गीले पैरों के निशान किले के पुराने महल की ओर जा रहे थे।
रात पूरी तरह उतर चुकी थी।
आसमान पर बादल थे और चाँद दिखाई नहीं दे रहा था।
आदित्य आगे चल रहा था।
उसके पीछे मीरा, कबीर और गोपाल थे।
कुछ दूरी पर जाकर निशान अचानक एक पत्थर की दीवार के सामने खत्म हो गए।
गोपाल ने दीवार को ध्यान से देखा।
“यहाँ कभी रास्ता हुआ करता था।”
कबीर ने पूछा—
“अब?”
“अब बंद है।”
आदित्य ने दीवार पर हाथ रखा।
उसे अंदर से हल्की धड़कन जैसी आवाज़ सुनाई दी।
धक… धक… धक…
उसने हाथ तुरंत पीछे खींच लिया।
“इस दीवार के पीछे कुछ है।”
गोपाल ने कहा—
“हमें यहाँ नहीं रुकना चाहिए।”
लेकिन मीरा ने दीवार के एक हिस्से पर हाथ रखा।
अचानक पत्थर अपने आप पीछे हट गया।
दीवार के अंदर एक संकरा रास्ता खुल गया।
अंदर से ठंडी हवा बाहर आई।
और साथ ही किसी महिला के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
गोपाल ने आँखें बंद कर लीं।
“यही है…”
“क्या?”
“रूहानी का कमरा।”
वे अंदर चले गए।
कमरा बहुत पुराना था।
बीच में पत्थर की एक चौकी थी।
उस पर एक टूटा हुआ आईना रखा था।
दीवारों पर अजीब निशान बने थे।
और एक कोने में लोहे का संदूक पड़ा था।
आदित्य ने संदूक खोला।
अंदर कुछ पुराने कागज़ और एक डायरी थी।
डायरी पर लिखा था—
“रूहानी की आखिरी रात।”
आदित्य ने डायरी खोल दी।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“मेरा नाम रूहानी है। मैं राजमहल में नृत्य करती हूँ। लेकिन पिछले कुछ दिनों से महल में एक तांत्रिक आया है। वह मुझे अपने वश में करना चाहता है।”
अगले पन्ने पर लिखा था—
“मैंने उसे मना कर दिया। उसने कहा कि वह मुझे इस किले की दीवारों में कैद कर देगा।”
मीरा ने पूछा—
“क्या वही तांत्रिक किले के श्राप का कारण था?”
गोपाल ने कहा—
“आगे पढ़ो।”
आदित्य ने अगला पन्ना पलटा।
“आज रात तांत्रिक ने मुझे एक मंत्र दिखाया। उसने कहा कि इस मंत्र से मेरी आत्मा हमेशा के लिए किले से बंध जाएगी। मैंने उसकी बात नहीं मानी।”
अगले पन्ने पर स्याही फैली हुई थी।
बस एक वाक्य साफ दिखाई दे रहा था—
“मैंने उसे नहीं मारा। लेकिन किसी और ने उसे मार दिया।”
सब चुप हो गए।
कबीर ने पूछा—
“किसी और ने?”
आदित्य ने डायरी के अगले पन्ने पलटे।
वहाँ सिर्फ एक चित्र था।
चित्र में एक महिला थी।
उसके पीछे एक काला साया।
साए के नीचे लिखा था—
“वह जो महल के नीचे रहता है।”
अचानक कमरे का आईना हिलने लगा।
मीरा पीछे हट गई।
आईने में चारों दिखाई दे रहे थे।
लेकिन उनके पीछे…
एक पाँचवीं आकृति खड़ी थी।
लंबे बाल।
सफेद चेहरा।
रूहानी।
कबीर ने पलटकर देखा।
पीछे कोई नहीं था।
फिर आईने में देखा।
रूहानी अभी भी वहीं थी।
इस बार वह मीरा के बिल्कुल पीछे खड़ी थी।
मीरा चीख पड़ी।
आईना अचानक टूट गया।
काँच के टुकड़े फर्श पर बिखर गए।
और उनमें से एक टुकड़े पर खून जैसा लाल निशान दिखाई दिया।
उस पर लिखा था—
“रूहानी कातिल नहीं थी।”
गोपाल ने धीरे से कहा—
“तो फिर असली कातिल कौन था?”
अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।
आदित्य ने उसे खोलने की कोशिश की।
दरवाज़ा नहीं खुला।
फिर दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।
“रूहानी…”
“रूहानी…”
“रूहानी…”
एक आवाज़ बाकी आवाज़ों से अलग थी।
वह पुरुष की थी।
“तुमने मेरा रहस्य क्यों खोला?”
कमरे की दीवार पर एक काली परछाईं उभरने लगी।
वह धीरे-धीरे इंसान के आकार में बदल गई।
गोपाल काँपने लगा।
“ये वही है…”
आदित्य ने पूछा—
“कौन?”
“तांत्रिक।”
परछाईं हँसी।
“सदियाँ बीत गईं…”
“फिर भी लोग मेरा नाम ढूँढते हैं।”
आदित्य ने साहस करके पूछा—
“तुमने रूहानी को श्राप दिया था?”
परछाईं ने कहा—
“नहीं।”
चारों एक-दूसरे को देखने लगे।
“तो किसने दिया?”
परछाईं ने जवाब दिया—
“उसने खुद को बचाने के लिए जो किया… वही उसका श्राप बन गया।”
तभी कमरे में तेज़ हवा चली।
दीवार पर एक दृश्य दिखाई देने लगा।
रूहानी उसी कमरे में खड़ी थी।
तांत्रिक उसके सामने मंत्र पढ़ रहा था।
लेकिन अचानक रूहानी ने जमीन से एक पत्थर उठाया और तांत्रिक के सिर पर मार दिया।
तांत्रिक जमीन पर गिर गया।
रूहानी डर गई।
वह भागने लगी।
लेकिन जाते-जाते उसने देखा कि तांत्रिक अभी जिंदा था।
उसने एक आखिरी मंत्र पढ़ा।
उसकी आत्मा एक काले धुएँ में बदल गई।
और रूहानी की चाँदी की पायल से जा चिपकी।
तांत्रिक ने कहा—
“जब तक यह पायल इस किले में रहेगी, मैं भी रहूँगा।”
रूहानी ने पायल उतारने की कोशिश की।
लेकिन पायल उसके पैर से चिपक चुकी थी।
वह चीखने लगी।
“मुझे बचाओ!”
तभी दृश्य समाप्त हो गया।
मीरा रोने लगी।
“तो रूहानी भी फँसी हुई थी।”
गोपाल ने कहा—
“और तांत्रिक उसकी आत्मा का इस्तेमाल करके लोगों को डराता रहा।”
आदित्य ने पूछा—
“तो इसे खत्म कैसे करें?”
परछाईं फिर सामने आ गई।
“पायल तोड़ दो।”
कबीर ने पूछा—
“बस?”
परछाईं हँसी।
“पायल टूटेगी तो मेरी शक्ति खत्म हो जाएगी। लेकिन…”
“लेकिन क्या?”
“जिसके हाथ से पायल टूटेगी, उसका डर हमेशा के लिए इस किले में कैद हो जाएगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आदित्य ने पायल उठाई।
“मैं इसे तोड़ूँगा।”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं!”
आदित्य ने कहा—
“अगर हमने इसे नहीं तोड़ा तो ये लोगों को हमेशा डराता रहेगा।”
गोपाल ने अचानक कहा—
“रुको।”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“पायल तोड़ने के लिए सिर्फ हिम्मत नहीं चाहिए।”
“क्या चाहिए?”
गोपाल ने कहा—
“जिसने रूहानी को धोखा दिया था, उसका खून।”
आदित्य चौंका।
“वो आदमी तो सदियों पहले मर चुका है।”
गोपाल ने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा।
“वह आदमी नहीं…”
“उसका वंश।”
गोपाल ने बताया कि किले के आसपास रहने वाले एक पुराने परिवार के बारे में कहा जाता था कि वे उसी तांत्रिक के वंशज थे।
और संयोग से…
गोपाल का परिवार भी उसी वंश से जुड़ा था।
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“मतलब?”
गोपाल ने अपनी जेब से चाकू निकाला और अपनी हथेली पर हल्का-सा कट लगाया।
एक बूंद खून पायल पर गिर गई।
अचानक पायल लाल रोशनी से चमकने लगी।
कमरा काँपने लगा।
काली परछाईं चीख उठी—
“नहीं!”
रूहानी की आत्मा आईने के टूटे हुए टुकड़ों में दिखाई दी।
उसने कहा—
“अब आखिरी काम बाकी है।”
आदित्य ने पूछा—
“क्या?”
रूहानी ने कहा—
“पायल को किले की सबसे ऊँची दीवार से नीचे फेंक दो।”
गोपाल ने कहा—
“लेकिन वहाँ पहुँचना असंभव है।”
रूहानी बोली—
“अगर सूर्योदय से पहले पायल किले से बाहर चली गई…”
“तो श्राप समाप्त हो जाएगा।”
अचानक काली परछाईं उन पर झपटी।
कमरे की दीवार टूट गई।
चारों भागे।
पीछे से भयानक चीखें आने लगीं।
आदित्य पायल लेकर आगे दौड़ रहा था।
कबीर और मीरा उसके साथ थे।
गोपाल पीछे मुड़कर देख रहा था।
काली परछाईं उनका पीछा कर रही थी।
वे किले की ऊँची दीवार के पास पहुँचे।
लेकिन वहाँ पहुँचते ही रास्ता बंद हो गया।
सामने सिर्फ एक गहरी खाई थी।
आदित्य ने नीचे देखा।
सूरज उगने में कुछ ही मिनट बाकी थे।
काली परछाईं उनके पीछे खड़ी थी।
उसने कहा—
“तुम पायल बाहर नहीं ले जा सकते।”
आदित्य ने पायल को कसकर पकड़ लिया।
तभी गोपाल ने पीछे से आवाज़ दी—
“आदित्य!”
आदित्य पलटा।
गोपाल मुस्कुरा रहा था।
उसने कहा—
“किसी एक को यहीं रहना होगा।”
और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता…
गोपाल ने पायल आदित्य के हाथ से छीन ली।
वह खाई की ओर भागा।
काली परछाईं उसके पीछे दौड़ी।
गोपाल ने आखिरी बार पीछे देखा।
फिर चिल्लाया—
“भागो!”
और वह पायल लेकर अंधेरे में गायब हो गया।
सूरज की पहली किरण आसमान पर दिखाई देने लगी।
लेकिन आदित्य, मीरा और कबीर के सामने अब सिर्फ एक सवाल था—
क्या गोपाल सच में मर गया था… या वह खुद किले का अगला हिस्सा बन चुका था?

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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