बस यूँ ही
कभी पुराने पन्ने खोल लेती हूँ,
कुछ यादें पढ़ती हूँ,
कुछ को बिना पढ़े ही बंद कर देती हूँ।
बस यूँ ही
कभी खुद से नाराज़ हो जाती हूँ,
फिर खुद को ही समझाकर
चुपचाप माफ़ कर देती हूँ।
बस यूँ ही
कुछ रातें जागकर काटी हैं,
कुछ आँसू तकिए में छुपाए हैं,
और कुछ दर्द मुस्कुराकर टाल दिए हैं।
बस यूँ ही
हर बार लगा, अब और नहीं,
फिर न जाने कहाँ से
थोड़ी-सी हिम्मत आ गई।
बस यूँ ही
मैंने बीते कल को छोड़ा नहीं,
बस उसके साथ जीना सीख लिया।
और बस यूँ ही,
आज भी खुद को थोड़ा-थोड़ा
फिर से लिख रही हूँ।

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹

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