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  • श्रापित तितली

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    श्रापित तितली

     

    बहुत समय पहले, पहाड़ों के बीच एक जादुई जंगल था। उस जंगल में रंग-बिरंगी परियां रहती थीं। उन्हीं में एक नन्ही और चंचल परी थी, जिसका नाम तारा था। तारा का दिल बहुत साफ था, लेकिन वह बहुत शरारती भी थी। उसे हर नई चीज़ जानने की उत्सुकता रहती थी।

     

    परियों के गुरु, गुरु वायुनाथ, पूरे जंगल के सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली गुरु थे। उन्होंने सभी परियों को एक नियम दिया था।

     

    “कभी भी उत्तर दिशा की पहाड़ी पर लगे सुनहरे फूल को मत छूना। वह फूल जादुई है और उसके पीछे बहुत बड़ा रहस्य छिपा है।”

     

    सभी परियां गुरु की बात मानती थीं, लेकिन तारा के मन में बार-बार यही सवाल उठता, “आख़िर उस फूल में ऐसा क्या है जिसे देखने तक की मनाही है?”

     

    एक सुबह, जब सारी परियां अपने काम में लगी थीं, तारा चुपके से उड़ती हुई उत्तर दिशा की पहाड़ी पर पहुंच गई। वहां सचमुच एक सुनहरा फूल चमक रहा था। उसकी खुशबू इतनी मीठी थी कि तारा खुद को रोक नहीं सकी।

     

    जैसे ही उसने फूल को हाथ लगाया, पूरे जंगल में तेज़ रोशनी फैल गई। आसमान काला पड़ गया और बिजली चमकने लगी। पेड़ तेज़ हवा में झूमने लगे और पूरा जंगल जैसे कांप उठा।

     

    अगले ही पल गुरु वायुनाथ वहां प्रकट हुए। उनकी आंखों में गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “तारा! मैंने तुम्हें चेतावनी दी थी। फिर भी तुमने मेरी आज्ञा तोड़ दी।”

     

    तारा डर गई। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “गुरुदेव… मुझसे गलती हो गई। मुझे माफ़ कर दीजिए।”

     

    गुरु बोले, “हर गलती की एक कीमत होती है। यदि आज तुम्हें बिना दंड के छोड़ दूं, तो बाकी परियां भी नियमों का सम्मान करना छोड़ देंगी।”

     

    उन्होंने अपना जादुई दंड उठाया और बोले,

     

    “आज से तुम्हारे पंख छिन जाएंगे। तुम एक नन्ही तितली बनकर धरती पर जीवन बिताओगी। जब तक तुम किसी ऐसे इंसान के दिल में बिना जादू के सच्ची दया और प्रेम नहीं जगा दोगी, तब तक यह श्राप नहीं टूटेगा।”

     

    इतना कहते ही तारा के चमकीले परी वाले पंख गायब हो गए। उसका शरीर छोटा होने लगा और कुछ ही पलों में वह एक सुंदर, रंग-बिरंगी तितली बन गई।

     

    तारा जोर-जोर से रोने लगी।

     

    “गुरुदेव… मैं फिर से परी बनना चाहती हूं।”

     

    लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

     

    तितली बनी तारा जंगलों, खेतों और बागों में उड़ती रहती। लोग उसकी सुंदरता की तारीफ करते, लेकिन कोई उसके दिल का दर्द नहीं समझता था।

     

    तितली बनने के बाद उसने पहली बार दुनिया को बहुत करीब से देखा। पहले वह एक परी थी, इसलिए उसे कभी भूख, डर या अकेलेपन का एहसास नहीं हुआ था। लेकिन अब हर दिन उसके लिए एक नई परीक्षा लेकर आता था। कभी तेज़ बारिश उसके नाज़ुक पंखों को भिगो देती, तो कभी आंधी उसे बहुत दूर जंगलों तक उड़ा ले जाती। कई बार पक्षी उसे अपना शिकार बनाने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़ते। वह किसी पत्ते या फूल के पीछे छिपकर अपनी जान बचाती।

     

    धीरे-धीरे तारा को समझ आने लगा कि छोटा होना कमजोरी नहीं, बल्कि धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षा है। उसने देखा कि छोटी-सी चींटी अपने से कई गुना बड़ा दाना उठाकर चलती है, मधुमक्खियां बिना थके शहद इकट्ठा करती हैं और छोटे-छोटे जीव भी कभी हार नहीं मानते। यह सब देखकर उसका स्वभाव बदलने लगा। अब वह पहले जैसी जिद्दी नहीं रही थी। उसने मन ही मन प्रण किया कि अगर उसे दोबारा कभी परी बनने का मौका मिला तो वह गुरु की हर बात का सम्मान करेगी।

     

    दिन बीतते गए… महीने गुजर गए… फिर साल भी बीत गए।

     

    एक दिन वह एक छोटे से गांव में पहुंची। वहां उसे आठ साल का एक लड़का मिला, जिसका नाम मोहन था।

     

    मोहन बहुत गरीब था। उसके पास खिलौने नहीं थे, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था।

     

    एक दिन कुछ बच्चे खेलते-खेलते तितली को पकड़ने लगे। कोई उसके पंख तोड़ना चाहता था, तो कोई उसे डिब्बे में बंद करना चाहता था।

     

    तारा डरकर इधर-उधर उड़ने लगी।

     

    तभी मोहन दौड़ता हुआ आया।

     

    उसने बच्चों से कहा,

     

    “उसे मत पकड़ो। अगर कोई तुम्हें पकड़कर बंद कर दे तो कैसा लगेगा?”

     

    बच्चे हंसने लगे।

     

    “अरे, ये तो सिर्फ एक तितली है।”

     

    मोहन बोला,

     

    “इसके भी प्राण हैं। इसे भी दर्द होता होगा।”

     

    उसने अपने दोनों हाथों से तितली को बचाया और धीरे से खुले आसमान की ओर उड़ा दिया।

     

    तारा पहली बार किसी इंसान की आंखों में इतनी सच्ची दया देख रही थी।

     

    उसकी आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े।

     

    लेकिन श्राप अभी भी नहीं टूटा।

     

    वह सोचने लगी, “शायद अभी मेरी परीक्षा पूरी नहीं हुई।”

     

    कुछ दिनों बाद गांव में भीषण सूखा पड़ गया। खेत सूख गए। कुएं खाली होने लगे। लोग परेशान हो गए।

     

    मोहन रोज़ अपने पीने के पानी में से थोड़ा-सा पानी बचाकर गांव के बाहर लगे छोटे-छोटे पौधों को सींचता था।

     

    लोग उसका मजाक उड़ाते।

     

    “जब इंसानों के लिए पानी नहीं है, तब पेड़ों को क्यों बचा रहा है?”

     

    मोहन मुस्कुराकर कहता,

     

    “अगर पेड़ नहीं बचेंगे, तो हम भी नहीं बचेंगे।”

     

    तारा रोज़ यह सब देखती और मन ही मन मोहन की अच्छाई पर गर्व महसूस करती।

     

    एक शाम मोहन ने देखा कि एक घायल चिड़िया ज़मीन पर पड़ी है। उसने उसे घर ले जाकर दाना-पानी दिया। कई दिनों तक उसकी सेवा की। जब चिड़िया पूरी तरह ठीक हो गई तो उसने उसे खुले आसमान में उड़ा दिया।

     

    उसी रात गांव में तेज़ बारिश हुई। सूखे खेतों में फिर से हरियाली लौटने लगी। लोग खुशियां मनाने लगे। मोहन ने आसमान की ओर देखकर भगवान का धन्यवाद किया।

     

    उसी समय तारा के चारों ओर सुनहरी रोशनी फैलने लगी।

     

    आसमान से गुरु वायुनाथ प्रकट हुए।

     

    उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तारा, तुम्हारा श्राप समाप्त हो गया।”

     

    तारा हैरानी से बोली,

     

    “लेकिन गुरुदेव, मैंने तो कोई जादू नहीं किया।”

     

    गुरु मुस्कुराए।

     

    “यही तुम्हारी सबसे बड़ी परीक्षा थी। तुमने किसी के मन को जादू से नहीं बदला। तुमने धैर्य रखा, जीवन की कठिनाइयों को सहा और सच्ची करुणा को अपने सामने खिलते हुए देखा। तुम्हारे बदलते स्वभाव और मोहन की निस्वार्थ दया ने इस श्राप को तोड़ दिया।”

     

    अगले ही पल तितली फिर से एक सुंदर परी बन गई। उसके पंख पहले से भी अधिक चमक रहे थे।

     

    तारा की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। उसने गुरु के चरण छू लिए।

     

    “गुरुदेव, आज मुझे समझ आया कि शक्ति से बड़ा अनुशासन होता है, और जादू से बड़ी दया।”

     

    गुरु ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ रखा और बोले,

     

    “जो अपनी गलती से सीख लेता है, वही सच्चा शिष्य कहलाता है।”

     

    उस दिन के बाद तारा फिर कभी अहंकार या जिद में नहीं आई। वह नई परियों को अपनी कहानी सुनाती और कहती,

     

    “जिज्ञासा अच्छी बात है, लेकिन गुरु की आज्ञा और अनुशासन उससे भी अधिक जरूरी है। दया, प्रेम और धैर्य में इतनी शक्ति होती है कि वे सबसे कठिन श्राप को भी समाप्त कर सकते हैं।”

     

    कहा जाता है कि आज भी जब किसी बगीचे में कोई रंग-बिरंगी तितली बच्चों के आसपास बिना डरे उड़ती है, तो लोग मुस्कुराकर कहते हैं”शायद यह वही श्रापित तितली है, जो अब हर किसी को प्रेम, दया और आज्ञा का सम्मान करना सिखाने आती है।”

  • मायावी

    मायावी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मायावी का भेष 

     

    शहर में पिछले कई महीनों से एक अजीब घटना लगातार हो रही थी। शहर के बड़े-बड़े अमीर परिवार अचानक अपनी मेहनत की कमाई और जमा-पूंजी खो रहे थे। किसी के बैंक खाते से करोड़ों रुपये गायब हो जाते, तो किसी की तिजोरी रातों-रात खाली मिलती। सबसे हैरानी की बात यह थी कि न कहीं चोरी के निशान मिलते थे और न ही किसी को यह याद रहता था कि आखिर उनके साथ हुआ क्या था।

     

    पुलिस ने हर तरफ जांच शुरू कर दी, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ एक सवाल मिलता—”यह सब करता कौन है?”

     

    एक दिन शहर के मशहूर उद्योगपति राघव मल्होत्रा अपने बेटे साहिल के सामने बैठे थे। उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    “साहिल, तुम्हारे खाते से पच्चीस लाख रुपये निकल गए। बैंक कह रहा है कि सारे लेन-देन तुम्हारी मंजूरी से हुए हैं। आखिर यह कैसे हुआ?”

     

    साहिल ने सिर पकड़ लिया।

     

    “पापा, मुझे तो कुछ भी याद नहीं। मैं ऑफिस से निकला था, रास्ते में एक कैफे पर रुका था… उसके बाद जैसे सब धुंधला हो गया।”

     

    यह सुनकर पूरा परिवार सन्न रह गया।

     

    ऐसी ही घटनाएं शहर के कई और अमीर परिवारों के साथ भी हो चुकी थीं। किसी के बेटे के साथ, किसी की बेटी के साथ, तो किसी के बिजनेस पार्टनर के साथ। हर कोई एक ही बात कहता—”हमें कुछ याद नहीं।”

     

    असल में इन सबके पीछे एक मायावी था।

     

    वह कोई साधारण इंसान नहीं था। उसके पास ऐसा मायाजाल था कि वह पलभर में अपना रूप बदल सकता था। कभी वह ड्राइवर बन जाता, कभी सिक्योरिटी गार्ड, कभी ऑफिस का कर्मचारी, कभी डॉक्टर और कभी किसी होटल का वेटर। उसका असली चेहरा किसी ने कभी नहीं देखा था।

     

    लेकिन वह जल्दबाजी नहीं करता था। पहले कई दिनों तक अपने शिकार पर नज़र रखता। वह देखता कि अमीर परिवार का बेटा या बेटी किस समय घर से निकलते हैं, कहाँ काम करते हैं, किस रास्ते से आते-जाते हैं और कहाँ रुकते हैं।

     

    जब उसे पूरा यकीन हो जाता कि अब मौका सही है, तब वह उसी जगह किसी नए भेष में पहुंच जाता।

     

    जिस दिन साहिल कैफे में कॉफी पीने रुका, उस दिन मायावी उसी कैफे का नया कर्मचारी बन चुका था।

     

    वह मुस्कुराते हुए साहिल के पास आया।

     

    “सर, आपकी कॉफी।”

     

    साहिल ने जैसे ही उसकी तरफ देखा, मायावी की आंखों में एक अजीब चमक दिखाई दी। वह धीमी आवाज़ में कुछ रहस्यमयी शब्द बोलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में साहिल की आंखें बोझिल हो गईं। वह जैसे किसी गहरे नशे में चला गया।

    “मोबाइल का पासवर्ड बताओ।”

    साहिल ने बिना सोचे बता दिया।

    “बैंक का ओटीपी?”

    वह भी बता दिया।

    कुछ ही मिनटों में लाखों रुपये अलग-अलग खातों में पहुंच चुके थे। मायावी ने साहिल का मोबाइल वापस उसकी जेब में रखा और बाहर निकल गया।

     

    कैफे से बाहर आते ही उसका चेहरा बदलने लगा। अब वह एक बूढ़ा आदमी बन चुका था। सड़क पर चलते लोग उसे देखकर आगे निकल गए। किसी को जरा भी शक नहीं हुआ।

     

    उधर साहिल कुछ देर बाद सामान्य हुआ, लेकिन उसे सिर्फ इतना याद था कि उसने कॉफी पी थी। बाकी सब कुछ उसकी याददाश्त से गायब था।

     

    जब पुलिस ने कैफे के सीसीटीवी कैमरे देखे, तो उसमें सिर्फ एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। लेकिन बाहर लगे दूसरे कैमरे में वही आदमी अचानक गायब हो गया था।

     

    पुलिस जितनी जांच करती, मामला उतना ही उलझता जा रहा था।

     

    उसी समय शहर में एक नए पुलिस अधिकारी की नियुक्ति हुई। उनका नाम था अजय राणा।

     

    उन्होंने सभी फाइलें पढ़ीं और धीरे से कहा,

     

    “यह कोई साधारण चोर नहीं… बल्कि बहुत चालाक खिलाड़ी है। लेकिन हर खिलाड़ी एक न एक गलती जरूर करता है।”

     

    अजय ने उसी पल फैसला कर लिया कि अब इस रहस्यमयी मायावी का खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चलने देगा।

     

    अजय राणा ने पिछले छह महीनों की सभी घटनाओं का बारीकी से अध्ययन किया। उसने हर पीड़ित से अलग-अलग बात की। सभी की यादें धुंधली थीं, लेकिन एक बात हर कहानी में समान थी हर वारदात से पहले किसी अनजान व्यक्ति से उनकी मुलाकात हुई थी।

     

    अजय ने समझ लिया कि अपराधी लोगों का भरोसा जीतकर उन्हें अपने जाल में फँसाता है।

     

    उसे पकड़ने के लिए उसने एक योजना बनाई।

     

    अगले ही दिन पूरे शहर में खबर फैला दी गई कि एक बड़े उद्योगपति का बेटा विदेश से लौट रहा है। उसके पास करोड़ों रुपये की दुर्लभ हीरे-जवाहरात और नकदी है। यह खबर जानबूझकर फैलाई गई थी ताकि मायावी लालच में आ जाए।

     

    लेकिन सच यह था कि वह युवक कोई उद्योगपति का बेटा नहीं, बल्कि पुलिस का एक जवान था। उसके आसपास सादे कपड़ों में पुलिस के कई अधिकारी हर समय मौजूद थे।

     

    तीन दिन तक कुछ नहीं हुआ।

    चौथे दिन वह जवान रोज़ की तरह एक होटल में खाना खाने पहुँचा। तभी एक नया वेटर उसके पास आया।

     

    अजय, जो दूर बैठा सब देख रहा था, अचानक चौकन्ना हो गया।

    वेटर की चाल बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी सीसीटीवी फुटेज में अलग-अलग लोगों की दिखाई देती थी।

     

    वेटर मुस्कुराया और बोला, “सर, आपका ऑर्डर।”

    जैसे ही उसने जवान की आँखों में देखा, उसकी आँखों से वही रहस्यमयी चमक निकली।

     

    लेकिन इस बार जवान पहले से तैयार था। उसने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं और मेज के नीचे लगा अलार्म दबा दिया।

     

    कुछ ही सेकंड में चारों तरफ से पुलिस ने होटल को घेर लिया।

    मायावी मुस्कुराया।

    “तुम लोग मुझे पकड़ नहीं सकते।”

    इतना कहकर उसने अपना चेहरा बदलना शुरू कर दिया। देखते ही देखते वह वेटर से बूढ़ा बन गया, फिर बूढ़े से साधु और अगले ही पल एक महिला का रूप धारण कर लिया।

    पुलिस के कई जवान पलभर के लिए भ्रमित हो गए।

     

    लेकिन अजय पहले से तैयार था।

    उसने होटल के चारों ओर विशेष दर्पण लगवाए थे। उन दर्पणों में मायावी का असली रूप साफ दिखाई दे रहा था। पहली बार सबने देखा कि उसका चेहरा न बूढ़े जैसा था, न जवान जैसा और न ही किसी साधु जैसा। उसका असली चेहरा डरावना और रहस्यमयी था।

     

    अजय ने बिना देर किए उस पर जाल फेंका। जाल पर विशेष मंत्र लिखे हुए थे, जिनकी वजह से मायावी अपना रूप बदल नहीं सका।

     

    वह गुस्से से चिल्लाने लगा।

    “मुझे कोई नहीं रोक सकता।”

     

    लेकिन इस बार उसकी सारी शक्तियाँ बेकार हो चुकी थीं।

     

    पुलिस उसे गिरफ्तार करके उसके गुप्त ठिकाने पर पहुँची। वहाँ से करोड़ों रुपये, सोना, हीरे और कई परिवारों का लूटा हुआ सामान बरामद हुआ।

    सभी चीज़ें उनके असली मालिकों को वापस लौटा दी गईं।

     

    साहिल और बाकी परिवारों ने राहत की साँस ली। पूरे शहर में अजय राणा की बहादुरी की चर्चा होने लगी।

     

    अदालत ने मायावी को उसके अपराधों के लिए उम्रकैद की सज़ा सुनाई।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

    एक रात जेल का एक पहरेदार अचानक बेहोश मिला। जब दूसरे पहरेदार उसकी मदद के लिए पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि मायावी अपनी कोठरी में तो बैठा है… लेकिन उसके चेहरे पर वही रहस्यमयी मुस्कान है।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मेरे जैसे मायावी कभी खत्म नहीं होते… हम सिर्फ अपना भेष बदलते हैं।”

     

    इतना सुनते ही जेल की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।

     

    कुछ पल बाद जब रोशनी वापस आई, तो मायावी अपनी कोठरी में बैठा

    था… या शायद कोई और उसके भेष में था।

    आज तक कोई यह पता नहीं लगा पाया कि उस रात सच में क्या हुआ था।

     

    समाप्त।

     

  • अधूरी इबादत भाग~20

    अधूरी इबादत भाग~20

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    भाग~20 तोड़ डाली परंपराएं

     

    जानकी चौहान, भानु प्रताप और उनके साथ बैठे मेहमान…. सभी की नज़रें एक साथ मेन गेट पर टिक गईं। सबने एक ही पल में देखा…. रूहानी, एक अनजान आदमी के साथ, वरमाला पहने, सिंदूर लगाए, गले में मंगलसूत्र डाले।

    कुछ क्षणों तक बस एक सन्नाटा था। फिर वो सन्नाटा जैसे किसी ने चीख से तोड़ दिया हो। जानकी की आँखों में विश्वास टूटने की दहशत थी, भानु प्रताप की मुट्ठियाँ सख्त हो गई थीं, और मेहमानों की फुसफुसाहटें एक भरी सभा में ज्वालामुखी जैसी गूंज रही थीं।

    रूहानी और अद्वैत अब गेट के भीतर कदम रख चुके थे। दोनों का चेहरा बाहर से शांत और भावहीन दिख रहा था, लेकिन भीतर एक तूफान उमड़ रहा था। रूहानी की हथेलियाँ ठंडी थीं, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, हर पल उसे लग रहा था जैसे उसका दिल सीने से बाहर आ जाएगा। 

    उसने हिम्मत करके अपने पापा की आँखों में देखना चाहा, पर उसका कलेजा कांप उठा। बस इसी क्षण से वो हमेशा से डरती आई थी और अभी यह पल किसी डरावने सपने की तरह उसके सामने था। उसने हमेशा से अपने पिता की स्वीकृति, उनका स्नेह और उनका गर्व चाहा था, लेकिन आज वो भीतर ही भीतर जानती थी कि शायद ये कभी नहीं मिलेगा, खासकर इस फैसले के बाद। 

    अद्वैत, रूहानी के ठीक बगल में खड़ा था, शांत, संयमित लेकिन बेहद सतर्क। उसकी आँखें चारों ओर के माहौल को स्कैन कर रही थीं, लोगों के चेहरों पर आते-जाते भावों को पढ़ रही थीं। वो जानता था कि ये उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है, शायद रूहानी के लिए उससे भी ज़्यादा।

    ये सिर्फ दो लोगों के स्वतंत्र विवाह की बात नहीं थी, ये दो अलग-अलग दुनियाओं, दो परिवारों के मूल्यों, परंपराओं, उम्मीदों और सपनों का एक ज़ोरदार टकराव था।

    उसने रूहानी की तरफ देखा, उसकी आँखों में डर और दर्द की एक झलक थी, लेकिन साथ ही होंठों के कसे होने और कंधों की दृढ़ता में एक अटूट संकल्प भी था।

    वो जानता था कि उसे इस समय उसके साथ खड़ा रहना है, न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि उसकी हिम्मत बनकर, एक चट्टान की तरह।

    “ये क्या है?” भानु प्रताप की भारी और रौबदार आवाज़ ने सबकी बातचीत पर ब्रेक लगाया। उनकी आवाज़ में सिर्फ सवाल नहीं था, उसमें एक अधिकार था, एक चेतावनी थी। उनकी नज़रें सीधी अद्वैत पर टिकी थीं।

    “कौन है ये?” भानु प्रताप की ऊँगली अद्वैत की ओर उठी। उनकी आवाज़ में गुस्सा और अविश्वास साफ झलक रहा था। जैसे कोई अजनबी, कोई अनचाहा व्यक्ति उनकी दुनिया में घुस आया हो।

    यश, रूहानी का छोटा भाई, जो अब तक किनारे खड़ा इस अप्रत्याशित दृश्य को हतप्रभ देख रहा था, धीरे से आगे आया। उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन शब्दों में सच्चाई थी। बोला, “पापा, ये अद्वैत अवस्थी हैं… दीदी के पति।” 

    यश हमेशा से रूहानी का समर्थक रहा था, उसकी बातों को सुनता था, लेकिन आज वो भी अपने पिता के गुस्से से डरा हुआ था। वो जानता था कि उनके पिता का गुस्सा कितना भयानक और अनियंत्रित हो जाता है।

    “पति…?” जानकी की आवाज़ मानो थम गई थी, जैसे शब्दों ने गले में ही दम तोड़ दिया हो। उनकी आँखों में सिर्फ सवाल नहीं थे…. वहाँ एक टूटा हुआ भरोसा था, एक परंपरा की अनसुनी पुकार, और एक ऐसी टीस जो सदियों से हर माँ की आँखों में पलती रही है।

    उन्होंने रूहानी के लिए हमेशा वही देखा था जो हर रूढ़िवादी परिवार देखता है…. एक ऐसा जीवनसाथी जिसे उसके माँ – बाप चुनें, जो जात-पात, कुल-परंपरा, और खानदान की इज़्ज़त को सबसे ऊपर रखे। 

    रूहानी से कभी पूछा नहीं जाना था कि वो क्या चाहती है, क्योंकि उस घर में बेटियों से सवाल नहीं पूछे जाते….. उन्हें बस मौन स्वीकृति देना सिखाया जाता है।

    उनके लिए ‘शादी’ कोई प्रेम कथा नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुबंध थी…. जहाँ भावनाओं से ज़्यादा महत्व घर की मर्यादा का था। जानकी को यकीन था कि रूहानी भी वही करेगी जो उसकी माँ, उसकी नानी, और उन तमाम औरतों ने किया…. चुपचाप सर झुका कर उनकी पसंद को अपना भाग्य मान लेगी।

    और ये अद्वैत… कौन था ये? कहाँ से आया था? वो उनके बुने हुए सपनों से बिल्कुल अलग था, एक अनदेखी राह का पथिक था।

    कमल, वो लड़का जिसे रूहानी के पति के रूप में उसके माँ – बाप के द्वारा चुना गया था, पीछे खड़ा था। उसके चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक और कुटिल मुस्कान थी। वो रूहानी को हमेशा से अपनी संपत्ति समझता था, एक ऐसी लड़की जो उसके रुतबे, उसकी सामाजिक स्थिति को और बढ़ाती। 

    आज, उसे लग रहा था जैसे वो संपत्ति, वो मान-सम्मान सब कुछ उससे छीन लिया गया हो, किसी ने उसे भरी महफ़िल में नीचा दिखा दिया हो। उसके अंदर अपमान और गुस्से का लावा उबल रहा था।

    “हमने शादी कर ली है,” रूहानी ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी थरथराहट थी, “क़ानूनी तौर पर…” उसकी आवाज़ में थोड़ी सी हिम्मत थी, जो उसने अपने अंदर बची आखिरी ताक़त से बटोरी थी, लेकिन वो जानती थी कि ये काफ़ी नहीं है। उसके शब्द हवा में तैरते हुए से लगे और फिर सन्नाटे में खो गए।

    “क़ानूनी?” भानु प्रताप की हँसी बेहद कड़वी और तीखी थी, जैसे किसी घाव पर नमक छिड़क दिया गया हो। 

    “बिना बताये? बिना हमारी सहमति के? और आज अचानक तुम यहाँ ये तमाशा दिखाने आ गई?” उनकी आँखों से जैसे आग बरस रही थी, माथे पर नसें तन गई थीं। उन्हें लगा था जैसे उनकी बेटी ने उनके अधिकार को, उनके निर्णय को, उनके अस्तित्व को ही चुनौती दे दी हो।

    कमल ने इस मौके का फायदा उठाते हुए ताना मारा, “तमाशा नहीं तो और क्या है? सबके सामने नाक कटवा दी। अपने खानदान की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी।” उसकी आवाज़ में ज़हर घुला हुआ था, जैसे वो इस अपमान का बदला शब्दों से ले रहा हो।

    कमल के पिता ने भी अपनी आवाज़ मिलाई, उनके चेहरे पर भी घोर निराशा और गुस्सा था। “हमने तो समझा था, हमें एक संस्कारी बहू मिलेगी, जो घर की लक्ष्मण रेखा समझे। पर ये क्या निकला? अपने फ़ैसले खुद लेने वाली… हमारे घर की लड़कियों में ऐसा कभी नहीं हुआ।” उनके शब्द केवल रूहानी पर नहीं, बल्कि जानकी और भानु प्रताप पर भी एक कटाक्ष थे, जैसे उनकी परवरिश पर सवाल उठा रहे हों।

    रूहानी के कानों में ये बातें तीर की तरह चुभ रही थीं। उसे लग रहा था जैसे हर कोई उसे अपराधी ठहरा रहा हो। वो हमेशा से अपने परिवार का सम्मान करती थी, उनकी बातों को मानती थी, लेकिन आज उसे लग रहा था जैसे उसने सबसे बड़ा गुनाह कर दिया हो, ऐसा गुनाह जिसकी कोई माफ़ी नहीं थी। 

    उसकी आँखों में आँसुओं का सागर उमड़ रहा था, पर उसने उन्हें किसी तरह रोक रखा था। वो जानती थी, अगर आज रोई, अगर आज कमज़ोर पड़ी, तो ये लोग उसे हमेशा के लिए कमज़ोर मान लेंगे और उसे पूरी ज़िंदगी सिर्फ अपनी सफाई ही देनी पड़ेगी।

    अद्वैत ने जैसे ही कमल और उसके पिता की बातें सुनी तो उसका खून खौल उठा। वो अब और चुप नहीं रह सका। उसने उनलोगों की तरफ मुड़कर पहली बार कुछ कहा। उसकी आवाज़ में ठहराव था, शांति थी, लेकिन एक ऐसी दृढ़ता थी जिसने माहौल की सारी फुसफुसाहटों को दबा दिया। 

    “ये तमाशा नहीं है,” अद्वैत ने कहा, “ये ज़िम्मेदारी है। रूहानी ने कोई गुनाह नहीं किया है। उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फ़ैसला लिया है, अपनी ख़ुशी का फ़ैसला और मैं उसके साथ हूँ। हम दोनों ने अपनी मर्ज़ी से, एक-दूसरे से शादी की है और हम अपने फ़ैसले के लिए किसी से माफ़ी नहीं मांगेंगे।”

    उसने फिर भानु प्रताप की तरफ देखा, उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, सिर्फ़ एक सीधी, अडिग चुनौती थी। “और जहाँ तक बात इज़्ज़त की है, इज़्ज़त किसी इंसान के पहनावे से नहीं, किसी के गोत्र या खानदान से नहीं, इज़्ज़त किसी इंसान के फ़ैसले से नहीं घटती, उसकी इज़्ज़त उसके कर्मों से होती है। 

    रूहानी ने आज जो हिम्मत दिखाई है, जो साहस दिखाया है, वो काबिले-तारीफ़ है। आप लोगों को उस पर शर्मिंदा नहीं, उस पर गर्व होना चाहिए।” अद्वैत के शब्द तीखे और सच्चे थे, उन्होंने माहौल में एक नई लहर पैदा कर दी।

    रूहानी ने अद्वैत की तरफ देखा, उसकी आँखों में अविश्वास झलक रहा था। क्या उसने सच में ये कहा? वो, जो अब तक बस एक औपचारिक रिश्ते का हिस्सा था, आज कुछ ऐसा कह गया था जो रूहानी ने कभी उम्मीद नहीं की थी….. इस कॉन्ट्रैक्ट मर्रिज के भीतर भी कोई उसके दर्द को समझ सकता है। ये बात उसके लिए अजीब भी थी और अप्रत्याशित भी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अद्वैत सचमुच उसकी फिक्र करता है, या ये भी किसी शर्त का हिस्सा है।

    भानु प्रताप ने पलटकर अपने दोस्तों की तरफ देखा, जो अब भी फुसफुसा रहे थे, सर हिला रहे थे, जैसे कोई घटिया नाटक देख लिया हो। उनके चेहरे पर तिरस्कार, हैरानी और मज़ाक का मिश्रण था।

    “इतनी भी बेहयाई कोई कैसे कर सकता है, अब तो रीत-रिवाज़ भी इनसे डरने लगे होंगे,” कमल की माँ ने खून खौलाते लहजे में कहा, जैसे उसके संस्कारों पर किसी ने सीधा वार किया हो।

    रूहानी की माँ जानकी चौहान के लिए ये सब बर्दाश्त कर पाना, ये दृश्य देखना आसान नहीं था। सालों से जिस बेटी को अपनी आंखों के सामने पाला था, जिसे हर रिश्ते के लिए, हर मर्यादा के लिए तराशा था, जिसे कुल की प्रतिष्ठा का प्रतीक माना था, वो आज एक अजनबी के साथ वरमाला और सिंदूर में लिपटी खड़ी थी…. बिना बताये, बिना पूछे, बिना समझाए। 

    समाज की बातें, मेहमानों की फुसफुसाहटें जो अब ज़ोर पकड़ने लगी थीं, और पति भानु प्रताप की तनी हुई भौंहें और अपमानित चेहरा…. इन सबके बीच जानकी का दिल तड़प उठा। उसकी आँखों के सामने उसके सारे सपने बिखरते नज़र आ रहे थे।

    वो धीरे-धीरे रूहानी के पास आई, उसका चेहरा देखा… उस चेहरे पर न कोई ग्लानि थी, न कोई शर्म, बस एक गहरा सन्नाटा था, एक थका हुआ भाव था जैसे वो बहुत लंबी लड़ाई लड़कर आई हो और वही सन्नाटा उसकी माँ की सहनशक्ति तोड़ गया। जिस बेटी से उसे उम्मीद थी कि वो आँखों में आँसू लेकर माफ़ी मांगेगी, वो बेटी शांत खड़ी थी, जैसे उसने कोई गलती की ही न हो।

    “शर्म नहीं आई तुझे?” जानकी ने धीमे, पर कड़वे शब्दों में कहा। उसकी आवाज़ में माँ का प्यार नहीं, अपमानित स्त्री का गुस्सा था। “हमारे जीते जी तूने सब खत्म कर दिया। हमारी इज़्ज़त, हमारा नाम… सब मिट्टी में मिला दिया।”

    रूहानी एक पल को स्तब्ध खड़ी रही। उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन चेहरा कठोर था। वह कुछ कहना चाहती थी। होंठों तक आते हुए शब्द काँप रहे थे।

    “माँ… मैं बस—”

    जानकी ने बात पूरी होने से पहले ही रूहानी के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। उस एक थप्पड़ की गूंज पूरे आँगन में फैल गई, हवा में गूंजती रही, जैसे समय ठहर गया हो। हर कोई सन्न रह गया।

    —————

    क्या वाकई ये थप्पड़ सिर्फ एक गाल पर पड़ा था… या फिर एक पीढ़ी के सपनों, भरोसे और इज्ज़त पर भी?

    अब क्या रूहानी फिर खड़ी हो पाएगी… या ये थप्पड़ उसकी हिम्मत की आखिरी दरार बन जाएगा?

    अद्वैत… क्या वो अब भी उसका हाथ वैसे ही थामे रखेगा, या इस तमाचे की गूंज उसके वादों को भी डगमगा देगी?

     

  • अधूरी इबादत भाग~19

    अधूरी इबादत भाग~19

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग ~19 दुल्हन… पर अधूरी

     

    अद्वैत की कार जैसे ही चौहान निवास के बाहर आकर रुकी, उस घर की पुरानी दीवारों पर एक नया तनाव उतर आया था। बाहर की धूप हल्की थी, लेकिन कार के भीतर एक अजीब

     सा बोझ था, जो किसी की आंखों से नहीं, लेकिन हर खामोशी से टपक रहा था।

    बैकसीट पर बैठा यश उतावलेपन से दरवाज़ा खोलते ही झट से बाहर निकला और दौड़ता हुआ फ्रंट सीट पर आ गया। रूहानी की खिड़की के पास आकर वह बच्चों जैसी उत्सुकता से बोला, “जल्दी से आओ न दीदी। मां-पापा तुम्हें शादीशुदा देखकर खुश हो जाएंगे।” उसके चेहरे पर उम्मीद थी, नादानी थी, और वो मासूम यक़ीन था जो हालात की गहराई नहीं समझता।

    रूहानी ने यश की ओर नहीं देखा। उसकी नजरें खुद में उलझी थीं। कार की खिड़की पर झुकी, शीशे में खुद को देखा तो बस एक वरमाला थी उसके गले में। ना मांग में सिंदूर, ना हाथों में चूड़ियाँ, ना कोई वो पहचान जो समाज ‘सहजीवन’ से जोड़ता है। और सच कहें तो चेहरा… चेहरा किसी दुल्हन का नहीं, किसी समझौते से झांकते हुए इंसान का था।

    उसने धीरे से अपना हाथ गले पर रखा, वहां, जहां आमतौर पर एक मंगलसूत्र होना चाहिए था… वो खालीपन उसे बाहर से ज़्यादा भीतर चुभ रहा था।

    अद्वैत, जो ड्राइवर सीट पर बैठा था, एकटक उसे देख रहा था। उसका हाथ रूहानी की हर हरकत को पढ़ रहा था जैसे वो कोई किताब हो जिसे वो कई बार दोहरा चुका हो। उसने समझ लिया था…. रूहानी किस दुविधा में है। वह यह जानता था कि ये सिर्फ एक दिखावटी शादी है, लेकिन दिखावे का यह क्षण अब वास्तविक दुनिया में प्रवेश कर चुका था, जहाँ भावनाएं नकाब नहीं पहनतीं।

    इसलिए अद्वैत ने यश की ओर मुड़कर नरम लेकिन तय स्वर में कहा, “तुम्हारी दीदी तुम्हारे जीजाजी के साथ पहली बार घर आ रही है तो क्या स्वागत नहीं करोगे?”

    यश ने जैसे किसी भूली हुई रस्म को याद करते हुए अपनी दोनों हथेलियों से सिर पीटा, “अरे, जीजाजी, मैं तो भूल ही गया था। जरूर स्वागत होगा। मैं करूंगा ना। आपने बिल्कुल सही कहा। मैं अभी जाता हूं, आप भी दीदी को लेकर जल्दी से आना।” और वो फुर्ती से घर की ओर भाग गया।

    अद्वैत ने उसकी मासूम ऊर्जा पर मुस्कराते हुए कहा, “हां, तुम जाओ, हम दोनों अभी आते हैं।”

    अब कार के भीतर फिर वही सन्नाटा था, पर अब उसमें सवाल थे।

    ——–

    यश के अकेले घर में प्रवेश करते ही उसकी मां जानकी चौहान के चेहरे पर चिंता, शर्म और ग़ुस्से की मिली-जुली रेखाएँ खिंच गई थीं। उसकी आँखों में हज़ार सवाल तैर रहे थे और लहजा ऐसा जैसे किसी ज्वालामुखी ने फूटने की पूरी तैयारी कर ली हो।

    उसने यश की कलाई कसकर पकड़ी और लगभग घसीटते हुए उसे हॉल से दूर कोने की ओर ले गई, जहाँ से भानु प्रताप की नज़रें उन पर न पड़ें।

    उसका स्वर धीमा नहीं था, पर डर और बेचैनी से भरा हुआ था, “सुबह-सुबह ही निकल गया था न तू उस बेशर्म के साथ, तो आने में दोपहर कैसे हो गई? और शॉपिंग का सामान कहां है? खाली हाथ क्यों आया है तू, और वो बेशर्म कहां रह गई?”

    वो जैसे रुकी ही नहीं। उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं, होंठ कांप रहे थे और माथे पर पसीने की एक महीन परत थी। “कहीं भाग तो नहीं गई? हाय राम! अब तो हम कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहे। हॉल में तेरे पापा के दोस्त और उनका पूरा परिवार आया हुआ है। कब से रूहानी से मिलने के लिए बोल रहे हैं, और मैं आधे घंटे से कहे जा रही हूं कि वो अपने भाई के साथ खरीदारी करने गई है। बोल मेरे बेटे, कहां छोड़ आया है उसे?”

    यश ने मां के कंधों को पकड़ कर हल्के से दबाया, जैसे उसकी थरथराहट को थाम लेना चाहता हो। उसकी आवाज़ में वो संयम था जो अक्सर बच्चों में नहीं होता, लेकिन इस वक़्त उसके चेहरे पर एक अलग किस्म की समझदारी झलक रही थी।

    “मुझे बोलने दोगी, तब न मैं कुछ बता पाऊंगा,” उसने माँ की आँखों में देखकर कहा, “तब से तो एक ही सांस में बोले जा रही हो। दीदी मेरे ही साथ थी, बस पीछे से आ रही हैं…”

    ——– 

    इधर, अद्वैत ने जैसे ही कार के ग्लव बॉक्स से वो छोटी सी डिब्बी निकाली और रूहानी की ओर बढ़ाई, उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी—जैसे वो जानता हो कि ये क्षण नाटकीय नहीं, पर जरूरी है। “ये लो,” उसने धीमे से कहा, “इसे पहन लो, वरना तुम्हारे मां-पापा को शक हो जाएगा।”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा। बस उसके हाथ से वो डिब्बी ली और धीरे से खोली। उसमें एक छोटा सा फैंसी मंगलसूत्र था—सस्ता, लेकिन अपनी भूमिका में सटीक। उसका दिल थोड़ी देर को जैसे ठहर गया। उसने उस मंगलसूत्र को हथेलियों में रखा और उंगलियों से हल्के हल्के मसलने लगी, जैसे वो धातु नहीं कोई विचार हो—कभी अपना, कभी पराया।

    अद्वैत उसकी उंगलियों के कम्पन और उसके माथे की संकोचभरी सिलवटों को पढ़ रहा था। उसकी नजरें कहीं ठहरी नहीं थीं, पर सब देख रही थीं। वो समझ गया कि ये नाटक उनके लिए बाहरी दुनिया को दिखाने के लिए है, लेकिन रूहानी के भीतर कुछ बहुत गहरा टूटा और जुड़ता जा रहा है।

    “और हां,” उसने एक और डिब्बी बढ़ाते हुए कहा, “इसे मत भूल जाना… मैं यहीं बाहर हूं।”

    इतना कहकर अद्वैत कार से बाहर निकल गया और उसकी तरफ पीठ कर के खड़ा हो गया, जैसे उसे खुद को भी इस दृश्य से अलग रखना हो।

    कार के अंदर अब सिर्फ रूहानी थी और एक अजीब सी चुप्पी। उसने मंगलसूत्र को बिना ज़्यादा सोचे, एक ही झटके में पहन लिया। उसके बाद जब उसने दूसरी डिब्बी खोली, तो उसमें लाल रंग का सिंदूर देखकर उसका दिल एक बार फिर कांप गया। उंगलियां ठिठकीं, आँखें नम हुईं। वो आईने में खुद को देख रही थी….. एक ऐसी स्त्री, जो शादीशुदा दिखने जा रही थी, लेकिन मन के किसी कोने में अभी भी कुछ अधूरा, कुछ अनकहा ज़िंदा था।

    आईने में उसका अक्स बदलता गया। उसे अपना पुराना चेहरा याद आया—वो लड़की जो कुछ साल पहले अपने करियर, अपनी पहचान और एक सच्चे प्रेम के ख्वाब के साथ ज़िंदगी को देखने निकली थी। मगर उस प्रेम ने धोखा दिया था, और करियर अब उस मोड़ पर आ खड़ा हुआ था जहाँ झूठ की परत चढ़ानी पड़ रही थी।

    पर अब वक्त उन बातों का नहीं था। वो जानती थी कि एक परछाईं की तरह अतीत उसके साथ चल सकती है, लेकिन आज जो सामने खड़ा है, उससे नज़रें नहीं चुराई जा सकतीं। उसने एक चुटकी सिंदूर उठाया और अपनी मांग में भर लिया—सिर्फ इसलिए नहीं कि दुनिया देखे, बल्कि इसलिए कि वो खुद उस भूमिका को निभा सके जो उससे उम्मीद की जा रही थी।

    बाहर खड़े अद्वैत की पीठ की तरफ देखते हुए उसने गहरी साँस ली और दरवाज़ा खोल कर कहा, “चलो, मैं तैयार हूं।”

    अद्वैत ने जब उसकी आवाज़ सुनी, तो मुड़कर देखा। उसके हाथ अपने वरमाला को ठीक कर रहे थे, पर निगाहें रूहानी के चेहरे पर जम गईं। एक पल को वो ठिठक गया। सामने खड़ी औरत वही थी जिससे उसने एक समझौता किया था, लेकिन अब उसमें कुछ बदल गया था…. वो सिर्फ रूहानी नहीं रही, उसमें कहीं छुपकर उसकी ‘पत्नी’ भी झलकने लगी थी।

    “तुम…” बस इतना ही कहा अद्वैत ने, उसकी आंखों में एक अबोझ सी चमक थी।_

    रूहानी ने घबरा कर कहा, “क्या हुआ? कुछ ठीक से नहीं है क्या?” वो अपनी वरमाला, मंगलसूत्र और सिंदूर को टटोलने लगी, जैसे कोई बच्चा हो जिसने पहली बार कुछ पहन कर आईने में खुद को देखा हो।

    “नहीं… सब ठीक है…” अद्वैत ने अपनी कल्पना से बाहर आते हुए कहा, “चलो चलते हैं।”

    दोनों घर के मेन गेट के पास पहुँचे। हवा थोड़ी गर्म थी, लेकिन उनके बीच एक अजीब सी ठंडक पसरी हुई थी…. शब्दों की, भावनाओं की, और उन अहसासों की जो ज़ोर से कहे नहीं जा सकते।

    उधर थोड़ी दूरी पर एक नौजवान लड़का…. तनाव और झुंझलाहट से टहलता हुआ…. बेसब्री से बोला, “यश, कहां रह गई रूहानी? मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा।”

    यश ने तुरंत गेट की ओर इशारा किया, “वो रही दीदी…”

    और फिर सब जैसे रुक गया।

    जानकी चौहान, भानु प्रताप और उनके साथ बैठे मेहमान…. सभी की नज़रें एक साथ मेन गेट पर टिक गईं। सबने एक ही पल में देखा…. रूहानी, एक अनजान आदमी के साथ, वरमाला पहने, सिंदूर लगाए, गले में मंगलसूत्र डाले।

    कुछ क्षणों तक बस एक सन्नाटा था। फिर वो सन्नाटा जैसे किसी ने चीख से तोड़ दिया हो। जानकी की आँखों में विश्वास टूटने की दहशत थी, भानु प्रताप की मुट्ठियाँ सख्त हो गई थीं, और मेहमानों की फुसफुसाहटें एक भरी सभा में ज्वालामुखी जैसी गूंज रही थीं।

    ————-

    क्या ये सिर्फ एक दिखावा था, या इस नाटक ने वाकई कुछ बदल दिया था?

    क्या जानकी की आँखों में जो दहशत थी, वो एक माँ का डर था या एक औरत का टूटा हुआ घमंड?

    भानु प्रताप की सख्त मुट्ठियाँ… क्या वो सिर्फ गुस्से की थीं, या किसी पुराने राज़ की दस्तक थी?

    रूहानी के क़दमों ने चौहान निवास में जो तूफ़ान लाया था… क्या अब उससे कोई बच पाएगा?

  • अधूरी इबादत भाग~18

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~18 इमोशन्स का बीमा

    पंजीकरण कार्यालय की उस सफ़ेद, ठंडी दीवारों वाली बिल्डिंग में ~भी उस वक़्त एक अजीब सी गर्माहट फैल गई थी, जब रुहानी के हाथों में काग़ज़ का वो पुलिंदा रखा गया – अद्वैत द्वारा तैयार किया गया विवाह अनुबंध। 

    बाहर हल्की धूप थी, अंदर ट्यूब लाइट की सफेद रौशनी और दोनों के बीच कुछ ऐसा था जो रौशनी से ज़्यादा कुछ कहता था…. एक मौन संवाद। 

    रुहानी के हाथ काँपते नहीं रहे थे, पर उसकी आँखें एक-एक शब्द पर रुकती चली जा रही थीं, जैसे कोई मन के अंदर झाँकने का हक़ मांग रहा हो।

    उसके सामने अद्वैत खड़ा था, एकदम शांत, जैसे उसने अपने भीतर की हर हलचल को ताले में बंद कर रखा हो। वो कुछ नहीं बोल रहा था, बस रुहानी के चेहरे को पढ़ रहा था…. उसकी हर मरोड़, हर रुकावट, हर सांस की गहराई को। 

    उधर रुहानी, एक-एक शब्द पढ़ती जा रही थी…..

    विवाह अनुबंध-पत्र (Contract Marriage Agreement)

    (स्वतंत्रता, सीमाओं और गोपनीयता के स्पष्ट निर्देशों सहित)

    पक्ष 1:

    नाम: अद्वैत अवस्थी

    उम्र: 28 वर्ष

    पेशा: लेखक एवं सामाजिक वक्ता

    निवास: विमान नगर, पुणे

     

    पक्ष 2:

    नाम: रुहानी चौहान

    उम्र: 24 वर्ष

    पेशा: स्वतंत्र वस्त्र डिज़ाइनर

    निवास: हडपसर, पुणे८

    स्पष्ट और पारदर्शी शर्तें: (Clear and Transparent Terms)

    1. यह विवाह केवल एक सामाजिक औपचारिकता है, जो एक वर्ष तक सीमित रहेगा।

    2. यह विवाह दिखावे का है, लेकिन इ⁹सके बावजूद किसी भी प्रकार के अतिरिक्त विवाहिक संबंध (extra-marital affair) की अनुमति नहीं होगी।

    3. दोनों के कमरे अलग-अलग होंगे। कोई भी पक्ष बिना पूर्व अनुमति के दूसरे के निजी स्थान में प्रवेश नहीं करेगा।

    4. शारीरिक संपर्क केवल सार्वजनिक मौकों पर “विवाहित जोड़े” की छवि बनाए रखने के लिए सीमित होगा, और वह भी केवल सामाजिक मर्यादाओं के भीतर।

    5. अनुबंध की अवधि में किसी भी प्रकार की शारीरिक निकटता की कोई अनिवार्यता नहीं होगी। न कोई अपेक्षा, न कोई ज़ोर।

    6. यह स्पष्ट रूप से समझा जाता है कि “दिल लगाना मना है” (falling in love is not allowed)…… किसी भी भावनात्मक जुड़ाव की कोई ज़रूरत या बाध्यता नहीं है।

    7. कोई भी inappropriate या असहज करने वाला स्पर्श, शब्द या व्यवहार इस अनुबंध का उल्लंघन माना जाएगा।

    8. दोनों अपने-अपने पेशेवर जीवन में पूर्ण स्वतंत्र रहेंगे। कोई भी एक-दूसरे के काम में हस्तक्षेप नहीं करेगा, न आलोचना, न सलाह बिना माँगे।

    9. दोनों को अपने सामाजिक, व्यक्तिगत और मानसिक क्षेत्र में स्वतंत्रता का पूरा अधिकार है।

    10. इस अनुबंध की जानकारी एक सीमित दायरे तक ही रखी जाएगी: सिर्फ अद्वैत, रुहानी, उनके वकील और मैनेजर तक।

    11. यदि इस अनुबंध की कोई भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो यह समझा जाएगा कि अनुबंध समाप्त हो चुका है। फिर दोनों पक्ष एक-दूसरे से पूर्णतः अजनबी हो जाएंगे, और इस शर्त के उल्लंघन करने वाले को किसी भी तरह की कोई बात करने का अधिकार नहीं होगा।

     

    हस्ताक्षर:

    पक्ष 1 (अद्वैत अवस्थी): _______________

    पक्ष 2 (रुहानी चौहान): _______________

    विधिक सलाहकार: _______________

    तिथि: _______________

     

    रुहानी ने अनुबंध के पहले कुछ खंडों को पढ़ते हुए महसूस किया कि यह किसी और दुनिया का समझौता था। यह अनुबंध उससे दूर था, फिर भी जैसे वह खुद को इसमें बांधने जा रही हो।

    “दोनों के कमरे अलग-अलग होंगे… दिल लगाना मना है… कोई भी शारीरिक निकटता अनुबंध का हिस्सा नहीं होगी…” जैसे हर शब्द उसकी सोच में एक छोटी सी सुई चुभो रहा हो, मगर दर्द की जगह एक अजीब किस्म की ठंडक भर रही थी।

    “कमाल है…” उसने हल्की सी हँसी में फुसफुसाया, बिना अद्वैत की तरफ़ देखे, “तुमने तो हर इमोशन का बीमा करवा लिया है इस कॉन्ट्रैक्ट में।”

    अद्वैत ने पहली बार पलकें झपकाईं, फिर बहुत धीरे से कहा, “इमोशन्स ही तो सबसे ज़्यादा नुकसान करते हैं और मुझे अब कोई भी नुकसान नहीं चाहिए।”

    रुहानी आगे पढ़ी। अगली शर्त थी….‘पब्लिक प्लेस में साथ दिखना होगा, पर कोई भी स्पर्श मर्यादित रहेगा। सिर्फ़ दिखावे के लिए।’

    “मतलब… हमें भीड़ में हाथ पकड़ना होगा, पर एक छत के ही नीचे होने पर कोई स्पर्श नहीं होगा?” उसकी आवाज़ में एक टुकड़ा था…न गुस्से का, न दुःख का… बस एक उलझा हुआ विस्मय।

    अद्वैत ने सिर झुकाया, जैसे मान लेना चाहता हो कि हाँ, ये सब शायद असहज है, पर है ज़रूरी।

    “ये सब ज़रूरी है, रुहानी,” उसने नज़रों को दूर खिड़की की दिशा में टिकाते हुए कहा, “मेरे करियर की एक धारणा है, जो टूटी तो सब बिखर जाएगा। मुझे अपने शब्दों को बचाना है… और अब… अपना चेहरा भी।”

    रुहानी की आँखें कुछ पल के लिए अद्वैत की आंखों पर टिक गईं, जैसे उसकी पुतली में कोई अनकहा डर देख रही हों। फिर वो बोली, धीरे, लेकिन बिलकुल साफ़…. “मेरे लिए भी तो ज़रूरी है अब ये सब। पापा के मेरी मर्ज़ी के खिलाफ, जबरदस्ती उनकी पसंद के दकियानूसी सोच वाले इंसान से शादी करने से तो ये झूठी शादी ही सही… कम से कम यहाँ मेरी रज़ामंदी तो है और वैसे भी मुझे भी तो अपने प्रोफेशन में सेटल होने के लिए वक्त चाहिए।”

    उसके शब्दों में आंसू नहीं थे, लेकिन आवाज़ जैसे किसी जले हुए पत्ते पर चल रही थी… खुरदरी, सूखी, फिर भी सच्ची। अद्वैत ने उसे गौर से देखा, पहली बार जैसे उसकी मजबूरी की असल शक्ल को पहचाना हो। कमरा कुछ देर के लिए सांस लेना भूल गया था।

    रुहानी ने आख़िरी पन्ने पर दस्तख़त करने से पहले काग़ज़ को हल्के से मोड़ा, जैसे कोई किताब के किसी अधूरे अध्याय को दबा कर रख देता है… ताकि कोई और उस अधूरेपन को महसूस न कर पाए।

    रजिस्टार ने दोनों से कहा, “अब आप दोनों एक दूसरे को वरमाला पहनाएं ताकि यह पूरी प्रक्रिया असली शादी जैसा लगे।” कमरे में खामोशी छा गई। अद्वैत और रुहानी एक दूसरे को देखते रहे, जैसे दोनों एक अजीब सी स्थिति में फंसे हों। उनकी आँखों में सवाल था, न जाने कितना कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द नहीं मिल रहे थे।

    अद्वैत की आँखों में कुछ छिपा हुआ था, जैसे वह खुद को इस पल से बाहर निकालने का रास्ता ढूँढ़ रहा हो। रुहानी ने धीमे से कहा, “हम दोनों खुद ही माला पहन लेते हैं,” और अद्वैत ने भी हामी भरी, मानो वह इस छोटी सी समझौते में अपने कर्तव्यों से बाहर आना चाहता हो।८

    वकील ने कहा, “जैसा आप दोनों चाहें, वैसा ही सही,”

    फिर दोनों ने बिना किसी और शब्दों के खुद के गले में माला डाल दी. वकील की मंजूरी के बाद, जब वे कमरे से बाहर निकले, तो रुहानी का छोटा भाई यश वहाँ खड़ा था। 

    जैसे ही उसने रुहानी को देखा, खुशी से दौड़ते हुए उसके गले लग गया और बोला, “अब पापा की जबरदस्ती किसी और जगह शादी नहीं कर पाएंगे, मैं बहुत खुश हूं आपके लिए।” उसका चेहरा जैसे किसी छोटे बच्चे की खुशी से भर गया हो, और रुहानी के मन में एक हल्की सी राहत महसूस हुई। 

    अद्वैत ने चुपचाप देखा, मानो वह इस नये रिश्ते में खुद को थोड़ा और खोता जा रहा हो, पर उसकी आँखों में कोई अजीब सी गहराई थी, जैसे वह इस रिश्ते के बारे में बहुत कुछ सोच रहा हो।

    यश खुशी से अद्वैत के पास आकर बोला, “जीजाजी तो बोल सकता हूं न अब आपको, चलिए मेरे साथ मेरे पापा के घर, अब पापा भी जान जाएंगे कि रूहानी दीदी की शादी हो गई है तो अब सब ठीक हो जाएगा।” यश की आवाज में उम्मीद और राहत थी, जैसे उसने किसी बड़े संकट से निकलने का रास्ता पा लिया हो।

    लेकिन अद्वैत और रूहानी एक दूसरे को प्रश्नवाचक नजरों से देखकर उस बात पर चुप रहे। उनके दिलों में अनकहे सवाल थे…..क्या सच में सब ठीक हो जाएगा? 

    ————–

    क्या ये अनुबंध दोनों के लिए यह एक ऐसा चक्रव्यूह बन जाएगा, जिसमें वे खुद ही फंसते चले जाएंगे? 

    अद्वैत और रुहानी के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी थी, जो टूटेगी या फिर और मजबूत होगी?

    क्या वे सच में अपनी इच्छाओं और डर से बच पाएंगे, या यह शादी उन्हें उन भावनाओं के सबसे करीब ले आएगी, जिनसे बचने के लिए उन्होंने ये अनुबंध किया था?

     

  • अधूरी इबादत भाग~17

    अधूरी इबादत भाग~17

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~17 शादी… मगर नकली

     

    रात के खाने के बाद जब सब अपने-अपने कमरों में चले गए थे, तब रुहानी चुपचाप छत पर आकर बैठ गई थी। ऊपर आसमान बिलकुल शांत था, लेकिन उसके भीतर हलचल थी… ऐसी जैसे ठहरे पानी में अचानक कोई कंकर गिरा हो। 

    हवा में हल्की ठंडक थी, और चाँद की रोशनी उसकी पलकों पर पड़ी तो उसकी सोच और भी गहराने लगी। वो अपने पैरों को सिकोड़े, घुटनों को बाँहों में भरे, बस छत के कोने में बैठी थी, जैसे किसी सवाल की तलाश में हो, जो खुद उसी के भीतर छुपा हो। 

    रात की नमी, नीले आसमान का सूनापन, और शहर की दूर होती हलचलें…. सब जैसे मिलकर कोई अनकहा गीत गा रही थीं, जिसमें हर सुर रुहानी की बेचैनी को छू रहा था।

    यश की कही सारी बातें अब भी उसके कानों में गूंज रही थीं… एक-एक लफ़्ज़ जैसे मन के अंदर गहराई तक उतर गया था। अद्वैत ने जो कहा था, यश ने सब कुछ ज्यों का त्यों सुना दिया था, लेकिन उस सच्चाई में भी कहीं न कहीं कोई परतें छुपी थीं, जो रुहानी को भीतर से बेचैन कर रही थीं।l

    “आख़िर वो मुझसे शादी क्यूँ करना चाहता है?” – ये सवाल उसकी सोच में बार-बार एक टकराते हुए समुंदर की तरह उठ रहा था, जिसका कोई किनारा नजर नहीं आ रहा था। उसकी ज़िंदगी के सबसे कठिन लम्हे में उसने उसे बचाया था, ये बात सच थी…. लेकिन क्या किसी की जान बचाने भर से कोई रिश्ता इतना गहरा हो सकता है कि वो शादी तक पहुंच जाए? नहीं… रुहानी का दिल मानने को तैयार नहीं था।

    उसने जितना अद्वैत को जाना था… उसके घर में रहते हुए, उसकी मेड से बात करके…. वो इंसान तो बेहद आत्मनिर्भर था, एकदम अपने ही खोल में बंद, जैसे दुनिया से कोई सरोकार ही न हो। उसके चेहरे पर हमेशा एक उदास ठहराव रहता था, जैसे हर मुस्कान पर एक साया हो। वो न तो फालतू बातचीत करता, न ही किसी से खास घुलता-मिलता। 

    और फिर, सबसे बड़ी बात जो रुहानी को भीतर तक कचोट रही थी…. वो ये कि अद्वैत अपनी मरी हुई पत्नी से बेहद मोहब्बत करता था। इतना कि उसके गुजर जाने के बाद किसी और औरत को उसने अपने घर में आने तक नहीं दिया। ना कोई दोस्त, ना कोई हमराज़, ना कोई छांव।)

    तो फिर… ऐसी कौन सी बात है जो उसे, एक अजनबी लड़की को, अपनी पत्नी बनाने के लिए मजबूर कर रही है? रुहानी की उंगलियाँ धीरे-धीरे उसकी मोबाइल की किनारी से खेल रही थीं, और मन सवालों के भंवर में डूबा जा रहा था। 

    तभी उसके हाथ में रखा मोबाइल एकाएक बज उठा।  पर बस एक नाम चमक रहा था — Adwait. जैसे किसी खामोश तलाब में पत्थर गिरा हो, वैसे ही उसकी तंद्रा टूटी। उस एक नाम से उसके भीतर की सारी उलझनें जाग उठीं। हाथ थोड़े काँपे, पर उसने कॉल उठा लिया।

    फोन उठते ही दोनों तरफ कुछ क्षण की चुप्पी रही। जैसे दोनों अपनी साँसें थामे हुए हों, जैसे शब्दों से ज़्यादा भारी हो गई हों खामोशियाँ। और फिर जैसे कोई धागा एक साथ खिंच जाए….. दोनों एक साथ बोल पड़े:

    “मुझे तुम्हें कुछ बताना है,” अद्वैत की आवाज़ थी, भारी और धीमी।

    “मुझे तुमसे कुछ पूछना है,” रुहानी की आवाज़ में भी हल्की थरथराहट थी।

    फिर दोनों एक साथ रुक गए। एक और खामोशी, लेकिन इस बार वह बोझिल नहीं थी…. यह एक इंतज़ार की खामोशी थी।

    रुहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा, “यश ने बताया तुम्हारे प्रपोज़ल के बारे में… उसी सिलसिले में कुछ पूछना था मुझे।”

    फोन के दूसरी तरफ अद्वैत ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे शब्दों को आकार देने के लिए भीतर से कुछ खींच रहा हो, और फिर बोला, “इससे पहले कि तुम कुछ पूछो, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ… जिससे शायद तुम्हारे सारे सवालों के जवाब खुद-ब-खुद मिल जाएँ।”

    रुहानी थोड़ी चौंकी। यह शायद पहली बार था जब अद्वैत ने उससे इतने लंबे वाक्य में कुछ कहा था। कुछ तो था उस आवाज़ में…. कोई थकान, कोई सच्चाई, कोई बोझ। 

    वह बस “हम्म… ठीक है, कहो जो कहना है,” कहकर सुनने लगी।

    अद्वैत की आवाज़ फिर आई, बहुत साफ और सीधे लहजे में, “ये शादी असली शादी नहीं होगी।”

    रुहानी के माथे पर लकीरें उभर आईं, और उसकी भौहें एक-दूसरे के पास सिमट गईं। “क्या मतलब?” उसने पूछा, जैसे किसी पहेली को हल करने की कोशिश कर रही हो।

    “तुम्हें थोड़ा अजीब लग रहा होगा,” अद्वैत ने कहा, “लेकिन हमारी शादी एक शो होगी दुनिया के लिए… मतलब, ‘contract marriage’। मुझे इसी सिलसिले में तुमसे बात करनी थी।”

    अब उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी….. जैसे जो बोझ वो दिल में लिए फिर रहा था, अब वो उतरने वाला हो। और उधर रुहानी की आँखें आसमान को नहीं, अब अपने भीतर के किसी सच को देख रही थीं….. वो सच, जिसे वो अब तक अनदेखा कर रही थी।

    रुहानी के कानों में जब ये सब बातें पड़ीं, तो पहले-पहल उसे विश्वास नहीं हुआ। शब्द तो मानो हवा में तैरते हुए आए थे, मगर जब उन्होंने उसके दिल की सतह को छुआ, तो वहां से भी कुछ वैसी ही सच्चाई फूट पड़ी। 

    भीतर से एक आवाज आई….. थकी हुई, टूटी हुई, मगर बेहद सच्ची…..”मैं भी तो किसी से रियल में शादी नहीं करना चाहती, ये भी ठीक ही है।” उसकी आंखों में थोड़ी नमी थी, लेकिन होंठों पर एक हल्की सी राहत की परछाईं भी। जैसे किसी भारी बोझ को अस्थायी ही सही, मगर कुछ देर के लिए नीचे रख दिया गया हो।

    अद्वैत की आवाज फिर कानों में पड़ी, गहरी और संयमित, “ऐसे तो मुझे एक साल का कॉन्ट्रैक्ट चाहिए तुमसे, लेकिन अगर तुम्हें कम या ज़्यादा करवाना हो तो तुम बता देना।”

    उसकी आवाज़ में एक पेशेवर ठंडक थी, पर उसके शब्दों की परतों में कहीं एक आत्म-रक्षा की दीवार भी थी… जैसे वो कुछ छुपा रहा हो, खुद से भी।

    रुहानी हल्की मुस्कराहट के साथ, पर दिल में उठते सवालों को थामे, धीरे से पूछ बैठी, “और क्या-क्या टर्म्स एंड कंडीशन्स रहेंगी इस कॉन्ट्रैक्ट में?”

    अद्वैत ने तुरंत कहा, “उतना सारा अभी कॉल पर बताना तो इम्पॉसिबल है। मैं तुम्हें सब मैसेज कर दूँगा। तुम्हें जो भी मॉडिफिकेशन करवाना हो, तो जल्द से जल्द मुझे रिप्लाई कर देना। मैं कल अपने मैनेजर से कहकर सारे डॉक्युमेंट्स बनवा लूंगा।”

    फोन की स्क्रीन से चिपकी रुहानी की उंगलियाँ कांप गईं। कोई रिश्ता यूँ कागज़ों में बंध जाए, ये सोचना भी भारी लग रहा था। लेकिन अब कुछ पूछे बिना रहा न गया। उसकी आवाज़ में एक थरथराहट थी, जैसे भीतर की सच्चाई बाहर आने को तैयार हो—“अचानक से तुम्हें कॉन्ट्रैक्ट मैरिज करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी?”

    अद्वैत ने अपनी आंखें कुछ पल के लिए बंद कीं, जैसे हर जवाब को भीतर से टटोल रहा हो। फिर धीरे-धीरे कहने लगा, “ये सब मेरी राइटिंग करियर के लिए है। नाम है मेरा, एक इमेज है… उस पर दाग नहीं लगने दे सकता। कुछ चीजें दुनिया के लिए परफेक्ट दिखानी पड़ती हैं।”

    उसकी आवाज में कोई घमंड नहीं था, बस एक थकी हुई सच्चाई थी….जैसे कोई लेखक अपने किरदार को नहीं, खुद को पर्दे के पीछे छिपा रहा हो। कुछ कहने से पहले ही अद्वैत फिर बोल पड़ा, मानो उसे डर था कि कहीं रुहानी कोई वाजिब सवाल ना पूछ ले जिससे उसका यह ताश का महल हिल जाए, “याद रहे, contract marriage की बात केवल मैं, तुम, मेरे मैनेजर और वकील को ही पता रहेगी। इसके अलावा और कोई नहीं जान पाए।”

    रुहानी के होंठों पर एक उदासी भरी हँसी खिली, जो मुस्कान से ज़्यादा एक खामोश स्वीकार था। “तुम बेफिकर रहो,” उसने कहा, और वो शब्द किसी वादे की तरह गूंजे, जैसे उसने ना सिर्फ अद्वैत की बात मानी, बल्कि खुद को भी एक दायरे में कैद कर दिया हो। 

    उस हँसी में कोई नयापन नहीं था, बस एक पुरानी थकान थी…. एक लड़की की जो रिश्तों से ज़्यादा उम्मीदें करना भूल चुकी थी, और अब हर सौदे में बस थोड़ी सी इज़्ज़त ढूंढ रही थी।

    ——–

    रुहानी ने जो ‘हाँ’ कहा, क्या वो किसी मजबूरी का फैसला था… या दिल के किसी छुपे कोने से आई सहमति?

    जब इस कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें कागज़ पर उतरेंगी… तो क्या कोई एक लाइन उनकी किस्मत की लकीर बदल देगी?

    क्या एक समझौते के तहत बंधे इस रिश्ते में सचमुच कोई प्यार, कोई इमोशन हो सकता था?

  • अधूरी इबादत भाग~16

    अधूरी इबादत भाग~16

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~16 खुद से बड़ा सवाल

     

    अद्वैत उस पुराने, हल्की रोशनी वाले कैफ़े के एक कोने की टेबल पर बैठा था, जहाँ लकड़ी की मेज़ें और दीवारों पर लगे पुराने पोस्टर अब भी बीते ज़माने की खुशबू सँजोए हुए थे।

    वो बच्चा, जो पहली बार उससे मिला था, अब उसकी ज़िंदगी की सबसे गंभीर बात कह चुका था…. शादी की, रिश्तों की, भरोसे की। यश के शब्द अब भी उसके ज़ेहन में गूंज रहे थे, और उसकी आँखें उस बालक की मासूम गंभीरता में उलझी हुई थीं, जैसे वो किसी गहरे सवाल के जवाब ढूँढ रही हों।

    “तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”

    यश ने चौंकने की बजाय बहुत सधे हुए स्वर में जवाब दिया, उसकी आँखों में कोई हिचक नहीं थी, “दीदी ने आपके बारे में जितना बताया है, उससे मुझे तो आप बहुत भले इंसान लगते हो।”

    अद्वैत ने एक पल को उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में सच में कोई छल नहीं था। मगर वो यह सुनकर और जानना चाहता था। उसकी आवाज़ में थोड़ी जिज्ञासा उभरी, “भला इंसान कैसे?”

    यश का चेहरा खिल उठा। “सबसे पहली बात,” उसने कहा, “आपने मेरी दीदी की जान बचाई है। और दूसरी, सबसे बड़ी बात – आपने कभी भी उनका फायदा नहीं उठाया, न उनके साथ कुछ ग़लत किया। आजकल तो लोग बस मौके ढूंढते हैं, लेकिन आपने… आपने उन्हें स्पेस दिया, इज़्ज़त दी… वो चीज़ जो शायद उन्हें सबसे ज़्यादा चाहिए थी।”

    अद्वैत के भीतर कुछ खामोशी से हिलने लगा। यश के मासूम शब्दों ने उसे अंदर तक छू लिया था। उसे लगा जैसे कोई उसके अंधेरे कमरे में एक छोटा सा दीया जला गया हो, बिना कोई शोर किए। उस पल में अद्वैत को एहसास हुआ कि भले ही उसने कुछ बड़ा नहीं किया हो, पर शायद… शायद उसका होना ही किसी के लिए काफी हो गया था।

    अद्वैत को अपने बारे में यश के मुँह से ये बातें सुनना कुछ अजीब सा लग रहा था। भीतर कहीं कुछ काँप गया था। जैसे कोई पुरानी धूल में ढकी हुई तस्वीर अचानक आँखों के सामने आ गई हो—अपनी माँ की वो आँखें, जिनमें उसने आखिरी बार देखा था खुद पर भरोसा। वो आँखें जो कहती थीं, “दूसरे जैसे मत बनना, अद्वैत… अपनी अच्छाई को मत छोड़ना।” आज यश के मासूम शब्दों ने उस अधूरी बात को पूरा कर दिया था।

    जिस अद्वैत अवस्थी को दुनिया अक्सर “नजायज़” कहकर किनारे कर देती थी, जिसके नाम के आगे कभी पिता का नाम नहीं जुड़ा, जिसकी परवरिश सवालों की छांव में हुई—क्या वही अद्वैत आज किसी के लिए “भला इंसान” कहलाने लायक बन गया है? क्या उसने सचमुच अपनी माँ के आदर्शों को जी लिया है, जो एक किशोर लड़के की आँखों में इतनी साफ इज्ज़त उतर आई?

    लेकिन जैसे ही उसका मन उन ख्यालों में बहने लगा, उसने खुद को एक झटका दिया। नहीं, अभी भावनाओं में बहने का समय नहीं है। उसने गहराई से यश की आँखों में देखा, फिर धीमी, मगर साफ आवाज़ में बोला, “यश, तुम्हें किसी भी तरह अपनी दीदी को कल कोर्ट लेकर आना होगा। तभी हम दोनों की शादी हो पाएगी।”

    यश कुछ कहने ही वाला था कि अद्वैत ने जल्दी से जोड़ा, “लेकिन इस बारे में सिर्फ़ तुम्हें और रूहानी को ही पता होना चाहिए। कोई तीसरा नहीं। कोई भी नहीं।”

    उसके शब्दों में कोई डर नहीं था, मगर एक जिम्मेदारी की थकान ज़रूर थी। मानो वो उस अकेले पुल पर खड़ा हो जहाँ से नीचे छलांग लगाना भी जरूरी था और टिके रहना भी। उसकी आवाज़ में स्थिरता थी, लेकिन भीतर कहीं बहुत गहराई में एक बवंडर चल रहा था…. डर, उम्मीद और एक अजीब-सी राहत का। जैसे वो किसी ऐसी डोर को थामे खड़ा था जो अगर टूटी, तो सब कुछ बिखर जाएगा, लेकिन अगर बची रही… तो शायद एक नई ज़िंदगी शुरू हो सकती थी।

    यश की बातों को सुनते हुए अद्वैत का मन कुछ झिझकता है, लेकिन उसने अपने भीतर के असमंजस को दबा दिया। “आप फिक्र मत कीजिए सर, कल मैं उन्हें शादी की शॉपिंग के नाम से ले आऊँगा,” यश का विश्वासपूर्ण स्वर सुनकर अद्वैत ने एक गहरी सांस ली। 

    फिर, जैसे किसी कांटे को उखाड़ने की कोशिश करते हुए उसने अपनी चिंता को एक बार फिर से व्यक्त किया, “लेकिन साथ में कोई और नहीं होना चाहिए, ना ही तुम्हारी माँ या तुम्हारे पापा।” अद्वैत के शब्दों में गहरी चिंता थी, जैसे उसके मन में एक अंधी सी गलती का डर पल रहा हो, जो इस फैसले को और भी कठिन बना रहा था।

    यश ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप निश्चिंत रहिए, दीदी को लेकर मैं अकेले ही आऊँगा, माँ-पापा मुझे कुछ नहीं बोलेंगे।” यश के शब्दों में एक तरह का आत्मविश्वास था, लेकिन अद्वैत के भीतर एक हल्की सी खटक महसूस हुई। यह विश्वास था या फिर एक और भ्रम, वह नहीं जानता था।

    उसके मन में एक असमंजस था, जैसे एक तट पर खड़ा कोई इंसान जो जानता है कि समुद्र की लहरें कभी भी उसे अपनी चपेट में ले सकती हैं, फिर भी वह कदम बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। उसने अपने भीतर की घबराहट को शांत किया, और फिर से अपने ध्यान को एक ही बिंदु पर केंद्रित किया। “बस, अब यहीं तक,” उसने खुद से कहा, और फिर वहां से जाने का निर्णय लिया।

    अद्वैत जैसे ही उठने वाला था, तभी उसकी नजरें रुहानी के फोन पर पड़ीं, जो अभी भी उसके हाथों में था। कुछ पल के लिए वह जैसे ठहर गया। उसकी उंगलियाँ फोन के आसपास हल्की सी घूमने लगीं, जैसे उसे इसे वापस करना न हो, बल्कि उसमें छुपे हुए किसी गहरे रिश्ते को थामे रखने की इच्छा हो।

    दिल में उथल-पुथल सी महसूस हो रही थी। वह रुहानी से जुड़ी हर बात, हर याद, उसकी आँखों के सामने जैसे सजीव हो उठी। पर फिर उसने खुद को सँभाला और यथार्थ में लौटते हुए यश को फोन वापस करते हुए कहा, “अपनी दीदी को उसका फोन दे देना।”

    यश ने उस फोन को सावधानी से अद्वैत से लिया और उसे अपने हाथों में थाम लिया, जैसे कोई बहुमूल्य चीज हो। वह खड़ा होने लगा, जाने के लिए तैयार था, तभी अद्वैत ने उसे रोकते हुए कहा, “और हाँ, रुहानी को बोल देना कि मैंने अपना नंबर इस में सेव कर लिया है और मैं उससे बात कर लूंगा।”

    यश ने सिर झुकाकर कहा, “जी जरूर, धन्यवाद,” और धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। अद्वैत ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन उसका मन अभी भी कहीं और था। उसके भीतर जैसे एक अजीब सी लहर दौड़ रही थी। उसका ध्यान अब भी उसी फोन पर था, जिसमें रुहानी की यादें और उसकी खुशबू बसी हुई थी। यश के जाते ही अद्वैत वहीं बैठा रहा, जैसे किसी उलझी हुई सोच में खो गया हो। उसके दिल में एक अजीब सी गहरी खामोशी थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था।

    ———–

    क्या अद्वैत की ज़िंदगी में अब भी कोई और आ सकता था, या फिर वह खुद ही किसी अजनबी भविष्य की ओर बढ़ रहा था?

    क्या रुहानी इस समझौते को स्वीकार करेगी, जो अद्वैत ने बिना उससे पूछे तय कर दिया है? 

    अद्वैत की उम्मीदों और रुहानी के दिल के बीच जो अनकही बातें हैं, क्या वे दोनों के सामने आने वाली राह को बदल देंगी?

  • अधूरी इबादत भाग~15

    अधूरी इबादत भाग~15

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~15 अद्वैत की सबसे बड़ी चुनौती

     

    अद्वैत सुबह की पहली रोशनी के साथ ही घर से निकल पड़ा। उसके कदम धीमे थे लेकिन मन तेज़ी से दौड़ रहा था…. जैसे हर मोड़ पर कोई अधूरी बात उसका इंतज़ार कर रही हो। 

    यश द्वारा भेजे गए पते को उसने रात भर निहारते हुए कितनी बार देखा था, अब वही पता उसे एक अजनबी सच्चाई की ओर ले जा रहा था। 

    कार चलाते हुए भी उसकी नज़रें अक्सर सड़कों से हटकर शहर की धड़कनों को पढ़ने की कोशिश करती… कोरे आसमान के नीचे फैले चाय के ठेले, जागती हुई दुकानों की नीम रोशनी और कॉलेज के बाहर खड़े युवाओं की हल्की सी चहक…. ये सब उस शहर के अपनेपन को बिखेर रहे थे, फिर भी अद्वैत के मन में कुछ अनकहा, कुछ अधूरा सा महसूस हो रहा था।

    उसने कार एक शांत गली में मोड़ी और कुछ देर बाद एक छोटे लेकिन सलीके से सजे कैफ़े के सामने आकर रुक गई। कैफ़े की बाहरी दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं, जिन पर सुबह की धूप छिटकी हुई थी। भीतर से हल्की सी जैज़ म्यूज़िक की आवाज़ आ रही थी और एक पुरानी लकड़ी की खिड़की के पार कुछ रंगीन कुर्सियाँ करीने से रखी थीं। 

    अद्वैत कुछ देर बाहर ही खड़ा रहा। उसकी आँखें हर आहट पर टिक जाती और दिल हर दरवाज़े की ओर उम्मीद से देखता। कुछ देर बाद वह वह कैफ़े में प्रवेश किया। 

    अंदर की हवा में कॉफी और वैनिला की खुशबू थी और कोनों में रखी किताबों से उठती खामोशी…. सब कुछ बेहद सुकून देने वाला था, लेकिन अद्वैत की बेचैनी उस शांति को भी चीर रही थी। उसने अपनी निगाहें चारों ओर दौड़ाईं, किसी अपरिचित लेकिन परिचित चेहरे की तलाश में।

    अद्वैत कैफ़े के कोने वाली टेबल पर बैठा था, जहाँ एक बड़ी सी खिड़की बाहर सड़क की हलचल दिखा रही थी। उसने सामने टेबल पर रूहानी का फोन रखा। उसकी उंगलियाँ बार-बार फोन के पास जाती, जैसे हर स्पर्श में कोई संकेत टटोल रही हो। 

    वह लगातार बाहर झाँकता रहा…. उसकी आँखों में किसी अजनबी की प्रतीक्षा का तनाव था। हर बार जब कोई लड़का कैफ़े के पास आता, उसका मन थोड़ी देर के लिए ठहर जाता और फिर उसी अनिश्चितता में लौट जाता। 

    कुछ ही देर में एक दुबला-पतला किशोर, स्कूल यूनिफॉर्म में, बैग लटकाए, तेज़-तेज़ कदमों से आता दिखा। उसने वही बाहर से रूहानी के फोन पर कॉल किया। अद्वैत ने फोन को देखा, और फिर खिड़की से बाहर….. दोनों की नज़रें मिली और एक सहज मुस्कान के साथ उन्होंने अपने-अपने हाथ हिलाए, जैसे किसी अनकहे बंधन को पहचान लिया हो।

    यश दरवाजा खोलते ही अद्वैत की ओर ऐसे लपका, मानो कोई छोटा भाई किसी बड़े को बहुत दिनों बाद देख रहा हो। उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन आँखों में गहरी कृतज्ञता की चमक थी। उसने बैग उतारकर एक ओर रखा और बिना देर किए अद्वैत के सामने बैठ गया। 

    वह कुछ पल तक उसे देखता रहा, फिर भर्राए गले से बोला — “सर… मैं आपको सिर्फ एक बार शुक्रिया कहना चाहता था… आपने मेरी दीदी को बचाया… वरना आज शायद हम…” उसकी आवाज़ टूटने लगी, लेकिन उसने खुद को सम्भाला, “मैं नहीं जानता आपने क्यों और कैसे किया… लेकिन मेरे लिए आप भगवान से कम नहीं।” 

    अद्वैत की आँखों में उस क्षण एक अजीब सा सन्नाटा उतर आया…. तारीफ सुनना उसे कभी सहज नहीं लगता था, खासकर तब जब वो खुद अपने किए पर संशय में हो। उसने धीमे स्वर में कहा, “मैंने कुछ ख़ास नहीं किया… बस जो सही लगा, वही किया।” 

    यश की आँखों में आँसू तैर रहे थे, मगर उन्हीं अश्रुओं की गहराई में कहीं एक विश्वास भी चमक रहा था… जैसे उसे यक़ीन हो चला हो कि उसकी दीदी की टूटी-बिखरी कहानी शायद फिर से एक मुकम्मल रूप ले सके।

    अद्वैत कुछ क्षणों तक यश को एकटक देखता रहा, जैसे उसके भीतर चल रही भावनाओं को समझना चाहता हो। कैफ़े की हल्की रोशनी में यश का चेहरा थका हुआ था, लेकिन आँखों में जो सच्चाई थी, वो अद्वैत को भीतर तक छू रही थी। 

    उसने अपनी हथेलियाँ मेज़ पर रख दीं, और थोड़ी देर की चुप्पी के बाद धीमे स्वर में पूछा, “यश… क्या तुम मुझे बता सकते हो कि रूहानी ने ऐसा कदम क्यों उठाया था?” 

    उसकी आवाज़ में जिज्ञासा से ज़्यादा दर्द था, जैसे वह उस अधूरे रहस्य के धागे को पकड़कर कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो। 

    यश ने एक गहरी साँस ली, उसके होंठ थोड़े काँपे, लेकिन उसने बोलना शुरू किया, “सर, दीदी हमेशा से थोड़ी अलग थी… कुछ साल पहले से ही वह कपड़े डिज़ाइन करने का सपना देखा करती थी, लेकिन मम्मी-पापा को यह मंज़ूर नहीं था। माँ हमेशा उसे शादी और घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाने की सलाह देती रहती थी जैसे उसकी अपनी इच्छाएँ कोई मायने नहीं रखती थीं।”

    अद्वैत ने चुपचाप यश की बातों को सुन रहा। यश ने बात आगे बढ़ाई, “फिर एक दिन कुछ हुआ। घर में एक बड़ा झगड़ा और दीदी बहुत टूट गई थी। माँ -पापा ने जब उन्हें कहा की वो उनके मर गई तब शायद उन्होंने सोचा होगा कि सब कुछ खत्म कर दे।”

    अद्वैत की आँखें धीरे-धीरे नम होने लगीं। हर एक शब्द उसे रूहानी के उस चेहरे की याद दिला रहा था जो चुप तो रहता था, पर बहुत कुछ कहता था। 

    यश ने फिर कुछ ऐसा कहा जिससे अद्वैत पर मानो बिजली गिर पड़ी हो। उसके शब्दों ने उसकी पूरी दुनिया को हिला दिया।

    यश ने गहरी चिंता में डूबकर कहा, ‘आपके यहाँ से जाने के बाद पापा ने यह ऐलान कर दिया कि वह जल्द से जल्द दीदी की शादी कर देंगे… एक ऐसे आदमी से, जो पुरानी सोच और सख्त धारणाओं में बंधा हो, और जो दीदी की स्वतंत्रता को समझ न सके। दीदी ने उन्हें मना किया, लेकिन पापा को सिर्फ नाम और इज़्ज़त की परवाह है।’ यश की आँखों से एक आँसू टपककर टेबल पर गिरा।

    यश की बातों को सुनते ही अद्वैत के मन में कई विचारों की लहरें उठने लगीं। वह सोचने लगा, अगर रूहानी की शादी सच में हो गई तो उसकी व्यक्तिगत उलझनें उसकी पेशेवर छवि को गहरा नुकसान पहुँचा सकती हैं। 

    लेखक के रूप में उसकी प्रतिष्ठा और सफलता पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। मीडिया पहले ही उसकी निजी ज़िंदगी को घेर चुका था और वह जानता था कि यदि यशस्वी से इस अनुबंधित शादी के बारे में बात नहीं की, तो उसका करियर खतरे में पड़ सकता है। उसका आत्म-सम्मान अब दबावों के नीचे दबा हुआ था और उसे सिर्फ अपनी छवि की चिंता सता रही थी।

    लेकिन अगले ही पल, यश की बातों से अद्वैत को राहत मिली। उसने महसूस किया कि यश की मासूमियत और उसके विश्वास में एक गहरी पीड़ा छिपी थी, जो उसकी दीदी को बचाने की आखिरी उम्मीद थी। 

    थोड़ी देर रुककर उसने सीधा अद्वैत की आँखों में देखा और बोला, “सर… इसीलिए मैं आपसे मिलना चाहता था। मैं जानता हूँ कि आप दीदी के लिए अजनबी हैं, लेकिन फिर भी… आपने उन्हें ज़िंदगी दी है। और अगर… अगर आप उनसे शादी कर लें… तो शायद दीदी की शादी के लिए पापा जबरदस्ती नहीं कर पाएंगे।” 

    यश के शब्दों में एक मासूम सी ज़िद थी, एक छोटे भाई की उम्मीद, जिसने अपनी बहन को खोते-खोते बचाया था… और अब उसे फिर से टूटने नहीं देना चाहता था। अद्वैत बस चुप था, जैसे शब्द कहीं खो गए हों और दिल एक अनकहे बोझ से भर गया हो।

    अद्वैत ने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन वो मुस्कान पूरी नहीं हो सकी और उसने बहुत संयम से यश की ओर देखा। 

    “तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”

    ————

    क्या अद्वैत इस घने उलझन के बीच अपनी पहचान और करियर को खतरे में डालने को तैयार था?

    अद्वैत के दिल में एक सवाल गूंजा… क्या यह सच में सिर्फ एक रास्ता था, या फिर यह एक ऐसा चक्र था जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं था?

    उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी चुनौती अब इस ए:क सवाल पर टिकी थी – क्या वह खुद को उस रिश्ते में बँधने दे सकता था?

     

  • हम भी जाएंगे देवघर

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    वैद्यनाथ, जिसे देवघर, बाबा धाम भी कहा जाता है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह झारखंड में स्थित है।

     

    यह शिव जी की पूजा का प्रमुख धाम है। सावन के महीने में लाखों लोग यहाँ आते हैं। कहा जाता है कि यहाँ माता सती का हृदय गिरा था। जब माता सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में गईं और वहाँ शिव जी का अपमान सहन नहीं कर सकीं, तब उन्होंने उसी अग्निकुंड में आत्मदाह कर लिया। जब भगवान शिव माता सती के शरीर को कंधे पर रखकर तांडव करने लगे, तब उनका हृदय यहाँ आकर गिरा। इसलिए यह 108 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

     

    कहा जाता है कि जब रावण ने कठोर तपस्या कर अपने एक-एक सिर भगवान शिव को अर्पित किए और अंतिम सिर भी चढ़ाने वाले थे, तब भगवान शिव प्रकट हुए। रावण ने उनसे प्रार्थना की कि वे उसके साथ लंका चलें। शिव जी शिवलिंग के रूप में उसके साथ चलने को तैयार हो गए, लेकिन एक शर्त रखी कि जहाँ भी वह शिवलिंग को धरती पर रख देगा, वहीं वह स्थापित हो जाएगा।

     

    देवताओं ने शिव जी को लंका जाने से रोकने के लिए झारखंड में रावण से छल कराया और शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। उसी स्थान पर माता सती का हृदय भी गिरा था। तभी से इस स्थान का नाम वैद्यनाथ धाम पड़ा।

     

    इसी वैद्यनाथ मंदिर में सावन के महीने में लाखों भक्त बाबा के दर्शन करने और गंगाजल चढ़ाने के लिए आते हैं।

     

    उन्हीं भक्तों में एक दंपति था—अमर और पूजा। वे पिछले 12 वर्षों से हर साल लगभग 200 किलोमीटर पैदल चलकर बाबा के दर्शन करने आते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने प्रण लिया था कि या तो बाबा उन्हें संतान देंगे, या फिर वे जीवन भर हर साल इसी तरह बाबा के दर्शन करने आते रहेंगे।

     

    दोनों के पैरों में छाले पड़ जाते थे, फिर भी वे कभी नहीं रुकते थे। पूरे रास्ते वे कुछ खाते-पीते नहीं थे। बस एक ही नारा लगाते हुए चलते रहते—

     

    “बोलबम का नारा है, बाबा एक सहारा है।”

     

    घर से निकलने से लेकर घर लौटने तक उनके होंठों पर बस यही जयकारा रहता था।

     

    लोग कहते थे, “अगर कोई दे सकता है, तो केवल भोले बाबा ही दे सकते हैं। उनसे बड़ा दयालु कोई नहीं।”

     

    समय बीतता गया। एक दिन पूजा की गोद भर गई। अमर और पूजा इसे भोले बाबा का आशीर्वाद मानने लगे। आखिर बाबा ने उनकी पुकार सुन ली थी।

     

    इस वर्ष भी सावन का महीना आया, लेकिन इस बार पूजा आठ महीने की गर्भवती थी। डॉक्टर ने उसे कहीं भी यात्रा करने से मना किया था। घर के सभी लोग भी यही चाहते थे कि इस बार पूजा देवघर न जाए और अमर अकेले ही बाबा के दर्शन कर आए।

     

    अमर ने भी प्यार से कहा,

     

    “पूजा, इस बार तुम मत चलो। तुम्हारी और हमारे बच्चे की सुरक्षा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।”

     

    लेकिन पूजा मुस्कुराकर बोली,

     

    “जब मेरे पास कुछ नहीं था, तब भी मैं बाबा के दर्शन के लिए जाती थी। आज जब भोले बाबा ने हमें यह अनमोल खुशी दी है, तो मैं उनके दर्शन किए बिना कैसे रह सकती हूँ? बारह साल तक उन्होंने हमारा साथ नहीं छोड़ा, तो अब मैं भी उनका साथ नहीं छोड़ूँगी। हम दोनों साथ चलेंगे।”

     

    आखिरकार अमर उसकी जिद के आगे हार गया।

     

    सावन के पहले सोमवार के दर्शन के लिए दोनों शुक्रवार को ही घर से निकल पड़े। रास्ते भर “बोलबम का नारा है, बाबा एक सहारा है” का जयघोष करते हुए वे पैदल चलते रहे।

     

    पूजा अपने पेट पर हाथ रखकर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रही थी और अमर हर पल उसका सहारा बना हुआ था। जब भी पूजा थक जाती, अमर उसे कुछ देर बैठाकर आराम कराता, लेकिन खुद कभी नहीं बैठता। उसकी बस एक ही चिंता थी कि पूजा सुरक्षित बाबा धाम पहुँच जाए।

     

    आधे रास्ते तक सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन अचानक पूजा के पेट में तेज दर्द होने लगा। दर्द इतना बढ़ गया कि वह सड़क किनारे बैठ गई। अमर घबरा गया। आसपास चल रही कुछ महिला कांवरियों ने तुरंत दौड़कर पूजा को संभाला।

     

    एक महिला ने पूजा की हालत देखकर कहा,

     

    “लगता है बच्चे का जन्म होने वाला है। इसे तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।”

     

    लेकिन पूजा दर्द से कराहते हुए बोली,

     

    “नहीं… मैं बाबा के दर्शन किए बिना कहीं नहीं जाऊँगी। चाहे कुछ भी हो जाए।”

     

    सबने उसे बहुत समझाया, पर वह नहीं मानी। आखिर सभी महिलाओं ने वहीं उसकी मदद करने का फैसला किया।

     

    अमर बाहर बेचैन होकर इधर-उधर टहल रहा था। उसके हाथ जुड़े हुए थे और आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    वह बार-बार बाबा से प्रार्थना कर रहा था,

     

    “भोलेनाथ! आज तक कभी खाली हाथ नहीं लौटाया। मेरी पूजा और मेरे बच्चे की रक्षा करना।”

     

    कुछ ही देर बाद बच्चे की किलकारी गूँज उठी।

     

    महिलाएँ मुस्कुराते हुए बाहर आईं और बोलीं,

     

    “बधाई हो… बेटा हुआ है।”

     

    यह सुनते ही अमर की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उसने दोनों हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा और बोला,

     

    “हर-हर महादेव! बाबा, आपने हमारी लाज रख ली।”

     

    थोड़ी देर आराम करने के बाद पूजा ने अपने नवजात बेटे को गोद में उठाया और दोनों फिर बाबा धाम की ओर चल पड़े।

     

    सोमवार की सुबह वे वैद्यनाथ धाम पहुँच गए। बाबा के दर्शन किए, गंगाजल अर्पित किया और अपने बेटे को भगवान शिव के चरणों में लिटा दिया।

     

    दोनों ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोले बाबा! यह आपका दिया हुआ प्रसाद है। इसकी रक्षा करना।”

     

    उन्होंने अपने बेटे का नाम शिवशंकर रखा।

     

    जिस बाबा से उन्होंने बारह वर्षों तक संतान माँगी थी, उसी बाबा ने उनकी झोली भर दी थी। उनकी श्रद्धा और विश्वास सफल हो गया।

     

    लक्ष्मी कुमारी

  • बचपन जो लौट कर नहीं आया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बचपन जो लौटकर कभी नहीं आया 

     

    “मम्मी… मुझे भी स्कूल जाना है…”

     

    तेरह साल की राधा अपने आठ महीने के बेटे को गोद में लेकर घर के बाहर बने छोटे से आँगन में बैठी थी। सामने वाली सड़क से स्कूल की वर्दी पहने बच्चे हँसते-मुस्कुराते जा रहे थे। किसी के हाथ में किताबें थीं, किसी के कंधे पर भारी बस्ता था, तो कोई अपने दोस्तों के साथ शरारत करते हुए आगे बढ़ रहा था।

     

    राधा की नज़रें उन बच्चों पर ही टिक गईं। उसकी आँखों में आँसू आ गए। कभी वह भी उन्हीं बच्चों की तरह स्कूल जाया करती थी। उसे हिंदी की कहानियाँ पढ़ना और चित्र बनाना बहुत पसंद था। वह अक्सर अपनी माँ से कहती थी, “मैं बड़ी होकर टीचर बनूँगी।”

     

    लेकिन किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही लिख रखा था।

     

    राधा सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसी स्कूल में रोहित नाम का एक लड़का भी पढ़ता था। उसकी उम्र तेईस साल थी। कई बार फेल होने के कारण वह अब भी स्कूल आता था। शुरुआत में वह राधा से सामान्य बातें करता, उसकी कॉपी उठाकर दे देता और कभी-कभी टॉफी या चॉकलेट भी दे देता।

     

    राधा मासूम थी। उसे समझ नहीं था कि एक बड़े लड़के का इस तरह उसके करीब आना ठीक नहीं है।

     

    धीरे-धीरे रोहित ने उसे यह विश्वास दिला दिया कि वही उससे सबसे ज़्यादा प्यार करता है। वह कहता, “मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूँगा। कोई तुम्हें डाँटेगा नहीं। बस एक बार मेरे साथ चलो।”

     

    राधा ने बिना कुछ समझे उसकी बातों पर भरोसा कर लिया।

     

    एक दिन वह घर से उसके साथ चली गई। दोनों ने कुछ लोगों की मौजूदगी में शादी जैसा एक दिखावा कर लिया। किसी ने यह नहीं सोचा कि राधा अभी सिर्फ तेरह साल की बच्ची है। उसके हाथों में अभी किताबें होनी चाहिए थीं, घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ नहीं।

     

    कुछ महीनों बाद राधा को पता चला कि वह गर्भवती है।

     

    यह खबर सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है। उसका शरीर अभी पूरी तरह विकसित भी नहीं हुआ था। गर्भावस्था उसके लिए बेहद कठिन रही। उसे बार-बार कमजोरी, चक्कर और तेज़ बुखार आने लगा। कई बार डॉक्टरों के पास ले जाना पड़ा।

     

    आख़िरकार उसने एक बेटे को जन्म दिया।

     

    सब लोग बच्चे को देखकर खुश थे, लेकिन किसी ने उस छोटी बच्ची के चेहरे की थकान नहीं देखी, जिसने अपना बचपन खो दिया था।

     

    आज उसका बेटा आठ महीने का हो चुका था।

     

    रात में जब बच्चा रोता, तो राधा भी उसके साथ रो पड़ती। कई बार उसे खुद तेज़ बुखार होता, फिर भी वह बेटे को सीने से लगाए रखती। उसे समझ नहीं आता कि पहले बच्चे को संभाले या खुद को।

     

    रोहित भी अब पहले जैसा नहीं रहा था। शादी से पहले जो हर वक्त प्यार और साथ निभाने की बातें करता था, वही अब छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगा था। काम ठीक से नहीं चलता था, पैसों की तंगी रहती थी और घर में रोज़ झगड़े होने लगे थे।

     

    एक दिन राधा ने हिम्मत करके कहा, “क्या मैं फिर से स्कूल जा सकती हूँ?”

     

    रोहित ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया, “अब स्कूल जाकर क्या करोगी? अब तुम एक बच्चे की माँ हो।”

     

    ये शब्द सुनकर राधा का दिल टूट गया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने बहुत छोटी उम्र में ऐसा फैसला लिया था, जिसकी कीमत उसे पूरी जिंदगी चुकानी पड़ सकती है।

     

    उस रात वह देर तक जागती रही। बेटा उसकी गोद में सो रहा था और उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। उसे अपनी पुरानी किताबें, अपनी सहेलियाँ, स्कूल का मैदान और अपने अधूरे सपने याद आने लगे।अगले भाग में कहानी आगे बढ़ेगी, जहाँ राधा की ज़िंदगी में एक नया मोड़ आएगा और वह अपने बेटे के भविष्य के लिए एक बड़ा फैसला लेगी।

     

    अगली सुबह राधा अपने बेटे को गोद में लेकर चुपचाप बैठी थी। तभी उसके गाँव में रहने वाली उसकी पुरानी स्कूल टीचर, सीमा मैडम, किसी काम से वहाँ आईं। उनकी नज़र जैसे ही राधा पर पड़ी, वे उसे पहचान ही नहीं पाईं।

    “राधा… तुम?”

    राधा ने सिर झुका लिया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। सीमा मैडम ने जब उसकी गोद में छोटा-सा बच्चा देखा तो वे सब समझ गईं। उन्होंने राधा का हाथ पकड़ लिया और पास बैठ गईं।

     

    “बेटी, तुम्हारे साथ जो हुआ, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन तुम्हारा भविष्य अभी भी खत्म नहीं हुआ है।”

     

    राधा फूट-फूटकर रो पड़ी।

     

    “मैडम… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मुझे लगा था कि प्यार ही सब कुछ होता है। मुझे नहीं पता था कि मेरी पूरी जिंदगी बदल जाएगी।”

     

    सीमा मैडम ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा, “गलती से सीखना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है। तुम अभी भी पढ़ सकती हो।”

     

    उनकी बातें राधा के दिल में उतर गईं।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में बच्चों की शिक्षा और बाल विवाह के प्रति जागरूकता का एक शिविर लगा। राधा भी अपने बेटे को लेकर वहाँ पहुँची। मंच पर एक अधिकारी कह रहे थे, “हर बच्चे को बचपन, शिक्षा और सुरक्षित भविष्य का अधिकार है। कम उम्र में शादी और गर्भावस्था बच्चों के जीवन पर गहरा असर डाल सकती है।”

     

    ये शब्द सुनकर राधा की आँखें भर आईं। उसे अपनी पुरानी कक्षा, ब्लैकबोर्ड, सहेलियाँ और स्कूल की घंटी याद आने लगी। उसने महसूस किया कि उसने जिस उम्र में सपने देखने थे, उस उम्र में जिम्मेदारियों का बोझ उठा लिया।

     

    शिविर के बाद सीमा मैडम फिर उससे मिलीं। उन्होंने कहा, “राधा, अगर तुम चाहो तो घर से पढ़ाई शुरू कर सकती हो। मैं तुम्हारी मदद करूँगी।”

     

    उस दिन राधा ने पहली बार उम्मीद की एक किरण महसूस की।

     

    उसने अपनी पुरानी किताबें निकालीं। जब उसका बेटा सो जाता, वह पढ़ने बैठ जाती। कभी-कभी थकान से उसकी आँखें बंद होने लगतीं, लेकिन फिर वह अपने सपने याद करके दोबारा किताब खोल लेती।

     

    धीरे-धीरे उसके माता-पिता का भी दिल पिघलने लगा। उन्होंने महसूस किया कि उनकी बेटी अभी खुद भी बच्ची है। वे समय-समय पर उसके बेटे को संभाल लेते ताकि राधा कुछ घंटे पढ़ सके।

     

    एक दिन राधा अपने बेटे को गोद में लेकर आईने के सामने खड़ी थी। उसने मुस्कुराकर कहा, “मैंने अपना बचपन खो दिया, लेकिन तुम्हारा कभी नहीं खोने दूँगी।”

     

    उसने तय कर लिया कि उसका बेटा सही उम्र में स्कूल जाएगा, खूब पढ़ेगा और अपने जीवन के फैसले समझदारी से लेगा।

     

    समय बीतता गया। राधा ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू कर दी। रास्ता आसान नहीं था। घर के काम, बच्चे की देखभाल और पढ़ाई—सब कुछ साथ संभालना पड़ता था। कई बार लोग ताने भी मारते, “अब पढ़कर क्या करेगी?”

     

    लेकिन इस बार राधा चुप नहीं रहती। वह मुस्कुराकर कहती, “पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती।”

     

    उसकी यही बात धीरे-धीरे दूसरी लड़कियों के लिए भी हिम्मत बन गई। गाँव की कई बच्चियाँ, जो पढ़ाई छोड़ने वाली थीं, उन्होंने अपने माता-पिता से पढ़ने की जिद की।

     

    कुछ साल बाद वही राधा एक कार्यक्रम में बच्चों और अभिभावकों के सामने खड़ी थी। उसने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा,

     

    “एक गलत फैसला मेरा बचपन छीन ले गया। लेकिन मैंने ठान लिया कि मेरी गलती किसी और बच्ची की किस्मत नहीं बनेगी। हर बेटी को पढ़ने का अधिकार है और हर बच्चे को अपना बचपन जीने का हक है।”

     

    तालियों की गूँज पूरे हॉल में फैल गई।

     

    राधा ने अपने बेटे की ओर देखा। वह मुस्कुराते हुए अपनी किताब हाथ में पकड़े बैठा था।

     

    राधा की आँखें नम थीं, लेकिन इस बार उन आँसुओं में दर्द नहीं, बल्कि सुकून था। उसे विश्वास था कि भले ही उसका बचपन लौटकर कभी नहीं आया, लेकिन उसने अपने बेटे और कई दूसरी बच्चियों का भविष्य ज़रूर बदल दिया।