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बहु बनी डायन 😱 भाग 2 — हवेली के नीचे का रहस्य😱

पढ़ने का समय : 11 मिनट

 

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रात के लगभग एक बज चुके थे।भैरवपुर गाँव अब पूरी तरह नींद में डूबा हुआ था, लेकिन गाँव के बाहर खड़ी वह पुरानी हवेली जाग रही थी।

 

हवेली की टूटी हुई खिड़कियों से कभी-कभी पीली रोशनी बाहर आती और फिर अचानक गायब हो जाती।

 

हवा में चमगादड़ों की फड़फड़ाहट थी।

 

दूर कहीं सियार रो रहे थे।

 

और हवेली के सामने खड़े नंदिनी, अमन और हरिदास बाबा के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

 

भाग 1 में गौरी की आत्मा ने उन्हें हवेली के नीचे दफन सच खोजने का संकेत दिया था।

 

लेकिन किसी को नहीं पता था कि उस हवेली में उनके लिए क्या इंतजार कर रहा था।

 

अमन ने धीमी आवाज में कहा—

 

“नंदिनी, हमें वापस चलना चाहिए।”

 

नंदिनी ने हवेली की ओर देखते हुए कहा—

 

“अगर हम वापस चले गए तो गौरी की आत्मा कभी शांत नहीं होगी।”

 

हरिदास बाबा ने गंभीर आवाज में कहा—

 

“सिर्फ गौरी ही नहीं… शायद इस गाँव में कई आत्माएँ भटक रही हैं।”

 

अमन ने उनकी तरफ देखा।

 

“कई आत्माएँ?”

 

हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उन्होंने हवेली का पुराना दरवाजा धक्का देकर खोला।

 

चर्रररर…

 

दरवाजा इतनी तेज आवाज के साथ खुला कि तीनों सहम गए।

 

अंदर घना अंधेरा था।

 

हरिदास ने लालटेन जलाई।

 

कमरे में पुराने फर्नीचर पड़े थे।

 

दीवारों पर जाले लटक रहे थे।

 

छत से चमगादड़ उल्टे लटके हुए थे।

 

लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि दीवार पर दर्जनों औरतों के चित्र लगे थे।

 

हर चित्र के नीचे एक ही शब्द लिखा था—

 

“डायन।”

 

नंदिनी धीरे-धीरे एक चित्र के पास गई।

 

उसने धूल साफ की।

 

चित्र में एक बूढ़ी औरत थी।

 

नीचे लिखा था—

 

“सीता — डायन।”

 

दूसरे चित्र पर—

 

“मालती — डायन।”

 

तीसरे पर—

 

“कमला — डायन।”

 

नंदिनी ने घबराकर पूछा—

 

“ये सब कौन थीं?”

 

हरिदास ने कहा—

 

“गाँव की औरतें।”

 

“लेकिन इन्हें डायन क्यों कहा गया?”

 

हरिदास चुप रहे।

 

नंदिनी ने उनकी तरफ देखा।

 

“बाबा, आप सब जानते हैं।”

 

हरिदास ने आँखें बंद कर लीं।

 

“हाँ।”

 

“तो बताइए।”

 

हरिदास ने भारी आवाज में कहा—

 

“तीस साल पहले भैरव सिंह गाँव का सबसे ताकतवर आदमी था। उसके पास जमीन थी, पैसा था और लोग उससे डरते थे।”

 

“जो कोई उसके खिलाफ बोलता, उसे डायन या तांत्रिक कहकर बदनाम कर दिया जाता।”

 

अमन ने पूछा—

 

“लेकिन इससे उसे क्या फायदा होता था?”

 

“जमीन।”

 

हरिदास ने दीवार की ओर इशारा किया।

 

“इनमें से ज्यादातर औरतों के पास जमीन थी। डर फैलाकर उन्हें गाँव से भगाया गया और उनकी जमीन भैरव सिंह ने अपने नाम कर ली।”

 

नंदिनी की मुट्ठियाँ कस गईं।

 

“और गौरी?”

 

हरिदास की आँखें नम हो गईं।

 

“गौरी ने उसके खिलाफ आवाज उठाई थी।”

 

तभी ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

 

धड़ाम!

 

तीनों चौंक गए।

 

अमन ने लालटेन उठाई।

 

“ऊपर कोई है।”

 

हरिदास ने तुरंत कहा—

 

“हमें ऊपर नहीं जाना चाहिए।”

 

नंदिनी ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि जिस रात गौरी गायब हुई थी, वह आखिरी बार इसी हवेली में देखी गई थी।”

 

तीनों के पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।

 

नंदिनी ने धीरे से पूछा—

 

“आपने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?”

 

हरिदास ने कहा—

 

“क्योंकि मुझे डर था कि सच बाहर आया तो गाँव में फिर खून बह सकता है।”

 

नंदिनी ने दृढ़ आवाज में कहा—

 

“सच छिपाने से खून बहना बंद नहीं होता, बाबा।”

 

तीनों सीढ़ियों की ओर बढ़े।

 

हर कदम के साथ लकड़ी की सीढ़ियाँ कराह रही थीं।

 

चीं… चीं… चीं…

 

ऊपर पहुँचते ही उन्हें एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

 

गलियारे के अंत में एक बंद कमरा था।

 

उस दरवाजे पर खून से लिखा था—

 

“गौरी यहाँ नहीं मरी।”

 

नंदिनी ने दरवाजा खोला।

 

कमरे के अंदर एक पुरानी मेज थी।

 

मेज पर कुछ कागज पड़े थे।

 

अमन ने एक कागज उठाया।

 

उस पर लिखा था—

 

“जिसे दुनिया डायन समझती है, वह असल में गवाह है।”

 

नंदिनी ने दूसरा कागज उठाया।

 

उस पर गाँव के कई लोगों के नाम लिखे थे।

 

कुछ नामों के आगे लाल निशान लगा था।

 

नंदिनी ने देखा—

 

हरिदास का नाम भी उनमें था।

 

लेकिन उसके आगे लिखा था—

 

“डरा हुआ गवाह।”

 

हरिदास ने सिर झुका लिया।

 

“मैंने कहा था ना… मैं सब जानता था।”

 

नंदिनी ने पूछा—

 

“फिर गौरी को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?”

 

हरिदास की आँखों से आँसू निकल आए।

 

“मैं डर गया था।”

 

अचानक कमरे की खिड़की जोर से खुली।

 

धड़ाम!

 

ठंडी हवा अंदर आई।

 

दीवार पर लगी एक तस्वीर अपने आप गिर गई।

 

उसके पीछे एक गुप्त दरवाजा दिखाई दिया।

 

अमन ने कहा—

 

“यहाँ कुछ छिपा हुआ है।”

 

नंदिनी ने दरवाजा खोला।

 

नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

 

सीढ़ियों के नीचे घना अंधेरा था।

 

हरिदास ने काँपते हुए कहा—

 

“यही है…”

 

“क्या?”

 

“हवेली का तहखाना।”

 

तीनों धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे।

 

सीढ़ियाँ खत्म हुईं तो एक बड़ा कमरा सामने था।

 

कमरे के बीच में लोहे का संदूक रखा था।

 

संदूक पर पुराने ताले लगे थे।

 

नंदिनी ने उसे छुआ।

 

अचानक कमरे में किसी लड़की की हँसी गूँजी।

 

ही… ही… ही…

 

अमन पीछे हट गया।

 

“यह आवाज…”

 

हरिदास ने फुसफुसाकर कहा—

 

“गौरी।”

 

अचानक संदूक अपने आप खुल गया।

 

अंदर पुराने कपड़े, कागज और तस्वीरें थीं।

 

नंदिनी ने तस्वीरें उठाईं।

 

एक तस्वीर देखकर उसकी साँस रुक गई।

 

तस्वीर में भैरव सिंह खड़ा था।

 

उसके साथ गाँव के कई बड़े लोग थे।

 

और उनके बीच…

 

गौरी भी थी।

 

लेकिन गौरी के चेहरे पर डर था।

 

तस्वीर के पीछे लिखा था—

 

“आज रात सौदा पूरा होगा।”

 

नंदिनी ने पूछा—

 

“कौन-सा सौदा?”

 

हरिदास ने सिर हिलाया।

 

“मुझे नहीं पता।”

 

अमन ने संदूक के नीचे से एक और कागज निकाला।

 

वह जमीन का नक्शा था।

 

नक्शे पर हवेली, बरगद का पेड़ और गाँव के आसपास की जमीन दिखाई गई थी।

 

लाल निशान एक खास जगह पर था।

 

अमन ने कहा—

 

“यह जगह कहाँ है?”

 

हरिदास ने नक्शा देखते ही कहा—

 

“पुराना कुआँ।”

 

नंदिनी ने पूछा—

 

“वही कुआँ जहाँ गौरी गायब हुई थी?”

 

हरिदास ने सिर हिलाया।

 

तभी पीछे से आवाज आई—

 

“वह वहाँ नहीं मरी थी।”

 

तीनों ने एक साथ पीछे देखा।

 

कमरे के कोने में एक सफेद साया खड़ा था।

 

लंबे बाल।

 

झुका हुआ सिर।

 

और धीरे-धीरे ऊपर उठता हुआ चेहरा।

 

गौरी।

 

अमन ने डरकर आँखें बंद कर लीं।

 

नंदिनी वहीं खड़ी रही।

 

उसने पूछा—

 

“अगर तुम नहीं मरी थीं… तो तुम्हारे साथ क्या हुआ?”

 

गौरी ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उसने बस अपना हाथ उठाया।

 

और दीवार की तरफ इशारा किया।

 

दीवार पर अचानक दरार पड़ गई।

 

चर्ररर…

 

फिर ईंटें गिरने लगीं।

 

उनके पीछे एक छोटा कमरा दिखाई दिया।

 

कमरे के अंदर एक पुराना लकड़ी का बक्सा था।

 

नंदिनी ने बक्सा खोला।

 

उसमें एक डायरी थी।

 

पहले पन्ने पर लिखा था—

 

“यह मेरी आखिरी गवाही है।”

 

नंदिनी ने पढ़ना शुरू किया।

 

डायरी गौरी की थी।

 

उसमें लिखा था कि जिस रात गाँव वालों ने उसे डायन कहकर पकड़ने की कोशिश की, वह भागकर हवेली पहुँची थी।

 

वह भैरव सिंह से मदद माँगने आई थी।

 

लेकिन भैरव सिंह ने उसकी मदद करने के बजाय उसे कैद कर लिया।

 

गौरी ने वहाँ एक ऐसा राज देखा था, जिसके बारे में किसी को पता नहीं था।

 

भैरव सिंह अकेला नहीं था।

 

गाँव के कुछ बड़े लोग उसके साथ मिलकर लोगों की जमीन हड़पते थे।

 

जो विरोध करता, उसके बारे में अफवाह फैलाई जाती कि वह डायन के जादू से गाँव को नुकसान पहुँचा रहा है।

 

लेकिन डायरी का आखिरी हिस्सा सबसे ज्यादा डरावना था।

 

गौरी ने लिखा था—

 

“मैंने उन्हें एक ऐसी चीज करते देखा है, जिसे देखने के बाद शायद मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।”

 

इसके आगे के पन्ने फटे हुए थे।

 

नंदिनी ने कहा—

 

“बाकी पन्ने कहाँ हैं?”

 

तभी तहखाने में किसी आदमी की आवाज गूँजी—

 

“तुम्हें बाकी पन्ने नहीं मिलेंगे।”

 

तीनों पीछे मुड़े।

 

सीढ़ियों के पास एक आदमी खड़ा था।

 

वह गाँव का वर्तमान जमींदार वीरेंद्र सिंह था।

 

भैरव सिंह का पोता।

 

अमन ने गुस्से में कहा—

 

“तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

 

वीरेंद्र मुस्कुराया।

 

“उस सच को बचाने आया हूँ जिसे मेरे परिवार ने तीस साल से छिपा रखा है।”

 

नंदिनी ने पूछा—

 

“तुम्हें गौरी के बारे में सब पता है?”

 

वीरेंद्र ने कहा—

 

“मुझसे ज्यादा किसी को नहीं।”

 

हरिदास ने काँपते हुए पूछा—

 

“तुम्हारे दादा ने गौरी को कहाँ रखा था?”

 

वीरेंद्र की मुस्कान गायब हो गई।

 

“तहखाने में।”

 

नंदिनी ने कहा—

 

“क्या उन्होंने उसे मार दिया?”

 

वीरेंद्र ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

तीनों चौंक गए।

 

“तो फिर?”

 

वीरेंद्र ने कहा—

 

“गौरी उस रात भाग गई थी।”

 

“कहाँ?”

 

वीरेंद्र ने बरगद के पेड़ की ओर इशारा किया।

 

“लेकिन उसके बाद जो हुआ… वह मेरे परिवार के लिए भी रहस्य बन गया।”

 

तभी तहखाने की दीवारों से धीमी-धीमी खरोंचने की आवाज आने लगी।

 

खर्र… खर्र… खर्र…

 

अमन ने चारों तरफ देखा।

 

“ये आवाज कहाँ से आ रही है?”

 

वीरेंद्र अचानक डर गया।

 

“यह संभव नहीं…”

 

नंदिनी ने पूछा—

 

“क्या?”

 

वीरेंद्र ने फुसफुसाकर कहा—

 

“यह आवाज… तब आती है जब वह जागती है।”

 

“कौन?”

 

वीरेंद्र ने जवाब नहीं दिया।

 

अचानक तहखाने की सारी लालटेन बुझ गईं।

 

पूर्ण अंधकार।

 

फिर किसी ने नंदिनी का हाथ पकड़ लिया।

 

वह चीख पड़ी।

 

“अमन!”

 

“मैं यहाँ हूँ!”

 

“तो फिर मेरा हाथ किसने पकड़ा?”

 

अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

नंदिनी ने नीचे देखा।

 

उसकी कलाई पर पाँच काली उँगलियों के निशान थे।

 

तभी अंधेरे में एक और आवाज गूँजी।

 

लेकिन इस बार आवाज गौरी की नहीं थी।

 

वह किसी बूढ़ी औरत की आवाज थी।

 

“गौरी को मैंने नहीं मारा…”

 

हरिदास काँपने लगे।

 

आवाज फिर आई—

 

“उसे मैंने बनाया…”

 

अचानक दीवार पर एक चेहरा उभर आया।

 

वह चेहरा किसी बूढ़ी औरत का था।

 

उसकी आँखें लाल थीं।

 

और माथे पर गहरा काला निशान था।

 

वीरेंद्र चीख पड़ा—

 

“नहीं! यह नहीं हो सकता!”

 

नंदिनी ने पूछा—

 

“तुम इसे जानते हो?”

 

वीरेंद्र पीछे हटने लगा।

 

“मेरी दादी…”

 

हरिदास ने भयभीत होकर कहा—

 

“रुक जाओ…”

 

लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

 

दीवार पर वह चेहरा मुस्कुराया।

 

और बोला—

 

“जिसे तुम गौरी की आत्मा समझते रहे… वह गौरी नहीं थी।”

 

तभी तहखाने का दरवाजा जोर से बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

कमरे में भयंकर ठंड फैल गई।

 

और दीवार पर धीरे-धीरे एक नया नाम उभर आया—

 

“नंदिनी।”

 

नंदिनी पीछे हट गई।

 

उसके सामने अंधेरे में दो लाल आँखें चमक रही थीं।

 

फिर एक फुसफुसाहट सुनाई दी—

 

“अब तुम्हारी बारी है…”

 

अचानक जमीन फट गई।

 

नंदिनी नीचे गिरने लगी।

 

अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

लेकिन नीचे से किसी अदृश्य शक्ति ने नंदिनी को खींचना शुरू कर दिया।

 

“अमन! मुझे बचाओ!”

 

अमन पूरी ताकत लगा रहा था।

 

हरिदास मंत्र पढ़ने लगे।

 

वीरेंद्र दीवार से चिपककर खड़ा था।

 

और तभी…

 

गौरी की आत्मा अचानक प्रकट हुई।

 

उसने नंदिनी की ओर हाथ बढ़ाया।

 

एक तेज प्रकाश फैला।

 

नंदिनी ऊपर खिंच आई।

 

लेकिन गौरी का चेहरा अब शांत नहीं था।

 

वह पहली बार डरती हुई दिखाई दे रही थी।

 

उसने नंदिनी की तरफ देखा और कहा—

 

“वह जाग चुकी है…”

 

नंदिनी ने काँपते हुए पूछा—

 

“कौन?”

 

गौरी ने हवेली के नीचे अंधेरे की तरफ देखा।

 

फिर बोली—

 

“जिसने मुझे डायन बनाया था।”

 

अगले ही पल हवेली की पूरी जमीन हिलने लगी।

 

दीवारों से चीखें निकलने लगीं।

 

सैकड़ों औरतों की आवाजें एक साथ सुनाई दीं—

 

“हमें न्याय चाहिए…”

 

और हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में एक बूढ़ी औरत खड़ी दिखाई दी।

 

उसकी आँखें लाल थीं।

 

उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

 

और उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जिसे देखकर वीरेंद्र घुटनों के बल गिर पड़ा।

 

उसने काँपते हुए कहा—

 

“दादी…”

 

बूढ़ी औरत ने नीचे देखा।

 

और धीरे से बोली—

 

“तीस साल पहले मैंने एक डायन बनाई थी… अब मैं पूरे गाँव को अपना घर बनाऊँगी।”

 

अचानक पूरी हवेली अंधेरे में डूब गई।

 

और उसी अंधेरे में नंदिनी ने एक बात समझ ली—

 

गौरी से डरना शायद सबसे बड़ी भूल थी।

 

क्योंकि असली डरावनी शक्ति अभी तक छिपी हुई थी।

 

और अब वह जाग चुकी थी।

 

जारी रहेगा…

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