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😱भानगढ़ का किला😱 भाग 1 — किले में पहली रात😱

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 

 

राजस्थान की सूखी पहाड़ियों के बीच बसा भानगढ़ का किला दिन में भी किसी रहस्य से कम नहीं लगता था।

 

ऊँची-ऊँची टूटी दीवारें, सुनसान गलियाँ, पुराने महल के खंडहर और दूर तक फैली वीरानी…

 

लेकिन शाम होते ही उस जगह का माहौल पूरी तरह बदल जाता था।

 

स्थानीय लोग कहते थे कि सूरज ढलने के बाद किले के अंदर कोई नहीं जाता।

 

क्योंकि रात में वहाँ से पायल की आवाज़ आती थी।

 

कभी किसी औरत के रोने की।

 

और कभी…

 

किसी के धीरे-धीरे अपना नाम पुकारने की।

 

लेकिन आदित्य इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

 

वह एक युवा डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता था और उसे भारत की रहस्यमयी ऐतिहासिक जगहों पर फिल्में बनाना पसंद था।

 

उसके साथ उसकी दोस्त मीरा, कैमरा संभालने वाला कबीर और स्थानीय गाइड गोपाल थे।

 

गोपाल ने किले के मुख्य रास्ते पर पहुँचते ही कहा—

 

“एक बात पहले ही बता देता हूँ। सूरज डूबने के बाद हम यहाँ नहीं रुकेंगे।”

 

कबीर हँस पड़ा।

 

“क्यों? भूत पकड़ लेगा?”

 

गोपाल ने उसकी तरफ देखा।

 

“भूत से ज्यादा डर उस चीज़ का है जो खुद को भूत नहीं मानती।”

 

कबीर की हँसी अचानक रुक गई।

 

आदित्य ने कहा—

 

“हमें सिर्फ कुछ फुटेज चाहिए। अगर अंधेरा होने लगेगा तो निकल जाएँगे।”

 

गोपाल ने सिर हिला दिया।

 

चारों किले के अंदर जाने लगे।

 

जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, मोबाइल नेटवर्क गायब हो गया।

 

हवा भी अजीब तरह से ठंडी लग रही थी।

 

किले के पुराने बाजार के खंडहरों के बीच से गुजरते हुए मीरा ने एक टूटी हुई दुकान की दीवार पर कुछ देखा।

 

वहाँ लाल रंग से एक निशान बना था।

 

“ये क्या है?”

 

गोपाल ने निशान देखा और तुरंत दूसरी तरफ देखने लगा।

 

“इसे मत छूना।”

 

आदित्य ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

गोपाल ने जवाब नहीं दिया।

 

कुछ दूर जाने के बाद वे महल के पास पहुँचे।

 

महल का एक हिस्सा बाकी जगहों से अलग था।

 

उसकी दीवारें काली थीं।

 

गोपाल ने कहा—

 

“यहाँ रात में कोई नहीं आता।”

 

आदित्य ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

गोपाल ने धीरे से कहा—

 

“कहते हैं इसी हिस्से में राजदरबार की एक दासी रहती थी। उसका नाम था रूहानी।”

 

मीरा ने पूछा—

 

“रूहानी?”

 

“हाँ। लोग कहते हैं वह बहुत खूबसूरत थी। एक तांत्रिक उस पर मोहित हो गया था। उसने रूहानी को पाने के लिए जादू किया।”

 

आदित्य मुस्कुराया।

 

“ये तो पुरानी लोककथा है।”

 

गोपाल बोला—

 

“लोककथा हो या सच… लेकिन उस रात किले में बहुत कुछ हुआ था।”

 

“क्या?”

 

“रूहानी ने तांत्रिक का विरोध किया। तांत्रिक ने गुस्से में किले को श्राप दे दिया।”

 

कबीर ने पूछा—

 

“फिर?”

 

गोपाल कुछ कहता, उससे पहले अचानक ऊपर से पत्थर गिरा।

 

धड़ाम!

 

सभी चौंक गए।

 

गोपाल ने कहा—

 

“हमें वापस चलना चाहिए।”

 

लेकिन आदित्य ने कैमरा ऊपर कर दिया।

 

“यही तो हमें चाहिए।”

 

उन्होंने शूटिंग जारी रखी।

 

शाम होने लगी।

 

आसमान नारंगी से धीरे-धीरे काला होने लगा।

 

गोपाल बार-बार घड़ी देख रहा था।

 

“हमें अब निकलना होगा।”

 

लेकिन तभी कैमरे में कुछ दिखाई दिया।

 

मीरा ने स्क्रीन देखी।

 

“आदित्य…”

 

“क्या हुआ?”

 

“वहाँ कौन खड़ा है?”

 

कैमरे में उनसे लगभग पचास मीटर दूर एक महिला खड़ी दिखाई दे रही थी।

 

उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

 

बाल बहुत लंबे थे।

 

चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

 

आदित्य ने कैमरा नीचे किया।

 

सामने कोई नहीं था।

 

फिर कैमरा स्क्रीन पर देखा।

 

महिला अभी भी वहीं थी।

 

“ये कैसे संभव है?”

 

कबीर ने कैमरा लिया।

 

तभी स्क्रीन पर महिला ने अपना सिर उठाया।

 

और सीधे कैमरे की तरफ देखने लगी।

 

कबीर के हाथ काँप गए।

 

“आदित्य… इसे बंद कर।”

 

स्क्रीन अचानक काली हो गई।

 

उसी समय दूर से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

 

छन… छन… छन…

 

गोपाल का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“भागो।”

 

चारों तेजी से मुख्य द्वार की तरफ भागे।

 

लेकिन रास्ता जैसे बदल गया था।

 

जिस रास्ते से वे आए थे, वहाँ अब एक ऊँची दीवार खड़ी थी।

 

आदित्य ने कहा—

 

“ये रास्ता तो यहाँ था!”

 

गोपाल ने घबराकर कहा—

 

“किला रास्ते बदलता नहीं… हमें भटका रहा है।”

 

अचानक पीछे से किसी औरत की आवाज़ आई—

 

“रुक जाओ…”

 

चारों जम गए।

 

आवाज़ बहुत पास से आई थी।

 

मीरा ने धीरे से पीछे देखा।

 

कोई नहीं था।

 

फिर वही आवाज़ दूसरी तरफ से आई—

 

“मीरा…”

 

मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।

 

“इसे मेरा नाम कैसे पता?”

 

आदित्य ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“मेरे पीछे रहो।”

 

वे एक टूटे हुए कमरे में घुस गए।

 

कमरे का दरवाज़ा उन्होंने अंदर से बंद कर लिया।

 

कुछ सेकंड तक बाहर सन्नाटा रहा।

 

फिर…

 

ठक… ठक… ठक…

 

दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।

 

कबीर ने फुसफुसाकर पूछा—

 

“कौन है?”

 

बाहर से जवाब आया—

 

“गोपाल…”

 

गोपाल ने घबराकर कहा—

 

“मैं यहाँ हूँ।”

 

दरवाज़े के बाहर से फिर आवाज़ आई—

 

“दरवाज़ा खोलो।”

 

गोपाल आगे बढ़ा।

 

आदित्य ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“रुको।”

 

“वो मेरी आवाज़ है,” गोपाल ने कहा।

 

आदित्य ने धीरे से पूछा—

 

“अगर तुम अंदर हो… तो बाहर कौन बोल रहा है?”

 

गोपाल पीछे हट गया।

 

कुछ पल बाद बाहर से वही आवाज़ बदल गई।

 

अब वह आदित्य की आवाज़ थी।

 

“गोपाल, दरवाज़ा खोलो।”

 

फिर कबीर की।

 

“जल्दी खोलो!”

 

फिर मीरा की।

 

“मुझे डर लग रहा है।”

 

मीरा ने अपने कान बंद कर लिए।

 

बाहर से अचानक जोर-जोर से हँसी आने लगी।

 

दरवाज़ा हिलने लगा।

 

धड़ाम!

 

धड़ाम!

 

धड़ाम!

 

गोपाल ने कहा—

 

“ये हमें अंदर आने के लिए मजबूर कर रहा है।”

 

आदित्य ने पूछा—

 

“क्या?”

 

गोपाल ने जवाब दिया—

 

“किले का श्राप।”

 

अचानक कमरे की दीवार पर एक काला निशान उभर आया।

 

वही निशान जो उन्होंने रास्ते में देखा था।

 

लेकिन इस बार उसके नीचे एक शब्द लिखा था—

 

“रूहानी।”

 

मीरा ने डरते हुए कहा—

 

“ये नाम किसका है?”

 

गोपाल ने कहा—

 

“जिससे हमें डरना चाहिए था।”

 

उसी समय कमरे की छत से धूल गिरने लगी।

 

और फर्श के नीचे से किसी महिला की धीमी आवाज़ आई—

 

“तुम लोग बहुत देर से आए हो…”

 

आदित्य ने नीचे देखा।

 

फर्श के बीच एक पतली दरार बन चुकी थी।

 

उस दरार के अंदर से सफेद रोशनी निकल रही थी।

 

और फिर…

 

एक हाथ धीरे-धीरे जमीन से बाहर आया।

 

चारों चीख पड़े।

 

हाथ के साथ एक चाँदी की पायल भी बाहर निकली।

 

आदित्य ने पायल को देखा।

 

उसी क्षण उसके कैमरे की स्क्रीन अपने आप चालू हो गई।

 

स्क्रीन पर एक दृश्य दिखाई दिया।

 

एक पुराना महल।

 

एक महिला भाग रही थी।

 

उसके पीछे एक आदमी मंत्र पढ़ रहा था।

 

और महिला चिल्ला रही थी—

 

“मुझे छोड़ दो!”

 

फिर दृश्य बदल गया।

 

महिला ने कैमरे की तरफ देखा।

 

वह रूहानी थी।

 

उसके होंठ हिले।

 

आवाज़ बहुत धीमी थी—

 

“मुझे श्राप नहीं दिया गया था…”

 

फिर स्क्रीन काली हो गई।

 

आदित्य ने कहा—

 

“उसने क्या कहा?”

 

मीरा ने काँपते हुए जवाब दिया—

 

“उसने कहा… उसे श्राप नहीं दिया गया था।”

 

बाहर अचानक तेज़ हवा चलने लगी।

 

दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

 

सामने कोई नहीं था।

 

लेकिन जमीन पर गीले पैरों के निशान बने थे।

 

वे निशान धीरे-धीरे आगे जा रहे थे।

 

गोपाल ने कहा—

 

“अब हमें उस जगह जाना होगा जहाँ ये निशान जा रहे हैं।”

 

आदित्य ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

गोपाल ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्योंकि अगर हमने रूहानी की कहानी नहीं समझी…”

 

वह कुछ पल रुका।

 

“तो शायद हम इस किले से कभी बाहर नहीं निकल पाएँगे।”

 

और चारों उन रहस्यमयी पैरों के निशानों का पीछा करते हुए किले के उस हिस्से की ओर बढ़ गए…

 

जहाँ पिछले सौ साल से कोई नहीं गया था।

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