श्रापित आईना
शहर से दूर, घने जंगलों के बीच एक विशाल लेकिन उजड़ा हुआ महल खड़ा था। लोग उसे “काली हवेली” के नाम से जानते थे। कहते थे कि उस हवेली में लगा एक पुराना आईना इंसान का चेहरा नहीं, बल्कि उसकी मौत दिखाता था।
जो भी उस आईने में अपनी आखिरी झलक देख लेता, वह सात दिनों के भीतर रहस्यमयी तरीके से मर जाता।
इसी वजह से कई सालों से उस हवेली के आसपास कोई नहीं जाता था।
लेकिन अदिति इन बातों पर विश्वास नहीं करती थी। वह इतिहास की शोधकर्ता थी और पुरानी हवेलियों के रहस्यों पर काम करती थी। उसे भूत-प्रेत की कहानियाँ नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी सच्चाई खोजने का शौक था।
एक दिन उसे काली हवेली के बारे में पता चला।
लोगों ने उसे बहुत समझाया।
“बेटी, वहाँ मत जाना। जिसने भी उस आईने को देखा है, वह कभी नहीं बचा।”
अदिति मुस्कुराई।
“अगर हर अफवाह सच होती, तो दुनिया में कोई ज़िंदा नहीं बचता।”
अगली सुबह वह कैमरा, डायरी और टॉर्च लेकर हवेली पहुँच गई।
हवेली का विशाल दरवाज़ा आधा टूटा हुआ था। अंदर हर तरफ धूल, मकड़ी के जाले और टूटी हुई मूर्तियाँ पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे सदियों से वहाँ कोई आया ही न हो।
वह धीरे-धीरे अंदर बढ़ती गई।
अचानक उसकी नज़र एक बड़े से कमरे पर पड़ी।
कमरे के बीचोंबीच सोने की नक्काशी वाला एक विशाल आईना रखा था।
उस पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।
अदिति ने रूमाल से धूल साफ की।
जैसे ही उसने आईने में देखा, उसका दिल धड़कना बंद होने जैसा हो गया।
आईने में उसका चेहरा नहीं था।
वहाँ उसने खुद को एक गहरी खाई के किनारे खड़ा देखा।
अचानक पीछे से किसी ने उसे ज़ोर से धक्का दिया।
आईने में दिख रही अदिति चीखती हुई खाई में गिर गई।
और उसी पल आईना फिर सामान्य हो गया।
अदिति के माथे पर पसीना आ गया।
“यह… यह क्या था?”
उसने खुद को समझाया कि शायद यह कोई भ्रम था।
वह जल्दी से हवेली से बाहर निकल आई।
लेकिन उसी रात उसे वही सपना आया।
वही खाई…
वही धक्का…
वही चीख…
अगले दिन उसने गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति से मुलाकात की।
बुज़ुर्ग ने उसकी बात सुनकर गहरी साँस ली।
“तुमने उस आईने में देख लिया?”
अदिति ने सिर हिलाया।
बुज़ुर्ग बोले, “अब तुम्हारे पास सिर्फ़ सात दिन हैं।”
“लेकिन यह सब होता क्यों है?”
बुज़ुर्ग ने बताया कि बहुत साल पहले उस हवेली में राजा वीरेंद्र रहता था। उसे अपनी सुंदरता और शक्ति पर बहुत घमंड था।
एक दिन एक साधु महल में आए और पानी माँगा।
राजा ने उनका अपमान कर दिया।
साधु ने क्रोधित होकर कहा,
“जिस चेहरे पर तुझे इतना घमंड है, अब यही चेहरा हर उस इंसान की मौत का कारण बनेगा जो इस आईने में झाँकेगा।”
उसी दिन से वह आईना श्रापित हो गया।
अदिति अब भी पूरी तरह विश्वास नहीं कर रही थी।
उसने तय किया कि वह इस रहस्य का वैज्ञानिक कारण ढूँढेगी।
उसने हवेली के पुराने दस्तावेज़ खोजने शुरू किए।
तीसरे दिन उसे तहखाने में एक गुप्त कमरा मिला।
वहाँ सैकड़ों पुरानी डायरियाँ रखी थीं।
एक डायरी राजा की बेटी राजकुमारी वैदेही की थी।
उसमें लिखा था—
“यह आईना मौत नहीं दिखाता… यह उस व्यक्ति को दिखाता है जो तुम्हारी मौत का कारण बनेगा। अगर उसे समय रहते पहचान लिया जाए, तो श्राप टूट सकता है।”
अदिति चौंक गई।
यानी उसकी मौत तय नहीं थी।
लेकिन उसे धक्का देने वाला कौन था?
उसने आईने में दिखे चेहरे को याद करने की कोशिश की।
चेहरा साफ नहीं दिखा था।
सिर्फ़ हाथ दिखाई दिया था।
उस हाथ में एक चाँदी की अंगूठी थी, जिस पर साँप बना हुआ था।
अचानक अदिति को याद आया।
ऐसी अंगूठी तो उसके साथ काम करने वाले उसके सहयोगी करण के हाथ में थी।
लेकिन करण तो उसका सबसे अच्छा दोस्त था।
क्या वह सचमुच उसे मार सकता था?
अदिति को विश्वास नहीं हुआ।
उसने करण से इस बारे में कुछ नहीं कहा।
छठे दिन करण अचानक उसके घर आया।
“तुम फिर उस हवेली में चलोगी? मुझे भी देखना है।”
अदिति ने हामी भर दी।
दोनों शाम को हवेली पहुँचे।
करण बार-बार उसी आईने के सामने जाने की ज़िद कर रहा था।
अदिति अब सतर्क थी।
जैसे ही वह खाई वाले कमरे के पास पहुँची, अचानक करण ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।
उसकी आँखों में अजीब लालच था।
“मुझे माफ़ कर देना अदिति।”
“क्या मतलब?”
करण बोला,
“मुझे हवेली का खज़ाना चाहिए। मैंने पुरानी किताबों में पढ़ा है कि यह खज़ाना तभी मिलेगा जब कोई उस आईने का श्राप अपने साथ ले जाएगा।”
यह सुनकर अदिति के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“तो तुम मुझे मारना चाहते थे?”
करण हँसने लगा।
“हाँ… क्योंकि आईने ने मुझे भी यही रास्ता बताया था।”
इतना कहकर उसने अदिति को धक्का देने की कोशिश की।
लेकिन अदिति पहले से तैयार थी।
वह एक कदम पीछे हट गई।
करण का संतुलन बिगड़ गया।
वह खुद पुराने लकड़ी के फर्श पर गिर पड़ा।
फर्श टूट गया और वह सीधे नीचे बने गहरे गड्ढे में जा गिरा।
उसकी चीख पूरी हवेली में गूँज उठी।
कुछ ही सेकंड में सब शांत हो गया।
अदिति काँपते हुए नीचे पहुँची।
लेकिन करण की साँसें थम चुकी थीं।
उसी समय हवेली ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगी।
वह भागकर फिर उसी आईने वाले कमरे में पहुँची।
आईने में अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।
पहली बार उसमें मौत की कोई तस्वीर नहीं थी।
तभी आईने के अंदर से एक हल्की रोशनी निकली।
उस रोशनी में राजकुमारी वैदेही की आकृति दिखाई दी।
वह मुस्कुराकर बोली,
“श्राप खत्म हो चुका है। यह आईना कभी मौत नहीं दिखाता था। यह सिर्फ़ इंसान के सबसे बड़े दुश्मन की पहचान कराता था। लेकिन लालच में अंधे लोगों ने इसे मौत का आईना समझ लिया।”
इतना कहते ही आईने में दरार पड़ने लगी।
कुछ ही पलों में वह हज़ारों टुकड़ों में बिखर गया।
सदियों पुराना श्राप हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
अदिति हवेली से बाहर निकल आई।
उसने पूरी घटना किसी को नहीं बताई।
लोगों को सिर्फ़ इतना पता चला कि काली हवेली अब श्रापमुक्त हो चुकी है।
कुछ महीनों बाद उस हवेली को एक ऐतिहासिक धरोहर घोषित कर दिया गया।
दूर-दूर से लोग उसे देखने आने लगे।
लेकिन अदिति ने कभी किसी को उस टूटे हुए आईने के बारे में नहीं बताया।
क्योंकि वह जान चुकी थी कि दुनिया में सबसे खतरनाक श्राप किसी आईने में नहीं होता…
वह इंसान के लालच और विश्वासघात में छिपा होता है।

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