शीर्षक: हर जन्मदिन पर उम्र घटने वाली लड़की
बारिश की हल्की बूंदें आसमान से गिर रही थीं। शहर के एक छोटे से घर में रहने वाली नायरा आज अपना अठारहवाँ जन्मदिन मना रही थी। घर में केक, मोमबत्तियाँ और खुशियों का माहौल था, लेकिन उसकी माँ मीरा के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। उनकी आँखों में एक ऐसा डर था, जिसे वे हर साल छिपाने की कोशिश करती थीं।
केक काटने के बाद जैसे ही घड़ी ने रात के बारह बजाए, अचानक नायरा को तेज़ चक्कर आने लगे। वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गई। कुछ देर बाद जब उसे होश आया तो उसे अजीब महसूस हुआ। अगले दिन जब वह कॉलेज पहुँची, तो उसके दोस्तों ने हैरानी से कहा, नायरा, तू आज पहले से छोटी लग रही है।
शुरुआत में सबने इसे मज़ाक समझा, लेकिन कुछ ही दिनों में सच सामने आ गया। उसका चेहरा सचमुच सोलह साल की लड़की जैसा दिखने लगा था। डॉक्टरों ने हर तरह की जाँच की, लेकिन सब रिपोर्ट बिल्कुल सामान्य थीं।
एक साल बीता।
उन्नीसवें जन्मदिन की रात वही घटना दोबारा हुई। इस बार सुबह उठकर उसने आईने में देखा तो वह लगभग चौदह साल की बच्ची जैसी दिखाई दे रही थी।
अब माँ मीरा का डर और बढ़ गया। उन्होंने नायरा को स्कूल या कॉलेज भेजना बंद कर दिया। लोगों से मिलना-जुलना भी कम कर दिया। पड़ोसी तरह-तरह की बातें बनाने लगे।
इस लड़की पर कोई साया है।ज़रूर किसी ने टोना किया है।
लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था।
एक दिन नायरा ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, मुझसे क्या छिपा रही हो? हर जन्मदिन पर मेरे साथ ऐसा क्यों होता है?”
मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटी हुई डायरी निकाली।
“अब समय आ गया है कि तुझे सब सच बता दूँ।”
डायरी नायरा के जन्म से भी पहले की थी। उसमें लिखा था कि मीरा और उनके पति कई साल तक संतान के लिए तरसते रहे। एक दिन वे पहाड़ों में रहने वाली एक रहस्यमयी साध्वी के पास पहुँचे।
साध्वी ने कहा था, “तुम्हें बेटी मिलेगी, लेकिन उसकी ज़िंदगी साधारण नहीं होगी। अगर उसके जन्म का रहस्य कभी किसी लालची इंसान तक पहुँचा, तो उसकी उम्र हर जन्मदिन पर एक साल बढ़ने के बजाय दो साल घटती जाएगी।”
मीरा ने उस समय इन बातों पर ध्यान नहीं दिया था।
लेकिन नायरा के दसवें जन्मदिन से ही यह अजीब बदलाव शुरू हो गया।
नायरा ने काँपती आवाज़ में पूछा, “क्या इसका कोई इलाज है?”
मीरा बोलीं, “डायरी में लिखा है कि पहाड़ों के उसी मंदिर में जवाब मिलेगा।”
अगले ही दिन दोनों माँ-बेटी उस पुराने पहाड़ी मंदिर के लिए निकल पड़ीं।
घने जंगल, ऊँचे पहाड़ और सुनसान रास्ते पार करने के बाद वे मंदिर पहुँचीं। वहाँ वही साध्वी अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं।
उन्होंने नायरा को देखते ही कहा, “मुझे पता था, तुम एक दिन ज़रूर आओगी।”
नायरा ने उनसे सारी बात पूछी।
साध्वी ने कहा, “तुम्हारी उम्र किसी बीमारी से नहीं घट रही। तुम्हारी जीवन-शक्ति कोई और चुरा रहा है।”
“कौन?”
“तुम्हारे पिता का अपना बड़ा भाई।”
यह सुनकर मीरा दंग रह गईं।
साध्वी ने बताया कि नायरा के चाचा ने वर्षों पहले तांत्रिक विद्या सीख ली थी। उसे पता चल गया था कि नायरा के जन्म के साथ एक दुर्लभ वरदान जुड़ा है। वह अपनी बढ़ती उम्र रोकने के लिए हर साल नायरा की एक-एक साल की जीवन-शक्ति चुरा रहा था।
नायरा को विश्वास नहीं हुआ।
“लेकिन चाचा तो हमेशा हमारे साथ अच्छे रहे हैं।”
साध्वी बोलीं, “बुराई हमेशा मुस्कुराकर सामने आती है।”
उन्होंने नायरा को एक ताबीज़ दिया और कहा, “अगले जन्मदिन की रात सच अपने आप सामने आ जाएगा।”
एक साल बाद…
नायरा का बीसवाँ जन्मदिन था, लेकिन उसका शरीर अब बारह साल की बच्ची जैसा दिखता था।
रात के बारह बजते ही पूरे घर की बिजली चली गई। हवा तेज़ चलने लगी। तभी आँगन में काले कपड़ों में एक आदमी दिखाई दिया।
वह कोई और नहीं, उसका चाचा था।
वह हाथ में एक पुरानी माला लिए कुछ मंत्र पढ़ रहा था। जैसे ही उसने माला उठाई, नायरा के शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।
उसी समय नायरा ने साध्वी का दिया हुआ ताबीज़ कसकर पकड़ लिया।
ताबीज़ तेज़ चमकने लगा।
अचानक रोशनी वापस पलटी और सीधे उसके चाचा के ऊपर गिर गई।
वह दर्द से चीख उठा।
उसका असली चेहरा सामने आने लगा। कुछ ही सेकंड में वह बूढ़ा, कमजोर और झुर्रियों से भरा इंसान बन गया।वह ज़मीन पर गिर पड़ा।
रोते हुए बोला, “मैं मरना नहीं चाहता था… इसलिए हर साल इसकी उम्र चुराता रहा।”
मीरा की आँखों में आँसू थे।
उन्होंने कहा, “तुमने अपने ही भाई की बेटी के साथ ऐसा किया?”
चाचा ने सिर झुका लिया।
उसी समय तेज़ हवा चली और मंदिर की साध्वी वहाँ प्रकट हुईं।
उन्होंने कहा, “जिसने किसी और की ज़िंदगी चुराई, उसकी अपनी उम्र भी अब उसी पाप का हिसाब देगी।”
अगले ही पल चाचा राख बनकर हवा में बिखर गया।
घर में फिर से शांति लौट आई।
धीरे-धीरे नायरा के शरीर में बदलाव आने लगे। पहली बार उसकी उम्र बढ़ने लगी। कुछ महीनों बाद वह फिर अपनी असली उम्र जैसी दिखने लगी।
माँ ने राहत की साँस ली।
नायरा ने अपनी पढ़ाई पूरी की और डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया। उसने ठान लिया कि वह लोगों के शरीर ही नहीं, उनके टूटे हुए हौसलों का भी इलाज करेगी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
एक दिन अस्पताल में काम करते हुए उसके पास एक सात साल की बच्ची लाई गई। उसकी माँ रोते हुए बोली, “डॉक्टर साहिबा… मेरी बेटी का हर जन्मदिन आने पर उसकी उम्र बढ़ने की बजाय कम होने लगती है…”
नायरा के हाथ से फ़ाइल गिर गई।
उसे अचानक वही पुराना ताबीज़ याद आया।
उसने उसे वर्षों से संभालकर रखा था।
उसकी नज़र खिड़की के बाहर गई। दूर पहाड़ों की दिशा में उसे ऐसा लगा जैसे वही बूढ़ी साध्वी मुस्कुरा रही हों।
नायरा समझ गई कि उसका संघर्ष सिर्फ़ उसकी अपनी कहानी नहीं था। शायद अब उसकी ज़िम्मेदारी थी कि वह उस रहस्य का हमेशा के लिए अंत करे, ताकि फिर कभी किसी मासूम की ज़िंदगी उसकी उम्र से न छीनी जाए।
उसने बच्ची का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा,
“डरो मत… इस बार तुम्हें अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा।”
यहीं से एक नई कहानी की शुरुआत हुई।

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