😱 सुहागन चुड़ैल 😱 सिंदूर का श्राप😱
PART-2
कमरे में सैकड़ों चूड़ियों के टूटने की आवाज़ गूँज रही थी। अर्जुन के पैरों तले ज़मीन जैसे जम गई थी। उसके सामने खड़ी लाल साड़ी वाली दुल्हन की गर्दन पूरी तरह पीछे घूम चुकी थी, लेकिन उसका शरीर अब भी सीधा खड़ा था।
अचानक उसने एक भयानक चीख मारी।
चीख इतनी डरावनी थी कि हवेली की खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं। तेज़ हवा चलने लगी। दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरें गिरकर टूट गईं।
अर्जुन ने काँपते हुए अपना कैमरा उठाया और भागने लगा।
लेकिन जैसे ही वह दरवाज़े तक पहुँचा, दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
उसने पूरी ताकत से दरवाज़ा खींचा, पर वह नहीं खुला।
पीछे से पायल की आवाज़ धीरे-धीरे उसके पास आने लगी।
छन… छन… छन…
अर्जुन ने हिम्मत करके पीछे देखा।
दुल्हन अब उससे केवल पाँच कदम दूर थी।
उसकी आँखों के काले गड्ढों से खून बह रहा था। होंठों पर मुस्कान पहले से भी चौड़ी हो चुकी थी।
वह धीमी आवाज़ में बोली—
“दूल्हे… मुझे छोड़कर कहाँ जाओगे?”
अर्जुन घबरा गया।
“मैं तुम्हारा दूल्हा नहीं हूँ!”
दुल्हन ज़ोर से हँस पड़ी।
“हर जन्म में यही कहते हो…”
इतना कहकर उसने अपना हाथ अर्जुन की तरफ बढ़ाया।
उसकी उँगलियाँ अचानक लंबी होकर पंजों जैसी हो गईं।
अर्जुन ने पास पड़ा लकड़ी का एक टूटा दरवाज़ा उठाकर उसकी ओर फेंका।
लकड़ी उसके आर-पार निकल गई।
मानो उसका शरीर धुएँ का बना हो।
अर्जुन समझ गया कि वह किसी इंसान से नहीं, किसी भयानक शक्ति से सामना कर रहा है।
तभी उसकी नज़र कमरे के कोने में रखी एक पुरानी पीतल की घंटी पर पड़ी।
उसे याद आया कि गाँव के बुज़ुर्गों ने कहा था—”बुरी आत्माएँ मंदिर की घंटी की आवाज़ से कमज़ोर पड़ती हैं।”
उसने दौड़कर घंटी उठाई और पूरी ताकत से बजा दी।
टन… टन… टन…
घंटी की आवाज़ गूँजते ही दुल्हन दर्द से चीख उठी।
उसका चेहरा जलने लगा।
वह पीछे हट गई और धुएँ में बदलकर गायब हो गई।
अर्जुन ने तुरंत दरवाज़ा खोला और हवेली से बाहर भाग निकला।
बाहर निकलते ही वह सीधे गाँव के पुराने शिव मंदिर पहुँचा।
मंदिर में केवल एक बूढ़े पुजारी बैठे थे।
उन्होंने अर्जुन को देखते ही कहा—
“तुम उसे देख आए हो।”
अर्जुन हैरान रह गया।
“आपको कैसे पता?”
पुजारी ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारे माथे पर उसका सिंदूर लग चुका है।”
अर्जुन ने जेब से मोबाइल निकाला और सेल्फी कैमरा खोला।
उसके माथे पर सचमुच लाल सिंदूर की एक पतली रेखा बनी हुई थी।
वह घबरा गया।
“यह कैसे हुआ?”
पुजारी बोले—
“अब वह तुम्हें छोड़ने वाली नहीं।”
अर्जुन ने काँपती आवाज़ में पूछा—
“कौन थी वह?”
पुजारी ने मंदिर के गर्भगृह की ओर देखा और धीरे-धीरे कहानी सुनानी शुरू की।
“नंदिनी अपने पति से बहुत प्रेम करती थी। लेकिन जिस रात डाकुओं ने उसके पति की हत्या की, उसी रात हवेली के मालिक ने उसकी मजबूरी का फायदा उठाने की कोशिश की।”
“नंदिनी ने विरोध किया।”
“उन्होंने उसे ज़िंदा ही हवेली के तहखाने में बंद कर दिया।”
“वह कई दिनों तक भूखी-प्यासी वहीं तड़पती रही।”
“मरने से पहले उसने अपने खून से माँग भरी और शपथ ली—”
‘जब तक मेरा सुहाग मुझे वापस नहीं मिलेगा, मैं हर उस पुरुष की आत्मा लेती रहूँगी जो इस हवेली में आएगा।’
अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“तो क्या वह सचमुच मुझे अपना पति समझती है?”
पुजारी ने सिर हिलाया।
“नहीं…”
“वह हर आदमी में अपने खोए हुए पति की परछाई देखती है।”
“लेकिन इस बार बात अलग है।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसने पहली बार किसी के माथे पर अपना सिंदूर लगाया है।”
अर्जुन की साँसें तेज़ हो गईं।
“इसका मतलब?”
“तीन रातों के भीतर वह तुम्हें अपने साथ ले जाएगी।”
“और अगर मैं बचना चाहूँ?”
पुजारी कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
“हवेली के नीचे उसका असली शव आज भी दफ़न है।”
“जब तक उसका अंतिम संस्कार पूरे सम्मान से नहीं होगा, उसकी आत्मा मुक्त नहीं होगी।”
अर्जुन ने दृढ़ स्वर में कहा—
“मैं यह करूँगा।”
पुजारी ने चेतावनी दी—
“रास्ता आसान नहीं है।”
“वह तुम्हें रोकने के लिए अपने सबसे भयानक रूप में आएगी।”
उसी समय मंदिर की सारी घंटियाँ अपने आप बजने लगीं।
तेज़ हवा चली।
दीये बुझ गए।
और मंदिर के बाहर से वही आवाज़ आई—
“अर्जुन…”
“मैं फिर आ गई हूँ…”
अर्जुन ने काँपते हुए बाहर देखा।
मंदिर की सीढ़ियों पर लाल चुनरी हवा में लहरा रही थी…
लेकिन वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
अचानक वह चुनरी अपने आप उठी…
और हवा में उड़ते हुए अर्जुन की ओर बढ़ने लगी।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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