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  • अधूरी इबादत भाग~31

    अधूरी इबादत भाग~31

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~31 फटा हुआ पन्ना 

     

    अद्वैत किचन में था, apron पहने, चेहरे पर हल्की झुंझलाहट और पसीने की बूंदें। गैस पर रखे तवे से धुआँ उठ रहा था और कड़ाही में कुछ जलने की गंध हवा में तैर रही थी। 

    अद्वैत का हाथ थरथरा रहा था, जैसे हर टमाटर का टुकड़ा उसके हाथों से फिसलता जा रहा हो। उसकी सांसें गहरी थीं, पर दिल की धड़कनें असामान्य रूप से तेज़। हर झोंके में जो धुआँ उठता, वह उसकी उम्मीदों को बुझाता जा रहा था और एक आवाज़ उसके मन में बार-बार गूंज रही थी, “क्या मेरी कोशिशें इन मासूमों के लिए कभी मायने रखेंगी?”

    तवे पर जलती हुई आवाज़ ने उसे झकझोर दिया, जैसे असफलताओं का बोझ उसके कंधों पर उतर आया हो मानो वह खुद से ही हारता जा रहा था।

    मीना और रूहानी के घर में घुसते ही बच्चों की खामोशी ने माहौल में एक भारीपन घोल दिया था। गुनगुन की आँखें भरी हुई थीं और चीकू का हाथ उसकी बहन के हाथ में कसकर जकड़ा हुआ था, जैसे उसने अभी-अभी किसी डरावने दृश्य से खुद को खींच निकाला हो।

    मीना ने दौड़कर अपने बच्चों को गले लगाया, “क्या हुआ बच्चो? तुम रो क्यों रहे हो?” गुनगुन ने धीरे से फुसफुसाया, “अद्वैत अंकल ने कुछ जलाया… बहुत तेज़ आवाज़ आई… हमने सोचा कुछ बुरा हो गया।”

    रूहानी तेजी से किचन की ओर बढ़ी…. जहाँ अद्वैत झुका हुआ था, हाथ में तवा और चेहरे पर मायूसी। उसे देख रूहानी की आँखों में एक पल के लिए चिंता और फिर एक हल्की सी मुस्कान उभरी।

    “तुम ठीक हो?” उसने धीरे से पूछा।

    अद्वैत ने चौंककर उसकी ओर देखा, फिर सामान्य सी आवाज़ में बोला, “बच्चो ने कहा कि उन्हें भूख लगी है, इसलिए मैंने सोचा बच्चों के लिए कुछ बना लूँ…. पर शायद मेरा लेखक होना ही ठीक है, रसोइया नहीं।”

    “तुम ठीक तो हो ना? मैं… बस डर गई थी उस आवाज़ से… ये बच्चे इतने नाज़ुक होते हैं… तुम भी…” रूहानी की आवाज़ में एक नर्माहट थी, जैसे अपने भीतर की बेचैनी छुपाने की कोशिश कर रही हो।  

    उसकी आँखों में न केवल चिंता थी, बल्कि एक छुपा हुआ सवाल भी, जो शायद वो खुद भी समझ नहीं पा रही थी। उसकी सांसें थोड़ी तेज़ हुईं, मानो किसी अनजानी बेचैनी को रोकने की कोशिश हो रही हो।

    जब चीकू की मासूम उंगली अद्वैत की ओर उठी और उसने नन्हीं सी आवाज़ में कहा, “अंकल, आपको खाना बनाना नहीं आता ना?” तो कमरे की हवा में एक पल को जैसे नमी भर गई। वो सवाल नहीं था, वो एक सच्चाई थी जो अद्वैत के चेहरे पर शर्म और हल्की मुस्कान बनकर उभरी। 

    रूहानी की हँसी जैसे फूट पड़ी, वो खुलकर मुस्कुराई। 

    अद्वैत ने भी अपनी गर्दन झुका ली, जैसे उस सवाल ने उसके हाथों की बेबसी और उसके अंदर की गहराई दोनों उजागर कर दी हो।

    मीना ने भी मुस्कराते हुए तुरंत कहा, “आप निकलिए, सर… मैं बना देती हूँ,” और वह बिना देर किए पूरे किचन की सफ़ाई में जुट गई, जैसे किचन को सहेजना उसके मन को भी सहेजने जैसा था। 

    अद्वैत ने झेंप मिटाने के अंदाज़ में एप्रन उतारा और चुपचाप सोफे की तरफ़ चला गया, जहां उसके कुछ कागज़, पेन और लैपटॉप रखे हुए थे। वह अपने में ही खोया-सा उन्हें समेटने लगा।

    तभी रूहानी भी मीना की मदद के लिए आगे बढ़ी, शायद सिर्फ़ सामान समेटने नहीं, बल्कि उस पल की उलझन समेटने भी।

    लेकिन मीना ने बीच में आकर उसका हाथ थाम लिया, मुस्कुरा कर बोली, “आप रहने दीजिए मैडम, सर को ऊपर कुछ ज़रूरत पड़ी तो…” और धीरे से उसका हाथ सामान से अलग कर दिया। 

    उस क्षण रूहानी का चेहरे का रंग उड़ गया, जैसे कोई अनकही सीमा फिर से उसकी आँखों के सामने आ खड़ी हुई हो। अभी तक वह अद्वैत के कमरे के अंदर नहीं गई थी…. न उसे कभी ज़रूरत पड़ी, न इजाज़त मिली। 

    एग्रीमेंट की एक-एक पंक्ति उसके मन में ताज़ा हो उठी, जिसमें साफ़ कहा गया था — ‘न कोई एक-दूसरे के कमरे में आएगा, न निजी सीमाओं को लांघेगा।’

    रूहानी ने हल्के से बात मोड़ दी, “अद्वैत कोई छोटा बच्चा थोड़ी है, वो मैनेज कर लेगा…..” लेकिन उसकी आवाज़ में खुद को समझाने की थकावट थी। 

    लेकिन मीना पीछे नहीं हटी। वह मुस्कुराई और बोली, “पति को अपनी पत्नी की ज़रूरत पड़ ही जाती है… देखिए न, सर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे हैं…” और जैसे ही अद्वैत की छाया ऊपर जाती दिखी, मीना ने एक धीमा-सा धक्का दिया, “जाइए न मैडम, अब तो मान जाइए…”

    रूहानी कुछ नहीं बोली। उसकी पलकें झुकी रहीं, जैसे दिल में कोई गूंगी उलझन पल रही हो। फिर वो चुपचाप, धीमे क़दमों से, अनजाने डर और कहीं भीतर की कोमल उत्सुकता को समेटे, अद्वैत के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

    हर क़दम एक नई दहलीज़ थी और शायद, एक नया मोड़ भी।

    अद्वैत अपने कमरे में कदम रखने ही वाला था कि उसकी नज़र दो कदम दूर खड़ी हुई रूहानी पर पड़ी, जो इस अजीब सी स्थिति से बचने के लिए अपनी निगाहें इधर-उधर फेर रही थी। उसकी आंखें झुकी हुई थीं, पर भीतर एक बेचैनी साफ़ झलक रही थी। 

    अद्वैत का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया, उसकी आवाज़ में एक गहरी गंभीरता समा गई। “तुम यहां? रुहानी…”

    रूहानी जल्दी से अपना हाथ हिलाते हुए बोली, “मैं जानबूझकर यहां नहीं आई, वो मीना ने… मुझे… यहां… तुम्हारी मदद… नहीं, नहीं, मैं कॉन्ट्रैक्ट के नियमों के खिलाफ नहीं जा रही हूँ। प्लीज, मैं मजबूर हो गई थी।”

    उसकी आवाज़ में घबराहट थी, शब्द जैसे घुल-मिल गए थे और हाथों की हल्की थरथराहट उसके भीतर की बेचैनी बयां कर रही थी। वह खुद को न्यायसंगत साबित करने की कोशिश में थी, लेकिन अंदर से वह झूठी भी लग रही थी।

    अद्वैत ने उसकी इस बेचैन आवाज़ और थरथराते हुए शरीर को देखकर हल्की सी मुस्कान दी, लेकिन फिर खुद ही छिपाने की कोशिश में जल्दी ही कहा, “ठीक है, ठीक है, मैं समझ गया। मैं थोड़ा फ्रेश होकर आता हूँ। तुम जो चाहो तो पढ़ सकती हो।” उसकी आवाज़ में एक नरमी थी, जो रूहानी के भीतर की उलझनों को कुछ कम कर रही थी।

    रूहानी को पूरी बात समझ नहीं आ रही थी, तभी अद्वैत ने अपने कमरे के बगल वाले कमरे की ओर इशारा किया और कहा, “यह मेरा लाइब्रेरी या कह लो स्टडी रूम है। तब तक यहीं रहो, मैं आता हूँ, फिर साथ में नीचे चलते हैं ताकि मीना को शक न हो।”

    उस पल रूहानी के चेहरे पर हल्का सा सुकून आया, मानो किसी ने उसकी बेचैनी को थोडा सा कम कर दिया हो।

    रूहानी ने धीरे से सिर हिलाया और अद्वैत के स्टडी रूम में प्रवेश कर गई। अद्वैत भी अपने कमरे में वापस चला गया। 

    रूहानी ने धीरे-धीरे कमरे में कदम रखा, उसके होंठ अपने आप में कतर रहे थे, जैसे किसी अनजानी बेचैनी को छुपाने की कोशिश कर रही हो। उसका मन इस जगह को लेकर थोड़ा असहज था…. यह अद्वैत की निजी दुनिया थी, एक ऐसी दुनिया जिसमें वह खुद को अनजान पा रही थी। 

    उसने चारों ओर देखा तो किताबों की कतारें थीं, लेकिन वे सब कुछ ऐसी किताबें थीं जिन्हें पढ़कर शायद ही कोई दिल बहलाए…. क्योंकि यहाँ सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ज्ञान, शोध और शिल्प का संगम था। 

    हर शेल्फ पर इतिहास, दर्शन, विज्ञान और विभिन्न संस्कृतियों पर गंभीर ग्रंथ सजे थे, जिनके साथ लेखन कला की बारीकियों को सिखाने वाली मार्गदर्शिकाएँ और व्याकरण की किताबें भी थीं। 

    यह लाइब्रेरी किसी कथाकार के लिए विचारों का स्रोत और रचनात्मकता की प्रयोगशाला थी, जहाँ से अनगिनत कहानियों को जन्म मिलना था।

    वैसे तो रूहानी की रुचि कभी पढ़ाई में नहीं रही थी; वह हमेशा से जीवन के रंगीन, संवेदनशील पक्ष की ओर अधिक आकर्षित रही, न कि सूखे शब्दों की दुनिया की ओर।

    फिर उसकी नज़र एक किताब पर पड़ी…. पुरानी, धूल झड़ी हुई, जिसकी कवर झुर्रीदार थी। वह किताब कुछ अलग सी लग रही थी, शायद अद्वैत की वह ज़िन्दगी जिसे वह आम तौर पर छुपाता था। 

    उसने झिझकते हुए किताब निकाली और पन्ने पलटने लगी। ये कोई गंभीर या भारी किताब नहीं थी, बल्कि एक खूबसूरत कविता संग्रह था, जिसमें भावनाओं की गहराई और जीवन की नाजुकता के अनकहे रंग समाए थे। 

    रूहानी को एहसास हुआ कि अद्वैत के भीतर भी कोई छुपा हुआ कोमल पक्ष है, जो शायद उसने कभी सामने आने नहीं दिया।

    उसने पन्ने पलटते हुए एक फटा हुआ पन्ना देखा, जिस पर खूबसूरती से लिखा था — “यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है। उम्मीद है, तुम इसे संभालकर रखोगे – इशिता।” 

    “इशिता…” नाम रूहानी के होठों पर धीरे से बया हुआ, उसके भीतर अचानक से एक हलचल मच गई, उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं, जैसे किसी पुराने राज की परतें अब धीरे-धीरे खुल रही हों। उसने झट से किताब बंद कर दी, लेकिन वह छोटा सा संदेश उसके मन में सवालों के तूफान छोड़ गया।

    तभी पीछे से अद्वैत की आवाज़ आई। 

    ——

    क्या इशिता कौन है, और क्यों इस किताब में उसके दिल की बातें छुपी हैं? 

    क्या अद्वैत के भीतर छिपा वह कोमल पक्ष कहीं उनके रिश्ते की नींव बदलने वाला था? 

    जब रूहानी ने वो पन्ना छू लिया है… क्या वो सिर्फ एक पाठक रहेगी? या किसी पुराने सच की गवाह बनेगी?

  • सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत 💞💞

    सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत 💞💞

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत 💞 💞 

    निगाहों में निगाहें तुम संग मिलानी है,

    जो बात होंठों से हो ना सकी ,

    धड़कनों से बातें करते हुए सपनों में लानी है,

    मुझे ज्यादा न सही थोड़ी सी ही सही,

    सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत तुम संग निभानी है…।।

    हाथों को तुम्हारी बाहों में समेट दिया 

    जन्मभर के लिए यह विश्वास सबको दिलानी,

    तुम से ही शामें मेरी सारी हैं,

    ये एहसास कराती सांसों को काबू में रखकर

    हसीन ख्वाब के साथ सपने सजाती 

    आंखों को बेआवाज बहाना है ,

    खुद के लिए सिर्फ #मेरे लिए हो तुम #

    ये आसमान पर लिखते जाना है ,

    सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत ही सही

    तुमसे ही प्यार की कहानी लिखती जानी है,

    #मैं तुम्हारे लिए #हर लम्हा जीते जी

    मर जाऊंगी बस मुझे अपने हिस्से में

    शामिल करना ये वादे मैं तुमसे चाहूंगी…

  • खन खन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    खन-खन की मनाही

     

    पहाड़ों और घने जंगलों के बीच बसा एक छोटा-सा गांव था “चंद्रपुर” देखने में वह गांव किसी जन्नत से कम नहीं था। चारों ओर हरियाली, खेतों में लहलहाती फसलें और नदी का मीठा पानी। लेकिन उस गांव का एक अजीब नियम था।

     

    उस गांव की कोई भी औरत अपने पैरों में पायल नहीं पहनती थी।

     

    यहां तक कि शादी के दिन भी दुल्हन के पैरों में पायल नहीं बांधी जाती थी। गांव की बूढ़ी दादियां हमेशा अपनी बेटियों और बहुओं से कहती थीं,

     

    “बेटी, चाहे सोने के गहने पहन लेना, लेकिन भूलकर भी पायल मत पहनना। उसकी खन-खन पूरे गांव पर मौत बनकर टूट सकती है।”

     

    नई पीढ़ी इस बात पर यकीन नहीं करती थी। उन्हें लगता था कि यह सिर्फ पुरानी सोच है।

     

    उसी गांव में चंदा नाम की एक 20 साल की लड़की रहती थी। वह बहुत सुंदर, समझदार और थोड़ा जिद्दी स्वभाव की थी। कुछ ही दिनों बाद उसकी शादी होने वाली थी।

     

    जब उसकी सहेलियां दूसरे गांव से लौटीं तो वे तरह-तरह की चांदी की पायलें लेकर आईं।

     

    “देख चंदा, कितनी सुंदर है ना?” एक सहेली बोली।

     

    चंदा ने पहली बार इतनी खूबसूरत पायल देखी। उसके मन में भी इच्छा हुई।

     

    घर आकर उसने अपनी दादी से पूछा,

    “दादी, आखिर पायल पहनने से ऐसा क्या हो जाएगा?”

     

    दादी का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    उन्होंने कहा,

    “ये कहानी आज से करीब दो सौ साल पुरानी है।”

     

    सभी लोग उनके आसपास बैठ गए।

     

    दादी बोलीं,

    “पहले हमारे गांव में हर लड़की पायल पहनती थी। पूरे गांव में दिन-रात उसकी मीठी खन-खन गूंजती रहती थी। लेकिन जंगल के उस पार एक भयानक राक्षस रहता था—घोरासुर। उसके कान इतने तेज थे कि वह कई कोस दूर की आवाज भी सुन लेता था।”

     

    “उसे सबसे ज्यादा पायल की आवाज पसंद थी। जहां भी खन-खन सुनाई देती, वह समझ जाता कि वहां इंसान रहते हैं। फिर वह रात के अंधेरे में आता और पूरे गांव को उजाड़ देता।”

     

    “एक रात उसने हमारे गांव पर हमला कर दिया। कई लोग मारे गए। गांव जल गया। तब एक साधु ने गांव वालों से कहा—’अगर जीना चाहते हो तो आज के बाद इस गांव की कोई भी स्त्री पायल नहीं पहनेगी। जब तक खन-खन नहीं होगी, राक्षस यहां का रास्ता भूल जाएगा।’”

     

    तभी से यह नियम बन गया।

     

    चंदा ने कहानी तो सुन ली, लेकिन उसके मन ने इसे सच नहीं माना।

     

    कुछ दिनों बाद उसकी शादी का दिन आ गया।

     

    दूल्हा दूसरे गांव से आया था। वहां की परंपरा के अनुसार दुल्हन को चांदी की पायल पहनाई जाती थी।

     

    दूल्हे की मां ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “हमारी बहू बिना पायल के कैसी लगेगी?”

     

    चंदा की मां ने हाथ जोड़कर मना कर दिया।

     

    लेकिन रात को चंदा ने वही सुंदर पायल चुपके से निकाल ली।

     

    उसने सोचा,

    “बस थोड़ी देर पहनकर देखती हूं। किसी को क्या पता चलेगा?”

     

    उसने जैसे ही पायल पहनी…

     

    छन… छन… छन…

     

    कमरे में मीठी आवाज गूंज उठी।

     

    चंदा मुस्कुरा दी।

     

    उसे क्या पता था कि कई कोस दूर, काले पहाड़ के भीतर एक विशाल गुफा में सोया हुआ घोरासुर अचानक आंखें खोल चुका था।

     

    उसके कान फड़क उठे।

     

    वह धीरे-धीरे मुस्कुराया।

     

    “आखिर… इतने साल बाद फिर वही आवाज…”

     

    उसने हवा को सूंघा।

     

    “चंद्रपुर…”

     

    इतना कहकर वह बिजली की रफ्तार से जंगल की ओर दौड़ पड़ा।

     

    उधर गांव में अचानक कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगे।

     

    पेड़ों पर बैठे पक्षी रात में ही उड़ने लगे।

     

    गांव के सबसे बूढ़े पुजारी ने यह सब देखा तो उनका चेहरा पीला पड़ गया।

     

    उन्होंने चिल्लाकर कहा,

    “सब लोग घरों के अंदर चले जाओ। किसी ने पायल पहनी है!”

     

    पूरा गांव घबरा गया।

     

    लोग मशालें लेकर दौड़ पड़े।

     

    तभी चंदा डर गई।

     

    उसने तुरंत पायल उतार दी।

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    धरती कांपने लगी।

     

    जंगल से ऐसी दहाड़ सुनाई दी कि बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया।

     

    कुछ ही देर में पेड़ टूटने लगे।

     

    घोरासुर गांव के बाहर खड़ा था।

     

    उसकी लंबाई किसी पेड़ जितनी थी। लाल आंखें अंगारों जैसी जल रही थीं।

     

    वह गरजा,

    “मुझे पता है… तुम यहीं हो… जिसने पायल पहनी है।”

     

    गांव में सन्नाटा छा गया।

     

    चंदा की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    वह खुद आगे आ गई।

     

    “गलती मेरी है। किसी और को मत मारो।”

     

    गांव वाले उसे रोकने लगे, लेकिन वह नहीं रुकी।

     

    राक्षस उसकी ओर बढ़ने लगा।

     

    तभी गांव के मंदिर की घंटी अपने आप बज उठी।

     

    वही साधु, जिनकी कहानी दादी ने सुनाई थी, जैसे अचानक वहां प्रकट हो गए। उनके हाथ में एक पुराना त्रिशूल था।

     

    उन्होंने कहा,

    “घोरासुर! तेरी ताकत आवाज में है। लेकिन आज तेरे अहंकार का अंत होगा।”

     

    राक्षस जोर से हंसा।

     

    “मुझे कोई नहीं रोक सकता।”

     

    साधु ने त्रिशूल जमीन में गाड़ दिया।

     

    पूरा गांव तेज रोशनी से भर गया।

     

    घोरासुर आगे बढ़ना चाहता था, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में धंस गए।

     

    साधु बोले,

    “जिस आवाज के पीछे तू सदियों से भागता रहा, वही आज तेरे विनाश का कारण बनेगी।”

     

    उन्होंने चंदा से कहा,

    “बेटी, वह पायल फिर से पहन लो।”

     

    चंदा घबरा गई।

     

    “लेकिन… इससे तो ये और ताकतवर हो जाएगा।”

     

    साधु मुस्कुराए।

     

    “आज नहीं।”

     

    चंदा ने कांपते हाथों से पायल पहन ली।

     

    उसने धीरे से एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    छन… छन… छन…

     

    इस बार पायल की आवाज पूरे गांव में गूंज उठी।

     

    लेकिन इस बार वह साधारण आवाज नहीं थी।

     

    त्रिशूल से निकली दिव्य शक्ति उस खन-खन में मिल गई।

     

    घोरासुर दर्द से तड़पने लगा।

     

    वह अपने कान बंद करने लगा।

     

    “नहीं… ये क्या हो रहा है…!”

     

    जितनी बार पायल बजती, उसकी ताकत उतनी ही कम होती जाती।

     

    कुछ ही पलों में उसका विशाल शरीर पत्थर बनने लगा।

     

    उसने आखिरी बार गुस्से से दहाड़ लगाई।

     

    फिर पूरा शरीर पत्थर की मूर्ति बनकर वहीं खड़ा रह गया।

     

    अगले ही पल वह हजारों टुकड़ों में टूटकर धूल बन गया।

     

    गांव वाले खुशी से झूम उठे।

     

    सदियों पुराना डर आखिर खत्म हो चुका था।

     

    साधु मुस्कुराए और बोले,

    “डर हमें बचा सकता है, लेकिन हमेशा डर में जीना सही नहीं। समझदारी और साहस मिल जाएं तो सबसे बड़ा राक्षस भी हार जाता है।”

     

    इतना कहकर वे वहां से अदृश्य हो गए।

     

    कुछ महीनों बाद पूरे गांव में पहली बार एक नई परंपरा शुरू हुई।

     

    हर लड़की अपने पैरों में पायल पहनने लगी।

     

    अब वही खन-खन, जो कभी मौत की निशानी थी, गांव की खुशियों की पहचान बन गई।

     

    और आज भी जब चंद्रपुर की ग

    लियों में पायल की मधुर आवाज गूंजती है, तो बुजुर्ग मुस्कुराकर अपने बच्चों से कहते हैं,

     

    “ये सिर्फ पायल की खन-खन नहीं… ये उस साहस की आवाज है जिसने पूरे गांव को हमेशा के लिए भय से मुक्त कर दिया।”

     

  • बेवफाई भाग 2

    बेवफाई भाग 2

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

     

    Part 2

     

    छह महीने बाद, 

     

    अगले छह महीने रिया ने खुद को पूरी तरह काम में डुबो दिया। वह एक छोटे से डिजाइन स्टूडियो में काम करती थी। आरव से अलग होने के बाद उसने खुद को संभालना सीखा।

     

    पहले वह हर रात रोती थी। फिर रोना बंद हो गया। पहले उसे आरव की याद आती थी। फिर उसने खुद को याद करना शुरू किया। उसने अपने स्टूडियो को बड़ा किया।

     

    नई टीम बनाई। और छह महीने बाद… रिया का नाम मुंबई के युवा फैशन डिजाइनरों में गिना जाने लगा।

    वो रिया जिसे कुछ महीनों पहले तक कोई नहीं जानता था आज उसने अपना एक मुकाम हासिल कर लिया था। 

     

    एक दिन उसे एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला। क्लाइंट का नाम देखकर वह कुछ सेकंड के लिए चुप रह गई।

     

    आरव मल्होत्रा। उसकी कंपनी। रिया ने फाइल बंद कर दी। “मैं ये प्रोजेक्ट नहीं करूंगी।”

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद उसे क्लाइंट की शर्तों के बारे में पता चला।

     

    प्रोजेक्ट किसी और डिजाइनर को नहीं दिया जा सकता था। उसे ही करना था।

     

    रिया ने गहरी सांस ली। “ठीक है।”

     

    उसे क्या पता था कि यह मुलाकात उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच सामने लाने वाली थी।

     

    —

     

    अगले दिन वह आरव के ऑफिस पहुंची। दरवाजा खोलते ही उसकी नजर आरव पर पड़ी।

     

    छह महीने में वह बदल चुका था।

     

    चेहरे पर पहले से ज्यादा थकान थी। आंखों के नीचे हल्के काले घेरे। लेकिन सबसे ज्यादा अजीब था…

    उसकी आंखों में दर्द। रिया ने फाइल टेबल पर रखी।

     

    “प्रोजेक्ट की सारी डिटेल्स मैंने देख ली हैं।”

     

    आरव उसे देखता रहा। “तुम ठीक हो?”

     

    रिया ने ठंडी आवाज में कहा, “ये सवाल अब तुम्हें पूछने का अधिकार नहीं है।”

     

    आरव चुप हो गया। दोनों के बीच कुछ सेकंड की खामोशी रही।

     

    फिर रिया ने कहा, “काम की बात करें?”

     

    आरव ने सिर हिलाया, “हां।”

     

    दोनों प्रोफेशनल हो गए, कम से कम बाहर से।

     

    लेकिन हर मुलाकात में कुछ अनकहा रह जाता।

     

    एक दिन अचानक आरव ने पूछा, “तुमने दोबारा शादी क्यों नहीं की?”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा। “तुमने की?”

     

    आरव चुप हो गया। रिया मुस्कुरा दी। “मुझे भी जवाब नहीं चाहिए।”

     

    वह वहां से जाने लगी। तभी आरव ने कहा, “रिया…”

     

    वह रुक गई। “मैंने तुम्हारे साथ बेवफाई नहीं की थी।”

     

    रिया के चेहरे पर कठोरता आ गई। “फिर मीरा कौन थी?”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं। “वो मेरी बहन है।”

     

    रिया जैसे पत्थर की बन गई। “क्या?”

     

    आरव बोला, “मेरी छोटी बहन।”

     

    रिया कुछ बोल नहीं पाई। आरव ने टेबल की दराज खोली और एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    उसमें मेडिकल रिपोर्ट्स थीं। “मीरा को कैंसर था।”

     

    रिया के हाथ कांपने लगे। “क्या?”

     

    आरव, “डॉक्टर ने कहा था कि उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है।” आरव की आवाज टूटने लगी।

     

    “मीरा मेरी वजह से नहीं… मेरी वजह से नहीं, बल्कि इसलिए मेरी जिंदगी में वापस आई थी क्योंकि उसकी आखिरी इच्छा थी कि मैं उसे अपनी जिंदगी में खुश देखूं।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले।“तो तलाक?”

     

    आरव, “वो भी झूठ था।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “क्योंकि मुझे लगा… अगर मैं तुम्हें अपने से दूर कर दूंगा, तो तुम सुरक्षित रहोगी।”

     

    रिया ने हैरानी से उसे देखा। “किससे?”

     

    आरव ने धीरे से कहा, “मेरे पिता से।”

     

    रिया कुछ समझ नहीं पाई।

     

    आरव ने बताया कि उसके पिता एक बड़े घोटाले में फंस चुके थे और उनके दुश्मन आरव के परिवार को नुकसान पहुंचाना चाहते थे।

     

    कुछ लोगों ने रिया को धमकी देना शुरू कर दिया था।

     

    आरव ने पुलिस को सब बताया था, लेकिन जब तक सबूत नहीं मिलते, वह उसे सुरक्षित रखना चाहता था।

     

    इसलिए उसने दुनिया के सामने मीरा के साथ रिश्ता होने का नाटक किया, क्योंकि किसी को नहीं पता था आरव की कोई छोटी बहन है। 

     

    और जिससे लोग समझें कि उसका और रिया का रिश्ता खत्म हो चुका है। “लेकिन तुमने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए। “क्योंकि मुझे डर था कि अगर तुम्हें पता चल गया तो तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगी।”

     

    रिया ने धीमे से कहा, “और तुमने सोचा कि झूठ बोलकर मुझे बचा लोगे?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया। “मैं गलत था।”

     

    रिया की आंखों में दर्द था। “हां… तुम गलत थे।”

     

    वह उसके करीब आई। और उसका कॉलर पकड़ते हुए टूटी आवाज में बोली, “तुमने मेरी जान तो बचा ली, आरव…”

     

    उसकी आवाज कांप गई। “लेकिन मेरे अंदर का भरोसा मार दिया।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बहते रहे। “मैं जानता हूं।”

     

    “मैंने छह महीने तुम्हें नफरत किया।”

     

    “मैंने भी।”

     

    “मैं हर रात सोचती थी कि तुमने मुझे धोखा दिया।”

     

    “मैं हर रात तुम्हारी तस्वीर देखकर खुद को कोसता था।” आरव ने दर्द भरी आवाज में कहा। 

     

    दोनों चुप हो गए। कुछ रिश्तों में प्यार खत्म नहीं होता।

    बस दर्द इतना बढ़ जाता है कि प्यार दिखाई देना बंद हो जाता है।

     

    —

     

    कुछ दिनों बाद मीरा खुद रिया से मिलने आई। वह बहुत कमजोर थी। उसने रिया का हाथ पकड़ लिया। “भाभी…”

    रिया की आंखें भर आईं। “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

     

    मीरा मुस्कुराई। “लेकिन एक गलती मेरी थी।”

     

    रिया, “क्या?”

     

    मीरा, “मैंने भाई से कहा था कि अगर वो आपसे सच बताएगा तो आप उसे कभी माफ नहीं करेंगी।”

     

    रिया हल्का-सा मुस्कुरा दी। “और अब?”

     

    मीरा ने कहा, “अब लगता है कि प्यार में सबसे बड़ी बेवफाई झूठ बोलना नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुकी। “बल्कि सामने वाले को सच जानने का अधिकार न देना है।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। मीरा चली गई। रिया बहुत देर तक वहीं बैठी रही।

     

    —

     

    एक साल बाद। समुद्र के किनारे वही जगह जहां कभी आरव ने उसे प्रपोज किया था।

     

    आरव वहां खड़ा था। रिया धीरे-धीरे उसके पास आई।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “तुम यहाँ आई।”

     

    रिया मुस्कुरा दी। “हां।”

     

    आरव, “क्या तुम मुझे माफ कर सकती हो?”

     

    रिया ने कुछ पल उसे देखा। “माफ कर दिया।”

     

    आरव की आंखों में उम्मीद जगी।

     

    “लेकिन…” रिया ने उसकी बात रोक दी। “भरोसा वापस आने में वक्त लगेगा।”

     

    आरव ने सिर हिलाया। “मैं इंतजार करूंगा।”

     

    रिया उसके पास आई। “और अगर फिर कभी मुझे बचाने के लिए मुझसे झूठ बोला…”

     

    आरव मुस्कुरा दिया। “तो?”

     

    “तो इस बार सच में तलाक ले लूंगी।”

     

    दोनों हंस पड़े। आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। इस बार रिया ने अपना हाथ नहीं खींचा।

     

    समुद्र की लहरें उनके पैरों को छूकर लौट रही थीं।

     

    रिया ने आरव के कंधे पर सिर रख दिया। कभी-कभी रिश्तों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किसने बेवफाई की।

     

    सवाल यह होता है कि, क्या उस बेवफाई के बाद भरोसा दोबारा जन्म ले सकता है? रिया और आरव के रिश्ते ने एक बात सीखी थी,

     

    प्यार हमेशा रिश्ते को नहीं बचाता।

    लेकिन सच्चाई, पछतावा और दोबारा भरोसा बनाने की कोशिश… कभी-कभी टूटे हुए रिश्ते को पहले से भी

    ज्यादा मजबूत बना देती है।

     

    और शायद…

     

    उनकी कहानी में बेवफाई किसी तीसरे इंसान की नहीं थी। बेवफाई उस झूठ की थी, जिसने दो सच्चे दिलों को छह महीनों तक एक-दूसरे से दूर रखा।

     

    समाप्त….

    आपका एक लाइक मेरे लिए बहुत कीमती है।

     

  • बेवफाई

    बेवफाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

    Part 1

     

    “कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं… बस उनमें से भरोसा मर जाता है।

    और जब भरोसा मर जाए, तो प्यार कितना भी जिंदा हो… रिश्ता सांस नहीं ले पाता।”

     

    शाम के करीब सात बज रहे थे।

     

    मुंबई की सड़कों पर बारिश अपना पूरा जोर दिखा रही थी। आसमान काले बादलों से घिरा था और सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की रोशनी पानी की बूंदों में घुलकर किसी धुंधली तस्वीर जैसी लग रही थी।

     

    रिया माथुर खिड़की के पास खड़ी लगातार घड़ी देख रही थी। उसने हल्के आसमानी रंग की बहुत सी सुंदर साड़ी पहनी हुई थी, चेहरे पर हल्का सा मेकअप, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र। 

     

    आज उसके चेहरे पर महीनों बाद थोड़ी सी खुशी दिखाई दे रही थी।

     

    उसने कमरे को खुद सजाया था। टेबल पर मोमबत्तियां थीं। बीच में आरव का पसंदीदा चॉकलेट केक रखा था, जो उसने खुद अपने हाथों से बनाया था और उसके पास रखा था… एक छोटा-सा गिफ्ट बॉक्स।

     

    रिया ने अपने हाथ में पकड़े फोन की स्क्रीन देखी।

     

    “आरव ❤️” उसने फिर मैसेज किया।

     

    “कितनी देर और? आज जल्दी आना… तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है।”

     

    मैसेज भेजने के बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। आज उनकी शादी की तीसरी सालगिरह थी।

     

    तीन साल पहले इसी दिन आरव ने उसका हाथ पकड़कर सात फेरे लिए थे और कहा था, “रिया, जिंदगी चाहे जितनी मुश्किल हो जाए, मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूंगा।”

     

    रिया ने उस दिन उस एक वादे पर अपनी पूरी जिंदगी रख दी थी। और आज…

    वह उसी वादे का जश्न मनाने के लिए उसका इंतजार कर रही थी।

     

    रात के करीब आठ बजे दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। “आरव!” उसने धीरे से नाम लिया, और आंखों में चमक लिए, वह दौड़कर दरवाजे तक पहुंची।

     

    लेकिन दरवाजे के बाहर आरव नहीं था। कूरियर वाला खड़ा था। उसे देखकर रिया के चेहरे की चमक पलभर में गायब हो गई। 

     

    “मैडम, आपके नाम का पार्सल।” कुरियर वाले ने एक पैकेट रिया की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

    पहले तो रिया को थोड़ी हैरानी हुई, लेकिन फिर उसने पैकेट ले लिया। 

     

    “थैंक यू।” कहकर उसने एक पर्चे में साइन किया और फिर दरवाजा बंद करके अंदर आ गई। 

    वो पैकेट अभी भी उसके हाथ में था।

     

    पहले उसने सोचा आरव को फोन करने के बाद वो पैकेट खोलेगी, लेकिन फिर जाने क्या सोचकर उसने फोन टेबल पर रखना और पैकेट खोलने लगी। 

     

    अंदर एक फाइल थी। रिया ने हैरानी से फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था, “तलाक का समझौता।”

     

    जैसे ही उसने वो शब्द पढ़े, उसकी सांस जैसे वहीं रुक गई। “नहीं…” उसके हाथ कांपने लगे। “ये… ये क्या है?”

     

    फाइल के अंदर आरव के हस्ताक्षर किए हुए कागजात रखे थे। तलाक के कागजात।

     

    रिया ने तुरंत आरव को फोन किया।

     

    एक बार… दो बार… पांच बार… लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं।

     

    फिर फोन बंद हो गया। रिया फर्श पर बैठ गई, उसकी दुनिया मानो पलभर में पूरी तरह से उजड़ गई। आंखों के सामने तीन साल की पूरी जिंदगी घूम गई।

     

    पहली मुलाकात। पहली लड़ाई। पहली बारिश।

     

    पहली सालगिरह। आरव का उसे देखकर मुस्कुराना।

     

    और वह रात… जब आरव ने उसके माथे को चूमकर कहा था, “तुम मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत गलती नहीं, सबसे सही पसंद हो।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आया।

     

    एक फोटो। रिया की उंगलियां ठिठक गईं। फोटो में आरव था। और उसके साथ एक लड़की। दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब खड़े थे। लड़की के चेहरे पर मुस्कान थी। और आरव… उसे उसी तरह देख रहा था, जैसे कभी वह रिया को देखा करता था।

     

    फोटो के नीचे लिखा था, 

    “Finally… together. ❤️”

     

    रिया की आंखें फैल गईं। उसने फोटो को बार-बार देखा। फिर लड़की का चेहरा पहचानते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    मीरा। आरव की ऑफिस पार्टनर।

     

    वही मीरा जिसे लेकर रिया ने कई बार मजाक में कहा था, “तुम दोनों साथ में बहुत अच्छे लगते हो।”

     

    और आरव हर बार हंसकर कहता था, “रिया तुम पागल हो क्या? मेरे लिए सिर्फ तुम हो, मुझे किसी और की जरूरत नहीं है।”

     

    रिया ने उस वक्त उस पर भरोसा किया था। जब कभी आरव उसके साथ बिजनेस ट्रिप पर जाता, लेकिन रिया ने कभी उसपर रत्ती भर शक नहीं किया। 

    लेकिन, आज वही भरोसा उसके सामने टूटकर बिखर चुका था।

     

    —

     

    अगली सुबह रिया सीधे आरव के ऑफिस पहुंची।

     

    रिसेप्शन पर पहुंचते ही उसने पूछा, “आरव कहां है?”

     

    रिसेप्शनिस्ट ने उसे देखकर नजरें झुका लीं। “मैम… सर मीटिंग में हैं।”

     

    “मीटिंग?” रिया हंस पड़ी। वह हंसी जिसमें दर्द था। “उन्हें बुलाइए, कहिए कि मैं मिलना चाहती हूँ।”

     

     

    कुछ मिनट बाद आरव बाहर आया। काली शर्ट, चेहरे पर वही गंभीरता और आंखों में ऐसी ठंडक जैसे रिया उसके लिए कोई अजनबी हो।

     

    रिया उसे देखकर कुछ पल तक बस खड़ी रही। फिर बोली, “तुमने मुझे तलाक के पेपर भेजे?”

     

    आरव चुप रहा। 

     

    “मुझसे एक बार पूछना भी जरूरी नहीं समझा?” रिया ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा। 

     

    आरव ने कठोर शब्दों में कहा, “अब पूछने को बचा ही क्या है?”

     

    रिया का दिल टूट गया। “मतलब?”

     

    आरव ने नजरें फेर लीं। “मैं इस रिश्ते में नहीं रहना चाहता।”

     

    रिया टूटी आवाज में, “क्यों?”

     

    आरव, “बस नहीं रहना चाहता।”

     

    “झूठ!” रिया चीख पड़ी। “तुम मुझसे प्यार करते थे!”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “था।”

     

    बस एक शब्द। था। रिया को लगा जैसे किसी ने उसके सीने के बीचोंबीच वार कर दिया हो।

     

    “तो मीरा की वजह से?” आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रिया की आंखों में आंसू भर आए। “तीन साल का रिश्ता… और तुमने इसे इतनी आसानी से खत्म कर दिया?”

     

    “आसानी से?” आरव की आवाज पहली बार थोड़ी भारी हुई। “तुम्हें लगता है मेरे लिए आसान था?”

     

    “तो फिर मुझे छोड़ क्यों रहे हो?” आरव कुछ कहने ही वाला था कि पीछे से मीरा की आवाज आई, “आरव…”

     

    रिया ने मुड़कर देखा। मीरा वहां खड़ी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। वह सीधे आरव के पास आकर खड़ी हो गई। रिया ने दोनों को देखा।

     

    फिर अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए बोली, “शायद मेरी जगह अब यहां नहीं है।”

     

    वह मुड़ी। लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ देखा। “एक बात याद रखना…”

     

    आरव की

    आंखें उससे मिलीं। “जिस इंसान ने तुम्हें सबसे ज्यादा प्यार किया था, उसे तुमने आज खुद से दूर कर दिया है।”

     

    और वह चली गई।

     

    —

    To be continued..

    क्या सच में बिखर कर रह जाएगा आरव और रिया का रिश्ता। या कहानी आगे कुछ नया मोड लेगी जानने के लिए अगला भाग जरूर पढ़े। 

    और कहानी को आपका एक कीमती लाइक जरूर दें

     

  • खोए हुए पंख

    खोए हुए पंख

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    खोए हुए पंख

     

    परी लोक में एक बहुत ही सुंदर और दयालु परी रहती थी, जिसका नाम आयरा था। उसके चमकदार सफेद पंख चांदनी की तरह दमकते थे। जब भी वह आसमान में उड़ती, ऐसा लगता जैसे सितारों की बारिश हो रही हो।

     

    परी लोक का एक नियम था—कोई भी परी पृथ्वी पर सिर्फ कुछ घंटों के लिए ही जा सकती थी। सूर्यास्त से पहले उसे हर हाल में वापस लौटना पड़ता था। अगर कोई परी अपने पंख खो दे या समय पर वापस न लौटे, तो परी लोक का द्वार उसके लिए हमेशा के लिए बंद हो जाता था।

     

    एक दिन आयरा ने नीचे पृथ्वी की तरफ देखा। वहां एक छोटा-सा गांव था, जहां बच्चे बारिश में भीगते हुए हंस रहे थे। उनकी खुशियां देखकर उसका मन भी पृथ्वी देखने का हो गया।

     

    उसने रानी परी से अनुमति मांगी।

     

    रानी ने कहा, “जा सकती हो, लेकिन याद रखना… अपने पंखों का बहुत ध्यान रखना। अगर वे खो गए, तो तुम कभी वापस नहीं आ पाओगी।”

     

    आयरा ने मुस्कुराकर सिर हिलाया और पल भर में पृथ्वी पर उतर आई।

     

    धरती उसके लिए किसी जादू से कम नहीं थी। रंग-बिरंगे फूल, ठंडी हवा, बहती नदी, पक्षियों की आवाज… सब कुछ उसे बहुत अच्छा लग रहा था।

     

    ताकि कोई उसे पहचान न सके, उसने अपने पंख एक पुराने बरगद के पेड़ के पीछे छिपा दिए और इंसानों जैसी एक साधारण लड़की का रूप ले लिया।

     

    वह गांव की गलियों में घूमती रही। बच्चों के साथ खेली, बूढ़ी दादी की पानी भरने में मदद की और एक घायल चिड़िया का इलाज भी किया।

     

    समय कैसे बीत गया, उसे पता ही नहीं चला।

     

    अचानक उसे आसमान में ढलता सूरज दिखाई दिया।

     

    “अरे! मुझे तुरंत लौटना होगा!”

     

    वह भागती हुई उस बरगद के पेड़ के पास पहुंची…

     

    लेकिन वहां उसके पंख नहीं थे।

     

    उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    “नहीं… मेरे पंख… कहां गए?”

     

    उसने पूरे आसपास तलाश शुरू कर दी। हर झाड़ी, हर पत्थर, हर पेड़ के पीछे देखा।

     

    लेकिन पंख कहीं नहीं मिले।

     

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उधर आसमान में परी लोक का सुनहरा द्वार धीरे-धीरे बंद होने लगा।

     

    आयरा ने आखिरी बार आसमान की ओर देखा। उसे अपनी मां, अपनी सहेलियां और अपना घर याद आने लगा।

     

    वह पूरी ताकत से दौड़ी, लेकिन बिना पंखों के वह उड़ ही नहीं सकती थी।

     

    कुछ ही पलों में सुनहरा द्वार बंद हो गया।

     

    आसमान फिर बिल्कुल सामान्य हो गया।

     

    आयरा वहीं घुटनों के बल बैठ गई।

     

    “अब… मैं कभी वापस नहीं जा पाऊंगी…”

     

    उस रात उसने पहली बार खुले आसमान के नीचे रोते-रोते रात बिताई।

     

    अगले दिन उसने फिर अपने पंख ढूंढने शुरू किए।

     

    दिन बीत गया।

     

    फिर एक हफ्ता।

     

    फिर एक महीना।

     

    लेकिन उसके पंख नहीं मिले।

     

    धीरे-धीरे उसके जादू की ताकत भी कम होने लगी।

     

    अब वह सिर्फ एक साधारण इंसान जैसी दिखने लगी थी।

     

    एक दिन उसकी मुलाकात एक युवक से हुई, जिसका नाम आरव था।

     

    उसने आयरा को अकेले बैठे देखा।

     

    “तुम रोज यहां आकर क्या ढूंढती रहती हो?”

     

    आयरा मुस्कुरा दी।

     

    “अपनी सबसे कीमती चीज।”

     

    “क्या खो गया?”

     

    आयरा कुछ पल चुप रही।

     

    अगर वह सच बता देती, तो शायद कोई यकीन नहीं करता।

     

    उसने बस इतना कहा, “मेरा घर…”

     

    आरव उसकी बात समझ नहीं पाया, लेकिन उसने उसकी मदद करने का फैसला किया।

     

    दोनों रोज जंगलों, पहाड़ियों और नदियों के किनारे पंख ढूंढते।

     

    कई बार उन्हें सफेद पंख मिलते भी, लेकिन वे किसी पक्षी के होते।

     

    हर बार आयरा की उम्मीद टूट जाती।

     

    समय गुजरता गया।

     

    मौसम बदल गए।

     

    गांव वाले आयरा को अपनी बेटी मानने लगे।

     

    वह सबकी मदद करती।

     

    बीमारों की सेवा करती।

     

    अनाथ बच्चों को पढ़ाती।

     

    जिसके घर खाना नहीं होता, वहां चुपके से खाना पहुंचा देती।

     

    लोग कहते,

     

    “इस लड़की के अंदर जरूर कोई फरिश्ता रहता है।”

     

    आयरा बस मुस्कुरा देती।

     

    उसे नहीं पता था कि उसके अपने लोग भी आज तक उसे याद करते होंगे या नहीं।

     

    एक रात पूर्णिमा थी।

     

    अचानक आसमान में वही सुनहरी रोशनी दिखाई दी।

     

    आयरा खुशी से खड़ी हो गई।

     

    “क्या परी लोक का द्वार फिर खुल गया?”

     

    लेकिन कुछ ही क्षण बाद रोशनी गायब हो गई।

     

    शायद वह सिर्फ एक संकेत था।

     

    उस दिन आयरा बहुत रोई।

     

    उसे पहली बार लगा कि अब शायद वह कभी वापस नहीं जा पाएगी।

     

    उधर परी लोक में भी सब उसे याद करते थे।

     

    रानी परी ने कई परियों को पृथ्वी पर भेजा।

     

    लेकिन समय बीत जाने के कारण आयरा की जादुई पहचान मिट चुकी थी।

     

    कोई भी उसे खोज नहीं पाया।

     

    साल गुजरते गए।

     

    आयरा अब पूरी तरह पृथ्वी की हो चुकी थी।

     

    लेकिन हर रात वह आसमान के सबसे चमकीले तारे को देखकर मुस्कुराती और धीरे से कहती,

     

    “मैं आज भी तुम्हें नहीं भूली…”

     

    एक दिन गांव के बाहर एक बूढ़ा साधु आया।

     

    उसने आयरा को देखते ही कहा,

     

    “तुम इंसान नहीं हो।”

     

    आयरा चौंक गई।

     

    “आप… जानते हैं मैं कौन हूं?”

     

    साधु मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारी आंखों में आसमान बसा है। ऐसे नयन धरती वालों के नहीं होते।”

     

    आयरा की आंखें भर आईं।

     

    उसने पहली बार किसी को अपनी पूरी कहानी सुनाई।

     

    साधु कुछ देर तक शांत बैठा रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “जिस चीज को तुम ढूंढ रही हो, शायद वह अब कभी न मिले। लेकिन कभी-कभी भगवान किसी का रास्ता इसलिए बदलते हैं, क्योंकि उसकी मंजिल बदल चुकी होती है।”

     

    “मतलब?”

     

    “अगर तुम्हारे पंख मिल भी जाते, तो क्या तुम उन लोगों को छोड़ पाती जिनकी जिंदगी तुमने बदल दी?”

     

    आयरा ने गांव की तरफ देखा।

     

    वहां बच्चे उसे देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    बूढ़ी दादी उसे बेटी कहकर बुला रही थीं।

     

    आरव दूर खड़ा उसकी चिंता कर रहा था।

     

    उसे एहसास हुआ कि उसने अपना पुराना घर खोया जरूर है… लेकिन बदले में एक नया परिवार पा लिया है।

     

    उसने आसमान की ओर देखा और मुस्कुराकर कहा,

     

    “शायद यही मेरी नई दुनिया है।”

     

    उसी पल हवा का एक तेज झोंका आया।

     

    उसके सामने दो सफेद पंख उड़ते हुए आए…

     

    आयरा ने उन्हें हाथ में लिया।

     

    लेकिन वे उसके असली पंख नहीं थे।

     

    वह हल्के से मुस्कुराई।

     

    “अब मुझे इनकी जरूरत भी नहीं है।”

     

    उसने वे पंख नदी में बहा दिए।

     

    आसमान में कहीं दूर एक हल्की-सी सुनहरी रोशनी चमकी, मानो परी लोक भी उसकी खुशी को स्वीकार कर रहा हो।

     

    उस दिन के बाद आयरा ने कभी अपने खोए हुए पंखों का दुख नहीं मनाया।

     

    क्योंकि उसे समझ आ गया था कि कभी-कभी जिंदगी

    हमसे कुछ छीनकर हमें उससे भी ज्यादा कीमती चीज दे देती है।

    और गांव के लोग आज भी कहते हैं…

     

    “कई साल पहले हमारे गांव में एक ऐसी लड़की आई थी, जिसके पास पंख तो नहीं थे… लेकिन उसका दिल किसी परी से कम नहीं था।”

     

  • धोखेबाज

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    “धोखेबाज़…”

     

    यह एक ऐसा शब्द था जिसे सुनते-सुनते मयंक के कान जैसे सुन्न पड़ चुके थे। गांव में शायद ही कोई ऐसा इंसान बचा था जो उसे उसके नाम से बुलाता हो। हर किसी की ज़ुबान पर बस एक ही नाम था—धोखेबाज़।

     

    लेकिन सबसे बड़ा दुख इस बात का नहीं था कि लोग उसे ताने मारते थे। असली दर्द इस बात का था कि जिस गुनाह की सज़ा वह सालों से भुगत रहा था, वह गुनाह उसने कभी किया ही नहीं था।

     

    करीब दस साल पहले की बात थी।

     

    मयंक और कबीर बचपन के दोस्त थे। दोनों एक-दूसरे पर अपनी जान तक लुटाने को तैयार रहते थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मिलकर गांव में दूध का कारोबार शुरू किया। दोनों की मेहनत और ईमानदारी ने कुछ ही सालों में उन्हें पूरे इलाके में पहचान दिला दी।

     

    एक दिन गांव वालों ने अपनी जमा-पूंजी उन दोनों के भरोसे रख दी। शहर से नई मशीनें खरीदनी थीं ताकि कारोबार और आगे बढ़ सके। धीरे-धीरे करीब पचास लाख रुपये इकट्ठे हो गए।

     

    लेकिन अगले ही दिन सब कुछ बदल गया।

     

    पैसे गायब थे…

     

    और कबीर भी।

     

    पूरा गांव गुस्से से आग-बबूला हो गया। किसी ने सच जानने की कोशिश तक नहीं की। सबकी उंगली सीधे मयंक पर उठ गई।

     

    “दोनों ने मिलकर हमें लूटा है।”

     

    “देखने में सीधा बनता था, निकला बहुत बड़ा धोखेबाज़।”

     

    “इसे गांव से निकाल दो।”

     

    मयंक हाथ जोड़कर बार-बार कहता रहा कि उसे कुछ नहीं पता, लेकिन किसी ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी।

     

    गांव वालों ने उसके घर पर पत्थर फेंके। उसकी बूढ़ी मां को रोज ताने सुनने पड़े।

     

    “तुम्हारा बेटा चोर है… धोखेबाज़ है…”

     

    अपनों के ताने और बेटे की बदनामी का दुख उसकी मां सह नहीं सकी। कुछ ही दिनों बाद उसने दुनिया छोड़ दी।

     

    मां की चिता के सामने खड़ा मयंक फूट-फूटकर रो रहा था।

     

    “मां… मैंने किसी को धोखा नहीं दिया। तुम मुझ पर भरोसा करती थीं ना…?”

     

    लेकिन उस दिन उसकी आवाज़ का जवाब देने वाला कोई नहीं था।

     

    उसकी मां चली गई और उसके साथ मयंक की हंसी भी हमेशा के लिए खो गई।

     

    उस दिन के बाद उसने गांव छोड़ने का नहीं, बल्कि वहीं रहकर सच का इंतज़ार करने का फैसला किया।

     

    लोग उसे देखते ही रास्ता बदल लेते। बच्चे भी उसका मज़ाक उड़ाते।

     

    “देखो… धोखेबाज़ आ गया।”

     

    मयंक कुछ नहीं कहता। बस चुपचाप अपनी मजदूरी करता और शाम को अपनी मां की तस्वीर के सामने बैठ जाता।

     

    समय बीतता गया।

     

    एक… दो… पांच… और देखते ही देखते पूरे दस साल गुजर गए।

     

    एक सुबह गांव में पुलिस की गाड़ी आकर रुकी।

     

    पूरा गांव चौपाल पर जमा हो गया।

     

    पुलिस के साथ एक आदमी हथकड़ी में खड़ा था।

     

    वह कबीर था।

     

    उसे देखते ही हर कोई हैरान रह गया।

     

    पुलिस अधिकारी ने कहा,

     

    “इसे दूसरे राज्य से गिरफ्तार किया गया है। पूछताछ में इसने दस साल पहले गांव के पचास लाख रुपये चोरी करने की बात कबूल की है। इस चोरी में मयंक का कोई हाथ नहीं था।”

     

    पूरा गांव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    कबीर रोते हुए मयंक के सामने आ गया।

     

    “मयंक… मुझे माफ़ कर दे। लालच ने मेरी आंखों पर पर्दा डाल दिया था। पैसे मैंने अकेले चुराए थे। तू पूरी तरह बेगुनाह था।”

     

    मयंक ने उसकी ओर देखा।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन गुस्सा नहीं।

     

    बस एक गहरा दर्द था।

     

    सरपंच कांपते हुए उसके सामने आया।

     

    “बेटा… हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। हमें माफ़ कर दे।”

     

    मयंक ने धीमी आवाज़ में कहा,

     

    “माफी मांगने से क्या मेरी मां वापस आ जाएगी?”

     

    यह सुनते ही पूरे गांव की आंखें झुक गईं।

     

    कुछ लोग वहीं रोने लगे।

     

    मयंक ने आगे कहा,

     

    “तुम लोगों ने मुझे नहीं, मेरी मां के भरोसे को मार दिया था। वह आखिरी सांस तक यही सोचती रही कि दुनिया उसके बेटे को चोर समझती है। अब बताओ… उसका दर्द कौन मिटाएगा?”

     

    किसी के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    कबीर उसके पैरों में गिर पड़ा।

     

    “जो सज़ा देनी हो दे दे… लेकिन मुझे माफ़ कर दे।”

     

    मयंक ने उसे उठाया।

     

    “तेरी सज़ा अब कानून तय करेगा। मेरे दिल में तेरे लिए न दोस्ती बची है और न ही नफरत… बस एक खालीपन है।”

     

    कुछ महीनों बाद अदालत ने कबीर को कई वर्षों की सज़ा सुनाई।

     

    सरकार ने आधिकारिक रूप से मयंक को बेगुनाह घोषित किया।

     

    गांव वालों ने उसका सम्मान करने के लिए एक बड़ा कार्यक्रम रखा।

     

    लेकिन मयंक वहां नहीं गया।

     

    वह सीधे श्मशान पहुंचा।

     

    अपनी मां की समाधि के सामने बैठकर उसने एक सफेद फूल रखा और भर्राई आवाज़ में बोला,

     

    “मां… आज सबको सच पता चल गया। आज पूरा गांव कह रहा है कि तुम्हारा बेटा बेगुनाह था।”

     

    उसकी आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    “काश… ये सच दस साल पहले सामने आ जाता। शायद आज तुम मेरे साथ होती।”

     

    हवा का एक हल्का झोंका आया।

     

    मयंक को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी मां हमेशा की तरह उसके सिर पर हाथ फेर रही हो।

     

    उस दिन के बाद उसने अपनी ज़िंदगी दूसरों के लिए जीने का फैसला किया।

     

    उसने गांव में गरीब बच्चों के लिए एक मुफ्त पुस्तकालय और पढ़ाई का केंद्र शुरू किया।

    दरवाज़े पर एक तख्ती लगवाई, जिस पर लिखा था

    “किसी भी इंसान को बिना सच जाने कभी दोषी मत ठहराना, क्योंकि झूठा इल्ज़ाम इंसान को जीते-जी मार देता है।”

     

    एक दिन एक छोटा बच्चा वहां आया और मासूमियत से बोला,

     

    “चाचा… क्या आप वही हैं जिन्हें पहले सब धोखेबाज़ कहते थे?”

     

    मयंक मुस्कुरा दिया।

     

    “हाँ बेटा… लोग मुझे यही कहते थे।”

     

    “लेकिन आप तो अच्छे इंसान हो।”

     

    मयंक ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “इस दुनिया में कई बार लोग सच जाने बिना ही फैसला सुना देते हैं। इसलिए हमेशा किसी के बारे में राय बनाने से पहले उसकी सच्चाई जानने की कोशिश करना।”

     

    बच्चा मुस्कुराते हुए वहां से चला गया।

     

    मयंक आसमान की ओर देखने लगा।

     

    आज उसकी मां उसके साथ नहीं थी, लेकिन उसे यकीन था कि जहां भी होगी, अपने बेटे पर गर्व ज़रूर कर रही होगी।

     

    समय ने उससे बहुत कुछ छीन लिया था, लेकिन आखिरकार एक चीज़ उसे वापस मिल गई थी—

     

    उसकी सच्चाई… और उसका सम्मान।

     

    तो कैसी लगी ये वाली स्टोरी कॉमेट ओर लाइक तो कर दिया करो दोस्तो प्लीज 

     

  • बेपरवाह लड़का

    बेपरवाह लड़का

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक समय की बात है। एक छोटे से शहर में कबीर नाम का लड़का रहता था। पूरे मोहल्ले में उसकी पहचान एक नादान, बेपरवाह और मस्तमौला लड़के के रूप में थी। उसे न किसी से प्यार था, न किसी रिश्ते की परवाह। दोस्त कहते, “कबीर, कभी तो किसी लड़की को देखकर दिल धड़केगा।”

     

    वह हंसकर जवाब देता, “मुझे इन सब चक्करों में नहीं पड़ना। जिंदगी बस खुलकर जीने के लिए मिली है।”

     

    दिन बीतते रहे। एक दिन कबीर पार्क में अपने दोस्त का इंतजार कर रहा था। तभी उसकी नजर कुछ दूर बच्चों के साथ खेल रही एक लड़की पर पड़ी। वह बच्चों के साथ कभी झूला झूलती, कभी उन्हें पकड़म-पकड़ाई खिलाती, कभी उनकी छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाकर हंस पड़ती।

     

    उसकी हंसी में ऐसा अपनापन था कि कबीर पहली बार किसी को देखकर चुप हो गया।

     

    वह खुद से बोला, “यार… कोई इतना मुस्कुरा कैसे सकता है?”

     

    उस दिन वह बिना दोस्त से मिले ही घर लौट आया, लेकिन उसका मन बार-बार उसी मुस्कुराती लड़की के पास चला जाता।

     

    अगले दिन वह फिर उसी समय पार्क पहुंच गया।

     

    लड़की फिर वहीं थी।

     

    कबीर अब रोज पार्क आने लगा। कभी दूर बैठकर उसे देखता, कभी बच्चों के साथ खेलते हुए उसकी हंसी सुनता। धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि जिसे वह प्यार जैसी बेकार चीज समझता था, वही उसके दिल में घर बना चुकी है।

     

    एक दिन उसने हिम्मत जुटाई।

     

    “हाय… मैं कबीर।”

     

    लड़की मुस्कुराई।

     

    “मैं अन्वी।”

     

    “तुम रोज यहां आती हो?”

     

    “हां… बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है।”

     

    “और मुझे…”

     

    वह रुक गया।

     

    अन्वी हंस पड़ी।

     

    “क्या?”

     

    “मुझे तुम्हें देखना अच्छा लगता है।”

     

    अन्वी हल्का सा शर्माकर दूसरी तरफ देखने लगी।

     

    उस दिन दोनों देर तक बातें करते रहे।

     

    अब उनकी मुलाकातें रोज होने लगीं। कबीर की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। जो लड़का पहले किसी की परवाह नहीं करता था, अब अन्वी के लिए फूल खरीदता, उसकी पसंद का खाना लाता और उसकी छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान रखता।

     

    एक दिन कबीर ने कहा,

     

    “अन्वी… मुझे तुमसे प्यार हो गया है।”

     

    अन्वी कुछ पल चुप रही।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “कबीर… ऐसा मत कहो।”

     

    “क्यों?”

     

    “बस… मत कहो।”

     

    लेकिन कबीर कहां मानने वाला था।

     

    उसने कई दिनों तक उसे मनाया, समझाया और आखिर एक शाम पार्क के उसी पुराने पेड़ के नीचे घुटनों पर बैठकर बोला,

     

    “अगर तुम हां नहीं कहोगी तो मैं जिंदगी भर इंतजार करूंगा।”

     

    अन्वी की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    उसने कांपते हुए हाथ से कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हां… मैं भी तुमसे प्यार करती हूं।”

     

    कबीर खुशी से झूम उठा।

     

    उसे लगा जैसे पूरी दुनिया उसकी हो गई।

     

    दोनों ने साथ घूमना शुरू किया। बारिश में भीगना, सड़क किनारे चाय पीना, बच्चों के साथ खेलना, छोटी-छोटी लड़ाइयां करना… हर दिन एक नई याद बन जाता।

     

    लेकिन कबीर ने एक बात नोटिस की।

     

    अन्वी बहुत जल्दी थक जाती थी।

     

    कभी अचानक पेट पकड़कर बैठ जाती।

     

    कभी दर्द में भी मुस्कुराने की कोशिश करती।

     

    एक दिन कबीर ने पूछा,

     

    “सच बताओ… तुम ठीक तो हो?”

     

    “हां… बस थोड़ी कमजोरी है।”

     

    वह बात टाल गई।

     

    कुछ दिन बाद अन्वी अचानक पार्क आना बंद हो गई।

     

    कबीर परेशान हो गया।

     

    उसने उसके घर का पता ढूंढ लिया और वहां पहुंच गया।

     

    दरवाजा उसकी मां ने खोला।

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “आंटी… अन्वी कहां है?”

     

    उनकी आंखें भर आईं।

     

    “बेटा… अस्पताल में है।”

     

    कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह दौड़ता हुआ अस्पताल पहुंचा।

     

    कमरे में अन्वी बिस्तर पर लेटी थी।

     

    चेहरा पहले जैसा मुस्कुराता जरूर था, लेकिन बहुत कमजोर हो चुका था।

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या हुआ है तुम्हें?”

     

    अन्वी चुप रही।

     

    तभी डॉक्टर अंदर आए।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “उन्हें स्टमक कैंसर है… और बीमारी आखिरी स्टेज पर है।”

     

    यह सुनते ही कबीर जैसे पत्थर का हो गया।

     

    उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    वह डॉक्टर से बोला,

     

    “कुछ तो होगा… इलाज… ऑपरेशन… कुछ भी।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब समय बहुत कम है।”

     

    कबीर वहीं फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    उस रात उसने पहली बार भगवान से प्रार्थना की।

     

    “मेरी सारी खुशियां ले लो… बस उसे ठीक कर दो।”

     

    लेकिन जिंदगी हर दुआ नहीं सुनती।

     

    अगले दिन कबीर अस्पताल पहुंचा तो देखा अन्वी खिड़की से बाहर बच्चों को खेलते हुए देख रही थी।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “देखो… कितने खुश हैं ना?”

     

    कबीर ने आंसू छिपाते हुए कहा,

     

    “तुम भी ठीक होकर इनके साथ खेलोगी।”

     

    अन्वी ने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    “शायद नहीं।”

     

    “ऐसा मत बोलो।”

     

    “कबीर… सच से भागने से सच बदल नहीं जाता।”

     

    कुछ देर बाद उसने अपने बैग से एक छोटी डायरी निकाली।

     

    “ये तुम्हारे लिए है।”

     

    कबीर ने खोला।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस दिन तुमने पहली बार कहा था कि तुम्हें मुझे देखना अच्छा लगता है, उसी दिन मुझे तुमसे प्यार हो गया था। लेकिन मैं तुम्हें अपने दर्द में बांधना नहीं चाहती थी। इसलिए बार-बार तुम्हें दूर करती रही।”

     

    कबीर रो पड़ा।

     

    “तुमने मुझसे छिपाया क्यों?”

     

    अन्वी बोली,

     

    “क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी रुक जाए।”

     

    कबीर ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “अगर जिंदगी तुम्हारे बिना है… तो वह जिंदगी नहीं है।”

     

    अन्वी मुस्कुराई।

     

    “नहीं… तुम जीओगे। मेरे हिस्से की मुस्कान भी तुम ही बांटोगे।”

     

    उस दिन दोनों ने घंटों बातें कीं।

     

    उन्होंने अपनी अधूरी इच्छाओं की एक सूची बनाई।

     

    एक साथ आइसक्रीम खाना।

     

    बारिश में भीगना।

     

    बच्चों को खिलौने बांटना।

     

    सूर्योदय देखना।

     

    अनाथालय जाकर बच्चों के साथ पूरा दिन बिताना।

     

    डॉक्टर की अनुमति से कबीर उसे व्हीलचेयर पर बाहर ले गया।

     

    दोनों ने हर छोटी इच्छा पूरी की।

     

    अन्वी दर्द में होती थी, लेकिन हर तस्वीर में मुस्कुरा रही थी।

     

    कुछ दिनों बाद उसकी तबीयत और बिगड़ गई।

     

    अब वह ठीक से बोल भी नहीं पाती थी।

     

    एक रात कबीर उसके पास बैठा था।

     

    अन्वी ने बहुत मुश्किल से कहा,

     

    “कबीर…”

     

    “हां… मैं यहीं हूं।”

     

    “एक वादा करोगे?”

     

    “हजार करूँगा।”

     

    “मेरे जाने के बाद… फिर से पहले वाले कबीर मत बन जाना। लोगों से प्यार करना, बच्चों के साथ खेलना, मुस्कुराना… और अगर कभी कोई लड़की तुम्हारी जिंदगी में आए, तो उसे ये मत कहना कि प्यार बेकार होता है।”

     

    कबीर की रुलाई छूट गई।

     

    उसने सिर हिलाकर कहा,

     

    “वादा है।”

     

    अन्वी ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा।

     

    उसके होंठों पर वही पहली मुलाकात वाली मासूम मुस्कान थी।

     

    धीरे-धीरे उसकी आंखें बंद हो गईं।

     

    कमरे में मशीन की सीधी आवाज गूंज उठी।

     

    कबीर का संसार उसी पल जैसे थम गया।

     

    कई महीने तक वह हर शाम उसी पार्क में जाता रहा, जहां पहली बार उसने अन्वी को बच्चों के साथ खिलखिलाते देखा था।

     

    एक दिन उसने देखा कि कुछ गरीब बच्चे पुराने झूले के पास उदास बैठे हैं।

     

    उसे अन्वी की बात याद आई—”मेरे हिस्से की मुस्कान भी तुम ही बांटोगे।”

     

    उसने बच्चों के लिए खिलौने खरीदे, किताबें लाया और हर रविवार उनके साथ खेलना शुरू कर दिया।

     

    धीरे-धीरे शहर के लोग भी उससे जुड़ते गए। उसने अन्वी के नाम से एक छोटी संस्था बनाई, जहां कैंसर से जूझ रहे बच्चों और जरूरतमंद परिवारों की मदद की जाने लगी।

    अब जब भी कोई उससे पूछता, “क्या तुम्हें कभी सच्चा प्यार मिला था?”

     

    वह आसमान की ओर देखकर मुस्कुरा देता और कहता,

     

    “हां… मुझे प्यार मिला था। वह बहुत कम समय के लिए मेरी जिंदगी में आई, लेकिन उसने मुझे पूरी जिंदगी के लिए इंसान बना दिया। कुछ लोग सालों साथ रहकर भी याद नहीं बनते, और कुछ लोग कुछ महीनों में पूरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद बन जाते हैं। अन्वी चली गई, लेकिन उसकी मुस्कान आज भी हर उस बच्चे की हंसी में जिंदा है, जिसे देखकर कभी एक बेपरवाह लड़के को पहली बार प्यार का मतलब समझ आया।”

     

  • बारिश में मिला राजकुमार

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    बारिश में मिला राजकुमार 

     

    बहुत समय पहले सूर्यगढ़ नाम का एक समृद्ध राज्य था। उस राज्य के राजकुमार आदित्य अपनी समझदारी और अच्छे स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उन्हें नई-नई जगहें देखना और अलग-अलग लोगों से मिलना बहुत पसंद था। एक दिन वे अपने कुछ सैनिकों के साथ पड़ोसी राज्य की यात्रा पर निकले। रास्ता लंबा था और बीच में घना जंगल पड़ता था।

     

    सुबह मौसम बिल्कुल साफ था। ठंडी हवा चल रही थी और पक्षियों की आवाज़ पूरे जंगल में गूंज रही थी। आदित्य घोड़े पर बैठे रास्ते का आनंद ले रहे थे। लेकिन दोपहर होते-होते अचानक आसमान का रंग बदल गया। काले बादल चारों ओर फैल गए। तेज हवा चलने लगी और देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।

     

    बारिश इतनी तेज थी कि कुछ ही मिनटों में रास्ता कीचड़ से भर गया। घोड़ों का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया।

     

    आदित्य ने सैनिकों से कहा,

    “पास में कोई सुरक्षित जगह ढूंढो, वरना रात यहीं जंगल में बितानी पड़ेगी।”

     

    थोड़ी दूर उन्हें एक छोटा-सा मिट्टी का घर दिखाई दिया। घर गांव के आखिरी छोर पर था। उसके आसपास दूर-दूर तक कोई दूसरा घर नहीं था।

     

    आदित्य घोड़े से उतरे और दरवाजे पर दस्तक दी।

     

    कुछ पल बाद एक बुजुर्ग किसान ने दरवाजा खोला।

     

    “कौन है बेटा?”

     

    आदित्य ने हाथ जोड़कर कहा,

    “हम मुसाफिर हैं। बारिश बहुत तेज है। अगर एक रात के लिए अपने घर में जगह मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी।”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “अरे बेटा, मेहमान को मना थोड़ी किया जाता है। अंदर आ जाओ।”

     

    उन्होंने आदित्य और उनके दो साथियों को अंदर बुला लिया। बाकी सैनिक पास की एक पुरानी सराय में चले गए।

     

    घर बहुत छोटा था, लेकिन साफ-सुथरा था। मिट्टी का आंगन, एक छोटा-सा चूल्हा और दीवारों पर टंगे मिट्टी के बर्तन पूरे घर को अपनापन दे रहे थे।

     

    तभी एक लड़की पानी का लोटा लेकर आई।

     

    उसका नाम गौरी था। वह किसान की इकलौती बेटी थी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा,

    “पहले हाथ-मुंह धो लीजिए। मैं अभी गरम चाय लेकर आती हूं।”

     

    आदित्य ने पहली बार उसे देखा। उसके चेहरे पर बनावटी सुंदरता नहीं थी, लेकिन उसकी सादगी और मुस्कान बहुत प्यारी थी।

     

    कुछ ही देर में गौरी गरम चाय और पकौड़े लेकर आई।

     

    वह बोली,

    “बारिश में गरम-गरम चाय मिल जाए तो सारी थकान दूर हो जाती है।”

     

    आदित्य मुस्कुराकर बोला,

    “सच कहा तुमने।”

     

    रात को गौरी की मां ने दाल, रोटी और सब्जी बनाई। सब लोग एक साथ बैठकर खाना खाने लगे।

     

    आदित्य को पहली बार लगा कि सादा खाना भी इतना स्वादिष्ट हो सकता है।

     

    खाना खाते-खाते किसान ने पूछा,

    “बेटा, तुम लोग कहां जा रहे हो?”

     

    आदित्य ने अपनी असली पहचान छिपाते हुए कहा,

    “दूसरे शहर काम से जा रहे हैं।”

     

    किसान ने ज्यादा सवाल नहीं किए।

     

    रात को बिजली कड़क रही थी। बाहर तेज बारिश हो रही थी।

     

    गौरी ने मेहमानों के लिए अपने कमरे की चारपाई दे दी और खुद अपनी मां के साथ दूसरे कमरे में सो गई।

     

    आदित्य देर रात तक जागता रहा।

     

    उसे बार-बार यही सोच आ रही थी कि इतने छोटे घर में रहने वाले लोग कितने बड़े दिल के हैं।

     

    सुबह जब बारिश रुकी तो पूरे गांव में ठंडी हवा चल रही थी।

     

    आदित्य बाहर निकले तो देखा गौरी आंगन में पक्षियों के लिए दाना डाल रही थी।

     

    वह बोली,

    “बारिश में बेचारे इन्हें भी खाना नहीं मिलता।”

     

    आदित्य उसकी दयालुता देखकर मन ही मन मुस्कुरा उठा।

     

    उसी समय दूर से घोड़ों की आवाज़ सुनाई दी।

     

    राजकुमार के बाकी सैनिक उन्हें ढूंढते हुए वहां पहुंच चुके थे।

     

    जैसे ही उन्होंने आदित्य को देखा, सभी घोड़ों से उतरकर झुक गए और एक साथ बोले—

     

    “राजकुमार आदित्य की जय हो!”

     

    यह सुनते ही गौरी, उसके माता-पिता और आसपास खड़े गांव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस मुसाफिर को उन्होंने अपने घर में ठहराया था, वह वास्तव में एक बड़े राज्य का राजकुमार था।

     

    आदित्य ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा, लेकिन अब सबसे बड़ी मुश्किल शुरू होने वाली थी…

     

    राजकुमार होने की बात सुनते ही गौरी के पिता घबरा गए। वे तुरंत आदित्य के सामने हाथ जोड़कर बोले,

     

    “राजकुमार जी, हमें माफ कर दीजिए। अगर हमारी सेवा में कोई कमी रह गई हो तो क्षमा कर दें। हमें क्या पता था कि आप इतने बड़े राज्य के राजकुमार हैं।”

     

    आदित्य ने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “काका, आपने मुझे मेहमान नहीं, अपने बेटे की तरह रखा। इससे बड़ा सम्मान मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता।”

     

    गौरी चुपचाप खड़ी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे। कल तक जो युवक उसे एक साधारण मुसाफिर लगा था, वह आज राजकुमार निकला।

     

    विदा लेते समय आदित्य ने एक बार गौरी की ओर देखा। गौरी की आंखें भी उसी की ओर थीं। दोनों बहुत कुछ कहना चाहते थे, लेकिन शब्द किसी के पास नहीं थे।

     

    कुछ ही देर बाद घोड़ों की टापों की आवाज़ दूर होती गई और राजकुमार अपनी यात्रा पर निकल गया।

     

    उसके जाने के बाद घर पहले जैसा तो था, लेकिन अब कुछ खाली-खाली सा लगने लगा था।

     

    हर शाम गौरी अनजाने में उसी रास्ते की ओर देखने लगती, जहां से वह बारिश वाली रात वह मुसाफिर आया था।

     

    उधर राजमहल पहुंचने के बाद भी आदित्य का मन कहीं नहीं लग रहा था।

     

    दरबार चलता, मंत्री बातें करते, सैनिक अभ्यास करते, लेकिन आदित्य की आंखों के सामने बार-बार वही छोटा-सा घर और गौरी की मुस्कान आ जाती।

     

    एक दिन राजा ने पूछा,

     

    “आदित्य, कई दिनों से तुम परेशान दिखाई दे रहे हो। बात क्या है?”

     

    आदित्य ने सारी बात सच-सच बता दी।

     

    राजा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “वह एक किसान की बेटी है। राजघराने की अपनी मर्यादाएं होती हैं।”

     

    आदित्य ने शांत स्वर में कहा,

     

    “पिताजी, इंसान की पहचान उसके कपड़ों या घर से नहीं, उसके संस्कारों से होती है।”

     

    राजा ने कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    कुछ दिनों बाद उन्होंने अपने विश्वसनीय मंत्री को गांव भेजा ताकि गौरी और उसके परिवार के बारे में जानकारी मिल सके।

     

    मंत्री वापस लौटे और बोले,

     

    “महाराज, वह परिवार गरीब जरूर है, लेकिन पूरे गांव में उनकी ईमानदारी और अच्छे व्यवहार की मिसाल दी जाती है।”

     

    फिर भी राजा ने एक छोटी-सी परीक्षा लेने का निश्चय किया।

     

    उन्होंने गौरी और उसके माता-पिता को राजमहल बुलवाया।

     

    महल देखकर गौरी घबरा गई, लेकिन उसने विनम्रता नहीं छोड़ी।

     

    राजा ने पूछा,

     

    “अगर तुम इस महल की रानी बन गईं, तो सबसे पहले क्या बदलोगी?”

     

    गौरी मुस्कुराई और बोली,

     

    “महाराज, मैं महल की दीवारें नहीं बदलूंगी। मैं इतना जरूर चाहूंगी कि यहां रहने वाला हर व्यक्ति एक-दूसरे का सम्मान करे। महल की असली सुंदरता सोने-चांदी से नहीं, लोगों के व्यवहार से होती है।”

     

    राजा उसके उत्तर से प्रभावित हुए।

     

    उसी समय एक सेवक घबराकर आया। उसके हाथ से पानी का घड़ा टूट गया था।

     

    वह डरते हुए बोला,

     

    “महाराज, मुझसे गलती हो गई।”

     

    राजा कुछ कहते, उससे पहले गौरी ने सेवक से कहा,

     

    “घड़ा टूट गया तो क्या हुआ? गलती इंसान से ही होती है। डरने की जगह अगली बार संभलकर काम करना।”

     

    राजा यह सब ध्यान से देख रहे थे।

     

    उन्होंने महसूस किया कि गौरी के अंदर दया, धैर्य और सम्मान जैसे गुण हैं।

     

    यही गुण एक सच्ची रानी में होने चाहिए।

     

    राजा मुस्कुराए और आदित्य की ओर देखकर बोले,

     

    “तुमने सही कहा था। जन्म नहीं, संस्कार इंसान को बड़ा बनाते हैं।”

     

    यह सुनते ही आदित्य की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

     

    कुछ ही दिनों बाद पूरे राज्य में उनके विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं।

     

    जिस गांव के आखिरी छोर पर वह छोटा-सा घर था, वहां पहली बार राजमहल से सजे हुए रथ पहुंचे।

     

    पूरा गांव खुशी से झूम उठा।

     

    गौरी दुल्हन बनी तो उसकी मां की आंखों से खुशी के आंसू रुक ही नहीं रहे थे।

     

    किसान पिता बार-बार भगवान का धन्यवाद कर रहे थे।

     

    विवाह बड़े धूमधाम से हुआ।

     

    राजा ने स्वयं गौरी का हाथ पकड़कर उसे महल में प्रवेश कराया।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “आज से यह सिर्फ मेरी बहू नहीं, इस राज्य की बेटी भी है।”

     

    रात को महल की छत पर खड़े होकर आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “याद है, उस दिन मुझे सिर्फ बारिश से बचने के लिए एक छत चाहिए थी।”

     

    गौरी मुस्कुराई और बोली,

     

    “और मुझे क्या पता था कि एक साधारण मुसाफिर मेरे जीवन का सबसे बड़ा सहारा बन जाएगा।”

     

    इतना कहते ही फिर से हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों आसमान की ओर देखने लगे।

     

    आदित्य ने गौरी का हाथ थाम लिया और कहा,

     

    “कभी-कभी भगवान हमारी किस्मत बदलने के लिए तूफान भेजते हैं। अगर उस दिन बारिश न होती, तो शायद मैं तुम्हारे दरवाजे तक कभी नहीं पहुंचता।”

     

    गौरी मुस्कुराकर बोली,

     

    “इसलिए अब जब भी बारिश होगी, मुझे उस पहली मुलाकात की याद जरूर आएगी।”

     

    दोनों की मुस्कान के साथ बारिश की बूंदें महल की छत पर गिरती रहीं। उस दिन हर किसी को यकीन हो गया कि सच्चा प्यार न अमीरी देखता है, न गरीबी वह बस एक सच्चे दिल की तलाश करता है।

     

  • लोहे की सासू मां

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    लोहे की सासू माँ 

     

    मीरा की शादी को दो साल हो चुके थे। उसका पति अमन एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था। दोनों शहर से थोड़ी दूर एक छोटे-से घर में रहते थे। घर में उनके अलावा कोई नहीं था। अमन के माता-पिता कई साल पहले इस दुनिया से जा चुके थे। इसलिए मीरा पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं थी।

     

    हर सुबह मीरा पाँच बजे उठ जाती। चाय बनाती, नाश्ता तैयार करती, घर की सफाई करती, कपड़े धोती और खाना भी बना लेती। नौ-दस बजे तक उसका सारा काम खत्म हो जाता। फिर वह अपने पौधों में पानी डालती, कभी सिलाई करती तो कभी किताब पढ़ने बैठ जाती।

     

    उसकी जिंदगी बहुत सादगी से चल रही थी।

     

    लेकिन उसके मोहल्ले की कुछ औरतों को उसकी यह जिंदगी बिल्कुल पसंद नहीं थी।

     

    जब भी वे मीरा को खाली बैठा देखतीं, कोई न कोई ताना जरूर मार देती।

     

    एक दिन कमला बोली,

    “अरे मीरा, तेरी तो किस्मत ही खुल गई। न सास है, न ननद। आराम ही आराम है।”

     

    दूसरी पड़ोसन शांति हंसते हुए बोली,

    “हमारी सास तो हर पाँच मिनट में आवाज लगा देती हैं। कभी चाय बना, कभी पानी ला, कभी ये कर, कभी वो कर।”

     

    तीसरी औरत भी बोल पड़ी,

    “तुझे क्या पता बहू होना किसे कहते हैं? तेरे ऊपर तो कोई हुक्म चलाने वाला ही नहीं है।”

     

    सब औरतें हंसने लगीं।

     

    मीरा भी हल्का-सा मुस्कुरा देती, लेकिन अंदर ही अंदर उसे बुरा लगता था।

     

    उसे अपनी सास की कमी कभी महसूस नहीं हुई थी। लेकिन रोज-रोज एक ही बात सुनकर अब उसका मन उदास रहने लगा।

     

    शाम को अमन घर लौटा तो उसने देखा कि मीरा चुपचाप बैठी है।

     

    “क्या हुआ? आज इतनी शांत क्यों हो?”

     

    मीरा बोली,

    “क्या सच में बिना सास के बहू की कोई कीमत नहीं होती?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “लोगों की बातों पर ध्यान मत दो। हर किसी को दूसरे की जिंदगी में कमी निकालने की आदत होती है।”

     

    मीरा ने सिर हिला दिया, लेकिन उसके मन में कुछ और ही चल रहा था।

     

    अगले दिन उसने घर के कोने-कोने से पुराने लोहे के बर्तन निकालने शुरू कर दिए। टूटी कड़ाही, पुराना तवा, जंग लगी बाल्टी, बेकार चिमटा, पुरानी थाली, लोहे का डिब्बा और कई टूटे-फूटे सामान उसने एक जगह इकट्ठा कर दिए।

     

    अमन ने हैरानी से पूछा,

    “ये सब कबाड़ क्यों जमा कर रही हो?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “बस… एक छोटा-सा काम है।”

     

    वह सारे बर्तन लेकर गांव के मशहूर लोहार रामदीन के पास पहुंच गई।

     

    रामदीन ने पूछा,

    “अरे बहू, इतना कबाड़ किसलिए लाई हो?”

     

    मीरा बोली,

    “काका, मुझे इन सबसे एक मूर्ति बनवानी है।”

     

    रामदीन ने पूछा,

    “किसकी मूर्ति?”

     

    मीरा ने बिल्कुल गंभीर होकर जवाब दिया,

    “मेरी सासू माँ की।”

     

    रामदीन पहले तो कुछ पल उसे देखता रहा, फिर जोर से हंस पड़ा।

     

    “अरे बहू, कहीं मजाक तो नहीं कर रही?”

     

    “नहीं काका। बिल्कुल सच कह रही हूं।”

     

    रामदीन को बात अजीब जरूर लगी, लेकिन उसने काम करने की हामी भर दी।

     

    करीब दस दिन तक वह मेहनत करता रहा। आखिरकार पुराने बर्तनों और लोहे के टुकड़ों से एक बड़ी मूर्ति तैयार हो गई।

     

    मूर्ति बिल्कुल किसी सख्त स्वभाव वाली सास जैसी लग रही थी। सिर पर पल्लू, कमर पर हाथ और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे अभी किसी को डांटने वाली हो।

     

    मीरा ने खुशी-खुशी वह मूर्ति घर लाकर रसोई के दरवाजे के पास खड़ी कर दी।

     

    अगली सुबह उसने सबसे पहले मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर कहा,

    “प्रणाम सासू माँ।”

     

    फिर खुद ही आवाज बदलकर बोली,

    “बहू, पहले झाड़ू लगा।”

     

    मीरा हंसते हुए झाड़ू लगाने लगी।

     

    थोड़ी देर बाद फिर बोली,

    “अब बर्तन धो।”

     

    और वह बर्तन धोने लगी।

     

    कभी कहती,

    “बहू, चाय बना।”

     

    तो खुद ही चाय बना लेती।

     

    अगर थक जाती तो मूर्ति के सामने बैठकर कहती,

    “सासू माँ, आज थोड़ा आराम कर लूं?”

     

    फिर खुद ही जवाब देती,

    “ठीक है बहू, लेकिन शाम की रोटी समय पर बन जानी चाहिए।”

     

    यह सब देखकर अमन अपनी हंसी नहीं रोक पाता।

     

    एक दिन पड़ोस की कमला खिड़की से यह सब देख रही थी। उसने तुरंत बाकी औरतों को बुला लिया।

     

    कुछ ही देर में सभी मीरा के घर के बाहर खड़ी थीं।

     

    उन्होंने जैसे ही लोहे की सासू माँ को देखा, उनकी आंखें खुली की खुली रह गईं।

     

    कमला ने पूछा,

    “मीरा… ये सब क्या है?”

     

    मीरा मुस्कुराकर बोली,

    “आप लोग रोज़ कहती थीं कि मेरी सास नहीं है। इसलिए मैंने सोचा, अब यह कमी भी पूरी कर लेती हूं।”

     

    इतना सुनते ही कुछ औरतें हंसने लगीं, लेकिन मीरा के चेहरे पर हल्की-सी गंभीर मुस्कान थी।

     

     

    मीरा की बात सुनकर कुछ औरतें हंस रही थीं, लेकिन उसकी आंखों में छिपा दर्द किसी ने नहीं देखा।

     

    कमला ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “अरे, हमने तो मजाक किया था। तूने सच में लोहे की सास बना डाली!”

     

    मीरा ने शांत आवाज में कहा,

    “मजाक रोज़-रोज़ सुनने वाले को कैसा लगता है, ये वही जानता है। आप सब बार-बार यही कहती थीं कि मेरी जिंदगी आसान है क्योंकि मेरी सास नहीं है। इसलिए मैंने सोचा, अब मेरे घर में भी सासू माँ होंगी।”

     

    इतना कहकर वह रसोई में चली गई।

     

    अगले दिन से उसकी एक नई आदत बन गई।

     

    सुबह उठते ही वह मूर्ति के सामने हाथ जोड़ती और कहती,

    “सासू माँ, आज क्या-क्या काम करना है?”

     

    फिर खुद ही दूसरी आवाज़ बनाकर बोलती,

    “बहू, पहले आंगन साफ कर, फिर नाश्ता बना, उसके बाद कपड़े धोना मत भूलना।”

     

    यह देखकर अमन हंसते-हंसते लोटपोट हो जाता।

     

    वह कहता,

    “मीरा, अगर किसी ने पहली बार यह देखा तो सच में समझेगा कि हमारी सासू माँ यहीं रहती हैं।”

     

    मीरा भी मुस्कुरा देती।

     

    कुछ ही दिनों में पूरे मोहल्ले में यह बात फैल गई।

     

    लोग दूर-दूर से सिर्फ उस लोहे की सासू माँ को देखने आने लगे।

     

    कोई फोटो खींचता, कोई हंसता, तो कोई हैरानी से मूर्ति को देखता रहता।

     

    एक दिन कुछ छोटे बच्चे भी वहां पहुंच गए।

     

    एक बच्चे ने पूछा,

    “चाची, क्या ये आपको डांटती भी हैं?”

     

    मीरा हंसकर बोली,

    “जब मैं आलस करती हूं, तब बहुत डांटती हैं।”

     

    दूसरा बच्चा बोला,

    “फिर तो ये अच्छी सासू माँ हैं।”

     

    सब बच्चे खिलखिलाकर हंस पड़े।

     

    उसी समय अमन भी ऑफिस से घर लौट आया।

     

    उसने बच्चों से मजाक में कहा,

    “सावधान! ज्यादा शोर मचाया तो मेरी लोहे वाली सासू माँ तुम्हें भी झाड़ू लगवा देंगी।”

     

    बच्चे हंसते हुए भाग गए।

     

    धीरे-धीरे मोहल्ले की औरतों को एहसास होने लगा कि मीरा ने यह सब मजाक के लिए नहीं किया था। उसके मन को उनके तानों ने सचमुच चोट पहुंचाई थी।

     

    एक दोपहर गांव की सबसे बुजुर्ग महिला, जिन्हें सब दादी कहते थे, मीरा के घर आईं।

     

    उन्होंने लोहे की मूर्ति को ध्यान से देखा, फिर मीरा के पास बैठ गईं।

     

    “बेटी, सच-सच बता, क्या बात है?”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    उसने धीरे से कहा,

    “दादी, मुझे कभी सास न होने का दुख नहीं था। लेकिन लोगों ने ऐसा महसूस करा दिया कि जैसे मेरी जिंदगी अधूरी है। हर दिन वही ताना सुन-सुनकर मैंने सोचा, अगर लोगों को सास चाहिए, तो मैं खुद ही बना लेती हूं।”

     

    दादी ने गहरी सांस ली।

     

    उन्होंने उसी शाम मोहल्ले की सभी औरतों को बुलाया।

     

    सबके सामने उन्होंने कहा,

    “किसी की मजबूरी या उसकी किस्मत का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। जिसके पास जो नहीं है, उसे बार-बार याद दिलाना सबसे बड़ा दुख होता है।”

     

    सभी औरतों के सिर शर्म से झुक गए।

     

    कमला सबसे आगे आई।

     

    उसने मीरा का हाथ पकड़कर कहा,

    “हमें माफ कर दे। हमने कभी सोचा ही नहीं कि हमारी बातें तुझे इतना दुख पहुंचा रही हैं।”

     

    बाकी औरतों ने भी उससे माफी मांगी।

     

    मीरा मुस्कुराई और बोली,

    “अब पुरानी बातें भूल जाइए।”

     

    कमला ने हंसते हुए लोहे की मूर्ति की तरफ देखा और बोली,

    “चलो, अब तो हमारी भी सासू माँ बन गईं।”

     

    यह सुनते ही पूरा आंगन हंसी से गूंज उठा।

     

    उस दिन के बाद मोहल्ले का माहौल बदल गया।

     

    अब औरतें मीरा के घर ताने देने नहीं, बल्कि चाय पीने और बातें करने आने लगीं।

     

    अगर किसी को कोई परेशानी होती, तो मीरा उसकी मदद करती।

     

    धीरे-धीरे सबके बीच अच्छा रिश्ता बन गया।

     

    लोहे की वह सासू माँ अब सिर्फ एक मूर्ति नहीं रही थी, बल्कि पूरे मोहल्ले को एक सीख देने वाली निशानी बन गई थी।

     

    कई साल बाद भी जब कोई नया व्यक्ति उस गली में आता, तो सबसे पहले उसी मूर्ति के बारे में पूछता।

     

    लोग मुस्कुराकर कहते,

    “ये सिर्फ लोहे की मूर्ति नहीं है, बल्कि उन तानों का जवाब है जो किसी के दिल को चोट पहुंचाते हैं।”

     

    मीरा आज भी कभी-कभी उस मूर्ति के सामने खड़ी होकर हंसते हुए कहती,

     

    “सासू माँ, अब तो सब सुधर गए हैं। अब आपको किसी को डांटने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”

     

    और फिर खुद ही जवाब देती,

     

    “बहू, अगर लोग एक-दूसरे की इज्जत करना सीख जाएं, तो हर घर अपने आप खुशियों से भर जाता है।”