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  • दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

    दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

                          दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

     

     वो जो दूर रहकर भी मेरे पास सदा रहता है,

    हर लम्हा मेरे हिस्से में खुशियां ही आएं

    ऐसी दुआ करता है, ऐसा ही एक अनमोल

    रिश्ता दोस्ती के रूप में मैंने संजो रखा है ,

    रोज छोटी छोटी बातों में मुझसे लड़ पड़ता है, मेरे साथ बिना बोले जिसका दिन नहीं कटता है,

    हां! ऐसे ही एक शख्स को अपना

    दोस्त मैंने बना रखा है , मेरी जिंदगी में

    शामिल हुआ है वह ऐसे जैसे धड़कन

    बनकर बस गया है मुझमें,

    ना जाने कितने आए और साथ निभाने

    का वादा करके निकल गये,

    बस ये एक बिना किसी कारण और

    वादों के मेरे साथ ठहरा है ,

    “दोस्ती ” ये उससे मैंने जानी है 

    सब रिश्ते में सबसे खूबसूरत रिश्ता 

    दोस्ती का है, जो उसने मुझे समझा दिया है ….

  • काश मैं अब भी तुम्हारे करीब होती

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “कुछ गलतियाँ इंसान की ज़िंदगी बदल देती हैं… और कुछ गलतियाँ पूरी ज़िंदगी पछतावा बनकर साथ चलती हैं।”

     

    रिया और आरव एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। दोनों की मुलाकात कॉलेज में हुई थी। धीरे-धीरे दोस्ती हुई और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई। आरव रिया का बहुत ख्याल रखता था। वह हर छोटी-बड़ी खुशी में उसके साथ खड़ा रहता। रिया की तबीयत खराब हो जाए तो पूरी रात जागकर उसकी चिंता करता। उसके जन्मदिन पर अपने हाथों से छोटा-सा गिफ्ट बनाता, क्योंकि उसके पास ज़्यादा पैसे नहीं थे।

     

    रिया भी उससे बहुत प्यार करती थी, लेकिन उसके दिल में एक कमी थी। उसे हमेशा लगता था कि आरव बहुत सीधा-सादा है। उसके पास न महंगी बाइक थी, न स्टाइलिश कपड़े और न ही बड़ा बैंक बैलेंस। धीरे-धीरे उसने दूसरों की बातों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। उसकी कुछ सहेलियाँ भी उसे समझातीं कि प्यार से ज़िंदगी नहीं चलती, पैसे भी ज़रूरी होते हैं। यही बातें धीरे-धीरे उसके मन में घर करने लगीं और उसने आरव के सच्चे प्यार से ज़्यादा बाहरी चमक-दमक को महत्व देना शुरू कर दिया।

     

    एक दिन कॉलेज में कबीर नाम का लड़का आया। अमीर परिवार से था, महंगी कार में आता था, हर समय दोस्तों से घिरा रहता था। उसकी बातें सुनकर रिया धीरे-धीरे उसकी तरफ आकर्षित होने लगी।

     

    आरव को यह बदलाव महसूस होने लगा।

     

    “रिया, सब ठीक है ना? तुम पहले जैसी नहीं रहीं।”

     

    रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “कुछ नहीं… बस पढ़ाई का प्रेशर है।”

     

    लेकिन सच कुछ और था।

     

    अब वह आरव के मैसेज देर से पढ़ती, कॉल उठाने से बचती और हर समय कबीर के साथ दिखाई देती। आरव हर दिन खुद को समझाता कि शायद रिया किसी परेशानी में होगी, लेकिन उसके दिल को हर पल यही डर सताता था कि कहीं वह उसे खो न दे।

     

    एक शाम आरव ने उसे पार्क में बुलाया।

     

    “रिया… अगर मुझसे कोई गलती हुई है तो बता दो। मैं खुद को बदल लूंगा, लेकिन यूँ दूर मत जाओ।”

     

    रिया ने बिना उसकी आँखों में देखे कहा,

     

    “आरव… हमें यहीं सब खत्म कर देना चाहिए।”

     

    यह सुनते ही आरव जैसे अंदर से टूट गया।

     

    “क्या… इतना आसान था तुम्हारे लिए?”

     

    रिया बोली,

     

    “हम दोनों एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं।”

     

    असल वजह उसने नहीं बताई कि वह कबीर के साथ रहना चाहती है।

     

    आरव की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा,

     

    “अगर यही तुम्हारी खुशी है… तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं। बस खुश रहना।”

     

    उस दिन के बाद दोनों की राहें अलग हो गईं।

     

    कुछ ही दिनों में रिया और कबीर साथ घूमने लगे। महंगे रेस्टोरेंट, लंबी ड्राइव, बड़े-बड़े गिफ्ट… रिया को लगा कि उसने सही फैसला लिया है। उसे लगता था कि अब उसकी हर ख्वाहिश पूरी होगी और यही उसकी नई दुनिया है।

     

    लेकिन कहते हैं, जो रिश्ता दिखावे पर शुरू होता है, वह ज़्यादा दिन नहीं चलता।

     

    धीरे-धीरे कबीर का व्यवहार बदलने लगा। वह घंटों तक रिया के मैसेज का जवाब नहीं देता। मिलने के बहाने टाल देता। पहले जो हर समय उसके साथ रहने की बातें करता था, अब वही उससे दूरी बनाने लगा।

     

    एक दिन रिया ने देखा कि कबीर किसी दूसरी लड़की के साथ हाथ पकड़कर घूम रहा है।

     

    रिया उसके सामने जाकर खड़ी हो गई।

     

    “कबीर… ये सब क्या है?”

     

    कबीर ने बेपरवाही से कहा,

     

    “रिया, प्लीज़ ड्रामा मत करो। मुझे अब तुम्हारे साथ नहीं रहना।”

     

    रिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    “लेकिन… तुमने तो कहा था कि तुम मुझसे प्यार करते हो।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “मैंने ऐसा कई लड़कियों से कहा है। तुम भी उनमें से एक थीं।”

     

    इतना कहकर वह दूसरी लड़की का हाथ पकड़कर चला गया।

     

    रिया वहीं सड़क किनारे बैठकर फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने किस इंसान को खो दिया।

     

    उस रात उसने मोबाइल खोला।

     

    आरव की पुरानी तस्वीरें…

     

    पुराने मैसेज…

     

    उसकी भेजी हुई शुभ रात्रि की बातें…

     

    जन्मदिन की शुभकामनाएँ…

     

    सब कुछ पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भर आईं।

     

    एक मैसेज पर उसकी नज़र रुक गई।

     

    “अगर कभी पूरी दुनिया भी तुम्हारा साथ छोड़ दे… तब भी मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”

     

    रिया ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

     

    “मैंने ही तो उस इंसान का साथ छोड़ दिया था…”

     

    अब उसे समझ आया कि सच्चा प्यार महंगे गिफ्ट या बड़ी कार से नहीं, बल्कि परवाह और भरोसे से बनता है।

     

    अगले दिन वह हिम्मत करके आरव के घर पहुँची।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    सामने आरव था।

     

    वह पहले जैसा ही शांत था, लेकिन उसकी आँखों की चमक कहीं खो चुकी थी।

     

    रिया रोते हुए बोली,

     

    “आरव… मुझे माफ़ कर दो। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। मैंने तुम्हारे प्यार की कद्र नहीं की। अगर हो सके तो मुझे एक मौका और दे दो।”

     

    कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने धीमी आवाज़ में कहा,

     

    “रिया… मैंने तुम्हें दिल से चाहा था। जब तुम गई थीं, उस दिन सिर्फ रिश्ता नहीं टूटा था… मैं भी टूट गया था। कई रातें बिना सोए गुज़ारी हैं मैंने। हर त्योहार, हर खुशी अधूरी लगती थी। लेकिन समय ने मुझे जीना सिखा दिया।”

     

    रिया की सिसकियाँ और तेज़ हो गईं।

     

    “मुझे हर दिन पछतावा होता है। काश… मैं तुम्हें कभी छोड़कर न जाती।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने तुम्हें बहुत पहले माफ़ कर दिया था… क्योंकि प्यार में नफरत करना मैंने सीखा ही नहीं। लेकिन कुछ टूटे हुए रिश्ते फिर जुड़ तो जाते हैं, मगर उनमें पहले जैसा भरोसा कभी वापस नहीं आता।”

     

    रिया समझ गई कि अब बहुत देर हो चुकी है।

     

    उसने आखिरी बार आरव को देखा और भारी कदमों से वहाँ से चली गई।

     

    कई साल बीत गए।

     

    एक दिन बारिश हो रही थी।

     

    रिया बस स्टॉप पर अकेली खड़ी थी। सामने सड़क के उस पार आरव अपनी पत्नी और छोटी-सी बेटी के साथ हँसते हुए चल रहा था।

     

    उसकी बेटी ने दौड़कर आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    आरव मुस्कुराकर उसे गोद में उठा लिया।

     

    वह दृश्य देखकर रिया की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उसने आसमान की तरफ देखा और खुद से कहा,

     

    “जिस इंसान ने मुझे सबसे ज़्यादा प्यार किया… मैंने उसी का दिल तोड़ दिया। आज उसके पास उसकी खुशियाँ हैं, और मेरे पास सिर्फ मेरी गलती की यादें।”

     

    बारिश की बूँदें उसके आँसुओं में मिल गईं।

     

    वह धीरे से मुस्कुराई, लेकिन उस मुस्कान में दर्द छिपा था।

     

    उसके होंठों से बस एक ही बात निकली—

     

    “काश… मैं अब भी तुम्हारे करीब होती।

  • नन्ही कोमल की अधूरी विदाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नन्ही कोमल की अधूरी विदाई

     

    राजस्थान के एक छोटे से गांव में वर्षों से एक ऐसी परंपरा चली आ रही थी, जिसे वहां के लोग अपनी शान और संस्कृति का हिस्सा मानते थे। सिर्फ वही गांव नहीं, बल्कि उसके आसपास के सभी गांवों में भी बचपन में ही बच्चों की शादी कर दी जाती थी। चार-पाँच साल के बच्चों का रिश्ता तय कर दिया जाता और आठ-दस साल की उम्र तक उनकी शादी भी कर दी जाती। गांव वालों का मानना था कि जल्दी शादी करने से परिवार की इज्जत बनी रहती है और बड़े होकर बच्चे कोई गलती नहीं करते।

    इसी बीच सरकार की ओर से गांव के प्राथमिक विद्यालय में नए शिक्षक राघव का तबादला हो गया। राघव अपनी पत्नी सीमा और अपनी पाँच साल की प्यारी बेटी कोमल के साथ उस गांव में रहने आ गए।

    कोमल बहुत ही मासूम और चंचल बच्ची थी। कभी गुड़ियों से खेलती, कभी तितलियों के पीछे भागती और कभी अपने पापा के स्कूल में जाकर बच्चों के साथ बैठ जाती। उसे दुनिया की किसी भी परंपरा या रीति-रिवाज की कोई समझ नहीं थी।

    गांव में उनके आने की खबर फैलते ही कई लोग उनसे मिलने पहुंचे।

    एक बुजुर्ग मुस्कुराते हुए बोले, “मास्टर जी, सुना है आपकी एक बेटी भी है?”

     

    राघव ने हँसते हुए कहा, “हाँ, पाँच साल की है।”

    दूसरे बुजुर्ग ने कहा, “तो फिर उसकी शादी की बात भी शुरू कर दीजिए। हमारे यहां लड़कियों की शादी बचपन में ही कर दी जाती है। बड़े होकर बच्चे अपने मन की करने लगते हैं।”

     

    राघव ने विनम्रता से जवाब दिया, “अभी तो उसे ठीक से लिखना-पढ़ना भी नहीं आता। उसकी शादी की बात करना तो बहुत दूर की बात है।”

     

    बुजुर्गों ने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले, “मास्टर जी, यहां का यही रिवाज है।”

     

    राघव मुस्कुरा तो दिए, लेकिन उनके मन में चिंता घर कर गई।

     

    अगले दिन जब वे स्कूल पहुंचे तो उन्हें एक अजीब बात दिखाई दी। स्कूल में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी। कई बच्चियों के नाम रजिस्टर में दर्ज थे, लेकिन वे महीनों से स्कूल नहीं आई थीं।

     

    उन्होंने एक बच्चे से पूछा, “रीना स्कूल क्यों नहीं आती?”

     

    बच्चे ने सहजता से कहा, “सर, उसकी शादी हो गई। अब ससुराल वाले पढ़ने नहीं भेजते।”

     

    यह सुनकर राघव का दिल बैठ गया।

     

    शाम को कोमल घर के बाहर मिट्टी में खेल रही थी। तभी लगभग दस साल की एक लड़की वहां आई। उसकी मांग में सिंदूर था और गले में मंगलसूत्र।

     

    कोमल ने मासूमियत से पूछा, “दीदी, आपने ये लाल-लाल क्या लगाया है?”

     

    लड़की ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “मेरी शादी हो गई है।”

     

    कोमल खुश होकर बोली, “शादी में तो बहुत सारी मिठाइयाँ मिलती होंगी ना?”

     

    लड़की की आंखें भर आईं। उसने बस सिर हिला दिया और वहां से चली गई।

     

    राघव दूर खड़े यह सब देख रहे थे। उन्हें उस बच्ची की आंखों में छिपा दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

     

    कुछ दिनों बाद गांव की पंचायत बुलाई गई।

     

    सरपंच ने कहा, “मास्टर जी, गांव वाले चाहते हैं कि आपकी बेटी का रिश्ता भी तय कर दिया जाए। इससे गांव की परंपरा बनी रहेगी।”

     

    राघव अपनी जगह से उठे और पूरे आत्मविश्वास के साथ बोले,

     

    “मेरी बेटी कोई बोझ नहीं है जिसे जल्दी विदा कर दूँ। वह पढ़ेगी, अपने सपने पूरे करेगी और जब समझदार होगी, तभी अपनी जिंदगी का फैसला खुद करेगी।”

     

    यह सुनकर पंचायत में सन्नाटा छा गया।

     

    कुछ लोगों को उनकी बात पसंद नहीं आई। धीरे-धीरे गांव वालों ने उनके परिवार का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। कोई दूध नहीं देता, कोई सब्जी नहीं बेचता और कई लोग उनसे बात तक नहीं करते।

     

    सीमा परेशान हो गईं। उन्होंने एक दिन कहा, “इतनी परेशानी हो रही है। अगर हम झुक जाएँ तो शायद सब ठीक हो जाए।”

     

    राघव ने शांत स्वर में कहा, “अगर आज हम डर गए, तो कल हमारी बेटी का बचपन भी छिन जाएगा।”

     

    कुछ ही दिनों बाद गांव में एक दुखद घटना हुई। बारह साल की पूजा, जिसकी शादी बचपन में हो गई थी, अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। उसे शहर के अस्पताल ले जाया गया।

     

    डॉक्टर ने गांव वालों से कहा, “बच्चों पर समय से पहले जिम्मेदारियाँ डालना उनके शरीर और मन दोनों के लिए नुकसानदायक है। इन्हें खेलने, पढ़ने और आगे बढ़ने का अधिकार है।”

     

    डॉक्टर की बातें कई लोगों के दिल को छू गईं।

     

    राघव ने उसी समय स्कूल में एक जागरूकता कार्यक्रम रखा। डॉक्टर, पुलिस अधिकारी और बाल विकास विभाग के कर्मचारी भी आए। उन्होंने गांव वालों को बताया कि बाल विवाह सिर्फ एक पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि कानूनन अपराध भी है। इससे बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, उनका भविष्य अंधकार में चला जाता है और उनका बचपन उनसे छिन जाता है।

     

    गांव वाले अब भी चुपचाप बैठे थे।

     

    तभी छोटी-सी कोमल अपनी कॉपी हाथ में लेकर मंच पर पहुंची।

     

    उसने मासूम आवाज में कहा,

     

    “मेरे पापा कहते हैं कि मैं बड़ी होकर डॉक्टर बन सकती हूँ… टीचर बन सकती हूँ… पुलिस बन सकती हूँ… या फिर जो चाहूँ, वो बन सकती हूँ। लेकिन अगर मेरी अभी शादी कर दी गई… तो क्या मैं अपने सपने पूरे कर पाऊँगी?”

     

    पूरा मैदान बिल्कुल शांत हो गया।

     

    किसी के पास उस पाँच साल की बच्ची के सवाल का जवाब नहीं था।

     

    उसी समय वह दस साल की शादीशुदा लड़की रोते हुए उठी और बोली,

     

    “काश… मुझे भी पढ़ने दिया होता। आज मैं भी अपने सपने पूरे कर रही होती।”

     

    उसकी बात सुनकर कई महिलाओं की आँखें भर आईं।

     

    सरपंच धीरे-धीरे खड़े हुए। उन्होंने गांव वालों की ओर देखा और कहा,

     

    “हमने हमेशा यही समझा कि हम सही कर रहे हैं, लेकिन आज एहसास हुआ कि हम अपने ही बच्चों से उनका बचपन छीन रहे थे।”

     

    उन्होंने ऊँची आवाज में घोषणा की,

     

    “आज से इस गांव और आसपास के किसी भी गांव में कोई भी बाल विवाह नहीं होगा। जो भी ऐसा करेगा, पंचायत उसका साथ नहीं देगी, बल्कि कानून का साथ देगी।”

     

    पूरा गांव तालियों की गूंज से भर उठा।

     

    कुछ महीनों बाद गांव पूरी तरह बदल चुका था। जहां पहले छोटी-छोटी बच्चियों के रिश्ते तय होते थे, वहां अब उनके स्कूल में दाखिले करवाए जाने लगे। माता-पिता अपनी बेटियों को गर्व से पढ़ने भेजने लगे।

     

    वही दस साल की लड़की भी दोबारा स्कूल आने लगी। उसके चेहरे पर अब उदासी नहीं, बल्कि नई उम्मीद दिखाई देती थी।

     

    कोमल भी हर सुबह अपने बैग के साथ खुशी-खुशी स्कूल जाती। उसकी मुस्कान देखकर राघव और सीमा की आँखों में सुकून झलकने लगता।

     

    एक दिन स्कूल से लौटते समय कोमल ने अपने पापा का हाथ पकड़कर पूछा,

     

    “पापा… मेरी शादी कब होगी?”

     

    राघव मुस्कुराए, उसे गोद में उठाया और प्यार से बोले,

     

    “जब मेरी बेटी अपने सारे सपने पूरे कर लेगी, अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी और अपनी जिंदगी का फैसला खुद करने लायक बन जाएगी… तभी उसकी शादी होगी।”

     

    कोमल खिलखिलाकर हँस पड़ी।

     

    उसकी वह हँसी सिर्फ एक बच्ची की हँसी नहीं थी, बल्कि उस गांव में लौट आए बचपन, शिक्षा और नई सोच की सबसे प्यारी आवाज बन चुकी थी।

  • एक गांव का राक्षस

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बहुत समय पहले घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ों के बीच शिवपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव बसा हुआ था। गाँव के लोग बहुत ही सीधे-सादे, मेहनती और भगवान पर अटूट विश्वास रखने वाले थे। गाँव के ठीक बीचोंबीच मां भवानी का एक प्राचीन मंदिर था। हर सुबह और हर शाम पूरा गाँव वहीं इकट्ठा होकर आरती करता और अपनी खुशियों की प्रार्थना करता था। लेकिन कई वर्षों से उस गाँव पर एक भयानक संकट मंडरा रहा था। जंगल की सबसे ऊँची पहाड़ी पर कालमुख नाम का एक राक्षस रहता था। उसका शरीर पहाड़ जैसा विशाल, आँखें जलते अंगारों जैसी लाल और उसकी दहाड़ सुनकर पेड़ों के पत्ते तक काँप उठते थे। जब भी उसे तेज भूख लगती, वह गाँव में आ धमकता और किसी एक छोटे बच्चे को उठाकर ले जाता। उसके जाने के बाद पूरे गाँव में सिर्फ मातम और चीख-पुकार रह जाती। हर माँ अपने बच्चे को सीने से लगाए रहती। कोई भी बच्चा अकेले घर से बाहर नहीं निकलता था। शाम ढलते ही पूरा गाँव अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेता। एक दिन फिर वही मनहूस घड़ी आ गई। जंगल की ओर से कालमुख की भयानक दहाड़ गूँजी। “वो आ गया… राक्षस आ गया…!” किसी ने घबराकर चिल्लाया। लोग अपने बच्चों को लेकर इधर-उधर भागने लगे। लेकिन कालमुख ने एक सात साल के मासूम बच्चे को पकड़ लिया। उसकी माँ रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़ी। “मेरे बच्चे को छोड़ दे… मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ… उसे मत ले जा…” कालमुख ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। “हा… हा… हा… तुम्हारे आँसू देखकर ही मेरी भूख और बढ़ जाती है।” इतना कहकर वह बच्चे को लेकर जंगल की ओर चला गया। पूरा गाँव सन्न रह गया। किसी घर में उस दिन चूल्हा नहीं जला। अगली सुबह गाँव के सभी लोग मां भवानी के मंदिर पहुँचे। सबकी आँखों में आँसू थे। गाँव के बुज़ुर्ग ने हाथ जोड़कर कहा, “हे मां… अब हमसे अपने बच्चों का दुख नहीं देखा जाता। हमारी रक्षा करो।” पूरा मंदिर “जय मां भवानी” के जयकारों से गूँज उठा। तभी मंदिर के बाहर जोरदार ठहाका सुनाई दिया। सबने बाहर देखा। कालमुख मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ा था। वह हँसते हुए बोला, “हर बार इसी मूर्ति से मदद माँगते हो? अगर तुम्हारी देवी में शक्ति है तो मुझे रोककर दिखाए।” उसने मंदिर की ओर देखकर उपहास किया और बोला, “अगली पूर्णिमा को मैं फिर आऊँगा… और इस बारपहले से भी छोटे बच्चे को लेकर जाऊँगा।” इतना कहकर वह हँसता हुआ जंगल की ओर लौट गया। पूरा गाँव डर से काँप उठा। उसी गाँव में हरिराम और सीता नाम का एक गरीब दंपति रहता था। दोनों की शादी को कई साल हो चुके थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। फिर भी उन्होंने कभी भगवान से शिकायत नहीं की। वे रोज़ मंदिर की सफाई करते, दीपक जलाते और मां भवानी की सेवा करते। एक रात सीता मंदिर में बैठी रो रही थी। “हे मां… अगर मेरी गोद भरनी है, तो ऐसी संतान देना जो सिर्फ मेरी नहीं, पूरे गाँव की रक्षा करे।” उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। अचानक मंदिर में रखा दीपक अपने आप तेज़ जलने लगा। बिना हवा के मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं। पूरा मंदिर दिव्य प्रकाश से भर गया। सीता ने काँपते हुए सिर उठाया। उसे लगा जैसे मां भवानी की मूर्ति मुस्कुरा रही हो। तभी एक मधुर आवाज़ गूँजी— “डर मत पुत्री। तुम्हारी भक्ति व्यर्थ नहीं जाएगी। समय आने पर मेरी शक्ति तुम्हारे घर जन्म लेगी। वह दिव्य कन्या इस गाँव को राक्षस के आतंक से मुक्त करेगी।” इतना कहकर प्रकाश धीरे-धीरे गायब हो गया। सीता ने यह बात हरिराम को बताई, लेकिन दोनों ने इसे किसी और से नहीं कहा। कुछ दिनों बाद एक चमत्कार हुआ। सालों से निसंतान रही सीता गर्भवती हो गई। जब यह खबर पूरे गाँव में फैली तो लोगों की आँखों में बरसों बाद उम्मीद की चमक दिखाई दी। सबने इसे मां भवानी का आशीर्वाद माना। लेकिन जब यह बात कालमुख तक पहुँची तो वह ज़ोर से हँस पड़ा। “एक बच्ची मेरा अंत करेगी? हा… हा… हा… इंसानों की उम्मीद भी कितनी मज़ेदार होती है।” उसने गुस्से में पहाड़ की एक विशाल चट्टान पर मुक्का मारा और वह चट्टान टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई। “जिस दिन वह बच्ची पैदा होगी, उसी दिन मैं उसे खा जाऊँगा। फिर देखूँगा तुम्हारी मां भवानी क्या कर लेती हैं।” यह सुनकर गाँव वाले और भी डर गए, लेकिन उन्होंने मां भवानी पर विश्वास नहीं छोड़ा। हर दिन पूरा गाँव मंदिर में दीप जलाकर सीता और उसके होने वाले बच्चे की सलामती की प्रार्थना करने लगा। आखिर वह रात आ ही गई। नौ महीने पूरे हो चुके थे।आसमान में काले बादल छा गए। बिजलियाँ चमकने लगीं।तेज़ हवाएँ चलने लगीं। मां भवानी के मंदिर की घंटियाँ बिना किसी के छुए अपने आप बजने लगीं। पूरा गाँव उस दिव्य प्रकाश से नहा उठा जो मंदिर से निकल रहा था। उसी समय सीता ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। जैसे ही उस बच्ची ने पहली बार अपनी आँखें खोलीं, उसके माथे पर लाल रंग का एक छोटा-सा त्रिशूल चमक उठा। उसी क्षण मंदिर की अखंड ज्योति पहले से कई गुना अधिक तेज़ हो गई। गाँव के बुज़ुर्ग भावुक होकर बोले, “यह कोई साधारण कन्या नहीं… यह मां भवानी के आशीर्वाद से जन्मी दिव्य शक्ति है।” लेकिन तभी दूर पहाड़ी से कालमुख की भयानक दहाड़ सुनाई दी। “मैं आ रहा हूँ… आज कोई देवी मुझे नहीं रोक पाएगी। सबसे पहले मैं इसी बच्ची को अपना शिकार बनाऊँगा!” उसकी दहाड़ सुनकर पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया। लेकिन उसी समय मां भवानी के मंदिर से तेज़ दिव्य प्रकाश निकला। ऐसा लगा जैसे स्वयं मां भवानी मुस्कुराकर कह रही हों “अब अधर्म का अंत निश्चित है… मेरी पुत्री इस धरती पर अपना पहला कदम रख चुकी है।” और इसी के साथ उस राक्षस के अंत की शुरुआत हो गई… राक्षस कालमुख को जैसे ही दिव्य कन्या के जन्म की खबर मिली, वह गुस्से से पागल हो उठा। उसकी भयानक दहाड़ से पूरा जंगल काँपने लगा। हाथ में विशाल गदा लिए वह तेज़ी से शिवपुर की ओर बढ़ा। गाँव वालों ने उसे आते देखा तो सभी अपने घरों से निकलकर मां भवानी के मंदिर में पहुँच गए। हरिराम और सीता अपनी नवजात बेटी को गोद में लिए मां भवानी के चरणों में बैठ गए। सभी लोग हाथ जोड़कर एक ही प्रार्थना कर रहे थे, “हे मां, हमारी रक्षा कीजिए।” कुछ ही देर में कालमुख मंदिर के सामने आ खड़ा हुआ। वह ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए बोला, “यही है वह बच्ची जो मेरा अंत करेगी? आज सबसे पहले मैं इसी को खाऊँगा, फिर पूरे गाँव को खत्म कर दूँगा।” इतना कहकर वह मंदिर की ओर बढ़ा। लेकिन जैसे ही उसने मंदिर की पहली सीढ़ी पर कदम रखा, उसके पैर वहीं रुक गए। उसे लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे आगे बढ़ने नहीं दे रही हो। गुस्से में उसने अपनी पूरी ताकत से गदा मंदिर पर फेंकी, लेकिन गदा मंदिर से टकराने से पहले ही राख बनकर हवा में उड़ गई। उसी क्षण मंदिर के गर्भगृह से तेज़ प्रकाश निकला। वह प्रकाश सीधा उस नवजात कन्या पर पड़ा। बच्ची मुस्कुराई और उसके माथे पर बना त्रिशूल चमकने लगा। देखते ही देखते वह दिव्य आभा से घिर गई। आसमान में बिजली चमकी और मां भवानी का दिव्य स्वर गूँजा, “कालमुख! तेरे पापों का अंत आज निश्चित है।” यह सुनते ही कन्या के सामने एक दिव्य त्रिशूल प्रकट हुआ। बिना किसी के छुए वह त्रिशूल तेज़ी से उड़ता हुआ कालमुख की ओर बढ़ा। राक्षस ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की। उसने बड़े-बड़े पत्थर उठाकर फेंके, ज़ोरदार दहाड़ लगाई, लेकिन दिव्य त्रिशूल को कोई नहीं रोक सका। अगले ही पल त्रिशूल कालमुख के सीने में जा धँसा। “नहीं… यह नहीं हो सकता!” राक्षस दर्द से चीख उठा। उसका विशाल शरीर काँपने लगा। धीरे-धीरे वह धुएँ में बदलने लगा और कुछ ही क्षणों में राख बनकर धरती पर बिखर गया। राक्षस के मरते ही आसमान साफ़ हो गया। मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं और पूरे गाँव में फूलों की वर्षा होने लगी। गाँव वाले खुशी से झूम उठे। हर तरफ़ “जय मां भवानी!” के जयकारे गूँजने लगे। हरिराम और सीता की आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया और मां भवानी का धन्यवाद किया। उस दिन के बाद शिवपुर में कभी किसी बच्चे पर कोई संकट नहीं आया। गाँव फिर से हँसी, खुशियों और बच्चों की किलकारियों से गूँज उठा। आज भी लोग उस मंदिर में जाकर यही कहते हैं “जहाँ सच्ची श्रद्धा और मां भवानी का आशीर्वाद हो, वहाँ अधर्म और बुराई का अंत निश्चित होता है।”

  • 20 साल का इंतजार

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    “अरे, शादी को पूरे बीस साल हो गए… लेकिन आज तक इनके घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी।”

     

    गांव की चौपाल हो, किसी की शादी हो या कोई त्योहार, रवि और मीरा जहां भी जाते, लोगों की बातें उनका पीछा नहीं छोड़ती थीं।

     

    “इतने साल हो गए, अब तो उम्मीद ही छोड़ देनी चाहिए।”

     

    “पता नहीं पिछले जन्म का कौन-सा पाप है।”

     

    ऐसी बातें सुन-सुनकर मीरा का दिल हर बार टूट जाता था। लेकिन वह किसी से कुछ नहीं कहती। बस चुपचाप अपने आंसू पोंछ लेती।

     

    रवि हमेशा उसका हौसला बनकर खड़ा रहता।

     

    वह मुस्कुराकर कहता,

    “दुनिया का काम बोलना है मीरा… और हमारा काम महादेव पर भरोसा रखना।”

     

    उनका छोटा-सा घर बहुत साधारण था, लेकिन उसमें प्यार की कोई कमी नहीं थी। दोनों एक-दूसरे का इतना ख्याल रखते कि देखने वाले कहते, “भगवान ने इन्हें संतान भले न दी हो, लेकिन इनके रिश्ते में कभी कमी नहीं आने दी।”

     

    हर सोमवार दोनों सुबह-सुबह उठकर महादेव के मंदिर जाते। मीरा अपने हाथों से शिवलिंग पर जल चढ़ाती और आंखें बंद करके बस एक ही प्रार्थना करती,

     

    “महादेव… अगर हमारी किस्मत में संतान है तो जरूर देना, और अगर नहीं है तो इतना धैर्य देना कि कभी आपसे शिकायत न करूं।”

     

    रवि भी हाथ जोड़कर कहता,

     

    “भोलेनाथ, हमें आपकी हर मर्जी मंजूर है।”

     

    समय अपनी रफ्तार से चलता रहा।

     

    एक दिन रवि के छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था। पूरा परिवार खुशियां मना रहा था।

     

    मीरा भी अपने हाथों से बच्चे के लिए केक और मिठाइयां लेकर गई।

     

    तभी एक रिश्तेदार ने ताना मारते हुए कहा,

     

    “दूसरों के बच्चों पर इतना प्यार लुटाने से क्या होगा? अपना बच्चा होता तो बात ही अलग थी।”

     

    दूसरी औरत भी हंसते हुए बोली,

     

    “भगवान हर किसी की झोली नहीं भरता।”

     

    ये सुनते ही मीरा की आंखें भर आईं।

     

    उसके हाथ से मिठाई की प्लेट लगभग गिर ही गई।

     

    रवि ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया और बिना किसी से कुछ कहे वहां से निकल आया।

     

    घर लौटते समय पूरे रास्ते दोनों चुप रहे।

     

    कुछ देर बाद मीरा रोते हुए बोली,

     

    “क्या सच में मेरी ही कमी है? क्या मैं कभी मां नहीं बन पाऊंगी?”

     

    रवि ने गाड़ी रोक दी।

     

    उसने मीरा का चेहरा अपने हाथों में लिया और कहा,

     

    “मेरी नजर में तुम दुनिया की सबसे अच्छी पत्नी हो। अगर पूरी जिंदगी भी हम दोनों अकेले रहे, तब भी मुझे कोई दुख नहीं होगा। मुझे सिर्फ तुम्हारी मुस्कान चाहिए।”

     

    मीरा और भी ज्यादा रो पड़ी।

     

    उस रात दोनों ने खाना भी नहीं खाया।

     

    वे सीधे घर के मंदिर में जाकर महादेव की मूर्ति के सामने बैठ गए।

     

    न कोई शिकायत…

     

    न कोई सवाल…

     

    बस आंखों में आंसू और दिल में भरोसा था।

     

    दिन महीने बने…

     

    महीने साल बने…

     

    और देखते ही देखते शादी के पूरे बीस साल बीत गए।

     

    अब गांव वालों ने ताने देना भी कम कर दिया था, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि अब इनके घर कभी बच्चा नहीं आएगा।

     

    लेकिन रवि और मीरा का विश्वास आज भी पहले जैसा अटल था।

     

    सावन का महीना शुरू हुआ।

     

    रवि ने कहा,

     

    “मीरा, इस बार हम पैदल चलकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करेंगे।”

     

    मीरा मुस्कुराकर बोली,

     

    “जहां महादेव बुलाएंगे, वहां तक जरूर चलेंगे।”

     

    दोनों ने यात्रा शुरू की।

     

    रास्ता आसान नहीं था।

     

    कभी तेज धूप पड़ती…

     

    कभी मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती…

     

    कभी पथरीले रास्तों पर पैर छिल जाते…

     

    लेकिन दोनों के होंठों पर सिर्फ एक ही जयकारा था—

     

    “हर हर महादेव!”

     

    यात्रा के आखिरी दिन जब दोनों मंदिर पहुंचे तो मीरा शिवलिंग के सामने बैठते ही फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उसने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “महादेव… आज मैं आपसे कुछ मांगने नहीं आई हूं। बस अपना सारा दुख आपके चरणों में छोड़ने आई हूं। अब जो आपकी इच्छा, वही हमारी किस्मत।”

     

    पास ही बैठे एक वृद्ध साधु काफी देर से दोनों को देख रहे थे।

     

    उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “बेटी, याद रखना… भोलेनाथ के घर देर हो सकती है, लेकिन अंधेर कभी नहीं होता। तुम्हारा विश्वास खाली नहीं जाएगा।”

     

    रवि और मीरा ने उनके चरण छुए और मन में नई उम्मीद लेकर घर लौट आए।

     

    करीब दो महीने बाद मीरा की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। उसे बार-बार चक्कर आने लगे और कमजोरी महसूस होने लगी।

     

    रवि घबरा गया और तुरंत उसे शहर के अस्पताल लेकर पहुंचा।

     

    डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखीं और दोनों को बाहर इंतजार करने के लिए कहा।

     

    रिपोर्ट आने तक दोनों की धड़कनें तेज थीं।

     

    मीरा बार-बार महादेव का नाम जप रही थी, जबकि रवि उसकी हथेली थामे चुपचाप बैठा था।

     

    थोड़ी देर बाद डॉक्टर मुस्कुराते हुए बाहर आए…

     

    और बोले,

     

    “बधाई हो… आप दोनों माता-पिता बनने वाले हैं।”

     

    यह सुनते ही दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

     

    उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि बीस साल का इंतजार आखिरकार खत्म होने वाला है।

     

    डॉक्टर के कमरे से बाहर निकलते ही मीरा ने कांपते हाथों से अपनी रिपोर्ट सीने से लगा ली। उसकी आंखों से खुशी के आंसू लगातार बह रहे थे। वह बार-बार आसमान की ओर देखकर बस एक ही बात कह रही थी,

     

    “महादेव… आपने मेरी सुन ली।”

     

    रवि की आंखें भी नम थीं। वह अस्पताल के छोटे-से मंदिर में गया और घुटनों के बल बैठ गया। उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ… बीस साल तक आपने हमारी परीक्षा ली, लेकिन आज आपने हमारी झोली खुशियों से भर दी। आपका लाख-लाख धन्यवाद।”

     

    इतने वर्षों तक उसने हर ताना मुस्कुराकर सहा था। उसने कभी अपनी पत्नी को अकेला महसूस नहीं होने दिया। आज उसे लग रहा था कि उसका हर आंसू, हर प्रार्थना और हर सोमवार का व्रत सफल हो गया।

     

    दोनों सबसे पहले घर पहुंचे। उन्होंने महादेव की तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाया। पूरे घर में अगरबत्ती की सुगंध फैल गई। दोनों ने मिलकर शिव चालीसा का पाठ किया।

     

    मीरा ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ, आपने हमें दुनिया की सबसे बड़ी खुशी दी है। अब बस इतनी कृपा करना कि हम इस बच्चे को अच्छे संस्कार दें और हमेशा आपके बताए रास्ते पर चलना सिखाएं।”

     

    उस दिन के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। जहां कभी सन्नाटा रहता था, वहां अब आने वाले नन्हे मेहमान की बातें होने लगीं। रवि रोज़ छोटे-छोटे कपड़े, खिलौने और झूले देखकर मुस्कुरा देता।

     

    नौ महीने जैसे-तैसे बीत गए।

     

    आखिर वह दिन भी आ गया जिसका दोनों ने बीस साल तक इंतजार किया था।

     

    अस्पताल के बाहर रवि बेचैनी से टहल रहा था। उसके होंठों पर लगातार “ॐ नमः शिवाय” का जाप चल रहा था।

     

    कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराते हुए बोले,

     

    “बधाई हो… लक्ष्मी आई है। आपके घर बेटी ने जन्म लिया है।”

     

    यह सुनते ही रवि की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने तुरंत हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा और कहा,

     

    “महादेव… आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”

     

    जब उसने पहली बार अपनी नन्ही-सी बेटी को गोद में लिया, तो उसकी आंखों से आंसू बच्ची के माथे पर गिर पड़े। उसने प्यार से उसके माथे को चूमते हुए कहा,

     

    “तुम हमारी बीस साल की तपस्या का फल हो।”

     

    मीरा अपनी बेटी को सीने से लगाकर रोए जा रही थी। यह दुख के नहीं, बल्कि बरसों की अधूरी इच्छा पूरी होने की खुशी के आंसू थे।

     

    कुछ दिनों बाद रवि अपनी बेटी को गोद में लेकर सबसे पहले महादेव के मंदिर पहुंचा।

     

    उसने बच्ची को शिवलिंग के सामने झुकाकर कहा,

     

    “भोलेनाथ, यह हमारी नहीं… आपकी अमानत है। आपने इसे हमें संभालने के लिए भेजा है।”

     

    मंदिर में मौजूद सभी लोगों की आंखें नम हो गईं।

     

    धीरे-धीरे पूरे गांव में यह खबर फैल गई।

     

    जो लोग कभी ताने मारते थे, वही आज मिठाई लेकर उनके घर आने लगे।

     

    उन्हीं रिश्तेदारों में से एक महिला, जिसने कभी मीरा का मजाक उड़ाया था, बेटी को गोद में लेकर रो पड़ी।

     

    वह बोली,”बहू… मुझे माफ कर देना। मैंने तुम्हें बहुत दुख पहुंचाया।”

     

    मीरा मुस्कुराई और बोली,

    “जब महादेव ने सब माफ कर दिया, तो मैं कौन होती हूं किसी से नाराज़ रहने वाली?”

     

    उसकी बात सुनकर वहां खड़े सभी लोगों का सिर शर्म से झुक गया।

     

    उस दिन गांव के हर इंसान ने एक बात सीखी—

     

    किसी के दुख का मजाक कभी नहीं उड़ाना चाहिए। क्योंकि इंसान सिर्फ आज देखता है, लेकिन भगवान सही समय देखकर देते हैं।

     

    आज भी हर सोमवार रवि, मीरा और उनकी नन्ही बेटी हाथों में पूजा की थाली लेकर महादेव के मंदिर जाते हैं।

     

    पहले वे दो लोग महादेव से एक संतान मांगने जाते थे…

     

    और आज वही तीनों हर बार सिर्फ धन्यवाद कहने जाते हैं।

     

    मंदिर की घंटियां बजती हैं, उनकी बेटी भोलेनाथ को देखकर मुस्कुरा देती है, और रवि-मीरा की आंखें फिर से नम हो जाती हैं।

     

    वे समझ चुके थे कि सच्ची श्रद्धा कभी व्यर्थ नहीं जाती। भगवान हर प्रार्थना सुनते हैं, बस उसका उत्तर अपने सही समय पर देते हैं।

     

    हर हर महादेव!

  • बुढ़ापे की तन्हाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “बेटा, खाना खा लिया?”

     

    फ़ोन पर हर रोज़ यही पहला सवाल होता था। दूसरी तरफ़ से हमेशा वही छोटा-सा जवाब आता—

     

    “हाँ माँ… अभी मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।”

     

    और कॉल कट जाती।

     

    शांति देवी कुछ पल तक मोबाइल की बुझी हुई स्क्रीन देखती रहतीं। फिर मुस्कुराने की कोशिश करतीं और धीरे से कहतीं, “चलो… कम से कम आवाज़ तो सुन ली।”

     

    पास ही चारपाई पर बैठे उनके पति रामस्वरूप सब समझ जाते, लेकिन कुछ कहते नहीं।

     

    —

     

    कई साल पहले यही घर हँसी से गूंजा करता था।

     

    शादी के बाद जब शांति इस घर में आई थीं, तब घर में कुछ भी नहीं था। मिट्टी का छोटा-सा मकान, टपकती छत और दो वक्त की रोटी का भी भरोसा नहीं।

     

    रामस्वरूप सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में चले जाते और रात को थके हुए लौटते। शांति पूरे दिन घर संभालतीं, गाय का दूध निकालतीं, चूल्हा जलातीं और हर मुश्किल में अपने पति का साथ देतीं।

     

    धीरे-धीरे दिन बदले।

     

    भगवान ने उन्हें दो बेटे और एक बेटी का सुख दिया।

     

    उनकी दुनिया अब बच्चों में बस गई।

     

    खुद फटे कपड़े पहन लेते, लेकिन बच्चों के लिए नए कपड़े ज़रूर लाते।

     

    खुद भूखे सो जाते, लेकिन बच्चों की थाली कभी खाली नहीं रहने देते।

     

    बरसात की रातों में जब छत टपकती थी, तो दोनों पति-पत्नी पूरी रात जागकर बच्चों के बिस्तर इधर-उधर करते रहते, ताकि उनके ऊपर पानी की एक बूंद भी न गिरे।

     

    उन्हें लगता था…

     

    “हमारी ज़िंदगी चाहे जैसी रही हो, लेकिन हमारे बच्चों की ज़िंदगी हमसे बेहतर होगी।”

     

    बस इसी उम्मीद में दोनों ने पूरी जवानी खपा दी।

     

    —

     

    समय बीतता गया।

     

    बच्चे पढ़-लिखकर बड़े हो गए।

     

    बेटी की शादी बड़े प्यार से कर दी।

     

    दोनों बेटों को शहर में पढ़ाया। इसके लिए शांति ने अपने शादी के समय मिले सारे गहने बेच दिए।

     

    रामस्वरूप ने पुश्तैनी खेत का एक हिस्सा तक बेच दिया।

     

    जब लोगों ने पूछा, “बुढ़ापे का सहारा भी बेच दिया?”

     

    तो रामस्वरूप मुस्कुराकर बोले—

     

    “हमारा असली सहारा खेत नहीं… हमारे बच्चे हैं।”

     

    उन्हें क्या पता था कि यही बात एक दिन उनकी सबसे बड़ी भूल बन जाएगी।

     

    दोनों बेटों को अच्छी नौकरी मिल गई।

    एक दिल्ली चला गया।

     

    दूसरा मुंबई।

     

    शुरुआत में हर हफ्ते फ़ोन आता था।

    फिर महीने में।

    फिर त्योहारों पर।

     

    और धीरे-धीरे… वह भी बंद होने लगा।

    शांति हर सुबह दरवाज़े की ओर देखतीं।

    शायद आज कोई आ जाए…

     

    रामस्वरूप रोज़ शाम को घर के बाहर वाली टूटी कुर्सी पर बैठ जाते।

     

    हर बार सड़क पर आती गाड़ी देखकर उनकी आँखें चमक उठतीं।

    लेकिन गाड़ी किसी और के घर चली जाती।

     

    फिर वे चुपचाप अंदर लौट आते।

     

    एक दिन शांति बोलीं—”सुनिए… इस बार दिवाली पर बच्चे ज़रूर आएँगे ना?”

     

    रामस्वरूप ने मुस्कुराकर कहा—

    “हाँ… क्यों नहीं आएँगे? आखिर अपना घर है।”

     

    दोनों ने पूरे घर की सफाई की।

    बेटों की पसंद की मिठाइयाँ बनाईं।

     

    उनके पुराने कमरे सजाए।

     

    दिवाली आ गई…

    रात हो गई…

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    बस एक संदेश आया “इस बार छुट्टी नहीं मिली… अगली बार ज़रूर आएँगे।”

     

    शांति ने मोबाइल सीने से लगा लिया।

    आँखों से आँसू बह निकले।

     

    लेकिन फिर भी बोलीं—

    “कोई बात नहीं… काम भी तो ज़रूरी है।”

     

    रामस्वरूप ने पहली बार अपना चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया, ताकि पत्नी उनके आँसू न देख सके।

     

    अब दोनों की उम्र ढल चुकी थी।

     

    चलना भी मुश्किल हो गया था।

     

    रामस्वरूप की आँखों से कम दिखाई देता था।

     

    शांति के घुटने जवाब दे चुके थे।

     

    फिर भी दोनों एक-दूसरे का सहारा बने हुए थे।

     

    अगर शांति गिर जातीं, तो रामस्वरूप काँपते हाथों से उन्हें उठाते।

     

    अगर रामस्वरूप की तबीयत खराब होती, तो शांति पूरी रात उनके सिरहाने बैठी रहतीं।

    दोनों जानते थे…

    अब उनके पास एक-दूसरे के अलावा कोई नहीं बचा।

    एक रात बिजली चली गई।

     

    घर में घुप्प अँधेरा था।

    शांति ने धीमे से पूछा—

    “अगर मैं तुमसे पहले चली गई… तो तुम अकेले कैसे रहोगे?”

    रामस्वरूप की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने काँपते हाथों से पत्नी का हाथ पकड़ लिया और बोले—

    “मैं तो आज भी तुम्हारे बिना एक पल नहीं रह सकता… अकेले कैसे जिऊँगा?”

     

    दोनों देर तक चुप रहे।

     

    उस रात दोनों की आँखों से नींद नहीं… आँसू बहते रहे।

    कुछ महीनों बाद रामस्वरूप की तबीयत अचानक बिगड़ गई।

    शांति ने बार-बार बेटों को फ़ोन किया।

     

    एक ने कहा “माँ, अभी ऑफिस में हूँ।”

    दूसरे ने कहा “दो दिन बाद आता हूँ।”

     

    लेकिन उन दो दिनों का इंतज़ार रामस्वरूप नहीं कर सके।

     

    उन्होंने शांति का हाथ कसकर पकड़ा…

     

    एक आख़िरी बार घर की ओर देखा…

     

    और हमेशा के लिए आँखें बंद कर लीं।

     

    शांति फूट-फूटकर रोती रहीं।

     

    जिस इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी बिताई, वही उन्हें बीच रास्ते में अकेला छोड़ गया।

    बेटे अगले दिन पहुँचे।

    पिता की चिता जल चुकी थी।

     

    उन्होंने माँ से कहा—

    “चलो माँ, हमारे साथ शहर चलो।”

     

    शांति ने पूरे घर को देखा।

    वही आँगन…

    वही नीम का पेड़…

    वही चारपाई…

     

    जहाँ उन्होंने पूरी ज़िंदगी अपने पति के साथ बिताई थी।

     

    उन्होंने धीमे से कहा—

    “जिस घर में तुम्हारे पिता की यादें साँस लेती हों… उसे छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?”

     

    बेटे दो दिन बाद वापस लौट गए।

     

    माँ फिर अकेली रह गई।

    अब हर सुबह शांति दो कप चाय बनातीं।

    एक खुद पीतीं…

     

    दूसरा कप रामस्वरूप की तस्वीर के सामने रख देतीं।

    हर शाम दरवाज़े की ओर देखतीं।

     

    शायद आज बच्चे आ जाएँ…

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुलता।

    एक दिन पड़ोस की औरत उन्हें बुलाने आई।

    बहुत आवाज़ दी…

    कोई जवाब नहीं मिला।

    जब अंदर गई तो देखा शांति अपने पति की तस्वीर को सीने से लगाए मुस्कुरा रही थीं।

    लेकिन इस बार उनकी साँसें रुक चुकी थीं।

    शायद…

    उन्हें आखिरकार अपने जीवनसाथी का साथ मिल गया था।

    उस दिन दोनों बेटे बहुत रोए।

    लेकिन अब पछताने से क्या होता?

    जिन माँ-बाप ने अपनी पूरी जवानी बच्चों के भविष्य पर लुटा दी…

    उनके बुढ़ापे में बच्चों के पास उनके लिए दो पल भी नहीं थे।

    याद रखिए…

    बचपन में माँ-बाप हमारी उँगली पकड़कर चलना सिखाते हैं।

    बुढ़ापे में उन्हें सिर्फ़ हमारी उँगली का सहारा चाहिए होता है।

    जिस दिन हम यह सहारा छीन लेते हैं, उसी दिन उनका घर नहीं… उनका दिल सूना हो जाता है।

    क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी गरीबी पैसे की नहीं होती…

    सबसे बड़ी गरीबी बुढ़ापे की तन्हाई होती है।

  • जय गुरु देव

    जय गुरु देव

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    आज की ये रात है भक्ति की,  

    आज का ये दिन है श्रद्धा की।  

    गुरु की महिमा गूँजे हर दिशा में,  

    गुरु का आशीष बरसे हर हृदय में।  

     

    गुरु वो दीप हैं, जो अंधकार मिटाते,  

    गुरु वो सागर हैं, जो सत्य सिखाते।  

    गुरु के चरणों में है जीवन का सार,  

    गुरु ही हैं हमारे पथ‑प्रदर्शक अपार।  

     

    आइए मिलकर करें गुरु का वंदन,  

    भक्ति से भर दें हर मन का आलोकन।  

    जय गुरु देव, जय गुरु देव,  

    गूँजे मंच पर यही स्वर नित्य देव।

     

    आइए गुरु शिष्य संवाद के आनंदित पलों का आनंद लें।😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, पढ़ाई बड़ी कठिन है,  

    गुरु मुस्काए – बेटा, यही तो जीवन का गहना है। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, नींद बहुत सताती है,  

    गुरु हँसे – ज्ञान की रोशनी ही जगाती है। 😂

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, सफलता कब आएगी?  

    गुरु बोले – जब मेहनत तेरे कदमों को सजाएगी। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, आपका आशीष चाहिए,  

    गुरु बोले – बेटा, तेरा विश्वास ही सबसे बड़ा उपहार है।😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, किताबें बहुत भारी हैं,  

    गुरु बोले – बेटा, ज्ञान ही सबसे प्यारी है। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, क्लास में नींद आती है,  

    गुरु बोले – बेटा, यही तो ध्यान की पहली सीढ़ी है। 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, परीक्षा में क्या लिखूँगा?  

    गुरु बोले – बेटा, वही जो पढ़ाया है, वरना फिर सुनूँगा! 😊

     

    शिष्य बोला – गुरुजी, आपकी डाँट भी मीठी लगती है,  

    गुरु बोले – बेटा, यही डाँट ही तेरी जीत की सीढ़ी बनती है।😊

     

    गुरु ने कहा – पढ़ ले बेटा, वरना पछताएगा,  

    शिष्य ने कहा – WiFi नहीं है, नेट कहाँ से आएगा! 😂

     

    गुरु ने कहा – ध्यान लगा, मन को शांत कर,  

    शिष्य ने कहा – कर दें मोबाइल साइलेंट पर! 😂

     

    गुरु ने कहा – ज्ञान ही सबसे बड़ा धन है,  

    शिष्य ने कहा – लेकिन UPI से रिचार्ज भी ज़रूरी है! 😂

     

    गुरु पूर्णिमा पर सबने किया गुरु को प्रणाम, 🙏

    गुरु मुस्काए बोले – बेटा, अब कर दो Exam पास तमाम!😊

     

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    , अपने विचार रखें नीचे कमेंट में लिखकर 😊😂

  • तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    गाँव रामपुर में तीन दोस्तों की जोड़ी इतनी मशहूर थी कि लोग उन्हें नाम से कम और “तीन तिगाड़ा” कहकर ज़्यादा बुलाते थे।

    पहला था भोला। नाम की तरह ही भोला नहीं, बल्कि थोड़ा सनकी भी था। उसे हर काम अपने ही अजीब तरीके से करना पसंद था। कोई कहे दाएँ जाओ, तो वह कहे, “सब दाएँ जाते हैं, मैं बाएँ जाऊँगा।”

    दूसरा था गोलू। हर समय हँसता रहता। चाहे कैसी भी मुसीबत हो, उसके चेहरे पर मुस्कान कभी नहीं जाती थी। उसकी एक ही आदत थी—हर बात में मज़ाक करना।

    तीसरा था पप्पू। वह इतना नादान और बेपरवाह था कि लोग कहते, “इसका दिमाग छुट्टी पर रहता है।” कोई भी कुछ कह दे, वह बिना सोचे वही कर देता।

    तीनों का हाल ऐसा था कि जहाँ जाते, वहाँ कोई न कोई गड़बड़ ज़रूर हो जाती।

    एक दिन तीनों ने सोचा कि अब गाँव में अपनी इज़्ज़त बनानी चाहिए।

    भोला बोला, “चलो आज किसी की मदद करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हाँ, लोग कहेंगे कि ये तीनों सुधर गए।”

    पप्पू बोला, “और अगर नहीं सुधरे तो?”

    दोनों ने उसे घूरकर देखा।

    सबसे पहले उन्हें एक बूढ़ी अम्मा मिलीं जो सिर पर लकड़ियों का गट्ठर उठाए जा रही थीं।

    तीनों दौड़ पड़े।

    “अम्मा, हम उठा देते हैं।”

    अम्मा खुश हो गईं।

    लेकिन जैसे ही भोला ने गट्ठर उठाया, उसने कहा, “इसे ऐसे नहीं, उल्टा पकड़ना चाहिए।”

    उसने गट्ठर उल्टा कर दिया।

    सारी लकड़ियाँ सड़क पर बिखर गईं।

    उधर गोलू इतनी ज़ोर से हँसा कि संतुलन बिगड़ गया और वह भी लकड़ियों पर गिर पड़ा।

    पप्पू उन्हें उठाने लगा, लेकिन उसने सूखी लकड़ियों की जगह पास रखे किसी के कपड़े उठा लिए।

    अम्मा सिर पकड़कर बैठ गईं।

    तीनों चुपचाप वहाँ से खिसक लिए।

    चलते-चलते उन्हें लगा कि खेती में मदद करनी चाहिए।

    एक किसान खेत में पानी लगा रहा था।

    भोला बोला, “चाचा, हम कर देते हैं।”

    किसान ने खुशी-खुशी हाँ कर दी।

    जैसे ही किसान घर गया, भोला ने नहर का रास्ता बदल दिया।

    बोला, “सीधा पानी जाएगा तो मज़ा क्या?”

    नतीजा…

    पूरा पानी खेत छोड़कर सड़क पर बहने लगा।

    गोलू हँस-हँसकर लोटपोट हो गया।

    पप्पू बोला, “लगता है सड़क पर धान उगेंगे।”

    इतने में किसान वापस आया।

    उसने देखा कि खेत सूखा है और सड़क नदी बनी हुई है।

    तीनों फिर भाग खड़े हुए।

    अब उन्होंने फैसला किया कि किसी की दुकान पर मदद करेंगे।

    हलवाई ने कहा, “इन लड्डुओं पर चाँदी का वर्क लगा दो।”

    भोला बोला, “वर्क से क्या होगा? चमक तो तेल से आएगी।”

    उसने लड्डुओं पर तेल लगा दिया।

    गोलू हँसते-हँसते चीनी का डिब्बा गिरा बैठा।

    पप्पू ने समझा कि सब खराब हो गया है।

    उसने पूरा बेसन पानी में डाल दिया।

    थोड़ी ही देर में लड्डुओं की जगह बेसन का हलवा बन गया।

    हलवाई चिल्लाया, “तुम तीनों दुकान से बाहर निकलो!”

    अब तो पूरे गाँव में चर्चा होने लगी।

    “जहाँ ये तीन पहुँच जाएँ, वहाँ भगवान ही मालिक है।”

    तीनों उदास होकर तालाब किनारे बैठ गए।

    गोलू पहली बार चुप था।

    तभी गाँव के सरपंच आए।

    उन्होंने कहा, “तुम लोग इतने परेशान क्यों हो?”

    भोला बोला, “हम अच्छा करना चाहते हैं, लेकिन सब बिगड़ जाता है।”

    सरपंच मुस्कुराए।

    उन्होंने कहा, “अगर सच में मदद करनी है तो पहले सीखो, फिर काम करो।”

    तीनों को बात समझ आ गई।

    अगले दिन गाँव में सफाई अभियान रखा गया।

    इस बार उन्होंने बिना अपनी अक्ल लगाए वही किया जो लोगों ने बताया।

    भोला सिर्फ झाड़ू लगाता रहा।

    गोलू कूड़ा उठाता रहा और बीच-बीच में सबका मन भी हँसाकर हल्का करता रहा।

    पप्पू बस बोरी पकड़कर चलता रहा।

    पहली बार कोई गड़बड़ नहीं हुई।

    गाँव वाले खुश हो गए।

    लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

    काम खत्म होने के बाद पप्पू बोला, “अब कूड़ा कहाँ डालना है?”

    किसी ने कहा, “पीछे वाले गड्ढे में।”

    पप्पू बिना देखे बोरी उठाकर फेंक आया।

    कुछ देर बाद पता चला कि वह कूड़ा नहीं, सरपंच का नया खाद का बोरा था।

    असली कूड़ा वहीं पड़ा रह गया।

    पूरा गाँव पहले कुछ पल चुप रहा…

    फिर इतनी ज़ोर से हँसा कि तालाब तक आवाज़ पहुँच गई।

    सरपंच भी हँस पड़े।

    उन्होंने कहा, “लगता है तुम तीनों की किस्मत में थोड़ा-बहुत काम बिगाड़ना लिखा है।”

    भोला बोला, “हम कोशिश तो पूरी करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हमारा इरादा अच्छा होता है, बस नतीजा थोड़ा अलग निकल जाता है।”

    पप्पू मासूमियत से बोला, “अगली बार शायद सही हो जाए…”

    यह सुनकर फिर सब हँस पड़े।

    उस दिन के बाद गाँव में जब भी कोई काम बिगड़ जाता, लोग मुस्कुराकर बस एक ही बात कहते—

    “लगता है यहाँ तीन तिगाड़ा होकर गए हैं!”

    और तीनों दोस्त भी अब इस बात का बुरा नहीं मानते थे। वे हर गलती से कुछ नया सीखते, फिर अगले काम में जुट जाते। हालाँकि उनके साथ कोई न कोई छोटी-मोटी गड़बड़ी फिर भी हो जाती थी, लेकिन उनकी सच्ची दोस्ती, साफ़ दिल और लोगों को हँसा देने वाली आदत ने पूरे गाँव का दिल जीत लिया था।

    सीख: अच्छा इरादा ज़रूरी है, लेकिन किसी भी काम को सही तरीके से सीखकर करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी होता है। और सच्चे दोस्त हर मुसीबत को भी हँसी में बदल

  • कबीरदास ने गुरु को भगवान से भी बड़ा क्यों कहा?

    कबीरदास ने गुरु को भगवान से भी बड़ा क्यों कहा?

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    संत कबीरदास भारतीय भक्ति परंपरा के उन महान संतों में से एक हैं, जिनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पाँच सौ वर्ष पहले थी। उन्होंने जाति, धर्म, पंथ और बाहरी आडंबरों से ऊपर उठकर प्रेम, सत्य और सहज ज्ञान का संदेश दिया। उनकी कविताएँ और दोहे आम आदमी की भाषा में हैं, फिर भी उनमें गहरी दार्शनिक गहराई छिपी हुई है। कबीरदास के हजारों दोहों में से एक दोहा ऐसा है जो गुरु की महिमा को भगवान से भी ऊँचा स्थान देता है

    “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।

    बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”

    इस दोहे का सीधा अर्थ है यदि गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों एक साथ खड़े हों, तो मैं किसके चरणों में पहले प्रणाम करूँ? मैं तो अपने गुरु के बलिहारी जाता हूँ, क्योंकि उन्होंने ही मुझे गोविंद का मार्ग दिखाया।

    यह दोहा केवल श्रद्धा का भाव नहीं है, बल्कि कबीरदास के पूरे जीवन-दर्शन का सार है। वे गुरु को भगवान से बड़ा इसलिए मानते थे क्योंकि उनके अनुसार भगवान तो सर्वव्यापी हैं, लेकिन उस सर्वव्यापी सत्ता तक पहुँचने का मार्ग दिखाने वाला गुरु ही है। बिना गुरु के मनुष्य अज्ञान के अंधकार में भटकता रहता है। गुरु वह प्रकाश है जो अंधेरे को चीरकर सत्य तक ले जाता है।

    कबीरदास का जन्म अनुमानतः सन् 1398 के आसपास काशी में हुआ था। उनके जीवन के बारे में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि वे एक जुलाहा परिवार में पले-बढ़े। बचपन से ही उनमें आध्यात्मिक जिज्ञासा थी। वे मस्जिद और मंदिर दोनों में जाते, लेकिन वहाँ के आडंबर उन्हें नहीं भाते थे। वे सत्य की खोज में थे उस सत्य की जो बाहरी पूजा-पाठ से परे हो।

    कबीरदास ने स्वयं गुरु की खोज की। प्रसिद्ध कथा है कि वे स्वामी रामानंद के शिष्य बने। रामानंद उस समय के बड़े वैष्णव संत थे। कबीरदास को डर था कि जाति के कारण रामानंद उन्हें शिष्य नहीं बनाएँगे। इसलिए उन्होंने एक दिन प्रातःकाल गंगा घाट की सीढ़ियों पर लेटकर इंतजार किया। जब रामानंद जी स्नान करने उतरे तो उनका पैर कबीर पर पड़ गया और मुख से “राम” निकल गया। कबीरदास ने उसी “राम” को गुरु-मंत्र मान लिया और स्वयं को रामानंद का शिष्य घोषित कर दिया। बाद में रामानंद जी ने उन्हें स्वीकार भी कर लिया।

    यह घटना कबीरदास के गुरु-महिमा के भाव को स्पष्ट करती है। उनके लिए गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं था, बल्कि वह माध्यम था जिसके द्वारा परमात्मा तक पहुँचा जा सकता था। कबीरदास ने कहा है।

    “गुरु की सोई परतिष्ठा, जो गुरुदेव बतावै।

    गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न राम॥”

    अर्थात् गुरु की वही प्रतिष्ठा है जो गुरुदेव बताएँ। गुरु के बिना ज्ञान उत्पन्न नहीं होता और गुरु के बिना राम नहीं मिलते।

    कबीरदास के अनुसार भगवान तो नित्य हैं, सर्वव्यापी हैं, लेकिन मनुष्य अपने अहंकार, अज्ञान और माया के कारण उन्हें देख नहीं पाता। गुरु वह होता है जो शिष्य के अंदर छिपे हुए परमात्मा को जगा देता है। जैसे अंधेरे कमरे में दीया जला देने से सब कुछ दिखाई देने लगता है, वैसे ही गुरु ज्ञान का दीया जलाकर शिष्य के जीवन को प्रकाशित कर देता है।

    भगवान को कोई देख नहीं सकता, छू नहीं सकता, उनसे सीधे बात नहीं कर सकता। लेकिन गुरु साक्षात् रूप में मौजूद होता है। वह शिष्य की गलतियों को सुधारता है, उसे डांटता है, प्यार करता है, और सही मार्ग पर ले जाता है। कबीरदास कहते हैं कि गुरु की कृपा के बिना भगवान भी नहीं मिलते,

    “गुरु बिन कौन बतावै बाट, गुरु बिन कौन उतारे पार।

    गुरु बिन कौन दिखावै राम, गुरु बिन कौन करे निस्तार॥”

    गुरु के बिना रास्ता कौन बताएगा? गुरु के बिना पार कौन उतारेगा? गुरु के बिना राम कौन दिखाएगा और गुरु के बिना निस्तार कौन करेगा?

    कबीरदास ने गुरु को इसलिए ऊँचा स्थान दिया क्योंकि वे व्यावहारिक संत थे। वे केवल सिद्धांत नहीं बताते थे, बल्कि जीवन जीने का तरीका सिखाते थे। उनके दोहों में बार-बार यह बात आती है कि बाहरी पूजा, तीर्थ, व्रत, जप-तप व्यर्थ हैं यदि भीतर का ज्ञान जागृत न हो। और भीतर का ज्ञान जगाने वाला गुरु ही होता है।

    कबीरदास ने गुरु-शिष्य संबंध को अत्यंत पवित्र और गहरी जिम्मेदारी वाला माना। उन्होंने कहा कि गुरु को चुनते समय सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि गलत गुरु शिष्य को और अधिक अंधकार में धकेल सकता है। सही गुरु वह है जो स्वार्थ से मुक्त हो, जो शिष्य को अपना बनाकर नहीं, बल्कि स्वतंत्र बनाकर ज्ञान दे।

    कबीरदास स्वयं ऐसे गुरु थे। उन्होंने अपने शिष्यों को कभी अंधभक्ति के लिए नहीं कहा। वे कहते थे कि गुरु की बात को भी विवेक से परखना चाहिए। लेकिन एक बार गुरु स्वीकार कर लेने के बाद उनकी आज्ञा का पालन पूर्ण श्रद्धा से करना चाहिए।

    उनके दोहे में गुरु की महिमा इस प्रकार है।

    “गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।

    अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥”

    गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा। गुरु शिष्य के अंदर के दोषों को गढ़-गढ़कर निकालता है। अंदर से हाथ का सहारा देता है और बाहर से चोट करता है ताकि शिष्य का जीवन सुंदर घड़े की तरह आकार ले सके।

    यह रूपक बहुत गहरा है। भगवान तो बस मौजूद हैं, लेकिन गुरु सक्रिय रूप से शिष्य को गढ़ता है। इसलिए कबीरदास गुरु को भगवान से बड़ा मानते हैं।

    कबीरदास अकेले नहीं थे जिन्होंने गुरु को इतना ऊँचा स्थान दिया। भारतीय भक्ति और संत परंपरा में गुरु को सदैव विशेष महत्व दिया गया है। नानक देव, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई—सभी ने गुरु की महिमा गाई है। लेकिन कबीरदास ने इसे सबसे स्पष्ट और निर्भीक भाषा में कहा। उन्होंने समाज के सामने चुनौती रखते हुए कहा कि यदि गुरु और भगवान दोनों मौजूद हों तो पहले गुरु को प्रणाम करो।

    यह बात उस समय और भी क्रांतिकारी थी जब लोग मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में उलझे हुए थे। कबीरदास ने कहा कि भगवान तो एक है, लेकिन उस तक पहुँचने का रास्ता गुरु दिखाता है। इसलिए गुरु की शरण में जाना सबसे पहला कदम है।

    आज के युग में जब ज्ञान इंटरनेट पर उपलब्ध है, किताबें सहज सुलभ हैं, तब भी गुरु की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है। कबीरदास का दोहा आज भी उतना ही सत्य है। कोई भी कला, विज्ञान, संगीत, खेल या आध्यात्मिक साधना गुरु के बिना पूरी नहीं होती। शिक्षक, मेंटर, माता-पिता, बड़े भाई-बहत ये सभी किसी न किसी रूप में गुरु का कार्य करते हैं।

    आज मनुष्य सूचनाओं से घिरा हुआ है, लेकिन विवेक और दिशा की कमी है। गुरु वही है जो सूचना को ज्ञान में और ज्ञान को जीवन में बदलने का मार्ग दिखाए। कबीरदास की दृष्टि में गुरु केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला है।

    गुरु पूर्णिमा का पर्व इसी भाव को जीवित रखता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी सफलता, हमारी समझ और हमारी प्रगति के पीछे किसी न किसी गुरु का योगदान है। कबीरदास हमें सिखाते हैं कि सफलता मिलने के बाद गुरु को भूल जाना सबसे बड़ी कृतघ्नता है। गुरु-दक्षिणा केवल धन या वस्तु नहीं, बल्कि जीवन में गुरु के बताए मार्ग पर चलना और उनके प्रति कृतज्ञ बने रहना है।

    कबीरदास ने गुरु को भगवान से बड़ा इसलिए कहा क्योंकि वे जानते थे कि भगवान तक पहुँचने का एकमात्र सच्चा माध्यम गुरु है। भगवान तो हमेशा मौजूद हैं, लेकिन मनुष्य के अज्ञान ने उनके और अपने बीच दीवार खड़ी कर रखी है। गुरु उस दीवार को गिराता है। गुरु अंधेरे में दीप जलाता है, भटके हुए को रास्ता दिखाता है और अधूरे जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है।

    उनका दोहा हमें याद दिलाता है कि श्रद्धा का पहला अधिकार गुरु का है। यदि गुरु न होते तो हम गोविंद को कैसे पहचानते? इसलिए कबीरदास बलिहारी जाते हैं अपने गुरु की क्योंकि उन्होंने गोविंद का पता बता दिया।

    आज जब हम गुरु पूर्णिमा मनाते हैं, तो कबीरदास की इस वाणी को हृदय में धारण करें। अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें चाहे वे स्कूल के शिक्षक हों, जीवन के मार्गदर्शक हों या माता-पिता। क्योंकि ज्ञान का मार्ग गुरु के बिना अधूरा है, और अधूरे मार्ग पर चलकर कोई भी मंजिल तक नहीं पहुँच सकता।

    कबीरदास की वाणी अमर है। वे कहते हैं

    “कबीर गुरु की भक्ति का, सुख फल आगम अपार।

    जाके मन में भक्ति नहीं, ताका जीवन बेकार॥”

    गुरु की भक्ति में अपार सुख छिपा है। जिसके मन में गुरु के प्रति भक्ति नहीं, उसका जीवन व्यर्थ है। यही कबीरदास का संदेश है गुरु को भगवान से भी बड़ा मानो, क्योंकि गुरु ही वह सेतु है जो मनुष्य को परमात्मा तक पहुँचाता है।

  • एक अनाथ

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    “बेटी, अब से यही तुम्हारा घर है… सबको अपना समझकर रहना।”

     

    विदाई के समय मामा की आँखों में आँसू थे। सामने खड़ी पायल भी रो रही थी। माँ-बाप का साया तो उसने बचपन में ही खो दिया था। वह सिर्फ पाँच साल की थी, जब एक सड़क हादसे ने उसके माता-पिता को उससे हमेशा के लिए छीन लिया। उस दिन के बाद उसकी दुनिया उजड़ गई थी।

     

    लेकिन भगवान ने उसके लिए एक सहारा पहले से ही चुन रखा था। उसके मामा और मामी ने उसे अपनी बेटी बनाकर अपने घर ले आए। उन्होंने कभी उसे यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अनाथ है। जितना प्यार उन्होंने अपने बेटे रोहन को दिया, उतना ही प्यार पायल को भी मिला। मामी हर रात उसे अपने हाथों से खाना खिलातीं और मामा उसे कंधों पर बैठाकर मेले घुमाने ले जाते।

     

    पायल बड़ी होती गई। पढ़ाई में होशियार, संस्कारों में सबसे आगे और दिल से बेहद नरम। पूरे मोहल्ले में उसकी मिसाल दी जाती थी। उसे हमेशा यही भरोसा था कि जिस घर में उसकी शादी होगी, वहाँ भी उसे इतना ही अपनापन मिलेगा।

     

    समय आया तो उसके लिए अमन का रिश्ता आया। परिवार देखने में अच्छा था। बातों में मिठास थी और सब लोग बहुत संस्कारी होने का दिखावा कर रहे थे। मामा-मामी ने अपनी हैसियत से बढ़कर शादी की। जो बन पड़ा, सब कुछ दिया। विदाई के समय मामी ने उसे गले लगाकर कहा, “बेटी, अगर कभी ज़रा-सी भी परेशानी हो, तो अपने इस घर का दरवाज़ा हमेशा खुला मिलेगा।”

     

    पायल मुस्कुराई और आँसू पोंछते हुए ससुराल चली गई।

     

    लेकिन जिस घर को उसने अपना नया संसार समझा था, वही उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुःख बन गया।

     

    शादी के दूसरे ही दिन उसकी सास ने दहेज का सामान देखते हुए ताना मारा, “बस इतना ही सामान भेजा है? लगता है तुम्हारे मामा-मामी ने अपनी जिम्मेदारी जल्दी खत्म करनी थी।”

     

    पायल चुप रही। उसने सोचा, शायद पहली बार की नाराज़गी होगी।

     

    लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी।

     

    हर सुबह कोई न कोई ताना उसका इंतज़ार करता।

     

    “इतनी देर से क्यों उठी?”

     

    “खाना बनाना भी नहीं आता?”

     

    “अनाथ लड़की से इससे ज़्यादा उम्मीद भी क्या करें?”

     

    ये शब्द रोज़ उसके दिल को तोड़ देते थे।

     

    उसका पति अमन भी धीरे-धीरे अपनी माँ की बातों में आने लगा। पहले जो उससे प्यार से बात करता था, अब छोटी-छोटी बातों पर उसे डाँटने लगा।

     

    एक दिन पायल ने हिम्मत करके कहा, “अगर मुझसे कोई गलती हुई है, तो मुझे समझाइए… लेकिन बार-बार अनाथ कहकर मत बुलाइए। बहुत दर्द होता है।”

     

    अमन ने बेरुखी से जवाब दिया, “माँ जो कहती हैं, सुन लिया करो। बेकार की बहस मत किया करो।”

     

    उस दिन पायल को समझ आ गया कि अब उसे इस घर में अकेले ही सब सहना होगा।

     

    धीरे-धीरे उससे पूरे घर का काम करवाया जाने लगा। सुबह चार बजे उठना, रात देर तक काम करना। अगर ज़रा-सी भी गलती हो जाती तो खाना तक नसीब नहीं होता।

     

    एक दिन उसे तेज़ बुखार था। शरीर काँप रहा था, लेकिन सास बोली, “बीमार होने का नाटक मत करो। रसोई में जाओ और खाना बनाओ।”

     

    पायल काँपते हाथों से रोटियाँ बना रही थी कि अचानक उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया और वह रसोई में ही बेहोश होकर गिर पड़ी।

     

    जब होश आया तो वह अपने कमरे में थी। उसे लगा कि शायद किसी ने उसकी चिंता की होगी।

     

    लेकिन तभी बाहर से सास की आवाज़ आई, “नाटक करने में तो बड़ी होशियार है। काम से बचने का नया तरीका ढूँढ़ लिया।”

     

    यह सुनकर पायल की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उस रात उसने अपने मामा को फोन किया। जैसे ही उधर से आवाज़ आई, “कैसी है मेरी बेटी?”

     

    पायल का गला भर आया। लेकिन वह उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थी।

     

    वह मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली, “मैं ठीक हूँ मामा… बस आपकी याद आ रही थी।”

     

    फोन कटते ही वह फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उधर मामा समझ गए कि उनकी बेटी कुछ छिपा रही है।

     

    दो दिन बाद मामा और मामी बिना बताए उसके ससुराल पहुँच गए।

     

    दरवाज़ा पायल ने खोला। उसके चेहरे की मुस्कान गायब थी। आँखों के नीचे काले घेरे थे और हाथों पर जलने के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे।

     

    मामी ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और धीरे से पूछा, “बेटी… सच बता, तू खुश तो है ना?”

     

    बस इतना सुनना था कि पायल खुद को रोक नहीं पाई। वह मामी के गले लगकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

     

    उसकी सिसकियाँ सुनकर घर में सन्नाटा छा गया।

     

    उस दिन पहली बार मामा ने अपनी बेटी की आँखों में वह दर्द देखा, जिसे वह महीनों से मुस्कान के पीछे छिपा रही थी।

     

    उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने अपनी फूल जैसी बेटी को जिस घर में विदा किया था, वहाँ उसे प्यार नहीं, बल्कि अपमान और तकलीफ़ मिली थी।

     

    उस पल मामा ने मन ही मन एक फैसला कर लिया अब उनकी बेटी कभी अकेली नहीं लड़ेगी।

     

    पायल मामी के गले लगकर लगातार रोए जा रही थी। बरसों का दर्द जैसे आज उसकी आँखों से बाहर निकल रहा था।

     

    मामी बार-बार उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कह रही थीं, “बस बेटी… अब और मत रो। हम आ गए हैं ना।”

     

    मामा ने पूरे घर की तरफ देखा। उनकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।

     

    इतने में पायल की सास बोली, “अरे, हमने ऐसा क्या कर दिया? बहुएँ अगर थोड़ा-बहुत काम करें तो क्या गलत है?”

     

    मामा ने शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा, “काम करवाना गलत नहीं है… लेकिन किसी की बेटी का सम्मान छीन लेना सबसे बड़ा गलत काम है।”

     

    सास हँसते हुए बोली, “ये आपकी बेटी नहीं, अनाथ लड़की है। हमने तो इस पर एहसान किया है।”

     

    ये सुनते ही मामा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कहा, “जिस दिन इसकी माँ-बाप की मौत हुई थी, उसी दिन मैंने इसे अपनी बेटी मान लिया था। अगर इसे जन्म देने वाले नहीं रहे, तो इसका मतलब ये नहीं कि इसका कोई अपना नहीं है।”

     

    पूरे घर में सन्नाटा छा गया।

     

    अमन भी वहीं खड़ा सब सुन रहा था, लेकिन उसने एक शब्द तक नहीं कहा।

     

    मामा ने पायल से पूछा, “बेटी, सच-सच बता… क्या तू इस घर में खुश है?”

     

    पायल कुछ पल चुप रही। फिर धीमी आवाज़ में बोली, “मैंने बहुत कोशिश की मामा… सबको अपना माना… हर ताना सहा… हर अपमान सहा… लेकिन अब मुझसे नहीं होता।”

     

    उसकी बात सुनकर मामी की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    मामा ने बिना एक पल गंवाए कहा, “चल बेटी… अपने घर चल।”

     

    सास तुरंत बोली, “अगर आज ये इस घर से गई, तो दोबारा इस घर में कदम नहीं रखेगी।”

     

    मामा ने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया, “जिस घर में बेटी की इज़्ज़त नहीं होती, उस घर में लौटने की ज़रूरत भी नहीं होती।”

     

    पायल अपने मामा-मामी के साथ चली गई।

     

    कई दिनों बाद उसने खुलकर साँस ली। पहली बार उसे ऐसा लगा कि वह फिर से ज़िंदा है।

     

    मामी ने उसे संभाला। मामा ने कहा, “बेटी, अब किसी के सामने रोना नहीं… अब खुद को इतना मज़बूत बनाना कि लोग तुझे कमजोर समझने की गलती कभी न करें।”

     

    पायल ने उसी दिन फैसला कर लिया कि अब वह अपनी पहचान खुद बनाएगी।

     

    उसने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की। साथ ही सिलाई और कंप्यूटर का कोर्स भी किया। धीरे-धीरे उसने घर से ही अपना छोटा-सा काम शुरू कर दिया।

     

    शुरुआत में कम कमाई हुई, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    कुछ महीनों बाद उसके बनाए कपड़ों की माँग बढ़ने लगी। फिर उसने दो और महिलाओं को अपने साथ काम पर रखा।

     

    एक साल के अंदर उसका छोटा-सा काम एक अच्छी दुकान में बदल गया।

     

    आज वही पायल, जिसे कभी ताने सुनने पड़ते थे, कई ज़रूरतमंद महिलाओं को रोज़गार दे रही थी।

     

    उधर अमन का घर पहले जैसा नहीं रहा। सास की तबीयत खराब रहने लगी। घर के काम करने वाला कोई नहीं था। तब उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि पायल नौकरानी नहीं, उस घर की बहू थी।

     

    एक दिन अमन पायल से मिलने उसके घर पहुँचा।

     

    उसने धीरे से कहा, “पायल… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। अगर हो सके तो मुझे माफ़ कर दो और वापस चलो।”

     

    पायल ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे, बल्कि आत्मविश्वास था।

     

    वह बोली, “माफ़ मैंने तुम्हें उसी दिन कर दिया था… लेकिन जिस घर में मेरे आत्मसम्मान की कोई कीमत नहीं थी, वहाँ अब लौटना मेरे बस की बात नहीं।”

     

    अमन शर्म से सिर झुका कर खड़ा रह गया।

     

    पायल ने मुस्कुराकर कहा, “रिश्ते प्यार से चलते हैं… तानों से नहीं। और सम्मान खोकर कोई रिश्ता नहीं निभाया जा सकता।”

     

    अमन बिना कुछ कहे वापस लौट गया।

     

    कुछ समय बाद पायल की मेहनत और हिम्मत की कहानी पूरे शहर में मिसाल बन गई। लोग उसे एक सफल महिला के रूप में पहचानने लगे।

     

    एक कार्यक्रम में जब उसे सम्मानित किया गया तो मंच से उसने सिर्फ एक बात कही—

     

    “मैं अनाथ ज़रूर थी, लेकिन कभी अकेली नहीं थी। मेरे मामा-मामी ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैं हर मुश्किल से लड़ सकी। और आज मैं हर उस लड़की से कहना चाहती हूँ… अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता मत करना। क्योंकि जो खुद की इज़्ज़त करना सीख लेता है, दुनिया भी एक दिन उसकी इज़्ज़त करना सीख जाती है

    ।”

     

    पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

     

    मामा और मामी की आँखों में गर्व के आँसू थे। उनकी बेटी हारकर नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाकर जीती थी।