मुझे तुम्हारे साथ पूरी कहानी लिखनी थी
और एक तुम मेरे साथ एक ही पन्ने में सिमट कर रह
गए…!!🥹🥹
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दर्द ऐ दिल…
पढ़ने का समय : < 1 मिनट -

काश उस दिन मैने
पढ़ने का समय : 6 मिनटWriter Lakshmi Kumari
Story titel “काश उस दिन मैंने…”
बारिश की बूंदें आज कुछ ज़्यादा ही तेज़ थीं… जैसे आसमान भी किसी के बिछड़ने का ग़म मना रहा हो। सड़क के किनारे खड़ा अर्जुन भीगता रहा… लेकिन उसे परवाह नहीं थी। उसकी आँखों में खालीपन था… और दिल में सिर्फ एक ही आवाज़ गूंज रही थी।।
“काश उस दिन मैंने अपने दिल की सुन ली होती…”
उसने अपनी मुट्ठी कस ली, सामने कब्रिस्तान था और एक कब्र पर नाम लिखा था “रोहन”
उस नाम को देखते ही उसकी सांसें भारी हो गईं… और यादों का सैलाब उसे बहा ले गया।
कॉलेज का पहला दिन हर तरफ नए चेहरे नई उम्मीदें और थोड़ी सी घबराहट थी।
अर्जुन क्लास के एक कोने में बैठा था… सिर झुकाए… किताब खोलकर। वह हमेशा से ऐसा ही था चुप चाप, सीधा, अपनी दुनिया में रहने वाला लड़का।
तभी किसी ने उसके सामने कुर्सी खींची “भाई, यहाँ बैठ जाऊं? या ये सीट भी तेरी तरह अकेली रहना चाहती है?”
अर्जुन ने सिर उठाया—एक लड़का मुस्कुरा रहा था… आँखों में शरारत और चेहरे पर मुस्कान थी।
“बैठ जाओ…” अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
“वैसे नाम क्या है तेरा? मैं रोहन… कॉलेज का फ्यूचर सुपरस्टार”
अर्जुन हँस पड़ा “मैं अर्जुन… बस एक आम इंसान…”
तभी पीछे से एक धीमी आवाज आई“अगर आम लोगों की बात हो रही है… तो मैं भी शामिल हो सकता हूँ?”
दोनों ने मुड़कर देखा, एक लंबा, शांत लड़का… जिसकी आँखों में गहराई थी।
उसने अपना हाथ आगे “कबीर…” उसने अपना नाम बताया।
बस… वहीं से शुरू हुई एक ऐसी दोस्ती… जो वक्त के साथ और गहरी होती चली गई।
तीनों साथ बैठते साथ हँसते साथ लड़ते और फिर खुद ही मना भी लेते।
एक दिन कैंटीन में बैठे-बैठे रोहन ने कहा “यार, अगर हमारी दोस्ती पर कोई फिल्म बने ना… तो सुपरहिट जाएगी!”
कबीर मुस्कुराया “लेकिन उसका एंडिंग sad नहीं होना चाहिए…”
अर्जुन ने हाथ बढ़ाया “तो वादा करते हैं… हम कभी अलग नहीं होंगे”
तीनों ने एक-दूसरे के हाथ पर हाथ रखा “हमेशा साथ”
सब कुछ सही चल रहा था… जब तक सिया नाम की लड़की उनकी जिंदगी में नहीं आई थी
पहली बार जब सिया क्लास में आई… तो जैसे वक्त थम गया। उसकी आँखों में मासूमियत थी… और मुस्कान में एक सुकून।
धीरे-धीरे तीनों उससे दोस्ती करने लगे… और अनजाने में तीनों के दिल में उसके लिए एक खास जगह बन गई।
लेकिन… किसी ने कुछ कहा नहीं, एक रात हॉस्टल की छत पर बैठे हुए रोहन बोला “यार… मुझे लगता है मैं सिया को पसंद करने लगा हूँ…”
अर्जुन चुप हो गया… क्योंकि वह भी यही महसूस कर रहा था।
कबीर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा “तो बता दे उसे…”
लेकिन उसके दिल में हलचल थी क्योंकि वह भी सिया को चाहता था।
तीनों दोस्त… एक ही लड़की से प्यार करने लगे थे… और किसी को इसका अंदाज़ा नहीं था।
कुछ दिनों बाद अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और एक चिट्ठी लिखी।
उसके हाथ काँप रहे थे… लेकिन दिल साफ था “सिया मैं तुम्हें पसंद करता हूँ… शायद ये सही समय नहीं है… लेकिन मैं और छुपा नहीं सकता हूं”
उसने वह चिट्ठी कबीर को दी “यार… तू इसे सिया तक पहुँचा दे… मुझसे नहीं होगा…”
कबीर ने चिट्ठी ली… और उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी आ गई। वह अकेले में गया… और चिट्ठी को देखा…
कुछ पल के लिए वह चुप रहा… फिर धीरे-धीरे चिट्ठी को फाड़ दिया।
उसके हाथ काँप रहे थे “मुझे माफ कर देना अर्जुन…”
फिर वह अर्जुन के पास आया “यार… सिया ने मना कर दिया…”
अर्जुन की आँखों में एक पल को उम्मीद चमकी… फिर बुझ गई।
“ओह… ठीक है…” उसने मुस्कुराने की कोशिश की… लेकिन उसकी आवाज टूट गई।
उस रात… अर्जुन बहुत रोया।
अब कबीर अपने झूठ में फंस चुका था। कुछ दिनों बाद रोहन ने कहा “मैं सिया को प्रपोज करने वाला हूँ…”
कबीर का दिल फिर से डगमगाया “नहीं… तू नहीं कर सकता…” उसने जल्दी से कहा।
“क्यों?” रोहन ने पूछा, “क्योंकि अर्जुन और सिया एक-दूसरे को पसंद करते हैं…”
रोहन सन्न रह गया “क्या? लेकिन उसने कभी बताया नहीं…”
“शायद वो तुझसे छुपा रहा है…” कबीर ने झूठ को और गहरा कर दिया।
रोहन का चेहरा उतर गया “ठीक है अगर ऐसा है तो मैं पीछे हट जाऊँगा।”
धीरे-धीरे… तीनों के बीच खामोशी आ गई।
एक दिन…
“तूने मुझसे झूठ क्यों बोला?” रोहन ने अर्जुन से पूछा।
“मुझ से झूठ तो तुम दोनों ने बोला!” अर्जुन चिल्लाया।
“तू सिया से प्यार करता है और मुझे बताया तक नहीं!” रोहन का गुस्सा फूट पड़ा।
अर्जुन हैरान था “क्या? मैंने कब कहा ऐसा?”
कबीर बीच में आया “बस करो”
“तू चुप रह!” दोनों एक साथ बोले।
उस दिन… उनकी दोस्ती बिखर गई।
कुछ महीनों बाद रोहन की मुलाकात सिया से हुई। “तुम लोग इतने दूर क्यों हो गए?” सिया ने पूछा।
रोहन ने सब बताया।
सिया चौंक गई “मुझे तो कभी कोई चिट्ठी मिली ही नहीं…”
रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“क्या…?”
उसे सब समझ आ गया। वह भागा… अर्जुन के पास… सब सच बताने…
बारिश हो रही थी… सड़क फिसलन भरी थी…
रोहन जल्दी में था… उसके दिल में सिर्फ एक बात थी।
“मुझे अर्जुन से माफी मांगनी है…”
लेकिन एक तेज़ रफ्तार ट्रक ने रोहर को टक्कर मार दी
अर्जुन और कबीर दौड़ते हुए अस्पताल पहुँचे।
रोहन ICU में था… साँसें टूट रही थीं। अर्जुन उसका हाथ पकड़कर रो पड़ा “रोहन उठ जा प्लीज।”
रोहन ने धीरे से आँखें खोलीं “अर्जुन” उसकी आवाज कमजोर थी…
“मुझे… सच पता चल गया…”
अर्जुन की आँखें भर आईं “कुछ मत बोल… तू ठीक हो जाएगा…”
रोहन मुस्कुराया “काश… उस दिन… मैंने अपने दिल की सुन ली होती और तुझसे पूछ लिया होता…”
उसने कबीर की तरफ देखा “और तू… अपने दिल से मत भागना…”
इतना कहकर… उसकी सांस रुक गई।
अर्जुन जमीन पर बैठ गया “नहीं रोहन नहीं…”
कबीर फूट-फूट कर रोने लगा “मैंने उसे मार दिया… ये सब मेरी गलती है…”
आज अर्जुन और कबीर रोहन की कब्र के सामने खड़े थे।
हवा शांत थी… लेकिन दिलों में तूफान उठा हुआ था।
अर्जुन बोला “काश… उस दिन हम एक बार बैठकर बात कर लेते…”
कबीर रोते हुए बोला “काश… उस दिन मैंने अपने दिल की सुन ली होती… और सच बता दिया होता।”
दोनों ने कब्र पर हाथ रखा “हम तुझे कभी नहीं भूलेंगे।”
कुछ कहानियाँ अधूरी रह जाती हैं कुछ गलतफहमियाँ जिंदगी छीन लेती हैं और कुछ पछतावे उम्र भर साथ चलते हैं तीनों की दोस्ती खत्म हो गई…
लेकिन एक सच्चाई हमेशा गूंजती रहेगी “काश उस दिन हमने अपने दिल की सुन ली होती।”
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हमारी बुनी हुई दास्तां
पढ़ने का समय : < 1 मिनटहमारी बुनी हुई दास्तां
कुछ रिश्ते थे… जिन्हें हमने धीरे-धीरे बुना है।
कुछ ख्वाहिशें थीं… जिन्हें दिल में सहेजकर रखा।
कुछ लम्हे थे हमारे पास भी,
जो मिलकर बन गए एक खूबसूरत सा अफसाना—
हमारी ही बुनी हुई दास्तां का।कुछ ख्वाब जो आँखों में पलते रहे,
हमने उन्हें धागों-सा जोड़ लिया।
हकीकत में ढाल लिया,
हर एहसास को प्यार से सजा लिया।क्या सुनाएँ ये दास्तां,
हमें इश्क-मोहब्बत का शोर पसंद नहीं,हमने तो खामोशी से रिश्तों को संजोया है,
हर टूटते धागे को फिर से जोड़ा है।
हमें बस एक ख्वाब सजाना था,
अपनेपन की गर्माहट से,जहाँ हर रिश्ता सच्चाई से चमकता रहे।
हमारी ये बुनी हुई दास्तां भी,
एक दिन सबकी जुबां पर होगी,
क्योंकि इसमें दिखावा नहीं,
बस सच्चे एहसासों की रोशनी होगी…
जो हर दिल में हमेशा याद रहेगी। -

अधूरा इश्क
पढ़ने का समय : 3 मिनटअधूरा इश्क
रागिनी को हमेशा से अंधेरे कमरों से अजीब-सी खींच महसूस होती थी।
उसके नए किराए के घर में एक कमरा था जिसका दरवाज़ा ताला लगा था। मालिक ने कहा था “कभी मत खोलना।”एक रात बिजली चली और वही कमरे से हल्की दस्तक आई। रागिनी डरते हुए बोली “क…कौन?”
अंदर से एक धीमी, टूटी आवाज़ आई “डरो मत… मैं भी कैद हूँ…”
अगली बार बिजली जाने पर आवाज़ फिर आई।
इस बार कमरे का ताला अपने आप गिरा।
और अंदर था… सिर्फ़ अंधेरा।पर उसी अंधेरे में एक परछाई उभर रही थी एक लड़का… बेहद खूबसूरत, पर धुंध जैसा।
उसने कहा “मेरा नाम आरव है… मैं इंसान नहीं हूँ, पर तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगा।”
रागिनी चाहकर भी उस कमरे से दूर नहीं रह पाती।
आरव उसे हर रात मिलता कभी बातों में, कभी बस खामोशी में।रागिनी ने महसूस किया कि वह आरव की तरफ़ खिंच रही है… डर और प्यार के बीच फँसकर।
आरव हमेशा कहता “मेरी दुनिया में मत आना रागिनी… वो अंधेरा तुम्हें वापस नहीं लौटने देगा।”
एक दिन रागिनी ने पूछ ही लिया “तुम कौन हो? क्या हो?”
आरव की आँखों में अजीब-सा दर्द चमका“एक गलती ने मुझे इस दुनिया के बीच कहीं अटका दिया है… ना मैं ज़िंदा हूँ, ना मरा हुआ।”
रागिनी उससे और गहराई से जुड़ने लगी, वह डर खत्म हो चुका था। बस एक अजीब-सी मोहब्बत जन्म ले चुकी थी।
अब रागिनी हर दिन सूरज ढलने का इंतज़ार करती।
रात होते ही आरव उसके पास आ जाता उसे कहानियाँ सुनाता, कभी हवा बनकर उसके बालों को छूता, कभी उसके आँसू पोंछता।दोनों जानते थे ये रिश्ता नामुमकिन है। पर इश्क़ कभी इजाज़त थोड़े ही पूछता है।
एक रात कमरे में सिर्फ आरव नहीं आया… उसके पीछे कुछ और भी था।
काली, गुर्राती परछाइयाँ जो रागिनी पर झपट पड़ीं।
आरव चिल्लाया “भागो! ये मेरी दुनिया के भूखे साए हैं—तुम्हें ले जाएँगे!”
आरव ने उन्हें रोक लिया… पर उसके शरीर का आधा हिस्सा अंधेरे में गायब हो गया।
रागिनी रो पड़ी “मैं तुम्हें खो दूँगी क्या?”
आरव बोला “मैं पहले ही खो चुका हूँ…”
आरव कमज़ोर पड़ने लगा। वह कहने लगा “रागिनी… जब तक मैं हूँ, तुम सुरक्षित हो। पर मेरा समय ख़त्म हो रहा है। इस कमरे को छोड़कर किसी और शहर चली जाओ।”
पर रागिनी ने साफ़ कह दिया “इश्क़ भागता नहीं, लड़ता है।”
उस रात हवा में अजीब सरसराहट थी। कमरा खुद-ब-खुद खुल गया। अंधेरा गाढ़ा और डरावना।
आरव ने रागिनी का हाथ पकड़ लिया पहली और आखिरी बार… उसका स्पर्श ठंडा, पर गहरा था।
“मेरे साथ मत आना…”
पर रागिनी ने कहा “मैं अकेली रह ही नहीं सकती तुम्हारे बिना।”
अंधेरा दोनों के चारों तरफ घूमने लगा।
अगली सुबह घर का दरवाज़ा खुला मिला। कमरा बिल्कुल शांत। आरव की परछाई गायब थी। रागिनी भी गायब थी।
बस दीवार पर उभरी एक धुँधली लाइन “अंधेरों में किया इश्क़… दोनों को उजाला कभी नहीं मिला।”
कई साल बाद, उसी घर में नए किरायेदार आते हैं।
पहली ही रात, बिजली जाती है… और बंद कमरे से आवाज़ आती है “डरो मत… मैं भी कैद हूँ…”इस बार कमरे में दो परछाइयाँ दिखाई देती हैं एक धुँधला लड़का… और उसके कंधे पर सिर रखे एक लड़की।
दोनों की आँखों में एक ही बात उनकी कहानी कभी पूरी नहीं हुई… और शायद कभी होगी भी नहीं।
“अंधेरों का इश्क़… अधूरा ही सही, पर अमर रहा।”
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झूठी दीवार
पढ़ने का समय : 6 मिनटसूर्य अस्त हो रहा था, और उसकी अंतिम नारंगी किरणें, एक समय जीवंत रहे, पर अब मौन पड़े घर के आंगन में फैली हुई थीं। उस आंगन में, जहाँ कभी हँसी और खिलखिलाहट गूंजती थी, आज सिर्फ सन्नाटा था। यह घर था आदित्य का, और उस सन्नाटे का कारण था, उसका भाई—अर्जुन।
आदित्य और अर्जुन दो भाई थे, जो एक ही पेड़ की दो मजबूत डालियों की तरह थे। दोनों में गहरा प्रेम था, उनका बचपन साझा सपनों और शरारतों से भरा था। उनके पिता ने उन्हें सिखाया था कि खून का रिश्ता दुनिया में सबसे पवित्र होता है।
लेकिन समय के साथ, जीवन की दौड़ शुरू हुई। आदित्य बड़े थे, उन्होंने जल्द ही अपने पिता का व्यापार संभाल लिया और उसमें सफल हुए। अर्जुन ने पढ़ाई पूरी करके एक बड़ी कंपनी में नौकरी शुरू की। दोनों की राहें अलग थीं, पर मंजिल एक थी,बअपने परिवार की खुशी।
समस्या तब शुरू हुई, जब उनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़े। पिता ने वसीयत बनाने का फैसला किया। उन्होंने व्यापार का एक बड़ा हिस्सा आदित्य को दिया, क्योंकि वह पहले से ही उसे संभाल रहे थे, और अर्जुन को पैतृक जमीन का एक मूल्यवान टुकड़ा और पर्याप्त धन दिया।
अर्जुन को लगा कि उसके साथ अन्याय हुआ है। उसके दिल में यह बात बैठ गई कि पिता ने आदित्य को उससे अधिक प्यार किया, अधिक मूल्यवान समझा। उसने सोचा कि आदित्य ने पिता को प्रभावित किया होगा। उस रात, क्रोध और निराशा से भरे अर्जुन ने आदित्य से झगड़ा किया। उसने कठोर, अपमानजनक शब्द कहे, जिनकी उम्मीद आदित्य ने कभी नहीं की थी।
“तुम हमेशा से पिता के पसंदीदा रहे हो, है ना? तुमने उन्हें फुसला लिया! यह न्याय नहीं है, यह छल है!” अर्जुन ने चिल्लाकर कहा था।
आदित्य, जो अपने छोटे भाई से इतना प्रेम करता था, उन शब्दों से टूट गया। उसने बचाव करने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन ने सुनने से इंकार कर दिया। उसके दिल में एक ‘झूठी दीवार’ खड़ी हो गई थी, एक गलतफहमी, अहंकार और कड़वाहट की दीवार।
उस झगड़े के बाद, अर्जुन ने वह घर छोड़ दिया। वह अपनी वसीयत का हिस्सा लेकर शहर के दूसरे छोर पर चला गया। उसके जाने से पहले, आदित्य ने उसे रोकने की कोशिश की थी, “अर्जुन, यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है। यह हमारा घर है, हमारा रिश्ता है! वापस आ जाओ।”
“रिश्ता? अब कोई रिश्ता नहीं,” अर्जुन का जवाब एक नुकीले तीर की तरह था।
उन दोनों भाइयों के बीच वर्षों का मौन पसर गया।
पिता कुछ समय बाद गुजर गए। उनकी अंतिम इच्छा थी कि दोनों भाई मिल जाएं, पर ऐसा न हो सका। पिता के निधन ने आदित्य को अंदर तक झकझोर दिया, लेकिन अर्जुन अपने दुःख में भी अपनी ‘झूठी दीवार’ के पीछे छिपा रहा।
आदित्य ने अपनी पत्नी, नेहा, और बच्चों के साथ जीवन व्यतीत करना जारी रखा, पर उसके चेहरे पर हमेशा एक उदासी छाई रहती थी। वह सफल था, लेकिन उसके घर का एक कोना हमेशा खाली रहता था। वह हर साल अर्जुन के जन्मदिन पर एक पत्र लिखता, पर कभी भेजता नहीं। बस उन पत्रों में अपनी भावनाओं और अपने दर्द को उतार देता।
कई साल बीत गए। अर्जुन ने अपने हिस्से की जमीन पर एक छोटा सा घर बना लिया था, और वह अपने काम में व्यस्त हो गया था। बाहर से वह खुश दिखता था, पर रात की खामोशी में, उसे हमेशा आदित्य के चेहरे की निराशा याद आती थी। उसे पता था कि उसने गलती की थी। वसीयत वास्तव में न्यायपूर्ण थी, और उसके कठोर शब्द अनुचित थे। लेकिन अब अहंकार, उस ‘झूठी दीवार’ ने उसे जकड़ रखा था।
फिर एक दिन, एक भयानक तूफान आया। अर्जुन का नया बना घर उस तूफान में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। वह बाल-बाल बचा, पर उसका सब कुछ बिखर गया था। वह अकेला, बेघर और टूटा हुआ महसूस कर रहा था।
अगली सुबह, जब अर्जुन टूटी हुई छत के नीचे बैठा था, उसने एक कार को रुकते देखा। कार से एक जाना-पहचाना चेहरा उतरा, आदित्य।
आदित्य ने बिना एक भी शब्द कहे अर्जुन की ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं, और चेहरे पर वर्षों पुराना दर्द झलक रहा था। वह सीधा अर्जुन के पास आया और उसे कसकर गले लगा लिया।
अर्जुन की ‘झूठी दीवार’ उस एक आलिंगन के स्पर्श से रेत के महल की तरह ढह गई। वर्षों से दबा हुआ पश्चाताप आंसुओं के रूप में बह निकला।
“माफ़ कर दो भाई! मुझे माफ़ कर दो! मैंने बहुत बड़ी गलती की! मैंने तुम्हारे प्यार का अपमान किया! पिता का अपमान किया! मैं अंधा हो गया था!” अर्जुन फूट-फूटकर रो पड़ा।
आदित्य ने उसे संभाला। उसकी आवाज़ में वर्षों का स्नेह भरा था। “अर्जुन, यह माफ़ी की बात नहीं है। यह मेरे भाई के वापस आने की बात है। मुझे पता था कि तुम एक दिन समझोगे। मैंने तुम्हें कभी दोष नहीं दिया।”
आदित्य ने उसे अपने साथ चलने के लिए कहा। उसने बताया कि कैसे उसने पैतृक घर को हमेशा उसी तरह बनाए रखा, यह सोचकर कि अर्जुन किसी भी पल वापस आ सकता है।
जब अर्जुन वापस अपने पुराने घर के आंगन में पहुंचा, तो उसने देखा कि सब कुछ वैसा ही था, जैसा उसने छोड़ा था। नेहा ने दौड़कर उसे गले लगाया, और बच्चे, जिन्हें उसने कभी देखा भी नहीं था, उत्सुकता से उसे देख रहे थे।
सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब आदित्य उसे उसके पुराने कमरे में ले गया। कमरे की दीवार पर अब भी वह निशान था, जहाँ दोनों भाइयों ने बचपन में एक क्रिकेट मैच के बाद एक-दूसरे को ‘सर्वश्रेष्ठ दोस्त’ लिखा था।
मेज पर एक पुरानी लकड़ी की पेटी रखी थी। आदित्य ने पेटी खोली। उसमें पिछले कई वर्षों के अन-भेजे गए पत्र थे।
“यह क्या है?” अर्जुन ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा।
“ये वो ख़त हैं, जो मैंने हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर लिखे। माफ़ी मांगने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए कि यहाँ सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं,” आदित्य ने कहा।
अर्जुन ने एक पत्र निकाला। तारीख 14 अगस्त, 2018।
उसमें लिखा था: “अर्जुन, आज तुम्हारा जन्मदिन है। माँ ने तुम्हारी पसंद की खीर बनाई है। मैं तुम्हें मिस कर रहा हूँ। वह ज़मीन का टुकड़ा जो तुम्हें मिला था, वह सबसे उपजाऊ है। पिता ने हमेशा कहा था कि तुम एक अच्छे किसान बनोगे। लौट आओ, भाई। घर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”
अर्जुन के दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए। उसने अपने भाई के निःस्वार्थ प्रेम को ठुकराया था, जबकि आदित्य ने हर पल उसके लिए प्रार्थना की थी। माफ़ी सिर्फ शब्द नहीं थे; वे आदित्य के इन अन-भेजे गए पत्रों में, उसके वर्षों के इंतज़ार में, और उसके निस्वार्थ आलिंगन में समाए हुए थे।
माफ़ी की वह घड़ी, तूफान से अधिक शक्तिशाली थी। वह ‘झूठी दीवार’ हमेशा के लिए गिर गई।
अर्जुन ने उस रात खाना नहीं खाया। वह बस आदित्य के पास बैठा रहा, उस रिश्ते की गर्माहट महसूस कर रहा था जिसे उसने वर्षों पहले खो दिया था। उसने कसम खाई कि वह अपने जीवन के हर क्षण से उस गलती का प्रायश्चित करेगा। उसने सीखा कि सबसे बड़ी संपत्ति ज़मीन या पैसा नहीं, बल्कि अपने ही दिल में मौजूद निस्वार्थ प्रेम और माफ़ी देने की शक्ति है।
और उस रात, उस आंगन में, जहाँ वर्षों से सन्नाटा था, फिर से एक भाई के वापस आने की खुशी और माफ़ी मिल जाने का सुकून, दोनों की शांतिपूर्ण साँसों में गूंज उठा।
Lakshmi Kumari
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कर्मों का फल
पढ़ने का समय : 6 मिनट
गाँव का नाम था हरियाली, जहाँ लोग मेहनती और सच्चे थे। गाँव के बीचों-बीच एक विशाल बड़ का पेड़ था, जिसके नीचे सब लोग इकट्ठा होते थे। इस पेड़ के पास ही एक गरीब ब्राह्मण, नाम था उसका रामू, अपने छोटे से झोपड़े में रहता था। रामू का जीवन साधारण था, लेकिन उसके दिल में अच्छाई का वास था।रामू रोज़ सुबह उठकर अपने छोटे से बाग में काम करता, हल्का-फुल्का खेती करता और जो भी थोड़ा-बहुत कमा पाता, उसी से अपने परिवार कापालन करता। उसकी पत्नी, सीता, हमेशा उसकी मदद करती, और दोनों मिलकर अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की कोशिश करते थे। रामू का मानना था कि अपने कर्मों का फल जरूर मिलता है।
एक दिन, गाँव में एक साधु महात्मा आए। गाँव के लोग उनके पास आए और उनसे आशीर्वाद मांगा। रामू भी साधु के पास पहुँचा। साधु ने रामू को देखा और कहा, “तुमhari मेहनत और ईमानदारी के फल तुम्हें जल्दी मिलेंगे।”
कुछ दिनों बाद, रामू ने सोच लिया कि वह गाँव में थोड़ा और मेहनत कर के और पैसे इकट्ठा करेगा। उसने खेतों में ज्यादा मेहनत की, और उस साल फसल भी अच्छी हुई। रामू ने अपने मेहनत के फल को देखा और अपनी स्थिति में सुधार करने लगा।
परंतु, गाँव के कुछ लोग उसकी सफलता से जलने लगे। उनमें से एक था उसका पड़ोसी, सुरेश। सुरेश का दिल जलन से भरा हुआ था और उसने सोच लिया कि वह रामू को नुकसान पहुँचाएगा। एक रात, सुरेश ने रामू के खेतों में आग लगा दी। अगली सुबह रामू ने देखा कि उसकी पूरी फसल जलकर राख हो गई है। रामू का दिल टूट गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने साधु के वचनों को याद किया और कहा, “मेरे कर्मों का फल मुझे अवश्य मिलेगा, मुझे धैर्य रखना होगा।”
रामू ने अपनी मेहनत से फिर से खेतों को तैयार किया और नई फसल बुवाई की। इस बार उसने सोचा कि उसे और भी सावधानी बरतनी होगी। उसने अपने परिवार को भी खेती में मदद करने के लिए प्रेरित किया और सबने मिलकर मेहनत की। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और रामू की फसल फिर से अच्छी हुई।
इस बीच, सुरेश की स्थिति खराब होती गई। उसकी जमीन उगाही की कमी के कारण सूखने लगी, और उसका धंधा भी ठप्प हो गया। सुरेश ने रामू की सफलता को देखकर सोचा कि इसे पलटा जाना चाहिए। उसने रामू के खिलाफ गांव के लोगों में अफवाहें फैलाने की कोशिश की कि रामू ने जो भी काम किया है, उसमें कुछ छिपा हुआ है।
लेकिन गाँव के लोग रामू की सच्चाई को जानते थे। उन्होंने सुरेश की बातों को खास नहीं माना। धीरे-धीरे, रामू की मेहनत और ईमानदारी की ख़ुशबू पूरे गाँव में फैल गई। लोग उसका सम्मान करने लगे। रामू ने अपने फसल को बेचकर पर्याप्त धन दौलत कमाई और अपनी स्थिति को मजबूत किया।
सुरेश को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने रामू के पास जाकर माफी मांगी। रामू ने उसे माफ कर दिया और कहा, “हम सबके कर्मों का फल ही हमें दिखाई देता है, मैं बस अपने कर्मों पर ध्यान देता हूँ। तुम्हें भी यही करना चाहिए।”
इस घटना ने गाँव के लोगों को यह सिखाया कि कर्मफल का सिद्धांत सचमुच काम करता है। रामू की मेहनत और सच्चाई ने उसे सफलता दिलाई, जबकि सुरेश की जलन और गलतियों ने उसे गिराया।
गाँव में रामू की सच्चाई और मेहनत की चर्चा हर ओर होने लगी। लोग उसकी ईमानदारी और दयालुता को देखकर प्रेरित होते थे। बच्चे रामू के पास बैठकर उसकी दास्तानें सुनते और बड़े होकर उसकी तरह अच्छे कर्म करने का सपना देखते।
रामू ने अपनी सफलताओं का उपयोग समाज की भलाई के लिए करना शुरू कर दिया। उसने गाँव के गरीब किसानों को खेतों की तकनीक सिखाई, ताकि वे भी अच्छे से फसल उगा सकें। वह माहौल बनाकर उन्हें अपने धंधे में मदद कर रहा था। धीरे-धीरे हरियाली गाँव एक खुशहाल और संपन्न गाँव में बदलने लगा।
उसी बीच, सुरेश ने रामू से प्रेरित होकर अपने कर्मों पर पुनर्विचार करना शुरू किया। उसने अपनी गलतियों को स्वीकारा और गाँव के लोगों से माफी मांगने का निर्णय लिया। सुरेश ने रामू से मदद मांगी और कहा, “मैंने तुम्हारे प्रति गलत मानसिकता रखी। कृपया मुझे सिखाओ कि कैसे मैं भी अपनी स्थिति को सुधार सकता हूँ।”
रामू ने सुरेश को सहारा दिया और उसे अपने साथ खेतों में ले गया। रामू ने सुरेश को मेहनत का महत्व समझाया और कहा, “सच्चा धन मेहनत, ईमानदारी और सद्भावना में है। यदि तुम अच्छे कर्म करोगे, तो तुम्हारा कर्मफल भी अच्छा होगा।”
सुरेश ने रामू के साथ मिलकर मेहनत करने का निश्चय किया। दोनों ने मिलकर खेतों की बुनियाद को मजबूती दी। सुरेश ने अपनी संपत्ति को सही दिशा में लगाना सीखा और रामू की मदद से धीरे-धीरे उसकी स्थिति भी सुधारने लगी। अब दोनों किसान एक-दूसरे के मददगार बन गए थे।
समय बीतता गया, और गाँव की स्थिति निरंतर सुधरती गई। अब हरियाली गाँव में खुशहाली, समर्पण, और एकता का माहौल था। गाँव के लोग एक-दूसरे का सहयोग करते और सच्चे रिश्ते बनाते। रामू और सुरेश की दोस्ती ने उदाहरण पेश किया कि किस तरह कर्मफल से जुड़े अच्छे कार्यों की बदौलत दोस्ती और भाईचारा स्थापित होते हैं।
इस बीच, गाँव ने एक बड़ा उत्सव मनाने का निर्णय लिया। गाँव के लोगों ने फसल के अच्छे उत्पादन के लिए रामू और सुरेश को सम्मानित करने का कार्यक्रम रखा। सभी लोग इकट्ठा हुए। इस अवसर पर गाँव के सरपंच ने कहा, “आज हम सब यहाँ इस बात की गवाही देने के लिए इकट्ठा हुए हैं कि ईमानदारी और मेहनत का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। रामू और सुरेश ने हमें यह सिखाया है कि आत्मसमर्पण और सहयोग से हम सभी कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं।”
रामू को सम्मानित किया गया, लेकिन उसने सुरेश को भी अपने साथ खड़ा किया। उसने कहा, “सच्ची पहचान और सफलता अकेले नहीं आते। ये हमारे सभी कर्मों का फल होते हैं। सुरेश ने भी अब बदलाव किया है और हमें उसके साथ खड़ा होना चाहिए।”
सभी गाँव वाले तालियाँ बजाने लगे। सुरेश ने रामू की ओर देखते हुए कहा, “तुमने मुझे सिखाया कि खुद को बदलना कितना महत्वपूर्ण है। मुझे अपने कर्मों का फल समझ में आ गया है। अब मैं मेहनत और ईमानदारी से जीवन बिताने का वचन देता हूँ।”
गाँव में उत्सव धूमधाम से मनाया गया। लोग एक-दूसरे के साथ नृत्य कर रहे थे, गीत गा रहे थे और खुशियों का आदान-प्रदान कर रहे थे। सब मिलकर यह महसूस कर रहे थे कि सच्चे कर्म हमेशा अच्छे फल लाते हैं।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारे कर्म ही हमें पहचान देते हैं। अच्छाई का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन यदि हम सही रास्ते पर रहें,
Lakshmi Kumari ,,,,,
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सोचने वाली बात है न…
पढ़ने का समय : < 1 मिनटन्यायालय में दोनों पक्षों को
सच पता होता है
असल में तो जज कटघरे में होता है।
(बात बहुत गहरी है… 🥹)
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सांझ की रोशनी में सौन्दर्य
पढ़ने का समय : < 1 मिनटसुनो! तुम श्रृंगार ना किया करो,
अपनी आंखों को यूं ना मुझे देख कर नीचे किया करो ,
मैं पागल हूं तुम्हारी झील सी आंखों का
मुझे और ना तुम्हारे लिए पागल किया करो ,
कजरारी आंखें तुम्हारी देख कर दिल में बेताबी सी छाती है,
सांझ की रोशनी में चमक तुम्हारे चेहरे की बढ़ जाती है,
मैं कायल हूं तुम्हारी झील सी आंखों का,
क्या इरादा रखती हो तुम मुझे डूब कर पार जाने का,
ये काली घटाओं सी जुल्फ तुम्हारी,
हार बनने को बेताब है गले का हमारी ,
यूं जो माथे पर छोटी सी बिंदी जो
तुम लगाती हो सच कहता हूं कि ,
तुम जान मेरी लेकर जाती हो ,
हल्की सी लाली लिए चेहरा तुम्हारा दमकता है,
निकला ना करो तुम अकेले कहीं दिल मेरा डरता है ,
ये जो हंसती हो औरों से मिलकर ,
नहीं जानती तुम कितना दिल मेरा जलता है ,
मैं बंदिशों में तुम्हें नहीं बांध रहा हूं ,
तुम इसे बंदिशें मत समझना ,
ये दुनिया तुम्हारे लायक नहीं है,
इसलिए मैं थोड़ा सा ही सही तुम्हें
लेकर सम्भल रहा हूं …!!
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कोई कुछ नहीं बोलेगा
पढ़ने का समय : 7 मिनटशीला प्रिंसिपल मैम के सवाल का जवाब देना चाहती थी। पर वो बोलकर नहीं। ये देखते हुए की कोई कुछ नहीं बोल रहा है ।तो प्रिंसिपल मैम दुबारा फिर से,एक सवाल और दुहराईं….
” कहीं तुम लोगों ने मिलकर कमल को, पिट पिट कर बेहोश तो नहीं कर दी हो? सच्चाई क्या है? साफ साफ हमें बताओ तुम सब.”
प्रिंसिपल मैम ने अपनी ऊंगली चारों लड़कियों के तरफ करतीं हुई आंखों में आंखे डाल कर,आवाज ऊंची करतीं हुई बोली थी।
जब राधा को लगा कि अब मामला बिगड़ने लगी है। तो उसने अपने आप को ज्यादा देर रोक नहीं पाई और बोल पड़ी…
” ऐसा कुछ भी नहीं है मैम , जो कुछ भी आप सब के सामने है ना मैम।सच्चाई इससे कहीं बहुत अलग है । “
राधा प्रिंसिपल मैम को देखते हुए बोली थी। और फिर एक बार सभी के नज़र राधा पर आ कर टिक गई थी।
शीला अपने मन में कुछ सोच रही थी। वो वहां से निकल कर धीरे-धीरे बाहर के तरफ चल दी थी। वो अपने पैर में लगी चोट के कारण ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। वो चलते हुए लंगड़ा कर चल रही थी। शीला पर कुछ लोगों को छोड़कर बाकी किसी की भी नजर नहीं थी। सभी लोगों का ध्यान कमल और उसके आसपास खड़ी लड़कीयों के उपर ही था। किसी ने भी शीला के उपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। वो लंगड़ाते हुए मीटिंग हॉल से बाहर निकल गई थी। चांदनी प्रिंसिपल मैम के पास जाती है। और उनके आंखों में आंखें डाल कर धीरे से बोलतीं है ।
” कमल बहुत ही घटिया लड़का है। इसके व्यवहार लड़कीयों के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है।”
चांदनी बात आगे बढ़ाते हुए बोली।
” इस ने राधा और रूपा के साथ बहुत हीं घटिया सलूक किया है।”
जब रूपा देखी की चांदनी बात खोल दी है। तो वो भी बीच में कुद पड़ी, एक जोरदार लात कमल के कमर के पास मारी। लात लगने से कमल का शरीर हिल कर रह जाता है। यह देखकर कि रूपा ने कमल को लात मारी है। तो कुछ लोग आगे आते हैं,और रूपा को पकड़ कर साइड में कर देते हैं। रूपा का शरीर गुस्से से उबल रही थी। वो सभी को खा जाने वाली नज़रों से देख रही थी। उसके माथे पसीने से भीग गई थी। जब चांदनी प्रिंसिपल मैम से ये बात बोलीं थी। तो प्रिंसिपल मैम भी यह बात सुनकर दंग रह गईं थीं।
और वो चांदनी के तरफ आश्चर्य से देखती हुई बोली।
” क्या हुआ है राधा और रूपा के साथ?बेटा तुम मुझे पुरी बात सच सच बताओ। कोई भी व्यक्ति हमारे कालेज के रूल रेगुलेशन को तोड़े,ये सब मैं बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर सकती हूं।”
प्रिंसिपल मैम कड़क अंदाज में चांदनी के तरफ देखते हुए बोली थी।
चांदनी बोली।
” मैं सच कह रही हूं मैम,कमल ने राधा और रूपा पर बहुत अत्याचार किया है।उन दोनों को रस्सियों से बांध कर पिटा है। बहुत बदसलूकी की है। उसके साथ रेप करने की कोशिश किया है।” बोलते बोलते चांदनी के आंखों से आंसू बहने लगती है।
प्रिंसिपल मैम अपने चेयर से उठ कर चांदनी के बहते आंसुओं को पोंछती है। और चांदनी को अपने गले से लगा लेती है। और बोलतीं हैं।
” अगर तुम्हारी बातों में सच्चाई है। तो मैं इसे छोड़ूंगी नहीं, इसे सजा दिलवा कर रहूंगी।”
और मुड़ कर प्रोफेसर दयानंद को आदेश देते हुए बोलती हैं।
” प्रोफेसर दयानंद जी। आप डाक्टर को फोन लगाइए, वो आकर कमल का चेक अप करे मामला बेहद संवेदनशील है।”
प्रोफेसर दयानंद हड़बड़ाकर जल्दी से उठते हुए बोलता है।
” जी मैडम जी,अभी काल करके बात कर रहा हूं।
प्रिंसिपल मैम बोली।
” हां थोड़ा जल्दी किजिए, बच्चों के जिंदगी का सवाल है।”
प्रोफेसर दयानंद अपने जेब में से अपना मोबाइल निकाल कर एक नम्बर डायल करता है। रिंगटोन बजने के बाद काल रिसीव होता है। प्रोफेसर दयानंद फोन पर बात करते हुए बोलता है।
” हैलो,हां जी डाक्टर शर्मा जी। आप कृपया करके जल्दी से कालेज में आ जाइए। यहां पर एक बच्चे की हालत गंभीर है।”
फोन पर दूसरी तरफ से आवाज आती है।
हैलो, प्रोफेसर दयानंद जी। हाउ आर यू क्या हुआ है? अच्छा ठीक है। मैं अभी निकलता हूं कालेज के लिए ,बस मैं जल्दी पहुंच हीं रहा हूं। आप मेरा इंतजार किजिए।”
बोलकर डाक्टर शर्मा ने फोन कट कर दिया था।
वहां मौजूद कुछ स्टूडेंट्स जो कमल के दोस्त थे। वो बिल्कुल भी मानने के लिए तैयार नहीं था कि कमल कभी भी यह घटिया हरकत कर सकता है। उसे लग रहा था कि, जरूर यह सब लड़कियां मिलकर कमल के साथ कोई साजिश कर रही है। उसको झूठ मूठ के जाल में फंसा रही है। एक लड़का जिसका नाम गोविंद था। वो जोर से बोल पड़ता है।
” नहीं यह सब झूठ है। मैं नहीं मानता इस तरह के बातों को, कमल कभी भी ऐसा घटिया हरकत कर हीं नहीं सकता है। मैं कमल को अच्छी तरह जानता हूं।”
यह देखकर एक लड़का और उसके सपोर्ट में खड़ा हुआ और बोला।
” ये इन लड़कियों की साज़िश है। ये कमल को फसाना चाहतीं हैं। क्यों की कमल पैसे वाला है।”
वह लड़का पूरी ताकत से चिल्लाकर बोल रहा था। इसका नाम विशाल है।
” विशाल ये तुम कैसी बातें कर रहे हो। कमल एक नंबर का कुत्ता कमीना घटिया इंसान है। वो राधा दीदी को बालात्कार करने वाला था। मेरी आंखों के सामने,सही टाइम पर आकर शीला दीदी और चांदनी दीदी ने उस राक्षस से राधा दीदी को बचा लिया। नहीं तो ये रेपिस्ट ना जाने क्या क्या करता हम दोनों के साथ।”
रुपा विशाल को नफ़रत भरी नजरों से देखते हुए जोर से बोली थी।
” झूठ, तुम झूठ बोल रही हो। बहाना बना रही हो। तुम सब ने मिलकर कमल को मार मारकर बेहोश कर दी हो। अब सजा से बचने केलिए बहाने बना रही हो ।”
विशाल रूपा के तरफ देखते हुए,वह भी ज़ोर से चीखते हुए बोल रहा था।
” सट अप, शांत हो जाओ तुम सब। कोई कुछ नहीं बोलेगा।”
प्रिंसिपल मैम सभी को डांटते हुए जोर से बोली थी। सुनकर सभी लोग चुप हो गए थे। प्रिंसिपल मैम के आवाज बिना माइक के हीं पुरे मीटिंग हाल में गुंज रही थी।
इधर शीला मीटिंग हॉल में से बाहर निकल कर कॉलेज के दो नंबर गेट वाले रास्ते में लंगड़ाती हुई चली जा रही थी। बाहर तेज धूप निकली हुई थी। हल्की हल्की ठंडी हवा बह रही थी। जिससे शीला थोड़ा राहत महसूस कर रही थी। रास्ते के साइडों में हरे भरे पेड़ पौधे लगाए गए थे। जिससे रास्ते में कहीं कहीं छाया भी हो रही थी। शीला चलती हुई कॉलेज के दो नंबर गेट से बाहर निकल कर मार्केट वाले रास्ते में चलने लगती है। चलते चलते एक शॉप से पानी की बोतल खरीद कर आगे बढ़ गई थी। थोड़ी देर आगे चलने के बाद शीला को एक मेडिकल स्टोर दिखाई पड़ती है। शीला उसमें चली जाती है। शीला मेडिकल स्टोर के अंदर आ गई थी। अंदर आकर वो काउंटर पर बैठे आदमी के तरफ देखते हुए बोलती है।
” नमस्ते अंकल “
सुनकर शीला के जवाब में वो आदमी भी बोलते हैं।
” नमस्ते बेटा , बोलिए बेटा क्या चाहिए आपको?”
शीला के तरफ देखते हुए दुकान दार मुस्कुराते हुए बोला था।
शीला अपनी पानी की बोतल काउंटर पर रख देती है।
” अंकल जी, मेरे फ्रेंड को न चोट लग गई है। और वो बेहोश है।ऐसी कोई मेडिसिन है। जिससे वो जल्दी से होश में आ जाए और वह ठीक हो जाए।”
शीला दुकानदार को उनके तरफ देखते हुए बोली थी।
” हां ठीक है, मैं आपको एक दवाई दे रहा हूं। जिसको पिलाने से वो होश में भी आ जायेगा। और उसके बॉडी के अंदर बूस्टर का भी काम करेगा।..”
शीला को इतना बोलकर वो दुकानदार अंकल अपने जगह से उठ कर दूसरे साइड दवाई लेने चला जाता है। शीला वहीं खड़ी होती है।
तभी अजय दुकान में दाखिल होता है। और वो भी काउंटर पर आकर खड़ा होता है।उसका ध्यान अभी शीला पर नहीं गया था। वो डोर ओपन करके अंदर आ गया था। लेकिन उसका नजर शीला के लिए दवाई लेने जा रहे दुकानदार अंकल पर हीं था।
आगे की कहानी पढ़िए कहानी के अगले भाग में……….. प्यार एक एहसास, नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड पर……..






