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  • अधूरी इबादत भाग~40

    अधूरी इबादत भाग~40

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~40 पन्ना नंबर तेईस 

     

    एकांश के घर से बाहर निकलते ही जैसे कमरे में ठहरे हुए हर शब्द की गर्मी भी साथ चली गई हो। रूहानी ने दरवाज़ा धीरे से बंद किया, फिर सीधे जाकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई…. जैसे उसकी टाँगों में अब खड़े रहने की ताक़त नहीं बची हो। 

    उसने एक ही साँस में पूरा गिलास पानी पिया, गले से नीचे उतरते पानी की ठंडक जैसे उसके भीतर उठ रहे तूफ़ान को थोड़ी देर के लिए थामना चाह रही थी। लेकिन उस ठंडेपन से भी उसका भीतर नहीं बुझा… आँखें अभी भी भटकी हुई थीं, जैसे कुछ खोज रही हों… या कुछ खो चुकी हों।

    उसकी नज़र सामने पड़े सैंडविच पर गई, जो अधूरी माफ़ी की तरह प्लेट में पड़ा था। अद्वैत ने बनाया था…. सादगी से भरा, न बोल सकने वाली क्षमा जो शब्दों से नहीं, हर काटे गए टुकड़े से झलक रही थी। 

    रूहानी ने उसे उठाया और खाना शुरू कर दिया, बिना अद्वैत की तरफ़ देखे। सैंडविच अब ठंडा हो चुका था, बिल्कुल उसी तरह जैसे उनके बीच की वो ऊष्मा जो कभी समझदारी से उपजी थी, अब चुप्पियों में बर्फ़ बनकर पिघल रही थी।

    अद्वैत ने कॉफ़ी का मग उठाया, कुछ कहने की हिम्मत जुटाते हुए बोला, “मैं रीहीट कर देता हूँ…”

    रूहानी की आवाज़ आयी… बहुत नर्म, मगर भीतर से साफ़ कटती हुई, “रहने दो… आइस हो फ्रिज में तो वही डाल दो।”

    वो नहीं चाहती थी कि अद्वैत कुछ पूछे….. न एकांश के बारे में और न उन दोनों के बीच के उस रिश्ते के बारे में। 

    इस घर में बहुत कुछ था जो कहे बिना भी भारी था और उन शर्तों के मुताबिक, सवाल करना मना था। 

    अद्वैत चुपचाप उठा और जैसे आदेश मिला हो, वैसे ही फ्रिज से आइस निकालकर कॉफ़ी में डाल दी। 

    रूहानी ने सैंडविच खत्म किया, भूख इतनी नहीं थी जितना बेचैनी थी, जो हर निवाले के साथ उसके गले से उतर रही थी। जब भी वो तनाव में होती थी,कुछ ज़्यादा ही भूख लगती थी उसे। 

    नाश्ता पूरा हुआ। प्लेट खाली, मग ठंडा, और उसका चेहरा पहले से ज़्यादा बुझा हुआ।

    “शाम तक लौट आऊँगी,” बस इतना कहा, और दरवाज़ा खोलकर निकल गई….. बिना पीछे देखे, बिना किसी सफ़ाई के, जैसे कोई पन्ना पलट दिया हो जिसमें अब और कुछ लिखना बाकी न हो। 

    अद्वैत वहीं खड़ा रह गया, उस अधूरे वाक्य की तरह, जिसका उत्तर कभी किसी ने माँगा ही नहीं।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रूहानी ने जैसे ही कैब का दरवाज़ा बंद किया, एक सधे हुए अंदाज़ में बैग से मोबाइल निकाला और रिनोवेशन वाले को कॉल कर दिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी ठंडक थी…. वह ठंडक जो अब उसकी पहचान बन गई थी; जैसे हर बातचीत सिर्फ एक डील हो, हर लहजा एक ऑर्डर। 

    “मैं दस मिनट में स्टूडियो पहुँच रही हूँ। टीम टाइम पर आ जाए।” कॉल कटते ही वह खिड़की की ओर मुड़ गई। ट्रैफिक की आवाज़ों के पीछे जैसे कोई पुरानी धुन चल रही थी… धीमी, शांत, बस उसी के लिए बजती हुई। वह धुन, जो उसे अतीत से जोड़ती थी और वर्तमान से काटती भी।

    स्टूडियो इस बार बड़ा था, बिल्कुल नया। एक खुली छत के नीचे फैला हॉलनुमा कमरा, जहाँ हर दीवार, हर कोना एक नई शुरुआत का इशारा दे रहा था। 

    सामने वुडन फ्लोर पर लाइट्स की वायरिंग चल रही थी, दूसरी ओर कपड़ों की कढ़ाई और डिज़ाइनिंग के लिए अलग सेक्शन बन रहा था, और एक कोना फोटोशूट और ब्रांडिंग स्टूडियो में तब्दील हो रहा था।

    दीवारों पर निशान लगते जा रहे थे, जैसे समय खुद वहाँ नए ख्वाबों की रेखाएँ खींच रहा हो। रिनोवेशन टीम अपने-अपने हिस्से का काम करने में जुटी थी…. किसी ने ब्लूप्रिंट फैलाया, कोई लैपटॉप खोलकर प्लानिंग समझाने लगा। सबकुछ योजनाबद्ध, सटीक, ठोस था।

    पर रूहानी?

    वह सबके बीच होकर भी कहीं दूर खड़ी थी…. ना दखल देती, ना कुछ रोकती, बस जैसे किसी पर्दे के पीछे से अपनी ही ज़िंदगी को एक बार फिर रंगते हुए देख रही हो। 

    कुछ देर बाद एक वर्कर ट्रे में जूस के गिलास लेकर आया। एक गिलास उसकी ओर भी बढ़ाते हुए बोला, “मैम, थोड़ा ब्रेक ले लीजिए।” 

    रूहानी ने शुक्रिया कहा, एक हल्की मुस्कान आई, जो अगले ही पल जैसे पिघल गई। स्टूडियो के काँच वाले दरवाज़े से कुछ दूरी पर रखी एक लकड़ी की बेंच पर जाकर बैठ गई।

    पहला घूँट लिया, तो गले से उतरती उस मिठास में एक कसक भी थी। बाहर की चिलचिलाती धूप के बीच, अंदर कुछ ठंडा बह रहा था… लेकिन वह ठंडक जूस की नहीं थी। वह उन यादों की थी जो समय की धूल में दबी थीं, पर अब भी साँस ले रही थीं।

    उसकी आँखें कहीं और ही चली गईं… वहीं पुरानी जगह पर, उस पहले स्टूडियो में जहाँ छत टपकती थी और दीवारें खुद-ब-खुद परतें छोड़ देती थीं। मगर उस कमरे की हवा में कभी मायूसी नहीं होती थी…..

    Flashback

    बारिश की रुक-रुककर गिरती बूंदें जैसे हर उस खामोशी को बुन रही थीं जो रूहानी के भीतर कई महीनों से बिना शब्दों के पनप रही थी। उसका पुराना स्टूडियो…. वही टूटी छत वाला, ईंटों की खुली दीवारों वाला कोना…. जहाँ वक़्त ने कई बार रुक कर साँस ली थी। 

    वहाँ आज फिर वही गंध थी — गीली मिट्टी, गीले रंग और पुराने सपनों की।द

    वो कैनवास के सामने बैठी थी, बाल रबर बैंड में बँधे, एक लट फिर भी जिद पर उतरी हुई थी… बार-बार आँखों के पास आकर उसे चिढ़ा रही थी। दीवारों पर कुछ अधूरी रेखाएँ थीं, जो अभी कहानी नहीं बनी थीं, बस किसी टूटी आत्मा की हल्की दस्तक सी लग रही थीं।

    तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। इतनी धीमी कि जैसे खुद भी यकीन नहीं था कि कोई उसे सुनेगा। रूहानी ने पलटकर देखा….. एक अनजाना चेहरा। मगर अजनबी तो बस दिखता था, उसकी आँखों में जाने-पहचाने सवाल थे।

    “तुम रूहानी हो?” आवाज़ हल्की थी और भीगी हुई।

    “हाँ…” उसने धीरे से जवाब दिया, जैसे किसी पुराने कागज़ को पलटते हुए।

    “ये तुम्हारी स्केचबुक है शायद… बस में छूट गई थी।”

    रूहानी की साँसें थम-सी गईं। वो स्केचबुक, जो वो हर रोज़ अपने दिल की धड़कनों की तरह संभालती थी…. अब उसके हाथों में नहीं, इस अजनबी के पास थी।

    उसने किताब हाथ में ली, काँपती उंगलियाँ जैसे किसी खोए हुए बच्चे को गले लगाना चाहती हों।

    “तुमने… देखा इसे?” उसने संकोच से पूछा।

    वो मुस्कुराया, एक धीमे उजाले की तरह जो किसी बहुत गहरे अंधेरे को समझता हो।

    “देखना तो नहीं चाहिए था मुझे” उसने जवाब दिया, “लेकिन ये पन्ना नंबर 23…. खुद ही अलग होकर गिर पड़ा था…. वही सबसे प्यारा लगा मुझे।”

    रूहानी ने झट से उस पन्ने को पलटकर देखा। 

    वहाँ एक अधूरी लड़की थी…. आँखें बंद, हथेलियाँ फैली हुई… जैसे कुछ माँग रही हो… शायद खुद को।

    “वो मैंने खुद को रचा है,” रूहानी के ज़हन में गूंजा, मगर होंठ चुप रहे।

    उस दिन कुछ नहीं कहा गया ज़्यादा, बस उसने उसे अंदर बुलाया और कॉफी दी। 

    “यहाँ अक्सर बारिश आती है क्या?” उसने पूछा।

    रूहानी ने सिर हिलाया। “यहाँ बारिश नहीं, पुराने दिन आते हैं… और खुद को धो जाते हैं।”

    वो हँसा नहीं, बस देखता रहा… उस दीवार की ओर जहाँ रूहानी की अधूरी स्केच टंगी थी। 

    फिर धीरे से बोला, “मैं एक डॉक्यूमेंट्री बना रहा हूँ… लोकल आर्टिस्ट्स पर। तुम्हें शूट करना चाहता हूँ।”

    रूहानी ने पहली बार किसी को इतना हल्के से अपनी दुनिया में आते देखा था…. जैसे वो दरवाज़ा नहीं खटखटाता, बल्कि साँसों के ज़रिए भीतर उतरता हो।

    “कैमरे से डर लगता है मुझे,” वो मुस्कुराई थी उस दिन।

    “क्यों?” उसने पूछा।

    “क्योंकि वो मुझे वैसी दिखा देता है, जैसी मैं खुद से भी छिपाना चाहती हूँ।”

    वो कुछ पल खामोश रहा, फिर कहा, “तो कैमरे को झूठ बोलना सिखा देंगे। या शायद… सच के लिए थोड़ा प्यार बाँट देंगे।”

    उस शाम के बाद, एकांश सिर्फ उस डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा नहीं रहा। वो उसके स्केचों के बीच रहने लगा… कभी पन्नों में, कभी रंगों में, और धीरे-धीरे साँसों में।

    flashback ends

    वो उस दिन को भूल नहीं पाई। ना पन्ना नंबर 23 को और ना उस एकांश को जो पहली बार किसी के सपनों को लौटा कर आया था।

    “काश,” उसने बेंच पर बैठे-बैठे सोचा, “कुछ चीज़ें लौटकर सिर्फ स्केचबुक तक सीमित रहतीं… दिल तक नहीं जातीं।”

    तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी। एक अनजान नंबर से सिर्फ एक पंक्ति….

    “तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती। वो मेरा था… और हमेशा रहेगा।” 

    उसका दिल एक लम्हे को रुक गया। उँगलियाँ स्क्रीन पर जमीं रहीं। आसपास सब कुछ चलता रहा….

    वर्कर्स की आवाज़ें, मशीनों की गूंज, ट्रैफिक का शोर….. लेकिन रूहानी के भीतर सन्नाटा उतर आया।

    उसने नंबर दोबारा देखा, पहचानने की कोशिश की… मगर न नाम, न कोई और सुराग।

    पर जो लहजा था… वो अजनबी नहीं था।

    ——————-

    वो मैसेज किसका था, जो एकांश को अपना बता गया…? 

    अगर वो लहजा अजनबी नहीं था, तो क्या रूहानी पहले ही किसी अनजाने झूठ से बंध चुकी थी…?

    क्या रूहानी सच में भूल पाई थी एकांश को… या बस खुद से झूठ बोल रही थी? 

  • अधूरी इबादत भाग~39

    अधूरी इबादत भाग~39

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~39 कुछ तो छुपा है… 

     

    एकांश के कानों को यकीन नहीं हुआ… सामने खड़ी रूहानी, वही रूहानी, जिसकी आँखों में कभी उसने खुद को देखा था, जिसकी हँसी से उसकी सुबहें जगा करती थीं…. आज वही औरत, अद्वैत की पत्नी कहलाने लगी है?

    उसके ही भाई की पत्नी…..

    फिर भले ही वो आज किसी और का पति है , कोई और औरत जिसके साथ उसने अग्नि के सात फेरे लिए थे…..

    एक पल को तो उसका शरीर सुन्न हो गया, समय जैसे थम गया। उसके चारों ओर की आवाजें मद्धम पड़ गईं और आँखों के सामने सिर्फ रूहानी का चेहरा छाया हुआ था और उसकी मांग में भरा सिंदूर और गले में मंगलसूत्र….. जो चीख-चीखकर कह रहा था कि अब वह किसी और की है। 

    उसने अद्वैत की ओर देखा….. वो अद्वैत जो बचपन से ही उसका हमदर्द रहा, जिसने उसे कभी यह महसूस होने नहीं दिया कि वह उसका सगा भाई नहीं है। 

    एकांश के दिल में अद्वैत के लिए कभी कोई ईर्ष्या नहीं थी… कभी भी नहीं। लेकिन यह… यह बहुत अलग था।

    “इतनी जल्दी?” एक प्रश्न खुद-ब-खुद उसके भीतर से उठा। 

    “भाई ईशिता भाभी को इतनी जल्दी कैसे भूल सकते है? क्या सब कुछ इतना ही आसान था उनके लिए?”

    लेकिन यह सवाल सिर्फ अद्वैत के लिए नहीं था। यह सवाल खुद रूहानी के लिए भी था। 

    वो रूहानी, जिसे वह जानता था…. टूटने के बाद भी मुस्कुराने वाली, मगर भीतर से बिखरने वाली।

    क्या वो सच में इतनी जल्दी आगे बढ़ गई? इतनी जल्दी move on कर पाना क्या उसके लिए इतना आसान था? 

    एकांश के भीतर उठता सवाल जैसे खुद एक दरवाज़ा खोल गया..…. एक पुरानी गली का, जहाँ हर मोड़ पर एक मुस्कान बिखरी थी, हर दीवार पर कोई अधूरी बात टंगी थी।

    flashback 

    रूहानी और उसका वो पुराना स्टूडियो… वही ईंटों से बने कच्चे से कमरे का कोना, जहाँ धूप शाम की तरह उतरती थी और कपड़े के टुकड़ों पर रंग नहीं, सपने चिपकाए जाते थे।

    उस शाम भी कुछ ऐसा ही था। हल्की हल्की बारिश हो रही थी। बाहर का आसमान जैसे उदास था, मगर भीतर की हवा में कोई मीठा साज़ बज रहा था।

    कमरे की एक दीवार पर रूहानी के स्केच चिपके थे…. कुछ अधूरे, कुछ अनगढ़, मगर हर एक में उसका दिल धड़कता था।

    एकांश फर्श पर बैठा था, कैमरा गोद में रखे और सामने खड़ी थी रूहानी… हल्के नीले रंग की इंडो-वेस्टर्न ड्रेस में, बालों को रबर बैंड से ऊपर बाँध रखा था, कुछ लटें उसके गालों पर गिरती थी और उसकी आँखों में वो चमक थी जो केवल अपने सपनों से लड़ने वालों में होती है।

    “इतनी जल्दी क्यों भागती हो तुम हर बार कैमरे से?” एकांश ने मुस्कुराकर पूछा था, उसकी आँखों में खेलती हुई रौशनी उस पर टिकी थी।

    रूहानी ने झिझकते हुए नजर झुकाया, फिर उसके सामने चुपचाप आ खड़ी हुई, “क्योंकि तुम मुझे वैसा देख लेते हो… जैसा मैं खुद को कभी नहीं देख पाई।”

    एकांश की आँखें पल भर को ठहर गईं। उसने कैमरा नीचे रख दिया और धीमे से बोला, “और मैं तुम्हें वैसी देखना ही नहीं चाहता… जैसी तुम खुद को देखती हो।”

    रूहानी के होंठ थरथराए थे। वो कुछ कहती, उससे पहले ही एकांश ने आगे बढ़कर उसकी हथेली थाम ली। उस छोटे से स्पर्श में जो गर्माहट थी, उसने कमरे की नमी को भी छू लिया।

    “कभी-कभी लगता है…” रूहानी की आवाज़ टूटी, “तुम्हारे कैमरे में नहीं, तुम्हारी आँखों में रहना चाहती हूँ मैं।”

    एकांश कुछ पल तक उसे बस देखता रहा। रूहानी के चेहरे पर वो मासूम-सी ख्वाहिश थी, जैसे कोई बच्चा टॉफ़ी नहीं, एक घर माँग रहा हो।

    “तो रहो न,” एकांश ने फुसफुसाकर कहा, “यह आँखें तुम्हारा इंतज़ार करती हैं… हर पल।”

    वो एक क्षण… समय जैसे ठहर गया था। 

    रूहानी ने उसकी ओर देखा…. गहराई से, पूरी तरह, जैसे उसके भीतर उतर जाना चाहती हो, उस नज़्म की तरह, जिसे कोई पढ़ ले।

    रूहानी ने धीरे से कहा, “तुम्हें खो दूँगी, तो शायद सब कुछ खो जाएगा… क्योंकि अब जब दिल धड़कता है, तो लगता है बस तुम्हारे नाम पर ही ज़िंदा है।”

    वो उससे लिपट गई थी, उस पुराने स्टूडियो की भींगी हवा में, उसकी हथेलियों में अपनी साँसें भरते हुए। कोई वादा नहीं था, बस एक साँझ थी, जिसमें रूहानी ने पहली बार खुद को पूरा महसूस किया था, एकांश की बाँहों में।

    उसी शाम एकांश ने जो तस्वीरें खींचीं, वो कभी किसी को नहीं दिखाई। वो उसके स्टूडियो की सबसे नज़दीकी दराज़ में बंद रहीं… क्योंकि उनमें रूहानी नहीं, उसकी पूरी दुनिया कैद थी।

    उसका दिल अब फिर से वही खो गया… उसी स्टूडियो में, उसी हल्की बारिश में… उसी वाक्य पर…. 

    “तुम्हें खो दूँगी, तो सब कुछ खो जाएगा…”

    flashback end 

    एकांश की आँखों में अब सवालों की आग थी। हर लम्हा एक साज़िश सा लगने लगा। दिल किसी पुराने गीत की तरह बार-बार वही धुन गुनगुनाता रहा— “कुछ तो है… कुछ छुपा हुआ है…”

    अब वह पीछे नहीं हटेगा। उसे जानना होगा… हर सच, हर परत… और उस सवाल का जवाब, जो अब उसकी रातों की नींद उड़ाने वाला था।

    “भाई… आप कब रूहानी से मिले?” एकांश की आवाज़ धीमी थी, मगर भीतर से कंपकंपाती हुई निकली। जैसे किसी बंद दरवाज़े को सालों बाद खटखटाया हो। 

    अद्वैत कुछ पल के लिए चुप रह गया। उसे समझ नहीं आया कि कहाँ से शुरू करे, कौन सा सच पहले बताए और कौन सा खुद तक ही सीमित रखे। 

    लेकिन उससे पहले ही एक अजीब-सी बात उसके मन में कौंधी, एकांश ने रूहानी का नाम सीधे क्यों लिया? 

    क्या वो उसे पहले से जानता था? उसकी आँखों में सवाल तैर गए। 

    “तुम… तुम रूहानी को कैसे जानते हो, एकांश?” अद्वैत की आवाज़ अब कुछ सख़्त थी, जैसे दिल में बैठी शंका को अब ज़ुबान मिल गई हो। 

    दोनों की आँखें एक-दूसरे से टकराईं… एक में आश्चर्य था, दूसरे में छुपा हुआ डर। 

    और तभी, जैसे उन दोनों के सवालों को सुनकर कोई तीसरा जवाब देने चला हो, पीछे से एक धीमी, मगर भारी आवाज़ आई……

    दोनों भाई पलटे तो देखा, रूहानी अब धीरे-धीरे उठकर बैठ चुकी थी। उसका चेहरा उतरा हुआ था, आँखों के नीचे नींद और उलझनों की छाया साफ़ दिख रही थी।

    उसकी आवाज़ बस इतनी कि सन्नाटे ने भी कान लगाकर सुनी, “पानी…” वह बस इतना ही कह पाई।

    दोनों जैसे किसी सहज पल में लौट आए हों, बिना कुछ बोले, दोनो अलग-अलग गिलासों में पानी लेकर डाइनिंग टेबल से उसकी ओर बढ़े। 

    अद्वैत के हाथ में कांपती उंगलियाँ थी और एकांश की आँखों में हज़ार सवाल छिपे थे। 

    रूहानी ने नज़रें उठाईं, दोनों के हाथों में पकड़े पानी को देखा…. कुछ ऐसा था उस दृश्य में, जैसे अतीत और वर्तमान पहली बार आमने-सामने खड़े हों।

    पर उसने पानी नहीं पिया। वह तुरंत खड़ी हुई, अपनी कपड़े ठीक करते हुए बोली, “मुझे एक अर्जेंट काम है, निकलना होगा।” 

    और बिना किसी की ओर देखे, तेजी से अपना पर्स उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ गई।

    “रूहानी,” अद्वैत की आवाज़ में चिंता भी थी और असहजता भी, “नाश्ता तो करती जाओ…”

    एकांश ने एक पल सोचा, फिर संयम से कहा, “अगर जल्दी है तो मैं छोड़ देता हूँ तुम्हें… अपनी कार से।”

    रूहानी वहीं दरवाज़े के पास ठिठक गई। उसकी पीठ अब भी उनकी ओर थी, मगर भीतर कहीं कुछ जैसे टूट रहा था। 

    आँखें नम हो चुकी थीं, पर उसने पलकें मजबूती से रोके रखीं। कुछ कहना चाहती थी, पर ज़ुबान साथ नहीं दे रही थी। 

    ठीक उसी पल एकांश का मोबाइल बजा, वह जेब से निकालकर स्क्रीन की ओर देखने लगा। उसकी पत्नी का नाम चमक रहा था। 

    उसने एक हल्की-सी मुस्कान के साथ अद्वैत को गले लगाया, “ठीक है, भाई… फिर जल्दी आऊँगा। घर से कॉल आ रहा है।”

    अद्वैत ने सिर हिलाकर उसे विदा किया, लेकिन वो जो अगला वाक्य एकांश ने हवा में कहा, उसने जैसे कमरे की दीवारों को भी सिहरने पर मजबूर कर दिया।

    एकांश के आख़िरी शब्द उसके कानों में नहीं, सीधे उसकी धड़कनों में गूंजे, “आपकी वाइफ से अच्छे से मुलाकात भी तो नहीं हुई है…. इशिता भाभी को गए हुए अभी ज्यादा वक्त भी तो नहीं गुजरा है,” यह कहकर एकांश मुस्कुराया और दरवाज़े की ओर बढ़ गया। 

    अद्वैत भी बस एक हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाता रहा, जैसे सब कुछ सामान्य हो।

    रूहानी वहीं दरवाज़े की चौखट के पास जैसे जम-सी गई। उसकी साँसें रुक गई थीं। हाथ में पकड़ा पर्स अब हथेली में पसीने से भीग चुका था। 

    शब्द हवा में जैसे फँस गए थे और दिल की धड़कन किसी पुरानी घड़ी की तरह लड़खड़ाने लगी थी।

    “एकांश राठौड़…”

    उसने मन ही मन दोहराया, होंठों के नीचे कुछ काँपा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया था, जैसे अचानक कोई परदा हट गया हो और अतीत की नंगी रौशनी आँखों में चुभने लगी हो।

    “अद्वैत अवस्थी का छोटा भाई…”

    वह शब्द जो अब तक केवल नाम थे, अचानक अर्थ लेने लगे थे….. भारी, जटिल, और असहनीय।

    ————–

    “आपकी वाइफ से अच्छे से मुलाकात भी तो नहीं हुई है…” क्या एकांश के शब्दों में कोई छुपा इशारा था… जो रूहानी ही समझ सकी? 

    क्या अब सच सामने आएगा… या सब कुछ और गहराई में दफ़न हो जाएगा?

  • अधूरी इबादत भाग~38

    अधूरी इबादत भाग~38

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~38 रूहानी… मेरी पत्नी

     

    फ्लैशबैक = एकांश की शादी की रात 

    उस रात महफ़िल अपने पूरे शबाब पर थी। झूमते हुए झूमर, रंगीन रोशनी में चमकती दीवारें और शहनाइयों की मधुर स्वर-लहरियाँ…. सब कुछ जैसे एक परी-कथा की तरह सजा था।

    हर चेहरा मुस्कराता, हर नजरें दुआओं से भरी हुईं, मगर जैसे ही दरवाज़े की भारी चौखट से कदम रखते हुए अद्वैत भीतर दाख़िल हुआ… वक़्त ने धीमी चाल पकड़ ली।

    उसका चेहरा गम्भीर था, कंधे तनकर सीधा चलने वाले थे, मगर आँखों में एक बेचैनी थी जिसे शोर-गुल भी नहीं दबा पा रहा था। कमरे की रौशनी उसकी आँखों से उलझ रही थी, पर उसका ध्यान तो कुछ और ही तलाश रहा था। और तभी…..

    सीढ़ियों के पास, सफेद सलवार में लिपटी एक लड़की, जिसके कंधे काँप रहे थे, जो किसी तूफान से भागकर आई हो….. बिखरे आँसू, धुँधली नज़रें और मन का ऐसा कोलाहल कि उसे खुद भी नहीं पता था वो कहाँ जा रही है।

    और तभी दोनों की टकराहट हुई।

    एक झटका… वो अचानक रुक गए। एक सन्नाटा उनके इर्द-गिर्द पसर गया जैसे महफ़िल की हर आवाज़ थम गई हो।

    दोनों की नज़रें झुकी हुईं, चेहरों का सामना नहीं हुआ, वे दोनों ही नहीं एक दूसरे की तरफ नहीं मुड़े..… मगर दिलों ने कुछ महसूस किया। कुछ जाना-पहचाना, मगर अनकहा।

    लड़की काँपती आवाज़ में बुदबुदाई, “सॉरी…”

    अद्वैत भी धीमे से फुसफुसाया, “इट्स ओके…”

    बस इतना ही। दोनों फिर अपने रास्ते चल पड़े…. जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

    यूँ तो अद्वैत सौतेले भाई की शादी में न चाहते हुए भी चला आया था…… केवल अपने भाई की ज़िद के आगे।   

    शादी की सजावटें भले ही चमचमा रही थीं, पर उसके अंदर कुछ बुरी तरह बुझा हुआ था। हँसी-ठहाकों की गूंज में उसके भीतर एक सन्नाटा था, ठंडा और थरथराता हुआ। 

    एकांगी स्नेह से भरे इस माहौल में वह बस एक अधूरा किरदार था, जिसे मंच पर होना तो था, पर संवाद नहीं दिए गए थे। 

    “अरे, देखो तो कौन आया है!”   

    किसी ने ठहाका लगाया और कुछ चेहरे उसकी ओर मुड़ गए।    

    “कौन? ओह! वही… नाजायज़ औलाद!”

    ये शब्द तीर की तरह उसके भीतर उतर गए। नहीं, ये नया नहीं था। हर बार की तरह वही लहजा, वही ज़हर। लेकिन चेहरा… चेहरा निर्विकार रहा। वही शांति, जो उसने वर्षों से ओढ़ रखी थी जैसे आत्मा के जख्मों पर बर्फ की पट्टियाँ बांध ली हों।  

    “अब तो बड़ा लेखक बन गया है… नाम है अद्वैत अवस्थी का!” किसी और ने तंज कसा।  

    “पर एक सच्चाई कभी नहीं बदलेगी, है ना?”  

    कानों तक बात पहुंची, फिर दिल तक, फिर जैसे रगों में ठंडक उतर आई। उंगलियाँ अनजाने में कस गईं, जैसे अपने ही भीतर कुछ थामने की कोशिश कर रहा हो।

    किसी और को जैसे अचानक याद आया…

    “वैसे इसकी पत्नी भी मर गई है ना? हाय बेचारी! जाने किस पाप का फल मिला उसे!”  

    इस बार भीतर कुछ टूटा। जैसे किसी ने उसकी आत्मा पर खरोंच मार दी हो। उसकी इशिता… वह जो उसकी ज़िंदगी की इकलौती रोशनी थी, उसके सारे अंधेरों में एक मोमबत्ती। अब वह भी नहीं थी। केवल याद थी…. अधूरी, चुप, और बर्फ सी ठंडी। 

    “और उससे पहले इसकी माँ भी तो छोड़ गई थी इसे…” किसी ने और धीरे कहा, पर पर्याप्त तेज़ कि वो सुन ले। 

    उसने कुछ नहीं कहा। बस एक गहरी साँस ली, मानो उस सारे ज़हर को अपने भीतर पी गया हो। वह जानता था, शब्दों की लड़ाई में उसकी हार पहले ही तय थी। बचपन से लेकर अब तक, कोई भी उसका सच सुनने को तैयार नहीं था। 

    वह अपने सौतेले भाई एकांश की ओर बढ़ा। अपने साथ लाया छोटा सा गिफ्ट बॉक्स उसके हाथ में दिया, जैसे सालों की चुप्पी उसमें बंद कर दी हो। एक हल्की सी मुस्कान दी, जो शब्दों से ज़्यादा कहती थी। 

    एकांश की आँखों में हलचल थी, शायद पछतावा, शायद कुछ कहना जो जुबां तक नहीं आ सका और न ही अद्वैत ने कोई उम्मीद की।

    अद्वैत ने भी कुछ नहीं बोला। वो जानता था, अब किसी स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं रही। जो रिश्ता था, वो कब का मर चुका था। अब बस उसकी राख रह गई थी….. गर्म, चुप और लाचार। 

    हॉल से बाहर निकलते समय उसके कदम ठोस थे, पर भीतर से वह दरक रहा था। जैसे हर कदम उसके भीतर की एक ईंट गिरा रहा हो।

    दरवाज़े से निकलते हुए उसने एक आखिरी बार पीछे देखा…. भीड़ अब भी हँस रही थी, जैसे उसका आना और जाना महज़ हवा का झोंका था।

    कार में बैठते ही उसने अपना सिर स्टीयरिंग पर टिका दिया, आँखें बंद कर लीं।

    “इशिता…” वह बुदबुदाया।

    बस एक नाम… पर उस नाम में पूरा जीवन था। एक खोया हुआ जीवन।

    कार स्टार्ट की और वो उसी तरह चला गया जैसे आया था….. चुपचाप, अनदेखा, और भीतर से खाली। 

    यही उसका नसीब था… आना, देखना, सहना, और बिना शोर किए लौट जाना।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    वर्तमान…….

    अद्वैत एकांश से खुद को धीरे से अलग किया।, जैसे कोई पुरानी किताब का पन्ना वापस बंद कर रहा हो….. सहेजते हुए, मगर दोबारा न पढ़ने की कसम के साथ। 

    उसकी आँखें अब भी एकांश की आँखों में नहीं देख रही थीं, क्योंकि वहाँ सवाल थे….. ऐसे सवाल जिनके जवाब उसके सीने में पत्थर बनकर जमे हुए थे। 

    “भाई…” एकांश की आवाज़ टूटी, मगर सीधी दिल से निकली, “मेरी शादी की रात… आप अचानक वापस क्यों चले आए थे? बिना बताए… बिना कुछ कहे… मैं आपको पूरे फेरे भर ढूंढता रहा… आप क्यों नहीं रुके?” 

    यह सवाल सुनते ही अद्वैत कुछ पल चुप खड़ा रहा। जैसे कोई पुराना घाव फिर से खुल गया हो। उसकी पलकें भारी थीं, पर उनमें आँसू नहीं, सिर्फ एक पुरानी परछाई थी….. दर्द की, ठुकराए जाने की, और न कह पाने की। 

    “मैं… रुकना चाहता था एकांश,” अद्वैत ने धीमे, थके हुए स्वर में कहा, “लेकिन… वहाँ जो शोर था, वह मेरी आत्मा की चुप्पी को निगलने लगा था। हर मुस्कान मेरे भीतर की किसी स्मृति को घायल कर रही थी।”

    उसने दीवार से नजर हटाकर दूर, खिड़की से बाहर अंधे आकाश की ओर देखा।

    “जब सबने मेरा स्वागत नहीं, मेरी परछाईं को याद किया… जब हर तंज मेरे ज़ख्मों को कुरेदता चला गया… मैं बस वहाँ और नहीं रह सकता था। तुम्हारे लिए आया था, सच में। लेकिन वो लोग…” वह रुका, साँस खींची। 

    उसने एक क्षण को आँखें बंद कीं, मानो भीतर का शोर फिर जाग गया हो।

    अद्वैत ने एक गहरी साँस ली, जैसे भीतर उठते भूचाल को जबरन रोक रहा हो। उसकी आँखें अब भी खिड़की के उस पार किसी अनदेखी दूरी को ताक रही थीं, पर भीतर कुछ बदल रहा था…. शब्दों की जगह अब जज़्बात ले रहे थे। 

    उसने अचानक अपनी उदासी को पीछे धकेला और एक हल्का सा मुस्कान लिए, आवाज़ में पुराना अपनापन लौटाते हुए कहा, “वैसे एकांश… तुम भी तो अपनी शादी के बाद अब मिल रहे हो मुझसे। कितने दिन हो गए, गिनती में आ भी नहीं रहा।”

    उसके स्वर में कोई उलाहना नहीं था, बस एक मीठी सी शिकायत थी… जैसे कोई टूटा हुआ रिश्ता अपनी पहली दरार पर उँगली रखकर मुस्कुराने की कोशिश कर रहा हो।

    एकांश की पलकें झुक गईं, उसकी आँखें भीग गई थीं…… न शर्म से, न अपराधबोध से, बल्कि उस नज़दीकी के एहसास से जिसे उन्होंने खुद ही समय और सन्नाटे के हवाले कर दिया था।

    “मैं आया था, भाई..…” उसकी आवाज़ काँपी, “कई बार… दरवाज़े तक। लेकिन… हिम्मत नहीं हुई कि कॉल बेल बजा सकूँ।”

    अद्वैत की आँखें थोड़ी नरम पड़ीं, जैसे बरसों की बर्फ पिघलने लगी हो।

    एकांश थोड़ा हँसा, हिचकी के बीच में, “लेकिन आज तो तय करके निकला था… कि बात करके ही जाऊँगा। पर ये नहीं सोचा था कि सुबह-सुबह आपके… गेस्ट से भी मुलाकात हो जाएगी।”

    अद्वैत ने उसकी बात सुनी, फिर बहुत ठहरकर, अपनी दोनों भौहें सिकोड़ते हुए, जैसे शब्दों को तोलकर बोल रहा हो, जवाब दिया, “रूहानी मेरी गेस्ट नहीं है।”

    एकांश ने चौंक कर उसकी ओर देखा। हल्की-सी हँसी के साथ चुटकी ली, “तो रूहानी आपकी कौन है, भाई?”

    अद्वैत अब उसकी आँखों में देख रहा था। वहाँ न शरारत थी, न व्यंग्य….. बस एक सीधी, निर्विकार नज़र। जैसे अब और कुछ छिपाना बाकी नहीं था। उसके शब्द सीधे, मगर भारी थे।

    “रूहानी मेरी पत्नी है।”

    यह सुनते ही एकांश ने एक कदम पीछे ले लिया, जैसे कुछ पकड़ने की कोशिश कर रहा हो जो अब फिसल चुका था। उसके चेहरे पर बहुत सारे भाव एक साथ उभर पड़े….. झटका, अविश्वास, दर्द और कुछ ऐसा, जो वो खुद भी समझ नहीं पाया।

    ————-

    तो क्या उस रात सीढ़ियों के पास काँपती वो लड़की… वही थी?

    फिर क्या छुपा था उन काँपते कंधों, उन बिखरे आँसुओं और उस एक “सॉरी” के पीछे?

    एकांश की आँखों में जो सवाल तैर रहे थे… क्या वो सिर्फ रूहानी को लेकर थे? 

  • अधूरी इबादत भाग~37

    अधूरी इबादत भाग~37

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~37 उसकी बाँहों में

     

    दरवाज़े पर जैसे ही रूहानी ने एकांश को देखा, उसके भीतर जैसे किसी भूले हुए समय की परछाइयाँ जाग उठीं। उसकी आँखें फैल गईं, होंठ सूख गए, और साँसों ने जैसे चलना बंद कर दिया हो। 

    उसके ज़ेहन में हजारों सवाल एक साथ दौड़ पड़े… “ये यहाँ कैसे? क्या ये मेरा पीछा कर रहा था? क्या अद्वैत को सब बता देगा?” दिल ने डर के थपेड़े खाए और दिमाग खाली हो गया, जैसे हर जवाब उस दरवाज़े के पीछे ही छूट गया हो।

    उसके पैर लड़खड़ाए। घबराहट उसकी साँसों में जहर घोलने लगी और शरीर सुन्न होने लगा। वो गिरने ही वाली थी, जब एक पुरानी आदत की तरह एकांश की बाँहें अचानक उसके चारों ओर आ गईं। उसने बिना सोचे, बिना समझे उसे थाम लिया, जैसे कोई भूली हुई महक अचानक साँसों में लौट आई हो। 

    उसकी बाँहों में रूहानी का शरीर हल्का-सा कांपा, और एकांश के हाथ, जैसे खुद-ब-खुद उसकी पीठ पर फिसलते गए, धीमे-धीमे, सहेजते हुए, जैसे पुराने दिनों की कोई आदत लौट आई हो। 

    उसकी आवाज़ बेहद मुलायम हुई, “रूहानी…” वो नाम जिसे अब उसने शायद अरसो से किसी और की ज़ुबान पर नहीं सुना था, अब किसी पुराने राग की तरह उसके कानों में घुल रहा था।

    अंदर से अद्वैत की आवाज़ आई, “रूहानी, कौन है?”

    मगर रूहानी जवाब नहीं दे सकी। और तब, जैसे किसी अपरिचित चेतावनी से घिरा हुआ, अद्वैत दरवाज़े की ओर आया और उसने देखा।

    उसकी नज़रों के सामने था…. उसकी ‘पत्नी’ किसी और की बाँहों में थी। मगर ये सिर्फ कोई और नहीं था… वो लड़का था जिसकी आँखों में उस वक़्त इतनी बेचैनी थी जैसे रूहानी को खो देने का डर फिर से उसके भीतर सुलग रहा हो। 

    अद्वैत की नज़रों में कुछ टूटा… कुछ बहुत बारीक, कुछ बेहद निजी। वो खुद नहीं समझ पाया कि क्या… लेकिन पहली बार उसने महसूस किया, उसे रूहानी को यूँ किसी और की बाँहों में देखना ठीक नहीं लगा।

    एकांश ने अद्वैत की ओर देखा, उसकी बाहों में अब भी रूहानी थी, जो बेहोश थी। उसकी आवाज़ थोड़ी काँपी, “मैं… मैं इसे कहाँ लिटा दूँ?”

    अद्वैत कुछ कहने वाला ही था…”नीचे उसके कमरे में…” मगर अचानक, जैसे कुछ भीतर से झटका देता है उसे, और वो झूठ बोल देता है, “यहाँ सोफे पर लिटा दो।”

    अद्वैत तुरंत किचन की ओर मुड़ता है, पानी लाने का बहाना बनाकर। उसकी उंगलियाँ पानी के गिलास को थामते हुए थोड़ी कांपती हैं, जैसे किसी अदृश्य दर्द से जूझ रही हों। 

    जब वो वापस आता है, तो देखता है….. एकांश अब भी उसके गाल थपथपा रहा है, धीरे-धीरे, उसी अंदाज़ में जैसे कोई बहुत अपना किसी अपने को होश में लाने की कोशिश करता है।

    अद्वैत वहीं ठिठक जाता है।

    गिलास उसके हाथ में ठहरा रहता है, मगर उसका ध्यान कहीं और है।

    क्यों चुभ रहा है ये?

    वो खुद से पूछना चाहता है…. मगर कोई जवाब नहीं…..

    उसकी नज़रें रूहानी के चेहरे पर ठहरती हैं और वहाँ एक अजीब-सी शांति है, जैसे उसका शरीर उस स्पर्श को पहचानता है… मानता है…

    और उस क्षण अद्वैत को पहली बार अहसास होता है कि शायद उसकी इस ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ के दायरे में अब कुछ ऐसा दाख़िल हो चुका है… जो अनुबंध से परे है।

    अद्वैत ने काँपते हाथों से पानी का गिलास उठाया, और खुद से रूहानी के चेहरे पर कुछ छींटे मारे। 

    एकांश अब भी वहीं बैठा था, उसका हाथ रूहानी के गाल पर था, लेकिन अद्वैत के आने से अब वो हल्के से पीछे हट चुका था, जैसे किसी पुराने हक़ को अब नए मौन से बदलना चाहता हो। 

    अद्वैत के चेहरे पर अब वो शांत मुखौटा नहीं था जो उसने अक्सर दुनिया को दिखाया था। उसकी भौंहें सख़्त थीं, जबड़े भींचे हुए, और होंठों के किनारे काँप रहे थे। उसकी उंगलियाँ अब बार-बार रूहानी के माथे को छूतीं, जैसे यह यक़ीन दिलाना चाहती हों कि सब ठीक है… कि वो यहाँ है… लेकिन हर बार जब रूहानी की पलकें नहीं फड़कतीं, उसका दिल और गहराई में डूबने लगता।

    “रूहानी… प्लीज़… होश में आओ,” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी, लेकिन इतनी सच्ची, इतनी भारी कि उस कमरे में हवा भी कुछ पल ठहर गई।

    एकांश ने ये सुना। और वह पल… जिसमें उसने अद्वैत की आँखों में कुछ देखा…. कुछ ऐसा जो शब्दों में नहीं था, लेकिन चीख रहा था… डर, मोह, उलझन… और शायद… एक नामालूम-सा अधिकार। 

    एकांश ने खुद को एक क़दम पीछे खींच लिया, जैसे अब ये दृश्य उसका नहीं था, जैसे कोई अदृश्य लकीर खिंच चुकी हो, जिसे लांघना अब मुमकिन नहीं।

    अद्वैत अब पूरे होश में था…. उसकी गंभीरता किसी जिम्मेदारी की नहीं थी, ये कुछ ज़्यादा था। 

    एकांश की आँखों ने देखा कि कैसे उसके चेहरे का रंग बदला… घबराहट उसकी पलकों पर जमा हो गई, जैसे कोई तूफ़ान आने से पहले का सन्नाटा।

    “देख न एकांश,” अद्वैत की आवाज़ टूटी, “रूहानी को होश नहीं आ रहा है।”

    एकांश की पलकों में चिंता झलक गई। वो तुरंत झुककर फिर से रूहानी के चेहरे के पास आया, उसकी नब्ज़ देखी, हाथ उसके गले के पास रखा, और फिर शांत स्वर में कहा, “भाई, जल्दी से डॉक्टर को बुलाओ… शॉक के कारण हो जाता है। लेकिन रिस्क नहीं ले सकते।”

    अद्वैत ने फौरन फोन उठाया, डॉक्टर को कॉल लगाया, और उसकी आवाज़ में वो घबराहट थी जो दिल को सीधा चीर जाती है। उसका हाथ काँप रहा था, और आँखें बार-बार रूहानी पर टिक रही थीं, जैसे हर पल उससे कहती हों, “तुम ठीक रहो… बस ठीक रहो…”

    फोन के दूसरी तरफ डॉक्टर की आवाज़ आई, “ये सिंकोप लग रहा है, शॉक के कारण। बस उसे लेटाकर पैरों को ऊपर रखो ताकि दिमाग तक खून का प्रवाह बढ़े। अगर दस मिनट में होश नहीं आता, तो क्लिनिक लाना पड़ेगा।”

    अद्वैत ने बिना वक़्त गँवाए एकांश को देखा, दोनों ने एक साथ मिलकर रूहानी को सावधानी से सोफे पर उसके पैरों के नीचे कुछ कुशन रखे। 

    अद्वैत अब ज़मीन पर बैठ चुका था, उसके माथे पर पसीना था, आँखें रूहानी के बंद पलकों पर टिकी थीं, जैसे उसकी हर साँस अब उसी की धड़कनों पर निर्भर हो।

    एकांश कुछ कदम पीछे खड़ा रहा। उसकी आँखों में भी चिंता थी, लेकिन वो जानता था… ये जगह अब सिर्फ उसकी नहीं रही। वहाँ एक और एहसास मौजूद था — अद्वैत का, जो शायद नाम नहीं जानता था… लेकिन महसूस कर चुका था।

    कमरे में अभी भी रूहानी की बेहोशी पसरी हुई थी, उसकी साँसें धीमी, लेकिन जारी थीं। उसकी पलकों पर थमे आँसू अब भी सूखने का नाम नहीं ले रहे थे। 

    बाहर मौसम जैसे कमरे की हालत से मेल खा रहा था…. बादलों से ढँका आसमान, कभी-कभी हल्की बिजली की चमक, और दूर से आती गरज की गूँज। 

    अद्वैत ने एक बार फिर उसकी ओर देखा, मगर इस बार उसकी नज़रें सिर्फ चिंता से भरी नहीं थीं, उनमें उलझन भी थी…. जैसे किसी पहेली के अनसुलझे टुकड़े अचानक आँखों के सामने बिखर गए हों।

    एकांश ने दीवार से टिककर लंबी साँस ली, फिर धीरे-धीरे अद्वैत के पास आया। उसकी चाल में कोई बनावट नहीं थी, बस एक सालों पुरानी थकान थी जो अब बाहर निकलना चाहती थी। 

    अचानक उसने आगे बढ़कर अद्वैत को बाँहों में भर लिया। एक क्षण के लिए दोनों सगे नहीं, मगर खून से बंधे हुए भाइयों की तरह एक-दूसरे के सीने से लग गए।

    “भाई…” एकांश की आवाज़ टूटी, मगर सीधी दिल से निकली, “मेरी शादी की रात… आप अचानक वापस क्यों चले आए थे? बिना बताए… बिना कुछ कहे… मैं आपको पूरे फेरे भर ढूंढता रहा… आप क्यों नहीं रुके?”

    अद्वैत सन्न खड़ा रह गया। उसका चेहरा ठंडा था, मगर आँखों में कुछ टूटता हुआ दिख रहा था।

    ————

    क्या अद्वैत सच में अब महसूस करने लगा है… कुछ ऐसा जो कभी तय नहीं किया गया था?

    रूहानी की बेहोशी में छुपा है कौन-सा सच… और वो होश में आकर सबसे पहला नाम किसका लेगी?

    एकांश का वो सवाल… ‘मेरी शादी के वक़्त आप वापस क्यों चले आए थे?’… क्या ये सब पहले से जुड़ा हुआ था किसी अधूरी कहानी से?

  • चार चोर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक छोटे से गांव में चार दोस्त रहते थे—कालू, भीमा, नंदू और गोपाल। पूरे गांव में उनकी पहचान चोरों के रूप में थी, लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था। लोग उन्हें देखते ही अपने दरवाज़े बंद कर लेते थे। बच्चे उनसे डरते थे और बड़े लोग उन्हें बुरा-भला कहते थे।

     

    असल में चारों बचपन से अनाथ थे। उनके पास न जमीन थी, न घर, न कोई अपना। कई बार उन्होंने मजदूरी की, लेकिन कभी काम मिलता तो कभी कई-कई दिन तक नहीं मिलता। कई रातें उन्होंने भूखे पेट बिताईं। आखिर एक दिन मजबूरी में उन्होंने चोरी का रास्ता चुन लिया।

     

    लेकिन एक अजीब बात थी।

     

    वे हर बार चोरी करने निकलते, मगर किसी न किसी वजह से उनका दिल बदल जाता और वे खाली हाथ लौट आते।

     

    एक रात कालू ने कहा, “दोस्तों, अब बहुत हो गया। आज अगर चोरी नहीं की तो कल खाने को कुछ नहीं होगा।”

     

    चारों गांव के सबसे अमीर सेठ की हवेली की ओर चल पड़े।

     

    आधी रात को वे दीवार फांदकर अंदर घुसे। तिजोरी वाला कमरा सामने था। जैसे ही कालू ने ताला खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, तभी पास के कमरे से किसी बच्ची के रोने की आवाज आई।

     

    उन्होंने धीरे से झांककर देखा।

     

    सेठ अपनी छोटी बेटी को गोद में लिए बैठा था।

     

    वह कह रहा था, “बेटा, सुबह शहर के बड़े डॉक्टर के पास चलेंगे। तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।”

     

    बेटी ने कमजोर आवाज में कहा, “पापा… मेरे लिए इतना परेशान मत होइए।”

     

    यह सुनते ही गोपाल की आंखें भर आईं।

     

    उसने फुसफुसाकर कहा, “जिस बाप की बेटी बीमार हो, उसका पैसा चुराकर हम कैसे चैन से जी पाएंगे?”

     

    चारों बिना कुछ लिए वापस लौट आए।

     

    अगले दिन उनके पास खाने के लिए सिर्फ एक सूखी रोटी थी। चारों ने उसे बराबर-बराबर बांटकर खाया।

     

    भीमा बोला, “अगर हर बार ऐसे ही लौटेंगे तो एक दिन भूख ही मार डालेगी।”

     

    कालू ने गहरी सांस ली।

     

    “भूख से लड़ लेंगे… लेकिन अपने ज़मीर से नहीं।”

     

    कुछ दिन बाद उन्होंने शहर के मशहूर सुनार की दुकान को निशाना बनाया।

     

    रात के अंधेरे में वे दुकान के अंदर पहुंच गए।

     

    तभी नंदू की नजर एक कागज पर पड़ी।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर इस महीने बैंक का कर्ज नहीं चुका पाया, तो दुकान और घर दोनों नीलाम हो जाएंगे।”

     

    कुछ ही दूरी पर सुनार अपनी पत्नी से कह रहा था,

     

    “चिंता मत करो। भगवान चाहेगा तो सब ठीक हो जाएगा।”

     

    चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और फिर बिना कुछ उठाए वहां से निकल गए।

     

    अब उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा था।

     

    तीन दिन तक उन्होंने सिर्फ पानी पीकर गुजारा किया।

     

    चौथे दिन गोपाल बोला, “अब गांव छोड़ देते हैं। शायद किसी दूसरे शहर में किस्मत बदल जाए।”

     

    चारों एक बड़े शहर पहुंच गए।

     

    वहां उन्होंने एक आलीशान हवेली देखी।

     

    उन्हें लगा कि इस बार जरूर माल मिलेगा।

     

    रात को वे अंदर घुसे।

     

    लेकिन अंदर सिर्फ एक बूढ़ी मां बैठी थी।

     

    वह भगवान के सामने हाथ जोड़कर रो रही थी।

     

    “हे भगवान… मेरा बेटा छह महीने से सीमा पर गया है। बस उसे सही-सलामत वापस भेज देना। मुझे धन नहीं चाहिए।”

     

    भीमा बोला, “चलो… यहां भी चोरी नहीं करेंगे।”

     

    चारों फिर लौट आए।

     

    अब तो उन्हें खुद पर हंसी भी आने लगी।

     

    नंदू बोला, “दुनिया में शायद हम ही ऐसे चोर हैं जो हर बार चोरी करने जाते हैं और खाली हाथ लौट आते हैं।”

     

    सभी हंस पड़े।

     

    एक शाम उन्हें रास्ते में एक बूढ़ा भिखारी मिला।

     

    वह कई दिनों से भूखा था।

     

    चारों के पास खाने के लिए सिर्फ दो रोटियां थीं।

     

    उन्होंने वे दोनों रोटियां उसी बूढ़े को खिला दीं।

     

    बूढ़े ने दुआ देते हुए कहा,

     

    “भगवान तुम्हें मेहनत की ऐसी कमाई देगा कि कभी किसी का हक नहीं छीनना पड़ेगा।”

     

    चारों मुस्कुरा दिए, लेकिन उन्हें यह बात उस समय सिर्फ एक दिलासा लगी।

     

    कुछ दिनों बाद गांव में खबर फैली कि एक बड़ा व्यापारी मेले से लौट रहा है। उसके पास सोने-चांदी और बहुत सारा पैसा है।

     

    चारों ने सोचा,

     

    “बस… यही आखिरी चोरी होगी। इसके बाद मेहनत से जिंदगी बिताएंगे।”

     

    वे जंगल में जाकर छिप गए।

     

    थोड़ी देर बाद व्यापारी की बैलगाड़ी वहां पहुंची।

     

    जैसे ही चारों बाहर निकले, अचानक झाड़ियों से दस-पंद्रह असली डाकू निकल आए।

     

    उन्होंने व्यापारी और उसके नौकरों पर हमला कर दिया।

     

    एक डाकू तलवार लेकर व्यापारी की तरफ बढ़ा।

     

    कालू जोर से चिल्लाया,

     

    “इसे बचाओ!”

     

    चारों बिना सोचे-समझे डाकुओं से भिड़ गए।

     

    लाठियां चलीं, पत्थर चले, कई घूंसे लगे।

     

    गोपाल के सिर से खून बहने लगा।

     

    भीमा के हाथ में चोट लगी।

     

    लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

     

    आखिरकार डाकू वहां से भाग गए।

     

    व्यापारी की जान बच गई।

     

    वह हैरान होकर बोला,

     

    “तुम लोग कौन हो?”

     

    कालू ने सिर झुका लिया।

     

    “सच कहें तो… हम तुम्हें लूटने आए थे।”

     

    व्यापारी कुछ पल तक उन्हें देखता रहा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    “जो लोग अपनी जान जोखिम में डालकर किसी अनजान इंसान की रक्षा कर सकते हैं, वे चोर नहीं हो सकते।”

     

    उसने चारों को अपने साथ शहर चलने का निमंत्रण दिया।

     

    अगले ही दिन उसने अपने गोदाम में उन्हें काम दे दिया।

     

    चारों ने पूरी ईमानदारी से काम करना शुरू किया।

     

    वे सुबह सबसे पहले पहुंचते और सबसे आखिर में घर लौटते।

     

    कुछ महीनों में ही व्यापारी का कारोबार पहले से दोगुना हो गया।

     

    लोग कहने लगे,

     

    “ये चारों जहां काम करते हैं, वहां बरकत आ जाती है।”

     

    एक दिन व्यापारी ने सबके सामने कहा,

     

    “आज से तुम मेरे नौकर नहीं, मेरे साझेदार हो।”

     

    चारों की आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े।

     

    उन्हें पहली बार लगा कि ईमानदारी का रास्ता कठिन जरूर होता है, लेकिन मंजिल सबसे खूबसूरत होती है।

     

    कुछ साल बाद चारों ने अपना खुद का व्यापार शुरू किया।

     

    उन्होंने गांव में एक छोटा-सा अनाथालय भी बनवाया, ताकि कोई बच्चा उनकी तरह मजबूरी में गलत रास्ते पर न जाए।

     

    एक दिन गांव के बच्चों ने उनसे पूछा,

     

    “चाचा, क्या आप सच में पहले चोर थे?”

     

    कालू हंसते हुए बोला,

     

    “हां बेटा, चोरी करने जाते थे।”

     

    “फिर करते क्यों नहीं थे?”

     

    गोपाल मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि हर बार हमारा दिल कह देता था कि किसी की मेहनत की कमाई छीनकर कभी सुकून नहीं मिलेगा।”

     

    भीमा बोला,

     

    “गरीबी इंसान को मजबूर कर सकती है, लेकिन उसका ज़मीर अगर ज़िंदा हो, तो वह उसे सही रास्ते पर जरूर वापस ले आता है।”

     

    नंदू ने बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “याद रखना, मेहनत से कमाया हुआ एक रुपया भी चोरी के हजार रुपयों से ज्यादा कीमती होता है।”

     

    उस दिन पूरे गांव ने पहली बार उन्हें चोर नहीं, बल्कि ईमानदार और नेकदिल इंसान कहा।

     

    चारों दोस्तों ने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन उस बूढ़े भिखारी की दुआ को याद किया।

     

    उन्हें अब यकीन हो गया था कि भगवान देर जरूर करता है, लेकिन मेहनत और अच्छे दिल का फल कभी अधूरा नहीं छोड़ता।

     

     

    मुश्किल हालात इंसान की परीक्षा लेते हैं, लेकिन उसका चरित्र यह तय करता है कि वह गिरकर बुरा बनेगा या संभलकर बेहतर इंसान।

     

  • अधूरी इबादत भाग~36

    अधूरी इबादत भाग~36

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~36  तुम… यहाँ क्यों? 

     

    रूहानी की नज़रें उस अलमारी से हटकर अब पूरे कमरे को टटोल रही थीं, जैसे हर चीज़ से एक जवाब माँग रही हो। उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे मेज़, दराज़, और किताबों की कतारों पर फिसलती चली गईं, हर पल उम्मीद और बेचैनी की लहरों से भीगती। 

    तभी उसकी नज़र कमरे के सबसे पिछले कोने में पड़ी—जहाँ एक पुरानी किताबों की गठरी पड़ी थी, धूल की चादर ओढ़े हुए। वह झुकी, और जैसे ही उसने गठरी हटाई, एक फाइलनुमा डायरी उसके हाथों में आ गई… वही हल्का नीला कवर, और किनारे से झांकता हुआ इशिता का नाम। 

    उस पल रूहानी के भीतर जैसे कोई सील टूट गई। सांसें तेज़ हो गईं, और उंगलियाँ काँपने लगीं।

    “यही है…” उसने बुदबुदाकर खुद से कहा, जैसे किसी अपराध की स्वीकारोक्ति कर रही हो।

    कमरे की नीरवता अब और भारी हो गई थी, मानो अद्वैत की मौजूदगी कहीं दीवारों में गूंज रही हो। और वहीं दूसरी ओर, कहीं दूर, एक अनकही सच्चाई उसके इंतज़ार में थी, किसी अधूरे पन्ने की तरह जो खुला तो बहुत कुछ बदल सकता था… शायद सब कुछ।

    रूहानी ने जैसे ही पुरानी किताब का पन्ना खोला, उसमें से एक मोड़ा हुआ ख़त निकल आया। कमरे में हल्की-सी पीली रौशनी थी, चांदनी खिड़की से फर्श पर उतर रही थी और पूरा कमरा एक सन्नाटे की चादर ओढ़े था। दीवार घड़ी की टिक-टिक और बाहर किसी कुत्ते की दूर जाती आवाज़ के सिवा कुछ भी न था।

    उसने गहरी साँस ली, ख़त को खोला और धीमे-धीमे पढ़ने लगी।

    “मुझे आज भी वो दिन साफ़ याद है जब तुमने कहा था कि तुम मुझसे प्यार करोगे। उस दिन, अनजाने में तुमने मेरी कलाई थाम ली थी जब समुद्र की लहरें किनारे से टकरा रही थीं लेकिन उनका शोर भी मेरे दिल की धड़कनों के आगे फीका पड़ गया था।

    मैंने कोशिश की थी, सच में, हज़ारों बार उस दिन को भूल जाने की। लेकिन यह दिल… यह नहीं चाहता कि उस पल को जाने दे। वो पल जब मुझे लगा कि मैं ताउम्र तुमसे मोहब्बत करने वाली हूँ। और मैं चाहती हूँ कि तुम जानो… मैं आज भी तुमसे मोहब्बत करती हूँ, और करती रहूँगी।”

    पढ़ते-पढ़ते रूहानी की उंगलियाँ कांपने लगीं। उसने किताब को बंद किया, ख़त को सावधानी से वापस मोड़ा, और फिर कमरे की खिड़की बंद कर दी। हवा अब भी बाहर बह रही थी, पर कमरे के अंदर जैसे कोई सूनापन घुस आया हो। 

    उसने ख़त को उसी किताब के भीतर वापस रखा, लेकिन वो बेचैनी अब उसकी सांसों से उतरकर उसके दिल में टिक चुकी थी।

    वो उठी और वापिस दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतरकर कमरे में पहुँची, फिर धीरे-धीरे बिस्तर की ओर बढ़ी। बिस्तर पर गिरते ही वह एकटक छत को घूरने लगी, जैसे वहाँ कोई जवाब छिपा हो। 

    दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं मानो कोई अंदर से छटपटा रहा हो। गले में अटकी हुई सिसकियाँ अब आँखों से बहकर गालों तक पहुँच गईं।

    रूहानी को खुद नहीं पता था कि वो रो क्यों रही है। पर ये खालीपन, ये टूटापन… किसी तरह सुकून दे रहा था। जैसे एक घाव जो अब खुलकर बह रहा हो। 

    उसे लगा, शायद ये उस एहसास की चुभन है कि वो किसी के लिए भी कभी “काफ़ी” नहीं रही।

    न अपने घर के लिए। 

    न उसके लिए जिन्हें उसने अपना सब कुछ मान लिया था।

    “उसने ही तो मुझे धोखा दिया था… मेरा करियर, मेरा विश्वास…. सबकुछ तोड़ दिया,” रूहानी ने धीमे से खुद से कहा।

    उसकी आँखों में अब आँसू नहीं, बस एक थकी हुई चमक थी… जैसे रो लेने के बाद भी सुकून नहीं, सिर्फ़ थकावट मिली हो।

    रात के उस पहर में, कमरे की दीवारें भी जैसे उसके भीतर की चीखें चुपचाप सुन रही थीं…

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रात भर अद्वैत करवटें बदलता रहा, जैसे हर अंग अपने किए पर शर्मिंदा हो। कमरे की दीवारें भी उसके साथ जाग रही थीं, और हर साँस एक बोझ की तरह उसके सीने में उतर रही थी। 

    उसके भीतर एक बेचैनी थी — नहीं, सिर्फ़ इस बात की नहीं कि उसने दरवाज़ा बिना इजाज़त खोला… बल्कि इस डर की कि रूहानी ने उसे वैसा देखा जैसा वो कभी होना नहीं चाहता था। 

    उसके ख्यालों में बार-बार रूहानी की वो नज़रें तैरतीं, जो चोट खाई थीं…. न चिल्लाईं, न तोड़ीं, बस चुपचाप उतर गईं उसकी आत्मा तक।

    सुबह जब हल्की धूप खिड़की के कोनों से सरकती हुई फर्श पर फैल रही थी, अद्वैत बिस्तर छोड़ चुका था। रसोई में जाकर उसने पहला काम किया — इंटरनेट पर सर्च किया: “How to make sandwich and coffee for someone you’ve hurt.” 

    उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर दिल में एक अजीब सी ठान थी। उसे खाना बनाना नहीं आता था, पर उसे एहसास आता था। उसने ब्रेड निकाली, टमाटर धीरे-धीरे काटे, चीज़ को बहुत एहतियात से रखा… जैसे हर परत में वह अपनी गलती का इकरार रख रहा हो।

    कॉफी बनाते वक्त उसकी आँखों में नमी थी। भाप से ढँके उसके चश्मे के शीशों में रूहानी की परछाईं थी, वो जो अब दूर लगती थी, पर जिस तक पहुँचने की कोशिश अब भी जारी थी।

    टेबल पर उसने सब कुछ अच्छे से सजाया, कप के पास एक छोटा सा नोट भी रखा, “अगर मेरी खामोशी ने ज़ख़्म दिए, तो ये सुबह मेरी पहली कोशिश है उन्हें भरने की।”

    और ठीक तभी, जैसे वक़्त ने उसकी पुकार सुन ली हो, रूहानी आ गई।

    उसकी चाल में अब भी वही चुप्पी थी, और आँखों में एक अजनबीपन — जैसे रात की नमी अब तक उसकी पलकों पर टिक गई हो। 

    उसने टेबल पर नज़र डाली, फिर अद्वैत की ओर, और कुछ पल तक कुछ नहीं बोली। मगर उन नज़रों में एक सवाल अब नहीं था, सिर्फ एक थकी हुई स्वीकृति थी — कि शायद कुछ रिश्ते माफ़ी से नहीं, कोशिशों से जुड़ते हैं।

    अद्वैत की नज़र जैसे ही रूहानी के चेहरे पर पड़ी, उसका दिल एक पल को थम-सा गया। उसकी आँखों के नीचे हलकी सूजन थी, जैसे कोई चुपचाप पूरी रात अपने आँसुओं से भीगता रहा हो। 

    वो दर्द जो ज़ुबान नहीं कहती, मगर चेहरा छुपा भी नहीं पाता….. अद्वैत ने वो सब कुछ उसकी आँखों में पढ़ लिया था। उसके दिल में एक हूक-सी उठी, जैसे किसी ने उसकी साँसों पर बोझ रख दिया हो। 

    एक बेचैनी, एक आत्मग्लानि, कि वो भी कहीं न कहीं इस उदासी का हिस्सा बन गया है। वो कुछ कह नहीं पाया, बस एक निगाह डाली — नम और शर्मिंदा।

    रूहानी ने धीरे से पूछा, “मीना नहीं आई आज काम पे?”

    अद्वैत थोड़ा झिझका, फिर बोला, “उसके काम करने का टाइमिंग बदल दिया है मैंने…”

    रूहानी ने उसे थोड़ा संदेह से देखा, जैसे दिल में कोई अनकहा सवाल उठ रहा हो।

    अद्वैत ने तुरंत बात सँभाली, उसकी आँखों में डूबते हुए बोला — ‘अगर तुम रोज़ नीचे वाले कमरे में सोओगी, वहीं से तैयार होकर निकलोगी… तो उसे शक हो जाएगा न। और फिर, उसके दोनों बच्चे तो सुबह-सुबह ही स्कूल निकल जाते हैं…’

    उसके लहजे में कोई चालाकी नहीं थी, सिर्फ एक मासूम-सी फ़िक्र थी कि वो इस रिश्ते की परतों को सबके लिए उतना ही अनदेखा रखना चाहता है, जितना कि रूहानी खुद चाहती थी।

    मगर रूहानी की आँखें उस पल कुछ और ढूँढ रही थीं… शायद कोई जवाब, या शायद ये जानना कि क्या अद्वैत की ये परवाह सिर्फ दिखावे की है… या कहीं उसमें कोई और परत भी छुपी है, जो धीरे-धीरे उजागर हो रही है।

    दोनों नाश्ते की मेज पर अभी बैठे ही थे। टेबल पर अद्वैत के हाथों से बनाए गए सैंडविच की खुशबू और कॉफी की भाप धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी। एक अजीब-सी चुप्पी थी दोनों के बीच बोझिल, मगर टूटी नहीं हुई।

    रूहानी ने कॉफी का प्याला उठाया ही था कि अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।

    “मैं देखता हूँ,” अद्वैत कुर्सी से उठने लगा, मगर रूहानी ने उसे हल्के से रोक दिया।

    “मैं देखती हूँ,” उसने धीरे से कहा, उसकी आँखों में अब भी पिछली रात की थकान और आज की उलझनें तैर रही थीं।

    वो दरवाज़े की ओर बढ़ी, कदम थोड़े संकोच भरे थे जैसे दिल कुछ अनहोनी का संकेत दे रहा हो। उसने कुंडी खोली, और जैसे ही दरवाज़ा पूरा खुला… उसके सामने खड़ा था – एकांश राठौर 

    वही चेहरा, वही तीखी नज़रें… जो एक समय उसकी रगों में लावा बनकर दौड़ती थीं… अब दरवाज़े पर यूँ खड़ी थीं जैसे वक़्त को चीरकर लौट आई हों।

    “त-तुम…. यहाँ?” रूहानी की आवाज़ उसकी साँसों में ही घुल गई।

    उसका दिमाग एक पल के लिए शून्य हो गया… शब्द गायब, सोचें धुंध में डूबीं और दिल की धड़कन जैसे किसी दूसरे युग में पहुँच गई हो।

    अंदर से अद्वैत ने आवाज़ लगाई, “रूहानी, कौन है?”

    ————-

    क्या रूहानी के अतीत की परछाई, उसके आज की चौखट पर दस्तक देने आई है? 

    अद्वैत… क्या वो जान पाएगा कि ये दस्तक सिर्फ अतीत की नहीं, एक नए तूफ़ान की शुरुआत है? 

    अब जब तीन धड़कनों का वक़्त एक ही कमरे में समा गया है, तो क्या कोई रिश्ता बचेगा… या सब बिखर जाएगा?

  • अधूरी इबादत भाग~35

    अधूरी इबादत भाग~35

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~35 आँखें जो शर्मिंदा हैं 

     

    अद्वैत वहीं दरवाज़े पर जड़ हो गया था, जैसे वक़्त उसकी साँसों के साथ थम गया हो। कमरे की हल्की पीली रौशनी रूहानी के नम बालों पर पड़कर उसे किसी बारिश में भीगी, अनकही कविता की तरह बना रही थी। 

    उसकी गर्दन से बहकर पायजामे के कपड़े तक पहुँचती पानी की बूंदें, हर उस भावना की गवाही दे रही थीं जो उसने आज तक दबा रखी थीं। 

    मगर अद्वैत के लिए यह दृश्य कोई आम क्षण नहीं था….. यह ऐसा था जैसे किसी पुराने, भरे हुए घाव पर अचानक धूप पड़ जाए। आँखों ने देखा जो दिल कहने से कतराता रहा।

    रूहानी का चेहरा जब आइने में उसकी अपनी परछाई से टकराया और उसने अद्वैत की मौजूदगी को महसूस किया, तो एक सिहरन सी दौड़ गई उसकी रूह तक। 

    वह चौंकी नहीं, मगर उसकी आंखों में एक ऐसी परत चढ़ गई जो शर्म और उलझन दोनों की थी। उसने तुरंत तौलिया उठाकर खुद को ढक लिया, जैसे कोई लहर जो तट से टकराकर लौटती है। 

    उसकी नज़रों में सवाल था, पर ज़ुबान पर सिर्फ वही एक वाक्य निकला, “ऐसे क्या देख रहे हो?”

    उसके स्वर में वो अजनबीपन था, जो दो अजनबियों के बीच बने रिश्ते की दीवार बन जाता है, चाहे वो एक ही छत के नीचे क्यों न रहते हों। 

    अद्वैत को समझ नहीं आया कि वो क्या कहे। उसकी पलकें झपकना भूल गई थीं और दिल एक लय में धड़कना बंद कर चुका था।

    “मैं… माफ़ करना, मैं बस… बस ये पूछने आया था कि… डिनर करोगी क्या?” उसकी आवाज़ जैसे किसी थके हुए दिल से निकली हो, टूटी, हकलाती हुई…. मानो हर शब्द अपने ही अपराध की गवाही दे रहा हो। 

    आँखें ज़मीन पर थीं, जैसे वहाँ खुद को दफना देना चाहता हो, और साँसें बोझिल, जैसे हर पल अपने किए पर शर्म की परतें चढ़ा रहा हो। 

    रूहानी ने उसकी तरफ देखा, आँखों में कहीं हल्का सा कांपता गुस्सा और कहीं एक मौन सी मायूसी तैरती थी। 

    “अद्वैत, हम दोनों जानते हैं कि इस शादी में हमारी अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। इस तरह बिना नॉक किए…” वह रुकी, जैसे शब्द गले में अटक गए हों।

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए कदम बढ़ाया, मगर फिर रुक गया। “मैंने दरवाज़ा खटखटाया था… शायद तुमने सुना नहीं।”

    उसके स्वर में कोई सफाई नहीं थी, बस एक बेकसी थी। जैसे कोई खुद से भी नज़रें नहीं मिला पा रहा हो।

    “चाहे कुछ भी हो, हमारी ये… इस कॉन्ट्रैक्ट मैरिज में, निजता सबसे ज़रूरी है,” रूहानी की आवाज़ अब संयत थी, लेकिन उसमें एक थरथराहट थी जो अद्वैत को चीरती चली गई।

    और फिर एक लंबा मौन पसरा, जैसे वक्त खुद भी इस तनाव में घुटने लगा हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में देखा, उन आँखों में कोई औरत नहीं थी, जो उससे नज़दीकियाँ चाहती हो। वहाँ सिर्फ एक इंसान था, जो खुद को सम्हालने में जुटा था। 

    उसे वह सब याद आ गया…. इशिता की मुस्कान, उसकी आखिरी साँसें और वो वादा कि वो कभी किसी और को अपनी दुनिया में इतनी जगह नहीं देगा।

    फिर भी आज, उस हल्की गीली खुशबू में, रूहानी की मौजूदगी ने उसकी दीवारों में एक दरार डाल दी थी।

    “माफ़ कर देना,” उसने धीरे से कहा और मुड़कर चला गया।

    रूहानी वहीं खड़ी रही, आइने में खुद को देखते हुए, जैसे पहली बार अपने ही चेहरे को समझने की कोशिश कर रही हो।

    अंदर कुछ टूटने जैसा था, मगर उससे भी ज़्यादा कुछ जुड़ने जैसा भी। मगर ये जुड़ाव कोई प्रेम नहीं था… ये सिर्फ दो जिंदगियों के बीच के मौन का पहला शब्द था।

    और बाहर, अद्वैत की चाल में एक ऐसा बोझ था जो उसने खुद अपने लिए चुना था… प्यार की कब्र पर खड़ा होकर किसी और की साँसें महसूस करना।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    डिनर टेबल पर दोनों आमने-सामने बैठे थे, लेकिन उनके बीच की खामोशी किसी अथाह गहराई जैसी थी….. ठंडी, स्थिर और बोझिल। कमरे की रौशनी हल्की थी, और हर चम्मच की आवाज़ दीवारों से टकराकर लौटती थी जैसे कोई सूनी पुकार। 

    अद्वैत की निगाहें थाली में थीं, पर वो कुछ देख नहीं रहा था। हर निवाला जैसे एक गवाही था उसके अंदर के अपराधबोध की, उस एक पल की जब उसने रूहानी की निजता के आँगन में बिना अनुमति कदम रख दिया था।

    रूहानी चुपचाप खा रही थी, मगर उसके चेहरे पर कहीं कोई जीवन नहीं था। उसकी पलकों की झपक भी जैसे भारी हो गई थी, जैसे वह अपने ही भीतर की बेचैनी को छिपाने की कोशिश कर रही हो। 

    उसके जेहन में अभी भी अद्वैत की वो नज़रें थी…. गहराई तक जाती, पर न समझती, सिर्फ देखती हुई। वह नज़र जो इंसान को समझने नहीं, बस छूने आई थी, और वह छुअन… किसी आँधी जैसी थी…. तेज, असहज, और बिना चेतावनी।

    अद्वैत ने भीतर ही भीतर कई बार कोशिश की कि कुछ कह सके। कोई माफ़ी, कोई स्पष्टीकरण, कोई ऐसा शब्द जो इन तनों हुई नसों को थोड़ा ढीला कर दे। मगर हर बार कुछ अजीब-सा डर उसके शब्दों को गला देता। जैसे किसी पुराने वादे की लाश उसके गले में फँसी हो। 

    वह जानता था, उसके अतीत की परछाइयाँ आज भी उसके वर्तमान में साँस ले रही थीं…. उसकी पहली पत्नी की छवि, उसकी यादें, और उसका वादा कि वह किसी और को उस जगह तक नहीं पहुँचने देगा।

    रूहानी ने बिना कुछ कहे धीरे से अपनी प्लेट सरकाई और उठ खड़ी हुई। कुर्सी की आवाज़ जैसे उस सन्नाटे को तोड़ने की एक बेकार कोशिश थी। 

    अद्वैत ने सिर उठाया और उनकी नज़रों की टकराहट ने एक पल को वक्त रोक दिया। उसमें कोई शब्द नहीं थे, बस भाव थे… टूटी उम्मीदें, अनकही शिकायतें, और कोई अजनबी सी आत्मीयता जिसे दोनों ने पहचानने से इनकार कर दिया।

    “मैं थक गई हूँ,” रूहानी ने बहुत धीमे, बहुत संयत स्वर में कहा। मगर इस थकान में नींद नहीं थी, इस थकान में टूटन थी — उस बोझ की, जिसे वो रोज़ ढो रही थी, उस रिश्ते की जो काग़ज़ पर था, मगर दिलों में कभी नहीं बसा।

    अद्वैत कुछ कहना चाहता था, बहुत कुछ। मगर शब्द उसकी ज़ुबान तक आते-आते जल जाते। वह सिर्फ उसे जाते हुए देखता रहा, जैसे कोई धुंध में लिपटा साया पीछे छूट रहा हो।

    टेबल पर रखी दो अधूरी थालियाँ अब भी वहीं थीं…. ठंडी, चुप, और गवाह उस रात की, जब दो लोग साथ थे, मगर फिर भी एक-दूसरे से बहुत दूर।

    °°°°°°°°°°°°°°°

    रूहानी बिस्तर पर थी, मगर मन किसी और समय में उलझा था — करवटें नहीं, अब तो जैसे आत्मा ही बेचैन थी… तकिए पर सिर रखते ही उसे अपने अंदर कोई धीमा तूफान सुनाई देता….. एक बेचैनी, जो थमती नहीं थी। नींद आँखों के किनारों तक आकर लौट जाती थी, जैसे उसे भी इस मौन की भाषा समझ न आ रही हो… बिल्कुल किसी अपने की तरह जो पास होकर भी अजनबी लगने लगे। 

    हर बार जब वो आंखें मूंदती, अद्वैत की वो नज़रें सामने आ खड़ी होतीं…. नरम, संकोच भरी, लेकिन कहीं भीतर कुछ कहती हुई। वो नज़रें जिनमें कोई पुराना दुख छिपा था, कोई अधूरा वादा, और वो खामोशी जो चीखने जैसी थी।

    उसने करवट ली और एकाएक उसे ख्याल आया…. सुबह जब वो पहली मंज़िल में गई थी, तो अद्वैत का स्टडी रूम लॉक नहीं था। ये बात उसे अभी याद आई, और अजीब बात ये थी कि वो कमरा हमेशा बंद रहता था। 

    उसके भीतर कुछ खिंचा, कोई पुरानी डोर जैसे खुद-ब-खुद खिंचने लगी। वह उठी, बिना चप्पलों के, नंगे पाँव, और दबे क़दमों से सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। घर की दीवारें साँसें रोककर जैसे उसका पीछा कर रही थीं।

    स्टडी रूम के बाहर आकर वो रुकी। साँसें धीमी थीं, लेकिन दिल की धड़कनें जैसे कानों में गूंज रही थीं। दरवाज़ा सच में खुला था। उसका हाथ थोड़ा कांपा, उसने हँथेली दरवाज़े पर रखा, पर खोलने से पहले एक और सवाल भीतर से उठा….. 

    क्या ये सही होगा? 

    क्या ये भी वही गलती नहीं होगी जो आज अद्वैत ने की थी? 

    क्या मैं भी उसकी निजता में झाँकने जा रही हूँ?

    लेकिन वो एक पन्ना… वो किताब… और उसमें लिखा इशिता का नाम… रूहानी का मन अब पीछे हटने को तैयार नहीं था। 

    उसने धीरे से दरवाज़ा खोला….. कमरे में हल्की-सी लकड़ी की महक थी, और खिड़की से आती चांदनी सीधे उस खाली खुली अलमारी पर पड़ रही थी, जहाँ वो किताब रखी जाती थी।

    मगर वो खाली थी।

    वहाँ कुछ नहीं था…. न किताब, न वो टुकड़ा 

    जो उसके भीतर के सारे सवालों को जिंदा कर गया था। 

    ————

    तो क्या अद्वैत जानता था कि वो वहाँ आएगी?

    क्या ये सिर्फ एक इत्तेफ़ाक था… या कोई अधूरी कहानी, जो खुद को छुपा रही थी?

    अगर किताब वहाँ नहीं थी….. तो फिर… इशिता की यादों का बोझ अब किसके पास था? 

  • अधूरी इबादत भाग~34

    अधूरी इबादत भाग~34

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~34 नज़रें जब मिलें 

     

    धनौरी की उस धूलभरी सड़क पर, जहाँ हर मोड़ जैसे किसी अधूरे किस्से की तरह चुप खड़ा था, रूहानी की सांसें एक अनकहे डर और उम्मीद के दो सिरों के बीच झूल रही थीं। 

    उस पुरानी दुकान के सामने खड़े होकर उसने पल भर को आँखें बंद कीं…. मन ही मन अपनी माँ की वो बात याद आई, “हर सपना एक कीमत मांगता है, बेटा… सिर्फ पैसों की नहीं, हिम्मत की भी।” लेकिन उस वृद्ध दुकानदार की जिद और चालाकी ने जैसे उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था।

    पर तभी मीना, जो अब तक शांत खड़ी थी, एकदम से बोल पड़ी, “बाबूजी, आप तो कह रहे थे कि आपको शाम की फ्लाइट है विदेश जाने की, और बेटा कह रहा था कि सारी प्रॉपर्टी बेचकर ही आना। अब अगर आप यही दुकान नहीं बेचेंगे, तो क्या बाकी टाइम बचा है जाने का?”

    उसके शब्दों में कुछ ऐसा था जो दुकानदार को भीतर तक छू गया। वह चुप हुआ, फिर गहरी साँस लेकर बोला, “ठीक है… तुम लोग बार-बार पूछ रहे हो, और मुझे भी अब देर नहीं करनी। लो, बीस लाख में तय रहा, पर आज ही कागज़ात पूरे होंगे।”

    रूहानी की साँस जैसे एक झटके में लौट आई। एक पल के लिए उसे सब कुछ थमता सा महसूस हुआ, जैसे आसमान पर छाए बादल अचानक हट गए हों। उसने अपने बैग से दस्तावेज़ और पैसे निकाले, और कांपते हाथों से कागज़ात उसके सामने रख दिए। 

    दुकानदार ने भी एक पुराना फाइल खोला और दोनों ने कागज़ों पर दस्तखत किए। रूहानी ने ध्यान से पढ़ा, हर लाइन को जाँचा, और जब आखिरी हस्ताक्षर किए, तो ऐसा लगा मानो उसने सिर्फ एक दुकान नहीं खरीदी, बल्कि अपने सपनों को एक ठिकाना दे दिया हो।

    कागज़ साइन करने के बाद, वो कुर्सी से उठी, जैसे किसी जीत का बोझ उसके कंधों से उतर गया हो।

    उस पल रूहानी को कोई परवाह नहीं थी कि किसने उस दुकान को खरीदने की कोशिश की थी। अब वो जगह उसकी थी….. उसकी पहचान, उसकी मेहनत, उसका सपना। 

    “अब कोई भी मुझे इस राह से पीछे नहीं कर सकता,” उसने मन ही मन कहा।

    जैसे ही रूहानी को दुकान की चाबी मिली, उसकी मुट्ठी कस गई… वो सिर्फ धातु का एक टुकड़ा नहीं थी, बल्कि उसकी मेहनत, संघर्ष और उम्मीदों की चाबी थी। उसने उसे हथेली में भरकर कुछ पल के लिए अपनी आँखें मूँद लीं, मानो उस धड़कते हुए पल को आत्मा में समेट लेना चाहती हो। 

    फिर वह हल्के क़दमों से मीना की ओर मुड़ी और धीमे स्वर में बोली, “मीना, अब तुम विमान नगर वापस चली जाओ। मुझे हडपसर जाना है… वहाँ पुराने स्टूडियो का जो किराया बकाया है, वो चुकता करना है।”

    मीना ने थोड़ा चौंकते हुए कहा, “मैडम, चलिए मैं भी साथ चलती हूँ…”

    रूहानी ने उसकी तरफ देख मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “नहीं मीना, आज अकेले जाने का मन है… ये सफर मेरा है। और तुम्हारे बच्चे भी घर पर अकेले होंगे, उनके बारे में भी तो सोचो। कल वापस आ जाना, बहुत सारा काम भी रहेगा।”

    मीना थोड़ी मायूस होकर चुप हो गई, लेकिन रूहानी के चेहरे पर जो विश्वास की चमक थी, उसने उसे और कुछ कहने नहीं दिया। वो चुपचाप विदा लेकर चली गई।

    हडपसर पहुँचते-पहुँचते दिन हल्का सा ढलने लगा था। स्टूडियो के बाहर खड़ी रूहानी ने एक बार फिर उस पुरानी इमारत को देखा…. धूल में लिपटा वो सपना, जिसे आज वो साफ करने आई थी। 

    पुराने मकान मालिक से मिलकर उसने बाकी का किराया अदा किया, और पक्की रसीद ली। बुजुर्ग ने उसे दुआ देते हुए कहा, “बिटिया, इस बार अपना सपना अधूरा मत छोड़ना।”

    लौटते वक़्त, रूहानी खुद से बुदबुदाई, “अब भी मेरे पास चार लाख हैं… उसी से मैं रिनोवेशन करवा लूंगी। और जो भी ज़रूरत का सामान होगा, मशीन, कपड़ा, डिजाइनिंग टेबल — सब कुछ ले आऊंगी।”

    उसके चेहरे पर अब थकावट नहीं थी… थी तो सिर्फ़ उम्मीद की चमक और एक नर्म-सी मुस्कान — जैसे ज़िंदगी पहली बार उसकी ओर बढ़ी हो, बिना किसी शर्त के।

    रूहानी जैसे ही सड़क किनारे कैब रोकने लगी, उसकी नज़र सामने से आ रहे एक दुबले-पतले, स्कूल यूनिफॉर्म में सजे लड़के पर पड़ी।

    सड़क पार करता वह लड़का पलभर में उसे पहचान गया। उसकी आँखों में चमक उभरी, “दीदी!” 

    वह दौड़कर रूहानी की ओर लपका। रूहानी की साँस जैसे रुक गई हो, वर्षों से भुलाया कोई एहसास दिल में दस्तक देने लगा।

    दोनों बहन-भाई गले लगे, कसकर, जैसे वक्त के हर बीते पल को समेट लेना चाहते हों। रूहानी ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा, “कैसा है मेरा छोटा यश? और मम्मी-पापा कैसे हैं?”

    यश ने चुपचाप खुद को अलग किया और थोड़ा रूठे हुए स्वर में कहा, “आपकी वजह से ही अब मैं आपको फोन नहीं करता, दीदी। आप ही ने तो कहा था ना, मुझसे कोई संपर्क मत करना… वरना मम्मी-पापा मेरा फ़ोन भी छीन लेंगे।”

    रूहानी की आँखें भीग आईं, लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की। कुछ पल चुप रहकर वो बोली, “मैंने ऐसा इसलिए कहा था यश… क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हें डाँट पड़े। तू उनके लाडले बेटे है, वो तुझे बहुत चाहते हैं।”

    यश ने गर्दन झुकाई और धीमे से कहा, “हाँ… लेकिन फिर भी, मैं बहुत अकेला हो गया हूँ दीदी। दोस्तों के बीच तो रहता हूँ… पर वो जो बात जीजाजी में है… वो किसी में नहीं। आप जानती हो, मैं रोज़ उनके बारे में सबको बताता हूँ… जीजू ऐसे, जीजू वैसे…”

    रूहानी बस उसकी हाँ में हाँ मिलाती रही, हल्की मुस्कान के पीछे बहुत कुछ छुपाते हुए। 

    फिर उसने उसकी कंधे पर हाथ रखकर कहा, “मुझे अब निकलना होगा यश… नहीं तो विमान नगर पहुँचते-पहुँचते रात बहुत हो जाएगी।”

    यश ने चुपचाप सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों में जो कसक थी, वो दूर तक रूहानी का पीछा करती रही।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    जब रूहानी विमान नगर अद्वैत के घर पहुँची, तो उसकी रूहानी की सारी थकान जैसे एक पल में झलकने लगी। सीधे अपने कमरे में जाकर नहाने चली गई, बिना यह सोचे कि अद्वैत घर में है या नहीं।

    सुबह से बाहर भाग-दौड़, मानसिक उलझनों और सपनों की जद्दोजहद ने उसे थका दिया था। बाथरूम से निकली तो उसने ढीले पायजामा सेट को पहना था, जो हल्का रंग का था और भीगते बालों से गीला हो चुका था। 

    वह तौलिये से अपने गीले बालों को धीरे-धीरे थपकाते हुए सूखाने की कोशिश में लगी थी, जैसे हर बूंद उसके भीतर की सारी बेचैनी को बहा ले जा रही हो।

    उसने बिल्कुल भी महसूस नहीं किया कि अद्वैत उसके कमरे के बाहर खड़ा है, डिनर के लिए पूछने आया था, लेकिन अद्वैत का दिल जैसे रुक-रुक कर धड़क रहा था। 

    उसकी आँखें रूहानी के हर छोटे-छोटे हाव-भाव को बड़े ही बारीकी से देख रही थीं…. उसके भीगे बाल, जो उसकी नाजुक गर्दन पर गिर रहे थे, तौलिये की कोमल छुअन, और वो हल्का सा कंपकपाना जो उसके चेहरे पर था। 

    अंदर एक अजीब सी गर्माहट उठ रही थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था। 

    उसकी सांसें धीरे-धीरे तेज हो रही थीं, और दिल की गहराइयों में कोई अनकहा सवाल उठ रहा था। 

    क्या ये सही है, क्या उसने अपने मन को इस तरह खो दिया? 

    रूहानी ने जैसे ही आइने में अपनी परछाई देखी, उसे महसूस हुआ कि कोई दरवाजे के पास खड़ा है। वह तुरन्त तौलिये को अपने गर्दन और साइन के उस हिस्से पर ले आई, जहाँ पानी की बूंदें गिरी थीं।

    अद्वैत को खड़ा पाकर उसने सकपकाते हुए कहा, “ऐसे क्या देख रहे हो?” उसकी आवाज़ में नश्तर की तरह कड़कपन और एक छुपी हुई शर्मिंदगी दोनों झलक रही थी।

    —————–

    क्या रूहानी के सपनों की ये दुकान सचमुच उसकी आज़ादी की चाबी बनेगी, या उसके अतीत के साये फिर से उस पर मंडराएंगे?

    क्या अद्वैत के उस खामोश नज़र में छुपा वो अनकहा सवाल, रूहानी के दिल की सबसे नाज़ुक जगह को छू पाएगा, या दोनों के बीच की दीवारें और गहरी होंगी? 

  • अधूरी इबादत भाग~33

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~33 कौन है वो

     

    रूहानी का दिल एक अजीब सी बेचैनी से घिर गया था। अद्वैत के सवाल के बाद कमरे में एक ऐसी खामोशी छा गई थी, जो केवल बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर भी गूंज रही थी। 

    वह जानती थी…. ये कोई आम निमंत्रण नहीं था। एक “पत्नी” के रूप में अद्वैत के साथ किसी सार्वजनिक मंच पर जाना, एक ऐसी पहचान को ओढ़ लेना था जो उसके लिए अब तक सिर्फ कागज़ पर थी। यह भी आसान नहीं था। `

    उसका मन बार-बार चेतावनी दे रहा था…. “रूहानी, संभल जा। कहीं अद्वैत ये न समझे कि तू उसकी ज़िंदगी में खुद को थोपना चाहती है।” लेकिन वो ऐसा कभी नहीं चाही…. कभी भी नहीं….. 

    उसने खुद से बार-बार कहा, “मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया, न कभी कहा। ये सब गलतफहमी हो सकती है। मैं तो बस यहाँ अपने सपनों के लिए हूँ। पर फिर भी ‘हाँ’ देना सही होगा, क्योंकि इसी वजह से तो वो मुझसे कॉन्ट्रैक्ट मैरिज के लिए तैयार हुआ था।” फिर भी उसके अंदर की उलझन कहीं न कहीं उसे डांवाडोल कर रही थी। 

    फिर धीरे-धीरे उसने खुद को संभाला, अपने आप से, “यह हाँ सिर्फ एक समझौता है, कोई दिल की बात नहीं। ये मेरे सपनों का हिस्सा है, जो मुझे आगे बढ़ने देगा। बस इतना समझ लेना कि ये नज़दीकियां सिर्फ जरूरतों की बातें हैं और उससे ज्यादा कुछ नहीं।”

    उस की आँखों में अब एक नई चमक थी…. एक ऐसा संतुलन जो उसके भीतर के डर और उम्मीद दोनों को समेटे हुए था। उसका मन तय कर चुका था कि चाहे कुछ भी हो, वह अपने सपनों को सबसे- ऊपर रखेग, और इस रिश्ते को भी एक समझौते के दायरे में ही रखेगी।

    और इसी सोच के साथ, उसने ठाना कि अगले रविवार को वह अपनी ज़िंदगी के नए अध्याय के लिए तैयार होगी…. सपनों के साथ, मजबूती के साथ और अपने आप से वादे के साथ।

    अद्वैत की आँखों में उम्मीद की एक हल्की रोशनी थी, मानो वो उस ‘हाँ’ के जवाब की तपती राह तक रहा हो।

    “हाँ, मैं साथ चलूंगी…” रूहानी की आँखों में एक गहराई थी, जो सच बोल रही थी। फिर उसने धीरे से अपनी पुरानी बात दोहराई, “और इसी वजह से तो तुमने मुझसे कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की थी, है ना…?”

    अद्वैत ने उसकी तरफ देखा, जैसे कुछ कहना चाहता हो, पर कुछ कह न सका।

    रूहानी ने फिर से नज़रें फेर लीं, पर इस बार उसकी आंखों में एक अजीब सी गहराई थी। जैसे वो खुद को याद दिला रही हो…. ये सिर्फ एक सौदा है, एहसास नहीं। 

    रूहानी के “हाँ” कहने के बाद, जैसे ही अद्वैत की आँखों में एक पल के लिए राहत की झलक दिखी, उसने चुपचाप अपनी घड़ी की ओर देखा और धीरे से कहा, “मुझे अभी निकलना होगा… मैनेजर से मिलना है, कुछ पब्लिशिंग की डिटेल्स फाइनल करनी हैं। मैं वापस आकर बात करता हूँ।”

    रूहानी ने बस सिर हिलाया, कोई सवाल नहीं किया। उसकी आवाज़ जैसे कहीं भीतर ही अटक गई थी। अद्वैत अपना मोबाइल उठाकर, अपने रूटीन से कुछ पेपर्स समेटकर निकल गया और दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ ने जैसे उस कमरे की हवा को और भारी कर दिया।-

    अद्वैत ने जैसे ही दरवाज़ा बंद किया, एक पल के लिए उसकी चाल धीमी पड़ गई। सीढ़ियाँ उतरते हुए उसका मन अजीब सी खामोशी से गुज़र रहा था… वो खामोशी जो बाहर से शांत लगती है लेकिन भीतर बहुत कुछ तोड़ती रहती है। 

    उसकी उंगलियाँ अब भी मोबाइल के चारों ओर कसी हुई थीं, जैसे किसी असहज विचार को जकड़े हुए हों। कार में बैठते ही उसने गहरी साँस ली और शीशे में खुद को देखा…. वही चेहरा, वही ठहराव, लेकिन आँखों के पीछे अब भी कुछ बेकल था।

    “क्या मैंने उसे कोई गलत उम्मीद दे दी?” उसने खुद से बुदबुदाया।

    गाड़ी जैसे-जैसे पब्लिशिंग हाउस की ओर बढ़ रही थी, अद्वैत का ध्यान उस सुबह के हर लम्हे पर बार-बार लौट रहा था….. रूहानी की झिझक, उसकी मौन स्वीकृति और वो हल्का सा मुस्कान जो ना पूरी तरह अपनापन था, ना पूरी तरह दूरी।

    मैनेजर से मुलाक़ात औपचारिक थी, लेकिन अद्वैत का ध्यान बार-बार भटकता रहा। टेबल पर रखे कॉन्ट्रैक्ट्स, आगामी बुक इवेंट्स की लिस्ट, मीडिया से जुड़ी सावधानियाँ…. सब कुछ उसकी आदत का हिस्सा था। पर आज उसकी आदतों में कुछ खलल था।

    “सर, ये रहा साहित्यिक समारोह का डिटेल्ड शेड्यूल, जिसमें आपकी और आपकी पत्नी की फोटो साथ में देने को कहा गया है,” मैनेजर ने कहा, एक फोल्डर उसकी ओर सरकाते हुए।

    अद्वैत ठिठका। कुछ पल फोल्डर को निहारता रहा, फिर पूछा, “अगर मैं अपनी पत्नी के साथ न जाऊँ तो?”

    मैनेजर ने चौंककर उसकी ओर देखा, “तो सर… वो मीडिया को अलग मैसेज जाएगा। फिर आप ही कहते हैं कि अफवाहों से बचना है।”

    अद्वैत ने चुपचाप फोल्डर बंद किया। “ठीक है,” उसने धीरे से कहा, लेकिन भीतर एक सवाल अब भी गूंज रहा था — क्या मैं उसे इस दुनिया का हिस्सा बनाने जा रहा हूँ, या फिर खुद उससे बच नहीं पा रहा?

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    उधर रूहानी अद्वैत के घर से निकलने के बाद कमरे में अकेली थी, लेकिन यह अकेलापन कुछ और ही था। ये वही घर था जहाँ कुछ देर पहले हल्की मुस्कानें थीं, कॉफी की खुशबू थी और कुछ अधूरे जुमलों के बीच छुपे इशारे। लेकिन अब सन्नाटा इतना घना हो चला था कि रूहानी को अपने दिल की धड़कनें भी ज़्यादा साफ सुनाई देने लगीं।

    उसने खुद को संयत करते हुए खिड़की के पास जाकर बाहर … जहाँ अद्वैत की गाड़ी धूल उड़ाती हुई दूर जा रही थी। एक अजीब सी बात थी, वो जानती थी कि ये शादी सिर्फ एक समझौता है, एक दिखावा… और फिर भी, इस दूरी में कुछ तो था जो उसे कचोट रहा था।

    “मैं क्यों सोच रही हूँ इतना?” वह बुदबुदाई, खुद से ही लड़ते हुए। “ये तो बस एक औपचारिकता है… एक दिन सब खत्म हो जाएगा और हम दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी में लौट जाएंगे।”

    लेकिन क्या वो सच में लौट पाएगी?

    अद्वैत की नज़रों का वो अटूट देखना, उसकी आवाज़ की वो सहज गर्माहट, और वो हिचकिचाहट भरी मुस्कानें… रूहानी को याद आ रही थीं।

    उसने खुद से सवाल किया, “अगर ये सब कुछ सिर्फ दिखावा है, तो फिर ये एहसास क्यों इतने सच्चे लगते हैं?”

    वो धीरे-धीरे चलती हुई फिर से स्टडी के दरवाज़े तक गई। हाथ( बढ़ाया… फिर वापस खींच लिया।

    “नहीं रूहानी… तुम्हें कोई हक नहीं है उसके सच को जानने का… ये कांट्रैक्ट है, रिश्ता नहीं।”

    लेकिन दिल कहाँ सुनता है तर्क की भाषा?

    स्टडी का दरवाज़ा अब भी बंद था, पर इस बार ताले का क्लिक नहीं था और रूहानी की उंगलियाँ अब कांच की तरह नाज़ुक पर हौले से उस दरवाज़े को धकेलने को तैयार थीं…

    दरवाज़ा खुलेगा या नहीं….. ये फैसला अब दिल करेगा, दिमाग नहीं।

    लेकिन तभी मीना भी आ गई। उसके घर में कदम रखते ही रूहानी को अपने भीतर की बेचैनी को समेटना पड़ा।

    मीना की मौजूदगी में वहाँ रुकना ठीक नहीं था। इसलिए वह धीमे कदमों से, अपनी सोचों और सवालों की परतें समेटते हुए, सीढ़ियों से उतरकर वापस हॉल में आ गई। लेकिन भीतर उसका मन बार-बार उसी स्टडी के दरवाज़े की ओर भाग रहा था, जो शायद अब लॉक नहीं था। 

    नीचे आते ही उसने एक झूठी सी सामान्य मुस्कान चेहरे पर ओढ़ ली, जैसे कुछ हुआ ही न हो, जैसे उसका मन हल्का और स्थिर हो। मीना ने किचन की ओर जाते हुए पूछा, “मैडम, साहब चले गए क्या?”

    रूहानी ने सिर हिलाकर जवाब दिया, “हाँ, ज़रूरी थी।”

    मीना के काम निपाटते ही, रूहानी ने अपनी फाइल और पैसे का बंडल उठाया, जो अद्वैत ने उसे सुबह दिया था। दस्तावेज़ संभालकर उसने बैग में रखा और मीना के साथ घर से निकल पड़ी…. मन में एक उम्मीद और माथे पर हल्का तनाव लिए।

    धनौरी पहुँचकर वह उस पुरानी दुकान पर गई, जिसे वह खरीदना चाहती थी। वो उसकी मेहनत और सपनों का पहला ठिकाना बन सकती थी। 

    लेकिन वो वृद्ध दुकानदार, जो अब तक कुछ नरम दिखता था, इस बार बेहद सख्त और चालाक नजर आया। “देखिए मैडम,” उसने टेबल पर उँगली थपथपाते हुए कहा, “अभी की मार्केट वैल्यू के हिसाब से इसकी कीमत पैंतीस लाख से कम नहीं होगी।”

    रूहानी ठिठक गई। उसके पास सिर्फ पच्चीस लाख थे, जो अद्वैत ने उसे दिए थे। वो समझ नहीं पा रही थी कि ये अचानक से रेट कैसे इतना बढ़ गया।

    “लेकिन कल तो आपने पच्चीस की बात की थी…”

    “वो तो कल की बात थी। आज किसी और ने आकर मुँह-माँगे दाम देने की बात की है। आप चाहें तो…”

    उसके शब्द अधूरे रह गए, लेकिन रूहानी का चेहरा एकदम फीका पड़ गया।

    किसी और ने?

    उसने बैग को कसकर पकड़ा और कुछ पल के लिए उसकी आँखें झील की सतह जैसी स्थिर हो गईं।

    “कौन है जो मेरी कोशिशों को रोकना चाहता है?” 

    उसके होंठ थरथराए, पर आवाज़ बाहर नहीं आई।

    अब सवाल ये नहीं था कि दुकान मिलेगी या नहीं… बल्कि ये था……

    कौन था वो जो उसके सपनों को ख़रीदने आया था… और क्यों?

    और सबसे बड़ा सवाल….. क्या वो सच में अकेली थी इस सपने की राह में?

    ———–

    रूहानी के भीतर छुपे उस सवाल की गूंज अब दूर-दूर तक फैलने लगी थी….. क्या कोई उसकी मेहनत को बर्बाद करने की साजिश रच रहा था? और अगर ऐसा है, तो कौन था वह अजनबी जो उसके सपनों को छीनने आया था?

    क्या अद्वैत के साथ उसका ये कांट्रैक्ट रिश्ता सचमुच सिर्फ एक समझौता था, या इस रिश्ते के पीछे कहीं कोई अनकहा राज़ छुपा था?

    और जब दरवाज़ा खुलने को था, तो क्या रूहानी अपनी दिल की आवाज़ सुन पाएगी, या फिर डर और शक की दीवारों में खो जाएगी?

  • अधूरी इबादत भाग~32

    अधूरी इबादत भाग~32

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    भाग~32 दिल के ताले 

     

    पीछे से अद्वैत के अचानक आने पर रूहानी एकदम से चौंक गई। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था, आंखें पलभर को फैल गईं और हाथ में पकड़ी किताब लगभग छूट ही गई। उसकी साँसें तेज हो गई थीं, जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो। 

    अद्वैत ने भौंहें चढ़ाते हुए पूछा, “क्या हुआ? यूं सहम क्यों गई?” 

    रूहानी ने फौरन खुद को सँभालते हुए सिर झुकाकर कहा, “नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है… वो दरअसल… यहाँ चारों तरफ इतनी शांति है न, तभी जब तुम्हारी आवाज़ अचानक आई तो थोड़ा चौंक गई… शायद इसलिए।” 

    उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन आँखें कुछ और कह रही थी… एक घबराहट, जो खुद से भी छुपी नहीं थी। 

    अद्वैत उसकी बातों को मान तो गया, लेकिन उसकी नज़रें रूहानी के चेहरे पर अटकी रह गईं, जैसे वो कुछ और पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। 

    फिर वह हल्के से मुस्कराया और बोला, “ठीक है, चलो नीचे।” 

    दोनों साथ-साथ सीढ़ियों की ओर बढ़े, लेकिन जैसे ही कदम उठे, वे दोनों एक-दूसरे के विपरीत किनारों पर चलने लगे, जैसे दूरी बनाए रखना अब भी एक अनकहा अनुबंध था। पर सीढ़ियों के हर पड़ाव पर, उनके दिलों के भीतर कुछ था… जो धीरे-धीरे पास आने की कोशिश कर रहा था।

    मीना और उसके दोनों बच्चे जब खाना खाकर जाने की तैयारी करने लगे तो अद्वैत और रूहानी जैसे एक ही सोच में डूबे हुए थे, एक साथ बोल पड़े, “यही रह जाओ।” 

    उनकी आवाज़ में एक अनकहा अपनापन था, जिसे वो खुद भी शायद अभी ठीक से नहीं समझ पाए थे। दोनों की नज़रें एक पल को आपस में टकराईं और फिर एक हल्की-सी फीकी मुस्कान उनके चेहरों पर तैर गई।

    अद्वैत ने बात संभालते हुए कहा, “रात हो गई है मीना, यहीं रुक जाओ बच्चों के साथ, क्या ज़रूरत है इतनी देर में लौटने की।” 

    मीना थोड़ी हड़बड़ाई, उसकी आँखों में कुछ छुपा हुआ डर था। उसने जल्दी से जवाब दिया, “न-नहीं सर… मेरे पति आएंगे… और अगर मैं घर पर नहीं रही तो…”

    रूहानी ने उसकी बातों में कुछ अजीब सा महसूस किया। उसकी निगाहों में संदेह उभरा, “क्या मतलब?”

    मीना ने तुरंत मुस्कुराने की कोशिश की, वो मुस्कान जिसमें सच्चाई कम और बनावट ज़्यादा थी, “अरे नहीं मैडम, मेरा मतलब ये कि अगर मैं नहीं रही तो इनके पापा भूखे रह जाएंगे… उन्हें तो चाय बनाना भी नहीं आता।”

    अद्वैत ने एक गहरी सांस लेकर कहा, “ठीक है, मैं कैब बुक कर देता हूँ।”

    मीना ने हाथ जोड़ते हुए मना किया, “नहीं, नहीं, सर, मैं चली जाऊंगी।” 

    लेकिन तब तक रूहानी भी अद्वैत की बात दोहराई, “नहीं मीना, इतनी रात को अकेले मत जाओ, कैब सही रहेगा।”

    मीना ने उन दोनों की बात मान लिया। 

    फिर रूहानी ने मीना के बच्चों की ओर मुड़कर कहा, “जब भी मन करे, यहीं आ जाना…”

    गुनगुन और चीकू ने ख़ुशी में एक-दूसरे से हाई-फाइव किया, और उस मासूमियत में जैसे एक नया रिश्ता  लेने लगा था…. जिसमें न खून का रिश्ता था, न नाम का, फिर भी कोई डोर थी… जो सबको जोड़ रही थी।

    घर में एक बार फिर से वही पुराना, गूंजता हुआ सन्नाटा पसर गया, जैसे सब कुछ अपनी जगह पर लौट आया हो, लेकिन फिर भी कुछ बदल चुका था। 

    मीना और उसके बच्चों के जाने के बाद अद्वैत और रूहानी के बीच एक अजीब-सी चुप्पी छा गई थी, जो न तो पूरी तरह असहज थी और न ही पूरी तरह सुकून भरी। दोनों एक-दूसरे से नज़रें चुराने लगे….. जैसे उन आंखों में कुछ था जो अभी कहा नहीं जा सकता था।

    इस अनकहे बोझ को हल्का करने के लिए अद्वैत ने आखिरकार खुद से कहा, “मुझे नींद आ रही है, मैं जा रहा हूं सोने।”

    रूहानी ने भी उसकी तरफ बिना देखे ही धीमे स्वर में जवाब दिया, “गुड नाइट।” और फिर नीचे वाले कमरे में जाकर दरवाज़ा हल्के से बंद कर लिया।

    पर उसकी आंखों में नींद नहीं थी, सिर्फ सवाल थे। वो सवाल जो उसके दिल में अब गहराई से उतरते जा रहे थे।

    उसे कमरे में टहलते हुए उसी किताब की याद  से ताज़ा हो गई….. वो किताब जिसे उसने अद्वैत के स्टडी रूम में देखा था, जिसके पहले पन्ने पर सुंदर लिखावट में लिखा था “यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है… — इशिता”।

    इशिता… कौन थी वो? क्या वो अद्वैत की पहली पत्नी थी? या कोई और…?

    मन का भूचाल उसे थकने नहीं दे रहा था। उसी में, उसने चुपचाप अपने पायल की आवाज़ दबाते हुए सीढ़ियों की ओर कदम बढ़ाए। हर सीढ़ी पर उसका दिल और भी तेज़ धड़कने लगा…

    उसे नहीं पता था कि वो ऊपर जाकर क्या ढूंढ़ेगी….. जवाब, या और सवाल…

    रूहानी दरवाज़े के सामने खड़ी कुछ पलों तक वहीं जमी रही। उसका हाथ धीरे-धीरे डोर नॉब की ओर बढ़ा, जैसे कोई राज़ खोलने जा रही हो। पर तभी उसकी उंगलियाँ एक ठंडी सी सच्चाई से टकराईं — दरवाज़ा बंद था, लॉक लगा हुआ था। 

    एक गहरी साँस लेकर वो चुपचाप नीचे लौटी, उसके मन में एक हल्का-सा अफ़सोस और एक अधूरी उत्सुकता थी जो उसके सीने में धड़क रही थी।

    अपने कमरे में आकर वो पेट के बल लेट गई, तकिये में चेहरा छुपाते हुए, जैसे किसी खोई हुई सोच को पकड़ना चाहती हो। उसका मन अद्वैत की प्रकृति पर टिक गया…. इतना शांत, लेकिन कहीं न कहीं कुछ छुपा हुआ सा। वो कब अपनी दुनिया खोलता है? और कब खुद को उस ताले में बंद कर लेता है — कुछ समझ नहीं आता।

    इन्हीं उलझनों में उसकी आँखें कब मुंदी, उसे खुद भी नहीं पता चला।

    सुबह की धीमी रोशनी कमरे में फैल रही थी जब उसकी नींद खुली। बाहर से कॉफ़ी की खुशबू आ रही थी, और जब वो बाहर आई तो देखा…. अद्वैत किचन में कॉफ़ी बना रहा था।

    रूहानी किचन के पास पहुँची ही थी कि अद्वैत ने एक मग उसकी ओर बढ़ाया, “मैंने दो कप कॉफ़ी बनाई है… पीना चाहोगी?”

    रूहानी ने हल्के से सिर हिलाया और मग लेकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई।

    रूहानी ने मग की सतह पर उठती भाप को देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हें तो कुछ बनाना आता ही नहीं था… तो फिर ये कॉफ़ी किस जादू से बना ली?”

    अद्वैत ने किचन काउंटर से टेक लगाते हुए मुस्कराया, उसकी आवाज़ में एक सादगी और थोड़ा-सा संकोच भी था, “हाँ, बहुत कुछ तो नहीं आता… लेकिन एक-दो चीजें बना लेता हूँ। बस, घर पर ज़रूरी सामान हो और… मन भी हो।”

    उसके ‘मन भी हो’ कहने में जो ठहराव था, वो रूहानी की रूह को छू गया। उसने अनजाने ही नज़रें झुका लीं, जैसे उस मामूली-सी कॉफ़ी के पीछे की भावनाओं को पढ़ने लगी हो। उस मग में केवल कॉफ़ी नहीं थी, उसमें शायद कोशिश थी… एक अनकही भावना… या फिर किसी आदत को दोबारा अपनाने की शुरुआत।

    कुछ क्षणों बाद, अद्वैत सोफे पर बैठ गया और उसने एक छोटा फोल्डर और लिफ़ाफ़ा उसकी ओर बढ़ाया, “ये लो…पूरे 25 लाख हैं, और ये एग्रीमेंट। साइन कर दो।”

    रूहानी ने कॉफ़ी साइड में रखकर काग़ज़ों पर दस्तख़त कर दिए। फिर मुस्कुराकर बोली, “थैंक यू अद्वैत… तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि तुमने मेरी ज़िंदगी की कितनी बड़ी मदद की है। मैं अब अपने सपनों को पूरा करके रहूँगी। मीना आएगी तो मुझे उसके साथ जाना होगा।”

    अद्वैत ने हल्की हैरानी से पूछा, “आज फिर से क्यों?”

    रूहानी ने कुछ पल चुप रहकर सोचा — कितनी बार तो चाहा था कि ये इन्सान एक बार पूछे कि वो उसके पैसे कहाँ लगा रही है… अब जब पूछ ही लिया है, तो बता ही देती हूँ

    उसने कहा, “मैं एक स्ट्रगलिंग ड्रेस डिज़ाइनर हूँ, तो नया स्टूडियो ले रही हूँ… उसी के लिए ये सब।”

    अद्वैत की आँखों में चमक आ गई। मुस्कराकर बोला, “अरे वाह! लेखक की पत्नी ड्रेस डिज़ाइनर…. ये तो कुछ ज़्यादा ही यूनिक कॉम्बिनेशन हो गया, है ना?”

    रूहानी उसके शब्दों से जैसे भीतर तक सिहर उठी। वो अचानक कुछ पल को चुप हो गई, उसके हाथ में पकड़ा कॉफ़ी मग ठंडा होने लगा लेकिन उसकी पकड़ अब भी वैसी ही टिकी रही। 

    उसकी आँखें अद्वैत की ओर थीं, पर नजरें जैसे किसी और ही सवाल में उलझी थीं….. क्या उसने सच में ‘पत्नी’ कहा? वो शब्द जो अब तक सिर्फ दस्तावेज़ों में था, आज अद्वैत की ज़ुबान पर था… यूँ सहज, यूँ स्वाभाविक।

    अद्वैत को जैसे महसूस हुआ कि उसने कुछ ज़्यादा कह दिया है, उसकी नज़रें फौरन झुक गईं। वो भी खुद को संयत कर घूंट भरते हुए अपनी कॉफी खत्म की और नज़रे चुराते हुए बोला, “मुझे तुमसे एक ज़रूरी बात करनी है… या यूँ कह लो कि कुछ पूछना है।”

    रूहानी, जो अब तक अपने मन के उलझे धागों को सुलझाने में लगी थी, थोड़ी झेंपते हुए बोली, “क्या?”

    अद्वैत ने हल्की सी साँस लेकर कहा, “अगले संडे यहीं पास में एक साहित्यिक समारोह हो रहा है… वहाँ मुझे आमंत्रित किया गया है। लेकिन… बात ये है कि उन्होंने मुझसे कहा है कि मुझे अपनी पत्नी के साथ आना होगा।”

    उसने रूहानी की ओर देखा, आँखों में एक सवाल था, जो शब्दों से ज़्यादा गहरा था।

    “तो… क्या तुम चलोगी?”

    रूहानी की सांस थम सी गई। उसके होंठ हिले, लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकली। 

    अद्वैत की निगाहें उसके चेहरे पर टिकी थीं, हर छोटी सी झलक पढ़ने की कोशिश में। कमरे की चुप्पी में सिर्फ उनके दिल की धड़कनों की गूंज़ सुनाई देती थी। 

    क्या वह हां कहेगी? या खामोशी ही उसका जवाब होगी? 

    —————–

    क्या मीना की उस अचानक डर भरी बात के पीछे कोई छुपा हुआ सच था?

    क्या ‘इशिता’ का नाम सिर्फ एक नाम था, या उसके पीछे छुपा था कोई अधूरा किस्सा? 

    क्या रूहानी उस साहित्यिक समारोह में अद्वैत के साथ जाने को तैयार होगी, या उसकी खामोशी में छुपा होगा कोई अनसुलझा दर्द?