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  • गुरु की ज्योति

    गुरु की ज्योति

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    गुरु वो दीप हैं, जो तमस हर लेते,  

    ज्ञान की किरणों से जीवन भर देते।  

    उनके चरणों में है सारा संसार,  

    उनसे ही मिलता है सच्चा आधार।  

     

    गुरु वो वृक्ष हैं, छाया में सुकून देते,  

    धूप में भी ठंडक का एहसास देते।  

    उनकी वाणी अमृत सी बरसती,  

    हर शब्द में शिक्षा की गंध बसती।  

     

    गुरु वो सागर हैं, जिनमें सत्य की लहरें,  

    हर प्रश्न का उत्तर, हर मन की डगरें।  

    उनकी दृष्टि में करुणा का सागर,  

    उनके आशीष से मिटता है अंधकार।  

     

    गुरु पूर्णिमा का पावन दिन आया,  

    श्रद्धा का दीप हर मन में जलाया।  

    फूलों की वर्षा, भक्ति की धारा,  

    गुरु चरणों में समर्पित हमारा प्यारा।  

     

    गुरु से ही जीवन का अर्थ समझा,  

    गुरु से ही आत्मा का स्वर मिला।  

    गुरु वो सूरज हैं, जो कभी न ढलते,  

    उनकी रोशनी से सब पथ पलते।  

     

    जय गुरु देव, जय ज्ञान के दाता,  

    आपसे ही जीवन का हर पल निखरता।  

    आपकी कृपा से मन निर्मल होता,  

    आपकी छाया में संसार संवरता।

     

    गुरु वो दीपक हैं, 

    जो अंधियारे में राह दिखाते,

    ज्ञान की गंगा बनकर, 

    जीवन को पावन बनाते।

     

    गुरु वो छाया हैं, 

    जो हर दुख में सहारा देते,

    संस्कारों की ज्योति से, 

    मन को उजियारा देते।

     

    गुरु वो सागर हैं, 

    जिनमें सत्य की लहरें उठतीं,

    भ्रम के रेगिस्तान में, 

    आशा की नदियाँ बहतीं।

     

    गुरु वो पर्वत हैं, 

    अटल, अडिग, स्थिर खड़े,

    शिष्य के हर प्रश्न पर, 

    उत्तर के दीप जलाए खड़े।

     

    गुरु पूर्णिमा का दिन है, 

    श्रद्धा का उत्सव महान,

    गुरु चरणों में अर्पित है, 

    जीवन का सारा सम्मान।

    🙏🙏  जय गुरु देव  🙏🙏

  • अधूरी इबादत भाग~14

    अधूरी इबादत भाग~14

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~14 उसके जाने के बाद

     

    अद्वैत की कार धीरे-धीरे शहर की जगमगाती सड़कों से गुज़र रही थी, लेकिन उसके भीतर एक अंधेरा लगातार फैलता जा रहा था। बाहर की दुनिया रोशनी से सराबोर थी, रेड लाइट पर रुकती गाड़ियों की कतारें, फुटपाथ पर चलते लोग, ट्रैफिक सिग्नल की टिमटिमाती बत्तियाँ… मगर अद्वैत की आंखों में इन सबका कोई प्रतिबिंब नहीं था। वह कार की खिड़की से बाहर देख ज़रूर रहा था, पर उसकी नज़रें उन दृश्यों को चीरती हुई कहीं बहुत भीतर, बहुत दूर चली जा रही थीं।

    वह बाहर से शांत दिखने की कोशिश कर रहा था, उसकी गर्दन सीधी, आँखें स्थिर, हाथ स्टीयरिंग पर टिके हुए… जैसे सब कुछ सामान्य हो। लेकिन भीतर एक उथल-पुथल चल रही थी, जैसे कोई जलप्रलय उसके भीतर ही फट पड़ा हो। मीडिया में आई तस्वीरें, लोगों की निगाहें, वो फुसफुसाहटें — “वो लड़की कौन है?”, “क्या सच में उसके साथ रह रहा है?”, “अब तक तो उसकी पत्नी मर चुकी थी, तो ये कौन है?” हर एक सवाल अद्वैत के मन में नश्तर की तरह चुभ रहा था।

    उसका मन बार-बार रूहानी की ओर भाग रहा था। लेकिन साथ ही उसे अब उस ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरेज’ की बात भी याद आ रही थी जो उसके मैनेजर ने सुझाई थी। यह सोचते ही उसका माथा भिंच गया। 

    “मैं उससे कैसे कहूँगा ये बात? वो कोई चीज़ नहीं है कि एक कागज़ पर साइन करवा लिया और मामला खत्म।” 

    “और फिर, मैंने उसे जाना ही कितना है?”

    उसने खुद से एक सवाल पूछा, “क्या वाकई में मुझे हक है उससे यह प्रस्ताव रखने का?”

    वह जानता था कि यह प्रस्ताव एक शर्त की तरह लगेगा, एक सौदा “मेरी छवि बचाने के लिए, मुझे अपने साथ तुम्हारा नाम चाहिए।” और यह ख्याल ही उसे भीतर से झकझोर गया।  

    “क्या वो लड़की, जो पुल से छलांग लगाने जा रही थी, अब मेरी वजह से किसी और बोझ तले दब जाएगी?”

    कार फिर एक मोड़ पर धीमी हुई। सड़कों पर अब भीड़ कम हो चुकी थी, लेकिन अद्वैत का मन और अधिक भारी होता जा रहा था।  

    “काश मैंने उससे बात की होती, काश उसके भीतर की परतों को समझने की कोशिश की होती… कम से कम इतना तो पूछता कि वो हर रात खिड़की की तरफ चुपचाप क्या देखती है?”

    अब जब उससे एक बेहद निजी प्रस्ताव रखने की नौबत आई थी, तब उसे यह अहसास हो रहा था कि वह तो उस लड़की का नाम भर जानता है, उसकी कहानी नहीं।

    अद्वैत की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं। उसने आँखें बंद कीं और एक गहरी साँस ली।  

    “ये गलत है… ये सब कुछ गलत है। लेकिन फिर, मैं झूठी अफवाहों से खुद को कैसे बचाऊँ? ये दुनिया सच नहीं पूछती, बस दिखावे पर यकीन करती है। और इस दिखावे से बाहर निकलने के लिए, मुझे रूहानी का नाम चाहिए… कम से कम बाहर की दुनिया के लिए।”

    उसने खुद से धीरे से कहा — “शायद, अब मुझे उससे सच में बात करनी ही होगी… पहली बार।”

    कार अब घर के गेट पर पहुंच चुकी थी। दरवाज़ा खुला और अद्वैत भीतर दाखिल हुआ… कमरा हल्का सा अस्त – व्यवस्त था। सोफे और हॉल के दरवाजे के बीच की जगह में बहुत कुछ बिखरा हुआ पड़ा था। उसकी आँखें उस बिखरे सामान में से एक चीज़ पर टिक गई -“रूहानी के नाम वाली ब्रेसेलेट”।

    वह ब्रेसेलेट गिरकर टूट चुका था। अद्वैत कुछ पल के लिए वहीं खड़ा हो गया मानो कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो।

    उसका दिल अचानक तेज़ी से धड़कने लगा। वह धीरे-धीरे ब्रेसेलेट के पास गया, ब्रेसलेट उठाते समय उसके हाथ कांप रहे थे। वह सोचने लगा, “क्या हुआ है आखि़र यहां” उसके मन में एक हलचल सी मची हुई थी। 

    अद्वैत ने पुकारा, “रूहानी… रूहानी…” लेकिन कही से कोई आवाज नहीं आई। कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। उसने एक बार फिर से आवाज लगाई, “रूहानी!” लेकिन उसके शब्द हवा में खो गए। 

    अब उसकी चिंता और बढ़ने लगी। वह घर के हर कोने में उसे खोजने लगा। उसकी आँखों में बेचैनी, घबराहट और कुछ समझ न पाने की स्थिति में थी। 

    शाम पहले ही हो चुकी थी और अंधेरा होने को था। अद्वैत को अचानक ख्याल आया, “क्यों न रूहानी को कॉल कर लूँ?” 

    लेकिन उसके चेहरे पर छाई मुस्कान गायब हो गई जब उसे याद आया कि उसने कभी रूहानी का नंबर एक्सचेंज ही नहीं किया था। 

    अद्वैत असमंजस में पड़ गया, “क्या करूँ अब?” उसके भीतर कुछ टूट सा गया। उसने जो उम्मीद की थी, वह अचानक उससे छिन गई। वह थक कर सोफे पर धड़ाम से गिर पड़ा। उसकी आँखें बंद हो गई और वह अपनी स्थिति पर सोचने लगा। 

    अद्वैत को जैसे कुछ अजीब सा अहसास हो रहा था कि रूहानी, उसका टूटा हुआ ब्रेसेलेट और यह पल कुछ गहरे अर्थ छुपाए हुए हैं। उसके मन में एक तूफान सा मचा हुआ था। वो खुद से सवाल की “क्या हुआ होगा रूहानी के साथ? क्या उसे कुछ हो गया?” 

    वह खुद को यह समझाने की कोशिश कर रहा था कि वह तो रूहानी को ठीक से जानता भी नहीं तो ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? 

    तभी अचानक, सोफे के निचले साइड टेबल पर रखा हुआ फोन न बजने लगा। अद्वैत चौक कर देखा तो फोन रूहानी का था, और उस पर वही “my life” का कॉल आ रहा था। अद्वैत का मन तेज़ी से दौड़ने लगा। 

    क्या यह रूहानी से जुड़ी कोई अहम बात है? 

    क्या उसे कुछ हुआ है?

    जैसे ही उसने फोन पर कान लगाया, दूसरी तरफ से एक किशोर लड़के की आवाज सुनाई दी, जो हड़बड़ाहट में बोल रहा था, “क्या मेरी बात अद्वैत अवस्थी से हो रही है?”

    अद्वैत ने धीरे से जवाब दिया, “हां, मैं अद्वैत हूं। तुम कौन हो? और रूहानी का फोन यहां क्यों है? वो कहां है? कहीं उसे कुछ तो नहीं हो गया?” 

    उसका मन पूरी तरह से घबराहट से भर चुका था। उसकी आँखों में अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कोई बुरी खबर सुनने को मिल सकती हो।

    उधर से यशस्वी के भाई यश ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। आपकी बातों का जवाब देने के लिए, लेकिन इतना जान लीजिए कि मैं रूहानी दीदी का छोटा भाई हूं और मैं आपको एक पता मैसेज कर रहा हूं। कल सुबह अगर आप वहां पहुंचेंगे, तो आपसे सारी बातें हो पाएंगी।”

    अद्वैत की आँखें अचानक से चौड़ी हो गई। उसके मस्तिष्क में एक साथ कई सवाल उठ पड़े। 

    रूहानी का भाई?….. 

    क्या यह सच है?

    क्या वह सच में रूहानी का भाई है?

    यह नया मोड़ उसे और भी अधिक उलझा रहा था। 

    अद्वैत कुछ कहने ही वाला था कि अचानक कॉल कट गया। फोन के स्क्रीन पर सन्नाटा छा गया, जैसे कोई जरूरी बात अधूरी रह गई हो। वह कुछ क्षण यूं ही थमा रहा, जैसे समय रुक गया हो। फिर धीरे-धीरे उसकी आँखों में विचारों की लहरें उठने लगीं। 

    “अगर रूहानी का परिवार है… तो उसने उस रात यह क्यों कहा कि इस दुनिया में उसका कोई नहीं है?” यह सवाल उसके भीतर लगातार गूंजता रहा। उसकी सांसें भारी हो गईं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि रूहानी ने ऐसा झूठ क्यों बोला। आखिर वजह क्या थी?

    अद्वैत की आंखों में उस रात की छवि लौट आई… वो रात जब रूहानी खुद को खत्म करने जा रही थी और उसने उसे बचाया था। लेकिन एक बात उसे अब चुभने लगी… उसने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि रूहानी ऐसा कदम क्यों उठाना चाहती थी। 

    फिर एक हल्की सी अपराधबोध की लहर उसके दिल में दौड़ गई। मगर उसी के साथ एक दूसरा ख्याल भी आया, एक तर्क….”किसी को बचा लेना तो ठीक है… पर क्या किसी की निजी ज़िंदगी में यूं झांकना सही होता है? खासकर तब, जब वो व्यक्ति अजनबी हो?” 

    यह विचार उसके मन को और भी उलझा दिया। वो खुद से लड़ने लगा…. “क्या वाकई में मैंने कुछ गलत किया? या फिर मैंने वही किया जो उस वक्त ज़रूरी था?” 

    उसके दिल के किसी कोने में अब यह जानने की जिद गहराने लगी थी कि रूहानी ने झूठ क्यों बोला।

    उसकी आंखें फोन की स्क्रीन पर रूहानी की तस्वीर पर टिक गई जैसे वो उससे जवाब मांग रहा हो। मगर जवाब तो अब उस पते पर था, जो उसे सुबह मिलना था।

    —————-

    क्या रूहानी ने जानबूझकर अपनी सच्चाई छुपाई थी?  

    क्या “इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है” महज़ एक झूठ था या कोई गहरा राज़?  

    अब अद्वैत के सामने सवाल ही सवाल थे… लेकिन जवाब कहाँ थे कि उस पते पर क्या इंतज़ार कर रहा था?

  • अधूरी इबादत भाग~13

    अधूरी इबादत भाग~13

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~13 अफवाहों के घेरे में

     

    शहर के सबसे बड़े सभागार की रोशनी आज अद्वैत के लिए खास थी। मखमली पर्दे धीमे-धीमे फड़फड़ा रहे थे, जैसे वे भी इस सुबह की थमी हुई बेचैनी को समझ रहे हों। अद्वैत मंच के ठीक बीच, विशिष्ट अतिथियों के लिए रखी गई भव्य, ऊँची पीठ वाली कुर्सी पर बैठा था, जिस पर बैठते ही किसी के भी भीतर एक छलावा सा आत्मगौरव जाग सकता था। 

    चारों तरफ तालियों की गूंज थी, हर मुस्कान में आदर था, हर आँख में चमक। लेखक अद्वैत अवस्थी… शब्दों का जादूगर, दिलों को छूने वाला… आज उस ऊँचाई पर था, जहाँ पहुँचने का सपना हर कलाकार देखता है। 

    लेकिन अद्वैत के भीतर कुछ टूट रहा था। उसके भीतर एक ऐसा शोर था जिसे कोई सुन नहीं सकता था। 

    जब वह तड़के ही अपने घर से निकला था, तभी से उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। मन अजीब सा घुटा-घुटा था, जैसे कोई अनकही आशंका दिल में घर बना रही हो। गाड़ी की खिड़की से बाहर बहती हवा भी आज उसे बोझिल सी लगी थी। हरियाली, सड़कें, आसमान…. सब कुछ उसे अपने से दूर-दूर सा लग रहा था। उसके भीतर एक अजीब सी वीरानी थी।

    सभागार के चमचमाते लाइटों के नीचे, वह तन से तो बैठा था, मुस्कुरा भी रहा था, मगर आत्मा कहीं भटक रही थी। भीड़ की तारीफों में डूबती-उतराती उसकी पहचान भी आज उसे बोझ जैसी लग रही थी। 

    एक हिस्सा जैसे लगातार पूछ रहा था… क्या यही था जिसकी तलाश थी? 

    क्या यही संतोष था जिसकी कल्पना की थी?

    किसी ने माइक पर उसका नाम पुकारा, बधाइयों के साथ। वह जैसे किसी नींद से जगा हो, धीरे से मुस्कुराया और आगे बढ़ा। कदम भारी थे, मुस्कान में बनावटी चमक थी।

    स्टेज पर पहुँचकर उसने माइक थामा।

    हॉल में एक गहरी ख़ामोशी छा गई। लोग उसकी अगली कहानी, उसकी अगली सीख, उसके शब्दों की गर्माहट को सुनने के लिए तत्पर थे। मगर अद्वैत के गले में जैसे कांटे उग आए थे। शब्द, जो कभी उसकी आत्मा से बहते थे, आज गले में अटके हुए थे।

    “मैं…,” उसने कहना शुरू किया, फिर पल भर को रुका।

    वह लोगों के चेहरों को देख रहा था। वहाँ केवल प्रशंसा थी, अपेक्षाएँ थीं, और कहीं भी उसे नहीं दिखा वह सुकून, जो शायद उसकी आत्मा मांग रही थी।

    उसे अपनी पत्नी की याद आई — वो जो इतनी जल्दी उससे बिछड़ गई थी। उसकी वो मुस्कुराहटें, उसके अधूरे वादे, उनका अधूरा सपना — सब एक साथ आँखों के सामने छा गया।

    और फिर… अचानक….. घर में एक बेहोश पड़ी लड़की की तस्वीर भी दिमाग के किसी कोने से उभर आई — रूहानी। वो अजनबी लड़की जो अब उसके घर की वीरानी में साँस ले रही थी। जिसे उसने बिना सोचे समझे बचा तो लिया था, पर अब उसके होने से घर में अजीब सी गूँज फैल गई थी।

    शायद रूहानी के टूटे हुए टुकड़े, अद्वैत के अपने बिखरे टुकड़ों से टकरा रहे थे। शायद इसलिए दिल में ये बेचैनी थी, ये घुटन थी। 

    “शब्दों से दुनिया को छूना आसान है,” उसने अचानक बोलना शुरू किया, “लेकिन अपने भीतर के सन्नाटे को छूना सबसे मुश्किल।”

    लोगों ने सोचा यह कोई गहरी भूमिका है, कोई नया विचार। पर अद्वैत जानता था, ये उसकी आत्मा की चीख थी, जो शब्द बनकर बाहर आ रही थी। उसकी आँखें चमक रही थीं, लेकिन वह चमक नम थी। उसने मुस्कुराने की कोशिश की, मगर होठों पर सिर्फ़ एक थकी हुई रेखा खिंच पाई।

    माइक रखते हुए वह जानता था, यह तालियाँ, ये हॉल, ये चमकती बत्तियाँ — सब कुछ उसकी सच्चाई से कोसों दूर हैं। आज भी वह अकेला था….. शायद पहले से भी ज्यादा…….

    शब्दों का सम्राट, दिलों का जादूगर — और फिर भी भीतर एक टूटा हुआ, बिखरा इंसान, जो बस किसी अपने की गर्माहट चाहता था लेकिन उस भीड़ में, उस सभागार में, उसे कोई अपना नहीं दिखा। केवल अजनबियों की गूँजती तालियाँ थीं, और एक थका हुआ दिल जो चुपचाप अपना बोझ ढो रहा था।

    रौशनी से चमकते मंच के पीछे का कोना हलचल से भर गया था। कवि सम्मेलन के समापन के बाद रिपोर्टर और मीडिया वाले अपने अपने कैमरों और रिकॉर्डरों के साथ अद्वैत के चारों ओर इकट्ठा हो गए थे। उनके सवालों की बौछार शुरू हो चुकी थी। शुरू में बात लेखन और रचनाओं के आस-पास घूमती रही। किस कविता में कौन सी भावना, किस कहानी में कौन सा दर्द… अद्वैत संयमित मुस्कान के साथ जवाब देता रहा, जैसे वर्षों से इस तरह के सवालों का सामना करता आया हो।

    लेकिन फिर अचानक सवालों की दिशा बदलने लगी। आवाजें तीखी हो गईं, नजरें चुभती हुई।

    “आपकी लेखनी की प्रेरणा कौन है?” एक युवा रिपोर्टर ने पूछा, उत्सुकता से झुकते हुए।

    अद्वैत ने अनायास ही बिना ज्यादा सोचे कहा, “मेरी पत्नी।”

    उसके शब्दों में एक नर्म, गहरी थकान थी। वह मुस्कुराया भी नहीं, बस नजरें एक पल को झुक गईं, मानो कोई भूला-बिसरा चेहरा फिर से उसकी आँखों के सामने तैर गया हो।

    लेकिन जैसे ही उसके शब्द हवा में घुले, एक और सवाल पीछे से आ गया, तीखा और बेरहम — “आपकी पत्नी तो एक साल पहले गुजर चुकी हैं, ना?”

    अद्वैत का दिल एक पल को थम गया। कमरे की गर्माहट जैसे अचानक बर्फ में बदल गई।  

    वह कुछ कह पाता, उससे पहले ही कोई और बोल पड़ा, “या फिर वो लड़की, जिसके साथ आप इन दिनों अपने घर में रह रहे हैं, वही आपकी नई पत्नी हैं?”

    यह सवाल नहीं था, यह एक वार था — सीधा दिल पर।

    अद्वैत का चेहरा सफेद पड़ गया। पलकों के नीचे छुपी थकान अचानक खुल कर सामने आ गई। आँखों में जो धैर्य था, वह दरकने लगा।  

    भीतर एक बेचैन चुप्पी थी, जो चिल्ला रही थी, चीख रही थी, पर बाहर वह बस खड़ा था — गूंगा और अकेला।

    रिपोर्टरों के कैमरों की फ्लैश लाइट्स उसके चेहरे पर चमकती रहीं। कोई जवाब न पाकर, वे और भी आक्रामक हो गए, उनके सवाल अब तीर बनकर आ रहे थे।

    “कौन है वो लड़की?”  

    “क्या आपने फिर से शादी कर ली है?”  

    “क्या आप अपनी पत्नी की यादों को इतनी जल्दी भूल गए?”  

    अद्वैत ने गहरी साँस ली। गला सूख गया था, जैसे हर शब्द कहीं अंदर ही घुट कर मर गया हो। 

    उसने नजरें उठाई, सामने भीड़ थी…. उत्सुक, जिज्ञासु, और निर्मम। वहाँ कोई अपनापन नहीं था, कोई समझ नहीं थी, सिर्फ़ हड़पने की भूख थी, उसकी जिंदगी का कोई टुकड़ा, कोई सनसनी।

    अद्वैत के चारों तरफ भीड़ का घेरा कसता जा रहा था। मंच के नीचे, चारों दिशाओं से कैमरे, माइक और सवाल उसकी ओर धकेले जा रहे थे। सभागार की भीतरी दीवारों पर फुसफुसाहटें गूंज रही थीं, जो धीरे-धीरे ऊँची आवाज़ों में बदलने लगी थीं। लोग उसे अब किसी और नजर से देखने लगे थे….. वही अद्वैत, जो शब्दों का जादूगर था, अब गंदी अफवाहों के घेरे में घिर गया था। 

    फिर अचानक मीडिया वालों ने दीवार पर प्रोजेक्टर चालू कर दिया। उजली दीवार पर एक तस्वीर उभरने लगी — एक पुल के किनारे की धुंधली शाम, जहाँ अद्वैत ने एक बेहोश लड़की को अपनी बाँहों में उठा रखा था। भीड़ सन्न रह गई। दूसरी तस्वीर में वह लड़की अद्वैत की कार में बैठी थी, और फिर उसके घर में दाखिल होती दिखाई दी। 

    सभागार में एक गहरी सरसराहट फैल गई। चुभती हुई निगाहें अद्वैत पर टिक गईं। सवाल अब और ज्यादा जहरीले हो चले थे।  

    “कौन है ये लड़की?”  

    “क्या ये आपकी नई प्रेमिका है?”  

    “कब से आपके घर में रह रही है?”  

    अद्वैत ने माइक थामा, उसकी आवाज अब भी वही मुलायम थी, लेकिन भीतर का दर्द उसके हर शब्द में रिस रहा था।  

    “मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ,” अद्वैत ने नज़रों में गहराई लाकर कहा, “जो कुछ भी आपने देखा, वह एक गलतफहमी है। वह लड़की मुश्किल में थी। अगर इंसानियत को बचाना गुनाह है, तो हाँ, मैंने गुनाह किया है।”

    लेकिन मीडिया को सफाई नहीं चाहिए थी, उन्हें सनसनी चाहिए थी।

    तालियों के बीच से, चुभती हुई फुसफुसाहटें उठती रहीं। भीड़ में अब जिज्ञासा नहीं, एक गहरी नफरत और गंदे मनोरंजन की भूख थी।

    स्थिति बेकाबू होने लगी थी। अद्वैत का मैनेजर, जो पीछे से सब कुछ देख रहा था, तुरंत आगे बढ़ा और उसे भीड़ से बाहर निकालने का रास्ता बना दिया। दोनों बड़ी मुश्किल से भीड़ से बचते हुए कार तक पहुँचे।

    कार के अंदर घुसते ही अद्वैत ने अपना सिर सीट से टिका दिया। उसकी आँखें बंद थीं, चेहरा थका और टूटा हुआ। सांसें भारी हो रही थीं, जैसे हर सांस अब एक बोझ थी।

    मैनेजर ने ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए गहरी सांस ली और फिर नरमी से कहा, “सर, इस हालात से एक ही रास्ता है बाहर निकलने का।”

    अद्वैत ने आँखें खोलीं, नजरें सवालों से भरी हुई थीं।

    “आपको और उस लड़की को शादीशुदा दिखाना पड़ेगा,” मैनेजर ने कहा।

    अद्वैत का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “क्या बकवास कर रहे हो तुम? मैं अपनी ज़िंदगी का तमाशा नहीं बनाऊंगा।”

    मैनेजर ने संयम से बात आगे बढ़ाई, “सर, सुनिए। मैं असली शादी की बात नहीं कर रहा। पेपर पर शादी… “एक कॉन्ट्रैक्ट”। बस दिखावे के लिए। ताकि मीडिया शांत हो जाए, आपकी इमेज बर्बाद न हो।”

    अद्वैत ने कार की खिड़की से बाहर देखा। अंधेरे में भागती लाइटों के बीच उसका दिल भी भाग रहा था, कहीं दूर, जहाँ उसे अपनी सच्चाई बचानी थी। 

    थोड़ी देर बाद उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, “ठीक है। मैं आज ही घर जाकर उससे बात करूँगा।”

    उसकी आवाज थकी हुई थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी दृढ़ता भी थी। एक फैसला… भले ही मजबूरी में लिया गया हो, लेकिन अब उसे निभाना था।  

    ———-

    क्या अद्वैत सच में रूहानी को इस मजबूरी भरे सौदे में बाँध पाएगा?

    क्या एक मजबूरी से शुरू हुआ समझौता, अद्वैत के दिल के जख्मों को और गहरा कर देगा?

    या फिर रूहानी के अतीत का कोई ऐसा राज सामने आएगा, जो अद्वैत की आधी अधूरी दुनिया को और भी बिखेर देगा?

  • अधूरी इबादत भाग~12

    अधूरी इबादत भाग~12

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    भाग~12 ग़लत इल्ज़ाम का बोझ

     

    रूहानी ने जब दरवाज़े पर अपने माँ-पापा और अपने भाई को देखा, तो एक पल के लिए उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। जैसे कोई सपना अचानक हक़ीक़त में बदल गया हो, जैसे वर्षों की सूनी सड़कों पर अचानक कोई परिचित चेहरा मुस्कुरा कर सामने आ गया हो। दरवाज़े की चौखट पर खड़ी रूहानी की आँखें भर आईं….. आंसू न खुशी के थे, न ग़म के, बस एक लंबी प्रतीक्षा के थके हुए, गीले मोती थे।

    किसी के कुछ कहने या सोचने से पहले ही, यश दौड़कर अपनी बहन से लिपट गया। उस आलिंगन में अनगिनत शब्द थे… शिकायतें, माफ़ी, डर, अपनापन और ना जाने क्या – क्या….

    “मुझे लगा मैंने आपको खो दिया है, दीदी,” यश एक ही साँस में कह गया, उसकी आवाज़ में एक टूटी हुई राहत थी, जो शायद अब तक रोज़ रात उसकी नींदें तोड़ देती थी।

    रूहानी ने उसके सिर को थपथपाते हुए कहा, “देख, मैं हूं न यहाँ… सही सलामत।” उसके शब्दों में न कोई दंभ था, न कोई सफाई। बस एक कोमल सच्चाई थी।

    पर जैसे ही रूहानी अपने पिता के पास पहुँची, समय जैसे पल भर में ठहर गया। भानु प्रताप चौहान, एक गरिमामय भाव लिए अपने सख्त चेहरे के साथ हाथ उठा कर उसे वहीं रुकने का इशारा करते हैं। उस इशारे में कोई क्रोध नहीं था, पर कोई प्रेम भी नहीं। बस एक गहरी दूरी थी…. आत्मा से आत्मा तक की दूरी।

    “यही दिन दिखाने के लिए तू घर छोड़ कर चली गई थी?” उनकी आवाज़ भारी थी, जैसे वर्षों से दबा ज्वालामुखी अब फूट पड़ा हो।

    रूहानी एक पल को स्तब्ध रह गई, मानो उसके कानों ने कुछ उल्टा सुन लिया हो।

    “मैं कुछ समझी नहीं, पापा,” उसने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में झिझक थी, पर दिल में अभी भी उम्मीद की थोड़ी सी रौशनी थी।

    भानु प्रताप गरज कर बोले, “मुझे पापा कहने का हक तुम पहले ही खो चुकी हो। तुम हमारे लिए पहले ही मर चुकी थी, लेकिन ये नहीं सोचा था कि तुम्हारी बेशर्मी इतनी बढ़ जाएगी कि तुम्हारे जाने के बाद भी हमारी समाज में कोई इज़्ज़त नहीं रहेगी।”

    ये शब्द नहीं थे, अंगारे थे। रूहानी जैसे एक-एक शब्द से जलती चली गई। उसकी आत्मा पर, जो अब तक अपने लौटने की घड़ी में सहजता ढूंढ रही थी, अचानक ठंडी हवा की जगह तपता सूरज उतर आया।

    वो अपने पिता की आँखों में देखती रही… वहाँ न कोई अपनापन था, न कोई सुरक्षा बस परछाईयाँ थी और एक टूटा हुआ विश्वास।

    “आप ये क्या सब बोल रहे हैं, पापा?” उसने आँखें भरकर कहा, “किस बारे में बोले जा रहे हैं? अंदर तो आइए, तब बात करते हैं।”

    उसका स्वर अब भी शांति लिए हुए था, पर भीतर कुछ टूटता जा रहा था, बिखरता जा रहा था, मगर चेहरे पर वो अब भी एक मुस्कान लिए खड़ी थी…. शायद खुद को समझाने के लिए, शायद यह दिखाने के लिए कि वो अब भी मजबूत है।

    लेकिन उसकी माँ जानकी चौहान की आवाज़ में जो तीखापन निकला, वो उसे सहने लायक नहीं रही।

    “बस कर रूहानी,” माँ की कड़ी आवाज़ गूँजी, “तेरे चलते हम कहीं मुँह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहे। पहले तो तूने ज़िद करके वो फ़ैशन वाला कपड़ा सिलने का काम शुरू किया था, ये जानते हुए भी कि हम दोनों में से कोई भी रज़ामंद नहीं था। और फिर उसके बाद क्या हुआ, भूल गई है क्या? या फिर से याद दिलाऊँ?”

    हर एक शब्द जैसे अतीत की धूल उड़ा रहा था, वो धूल जो रूहानी ने बड़ी मुश्किल से जमा दी थी, हर उस बात को ढँक दिया था जिसने उसकी रातों की नींद और दिल की चैन छीन ली थी।

    रूहानी की आँखों में अब आँसू नहीं थे, मगर उसकी रगों में दर्द दौड़ रहा था, हर सांस के साथ जलन पैदा करता हुआ। उसे अब अपने माँ-बाप की इन उलझन भरी बातों से चिढ़ होने लगी थी। वो नहीं चाहती थी कि फिर से वो सब याद किया जाए। वो नहीं चाहती थी कि फिर से वो सब जिंदा हो….. वो रातें, वो ताने, वो अकेलापन।

    वो काँपते हुए अपने छोटे भाई यश का हाथ पकड़ ली, उसकी आँखों में एक बेचैनी थी, एक डर।

    “क्या हुआ है, यश? बता… मम्मी -पापा कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं?” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में थी, जैसे डरती हो कि कहीं खुद उसकी आवाज़ से उसकी दुनिया और ज़्यादा टूट न जाए।

    यश कुछ क्षण चुप रहा। उसकी नज़रें ज़मीन में गड़ी रही और शब्द जैसे उसके गले में अटक गए हो। फिर वह अपने मम्मी -पापा से थोड़ी नज़रें चुराकर कहा, “वो दीदी… दी… वो पड़ोस वाली आंटी ने कहा है कि आप एक अजनबी आदमी के साथ उसके घर में अकेले रह रही हो और… और…”

    उसके शब्द अधूरे रह गए मगर रूहानी थोड़ा-थोड़ा समझ चुकी थी। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई जैसे कोई भूचाल आया हो उसके भीतर।

    “और क्या यश?” उसकी आवाज़ अब भी धीमी थी, मगर उसमें डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी सख़्ती थी जो उसके टूटे हुए आत्मसम्मान को थामे हुए थी।

    तभी माँ की आवाज़ फिर गूँजी और इस बार उसमें नफ़रत की तपिश थी, आरोपों की आग।

    “वो क्या कहेगा, तुमने जब हमारे मुँह काले किए तब याद नहीं था क्या? जब पराए मर्द के साथ उसके घर में, उसके बिस्तर में… छी… मुझसे तो बोलते भी नहीं बनता है।”

    एक पल को समय जैसे ठहर गया। रूहानी का चेहरा फक पड़ गया। उसके होंठ काँप उठे, और उसका सारा शरीर जैसे बर्फ बन गया हो। माँ की बातों ने उसके भीतर की उस मासूम बच्ची को झकझोर दिया था, जो अब तक यही सोचती आई थी कि उसकी माँ उसे समझेगी कि कभी तो उसका दर्द एक दिन उनके सीने तक पहुँचेगा।

    लेकिन आज तो जैसे उसकी रूह तक को किसी ने चीर दिया था।

    उसने एक गहरी साँस ली, फिर उसकी आँखें जल उठीं, लेकिन उसमें आँसू नहीं, एक गुस्सा था…. ग़लत इल्ज़ामों के खिलाफ़ एक मौन विद्रोह।

    “ये आप क्या अनाप-शनाप बोले जा रही हैं, मम्मी?” उसकी आवाज़ थरथरा रही थी, मगर वो चुप नहीं रही। “आप किसी तीसरे की बातों में कैसे आ गईं? क्या आपने अपनी आँखों से मुझे कुछ भी ग़लत करते देखा है?”

    उसकी आवाज़ की कड़क अब किसी आंधी जैसी थी। वो अब तक उन दोनों की इज्जत करते आयी थी, लेकिन अब चुप रहना उसे गवारा नहीं था।

    रूहानी की आँखों में एक हज़ार सवाल थे। क्या उसके सपने देखने की आज़ादी इतनी बड़ी ग़लती थी? 

    क्या उसने कोई अपराध कर दिया क्योंकि उसने अपने लिए एक रास्ता चुना, जो उसकी माँ-बाप की सोच से अलग था? 

    क्या एक लड़की का अपने पैरों पर खड़े होने का हक़ नहीं?

    तभी रूहानी के पापा ने उसके गाल पर एक जोर का तमाचा जड़ दिया जिसकी गूंज से रूहानई की माँ और उसका भाई दोनों एक दूसरे से चिपक से गए। 

    रूहानी के गाल पर वो तमाचा सिर्फ़ उसकी त्वचा नहीं, उसकी आत्मा तक को जला गया था। एक पल को समय ठहर गया, जैसे घर की दीवारें भी सहमकर चुप हो गई हों। 

    भानु प्रताप की गूंजती आवाज़ ने उस सन्नाटे को चीरते हुए उसकी रगों में तूफान भर दिया, “बेशर्म तो तू पहले से ही थी, लेकिन चरित्रहीन भी हो जाएगी ये हमने कभी उम्मीद नहीं की थी। तेरी वही सब करतूत देखने के लिए ही क्या अब हमारी आंखें बची हैं?”

    रूहानी की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था, पर उससे ज़्यादा काले वो शब्द थे जो उसके पिता के होंठों से निकले थे… तेज, नुकीले, और आत्मा को बींध देने वाले।

    रूहानी, वो वहीं आधे झुके हुए, अपने सुजे हुए गाल पर हाथ रखे, अपनी ही उलझनों में डूबी खड़ी थी। सन्नाटा, उसकी साँसों की रुकावट में तब्दील हो गया था। उसकी आंखों में आंसू नहीं थे…. नहीं, अब तो वो भी सूख चुके थे, जैसे आत्मा रोते-रोते थक गई हो।

    रूहानी की आंखें कुछ पल के लिए पथरा गईं, गाल पर पड़ा हाथ अब कांपने लगा था, दर्द से नहीं, भीतर उमड़ते तूफान से। उसने कुछ नहीं किया था — ना कोई पाप, ना कोई छल, फिर भी हर बार वो ही क्यों दोषी बनती रही? अंदर से कोई चीख उठी, कोई घुटा हुआ आक्रोश जो बरसों से थमा हुआ था।

    “नहीं… बहुत हो गया…” उसने खुद से कहा, जैसे उसके भीतर कोई ज्वालामुखी फूटने की तैयारी में हो।

    फिर एक लंबी, टूटी सांस लेकर, उसने एक ही बार में वो सब कह दिया जो उसकी रूह में बरसों से धंसा पड़ा था।

    “क्यों, पापा? क्या सिर्फ मेरी जननांग से आपकी इज़्ज़त जुड़ी है? क्या आपने मुझे बेटी बनाकर पाला था या कोई ‘इज़्ज़त का बक्सा’ बनाकर, जिसे जब तक ताला लगा रहे, तब तक आप शरीफ़ कहलाएं?”

    उसकी आवाज़ में ना चीख थी, ना सिसकी, बल्कि वो सन्नाटे का वो रूप थी जो कानों को फाड़ सकता था साथ ही दिल को भी चीर सकता था।

    “आपको मेरे हक़ से ज़्यादा मेरी देह की फिक्र क्यों है? मैं जीऊँ या मरूँ, आपको फर्क नहीं पड़ता….. बस इतना तय रहे कि मेरी देह किसी अजनबी की देह से ना छुए। क्या आपकी मर्दानगी इतनी सस्ती है कि मेरे ज़िंदा रहने से भी डर जाती है?”

    उसके शब्दों में जहर नहीं था, बल्कि वो सालों की पीड़ा थी, जो अब शब्दों के लिबास में बाहर आ रही थी।

    “जब मैं पुल से कूद कर मरने जा रही थी, उससे पहले आपको शर्म नहीं आई थी मुझे धिक्कारते हुए कहने में कि ‘तू हमारे लिए मर गई’। पर अब, जब मैं किसी की छत के नीचे साँस ले रही हूँ, तो आपको अपनी इज़्ज़त की चिंता सताने लगी?”

    उसका गला सूखने लगा था, पर शब्द नहीं रुके।

    “कौन-सी इज़्ज़त है ये, पापा, जो एक लड़की के पैरों के बीच से निकलकर आपके सीने में जाकर बसती है?”

    उसके ये शब्द जैसे दीवारों से टकराकर फिर उसके ही कानों में लौट आए। पर उससे पहले, उसकी मां ने जैसे खुद की बेइज़्ज़ती महसूस कर ली हो, तो उन्होंने उसके गाल पर एक और तमाचा मारा, फिर एक और। फिर वो बरसने लगी, न केवल हाथों से, बल्कि शब्दों से भी।

    “सही में सारी शरम-हया बेच कर खा गई है ये लड़की! बोलने से पहले लिहाज़ भी नहीं हुआ कि क्या-क्या बके जा रही है!”

    रूहानी कुछ कदम पीछे हट गई, पर उसकी आवाज़ अब भी टिकी रही, जैसे हर थप्पड़ के साथ और मजबूत हो रही हो।

    “तो आख़िर क्या ग़लत कहा मैंने?” उसने सवाल किया, पर उसमें कोई लड़ाई नहीं थी, बस थकावट थी। जैसे एक टूटे हुए इंसान ने अब लड़ने का बोझ उतार फेंका हो।

    तभी उसके पिता, गुस्से से कांपते हुए, लगभग चीखते हुए बोले, “बस! बहुत बोल लिया तूने और बहुत सुन लिया हमने!”

    उनकी आंखों में वो लाचारी थी जो हर उस पुरुष की आंखों में होती है जब उसकी ‘इज़्ज़त’ उसके नियंत्रण से बाहर जाने लगती है। उन्होंने उसका हाथ पकड़ा, इतने ज़ोर से जैसे वो उसे अपनी ‘नाक कटने’ से बचाने के लिए किसी गहरी खाई से खींच रहे हों।

    “तुझे इसकी सज़ा मिलकर रहेगी।”

    और फिर वो उसे लगभग घसीटते हुए उस घर से बाहर निकाल ले गए, जैसे कोई अपराधी पकड़ा गया हो। पीछे-पीछे उसकी मां और छोटा भाई, जिनकी आंखों में सिर्फ़ शर्म और डर था। 

    रूहानी को इस पल में अपने पिता की पकड़ इतनी मजबूत महसूस हो रही थी, जैसे वह उसे किसी चट्टान की तरह घसीट रहे हो और वह उन चट्टानों के नीचे दबकर नष्ट हो जाएगी।

    उसका मन बेतहाशा उथल-पुथल कर रहा था, लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह से खो चुकी थीं। उसकी दुनिया जैसे अंधेरे में डूब चुकी थी, जहां किसी भी उम्मीद का नामो-निशान नहीं था। वह जैसे एक खाली रास्ते पर चल रही थी, जहां न तो कोई मंजिल थी और न कोई वापसी का रास्ता।

    तभी रूहानी का मोबाइल उसकी नजरों के सामने गिर गया और उसके स्क्रीन पर लगातार नोटिफिकेशन आ रहे थे। लेकिन वह कुछ नहीं देख सकी। उसका मन वह था ही नहीं। 

    ———-

    रूहानी की आत्मा जैसे उथल-पुथल में थी, और हर शब्द, हर तमाचा, उसे और गहरे में ले जा रहा था। क्या उसके पास अब कोई रास्ता था, या ये उसका आखिरी संघर्ष था?

    क्या रूहानी की आत्मा इतनी टूट चुकी थी कि वो कभी खुद को फिर से नहीं पा सकेगी? 

    क्या अब भी कोई ऐसी उम्मीद है, जो उसे इस अंधेरे से बाहर निकाल सके?

    रूहानी की दुनिया अब सवालों में ढल चुकी थी, मगर क्या वह इन सवालों का जवाब कभी पा सकेगी?

  • अधूरी इबादत भाग~11

    अधूरी इबादत भाग~11

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~11 दरवाज़े पर तूफ़ान

     

    कुछ दिन पहले 

    जब यश रूहानी से फोन पर बात कर रहा था। तभी यश को अपने पीछे से अचानक एक सख्त, तीखी आवाज़ आई, “यश! किससे बात कर रहे हो?”

    वो कुछ पल वैसे ही खड़ा रहा, फोन अब भी उसके हाथ में था, लेकिन स्क्रीन बुझ चुकी थी… ठीक वैसे जैसे उसके भीतर की रोशनी। 

    उसकी रूहानी दीदी की काँपती आवाज़ अब भी उसके कानों में गूंज रही थी। एक अजीब सी चुप्पी कमरे में फैल गई थी, जैसे हर दीवार अब उसके जवाब चाहती हो।  

    “किससे बात कर रहे थे?” पिता की आवाज़ में उतनी ही सख्ती थी जितनी चिंता।

    यश, जो अभी-अभी फोन कट कर चुका था, थोड़ा हड़बड़ा गया। उसकी उंगलियाँ अब भी फोन की स्क्रीन पर ठहरी हुई थीं।

    “वो… दीदी थी…” उसने धीरे से कहा, आँखें नीचे कर लीं।

    उसके बोलते ही कमरे में जैसे सब कुछ थम गया। माँ ने चूल्हे पर रखी चाय की केतली को बंद कर दिया, जब उन्होंने यश के पिता की सख्त आवाज सुनी।

    “क्या कहा तुमने?” पिता की आवाज़ अब कुछ भारी हो गई थी।

    “द… दीदी से बात कर रहा था,” यश ने थोड़ा और स्पष्ट किया, लेकिन अब उसकी आवाज़ में भी डर था।

    “वो… ठीक हैं… मैंने बस पूछा कि कैसी हैं। मुझे उनकी फिक्र हो रही थी।”

    माँ की आँखों में नमी उतर आई। “कहाँ है वो?” उन्होंने लगभग फुसफुसाकर पूछा।

    यश ने सिर हिलाया, “पता नहीं माँ… लेकिन… लेकिन वो जिंदा हैं। उनकी आवाज़ बिलकुल वैसी ही थी। मैंने पूछा कि कब आओगी घर, तो…..”

    “बस!” पिता की आवाज़ तीर की तरह बरस पड़ी।

    “वो हमारे लिए मर चुकी है, यश। ये बात जितनी जल्दी समझो, उतना अच्छा होगा।”

    यह वाक्य यश के दिल को चीरता हुआ निकला। उसके भीतर कुछ टूटा, जैसे कोई काँच की परत हो जो अब तक उसके भीतर दीदी की यादों को सहेजे थी।

    यश ने आँखें मूंद लीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो दीदी की आवाज़ से खुश हो या इस घर की चुप्पी से डर जाए।

    यश ने फिर भी हिम्मत जुटाई, माँ की तरफ देखा, लेकिन उसकी आँखें अब कहीं और टिक चुकी थीं – शायद यादों की किसी पुरानी धूल भरी किताब पर।  

    उसे समझ नहीं आया कि दीदी से बात करना क्यों इतना गलत था?  

    यश ने धीमे कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ना शुरू किया, पीछे से किसी ने नहीं रोका, किसी ने नहीं पुकारा। शायद अब उस घर में रिश्ते नहीं, सिर्फ़ नाम बचे थे… और कुछ अधूरी बातें, जो अब भी दीदी की तरह कहीं हवा में टंगी थीं।

    सूरज धीरे-धीरे अस्त हो रहा था और आसमान पर एक हल्की नारंगी आभा छा गई थी। यश अपने कमरे में बैठा, अपनी दीदी के बारे में सोच रहा था। उसके मन में उथल-पुथल मची हुई थी, जैसे कोई तूफ़ान उसके भीतर उठ रहा हो।

    तभी बाहर से कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई देने लगीं। यश अपने कमरे के खिड़की की तरफ बढ़ा और परदे को हल्का सा खिसका कर झाँका। उसने देखा कि बाहर गली में पड़ोस वाली आंटी उसके माँ-पापा से बात कर रही थीं। उनके चेहरे पर चिंता और तीखी जिज्ञासा थी, जैसे कोई बड़ा रहस्य उजागर कर रही हों।

    यश ने कान लगाए तो उनकी आवाज़ें साफ़ सुनाई देने लगीं।

    “मैंने खुद देखा है, अपनी आँखों से,” वो कह रही थीं, “आपकी बेटी एक अजनबी के घर में जा रही थी। अकेली लड़की, इस उम्र में… और वो भी एक अनजान आदमी के घर? पता नहीं कौन है वो? कहाँ से आया? लेकिन इतना जरूर सुना है कि अकेले घर में रहता है और कोई है नहीं उसका उसे घर में…. पूरे मोहल्ले में तो यह बातें आग की तरह फैल रही हैं।”

    यश के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने देखा, माँ-पापा का चेहरा सुन पड़ गया था। माँ की आँखों में हैरानी और तकलीफ़ साफ झलक रही थी, जबकि पापा का चेहरा एकदम सख्त और कठोर हो गया था।

    “ये तो वाकई शर्म की बात है…” वो आगे बोलीं, “आप लोगों ने तो कहा था कि आपकी लड़की अब इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन अब तो पूरे मोहल्ले में बात फैलने लगी है। लोग सवाल कर रहे हैं। आपकी इज्ज़त का क्या होगा?”

    पापा ने मुश्किल से अपनी जबान पर काबू पाते हुए कहा, “धन्यवाद, आपका। हम देख लेंगे।”

    उन्होंने दरवाज़ा धीरे से बंद किया।

    अंदर आते ही जैसे घर की हवा भारी हो गई। माँ सोफे पर बैठ गईं, उनकी आँखों में आँसू तैरने लगे। पापा चुपचाप खड़े रहे, लेकिन उनके सख्त चेहरे से साफ था कि अंदर बहुत कुछ उबल रहा है। यश समझ गया था कि अब कोई तूफ़ान उठने वाला है।

    “यश!” पापा की आवाज़ गूंज उठी। “अभी फोन करो अपनी बहन को। पूछो उससे, किसके घर हमारी इज्ज़त नीलाम कर रही है।”

    यश ने काँपते हाथों से फोन उठाया और रूहानी का नंबर डायल किया। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। फोन की घंटी बजती रही, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उसने फिर से कॉल किया, लेकिन इस बार भी कोई उत्तर नहीं आया।

    “नहीं उठा रही है फोन,” यश ने धीरे से कहा।

    “तो अब हम क्या करें?” माँ ने घबराते हुए कहा। “लोग क्या कहेंगे? हमारी बेटी किसी अजनबी के घर में रह रही है और हमें कुछ पता ही नहीं।”

    पापा ने गहरी साँस ली और कहा, “हमें खुद जाकर देखना होगा। पता करना होगा कि वो कहाँ है और किसके साथ रह रही है।”

    यश ने सिर हिलाया और कहा, “मैं भी चलूँगा। मुझे भी दीदी से बात करनी है।”

    तीनों ने मिलकर योजना बनाई कि वे उस जगह पर जाएंगे जहाँ उनकी पड़ोसन ने रूहानी को देखा था। 

    आज 

    कुछ दिनों की खोज खबर के बाद वे तीनों उस इलाके में पहुँच गए। उन्होंने आसपास के लोगों से पूछताछ की, और अंततः एक महिला ने बताया कि एक लेखक अद्वैत अवस्थी के घर में एक लड़की रह रही है, जो शायद आपकी रूहानी ही हो।

    वे सभी अद्वैत के घर पहुँचे और दरवाज़ा खटखटाया।

    दूसरे तरफ से रूहानी के पैर दरवाज़े की ओर बढ़े, लेकिन मन पीछे किसी तूफान में उलझा हुआ था। हाथ ने चिटकनी घुमाई, पर उंगलियाँ काँप रही थीं। दरवाज़ा खुला, और सामने जैसे समय रुक गया हो…

     

    लेकिन दरवाज़ा खोलते ही उसके शरीर का सारा रक्त जैसे एक पल को थम गया और साँस अटक गई।

    दरवाज़े पर खड़े थे उसके और यश के माता-पिता। उनकी आँखों में गुस्सा, अपमान और अविश्वास की ज्वाला जल रही थी। रूहानी के होंठ काँपने लगे, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।

    —— 

    क्या अब रूहानी के जवाब, सब कुछ बिखेर देंगे… या फिर कोई और सच उजागर होने वाला है, जिससे अब तक सब अनजान हैं?

    उस पल, दरवाज़े की दहलीज़ पर खड़ी रूहानी—क्या वो फिर से एक बार खो जाएगी… हमेशा के लिए?

  • अधूरी इबादत भाग~10

    अधूरी इबादत भाग~10

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~10 तूफ़ान से पहले

     

    सुबह की ठंडी हवा खिड़कियों से छनकर कमरे के भीतर उतर रही थी, लेकिन रूहानी के भीतर एक अनाम घबराहट की तपिश थी। उसने बार-बार अपनी हथेलियों को आपस में मसलते हुए खुद को शांत करने की कोशिश की, पर बेचैनी जैसे उसके भीतर से फूट रही थी। 

    अद्वैत आज सुबह जल्दी ही निकल गया था। एक पास के शहर में कवि सम्मेलन था, जहाँ उसे मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था। जाते समय उसने सिर्फ एक हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया था, कुछ कहा नहीं था। शायद कहने को कुछ था भी नहीं। दोनों के बीच अब तक जो दूरी थी, वह अनकही बातों से भरी थी।  

    रूहानी ने सोफे पर बैठते हुए गहरी सांस ली। दिल जैसे हल्का नहीं हो रहा था। हर कुछ मिनट पर उसे लग रहा था कि कुछ गलत होने वाला है, कुछ ऐसा जो उसकी समझ से परे है। वह इस अजीब सी भावना को झटकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हर बार वह और गहरे उतरती जा रही थी।  

    मीना, जो चाय लेकर आई थी, उसकी खोई-खोई आँखों को देख नहीं पाई। उसने धीरे से चाय का कप सामने रख दिया और मुस्कुराते हुए कहा, “क्या हुआ मैडम, आप बहुत चुपचाप हैं आज? आपके पैर का घाव तो अब पूरी तरह ठीक हो गया है, कई दिन हो गए।”  

    रूहानी ने अनमने भाव से अपने तलवे की ओर देखा। वहाँ अब सिर्फ एक हल्का गुलाबी निशान बचा था, जैसे बीते दर्द की कोई फीकी याद। उसने धीमे से कहा, “हाँ, घाव तो ठीक हो गया है, लेकिन पता नहीं क्यों, आज मन बहुत बेचैन हो रहा है… जैसे कुछ बुरा होने वाला है।”  

    उसकी आवाज में एक ऐसी मासूमियत और डर था, जिसे सुनकर मीना का दिल पसीज गया। मीना ने अपने अनुभव से सीखा था कि कई बार दिल की बेचैनी कोई झूठा वहम नहीं होती, लेकिन फिर भी उसने रूहानी को ढाढ़स बंधाते हुए कहा, “ज्यादा चिंता मत कीजिए मैडम। सब कुछ अच्छा ही होगा। अच्छे लोगों के साथ अच्छा ही होता है।”  

    रूहानी ने एक कमजोर मुस्कान के साथ सिर हिला दिया, लेकिन भीतर का तूफान अब भी थमा नहीं था।  

    उसने चाय का कप अपने हाथों में थामा और खिड़की के बाहर झांकने लगी – धूप हल्की थी, पेड़ धीरे-धीरे हिल रहे थे, सब कुछ सामान्य था… फिर भी दिल के किसी कोने में कोई साया मंडरा रहा था, कोई अनदेखा डर जो उसके भीतर घर कर गया था।

    मीना अब धीरे-धीरे रूहानी से खुलने लगी थी। घर के काम करते-करते वह अपनी चुप्पी तोड़ बैठी। उसकी आवाज़ में अपनापन घुला था, जैसे अपने दिल का बोझ हल्का कर लेना चाहती हो। उसने सिर झुकाए हुए कहा, “मैडम, आप जानती हैं, मेरे बच्चे की पढ़ाई का सारा खर्च अद्वैत सर उठाते हैं।”

    रूहानी ने चौंककर उसकी तरफ देखा। मीना ने सफाई देते हुए आगे कहा, “मेरे पति बहुत शराबी थे। रोज़ पीकर घर आते, गाली-गलौच, मारपीट… सब सहती रही। लेकिन एक रात ज़्यादा पीकर कहीं गिर पड़े और फिर लौटकर नहीं आए।” उसकी आवाज़ में ना कोई पछतावा था, ना कोई आँसू…. बस एक थकान, जो बरसों के जिए हुए दुःख से आई थी।

    “उनके मरने के बाद मैंने घर-घर जाकर काम करना शुरू किया। एक दिन अद्वैत सर के पापा के यहाँ भी काम पर लगी। लेकिन…” मीना का चेहरा तनिक कस गया, “उनकी पत्नी को मैं कभी पसंद नहीं आई। रोज़ कोई न कोई गलती निकालती, डाँटतीं। कभी खाना खराब, कभी झाड़ू सही नहीं।”

    रूहानी चुपचाप सुनती रही। मीना ने आगे कहा, “फिर एक दिन सर आए। देखा कि मैं डाँट खा रही हूँ। फिर उन्होंने अपनी पत्नी से मिलवाया और कहा — ‘मीना अब हमारे घर काम करेगी।’ बस तब से यहीं हूँ, सर ने कभी कोई शिकायत नहीं की। हमेशा सम्मान दिया।”

    मीना के शब्दों में अद्वैत के लिए एक गहरा आदर था। रूहानी ने उसकी आँखों में वह चमक देखी, जो केवल उन लोगों की आँखों में होती है जिन्हें किसी ने टूटने से बचा लिया हो।

    कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही। मीना ने धीरे से झाड़ू एक कोने में टिकाई और हिचकिचाते हुए पूछा, “मैडम, आपके घरवाले क्यों नहीं आते आपको देखने?”

    यह सवाल हवा में तीर की तरह तना रह गया। रूहानी का दिल एक पल को जैसे रुक गया। उसने पलकों को झपकाया, अपने भीतर उठती कड़वी यादों को जब्त किया। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाते हुए, उसने नजरें चुराते हुए कहा, “ऐसा कुछ नहीं… वो सब बहुत दूर रहते हैं… व्यस्त होंगे शायद।”

    मीना ने उसकी आवाज़ में छुपे दर्द को महसूस कर लिया था, मगर उसने ज़्यादा कुरेदना सही नहीं समझा पर कमरे में जो मौन फैल चुका था, वह अब और भी गाढ़ा हो गया था।

    मीना ने माहौल को हल्का करने की कोशिश में फिर से बातचीत शुरू की। इस बार उसकी आवाज़ में हल्की उत्सुकता थी, “वैसे, आप क्या करती थीं, मैडम?”

    रूहानी ने एक पल को सोचा, क्या सच बताए या फिर वही आधा-अधूरा जवाब दे, जिसे सुनकर सामने वाला सवाल न बढ़ाए लेकिन मीना की आँखों में कोई छल नहीं था, बस एक सीधी-सादी जिज्ञासा थी।

    हल्की मुस्कान के साथ रूहानी ने कहा, “मैं ड्रेस डिजाइनर हूं।”

    मीना की आँखों में चमक आ गई। उसने पास आकर चहकते हुए पूछा, “अच्छा! तो आप तो बहुत बड़ी डिजाइनर होंगी न?”

    रूहानी ने हल्के से हँसते हुए सिर झुकाया। उसकी हँसी में एक थकी हुई सच्चाई थी।

    “नहीं, इतनी बड़ी भी नहीं,” उसने धीरे से कहा, “अभी तो बस… संघर्ष ही कर रही थी। खुद को साबित करने की कोशिश में थी।”

    मीना ने सहानुभूति से उसकी ओर देखा। फिर फुर्ती से बोली, “अरे, आप तो बहुत अच्छा काम करती होंगी। कपड़े का डिजाइन बनाना कोई मामूली बात थोड़े न है।”

    रूहानी ने मीना की बात पर कुछ नहीं कहा। दिल के किसी कोने में मीना की मासूम प्रशंसा ने हल्का-सा सुकून दिया, जैसे कोई किसी बर्फीली रात में काँपते हुए कंधों पर चुपचाप एक गर्म चादर रख दे।

    लेकिन उसी सुकून के नीचे एक कड़वी सच्चाई भी थी कि किस तरह उसका सपना टूटने की कगार पर था, कैसे उसे अपने अस्तित्व के लिए भी लड़ना पड़ा था, कैसे अपने घरवालों के ठुकराए जाने के बाद उसके पास खुद के अलावा कोई सहारा नहीं बचा था।

    कमरे में फिर से चुप्पी छा गई। मीना अब अपने बर्तन समेट रही थी, उनकी आवाजें उस भारी सन्नाटे में टकरा कर रह रह कर गूंज रही थीं।

    मीना ने आखिरी कुर्सी पर कपड़ा मारते हुए कहा, “ठीक है, मैंने अपना काम कर दिया है, मैं जा रही हूं।”

    रूहानी ने चुपचाप सिर हिलाया। उसकी मुस्कान फीकी थी, मगर आँखों में एक हल्का-सा अपनापन झलक गया था।

    मीना के जाते ही रूहानी ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया। दरवाज़ा बंद करते समय उसका हाथ कुछ पल के लिए हैंडल पर रुका, जैसे वह इस छोटे-से घर में पसरी एकाकी खामोशी से खुद को बचाने की कोशिश कर रही हो।

    कमरे में फिर से वही पुरानी चुप्पी फैल गई। रूहानी ने गहरी साँस ली और खुद को संयत करते हुए सोचा कि आज शायद कुछ पल अपने लिए भी होंगे। लेकिन इस उम्मीद को वक़्त ने लंबा नहीं चलने दिया।

    कुछ ही देर में दरवाज़े पर फिर से दस्तक हुई। रूहानी ने चौंक कर पलटकर दरवाजे की ओर देखा। उसके दिल में हल्की-सी बेचैनी उठी।

    “अब कौन?” उसने खुद से बुदबुदाया और धीमे कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ी।

    जैसे ही उसने दरवाजा खोला, सामने मीना खड़ी थी। हाथों में अपनी चुन्नी मरोड़ते हुए, आँखों में उम्मीद की चमक लिए।

    “अरे तुम?” रूहानी ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा।

    मीना हड़बड़ाई-सी बोली, “मैडम, एक बात कहनी थी। आप तो ड्रेस डिजाइनर हो ना? मेरे बच्चों के लिए ड्रेस डिजाइन कर दोगी क्या?”

    उसकी आवाज़ में संकोच और एक मासूम उम्मीद दोनों थीं।

    रूहानी ने भौंहें चढ़ाकर पूछा, “ड्रेस?”

    मीना ने जल्दी-जल्दी समझाया, “वो क्या है ना, मेरी बेटी का जन्मदिन आने वाला है। एक ड्रेस देखी थी उसने बाजार में, बहुत पसंद आई है उसे। लेकिन बहुत महंगी है, मारे बस की नहीं। अगर आप वही ड्रेस बना दें… तो मेरी गुड़िया बहुत खुश हो जाएगी।”

    रूहानी के होंठों पर एक कोमल मुस्कान तैर गई। मीना की आँखों में एक माँ का प्रेम साफ़ चमक रहा था।

    रूहानी ने सिर हिलाते हुए कहा, “हां, बना दूंगी। लेकिन मैं कोई बहुत फेमस डिजाइनर नहीं हूं। फिर भी, अपनी बेटी को ले आना। मैं उसके नाप की ड्रेस डिजाइन कर दूंगी।”

    मीना के चेहरे पर एक चमक आ गई, जैसे उसे कोई अनमोल तोहफा मिल गया हो। उसने बार-बार धन्यवाद कहा, फिर खुशी-खुशी पलट गई।

    रूहानी ने फिर दरवाजा धीरे से बंद कर दिया। कमरे में लौटते हुए उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान बनी रही, जो मीना के भोलेपन से उपजी थी।

    लेकिन जैसे ही वह अपने बिस्तर के किनारे बैठी, पुराने विचार फिर से उसे घेरने लगे। उसने सोचा, “कितने दिन हो गए स्टूडियो गए हुए… सारा सामान वहीं रखा है।” एक कसक सी उसके भीतर उठी।

    “आज चली जाऊंगी,” उसने धीरे से खुद से वादा किया।

    मन में एक हल्का सा उत्साह जागा… शायद काम में खुद को डुबो कर वह इस अनजानी खालीपन से बच सकेगी।

    उसे लगा जैसे कोई चीज़ उसके भीतर फिर से सांस लेने लगी हो लेकिन उसकी ये सोच भी बस कुछ ही पल ठहरी।

    अचानक दरवाज़े पर फिर से दस्तक हुई। इस बार दस्तक में थोड़ी जोर थी, थोड़ी बेसब्री भी।

    रूहानी ने झल्लाकर बड़बड़ाया, “अब क्या है, मीना?”

    तेज कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ते हुए उसने चिटकनी घुमाई और दरवाजा खोल दिया।

    लेकिन दरवाजा खोलते ही उसके शरीर का सारा रक्त जैसे एक पल को थम गया और सांस अटक गई।

    ——

    कौन था वह, जो इस बार मीना नहीं थी? 

    क्यों उसकी आंखों में अचानक डर की परछाई दौड़ गई? 

    क्या वही अनजानी आशंका अब हकीकत बनने जा रही थी?

  • अधूरा रिश्ता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “यार, तेरी सगाई पक्की हो गई!”

     

    दोस्त की बात सुनकर आदित्य के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। घर में भी कई दिनों से खुशियों का माहौल था। रिश्ता कोई अनजान परिवार में नहीं, बल्कि अपने ही रिश्तेदारों में तय हुआ था। लड़की का नाम जानवी था। दोनों बचपन से एक-दूसरे को जानते थे। इसलिए आदित्य को लगा कि इससे अच्छा रिश्ता शायद ही कहीं मिलेगा।

     

    सगाई में जब पहली बार उसने जानवी की उंगली में अंगूठी पहनाई, तो उसकी आँखों में ढेर सारे सपने थे। लेकिन जानवी की आँखों में वह चमक नहीं थी। आदित्य ने सोचा, “शायद शर्माती होगी।”

     

    सगाई के बाद आदित्य रोज़ उसे मैसेज करता।

    “कैसी हो?”

    “ठीक हूँ।”

     

    बस इतना ही जवाब आता।

     

    आदित्य कई बार सोचता कि शायद जानवी नई ज़िंदगी की जिम्मेदारियों को लेकर घबराई हुई है। इसलिए उसने कभी उस पर सवालों की बारिश नहीं की। वह हर छोटे-छोटे मौके पर उसे खुश करने की कोशिश करता। कभी उसकी पसंद की किताब भेज देता, तो कभी बिना किसी वजह के फूल। लेकिन हर बार जानवी सिर्फ “थैंक यू” लिखकर बात खत्म कर देती। आदित्य रात-रात भर उनकी आने वाली ज़िंदगी के सपने देखता, जबकि जानवी उन्हीं रातों में अपने फैसले को लेकर बेचैन होकर रोती रहती। दोनों एक ही रिश्ते में बंधे थे, लेकिन उनके दिल दो बिल्कुल अलग रास्तों पर चल रहे थे। एक तरफ सच्चा प्यार था, तो दूसरी तरफ मजबूरी और छिपा हुआ सच।

     

    वह घंटों उसके रिप्लाई का इंतज़ार करता, लेकिन जानवी कभी खुद से बात शुरू नहीं करती थी। आदित्य फिर भी यही सोचकर खुश रहता कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।

     

     

     

    धीरे-धीरे उसने शादी के सपने बुनने शुरू कर दिए। उसने अपने कमरे की दीवार पर उनकी सगाई की तस्वीर लगा दी। मोबाइल के वॉलपेपर पर भी जानवी की मुस्कुराती तस्वीर थी। वह अपनी हर छोटी-बड़ी खुशी उसी से जोड़ चुका था।

     

    एक दिन आदित्य ने जानवी से कहा,

    “अगर तुम्हें कहीं घूमने का मन हो तो बताना, शादी से पहले परिवार के साथ चलेंगे।”

     

    जानवी ने सिर्फ इतना कहा,”देखते हैं।”

     

    उसका हर जवाब ऐसा ही होता। आदित्य को कभी-कभी अजीब लगता, लेकिन उसने कभी ज़बरदस्ती नहीं की।

     

    उधर जानवी एक ऐसे सच के साथ जी रही थी, जिसे बताने की हिम्मत उसमें नहीं थी।

     

    वह कॉलेज के दिनों से रोहन नाम के लड़के से प्यार करती थी। दोनों कई सालों से साथ थे। लेकिन जब घरवालों ने रिश्तेदारों में उसका रिश्ता तय किया, तो वह अपने परिवार के सामने कुछ बोल नहीं पाई। उसने सोचा, शायद वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा।

     

    लेकिन वक्त के साथ उसकी बेचैनी और बढ़ती गई।

    शादी की तारीख अब सिर्फ एक महीने दूर थी।

     

    एक शाम आदित्य बड़े प्यार से जानवी के लिए उसकी पसंद का सूट लेकर उसके घर पहुँचा। वह उसे सरप्राइज़ देना चाहता था।

     

    कमरे के बाहर पहुँचते ही उसे अंदर से किसी की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “जानवी… आखिर कब तक ये सब चलेगा?”

     

    आदित्य रुक गया।

     

    जानवी रोते हुए कह रही थी,

    “रोहन, मैं मजबूर हूँ। मैं घरवालों को मना नहीं कर पाई।”

     

    रोहन बोला,

    “लेकिन तुम किसी और से शादी कैसे कर सकती हो? तुमने तो मुझसे साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं।”

     

    ये सुनते ही आदित्य के हाथ से गिफ्ट का बैग नीचे गिर गया।

     

    अंदर दोनों चौंक गए।

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आदित्य की आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ बिल्कुल शांत थी।

     

    “एक बात पूछूँ, जानवी?”

     

    वह सिर झुकाकर खड़ी रही।”क्या तुम उससे प्यार करती हो?”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद जानवी ने धीरे से कहा,

    “…हाँ।”

     

    बस एक शब्द…

    और आदित्य के सारे सपने उसी पल टूट गए।

     

    उसने काँपती आवाज़ में पूछा,”तो फिर मुझसे सगाई क्यों की? एक बार सच बता देती… मैं खुद पीछे हट जाता।”

     

    जानवी फूट-फूटकर रोने लगी।

    “मैं डर गई थी… मुझे लगा घरवाले कभी नहीं मानेंगे।”

     

    आदित्य ने गहरी साँस ली।

     

    “घरवालों से डर गई… लेकिन मेरी ज़िंदगी के बारे में एक बार भी नहीं सोचा?”

     

    उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    आदित्य चुपचाप वहाँ से चला गया।

     

    उस रात उसने अपने कमरे की दीवार से सगाई की तस्वीर उतार दी। मोबाइल का वॉलपेपर बदल दिया। लेकिन यादें… उन्हें कहाँ हटाया जा सकता था।

     

    अगले दिन दोनों परिवार आमने-सामने बैठे।

     

    सबको सच्चाई पता चली।

     

    घर में गुस्सा, रोना और आरोपों का दौर शुरू हो गया।

     

    तभी आदित्य ने सबको रोकते हुए कहा,

     

    “किसी को दोष मत दीजिए। गलती सिर्फ इतनी हुई है कि सच समय पर नहीं बोला गया।”

     

    फिर उसने जानवी की ओर देखकर कहा,

     

    “अगर आज भी तुम्हारा दिल रोहन के लिए धड़कता है, तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं। रिश्ता भरोसे से चलता है, मजबूरी से नहीं।”

     

    इतना कहकर उसने अपनी सगाई की अंगूठी उतारी और मेज़ पर रख दी।

     

    उस पल कमरे में बैठे हर इंसान की आँखें नम थीं।

     

    कुछ दिनों बाद जानवी की शादी रोहन से हो गई।

     

    उधर आदित्य ने खुद को पूरी तरह काम में डुबो दिया। उसने किसी से शिकायत नहीं की, लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं रहा।

     

    जो लड़का हर समय हँसता था, अब मुस्कुराने से पहले भी सोचता था।

     

    महीनों बाद एक दिन उसकी मुलाकात अपने पुराने स्कूल के शिक्षक से हुई।

     

    उन्होंने पूछा,

    “कैसे हो बेटा?”

     

    आदित्य मुस्कुराया और बोला,

    “ठीक हूँ।”

     

    शिक्षक ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा,

     

    “बेटा, ज़िंदगी में हर इंसान तुम्हारी किस्मत नहीं होता। कुछ लोग सिर्फ तुम्हें मज़बूत बनाने आते हैं।”

     

    ये बात उसके दिल में उतर गई।

     

    उसने धीरे-धीरे खुद को सँभालना शुरू किया। परिवार के साथ समय बिताने लगा। अपने अधूरे सपनों को पूरा करने में लग गया।

     

    कई साल बाद एक शादी में उसकी मुलाकात फिर से जानवी से हुई।

     

    दोनों की नज़रें मिलीं।

     

    जानवी की आँखों में पछतावा था।

     

    वह धीरे से बोली,

    “मुझे माफ़ कर दोगे?”

     

    आदित्य हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “मैंने तुम्हें बहुत पहले माफ़ कर दिया था… क्योंकि नफ़रत लेकर जीने से ज़्यादा मुश्किल कुछ नहीं होता।”

     

    इतना कहकर वह आगे बढ़ गया।

     

    उस दिन जानवी की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उसे पहली बार समझ आया कि धोखा सिर्फ रिश्ता नहीं तोड़ता, किसी के भरोसे और मासूमियत को भी हमेशा के लिए बदल देता है।

     

    और आदित्य…

     

    उसने उस दर्द को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। क्योंकि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में साथ निभाने नहीं, बल्कि हमें ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाने आते हैं।

  • रहस्यमयी गांव

    पढ़ने का समय : 5 मिनट
    1.  गाँव जहाँ कभी किसी बच्चे का जन्म नहीं होता था

    राजस्थान की ऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था अंधेरपुर। देखने में यह गाँव बिल्कुल साधारण था। चारों तरफ हरियाली, मिट्टी के घर, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और खेतों में मेहनत करते लोग। लेकिन इस गाँव का एक ऐसा नियम था, जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह जाता था।

     

    उस गाँव की ज़मीन पर कभी किसी बच्चे का जन्म नहीं होता था।

     

    अगर किसी औरत को गर्भ ठहर जाता, तो जैसे ही सातवाँ या आठवाँ महीना शुरू होता, पूरे परिवार वाले उसे शहर ले जाते। वहीं अस्पताल में बच्चे का जन्म कराया जाता और कुछ दिनों बाद माँ और बच्चा वापस गाँव लौट आते।

     

    गाँव के बाहर वालों को यही बताया जाता कि गाँव में अस्पताल नहीं है, इसलिए ऐसा किया जाता है। लेकिन गाँव के लोग जानते थे कि इसके पीछे एक ऐसा राज़ छिपा है, जिसके बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता।

     

    इसी गाँव में नई-नई शादी होकर आई थी जानवी। वह पढ़ी-लिखी, समझदार और बहुत ही सरल स्वभाव की लड़की थी। शादी के कुछ महीनों बाद जब उसे पता चला कि वह माँ बनने वाली है, तो पूरा परिवार खुशी से झूम उठा। लेकिन उसी खुशी के साथ सबके चेहरों पर एक अजीब-सा डर भी उतर आया।

     

    एक रात जानवी ने अपनी सास से पूछा,

    “माँ जी… मैं कई दिनों से देख रही हूँ कि सब लोग किसी बात को लेकर परेशान हैं। आखिर बात क्या है?”

     

    सास ने गहरी साँस ली और बोली,

    “बेटी… समय आने पर तुम्हें शहर ले जाया जाएगा। बस इतना याद रखना कि इस गाँव में कोई बच्चा पैदा नहीं होता।”

     

    जानवी ने हैरानी से पूछा,”लेकिन क्यों?”

    सास ने उसकी तरफ देखा और बोली,

    “इस सवाल का जवाब हमारे पास भी नहीं है… बस यही परंपरा है।”

    अब जानवी की बेचैनी और बढ़ गई। उसे लगा कि ज़रूर कोई बहुत बड़ा राज़ छिपाया जा रहा है।

    एक दिन वह गाँव की सबसे बुज़ुर्ग महिला दादी कमला के पास पहुँची।

    “दादी, मुझे सच जानना है। आखिर ऐसा क्यों होता है?”

    दादी कमला ने चारों तरफ देखा, फिर धीमी आवाज़ में बोलीं,

    “अगर सच सुनना चाहती हो, तो आज रात पुराने बरगद के पेड़ के पास आ जाना।”

     

    रात गहरा चुकी थी। पूरा गाँव सो चुका था। जानवी धीरे-धीरे बरगद के पास पहुँची। वहाँ दादी पहले से उसका इंतज़ार कर रही थीं।

     

    दादी ने कहना शुरू किया,”आज से करीब सौ साल पहले इस गाँव में धरा नाम की एक दाई रहती थी। पूरे इलाके में उससे अच्छा प्रसव कोई नहीं कराता था।”

     

    “एक दिन गाँव के ज़मींदार की बहू को प्रसव पीड़ा हुई। धरा ने पूरी कोशिश की, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। माँ और बच्चा दोनों नहीं बच सके।”

     

    “ज़मींदार गुस्से से पागल हो गया। उसने अपनी गलती छिपाने के लिए पूरे गाँव के सामने धरा को दोषी ठहरा दिया।”

     

    “बिना कोई सबूत, बिना कोई सुनवाई… लोगों ने धरा को ज़िंदा जला दिया।”

     

    जानवी की आँखों से आँसू निकल आए।

    दादी की आवाज़ भर्रा गई।

    “मरते समय धरा ने बस इतना कहा था…”

    ‘जिस मिट्टी ने मेरे साथ अन्याय देखा है, अब इस मिट्टी पर किसी बच्चे की पहली साँस कभी नहीं गूँजेगी।’

     

    “उस दिन के बाद जो भी बच्चा इस गाँव में पैदा हुआ… वह कुछ ही मिनटों में मर गया।”

    “पहले किसी ने यकीन नहीं किया, लेकिन जब कई नवजात बच्चों की मौत हो गई, तब पूरे गाँव ने फैसला किया कि अब कोई भी बच्चा इस गाँव में पैदा नहीं होगा।”

    जानवी सारी रात सो नहीं पाई।

    समय बीतता गया। उसका नौवाँ महीना शुरू होने वाला था। परिवार वाले शहर जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि अचानक लगातार कई दिनों तक इतनी तेज़ बारिश हुई कि गाँव की सभी सड़कें टूट गईं।

    नदियाँ उफान पर थीं।

    शहर जाने का कोई रास्ता नहीं बचा था।पूरा गाँव डर से काँप उठा।

    लोग कहने लगे,

    “अगर इस बार बच्चा यहीं पैदा हुआ… तो फिर वही होगा जो हमेशा होता आया है।”

    इसी बीच जानवी को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।

    घर में अफरा-तफरी मच गई।

    कोई भगवान से प्रार्थना कर रहा था, कोई रो रहा था।

     

    दादी कमला ने जानवी का हाथ पकड़कर कहा,

    “डरना मत बेटी… जो होगा, देखा जाएगा।”

    कुछ घंटों बाद पूरे घर में एक मासूम बच्चे के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

     

    सभी लोग साँस रोककर खड़े थे।

    एक मिनट…

    दो मिनट…

    पाँच मिनट…

    दस मिनट…

    लेकिन बच्चा बिल्कुल स्वस्थ था।

    किसी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

    तभी अचानक ज़मीन ज़ोर से काँपी।

     

    पुराना बरगद बीच से टूटकर गिर पड़ा।

    उसकी जड़ों के नीचे से एक पुराना लोहे का संदूक दिखाई दिया।

    गाँव वालों ने उसे बाहर निकाला।

     

    उसके अंदर कुछ सोने के गहने और एक पुरानी डायरी रखी थी।डायरी ज़मींदार की थी।

     

    गाँव के मास्टर जी ने उसे पढ़ना शुरू किया।

    उसमें लिखा था “धरा निर्दोष थी। मेरी बहू की मौत मेरी लापरवाही से हुई थी। मैंने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए पूरे गाँव के सामने धरा को दोषी बना दिया। अगर कभी यह डायरी किसी को मिले… तो धरा से माफ़ी माँग लेना।”

     

    यह सुनते ही पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया।

     

    जिस औरत को सौ साल तक लोग दोषी मानते रहे…

    वह तो बिल्कुल बेगुनाह थी।

     

    हर किसी की आँखों से आँसू बहने लगे।

    अगले दिन पूरे गाँव ने उसी जगह धरा की याद में एक छोटी-सी समाधि बनाई।

     

    सबने हाथ जोड़कर उससे माफ़ी माँगी।

    उस रात गाँव के कई लोगों ने एक जैसा सपना देखा।

    सफेद कपड़ों में एक औरत मुस्कुराते हुए गाँव से दूर जा रही थी।

    जाते-जाते उसने कहा—

    “अब किसी माँ की गोद सूनी नहीं रहेगी।”

    कुछ महीनों बाद गाँव की दूसरी बहू भी गर्भवती हुई।

     

    इस बार किसी ने उसे शहर नहीं भेजा।

    सबके दिलों में डर तो था, लेकिन उम्मीद उससे कहीं ज़्यादा थी।

    समय आया…

    और पूरे गाँव की मौजूदगी में एक और बच्चे का जन्म हुआ।

    इस बार भी बच्चा बिल्कुल स्वस्थ था।

    उस दिन पूरे गाँव में ढोल बजे।

    हर घर में मिठाइयाँ बाँटी गईं।मंदिर में दीप जलाए गए।

    लोगों की आँखों में खुशी के आँसू थे।

     

    जिस गाँव में कभी बच्चों की किलकारी सुनना एक सपना था…

    आज वही गाँव मासूम हँसी से गूँज रहा था।

     

    तब से अंधेरपुर की पहचान डर से नहीं, बल्कि एक सीख से होने लगी

    किसी बेगुनाह के साथ किया गया अन्याय कभी खत्म नहीं होता, जब तक सच सामने आकर न्याय न दिला दे।

     

  • अधूरी इबादत भाग~9

    अधूरी इबादत भाग~9

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    भाग~9 खोई नहीं हूँ मैं

    कमरे में चुप्पी घुली थी, जैसे दीवारें भी उसके भीतर उठते-गिरते ज्वार की साक्षी बन गई हों। रूहानी की उंगलियां अब भी मोबाइल को थामे कांप रही थीं, जबकि स्क्रीन बहुत पहले ही बुझ चुकी थी। कॉल कटने की वो छोटी सी ‘बीप’ अब भी उसके कानों में गूंज रही थी, जैसे कोई अटकी हुई सांस, जो पूरी निकलने से पहले ही दबा दी गई हो।

    यश की रुआंसी आवाज, माँ-बाबा के कठोर शब्द, सब उसके भीतर किसी पुराने घाव की तरह फिर से रिसने लगे थे। पल भर को रूहानी का मन किया कि वो फिर से फोन मिलाए, यश से बात करे, उससे पूछे कि अब वह ठीक तो है ना। पर अगले ही पल उसे खुद को रोकना पड़ा। वह जानती थी, अच्छी तरह जानती थी कि चाहे माँ-बाबा उसे अपने जीवन से काट चुके हों, पर यश अब भी उनका दुलारा बेटा था। उस पर हाथ उठाने या उसकी अनदेखी करने का सवाल ही नहीं था। यश, वो बेटा जिसे उन्होंने बरसों की तपस्या के बाद पाया था, उसके लिए तो उनके दिलों में अब भी असीम प्रेम था।

    इसी सोच ने उसे थोड़ी राहत दी, पर उस राहत की परत के नीचे जो कसक थी, वह कम नहीं हुई।

    धीरे से उसने मोबाइल को सिरहाने रखा और अपने पैरों की ओर देखा। पैर के तलवे पर पट्टी बंधी थी, पर पट्टी के बीच से झांकता दर्द अब भी धड़क रहा था। रूहानी ने पल भर को अपनी पलकों को भींच लिया, जैसे अपनी ही नजरों से खुद को बचाना चाहती हो। फिर एक धीमी, कसैली हँसी उसके होठों से फिसल गई।

    “अकेली,” उसने खुद से बुदबुदाया, “एकदम अकेली।”

    उसने अपने घायल पैर को हलके से सीधा किया। चुभन अब भी थी, पर उससे भी ज्यादा चुभन उसके मन में थी। खुद पर गुस्सा, खुद से नाराजगी। क्यों? क्यों वो इस हालत में आई थी? क्यों उसे लगा था कि मर जाने से सब कुछ बदल जाएगा? क्यों उसने सोचा था कि दुनिया इतनी आसान है कि बस एक फैसला, एक कदम और सब कुछ वैसा हो जाएगा जैसा वह चाहती थी?

    कमरे की धुंधली रोशनी में उसे अपनी ही परछाईं दीवार पर लहराती दिखी। एक टूटी हुई परछाईं, जिसमें अब कोई ठोस आकृति नहीं बची थी।

    “अब पड़े रहो,” वह खुद से फुसफुसाई, “इस अजनबी घर में, उस अजनबी आदमी के साथ… जब तक ये घाव भर नहीं जाते, तब तक कहीं जा भी नहीं सकती।”

    उसके शब्दों में जितनी कड़वाहट थी, उतनी ही असहायता भी। अद्वैत के घर में शरण लेना उसकी मजबूरी थी, न कि उसकी मर्जी। वो जानती थी कि अद्वैत उससे कोई उम्मीद नहीं रखता, न ही उसे यहाँ देखकर कोई खुशी होती थी, पर उसकी चुप्पी… उसकी चुप्पी उसे कहीं भीतर से चुभ रही थी।

    रूहानी ने अपने घुटनों को सीने से लगाकर खुद को और छोटा कर लिया, जैसे अपनी ही बाहों में छिप जाना चाहती हो।

    उसकी आँखों के कोनों से आंसू बह निकले, चुपचाप, बिना किसी आवाज के। वह रोई नहीं, बस बहने दिया उन आंसुओं को, जैसे बहाव ही उसकी सजा हो। उसने खुद से कहा, “तुम्हीं ने चुना था ये रास्ता, तुम्हीं को सहना भी होगा।”

    उसके दिल का सन्नाटा कमरे के भीतर भी उतर आया। हर चीज़ थम गई थी — धड़कनें, साँसें, उम्मीदें।

    एक पल के लिए उसे माँ-बाबा की वो आँखें याद आई, जो कभी उसके लिए आशीर्वाद थी और अब सिर्फ नफरत से भरी थीं। कैसे एक पल में वे लोग, जो उसके जीवन का आधार थे, उसे अपने जीवन से मिटा चुके थे। सिर्फ इसलिए कि उसने अपने लिए जीने की जुर्रत की थी?

    अचानक उसकी स्मृतियों में वह क्षण कौंध उठा जब अद्वैत ने उसे मृत्यु के मुख से खींच लाया था, जैसे किसी सूखते प्राण में फिर से प्राणवायु भर दी हो। आज फिर वही हाथ, उसके दूसरे पाँव को क्रूर कांच के टुकड़े से बचा गया था… एक चुप, मगर सजीव पहरेदार की तरह। 

    तभी रूहानी के भीतर कोई गहरी, शांत आवाज उठी—”नहीं… मैं विलीन नहीं हुई हूँ, मैं अब भी हूँ… पूर्ण और धड़कती हुई।”

    उसकी मुट्ठियाँ भींच गईं, दर्द से, डर से, और कहीं न कहीं, जिद से भी। उस अजनबी कमरे में, उस अजनबी के घर में, वह अपने अस्तित्व की छोटी सी लौ को थामे हुए थी।

    धीरे-धीरे उसके भीतर एक अजीब सी शांति फैलने लगी। एक ऐसा सन्नाटा जो बाहर के शोर से अलग था। यह सन्नाटा अंदर से आ रहा था, जैसे उसकी आत्मा ने हार मानने से इनकार कर दिया हो।

    ——–

    अद्वैत की सुबह हमेशा की तरह खामोशी के आवरण में लिपटी थी। सूरज की किरणें धीरे-धीरे खिड़कियों के पर्दों के नीचे से कमरे में घुसने लगी थीं, लेकिन अद्वैत को उजाले से कोई खास वास्ता नहीं था। वह नीचे रसोई में चुपचाप दराज खींच रहा था, जैसे हर ध्वनि से बचना चाहता हो। चाय के कपों के आपस में टकराने की धीमी सी आवाज कमरे के सन्नाटे को हल्के से चीरती थी। वही धीमा सधा हुआ स्पर्श, वही अभ्यस्त मौन, लेकिन आज इस मौन में कुछ और भी घुला था — एक अनजानी, अनकही उपस्थिति।

    रूहानी, जो अद्वैत के सुझाये गए रसोई से सटे कमरे में थी, अधजगी सी हालत में लेटी थी। उसकी पलकों के बीच नींद और जागृति का झीना सा परदा था। रसोई से आती हल्की आहटें, कप-प्लेट के टकराने की आवाजें उसके कानों में रिसती रहीं। उसे एहसास हुआ कि अद्वैत रसोई है — उसी घर में, उसी सांसों की लय में, बस कुछ कमरों की दूरी पर। कोई संवाद नहीं, कोई आमना-सामना नहीं, फिर भी उसकी उपस्थिति पूरे घर में महसूस हो रही थी, जैसे दीवारों में उसकी थकी हुई आत्मा की गूँज भरी हो।

    रूहानी ने कराहते हुए करवट ली। उसके सूजे हुए चेहरे पर कल रात के आँसुओं की कहानी अब भी बाकी थी। बाल बेतरतीबी से बिखरे थे, आँखों के नीचे गहरे साए थे। दर्द और थकान की मिश्रित परछाइयाँ उसकी देह पर पसरी हुई थीं। उसके घाव अब भी रिसते थे — न सिर्फ तलवों पर लगे घाव, बल्कि दिल के भी। 

    उसी वक्त अद्वैत, गलती से या शायद किसी अनकही बेचैनी के वश में, उसके कमरे के सामने से गुजरा। अनायास उसकी नजर कमरे के भीतर चली गई और वहाँ रूहानी को यूँ टूटा-बिखरा देखकर वह कुछ पल के लिए जैसे वहीं थम गया।  

    उसकी आँखें अनजाने ही रूहानी के सूजे चेहरे, नम पलकों और बिखरे बालों पर टिक गईं। उस पल अद्वैत के भीतर कोई अनचाहा मंथन उठ खड़ा हुआ। वह जो अब तक खुद को दुनिया से काट चुका था, जिसने अपनी पीड़ा को ताले में बंद कर दिया था, आज एक अनजान लड़की के दुःख से क्यों जुड़ रहा था? क्यों उसकी पीड़ा उसे अपने लंबे, सूने अकेलेपन की याद दिला रही थी?

    अद्वैत का गला अचानक भारी लगने लगा। भीतर एक कसक उठी जो उसे असहज कर गई। उसके भीतर का एक हिस्सा उसे झिड़क रहा था — क्यों देख रहा है? क्यों महसूस कर रहा है? यह तेरी लड़ाई नहीं है। लेकिन एक और हिस्सा था, जो फुसफुसा रहा था — यह पीड़ा पहचानी हुई है। यह वही खालीपन है जिसे तूने भी जिया है।

    उसकी उंगलियाँ दरवाजे के फ्रेम पर कस गईं। वह एक क्षण को भीतर जाने का सोचता है, फिर खुद को रोक लेता है। खुद पर गुस्सा आता है — इस बेबसी पर, इस अनचाही करुणा पर। 

    वह जानता था कि रूहानी एक अजनबी है, बस संयोग से उसके जीवन में आ गई है। और फिर भी, उसका टूटा हुआ चेहरा देखकर अद्वैत के भीतर बीते दिनों की एक रेखा खिंच गई थी। उसे अपनी पत्नी की आखिरी रात याद आ गई — जब उसने भी ठीक ऐसे ही बिस्तर पर बेजान पड़ी, थकी हारी आँखों से उसे देखा था। 

    एक टीस ने अद्वैत के सीने को चीर दिया। वह जानता था कि यह तुलना गलत थी। रूहानी उसकी पत्नी नहीं थी। यह अतीत को वर्तमान पर थोपना था। लेकिन भावनाएँ तर्क की राह कब चलती हैं?

    उसने धीरे से आँखें मूँद लीं, जैसे खुद को इस क्षण से अलग करना चाहता हो। फिर कदम पीछे खींच लिए, बमुश्किल खुद को कमरे से दूर किया।  

    लौटते हुए उसके कदम भारी थे, जैसे हर कदम उसके भीतर उठती हूक को और गहरा कर रहा हो। रसोई में लौटकर उसने दो कपों में चाय डाली। चाय के धुएं में उसकी आँखें फिर से उस सूजे चेहरे की परछाई खोजने लगीं। 

    अद्वैत चुपचाप कुर्सी पर बैठा रहा। चाय का कप हाथ में थामे, लेकिन पीने की कोई जल्दी नहीं। उसकी नजरें खिड़की के पार जाने कहाँ भटक रही थीं। 

    उधर, रूहानी धीरे से उठ बैठी थी। पैर का दर्द हल्का चुभ रहा था, लेकिन दिल का दर्द कहीं गहरा था। नीचे से आती हल्की-हल्की आहटें अब उसे चुभती नहीं थीं, बल्कि एक अजीब सा सुकून दे रही थीं। जैसे यह जान लेना कि कोई और भी घर में है, खुद में एक दवा बन गया हो। 

    वह जानती थी, अद्वैत से उसे कोई सहारा नहीं माँगना चाहिए। न कोई आस लगानी चाहिए। फिर भी, उसकी उपस्थिति — यह जानना कि वह अकेली नहीं है — एक नर्म, चुप सांत्वना की तरह उसके दिल के किसी कोने में फैलने लगी थी।  

    उसने खुद को सँभाला, गहरी साँस ली और अपने पैरों को बिस्तर से नीचे सरकाया। दर्द की एक लहर उसके तलवों से होते हुए पूरे जिस्म में दौड़ गई। वह जानती थी कि उसे अभी लंबा सफर तय करना है — न केवल शारीरिक घावों से उबरने का, बल्कि उस दिल के घावों से भी जिन्हें वह जाने कब से अपने भीतर छुपाती आई थी।

    और अद्वैत अपने ही विचारों के घेरे में फँसा चाय के कप से उठते धुएँ को ताक रहा था — जैसे उसमें से अपने सवालों के जवाब तलाश रहा हो, जिन्हें उसने खुद से पूछने की भी हिम्मत अब तक नहीं जुटाई थी। 

    दोनों चुप थे। दोनों अकेले थे। फिर भी एक महीन, अदृश्य धागे से एक-दूसरे से बंधने लगे थे — बिना बोले, बिना कहे।

    ——

    क्या अद्वैत अपनी बंद दुनिया के दरवाजे रूहानी के लिए खोलेगा? 

    या फिर दोनों अपनी-अपनी तन्हाइयों में डूबे रह जाएंगे? 

    क्या दर्द के पुराने साये उन्हें जोड़ेंगे या फिर और दूर कर देंगे?

  • अधूरी इबादत भाग~8

    अधूरी इबादत भाग~8

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~8 नाम तक मिटा दिया

    अद्वैत उस बंद दरवाज़े के सामने खड़ा था, जो बरसों से अपने पीछे ना जाने कितनी कहानियाँ छुपाए खड़ा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा तनाव था, जैसे वह खुद को इस पल के लिए भीतर से तैयार कर रहा हो। उसकी उंगलियाँ चाबी पर कस गई थीं। पल भर को उसने अपनी सांस रोक ली, फिर धीरे से चाबी घुमाई।

    चटक की एक धीमी आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला। जैसे ही अद्वैत ने दरवाज़े को धकेला, एक हल्की सी धूल भरी खुशबू उसके चेहरे से टकराई। वह भीतर कदम रखा और एक पल को उसकी आँखों के आगे उसकी पूरी ज़िंदगी जैसे उलटने लगी।

    यह कमरा कभी उसके सबसे करीब था। उसकी आत्मा का एक कोना।

    दीवार के साथ सजी किताबों की लंबी-लंबी कतारें थीं, जैसे समय को पकड़ कर रखने की एक नाकाम कोशिश हो। मोटी जिल्द वाली, पुरानी, धुंधली किताबें, जिनके कवर अब फीके पड़ चुके थे। किताबों के बीच-बीच में कुछ डायरी भी थीं, जिनके किनारे झड़ने लगे थे।  

    कमरे में जो भी था, उसे एक पाठक सह लेखक के घर का कमरा होना बता रहा था। 

    कमरे के एक कोने में खिड़की के पास एक स्टडी टेबल था। उस पर फैले हुए कागज, आधी लिखी चिट्ठियाँ और खाली पड़े पन्ने। कुछ चिट्ठियाँ ऐसी थीं, जिनके किनारे मुड़े हुए थे, शायद गीले हो जाने के कारण। जैसे कोई आँसू उनमें चुपके से समा गया हो।

    अद्वैत धीमे कदमों से भीतर चला आया। उसकी चाल में नरमी थी, जैसे वो इस कमरे की नींद को तोड़ना न चाहता हो। उसने एक गहरी सांस ली, जिसमें धूल और बीते हुए समय की महक घुल गई थी।

    यह सिर्फ वही जानता था कि क्यों उसने इस कमरे को बंद रखा था?

    क्यों मीना को साफ़ करने से मना किया था?

    क्योंकि यह कमरा उसकी आत्मा का सबसे कोमल हिस्सा था, जिसे वह दुनिया की नजरों से छुपाकर रखना चाहता था।

    फिर अद्वैत ने दरवाजे के पीछे से डस्टर और वाइपर निकाले। उसकी चाल में एक सधी हुई थकावट थी, जैसे वो हर कदम के साथ अपने भीतर किसी भारी बोझ को उठाने का साहस जुटा रहा हो।

    उसने डस्टर को कस कर पकड़ा और सबसे पहले दीवार से सटी किताबों की अलमारी की ओर बढ़ा। एक-एक करके किताबों के ऊपर जमी धूल हटाते हुए, उसकी उंगलियाँ किताबों की रीढ़ पर रेंगती चली गईं। जैसे हर किताब, हर कवर, हर स्पाइन पर उसके किसी बीते पल की परछाई बैठी हो।

    कुछ किताबों को छूते ही उसके चेहरे पर बिछी एक उदास मुस्कान हल्की सी तैर जाती। कोई पुराना शेर, कोई भूली-बिसरी कविता, कोई प्रेम कहानी… सब जैसे उसे पुकार रही थीं।

    कमरा धीरे-धीरे सांस लेने लगा। किताबें चमकने लगीं, अलमारियाँ मुस्कुराने लगीं।

    फिर वह स्टडी टेबल के पास की खिड़की तक चला गया। खिड़की से बाहर झांकते हुए उसने एक थकी हुई मुस्कान के साथ आसमान को देखा। बादल गहरे हो चले थे, जैसे कोई भी पल में बारिश फूट पड़ेगी।

    फिर भी वहां एक अलग सी संजीदगी थी, एक अलग सी तपिश। उसने डस्टर को और भी मुलायम हाथों से पकड़ा, जैसे किसी अपने के माथे से धूल हटाता हो। टेबल के हर कोने को उसने साफ किया, छोटे-छोटे खरोंचों को अपनी हथेली से सहलाया, मानो उन निशानों में दबी कहानियों को फिर से जीना चाहता हो।

    टेबल के किनारे रखे चिट्ठियों के बंडल पर नजर पड़ी तो उसने एक पल के लिए आँखें मूँद लीं। सांसें जैसे थोड़ी देर को थम गईं। फिर बहुत धीरे से, जैसे कोई प्राचीन ग्रंथ खोल रहा हो, उसने उन चिट्ठियों को अपने सामने रखा।

    कमरा अब पूरी तरह से साफ था। एक कोमल, शांत, मगर भारी हवा वहाँ बह रही थी।

    अद्वैत कुर्सी पर बैठ गया। उसकी उंगलियाँ एक चिट्ठी पर फिसलीं, फिर उसने पहली चिट्ठी उठाई। चिट्ठी के शब्द पढ़ते ही, उसकी आँखों के किनारे भीगने लगे। उसने चिट्ठी को अपने सीने से लगा लिया।

    पलकों के नीचे से कुछ गर्म बूँदें बह निकलीं। उसने आँखें बंद कर लीं और उन लम्हों में लौट गया जब वह दुनिया की भीड़ में सबसे अकेला नहीं था, जब उसका दिल किसी और के दिल की धड़कनों के साथ धड़कता था।

    एक-एक कर वह सारी चिट्ठियाँ पढ़ता गया। कहीं हँस पड़ता, कहीं साँसें भारी हो उठतीं। कभी उंगलियों से अक्षरों को छूता, मानो उन्हें आत्मा में समेट लेना चाहता हो।

    समय थम-सा गया था। हर चिट्ठी बीते कल की धुंध में उसे डुबोती चली जाती।

    आखिरी चिट्ठी हाथ में थी। उसने धीरे से उसे खोला, जैसे शब्दों के साथ कोई सपना टूट सकता हो। उसे भी पढ़कर उसने चिट्ठी को बहुत प्यार से मोड़ा और पूरे बंडल को फिर से एक किनारे रख दिया।

    इसके बाद उसने पास रखे नये कोरे कागजों के बंडल में से एक चिट्ठी निकाली। जिसमे कागज की खुशबू नई थी, लेकिन अद्वैत के भीतर सब कुछ पुराना था।

    उसने कलम उठाई। एक गहरी सांस ली और लिखता चला गया। 

    जब चिट्ठी पूरी हुई, उसने उसे बाकियों के बंडल में रख दिया। बहुत सहेज कर, जैसे कोई अनमोल चीज़ हो।

    फिर उसकी नजर टेबल के बीचोंबीच रखे छोटे से फ्रेम पर पड़ी। उसने तस्वीर को उठाया।

    वह तस्वीर जिसमें वह और उसकी पत्नी एक-दूसरे को देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। इतनी सच्ची, इतनी गहरी मुस्कान कि आज भी उसमें जीवन की गर्माहट बाकी थी।

    उसने अपनी उंगलियाँ बहुत प्यार से उसके चेहरे पर फेरीं। जैसे वह उसके गालों को छू रहा हो, जैसे उसकी हँसी को महसूस कर रहा हो।

    फिर तस्वीर को वापस उसी जगह रख दिया और अपनी ठुड्डी टेबल पर टिकाकर वह तस्वीर को एकटक देखता रहा।

    उसके भीतर कुछ भी बोल नहीं रहा था। सब कुछ बस महसूस हो रहा था।

    कमरे में केवल दीवारों की साँसे थीं, धूल की हल्की खुशबू थी और अद्वैत के दिल की नमी थी।

    बाहर बारिश थम चुकी थी। बादलों के बीच कहीं एक हल्की सी धूप झाँक रही थी।

    अद्वैत ने तस्वीर को देखते हुए बुदबुदाया – “तुम अब भी यहीं हो… हमेशा।”

    उसके शब्द हवा में घुल गए, दीवारों में समा गए और शायद उसके दिल की गहराइयों में कहीं बैठ गए।

    —–

    उधर कमरे में रूहानी फोन के उस पार अपनी घुटती आवाज़ में सवाल कर रही थी, “यश! मां-बाबा अभी भी गुस्से में हैं?” उसकी आवाज़ में वह कम्पन था जो टूटे हुए सपनों और बिखरे हुए रिश्तों से उठता है, जैसे पतझड़ की रात में बर्फीली हवा किसी वीरान पेड़ की शाखों को कंपा देती है।

    यश — यशवर्धन चौहान — जो रूहानी से उम्र में करीब 9-10 साल छोटा था, उस पल खुद भी टूटा हुआ सा महसूस कर रहा था। उसके गले में भरा हुआ दर्द जैसे हर शब्द को कांपता बना देता। रुआंसी आवाज़ में वह बोला, “दीदी… मां-बाबा तो तुम्हारा नाम तक नहीं ले रहे हैं। अगर मैं तुम्हारा जिक्र भी कर दूं… तो मुझे भी डांट कर कहते हैं कि इस घर में अब आपका नाम कोई नहीं लेगा।”

    यश की आवाज जैसे फिसलती चली गई और अगले ही पल वह फोन पर फूट-फूट कर रोने लगा। उसका रोना नंगे पांव किसी वीराने में भटकते बच्चे का विलाप था, जो हर सुनने वाले के दिल को चीर सकता था। वह घुटती सांसों के बीच बिखरे लफ्जों में कहने लगा, “माँ-बाबा ने तो यहाँ तक कह दिया है… कि अब आप हमारे लिए म… म… मर चुकी हो।”

    यह सुनते ही रूहानी के भीतर कुछ चटक कर टूट गया। उसकी आँखों से आँसू ऐसे बहने लगे जैसे किसी सूखी नदी को अचानक बाढ़ ने छू लिया हो। वह चाहकर भी खुद को रोक नहीं सकी। लेकिन भाई उसकी रोती हुई आवाज़ न सुन ले, इसलिए उसने अपने होठों को दांतों के बीच जकड़ लिया, इतना ज़ोर से कि शायद खून भी छलक आया हो… पर दर्द का एहसास उस पल उसके दिल के टूटने के आगे बौना था।

    फोन के उस पार यश की आवाज़ फिर आई, हिचकियों के बीच काँपती हुई, मासूम और बेबस, “दीदी, तुम मेरे लिए कभी नहीं मर सकती… माँ-बाबा ने कितनी आसानी से कह दिया… दीदी, माँ-बाबा ऐसा कैसे कर सकते हैं?”

    उसके शब्द रूहानी के दिल में गहरी दरारें डालते जा रहे थे, जैसे बर्फ़ की एक शांत झील अचानक भीतर से टूटने लगे। वह कुछ कहना चाहती थी, कुछ ऐसा जो यश के भी टूटे हुए दिल को सहला दे, उसे यह यकीन दिला दे कि प्यार कभी नहीं मरता, कि रूह कभी अलग नहीं होती। लेकिन उसकी जुबान जैसे पत्थर बन गई थी, शब्द गले में अटक कर रह गए।

    तभी यश के तरफ से रूहानी को फोन पर अचानक एक सख्त, तीखी आवाज़ आई, “यश! किससे बात कर रहे हो?”

    उस आवाज़ ने जैसे दोनों के होश उड़ा दिए। यश एकदम सहम गया, उसकी साँसें रुक-रुक कर चलने लगीं और रूहानी का तो गला ही सूख गया, जैसे किसी ने उसके भीतर के सारे पानी को सोख लिया हो।

    —————

    क्या अद्वैत उस कमरे में दबी किसी भूली हुई सच्चाई से फिर टकराने वाला था?

    क्या रूहानी के अतीत की कोई दरार अब वर्तमान को भी निगलने वाली थी?

    वो तीखी आवाज़… क्या एक नया तूफान दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था?