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श्रापित तितली

पढ़ने का समय : 6 मिनट

श्रापित तितली

 

बहुत समय पहले, पहाड़ों के बीच एक जादुई जंगल था। उस जंगल में रंग-बिरंगी परियां रहती थीं। उन्हीं में एक नन्ही और चंचल परी थी, जिसका नाम तारा था। तारा का दिल बहुत साफ था, लेकिन वह बहुत शरारती भी थी। उसे हर नई चीज़ जानने की उत्सुकता रहती थी।

 

परियों के गुरु, गुरु वायुनाथ, पूरे जंगल के सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली गुरु थे। उन्होंने सभी परियों को एक नियम दिया था।

 

“कभी भी उत्तर दिशा की पहाड़ी पर लगे सुनहरे फूल को मत छूना। वह फूल जादुई है और उसके पीछे बहुत बड़ा रहस्य छिपा है।”

 

सभी परियां गुरु की बात मानती थीं, लेकिन तारा के मन में बार-बार यही सवाल उठता, “आख़िर उस फूल में ऐसा क्या है जिसे देखने तक की मनाही है?”

 

एक सुबह, जब सारी परियां अपने काम में लगी थीं, तारा चुपके से उड़ती हुई उत्तर दिशा की पहाड़ी पर पहुंच गई। वहां सचमुच एक सुनहरा फूल चमक रहा था। उसकी खुशबू इतनी मीठी थी कि तारा खुद को रोक नहीं सकी।

 

जैसे ही उसने फूल को हाथ लगाया, पूरे जंगल में तेज़ रोशनी फैल गई। आसमान काला पड़ गया और बिजली चमकने लगी। पेड़ तेज़ हवा में झूमने लगे और पूरा जंगल जैसे कांप उठा।

 

अगले ही पल गुरु वायुनाथ वहां प्रकट हुए। उनकी आंखों में गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।

 

“तारा! मैंने तुम्हें चेतावनी दी थी। फिर भी तुमने मेरी आज्ञा तोड़ दी।”

 

तारा डर गई। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“गुरुदेव… मुझसे गलती हो गई। मुझे माफ़ कर दीजिए।”

 

गुरु बोले, “हर गलती की एक कीमत होती है। यदि आज तुम्हें बिना दंड के छोड़ दूं, तो बाकी परियां भी नियमों का सम्मान करना छोड़ देंगी।”

 

उन्होंने अपना जादुई दंड उठाया और बोले,

 

“आज से तुम्हारे पंख छिन जाएंगे। तुम एक नन्ही तितली बनकर धरती पर जीवन बिताओगी। जब तक तुम किसी ऐसे इंसान के दिल में बिना जादू के सच्ची दया और प्रेम नहीं जगा दोगी, तब तक यह श्राप नहीं टूटेगा।”

 

इतना कहते ही तारा के चमकीले परी वाले पंख गायब हो गए। उसका शरीर छोटा होने लगा और कुछ ही पलों में वह एक सुंदर, रंग-बिरंगी तितली बन गई।

 

तारा जोर-जोर से रोने लगी।

 

“गुरुदेव… मैं फिर से परी बनना चाहती हूं।”

 

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

 

तितली बनी तारा जंगलों, खेतों और बागों में उड़ती रहती। लोग उसकी सुंदरता की तारीफ करते, लेकिन कोई उसके दिल का दर्द नहीं समझता था।

 

तितली बनने के बाद उसने पहली बार दुनिया को बहुत करीब से देखा। पहले वह एक परी थी, इसलिए उसे कभी भूख, डर या अकेलेपन का एहसास नहीं हुआ था। लेकिन अब हर दिन उसके लिए एक नई परीक्षा लेकर आता था। कभी तेज़ बारिश उसके नाज़ुक पंखों को भिगो देती, तो कभी आंधी उसे बहुत दूर जंगलों तक उड़ा ले जाती। कई बार पक्षी उसे अपना शिकार बनाने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़ते। वह किसी पत्ते या फूल के पीछे छिपकर अपनी जान बचाती।

 

धीरे-धीरे तारा को समझ आने लगा कि छोटा होना कमजोरी नहीं, बल्कि धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षा है। उसने देखा कि छोटी-सी चींटी अपने से कई गुना बड़ा दाना उठाकर चलती है, मधुमक्खियां बिना थके शहद इकट्ठा करती हैं और छोटे-छोटे जीव भी कभी हार नहीं मानते। यह सब देखकर उसका स्वभाव बदलने लगा। अब वह पहले जैसी जिद्दी नहीं रही थी। उसने मन ही मन प्रण किया कि अगर उसे दोबारा कभी परी बनने का मौका मिला तो वह गुरु की हर बात का सम्मान करेगी।

 

दिन बीतते गए… महीने गुजर गए… फिर साल भी बीत गए।

 

एक दिन वह एक छोटे से गांव में पहुंची। वहां उसे आठ साल का एक लड़का मिला, जिसका नाम मोहन था।

 

मोहन बहुत गरीब था। उसके पास खिलौने नहीं थे, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था।

 

एक दिन कुछ बच्चे खेलते-खेलते तितली को पकड़ने लगे। कोई उसके पंख तोड़ना चाहता था, तो कोई उसे डिब्बे में बंद करना चाहता था।

 

तारा डरकर इधर-उधर उड़ने लगी।

 

तभी मोहन दौड़ता हुआ आया।

 

उसने बच्चों से कहा,

 

“उसे मत पकड़ो। अगर कोई तुम्हें पकड़कर बंद कर दे तो कैसा लगेगा?”

 

बच्चे हंसने लगे।

 

“अरे, ये तो सिर्फ एक तितली है।”

 

मोहन बोला,

 

“इसके भी प्राण हैं। इसे भी दर्द होता होगा।”

 

उसने अपने दोनों हाथों से तितली को बचाया और धीरे से खुले आसमान की ओर उड़ा दिया।

 

तारा पहली बार किसी इंसान की आंखों में इतनी सच्ची दया देख रही थी।

 

उसकी आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े।

 

लेकिन श्राप अभी भी नहीं टूटा।

 

वह सोचने लगी, “शायद अभी मेरी परीक्षा पूरी नहीं हुई।”

 

कुछ दिनों बाद गांव में भीषण सूखा पड़ गया। खेत सूख गए। कुएं खाली होने लगे। लोग परेशान हो गए।

 

मोहन रोज़ अपने पीने के पानी में से थोड़ा-सा पानी बचाकर गांव के बाहर लगे छोटे-छोटे पौधों को सींचता था।

 

लोग उसका मजाक उड़ाते।

 

“जब इंसानों के लिए पानी नहीं है, तब पेड़ों को क्यों बचा रहा है?”

 

मोहन मुस्कुराकर कहता,

 

“अगर पेड़ नहीं बचेंगे, तो हम भी नहीं बचेंगे।”

 

तारा रोज़ यह सब देखती और मन ही मन मोहन की अच्छाई पर गर्व महसूस करती।

 

एक शाम मोहन ने देखा कि एक घायल चिड़िया ज़मीन पर पड़ी है। उसने उसे घर ले जाकर दाना-पानी दिया। कई दिनों तक उसकी सेवा की। जब चिड़िया पूरी तरह ठीक हो गई तो उसने उसे खुले आसमान में उड़ा दिया।

 

उसी रात गांव में तेज़ बारिश हुई। सूखे खेतों में फिर से हरियाली लौटने लगी। लोग खुशियां मनाने लगे। मोहन ने आसमान की ओर देखकर भगवान का धन्यवाद किया।

 

उसी समय तारा के चारों ओर सुनहरी रोशनी फैलने लगी।

 

आसमान से गुरु वायुनाथ प्रकट हुए।

 

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

 

“तारा, तुम्हारा श्राप समाप्त हो गया।”

 

तारा हैरानी से बोली,

 

“लेकिन गुरुदेव, मैंने तो कोई जादू नहीं किया।”

 

गुरु मुस्कुराए।

 

“यही तुम्हारी सबसे बड़ी परीक्षा थी। तुमने किसी के मन को जादू से नहीं बदला। तुमने धैर्य रखा, जीवन की कठिनाइयों को सहा और सच्ची करुणा को अपने सामने खिलते हुए देखा। तुम्हारे बदलते स्वभाव और मोहन की निस्वार्थ दया ने इस श्राप को तोड़ दिया।”

 

अगले ही पल तितली फिर से एक सुंदर परी बन गई। उसके पंख पहले से भी अधिक चमक रहे थे।

 

तारा की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। उसने गुरु के चरण छू लिए।

 

“गुरुदेव, आज मुझे समझ आया कि शक्ति से बड़ा अनुशासन होता है, और जादू से बड़ी दया।”

 

गुरु ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ रखा और बोले,

 

“जो अपनी गलती से सीख लेता है, वही सच्चा शिष्य कहलाता है।”

 

उस दिन के बाद तारा फिर कभी अहंकार या जिद में नहीं आई। वह नई परियों को अपनी कहानी सुनाती और कहती,

 

“जिज्ञासा अच्छी बात है, लेकिन गुरु की आज्ञा और अनुशासन उससे भी अधिक जरूरी है। दया, प्रेम और धैर्य में इतनी शक्ति होती है कि वे सबसे कठिन श्राप को भी समाप्त कर सकते हैं।”

 

कहा जाता है कि आज भी जब किसी बगीचे में कोई रंग-बिरंगी तितली बच्चों के आसपास बिना डरे उड़ती है, तो लोग मुस्कुराकर कहते हैं”शायद यह वही श्रापित तितली है, जो अब हर किसी को प्रेम, दया और आज्ञा का सम्मान करना सिखाने आती है।”

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