खन-खन की मनाही
पहाड़ों और घने जंगलों के बीच बसा एक छोटा-सा गांव था “चंद्रपुर” देखने में वह गांव किसी जन्नत से कम नहीं था। चारों ओर हरियाली, खेतों में लहलहाती फसलें और नदी का मीठा पानी। लेकिन उस गांव का एक अजीब नियम था।
उस गांव की कोई भी औरत अपने पैरों में पायल नहीं पहनती थी।
यहां तक कि शादी के दिन भी दुल्हन के पैरों में पायल नहीं बांधी जाती थी। गांव की बूढ़ी दादियां हमेशा अपनी बेटियों और बहुओं से कहती थीं,
“बेटी, चाहे सोने के गहने पहन लेना, लेकिन भूलकर भी पायल मत पहनना। उसकी खन-खन पूरे गांव पर मौत बनकर टूट सकती है।”
नई पीढ़ी इस बात पर यकीन नहीं करती थी। उन्हें लगता था कि यह सिर्फ पुरानी सोच है।
उसी गांव में चंदा नाम की एक 20 साल की लड़की रहती थी। वह बहुत सुंदर, समझदार और थोड़ा जिद्दी स्वभाव की थी। कुछ ही दिनों बाद उसकी शादी होने वाली थी।
जब उसकी सहेलियां दूसरे गांव से लौटीं तो वे तरह-तरह की चांदी की पायलें लेकर आईं।
“देख चंदा, कितनी सुंदर है ना?” एक सहेली बोली।
चंदा ने पहली बार इतनी खूबसूरत पायल देखी। उसके मन में भी इच्छा हुई।
घर आकर उसने अपनी दादी से पूछा,
“दादी, आखिर पायल पहनने से ऐसा क्या हो जाएगा?”
दादी का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
उन्होंने कहा,
“ये कहानी आज से करीब दो सौ साल पुरानी है।”
सभी लोग उनके आसपास बैठ गए।
दादी बोलीं,
“पहले हमारे गांव में हर लड़की पायल पहनती थी। पूरे गांव में दिन-रात उसकी मीठी खन-खन गूंजती रहती थी। लेकिन जंगल के उस पार एक भयानक राक्षस रहता था—घोरासुर। उसके कान इतने तेज थे कि वह कई कोस दूर की आवाज भी सुन लेता था।”
“उसे सबसे ज्यादा पायल की आवाज पसंद थी। जहां भी खन-खन सुनाई देती, वह समझ जाता कि वहां इंसान रहते हैं। फिर वह रात के अंधेरे में आता और पूरे गांव को उजाड़ देता।”
“एक रात उसने हमारे गांव पर हमला कर दिया। कई लोग मारे गए। गांव जल गया। तब एक साधु ने गांव वालों से कहा—’अगर जीना चाहते हो तो आज के बाद इस गांव की कोई भी स्त्री पायल नहीं पहनेगी। जब तक खन-खन नहीं होगी, राक्षस यहां का रास्ता भूल जाएगा।’”
तभी से यह नियम बन गया।
चंदा ने कहानी तो सुन ली, लेकिन उसके मन ने इसे सच नहीं माना।
कुछ दिनों बाद उसकी शादी का दिन आ गया।
दूल्हा दूसरे गांव से आया था। वहां की परंपरा के अनुसार दुल्हन को चांदी की पायल पहनाई जाती थी।
दूल्हे की मां ने मुस्कुराते हुए कहा,
“हमारी बहू बिना पायल के कैसी लगेगी?”
चंदा की मां ने हाथ जोड़कर मना कर दिया।
लेकिन रात को चंदा ने वही सुंदर पायल चुपके से निकाल ली।
उसने सोचा,
“बस थोड़ी देर पहनकर देखती हूं। किसी को क्या पता चलेगा?”
उसने जैसे ही पायल पहनी…
छन… छन… छन…
कमरे में मीठी आवाज गूंज उठी।
चंदा मुस्कुरा दी।
उसे क्या पता था कि कई कोस दूर, काले पहाड़ के भीतर एक विशाल गुफा में सोया हुआ घोरासुर अचानक आंखें खोल चुका था।
उसके कान फड़क उठे।
वह धीरे-धीरे मुस्कुराया।
“आखिर… इतने साल बाद फिर वही आवाज…”
उसने हवा को सूंघा।
“चंद्रपुर…”
इतना कहकर वह बिजली की रफ्तार से जंगल की ओर दौड़ पड़ा।
उधर गांव में अचानक कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगे।
पेड़ों पर बैठे पक्षी रात में ही उड़ने लगे।
गांव के सबसे बूढ़े पुजारी ने यह सब देखा तो उनका चेहरा पीला पड़ गया।
उन्होंने चिल्लाकर कहा,
“सब लोग घरों के अंदर चले जाओ। किसी ने पायल पहनी है!”
पूरा गांव घबरा गया।
लोग मशालें लेकर दौड़ पड़े।
तभी चंदा डर गई।
उसने तुरंत पायल उतार दी।
लेकिन देर हो चुकी थी।
धरती कांपने लगी।
जंगल से ऐसी दहाड़ सुनाई दी कि बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया।
कुछ ही देर में पेड़ टूटने लगे।
घोरासुर गांव के बाहर खड़ा था।
उसकी लंबाई किसी पेड़ जितनी थी। लाल आंखें अंगारों जैसी जल रही थीं।
वह गरजा,
“मुझे पता है… तुम यहीं हो… जिसने पायल पहनी है।”
गांव में सन्नाटा छा गया।
चंदा की आंखों से आंसू बहने लगे।
वह खुद आगे आ गई।
“गलती मेरी है। किसी और को मत मारो।”
गांव वाले उसे रोकने लगे, लेकिन वह नहीं रुकी।
राक्षस उसकी ओर बढ़ने लगा।
तभी गांव के मंदिर की घंटी अपने आप बज उठी।
वही साधु, जिनकी कहानी दादी ने सुनाई थी, जैसे अचानक वहां प्रकट हो गए। उनके हाथ में एक पुराना त्रिशूल था।
उन्होंने कहा,
“घोरासुर! तेरी ताकत आवाज में है। लेकिन आज तेरे अहंकार का अंत होगा।”
राक्षस जोर से हंसा।
“मुझे कोई नहीं रोक सकता।”
साधु ने त्रिशूल जमीन में गाड़ दिया।
पूरा गांव तेज रोशनी से भर गया।
घोरासुर आगे बढ़ना चाहता था, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में धंस गए।
साधु बोले,
“जिस आवाज के पीछे तू सदियों से भागता रहा, वही आज तेरे विनाश का कारण बनेगी।”
उन्होंने चंदा से कहा,
“बेटी, वह पायल फिर से पहन लो।”
चंदा घबरा गई।
“लेकिन… इससे तो ये और ताकतवर हो जाएगा।”
साधु मुस्कुराए।
“आज नहीं।”
चंदा ने कांपते हाथों से पायल पहन ली।
उसने धीरे से एक कदम आगे बढ़ाया।
छन… छन… छन…
इस बार पायल की आवाज पूरे गांव में गूंज उठी।
लेकिन इस बार वह साधारण आवाज नहीं थी।
त्रिशूल से निकली दिव्य शक्ति उस खन-खन में मिल गई।
घोरासुर दर्द से तड़पने लगा।
वह अपने कान बंद करने लगा।
“नहीं… ये क्या हो रहा है…!”
जितनी बार पायल बजती, उसकी ताकत उतनी ही कम होती जाती।
कुछ ही पलों में उसका विशाल शरीर पत्थर बनने लगा।
उसने आखिरी बार गुस्से से दहाड़ लगाई।
फिर पूरा शरीर पत्थर की मूर्ति बनकर वहीं खड़ा रह गया।
अगले ही पल वह हजारों टुकड़ों में टूटकर धूल बन गया।
गांव वाले खुशी से झूम उठे।
सदियों पुराना डर आखिर खत्म हो चुका था।
साधु मुस्कुराए और बोले,
“डर हमें बचा सकता है, लेकिन हमेशा डर में जीना सही नहीं। समझदारी और साहस मिल जाएं तो सबसे बड़ा राक्षस भी हार जाता है।”
इतना कहकर वे वहां से अदृश्य हो गए।
कुछ महीनों बाद पूरे गांव में पहली बार एक नई परंपरा शुरू हुई।
हर लड़की अपने पैरों में पायल पहनने लगी।
अब वही खन-खन, जो कभी मौत की निशानी थी, गांव की खुशियों की पहचान बन गई।
और आज भी जब चंद्रपुर की ग
लियों में पायल की मधुर आवाज गूंजती है, तो बुजुर्ग मुस्कुराकर अपने बच्चों से कहते हैं,
“ये सिर्फ पायल की खन-खन नहीं… ये उस साहस की आवाज है जिसने पूरे गांव को हमेशा के लिए भय से मुक्त कर दिया।”

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