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  • छल ….!!

    छल ….!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तुम दूर हो मुझसे तो

    दूर ही रहो ना क्यों बेफिजूल की

    नजदीकियां बढा़ते हो ,क्या मिला है

    किसी को भी इश्क करके

    जो तुम मेरे पीछे पीछे आते हो,

    मै वाकिफ हूं तुमसे बेहतर ही

    फिर क्यों मुझे बहलाते हो,

    देखा है तुम्हें मैंने गैरों के संग

    भी फिर क्यों मुझे सब्जबाग

    दिखाते हो,

    माना इश्क ❤️ किया है मैंने तुमसे ,

    क्या इसलिए तुम मेरा फायदा उठाते हो,

    दूर दूर ही रहो ना तुम अब मुझसे,

    क्यों अपने झूठे इश्क का

    यकीन दिलाते हो,

    छल कपट से इश्क कभी

    मुकम्मल नहीं होता ,

    क्या हुआ जो अब मैं तन्हा हो जाऊंगी,

    बेशक दिल किलसता रहेगा

    तुम्हारे इन्तजार में ,

    फिर भी मैं भूल नहीं पाऊंगी

    तुम्हारे कपट भरे इजहार को ,

    सच्चाई सिर्फ मुझमें थी ,

    काश ! तुम भी सच्चे दिल से

    इकरार करते, मैं छोड़ देती ये

    जहां जो तुम मेरे साथ होते….!!

  • मेरा चांद…!!

    मेरा चांद…!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    रोशन है ऐ चांद तुमसे धरती का कोना- कोना,

    एक चांद मेरे पास भी है जिससे

    रोशन है मेरी जिंदगी का अंधियारा,

    ऐ चांद तुम पर बंदिशें है बादलों,

    बारिशों और आसमान में छाए धुंध की,

    मेरा चांद है मेरे पास मेरे हर लम्हें ,

    मेरे हर वजूद की परछाई में ,

    मैं तुम्हें देखूं जो बादलों से

    आ़खंमिचौली करता है,

    या उसे जो मेरे साथ मेरे हाथों

    में डालें हाथ एकटक तुम्हें निहारता है, 

    वो प्रमाण है मेरी जिंदगी की

    हर उधेड़बुन का,

    तुम्हीं बताओ अब उसे कैसे

    ना देखूं मैं तुमसे पहले ,

    तुम पर हक कविता शायरी

    करने का हक सबको मिला है  ,

    मेरा चांद मेरे दिल का चैन 

    उसने अपने सारे हक़ मेरे नाम किये,

    वो सिर्फ मेरा है  ,

    मेरे इस दिल ,जज़्बात ,ज़िन्दगी ,पर

    हक़ सिर्फ उसका है …!!

  • तकदीर का खेल

    तकदीर का खेल

    पढ़ने का समय : 7 मिनट
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    तकदीर का खेल

    भूमिका

    तकदीर, किस्मत, भाग्य – ये शब्द इंसान की ज़िंदगी में उतने ही मायने रखते हैं, जितने मेहनत और हौसले। कोई अपनी मेहनत से तकदीर बदलने की कोशिश करता है, तो कोई इसे अपनी नियति मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेता है। लेकिन क्या तकदीर सच में पहले से लिखी होती है, या इंसान अपने कर्मों से इसे बदल सकता है? यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जो तकदीर के खेल में उलझा, संघर्ष किया, और अंत में अपनी मेहनत से अपनी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी।

    गंगा किनारे बसा एक छोटा सा गाँव “शिवपुर”। गाँव के बाहर कच्चे रास्ते पर एक झोपड़ी में रहता था अर्जुन। उम्र लगभग 25 साल, चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक, मगर किस्मत ने जैसे उसके हिस्से में संघर्ष ही लिख दिया था। माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे, और एक छोटी बहन राधा उसकी जिम्मेदारी थी।

    अर्जुन बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था, मगर गरीबी ने उसे ज्यादा आगे नहीं बढ़ने दिया। मजबूरी में उसे मजदूरी करनी पड़ी, ताकि बहन की देखभाल कर सके। गाँव के बड़े लोग कहते थे, “अरे अर्जुन, तकदीर में जो लिखा है, वही होगा। मेहनत कर भी लेगा तो क्या होगा?” लेकिन अर्जुन इस सोच को मानने को तैयार नहीं था

    दूसरा अध्याय: संघर्ष की राह

    अर्जुन का सपना था कि वह बहन को अच्छी शिक्षा दिलाए और खुद भी अपनी जिंदगी सुधार सके। लेकिन तकदीर बार-बार उसकी परीक्षा लेती रही।

    एक दिन गाँव के जमींदार रतनलाल ने अर्जुन को बुलाया।

    “अर्जुन, मेरी जमीन पर मजदूरी करेगा? अच्छा पैसा दूँगा।”

    अर्जुन के पास कोई और चारा नहीं था, उसने हामी भर दी। दिनभर खेतों में मेहनत करता और रात को थका-हारा घर लौटता। मगर मन में एक ही सवाल घूमता – क्या यह जिंदगी भर चलने वाला है?

    एक दिन उसकी मुलाकात रमेश से हुई, जो शहर में नौकरी करता था।

    “अर्जुन, तू बहुत मेहनती है, शहर चल, वहाँ अच्छा काम मिलेगा,” रमेश ने सुझाव दिया।

    अर्जुन के मन में उम्मीद की किरण जागी। उसने फैसला किया कि वह भी शहर जाएगा और अपनी तकदीर को आजमाएगा।

    अर्जुन अपनी बहन को पड़ोसी के पास छोड़कर शहर चला गया। वहाँ नौकरी की तलाश शुरू की, मगर हर जगह सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। बिना किसी जान-पहचान के उसे कोई काम नहीं मिल।

    एक दिन, जब अर्जुन भूखा-प्यासा सड़क किनारे बैठा था, तब एक व्यापारी महेश गुप्ता ने उसे देखा।

    “क्या हुआ बेटा? परेशान क्यों है?” महेश जी ने पूछा।

    अर्जुन ने अपनी पूरी कहानी सुना दी। महेश जी ने उसे अपनी दुकान पर काम दे दिया। धीरे-धीरे अर्जुन मेहनत करने लगा और अपनी ईमानदारी से महेश जी का विश्वास जीत लिया।

    अर्जुन अब दुकान में अच्छा काम करने लगा था। वह सिर्फ सेल्समैन नहीं, बल्कि व्यापार के हर पहलू को समझने लगा था। महेश जी ने उसकी लगन को देखकर उसे और बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी।

    कुछ सालों बाद, अर्जुन महेश जी का सबसे भरोसेमंद व्यक्ति बन गया। लेकिन तभी तकदीर ने एक और खेल खेला – महेश जी का अचानक देहांत हो गया। उनकी फैमिली को बिजनेस में कोई रुचि नहीं थी, इसलिए उन्होंने दुकान बेचने का फैसला किया।

    अर्जुन के सामने बड़ा सवाल था – क्या वह अपनी अब तक की मेहनत को यूँ ही छोड़ दे? या कुछ बड़ा करने की सोचे?

    पाँचवाँ अध्याय: तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ?

    अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और अपनी सारी बचत और थोड़े पैसे उधार लेकर वही दुकान खरीद ली। अब वह खुद का मालिक बन चुका था। उसकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा।

    कुछ सालों में उसने अपने व्यापार को इतना बढ़ाया कि वह अब सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि कई दुकानों का मालिक बन चुका था। वह गाँव लौटा और अपनी बहन को अच्छे कॉलेज में पढ़ने भेजा।

    गाँव के लोग जो कभी उसे तकदीर का मारा समझते थे, अब कहते थे, “देखो, अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद लिखी!”

    निष्कर्ष: तकदीर बनती है मेहनत से

    अर्जुन की कहानी बताती है कि तकदीर का खेल असल में मेहनत का ही खेल है। अगर वह भी दूसरों की तरह तकदीर को दोष देकर बैठ जाता, तो उसकी जिंदगी वहीं खेतों में मजदूरी करते बीत जाती। लेकिन उसने अपने हौसले से, अपनी मेहनत से अपनी तकदीर खुद लिखी।

    तो, तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ? जवाब साफ है – तकदीर का खेल असल में मेहनत और संघर्ष की परीक्षा ही है!

    अर्जुन ने अपनी मेहनत से अपना व्यापार खड़ा कर लिया था, लेकिन ज़िंदगी में सफलता के साथ चुनौतियाँ भी आती हैं। जब उसका बिज़नेस अच्छा चलने लगा, तो कई लोगों की नज़रें उस पर टेढ़ी हो गईं।

    गाँव के जमींदार रतनलाल, जो कभी उसे मजदूरी के लिए बुलाते थे, अब उसकी बढ़ती सफलता से जलने लगे। उन्होंने अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं कि अर्जुन ने गलत तरीकों से पैसा कमाया है।

    एक दिन गाँव की पंचायत में यह मामला उठा। रतनलाल ने कहा,

    “अर्जुन, तू गाँव का एक गरीब लड़का था, अचानक इतना अमीर कैसे बन गया? जरूर कोई बेईमानी की होगी!”

    अर्जुन चुपचाप सबकी बातें सुनता रहा। फिर उसने जवाब दिया,

    “मैंने दिन-रात मेहनत की, संघर्ष किया, शहर में धक्के खाए, तब जाकर इस मुकाम तक पहुँचा हूँ। अगर कोई यह साबित कर दे कि मैंने गलत तरीके से कुछ कमाया है, तो मैं खुद सारा व्यापार छोड़ दूँगा!”

    गाँव के बुजुर्ग जानते थे कि अर्जुन ईमानदार है। उन्होंने पंचायत में ही उसका समर्थन किया और कहा,

    “तकदीर उसी की बदलती है जो मेहनत करना जानता है। अर्जुन ने अपने कर्मों से अपना भाग्य लिखा है।”

    रतनलाल चुप हो गए, लेकिन अर्जुन समझ गया कि सफलता के साथ आलोचना भी मिलती है।

    इधर अर्जुन की बहन राधा ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली और उसे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई। अर्जुन ने सोचा कि अब उसकी बहन की शादी करवा दी जाए। उसने राधा से पूछा,

    “क्या तुम किसी को पसंद करती हो, या फिर मैं तुम्हारे लिए अच्छा रिश्ता देखूं?”

    राधा थोड़ी संकोच में थी, फिर उसने कहा,

    “भइया, मेरा एक दोस्त है, जो बहुत अच्छा इंसान है। अगर आप मिलना चाहें, तो मैं उसे घर बुला सकती हूँ।”

    अर्जुन को खुशी हुई कि उसकी बहन अपने फैसले खुद लेने के लायक बन गई थी। उसने उस लड़के से मुलाकात की और जब देखा कि वह वाकई ईमानदार और मेहनती है, तो उसने शादी के लिए हाँ कर दी।

    शादी के दिन पूरा गाँव खुशी से झूम उठा। अर्जुन को देखकर लोग कहते,

    “अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद बनाई और अब अपनी बहन की जिंदगी भी संवार दी!”

    राधा की शादी के बाद अर्जुन ने अपने बिज़नेस को और आगे बढ़ाने का फैसला किया। उसने गाँव के कई बेरोजगार युवाओं को अपने काम से जोड़ा और उन्हें नौकरी दी।

    अब वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे गाँव की तकदीर बदलने की कोशिश कर रहा था। उसने गाँव में एक स्कूल भी खुलवाया, ताकि किसी और अर्जुन को अपनी पढ़ाई अधूरी न छोड़नी पड़े।

    धीरे-धीरे, गाँव के लोग भी मेहनत की अहमियत समझने लगे। वे भी किस्मत को कोसने के बजाय अपने हाथों से अपना भविष्य गढ़ने में जुट गए।

    एक दिन अर्जुन अपनी दुकान के बाहर बैठा था, जब एक बुजुर्ग ने आकर कहा,

    “बेटा, सच ही कहते हैं – तकदीर कोई लिखकर नहीं लाता, उसे मेहनत से गढ़ना पड़ता है। तूने यह साबित कर दिया!”

    अर्जुन मुस्कुराया और बोला,

    “हाँ काका, तकदीर का खेल असल में हमारे हाथ में ही होता है। अगर हम मेहनत करें, तो हम अपनी ज़िंदगी खुद बना सकते हैं।

    उस दिन अर्जुन को अहसास हुआ कि उसने सिर्फ अपनी तकदीर नहीं बदली, बल्कि अपने गाँव की सोच भी बदल दी थी। अब कोई भी तकदीर को कोसकर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता था – सब मेहनत की ताकत को समझ चुके थे।

    और इस तरह, तकदीर का खेल अर्जुन की मेहनत के आगे हार गया।

  • स्वाद की खोज

    स्वाद की खोज

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

    जॉन एक युवा शेफ था जो न्यूयॉर्क शहर में रहता था। उसका सपना था कि वह दुनिया के विभिन्न हिस्सों के व्यंजनों को सीखकर अपने रेस्तरां में पेश करे। एक दिन, उसने यूरोप की यात्रा करने का निर्णय लिया ताकि वहाँ के पारंपरिक व्यंजनों का अध्ययन कर सके।

    पहला पड़ाव इटली था, जहाँ उसने पिज़्ज़ा और पास्ता के विभिन्न प्रकारों को बनाना सीखा। नेपल्स में, उसने असली नेपोलिटन पिज़्ज़ा के रहस्यों को जाना, जबकि बोलोग्ना में उसने टैग्लिएटेल अल रागू की विधि सीखी।

    इसके बाद, वह फ्रांस गया, जहाँ उसने पेस्ट्री और बेकिंग की कला में महारत हासिल की। पेरिस में, उसने क्रोइसेंट और बैगेट बनाना सीखा, जबकि लियोन में उसने कोक औ विन और बुफ़ बौर्गिन्योन जैसे पारंपरिक व्यंजनों का ज्ञान प्राप्त किया।

    स्पेन में, जॉन ने तपस और पेला की विविधताओं का अध्ययन किया। बार्सिलोना में, उसने पेला वेलेंसियाना बनाना सीखा, जबकि मैड्रिड में उसने विभिन्न तपस व्यंजनों का स्वाद लिया और उनकी तैयारी की विधियाँ सीखीं।

    यूरोप की इस यात्रा ने जॉन के ज्ञान को समृद्ध किया और उसे पाश्चात्य व्यंजनों की गहराई और विविधता का अनुभव कराया। अपने देश लौटकर, उसने अपने रेस्तरां में इन सभी व्यंजनों को शामिल किया, जिससे उसके ग्राहकों को विभिन्न पाश्चात्य स्वादों का आनंद मिला।

    इस प्रकार, जॉन की यह यात्रा न केवल उसके व्यक्तिगत विकास का साधन बनी, बल्कि उसने अपने समुदाय को भी पाश्चात्य व्यंजनों की समृद्ध विरासत से परिचित कराया।

  • मन की बात

    मन की बात

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

     

     

    मन की बात

     

    मन की बात है गहरी, शब्दों में कैसे आए,

    दिल के कोने में छुपी, हर किसी को न बताए।

     

    कभी ये खुशियों की धुन, तो कभी दर्द सुनाए,

    कभी शोर मचाए मन में, तो कभी चुप रह जाए।

     

    सपनों की उड़ान इसमें, उम्मीदों की रोशनी,

    कभी बादलों से घिर जाए, कभी चमके चाँदनी।

     

    मन कहे सच बोलूं, मगर दुनिया से डरता हूँ,

    अपनों की खुशियों खातिर, हर ग़म मैं सहता हूँ।

     

    कभी बह जाए भावनाओं में, कभी बन जाए पत्थर,

    कभी झूमे सावन जैसे, कभी सूखा कोई सागर।

     

    मन की बात अधूरी है, कहो तो बोझ हल्का हो,

    न कहो तो रह जाए दिल में, और आँसू बन टपका हो।

     

    इसलिए सुनो मन की बातें, जो दिल में उमड़ती हैं,

    कभी शब्दों में बहती हैं, कभी आँखों में तैरती हैं।

  • अकेलापन….!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अपनों के बीच होकर भी गैर हो गया हूं मैं,

    क्या कहूं ऐ जिन्दगी कितना मजबूर हो गया हूं मैं , 

    हंसी होंठों से जाने नहीं देता

    इस दिल से कितना बेगैरत हो गया हूं मैं ,

    यादों की लाली मेरी आंखों से जाती नहीं,

    बस कह नहीं सकता कितना टूट गया हूं मैं, 

    अकेलापन अब तो सालता है मुझे ,

    आ देख! मुझे आकर तेरे बगैर कैसे जी रहा हूं मैं ,

    अकेलापन महसूस किया है मैंने अब तेरी पनाहों में,

    क्या कहूं दिल से कितना मजबूर हो गया हूं मैं …!!

  • बातों का विश्वास

    बातों का विश्वास

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    शीला कमल को मार मारकर उसे बेहोशी की दुनिया में पहुंचा दिया था। कमल के बेहोश होने के बाद भी शीला के लात रुक नहीं रही थी।‌‌ लगातार लातों की बारिश कर रही थी। गुस्से से शीला के चेहरे पसीने में भीग गया था। पिछे से शीला के कंधे पर दो हाथ पड़ने के आभास होता है। और शीला की तंद्रा भंग होती है। वो पिछे मुड़कर देखतीं हैं। रूपा और राधा उसकी कंधों को धिरे से सहला रही थी। दोनों के चेहरे पर एक खुशी झलक रही थी। और दोनों मुस्कुरा रही थी। वो दोनों अपने दीदी के कमल पर हुई जीत पर प्राउड फील कर रही थी।‌‌

     ” दीदी आप शांत हो जाइए,आप को चोट लगी है।”

    चांदनी धिरे धिरे शीला के तरफ बढ़ते हुए कैजुअली अंदाज में बोली थी।

    ” हां दीदी, अब तो आप हम लोगों पर छोड़ दिजिए। हम देख लेंगे की क्या करना है। इस कमिने के साथ।”

    राधा कमल के तरफ इशारा करते हुए बोली थी।

    ” अब हमें कमल को लेकर प्रिंसिपल मैम के पास चलना चाहिए।”

    रुपा अपने कमर पर हाथ रख कर मुस्कुराती हुई बोल रही थी।

    राधा चांदनी और शीला एक साथ बोलती है।

    ” हां ठीक है चलो चलते हैं।”

    कमल को होश तो था नहीं, जो वो चलकर जाता। तो अब उसे लेकर जाने की जिम्मेदारी,इन चारों सहेलियों के कंधे पर थी । चारों सहेलियों ने कमल के एक एक पैर और एक एक हाथ पकड़ कर उठाई और चल दी थी।

    इधर मीटिंग हाल में कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर कालेज में फंक्शन की तैयारी करने को लेकर प्रिंसिपल स्टूडेंट प्रोफेसर के बीच बाद संवाद चल रही थी। सभी प्रोफेसर अपने स्टूडेंट को भगवान श्री कृष्ण के जीवन के बारे में तो उनके द्वारा किए गए लीला के बारे में अपने स्टूडेंट के सामने ब्यख्यान कर रहे थे।

    जब प्रोफेसर शुक्ला अपनी बात स्टूडेंट के सामने रख रहे थे। तब एक स्टूडेंट अपने कुर्सी से उठ कर प्रोफेसर शुक्ला से एक सवाल किया।

    दरअसल इस शवाल का जवाब उस स्टूडेंट के साथ साथ आप हम और उस मीटिंग हाल में मौजूद सभी लोगों को चाहिए था। वो लड़का अपनी चेयर से उठा और वो प्रोफेसर शुक्ला को बीच में रोकते हुए बोला।

    ” माफ़ किजियेगा सर, मैं आपको बीच में रोक रहा हूं। सर मैं जानना चाहता हूं। कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव तो हम हमारे कालेज में हर साल मनाते आ रहे हैं। तो फिर हमें इस बार और पहली बार मनाया जाएगा, ऐसा क्यों बताया जा रहा है?”

    उस लड़के ने साफ शब्दों में अपनी बात प्रोफेसर शुक्ला के सामने रख दिया था। उस लड़के की आवाज जब वहां मौजूद सभी लोगों के कानों में जाते हैं। तो सभी के ध्यान उस लड़के पर टिक जाती है। जब ये सवाल उठ हीं गई है तो इसका जवाब जानने कि कोशिश में कुछ लोग और आगे आते हैं। एक लड़की अपनी चेयर से उठ कर बोलती है।

    ” हां सर, हम लोग तो श्री कृष्ण जन्मोत्सव हर साल मनाते हैं। और कॉलेज में अवार्ड फंक्शन का भी आयोजन किया जाता है। तो फिर ये क्यों?”

    उस लड़की ने भी अपने तरफ से एक सवाल पूछ लिया था।इन सवालों के जवाब स्टूडेंट को प्रोफेसर शुक्ला देने वाले हीं थे। कि सभी की नजर मीटिंग हाल के दरवाजे पर पहुंच जाती है।देख कर सभी शौक हो जातें हैं। मीटिंग हाल के माहौल अब बदलने वाला था। जहां तक बदल ही गया था। शीला कमल चांदनी राधा रुपा को देख कर सभी स्तब्ध रह गए थे। सन्नाटा पसर गया था। एक साथ सभी लोगों के जुवान बंद हो गया था। कोई कुछ भी नहीं बोल रहे थे। सभी सीर्फ एक टक उन पांचों को देख रहे थे। अब कोई आगे आकर वेलकम तो करने वाले थे नहीं, तो चारों सहेलियों ने खुद आगे बढ़कर अंदर आने लगी थी। शीला और चांदनी कमल के एक एक हाथ पकड़ कर टांगी हुई थी तो राधा और रूपा एक एक टांग सभी चलकर स्टेज के सामने आकर खड़ी हुई थी।

    खामोशी को भंग करते हुए एक छात्रा इन सभी को देख कर बोली थी।

    ” क्या हुआ है इसे, यह बेहोश क्यों है?”

     उस छात्रा ने अपनी उंगली से कमल को प्वाइंट आऊट करते हुए बोली थी। बीच में से एक और छात्र का आवाज गुंजा।

    ” तुम लोग कमल को ऐसे टांग कर क्यों लाई हो? क्या हुआ है इसके साथ, क्या ये एक्सीडेंट किया है?” 

    उस छात्र ने चारों सहेलियों से सवाल किया था।

    इस सवाल का जवाब आप हम, और ये चारों सहेलियां जानते हैं। लेकिन यहां मीटिंग हाल में मौजूद सभी लोग नहीं जानते थे। अब एक बात और है कि क्या यह सहेलियां जो भी बात बोलेगी क्या वहां मौजूद सभी लोग क्या इनके बात का विश्वास करेंगे? अगर नहीं, तो फिर उसके लिए क्या करना पड़ेगा। वही करने के लिए शीला अपने मन में कुछ सोच कर अपने कदम आगे बढ़ा चुकी थी। सभी कमल को फर्श पर लिटा कर वहीं एक तरफ खड़े हो जाते हैं। अगर कमल की सच्चाई सबके सामने उजागर करना है। तो उसे सबसे पहले होश में लाना होगा, शीला मन-ही-मन ये सोच रही थी। बिना उसको होश में लायें या बिना उसके मुंह से उसके बातों को कोई नहीं मानेगा क्यों मानेगा कैसे मानेगा कोई नहीं मानेगा। हम भी नहीं मानेंगे और आप तो मान हीं नहीं सकते हैं। क्यों की कमल अभी भी बेहोश पड़ा था। चोट उसको लगा था। अब अगर ये चारों सहेलियां बोलेगी की कमल ने उसे परेशान किया है तो इस बात को प्रमाणित भी करना होगा। जो कि कमल के बेहोश रहते संभव नहीं था। यह सीन देख कर प्रोफेसर और प्रिंसिपल मैम भी आश्चर्य चकित रह गए थे।

    प्रिंसिपल मैम इन चारों को देख कर बोलतीं हैं।

    ” शीला चांदनी राधा रूपा क्या है ये सब? तुम सब मिलकर कमल के साथ क्या की हो?”

     थोड़ा रुक कर प्रिंसिपल मैम फिर बोलना शुरू करतीं हैं।

    ” ये बेहोश क्यों हो गया है? सब कुछ सही सही बताओ तुम सब।”

    प्रिंसिपल मैम अपने चेयर पर बैठी हुई हीं इन चारों से सवाल की थीं। शीला प्रिंसिपल मैम को उनके सवाल का जवाब देना चाहती थी। डर इस बात का था कि उसके बात का कोई विश्वास नहीं करेगा।  यही कारण था कि वो कुछ बोलने से बच रही थी। अब प्रिंसिपल मैम उससे सीधा सवाल कर ली थी। तो अब वो चुप कैसे रह सकती थी। 

    क्या होगा जब कमल को होश आयेगा? ये चारों सहेलियां कब तक चुप रहेगी? क्या कमल को होश आयेगा? जब कमल की सच्चाई सभी के सामने आयेगा फिर क्या होगा? इन सभी सवालों के जानने के लिए पढ़ें कहानी का अगला भाग ….. प्यार एक अहसास , कहानी अजय शीला की नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड पर……

     

     

  • ग्रुप कॉल

    ग्रुप कॉल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    सभी अपने अपने दिशा में कमल को ढूंढने  चल पड़े हैं। चांदनी और राधा अलग अलग दिशा में और रूपा वापस शीला के तरफ चल देती है।उदेस्य तीनो चारों सहेलियों का वही एक कमल को पकड़ कर उसके किये की उसे सजा दिलवाना…

    इधर कमल जो छुप कर सभी पर नजर बनाये हुए था। जब उसे लगा सभी लोग उससे दुर जा चुके हैं। तब उसने राहत की सांस लिया और सोचते हुए बाहर निकल गया,की अब वो दुसरे रास्ते से कॉलेज से बाहर निकल जायेगा। और ये सभी लडकियां कॉलेज में उसे ढूंढती हीं रह जायेगी। कमल अपने मन में यही सब बातें सोचते हुए बाहर निकला और सड़क पर चलने लगा। चलते चलते उसने देखा की एक लड़की सड़क के किनारे बैठी, अपनी पैर पकड़े सर झुकाए अपने पैरों के साथ कुछ कर रही थी। वो लड़की शीला थी शीला को दुसरी साईड घूमी होने के कारण कमल उसे पहचान नहीं पाया था। शीला भी अपना सर नीचे कर के अपने पैर में लगी चोट को मालिश कर ठिक करने की कोशिश कर रही थी। उसकी नजर निचे की तरफ झुकी होने के वजह से उसने भी कमल को नहीं देख पायी थी। कमल भी कोई होगी सोचकर उसे आगे निकल गया था ।जैसे हीं कमल कुछ दूर गया था। कि उसके कानों में सर सराती हुई एक तेज तरार आवाज आकर पड़ी।

    ” वहीं रूक जाओ कमल भागने की बिल्कुल भी कोशिश मत कर ना”

    शीला अपने हांथ से घुटनो का सहारा से उठकर खड़ी होती हुई बोली थी।

    कमल एक दम से चौंका गया और उसके कदम रूक गया वो मुड़ कर आश्चर्य से पिछे देखा उसे शीला दिखी जो उसको अपनी बड़ी बड़ी आंखो से उसके तरफ गुस्से से देख रही थी। कमल शीला को नीचे से उपर तक गौड़ से देखता है। उसे ऐहसास हो जाता है की शीला को चोट लगी है। वो अकेली उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती है।

    ” हां हां नही भाग रहा हूं मैं,आजा ..देखता हूं क्या कर लेती है मेरा “

    कमल जोर से बोला था।

    ” कमीने मैं तेरा खून पी जाऊंगी।”

    शीला चीख कर जोर से कमल के तरफ बढ़ते हुए बोली थी।

    शीला के पैर के चोट के दर्द बढ़ गयी थी। वो चलते हुए लंगरा भी रही थी। यह देखकर कमल का हौसला और बढ़ गया था।

    ” ख़ून पी जायेगी हा हा हा हा हा “

    बोल कर कमल जोर से हंसा

    ” कुत्ते भागकर तुने अपने लिये और ज्यादा प्रोबलम खड़ी कर लिया है।”

     कमल को देखते हुए शीला दांत पीसकर जोर से बोली थी। शीला चलते हुए लंगरा रही थी ।धिरे धिरे शीला लंगड़ाती हुई कमल के सामने पहुंच जाती है। दोनो के बीच में बहस जारी रहती है। दूर से रूपा शीला और कमल को देख लेती है। वो अपने जेब से मोबाईल निकाल ती है। और अपने फोन में कुछ  टाईप करने लगती है। और ग्रुप कॉल लगा देती है। रींग होने लगती है।

    इधर राधा चलते हुए रास्ते के दोनो साईड नजर घुमा घुमा के देखते हुए आगे के तरफ बढ़ती रहती है।तभी राधा के फोन बजने लगती है।राधा अपनी जेब से मोबाईल बाहर निकालती है। राधा फोन के स्क्रीन में देखती है। जिसमें ग्रुप कॉल आ रही होती है। राधा अंसर बटन पर क्लीक कर के मोबाईल कान में सटा लेती है।

    उधर चांदनी भी कॉल उठा लेती है।जब कॉल रिसीव हो जाती है। तब रूपा जल्दी से जोर से बोलती है।

    ” आप लोग सुन रही हो ना दीदी “

    दूसरी तरफ से आवाज आई जो चांदनी की थी।

    ” हां सुन रही हूं। रूपा बोलो…”

     फिर राधा की भी आवाज आई

    ” क्या हुआ रूपा तुम कहां पर हो बोलो..”

    जबाव देते हुए रूपा बोली

    ” शीला दीदी ने कमल को पकड़ लिया है।आप लोग जल्दी से पहुंचिए।”

    ” ठीक है तुम दीदी के पास पहुंचो मैं भी जल्दी हीं आ रही हूं।”

    चांदनी बोलकर फोन कट कर देती है।

    ” रूपा हम लोग दूर हैं। थोड़ी देर लग सकती है। तुम तेजी से दीदी के पास पहुंचो दीदी को चोट लगी है। ध्यान रखना कमल दीदी को कुछ नुकसान ना पहुंचाए।”

    राधा बोलते हुए घबरा रही थी। उसे शीला की चिन्ता हो रही थी।

    ” ठीक है दीदी मैं जा रही हूं। जल्दी से आईए आप लोग “

    रूपा भी बोलकर फोन काट दी थी।

    फोन काट कर रूपा शीला के तरफ बढ़ने लगती है।  शीला हिम्मत से आगे बढ़कर कमल के कॉलर पकर लेती है।

    ” तेरी इतनी हिम्मत की तुम मेरा कॉलर पकड़ेगी।”

    कमल शीला को जोर से झापड़ मारते हुए चीख कर बोला था ‌।

    शीला थप्पड़ खा कर हिल गयी थी। थप्पड़ लगने के कारण शीला का कमल के कॉलर से पकड़ कमजोर हो गई थी।

    कमल शीला के हांथ को अपने कॉलर से हटाया और हांथ को मरोड़ा जिससे शीला पिछे मुड़ गयी थी। हांथ मुड़ने से शीला को दर्द भी हुआ था। कमल शीला का हांथ मरोड़ कर उसके पीठ पर मुक्का से वार किया था। मुक्के की चोट से शीला को दर्द तो हुआ था। पर अगले हीं पल शीला कमल के हांथ से अपना हांथ झटके से छुड़ाई और सम्भल कर कमल के पेट में एक जोर दार मुक्के से अटैक किया,कमल दर्द के मारे पेट पकड़ लिया था। शीला यहीं नहीं रूकी उसने फुर्ती से कमल के टांग पर वार किया। वो लगातार पांच छह लात लगातार कमल के पैर पर मारी थी। कमल दर्द से छट पटा गया था। वह फिर से क्लास रूम वाला सिच्युशन में चला गया था। वो उम्मीद नही किया था कि, एक अकेली शीला उस पर भारी पड़ जायेगी। वो भी चोट खाई हुई। वो पेट पकड़ कर घुटने के बल बैठ गया था। जैसे हीं कमल बैठा था। की शीला की लात ने उसके गाल पर भार दिया। गाल पर लात पड़ने के वजह से कमल बगल के तरफ उलट गया था। अब जब कमल जमीन पर गीर हीं गया था। तो शीला भी कहां चुकने वाली थी। चल पड़ी अपनी लात दर लात की बरसात करने वो भुल गयी थी की, उसकी पैर में चोट भी लगी है । वो लगातार लात से वार करती रही  कमल पर कभी उसकी लात कमल के पेट तो कभी कमर कभी गर्दन पर लगती थी । शीला हर लात के साथ बस यही बोलती थी।

     ” ये ले कमीने,ये ले कुत्ते, ये ले हरामी।”

    शीला अपनी सारी दर्द भुल कर कमल को मारे जा रही थी।

    मार खा खा के कमल के शरीर से होश गायब हो गया था। मतलब वो बेहोश हो गया था। शीला ये जाने बीना कमल को बीना साबुन के ही धुलाई किये जा रही थी। बे खबर शीला कमल को मारे जा रही थी। पढिए अगले भाग में……प्यार एक अहसास कहानी अजय शीला की……..

  • वो आखरी मेसेज

    वो आखरी मेसेज

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    तकरीबन सवा साल बीत गया था उसे गए हुए,

    कल अचानक उसका एक मैसेज आया

    सिर्फ एक शब्द लिखा था, 

     

    “सुनो…”

     

    मैंने फोन हाथ में लिया, पर उंगलियाँ कांप रही थीं,

    दिल ने कहा सब कह डालो जो इन महीनों में सहा है,

    दिमाग ने कहा खामोश रहो, उसने तुम्हें कब का भुला दिया है।

    ​मैंने टाइप करना शुरू किया

    “पता है? तुम्हारे जाने के बाद मैंने हंसना छोड़ दिया है,” (फिर मिटा दिया…) फिर लिखा

    “आज भी रात को जब नींद खुलती है, तो फोन में तुम्हारा नाम ढूंढते है,” (फिर मिटा दिया…) 

     

    आखिर में मैंने सिर्फ इतना लिखा “कहो, कैसे हो?” उसका जवाब आया

    “बस यूं ही याद आ गई थी, लगा तुम बदल गए होगे।” मैंने मन ही मन मुस्कुराया,

    अंदर एक टीस उठी और आंखों के कोर भीग गए।

    बदल तो वो लोग जाते हैं जिनके पास कोई और होता है,

    हम जैसे लोग तो बस एक ही याद के सहारे पूरी उम्र गुज़ार देते हैं।

     

    ​तभी स्क्रीन पर ‘Typing…’ दिखा और फिर गायब हो गया,

    शायद उसे भी एहसास हो गया था…

    कि कुछ सवाल पूछने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है।

    ​उस दिन फिर समझ आया

    कुछ लोग हाल पूछने नहीं,

    सिर्फ ये तसल्ली करने आते हैं,

    कि तुम आज भी उनकी यादों की कैद में हो या रिहा हो गए!💔💔💔

     

     

  • बदलाव…!!

    बदलाव…!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    घर बदलें गलियां बदलीं

    शहरों में मकां बदले,

    मौसम ने भी करवट ले कर

    अपने रंग दिखाये है ,

    तुम कहते हो बदलाव जरूरी है ,

    रिश्ते बदले लोगों ने भी

    अपने मतलब से वफादारी दिखाई है,

    तुम कहते हो बदलाव जरूरी है,

    तुम भी बदल रहे हो वक्त के हाथों,

    जब बदलाव की आंधी में

    खुद को सब बदल रहे तो

    मेरे बदलने में क्या बुराई है ,

    हवाओं का रुख भी बदला हुआ है  ,

    मैं बदलूं खुद को खुद ही की जद्दोजहद से ,

    अब नहीं परवाह करनी बेवजह

    के लोगों की ,ना ढ़लना मुझे

    औरो के कायदों में ,

    सुकून के पल खुद के लिए

    चुरा लूं जिंदगी से,

    बदलाव जरूरी है तो क्यों

    ना मैं खुद के लिए जीयूं??

    क्यों मेरे लिए ही वक्त की मारमारी है  ,

    बदलाव जरूरी है ना तो

    दुनिया के ढकोसलों को तुम्हीं सम्हालो  ,

    मैं उड़ती रहूं मदमस्त होकर गगन में …!!