भाग~33 कौन है वो
रूहानी का दिल एक अजीब सी बेचैनी से घिर गया था। अद्वैत के सवाल के बाद कमरे में एक ऐसी खामोशी छा गई थी, जो केवल बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर भी गूंज रही थी।
वह जानती थी…. ये कोई आम निमंत्रण नहीं था। एक “पत्नी” के रूप में अद्वैत के साथ किसी सार्वजनिक मंच पर जाना, एक ऐसी पहचान को ओढ़ लेना था जो उसके लिए अब तक सिर्फ कागज़ पर थी। यह भी आसान नहीं था। `
उसका मन बार-बार चेतावनी दे रहा था…. “रूहानी, संभल जा। कहीं अद्वैत ये न समझे कि तू उसकी ज़िंदगी में खुद को थोपना चाहती है।” लेकिन वो ऐसा कभी नहीं चाही…. कभी भी नहीं…..
उसने खुद से बार-बार कहा, “मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया, न कभी कहा। ये सब गलतफहमी हो सकती है। मैं तो बस यहाँ अपने सपनों के लिए हूँ। पर फिर भी ‘हाँ’ देना सही होगा, क्योंकि इसी वजह से तो वो मुझसे कॉन्ट्रैक्ट मैरिज के लिए तैयार हुआ था।” फिर भी उसके अंदर की उलझन कहीं न कहीं उसे डांवाडोल कर रही थी।
फिर धीरे-धीरे उसने खुद को संभाला, अपने आप से, “यह हाँ सिर्फ एक समझौता है, कोई दिल की बात नहीं। ये मेरे सपनों का हिस्सा है, जो मुझे आगे बढ़ने देगा। बस इतना समझ लेना कि ये नज़दीकियां सिर्फ जरूरतों की बातें हैं और उससे ज्यादा कुछ नहीं।”
उस की आँखों में अब एक नई चमक थी…. एक ऐसा संतुलन जो उसके भीतर के डर और उम्मीद दोनों को समेटे हुए था। उसका मन तय कर चुका था कि चाहे कुछ भी हो, वह अपने सपनों को सबसे- ऊपर रखेग, और इस रिश्ते को भी एक समझौते के दायरे में ही रखेगी।
और इसी सोच के साथ, उसने ठाना कि अगले रविवार को वह अपनी ज़िंदगी के नए अध्याय के लिए तैयार होगी…. सपनों के साथ, मजबूती के साथ और अपने आप से वादे के साथ।
अद्वैत की आँखों में उम्मीद की एक हल्की रोशनी थी, मानो वो उस ‘हाँ’ के जवाब की तपती राह तक रहा हो।
“हाँ, मैं साथ चलूंगी…” रूहानी की आँखों में एक गहराई थी, जो सच बोल रही थी। फिर उसने धीरे से अपनी पुरानी बात दोहराई, “और इसी वजह से तो तुमने मुझसे कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की थी, है ना…?”
अद्वैत ने उसकी तरफ देखा, जैसे कुछ कहना चाहता हो, पर कुछ कह न सका।
रूहानी ने फिर से नज़रें फेर लीं, पर इस बार उसकी आंखों में एक अजीब सी गहराई थी। जैसे वो खुद को याद दिला रही हो…. ये सिर्फ एक सौदा है, एहसास नहीं।
रूहानी के “हाँ” कहने के बाद, जैसे ही अद्वैत की आँखों में एक पल के लिए राहत की झलक दिखी, उसने चुपचाप अपनी घड़ी की ओर देखा और धीरे से कहा, “मुझे अभी निकलना होगा… मैनेजर से मिलना है, कुछ पब्लिशिंग की डिटेल्स फाइनल करनी हैं। मैं वापस आकर बात करता हूँ।”
रूहानी ने बस सिर हिलाया, कोई सवाल नहीं किया। उसकी आवाज़ जैसे कहीं भीतर ही अटक गई थी। अद्वैत अपना मोबाइल उठाकर, अपने रूटीन से कुछ पेपर्स समेटकर निकल गया और दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ ने जैसे उस कमरे की हवा को और भारी कर दिया।-
अद्वैत ने जैसे ही दरवाज़ा बंद किया, एक पल के लिए उसकी चाल धीमी पड़ गई। सीढ़ियाँ उतरते हुए उसका मन अजीब सी खामोशी से गुज़र रहा था… वो खामोशी जो बाहर से शांत लगती है लेकिन भीतर बहुत कुछ तोड़ती रहती है।
उसकी उंगलियाँ अब भी मोबाइल के चारों ओर कसी हुई थीं, जैसे किसी असहज विचार को जकड़े हुए हों। कार में बैठते ही उसने गहरी साँस ली और शीशे में खुद को देखा…. वही चेहरा, वही ठहराव, लेकिन आँखों के पीछे अब भी कुछ बेकल था।
“क्या मैंने उसे कोई गलत उम्मीद दे दी?” उसने खुद से बुदबुदाया।
गाड़ी जैसे-जैसे पब्लिशिंग हाउस की ओर बढ़ रही थी, अद्वैत का ध्यान उस सुबह के हर लम्हे पर बार-बार लौट रहा था….. रूहानी की झिझक, उसकी मौन स्वीकृति और वो हल्का सा मुस्कान जो ना पूरी तरह अपनापन था, ना पूरी तरह दूरी।
मैनेजर से मुलाक़ात औपचारिक थी, लेकिन अद्वैत का ध्यान बार-बार भटकता रहा। टेबल पर रखे कॉन्ट्रैक्ट्स, आगामी बुक इवेंट्स की लिस्ट, मीडिया से जुड़ी सावधानियाँ…. सब कुछ उसकी आदत का हिस्सा था। पर आज उसकी आदतों में कुछ खलल था।
“सर, ये रहा साहित्यिक समारोह का डिटेल्ड शेड्यूल, जिसमें आपकी और आपकी पत्नी की फोटो साथ में देने को कहा गया है,” मैनेजर ने कहा, एक फोल्डर उसकी ओर सरकाते हुए।
अद्वैत ठिठका। कुछ पल फोल्डर को निहारता रहा, फिर पूछा, “अगर मैं अपनी पत्नी के साथ न जाऊँ तो?”
मैनेजर ने चौंककर उसकी ओर देखा, “तो सर… वो मीडिया को अलग मैसेज जाएगा। फिर आप ही कहते हैं कि अफवाहों से बचना है।”
अद्वैत ने चुपचाप फोल्डर बंद किया। “ठीक है,” उसने धीरे से कहा, लेकिन भीतर एक सवाल अब भी गूंज रहा था — क्या मैं उसे इस दुनिया का हिस्सा बनाने जा रहा हूँ, या फिर खुद उससे बच नहीं पा रहा?
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
उधर रूहानी अद्वैत के घर से निकलने के बाद कमरे में अकेली थी, लेकिन यह अकेलापन कुछ और ही था। ये वही घर था जहाँ कुछ देर पहले हल्की मुस्कानें थीं, कॉफी की खुशबू थी और कुछ अधूरे जुमलों के बीच छुपे इशारे। लेकिन अब सन्नाटा इतना घना हो चला था कि रूहानी को अपने दिल की धड़कनें भी ज़्यादा साफ सुनाई देने लगीं।
उसने खुद को संयत करते हुए खिड़की के पास जाकर बाहर … जहाँ अद्वैत की गाड़ी धूल उड़ाती हुई दूर जा रही थी। एक अजीब सी बात थी, वो जानती थी कि ये शादी सिर्फ एक समझौता है, एक दिखावा… और फिर भी, इस दूरी में कुछ तो था जो उसे कचोट रहा था।
“मैं क्यों सोच रही हूँ इतना?” वह बुदबुदाई, खुद से ही लड़ते हुए। “ये तो बस एक औपचारिकता है… एक दिन सब खत्म हो जाएगा और हम दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी में लौट जाएंगे।”
लेकिन क्या वो सच में लौट पाएगी?
अद्वैत की नज़रों का वो अटूट देखना, उसकी आवाज़ की वो सहज गर्माहट, और वो हिचकिचाहट भरी मुस्कानें… रूहानी को याद आ रही थीं।
उसने खुद से सवाल किया, “अगर ये सब कुछ सिर्फ दिखावा है, तो फिर ये एहसास क्यों इतने सच्चे लगते हैं?”
वो धीरे-धीरे चलती हुई फिर से स्टडी के दरवाज़े तक गई। हाथ( बढ़ाया… फिर वापस खींच लिया।
“नहीं रूहानी… तुम्हें कोई हक नहीं है उसके सच को जानने का… ये कांट्रैक्ट है, रिश्ता नहीं।”
लेकिन दिल कहाँ सुनता है तर्क की भाषा?
स्टडी का दरवाज़ा अब भी बंद था, पर इस बार ताले का क्लिक नहीं था और रूहानी की उंगलियाँ अब कांच की तरह नाज़ुक पर हौले से उस दरवाज़े को धकेलने को तैयार थीं…
दरवाज़ा खुलेगा या नहीं….. ये फैसला अब दिल करेगा, दिमाग नहीं।
लेकिन तभी मीना भी आ गई। उसके घर में कदम रखते ही रूहानी को अपने भीतर की बेचैनी को समेटना पड़ा।
मीना की मौजूदगी में वहाँ रुकना ठीक नहीं था। इसलिए वह धीमे कदमों से, अपनी सोचों और सवालों की परतें समेटते हुए, सीढ़ियों से उतरकर वापस हॉल में आ गई। लेकिन भीतर उसका मन बार-बार उसी स्टडी के दरवाज़े की ओर भाग रहा था, जो शायद अब लॉक नहीं था।
नीचे आते ही उसने एक झूठी सी सामान्य मुस्कान चेहरे पर ओढ़ ली, जैसे कुछ हुआ ही न हो, जैसे उसका मन हल्का और स्थिर हो। मीना ने किचन की ओर जाते हुए पूछा, “मैडम, साहब चले गए क्या?”
रूहानी ने सिर हिलाकर जवाब दिया, “हाँ, ज़रूरी थी।”
मीना के काम निपाटते ही, रूहानी ने अपनी फाइल और पैसे का बंडल उठाया, जो अद्वैत ने उसे सुबह दिया था। दस्तावेज़ संभालकर उसने बैग में रखा और मीना के साथ घर से निकल पड़ी…. मन में एक उम्मीद और माथे पर हल्का तनाव लिए।
धनौरी पहुँचकर वह उस पुरानी दुकान पर गई, जिसे वह खरीदना चाहती थी। वो उसकी मेहनत और सपनों का पहला ठिकाना बन सकती थी।
लेकिन वो वृद्ध दुकानदार, जो अब तक कुछ नरम दिखता था, इस बार बेहद सख्त और चालाक नजर आया। “देखिए मैडम,” उसने टेबल पर उँगली थपथपाते हुए कहा, “अभी की मार्केट वैल्यू के हिसाब से इसकी कीमत पैंतीस लाख से कम नहीं होगी।”
रूहानी ठिठक गई। उसके पास सिर्फ पच्चीस लाख थे, जो अद्वैत ने उसे दिए थे। वो समझ नहीं पा रही थी कि ये अचानक से रेट कैसे इतना बढ़ गया।
“लेकिन कल तो आपने पच्चीस की बात की थी…”
“वो तो कल की बात थी। आज किसी और ने आकर मुँह-माँगे दाम देने की बात की है। आप चाहें तो…”
उसके शब्द अधूरे रह गए, लेकिन रूहानी का चेहरा एकदम फीका पड़ गया।
किसी और ने?
उसने बैग को कसकर पकड़ा और कुछ पल के लिए उसकी आँखें झील की सतह जैसी स्थिर हो गईं।
“कौन है जो मेरी कोशिशों को रोकना चाहता है?”
उसके होंठ थरथराए, पर आवाज़ बाहर नहीं आई।
अब सवाल ये नहीं था कि दुकान मिलेगी या नहीं… बल्कि ये था……
कौन था वो जो उसके सपनों को ख़रीदने आया था… और क्यों?
और सबसे बड़ा सवाल….. क्या वो सच में अकेली थी इस सपने की राह में?
———–
रूहानी के भीतर छुपे उस सवाल की गूंज अब दूर-दूर तक फैलने लगी थी….. क्या कोई उसकी मेहनत को बर्बाद करने की साजिश रच रहा था? और अगर ऐसा है, तो कौन था वह अजनबी जो उसके सपनों को छीनने आया था?
क्या अद्वैत के साथ उसका ये कांट्रैक्ट रिश्ता सचमुच सिर्फ एक समझौता था, या इस रिश्ते के पीछे कहीं कोई अनकहा राज़ छुपा था?
और जब दरवाज़ा खुलने को था, तो क्या रूहानी अपनी दिल की आवाज़ सुन पाएगी, या फिर डर और शक की दीवारों में खो जाएगी?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹
प्रातिक्रिया दे