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  • अधूरी इबादत भाग~18

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~18 इमोशन्स का बीमा

    पंजीकरण कार्यालय की उस सफ़ेद, ठंडी दीवारों वाली बिल्डिंग में ~भी उस वक़्त एक अजीब सी गर्माहट फैल गई थी, जब रुहानी के हाथों में काग़ज़ का वो पुलिंदा रखा गया – अद्वैत द्वारा तैयार किया गया विवाह अनुबंध। 

    बाहर हल्की धूप थी, अंदर ट्यूब लाइट की सफेद रौशनी और दोनों के बीच कुछ ऐसा था जो रौशनी से ज़्यादा कुछ कहता था…. एक मौन संवाद। 

    रुहानी के हाथ काँपते नहीं रहे थे, पर उसकी आँखें एक-एक शब्द पर रुकती चली जा रही थीं, जैसे कोई मन के अंदर झाँकने का हक़ मांग रहा हो।

    उसके सामने अद्वैत खड़ा था, एकदम शांत, जैसे उसने अपने भीतर की हर हलचल को ताले में बंद कर रखा हो। वो कुछ नहीं बोल रहा था, बस रुहानी के चेहरे को पढ़ रहा था…. उसकी हर मरोड़, हर रुकावट, हर सांस की गहराई को। 

    उधर रुहानी, एक-एक शब्द पढ़ती जा रही थी…..

    विवाह अनुबंध-पत्र (Contract Marriage Agreement)

    (स्वतंत्रता, सीमाओं और गोपनीयता के स्पष्ट निर्देशों सहित)

    पक्ष 1:

    नाम: अद्वैत अवस्थी

    उम्र: 28 वर्ष

    पेशा: लेखक एवं सामाजिक वक्ता

    निवास: विमान नगर, पुणे

     

    पक्ष 2:

    नाम: रुहानी चौहान

    उम्र: 24 वर्ष

    पेशा: स्वतंत्र वस्त्र डिज़ाइनर

    निवास: हडपसर, पुणे८

    स्पष्ट और पारदर्शी शर्तें: (Clear and Transparent Terms)

    1. यह विवाह केवल एक सामाजिक औपचारिकता है, जो एक वर्ष तक सीमित रहेगा।

    2. यह विवाह दिखावे का है, लेकिन इ⁹सके बावजूद किसी भी प्रकार के अतिरिक्त विवाहिक संबंध (extra-marital affair) की अनुमति नहीं होगी।

    3. दोनों के कमरे अलग-अलग होंगे। कोई भी पक्ष बिना पूर्व अनुमति के दूसरे के निजी स्थान में प्रवेश नहीं करेगा।

    4. शारीरिक संपर्क केवल सार्वजनिक मौकों पर “विवाहित जोड़े” की छवि बनाए रखने के लिए सीमित होगा, और वह भी केवल सामाजिक मर्यादाओं के भीतर।

    5. अनुबंध की अवधि में किसी भी प्रकार की शारीरिक निकटता की कोई अनिवार्यता नहीं होगी। न कोई अपेक्षा, न कोई ज़ोर।

    6. यह स्पष्ट रूप से समझा जाता है कि “दिल लगाना मना है” (falling in love is not allowed)…… किसी भी भावनात्मक जुड़ाव की कोई ज़रूरत या बाध्यता नहीं है।

    7. कोई भी inappropriate या असहज करने वाला स्पर्श, शब्द या व्यवहार इस अनुबंध का उल्लंघन माना जाएगा।

    8. दोनों अपने-अपने पेशेवर जीवन में पूर्ण स्वतंत्र रहेंगे। कोई भी एक-दूसरे के काम में हस्तक्षेप नहीं करेगा, न आलोचना, न सलाह बिना माँगे।

    9. दोनों को अपने सामाजिक, व्यक्तिगत और मानसिक क्षेत्र में स्वतंत्रता का पूरा अधिकार है।

    10. इस अनुबंध की जानकारी एक सीमित दायरे तक ही रखी जाएगी: सिर्फ अद्वैत, रुहानी, उनके वकील और मैनेजर तक।

    11. यदि इस अनुबंध की कोई भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो यह समझा जाएगा कि अनुबंध समाप्त हो चुका है। फिर दोनों पक्ष एक-दूसरे से पूर्णतः अजनबी हो जाएंगे, और इस शर्त के उल्लंघन करने वाले को किसी भी तरह की कोई बात करने का अधिकार नहीं होगा।

     

    हस्ताक्षर:

    पक्ष 1 (अद्वैत अवस्थी): _______________

    पक्ष 2 (रुहानी चौहान): _______________

    विधिक सलाहकार: _______________

    तिथि: _______________

     

    रुहानी ने अनुबंध के पहले कुछ खंडों को पढ़ते हुए महसूस किया कि यह किसी और दुनिया का समझौता था। यह अनुबंध उससे दूर था, फिर भी जैसे वह खुद को इसमें बांधने जा रही हो।

    “दोनों के कमरे अलग-अलग होंगे… दिल लगाना मना है… कोई भी शारीरिक निकटता अनुबंध का हिस्सा नहीं होगी…” जैसे हर शब्द उसकी सोच में एक छोटी सी सुई चुभो रहा हो, मगर दर्द की जगह एक अजीब किस्म की ठंडक भर रही थी।

    “कमाल है…” उसने हल्की सी हँसी में फुसफुसाया, बिना अद्वैत की तरफ़ देखे, “तुमने तो हर इमोशन का बीमा करवा लिया है इस कॉन्ट्रैक्ट में।”

    अद्वैत ने पहली बार पलकें झपकाईं, फिर बहुत धीरे से कहा, “इमोशन्स ही तो सबसे ज़्यादा नुकसान करते हैं और मुझे अब कोई भी नुकसान नहीं चाहिए।”

    रुहानी आगे पढ़ी। अगली शर्त थी….‘पब्लिक प्लेस में साथ दिखना होगा, पर कोई भी स्पर्श मर्यादित रहेगा। सिर्फ़ दिखावे के लिए।’

    “मतलब… हमें भीड़ में हाथ पकड़ना होगा, पर एक छत के ही नीचे होने पर कोई स्पर्श नहीं होगा?” उसकी आवाज़ में एक टुकड़ा था…न गुस्से का, न दुःख का… बस एक उलझा हुआ विस्मय।

    अद्वैत ने सिर झुकाया, जैसे मान लेना चाहता हो कि हाँ, ये सब शायद असहज है, पर है ज़रूरी।

    “ये सब ज़रूरी है, रुहानी,” उसने नज़रों को दूर खिड़की की दिशा में टिकाते हुए कहा, “मेरे करियर की एक धारणा है, जो टूटी तो सब बिखर जाएगा। मुझे अपने शब्दों को बचाना है… और अब… अपना चेहरा भी।”

    रुहानी की आँखें कुछ पल के लिए अद्वैत की आंखों पर टिक गईं, जैसे उसकी पुतली में कोई अनकहा डर देख रही हों। फिर वो बोली, धीरे, लेकिन बिलकुल साफ़…. “मेरे लिए भी तो ज़रूरी है अब ये सब। पापा के मेरी मर्ज़ी के खिलाफ, जबरदस्ती उनकी पसंद के दकियानूसी सोच वाले इंसान से शादी करने से तो ये झूठी शादी ही सही… कम से कम यहाँ मेरी रज़ामंदी तो है और वैसे भी मुझे भी तो अपने प्रोफेशन में सेटल होने के लिए वक्त चाहिए।”

    उसके शब्दों में आंसू नहीं थे, लेकिन आवाज़ जैसे किसी जले हुए पत्ते पर चल रही थी… खुरदरी, सूखी, फिर भी सच्ची। अद्वैत ने उसे गौर से देखा, पहली बार जैसे उसकी मजबूरी की असल शक्ल को पहचाना हो। कमरा कुछ देर के लिए सांस लेना भूल गया था।

    रुहानी ने आख़िरी पन्ने पर दस्तख़त करने से पहले काग़ज़ को हल्के से मोड़ा, जैसे कोई किताब के किसी अधूरे अध्याय को दबा कर रख देता है… ताकि कोई और उस अधूरेपन को महसूस न कर पाए।

    रजिस्टार ने दोनों से कहा, “अब आप दोनों एक दूसरे को वरमाला पहनाएं ताकि यह पूरी प्रक्रिया असली शादी जैसा लगे।” कमरे में खामोशी छा गई। अद्वैत और रुहानी एक दूसरे को देखते रहे, जैसे दोनों एक अजीब सी स्थिति में फंसे हों। उनकी आँखों में सवाल था, न जाने कितना कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द नहीं मिल रहे थे।

    अद्वैत की आँखों में कुछ छिपा हुआ था, जैसे वह खुद को इस पल से बाहर निकालने का रास्ता ढूँढ़ रहा हो। रुहानी ने धीमे से कहा, “हम दोनों खुद ही माला पहन लेते हैं,” और अद्वैत ने भी हामी भरी, मानो वह इस छोटी सी समझौते में अपने कर्तव्यों से बाहर आना चाहता हो।८

    वकील ने कहा, “जैसा आप दोनों चाहें, वैसा ही सही,”

    फिर दोनों ने बिना किसी और शब्दों के खुद के गले में माला डाल दी. वकील की मंजूरी के बाद, जब वे कमरे से बाहर निकले, तो रुहानी का छोटा भाई यश वहाँ खड़ा था। 

    जैसे ही उसने रुहानी को देखा, खुशी से दौड़ते हुए उसके गले लग गया और बोला, “अब पापा की जबरदस्ती किसी और जगह शादी नहीं कर पाएंगे, मैं बहुत खुश हूं आपके लिए।” उसका चेहरा जैसे किसी छोटे बच्चे की खुशी से भर गया हो, और रुहानी के मन में एक हल्की सी राहत महसूस हुई। 

    अद्वैत ने चुपचाप देखा, मानो वह इस नये रिश्ते में खुद को थोड़ा और खोता जा रहा हो, पर उसकी आँखों में कोई अजीब सी गहराई थी, जैसे वह इस रिश्ते के बारे में बहुत कुछ सोच रहा हो।

    यश खुशी से अद्वैत के पास आकर बोला, “जीजाजी तो बोल सकता हूं न अब आपको, चलिए मेरे साथ मेरे पापा के घर, अब पापा भी जान जाएंगे कि रूहानी दीदी की शादी हो गई है तो अब सब ठीक हो जाएगा।” यश की आवाज में उम्मीद और राहत थी, जैसे उसने किसी बड़े संकट से निकलने का रास्ता पा लिया हो।

    लेकिन अद्वैत और रूहानी एक दूसरे को प्रश्नवाचक नजरों से देखकर उस बात पर चुप रहे। उनके दिलों में अनकहे सवाल थे…..क्या सच में सब ठीक हो जाएगा? 

    ————–

    क्या ये अनुबंध दोनों के लिए यह एक ऐसा चक्रव्यूह बन जाएगा, जिसमें वे खुद ही फंसते चले जाएंगे? 

    अद्वैत और रुहानी के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी थी, जो टूटेगी या फिर और मजबूत होगी?

    क्या वे सच में अपनी इच्छाओं और डर से बच पाएंगे, या यह शादी उन्हें उन भावनाओं के सबसे करीब ले आएगी, जिनसे बचने के लिए उन्होंने ये अनुबंध किया था?

     

  • अधूरी इबादत भाग~17

    अधूरी इबादत भाग~17

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~17 शादी… मगर नकली

     

    रात के खाने के बाद जब सब अपने-अपने कमरों में चले गए थे, तब रुहानी चुपचाप छत पर आकर बैठ गई थी। ऊपर आसमान बिलकुल शांत था, लेकिन उसके भीतर हलचल थी… ऐसी जैसे ठहरे पानी में अचानक कोई कंकर गिरा हो। 

    हवा में हल्की ठंडक थी, और चाँद की रोशनी उसकी पलकों पर पड़ी तो उसकी सोच और भी गहराने लगी। वो अपने पैरों को सिकोड़े, घुटनों को बाँहों में भरे, बस छत के कोने में बैठी थी, जैसे किसी सवाल की तलाश में हो, जो खुद उसी के भीतर छुपा हो। 

    रात की नमी, नीले आसमान का सूनापन, और शहर की दूर होती हलचलें…. सब जैसे मिलकर कोई अनकहा गीत गा रही थीं, जिसमें हर सुर रुहानी की बेचैनी को छू रहा था।

    यश की कही सारी बातें अब भी उसके कानों में गूंज रही थीं… एक-एक लफ़्ज़ जैसे मन के अंदर गहराई तक उतर गया था। अद्वैत ने जो कहा था, यश ने सब कुछ ज्यों का त्यों सुना दिया था, लेकिन उस सच्चाई में भी कहीं न कहीं कोई परतें छुपी थीं, जो रुहानी को भीतर से बेचैन कर रही थीं।l

    “आख़िर वो मुझसे शादी क्यूँ करना चाहता है?” – ये सवाल उसकी सोच में बार-बार एक टकराते हुए समुंदर की तरह उठ रहा था, जिसका कोई किनारा नजर नहीं आ रहा था। उसकी ज़िंदगी के सबसे कठिन लम्हे में उसने उसे बचाया था, ये बात सच थी…. लेकिन क्या किसी की जान बचाने भर से कोई रिश्ता इतना गहरा हो सकता है कि वो शादी तक पहुंच जाए? नहीं… रुहानी का दिल मानने को तैयार नहीं था।

    उसने जितना अद्वैत को जाना था… उसके घर में रहते हुए, उसकी मेड से बात करके…. वो इंसान तो बेहद आत्मनिर्भर था, एकदम अपने ही खोल में बंद, जैसे दुनिया से कोई सरोकार ही न हो। उसके चेहरे पर हमेशा एक उदास ठहराव रहता था, जैसे हर मुस्कान पर एक साया हो। वो न तो फालतू बातचीत करता, न ही किसी से खास घुलता-मिलता। 

    और फिर, सबसे बड़ी बात जो रुहानी को भीतर तक कचोट रही थी…. वो ये कि अद्वैत अपनी मरी हुई पत्नी से बेहद मोहब्बत करता था। इतना कि उसके गुजर जाने के बाद किसी और औरत को उसने अपने घर में आने तक नहीं दिया। ना कोई दोस्त, ना कोई हमराज़, ना कोई छांव।)

    तो फिर… ऐसी कौन सी बात है जो उसे, एक अजनबी लड़की को, अपनी पत्नी बनाने के लिए मजबूर कर रही है? रुहानी की उंगलियाँ धीरे-धीरे उसकी मोबाइल की किनारी से खेल रही थीं, और मन सवालों के भंवर में डूबा जा रहा था। 

    तभी उसके हाथ में रखा मोबाइल एकाएक बज उठा।  पर बस एक नाम चमक रहा था — Adwait. जैसे किसी खामोश तलाब में पत्थर गिरा हो, वैसे ही उसकी तंद्रा टूटी। उस एक नाम से उसके भीतर की सारी उलझनें जाग उठीं। हाथ थोड़े काँपे, पर उसने कॉल उठा लिया।

    फोन उठते ही दोनों तरफ कुछ क्षण की चुप्पी रही। जैसे दोनों अपनी साँसें थामे हुए हों, जैसे शब्दों से ज़्यादा भारी हो गई हों खामोशियाँ। और फिर जैसे कोई धागा एक साथ खिंच जाए….. दोनों एक साथ बोल पड़े:

    “मुझे तुम्हें कुछ बताना है,” अद्वैत की आवाज़ थी, भारी और धीमी।

    “मुझे तुमसे कुछ पूछना है,” रुहानी की आवाज़ में भी हल्की थरथराहट थी।

    फिर दोनों एक साथ रुक गए। एक और खामोशी, लेकिन इस बार वह बोझिल नहीं थी…. यह एक इंतज़ार की खामोशी थी।

    रुहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा, “यश ने बताया तुम्हारे प्रपोज़ल के बारे में… उसी सिलसिले में कुछ पूछना था मुझे।”

    फोन के दूसरी तरफ अद्वैत ने एक लंबी, गहरी साँस ली, जैसे शब्दों को आकार देने के लिए भीतर से कुछ खींच रहा हो, और फिर बोला, “इससे पहले कि तुम कुछ पूछो, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ… जिससे शायद तुम्हारे सारे सवालों के जवाब खुद-ब-खुद मिल जाएँ।”

    रुहानी थोड़ी चौंकी। यह शायद पहली बार था जब अद्वैत ने उससे इतने लंबे वाक्य में कुछ कहा था। कुछ तो था उस आवाज़ में…. कोई थकान, कोई सच्चाई, कोई बोझ। 

    वह बस “हम्म… ठीक है, कहो जो कहना है,” कहकर सुनने लगी।

    अद्वैत की आवाज़ फिर आई, बहुत साफ और सीधे लहजे में, “ये शादी असली शादी नहीं होगी।”

    रुहानी के माथे पर लकीरें उभर आईं, और उसकी भौहें एक-दूसरे के पास सिमट गईं। “क्या मतलब?” उसने पूछा, जैसे किसी पहेली को हल करने की कोशिश कर रही हो।

    “तुम्हें थोड़ा अजीब लग रहा होगा,” अद्वैत ने कहा, “लेकिन हमारी शादी एक शो होगी दुनिया के लिए… मतलब, ‘contract marriage’। मुझे इसी सिलसिले में तुमसे बात करनी थी।”

    अब उसकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी….. जैसे जो बोझ वो दिल में लिए फिर रहा था, अब वो उतरने वाला हो। और उधर रुहानी की आँखें आसमान को नहीं, अब अपने भीतर के किसी सच को देख रही थीं….. वो सच, जिसे वो अब तक अनदेखा कर रही थी।

    रुहानी के कानों में जब ये सब बातें पड़ीं, तो पहले-पहल उसे विश्वास नहीं हुआ। शब्द तो मानो हवा में तैरते हुए आए थे, मगर जब उन्होंने उसके दिल की सतह को छुआ, तो वहां से भी कुछ वैसी ही सच्चाई फूट पड़ी। 

    भीतर से एक आवाज आई….. थकी हुई, टूटी हुई, मगर बेहद सच्ची…..”मैं भी तो किसी से रियल में शादी नहीं करना चाहती, ये भी ठीक ही है।” उसकी आंखों में थोड़ी नमी थी, लेकिन होंठों पर एक हल्की सी राहत की परछाईं भी। जैसे किसी भारी बोझ को अस्थायी ही सही, मगर कुछ देर के लिए नीचे रख दिया गया हो।

    अद्वैत की आवाज फिर कानों में पड़ी, गहरी और संयमित, “ऐसे तो मुझे एक साल का कॉन्ट्रैक्ट चाहिए तुमसे, लेकिन अगर तुम्हें कम या ज़्यादा करवाना हो तो तुम बता देना।”

    उसकी आवाज़ में एक पेशेवर ठंडक थी, पर उसके शब्दों की परतों में कहीं एक आत्म-रक्षा की दीवार भी थी… जैसे वो कुछ छुपा रहा हो, खुद से भी।

    रुहानी हल्की मुस्कराहट के साथ, पर दिल में उठते सवालों को थामे, धीरे से पूछ बैठी, “और क्या-क्या टर्म्स एंड कंडीशन्स रहेंगी इस कॉन्ट्रैक्ट में?”

    अद्वैत ने तुरंत कहा, “उतना सारा अभी कॉल पर बताना तो इम्पॉसिबल है। मैं तुम्हें सब मैसेज कर दूँगा। तुम्हें जो भी मॉडिफिकेशन करवाना हो, तो जल्द से जल्द मुझे रिप्लाई कर देना। मैं कल अपने मैनेजर से कहकर सारे डॉक्युमेंट्स बनवा लूंगा।”

    फोन की स्क्रीन से चिपकी रुहानी की उंगलियाँ कांप गईं। कोई रिश्ता यूँ कागज़ों में बंध जाए, ये सोचना भी भारी लग रहा था। लेकिन अब कुछ पूछे बिना रहा न गया। उसकी आवाज़ में एक थरथराहट थी, जैसे भीतर की सच्चाई बाहर आने को तैयार हो—“अचानक से तुम्हें कॉन्ट्रैक्ट मैरिज करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी?”

    अद्वैत ने अपनी आंखें कुछ पल के लिए बंद कीं, जैसे हर जवाब को भीतर से टटोल रहा हो। फिर धीरे-धीरे कहने लगा, “ये सब मेरी राइटिंग करियर के लिए है। नाम है मेरा, एक इमेज है… उस पर दाग नहीं लगने दे सकता। कुछ चीजें दुनिया के लिए परफेक्ट दिखानी पड़ती हैं।”

    उसकी आवाज में कोई घमंड नहीं था, बस एक थकी हुई सच्चाई थी….जैसे कोई लेखक अपने किरदार को नहीं, खुद को पर्दे के पीछे छिपा रहा हो। कुछ कहने से पहले ही अद्वैत फिर बोल पड़ा, मानो उसे डर था कि कहीं रुहानी कोई वाजिब सवाल ना पूछ ले जिससे उसका यह ताश का महल हिल जाए, “याद रहे, contract marriage की बात केवल मैं, तुम, मेरे मैनेजर और वकील को ही पता रहेगी। इसके अलावा और कोई नहीं जान पाए।”

    रुहानी के होंठों पर एक उदासी भरी हँसी खिली, जो मुस्कान से ज़्यादा एक खामोश स्वीकार था। “तुम बेफिकर रहो,” उसने कहा, और वो शब्द किसी वादे की तरह गूंजे, जैसे उसने ना सिर्फ अद्वैत की बात मानी, बल्कि खुद को भी एक दायरे में कैद कर दिया हो। 

    उस हँसी में कोई नयापन नहीं था, बस एक पुरानी थकान थी…. एक लड़की की जो रिश्तों से ज़्यादा उम्मीदें करना भूल चुकी थी, और अब हर सौदे में बस थोड़ी सी इज़्ज़त ढूंढ रही थी।

    ——–

    रुहानी ने जो ‘हाँ’ कहा, क्या वो किसी मजबूरी का फैसला था… या दिल के किसी छुपे कोने से आई सहमति?

    जब इस कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें कागज़ पर उतरेंगी… तो क्या कोई एक लाइन उनकी किस्मत की लकीर बदल देगी?

    क्या एक समझौते के तहत बंधे इस रिश्ते में सचमुच कोई प्यार, कोई इमोशन हो सकता था?

  • अधूरी इबादत भाग~16

    अधूरी इबादत भाग~16

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~16 खुद से बड़ा सवाल

     

    अद्वैत उस पुराने, हल्की रोशनी वाले कैफ़े के एक कोने की टेबल पर बैठा था, जहाँ लकड़ी की मेज़ें और दीवारों पर लगे पुराने पोस्टर अब भी बीते ज़माने की खुशबू सँजोए हुए थे।

    वो बच्चा, जो पहली बार उससे मिला था, अब उसकी ज़िंदगी की सबसे गंभीर बात कह चुका था…. शादी की, रिश्तों की, भरोसे की। यश के शब्द अब भी उसके ज़ेहन में गूंज रहे थे, और उसकी आँखें उस बालक की मासूम गंभीरता में उलझी हुई थीं, जैसे वो किसी गहरे सवाल के जवाब ढूँढ रही हों।

    “तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”

    यश ने चौंकने की बजाय बहुत सधे हुए स्वर में जवाब दिया, उसकी आँखों में कोई हिचक नहीं थी, “दीदी ने आपके बारे में जितना बताया है, उससे मुझे तो आप बहुत भले इंसान लगते हो।”

    अद्वैत ने एक पल को उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में सच में कोई छल नहीं था। मगर वो यह सुनकर और जानना चाहता था। उसकी आवाज़ में थोड़ी जिज्ञासा उभरी, “भला इंसान कैसे?”

    यश का चेहरा खिल उठा। “सबसे पहली बात,” उसने कहा, “आपने मेरी दीदी की जान बचाई है। और दूसरी, सबसे बड़ी बात – आपने कभी भी उनका फायदा नहीं उठाया, न उनके साथ कुछ ग़लत किया। आजकल तो लोग बस मौके ढूंढते हैं, लेकिन आपने… आपने उन्हें स्पेस दिया, इज़्ज़त दी… वो चीज़ जो शायद उन्हें सबसे ज़्यादा चाहिए थी।”

    अद्वैत के भीतर कुछ खामोशी से हिलने लगा। यश के मासूम शब्दों ने उसे अंदर तक छू लिया था। उसे लगा जैसे कोई उसके अंधेरे कमरे में एक छोटा सा दीया जला गया हो, बिना कोई शोर किए। उस पल में अद्वैत को एहसास हुआ कि भले ही उसने कुछ बड़ा नहीं किया हो, पर शायद… शायद उसका होना ही किसी के लिए काफी हो गया था।

    अद्वैत को अपने बारे में यश के मुँह से ये बातें सुनना कुछ अजीब सा लग रहा था। भीतर कहीं कुछ काँप गया था। जैसे कोई पुरानी धूल में ढकी हुई तस्वीर अचानक आँखों के सामने आ गई हो—अपनी माँ की वो आँखें, जिनमें उसने आखिरी बार देखा था खुद पर भरोसा। वो आँखें जो कहती थीं, “दूसरे जैसे मत बनना, अद्वैत… अपनी अच्छाई को मत छोड़ना।” आज यश के मासूम शब्दों ने उस अधूरी बात को पूरा कर दिया था।

    जिस अद्वैत अवस्थी को दुनिया अक्सर “नजायज़” कहकर किनारे कर देती थी, जिसके नाम के आगे कभी पिता का नाम नहीं जुड़ा, जिसकी परवरिश सवालों की छांव में हुई—क्या वही अद्वैत आज किसी के लिए “भला इंसान” कहलाने लायक बन गया है? क्या उसने सचमुच अपनी माँ के आदर्शों को जी लिया है, जो एक किशोर लड़के की आँखों में इतनी साफ इज्ज़त उतर आई?

    लेकिन जैसे ही उसका मन उन ख्यालों में बहने लगा, उसने खुद को एक झटका दिया। नहीं, अभी भावनाओं में बहने का समय नहीं है। उसने गहराई से यश की आँखों में देखा, फिर धीमी, मगर साफ आवाज़ में बोला, “यश, तुम्हें किसी भी तरह अपनी दीदी को कल कोर्ट लेकर आना होगा। तभी हम दोनों की शादी हो पाएगी।”

    यश कुछ कहने ही वाला था कि अद्वैत ने जल्दी से जोड़ा, “लेकिन इस बारे में सिर्फ़ तुम्हें और रूहानी को ही पता होना चाहिए। कोई तीसरा नहीं। कोई भी नहीं।”

    उसके शब्दों में कोई डर नहीं था, मगर एक जिम्मेदारी की थकान ज़रूर थी। मानो वो उस अकेले पुल पर खड़ा हो जहाँ से नीचे छलांग लगाना भी जरूरी था और टिके रहना भी। उसकी आवाज़ में स्थिरता थी, लेकिन भीतर कहीं बहुत गहराई में एक बवंडर चल रहा था…. डर, उम्मीद और एक अजीब-सी राहत का। जैसे वो किसी ऐसी डोर को थामे खड़ा था जो अगर टूटी, तो सब कुछ बिखर जाएगा, लेकिन अगर बची रही… तो शायद एक नई ज़िंदगी शुरू हो सकती थी।

    यश की बातों को सुनते हुए अद्वैत का मन कुछ झिझकता है, लेकिन उसने अपने भीतर के असमंजस को दबा दिया। “आप फिक्र मत कीजिए सर, कल मैं उन्हें शादी की शॉपिंग के नाम से ले आऊँगा,” यश का विश्वासपूर्ण स्वर सुनकर अद्वैत ने एक गहरी सांस ली। 

    फिर, जैसे किसी कांटे को उखाड़ने की कोशिश करते हुए उसने अपनी चिंता को एक बार फिर से व्यक्त किया, “लेकिन साथ में कोई और नहीं होना चाहिए, ना ही तुम्हारी माँ या तुम्हारे पापा।” अद्वैत के शब्दों में गहरी चिंता थी, जैसे उसके मन में एक अंधी सी गलती का डर पल रहा हो, जो इस फैसले को और भी कठिन बना रहा था।

    यश ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप निश्चिंत रहिए, दीदी को लेकर मैं अकेले ही आऊँगा, माँ-पापा मुझे कुछ नहीं बोलेंगे।” यश के शब्दों में एक तरह का आत्मविश्वास था, लेकिन अद्वैत के भीतर एक हल्की सी खटक महसूस हुई। यह विश्वास था या फिर एक और भ्रम, वह नहीं जानता था।

    उसके मन में एक असमंजस था, जैसे एक तट पर खड़ा कोई इंसान जो जानता है कि समुद्र की लहरें कभी भी उसे अपनी चपेट में ले सकती हैं, फिर भी वह कदम बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। उसने अपने भीतर की घबराहट को शांत किया, और फिर से अपने ध्यान को एक ही बिंदु पर केंद्रित किया। “बस, अब यहीं तक,” उसने खुद से कहा, और फिर वहां से जाने का निर्णय लिया।

    अद्वैत जैसे ही उठने वाला था, तभी उसकी नजरें रुहानी के फोन पर पड़ीं, जो अभी भी उसके हाथों में था। कुछ पल के लिए वह जैसे ठहर गया। उसकी उंगलियाँ फोन के आसपास हल्की सी घूमने लगीं, जैसे उसे इसे वापस करना न हो, बल्कि उसमें छुपे हुए किसी गहरे रिश्ते को थामे रखने की इच्छा हो।

    दिल में उथल-पुथल सी महसूस हो रही थी। वह रुहानी से जुड़ी हर बात, हर याद, उसकी आँखों के सामने जैसे सजीव हो उठी। पर फिर उसने खुद को सँभाला और यथार्थ में लौटते हुए यश को फोन वापस करते हुए कहा, “अपनी दीदी को उसका फोन दे देना।”

    यश ने उस फोन को सावधानी से अद्वैत से लिया और उसे अपने हाथों में थाम लिया, जैसे कोई बहुमूल्य चीज हो। वह खड़ा होने लगा, जाने के लिए तैयार था, तभी अद्वैत ने उसे रोकते हुए कहा, “और हाँ, रुहानी को बोल देना कि मैंने अपना नंबर इस में सेव कर लिया है और मैं उससे बात कर लूंगा।”

    यश ने सिर झुकाकर कहा, “जी जरूर, धन्यवाद,” और धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। अद्वैत ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन उसका मन अभी भी कहीं और था। उसके भीतर जैसे एक अजीब सी लहर दौड़ रही थी। उसका ध्यान अब भी उसी फोन पर था, जिसमें रुहानी की यादें और उसकी खुशबू बसी हुई थी। यश के जाते ही अद्वैत वहीं बैठा रहा, जैसे किसी उलझी हुई सोच में खो गया हो। उसके दिल में एक अजीब सी गहरी खामोशी थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था।

    ———–

    क्या अद्वैत की ज़िंदगी में अब भी कोई और आ सकता था, या फिर वह खुद ही किसी अजनबी भविष्य की ओर बढ़ रहा था?

    क्या रुहानी इस समझौते को स्वीकार करेगी, जो अद्वैत ने बिना उससे पूछे तय कर दिया है? 

    अद्वैत की उम्मीदों और रुहानी के दिल के बीच जो अनकही बातें हैं, क्या वे दोनों के सामने आने वाली राह को बदल देंगी?

  • अधूरी इबादत भाग~15

    अधूरी इबादत भाग~15

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~15 अद्वैत की सबसे बड़ी चुनौती

     

    अद्वैत सुबह की पहली रोशनी के साथ ही घर से निकल पड़ा। उसके कदम धीमे थे लेकिन मन तेज़ी से दौड़ रहा था…. जैसे हर मोड़ पर कोई अधूरी बात उसका इंतज़ार कर रही हो। 

    यश द्वारा भेजे गए पते को उसने रात भर निहारते हुए कितनी बार देखा था, अब वही पता उसे एक अजनबी सच्चाई की ओर ले जा रहा था। 

    कार चलाते हुए भी उसकी नज़रें अक्सर सड़कों से हटकर शहर की धड़कनों को पढ़ने की कोशिश करती… कोरे आसमान के नीचे फैले चाय के ठेले, जागती हुई दुकानों की नीम रोशनी और कॉलेज के बाहर खड़े युवाओं की हल्की सी चहक…. ये सब उस शहर के अपनेपन को बिखेर रहे थे, फिर भी अद्वैत के मन में कुछ अनकहा, कुछ अधूरा सा महसूस हो रहा था।

    उसने कार एक शांत गली में मोड़ी और कुछ देर बाद एक छोटे लेकिन सलीके से सजे कैफ़े के सामने आकर रुक गई। कैफ़े की बाहरी दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं, जिन पर सुबह की धूप छिटकी हुई थी। भीतर से हल्की सी जैज़ म्यूज़िक की आवाज़ आ रही थी और एक पुरानी लकड़ी की खिड़की के पार कुछ रंगीन कुर्सियाँ करीने से रखी थीं। 

    अद्वैत कुछ देर बाहर ही खड़ा रहा। उसकी आँखें हर आहट पर टिक जाती और दिल हर दरवाज़े की ओर उम्मीद से देखता। कुछ देर बाद वह वह कैफ़े में प्रवेश किया। 

    अंदर की हवा में कॉफी और वैनिला की खुशबू थी और कोनों में रखी किताबों से उठती खामोशी…. सब कुछ बेहद सुकून देने वाला था, लेकिन अद्वैत की बेचैनी उस शांति को भी चीर रही थी। उसने अपनी निगाहें चारों ओर दौड़ाईं, किसी अपरिचित लेकिन परिचित चेहरे की तलाश में।

    अद्वैत कैफ़े के कोने वाली टेबल पर बैठा था, जहाँ एक बड़ी सी खिड़की बाहर सड़क की हलचल दिखा रही थी। उसने सामने टेबल पर रूहानी का फोन रखा। उसकी उंगलियाँ बार-बार फोन के पास जाती, जैसे हर स्पर्श में कोई संकेत टटोल रही हो। 

    वह लगातार बाहर झाँकता रहा…. उसकी आँखों में किसी अजनबी की प्रतीक्षा का तनाव था। हर बार जब कोई लड़का कैफ़े के पास आता, उसका मन थोड़ी देर के लिए ठहर जाता और फिर उसी अनिश्चितता में लौट जाता। 

    कुछ ही देर में एक दुबला-पतला किशोर, स्कूल यूनिफॉर्म में, बैग लटकाए, तेज़-तेज़ कदमों से आता दिखा। उसने वही बाहर से रूहानी के फोन पर कॉल किया। अद्वैत ने फोन को देखा, और फिर खिड़की से बाहर….. दोनों की नज़रें मिली और एक सहज मुस्कान के साथ उन्होंने अपने-अपने हाथ हिलाए, जैसे किसी अनकहे बंधन को पहचान लिया हो।

    यश दरवाजा खोलते ही अद्वैत की ओर ऐसे लपका, मानो कोई छोटा भाई किसी बड़े को बहुत दिनों बाद देख रहा हो। उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन आँखों में गहरी कृतज्ञता की चमक थी। उसने बैग उतारकर एक ओर रखा और बिना देर किए अद्वैत के सामने बैठ गया। 

    वह कुछ पल तक उसे देखता रहा, फिर भर्राए गले से बोला — “सर… मैं आपको सिर्फ एक बार शुक्रिया कहना चाहता था… आपने मेरी दीदी को बचाया… वरना आज शायद हम…” उसकी आवाज़ टूटने लगी, लेकिन उसने खुद को सम्भाला, “मैं नहीं जानता आपने क्यों और कैसे किया… लेकिन मेरे लिए आप भगवान से कम नहीं।” 

    अद्वैत की आँखों में उस क्षण एक अजीब सा सन्नाटा उतर आया…. तारीफ सुनना उसे कभी सहज नहीं लगता था, खासकर तब जब वो खुद अपने किए पर संशय में हो। उसने धीमे स्वर में कहा, “मैंने कुछ ख़ास नहीं किया… बस जो सही लगा, वही किया।” 

    यश की आँखों में आँसू तैर रहे थे, मगर उन्हीं अश्रुओं की गहराई में कहीं एक विश्वास भी चमक रहा था… जैसे उसे यक़ीन हो चला हो कि उसकी दीदी की टूटी-बिखरी कहानी शायद फिर से एक मुकम्मल रूप ले सके।

    अद्वैत कुछ क्षणों तक यश को एकटक देखता रहा, जैसे उसके भीतर चल रही भावनाओं को समझना चाहता हो। कैफ़े की हल्की रोशनी में यश का चेहरा थका हुआ था, लेकिन आँखों में जो सच्चाई थी, वो अद्वैत को भीतर तक छू रही थी। 

    उसने अपनी हथेलियाँ मेज़ पर रख दीं, और थोड़ी देर की चुप्पी के बाद धीमे स्वर में पूछा, “यश… क्या तुम मुझे बता सकते हो कि रूहानी ने ऐसा कदम क्यों उठाया था?” 

    उसकी आवाज़ में जिज्ञासा से ज़्यादा दर्द था, जैसे वह उस अधूरे रहस्य के धागे को पकड़कर कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो। 

    यश ने एक गहरी साँस ली, उसके होंठ थोड़े काँपे, लेकिन उसने बोलना शुरू किया, “सर, दीदी हमेशा से थोड़ी अलग थी… कुछ साल पहले से ही वह कपड़े डिज़ाइन करने का सपना देखा करती थी, लेकिन मम्मी-पापा को यह मंज़ूर नहीं था। माँ हमेशा उसे शादी और घरेलू जिम्मेदारियाँ निभाने की सलाह देती रहती थी जैसे उसकी अपनी इच्छाएँ कोई मायने नहीं रखती थीं।”

    अद्वैत ने चुपचाप यश की बातों को सुन रहा। यश ने बात आगे बढ़ाई, “फिर एक दिन कुछ हुआ। घर में एक बड़ा झगड़ा और दीदी बहुत टूट गई थी। माँ -पापा ने जब उन्हें कहा की वो उनके मर गई तब शायद उन्होंने सोचा होगा कि सब कुछ खत्म कर दे।”

    अद्वैत की आँखें धीरे-धीरे नम होने लगीं। हर एक शब्द उसे रूहानी के उस चेहरे की याद दिला रहा था जो चुप तो रहता था, पर बहुत कुछ कहता था। 

    यश ने फिर कुछ ऐसा कहा जिससे अद्वैत पर मानो बिजली गिर पड़ी हो। उसके शब्दों ने उसकी पूरी दुनिया को हिला दिया।

    यश ने गहरी चिंता में डूबकर कहा, ‘आपके यहाँ से जाने के बाद पापा ने यह ऐलान कर दिया कि वह जल्द से जल्द दीदी की शादी कर देंगे… एक ऐसे आदमी से, जो पुरानी सोच और सख्त धारणाओं में बंधा हो, और जो दीदी की स्वतंत्रता को समझ न सके। दीदी ने उन्हें मना किया, लेकिन पापा को सिर्फ नाम और इज़्ज़त की परवाह है।’ यश की आँखों से एक आँसू टपककर टेबल पर गिरा।

    यश की बातों को सुनते ही अद्वैत के मन में कई विचारों की लहरें उठने लगीं। वह सोचने लगा, अगर रूहानी की शादी सच में हो गई तो उसकी व्यक्तिगत उलझनें उसकी पेशेवर छवि को गहरा नुकसान पहुँचा सकती हैं। 

    लेखक के रूप में उसकी प्रतिष्ठा और सफलता पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। मीडिया पहले ही उसकी निजी ज़िंदगी को घेर चुका था और वह जानता था कि यदि यशस्वी से इस अनुबंधित शादी के बारे में बात नहीं की, तो उसका करियर खतरे में पड़ सकता है। उसका आत्म-सम्मान अब दबावों के नीचे दबा हुआ था और उसे सिर्फ अपनी छवि की चिंता सता रही थी।

    लेकिन अगले ही पल, यश की बातों से अद्वैत को राहत मिली। उसने महसूस किया कि यश की मासूमियत और उसके विश्वास में एक गहरी पीड़ा छिपी थी, जो उसकी दीदी को बचाने की आखिरी उम्मीद थी। 

    थोड़ी देर रुककर उसने सीधा अद्वैत की आँखों में देखा और बोला, “सर… इसीलिए मैं आपसे मिलना चाहता था। मैं जानता हूँ कि आप दीदी के लिए अजनबी हैं, लेकिन फिर भी… आपने उन्हें ज़िंदगी दी है। और अगर… अगर आप उनसे शादी कर लें… तो शायद दीदी की शादी के लिए पापा जबरदस्ती नहीं कर पाएंगे।” 

    यश के शब्दों में एक मासूम सी ज़िद थी, एक छोटे भाई की उम्मीद, जिसने अपनी बहन को खोते-खोते बचाया था… और अब उसे फिर से टूटने नहीं देना चाहता था। अद्वैत बस चुप था, जैसे शब्द कहीं खो गए हों और दिल एक अनकहे बोझ से भर गया हो।

    अद्वैत ने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन वो मुस्कान पूरी नहीं हो सकी और उसने बहुत संयम से यश की ओर देखा। 

    “तुम तो आज पहली बार मुझसे मिल रहे हो, यश,” अद्वैत की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, मानो वह किसी नाजुक काँच को थाम रहा हो, “तो तुम मुझे अपनी दीदी से शादी करने के लिए कैसे कह सकते हो?”

    ————

    क्या अद्वैत इस घने उलझन के बीच अपनी पहचान और करियर को खतरे में डालने को तैयार था?

    अद्वैत के दिल में एक सवाल गूंजा… क्या यह सच में सिर्फ एक रास्ता था, या फिर यह एक ऐसा चक्र था जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं था?

    उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी चुनौती अब इस ए:क सवाल पर टिकी थी – क्या वह खुद को उस रिश्ते में बँधने दे सकता था?

     

  • हम भी जाएंगे देवघर

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    वैद्यनाथ, जिसे देवघर, बाबा धाम भी कहा जाता है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह झारखंड में स्थित है।

     

    यह शिव जी की पूजा का प्रमुख धाम है। सावन के महीने में लाखों लोग यहाँ आते हैं। कहा जाता है कि यहाँ माता सती का हृदय गिरा था। जब माता सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में गईं और वहाँ शिव जी का अपमान सहन नहीं कर सकीं, तब उन्होंने उसी अग्निकुंड में आत्मदाह कर लिया। जब भगवान शिव माता सती के शरीर को कंधे पर रखकर तांडव करने लगे, तब उनका हृदय यहाँ आकर गिरा। इसलिए यह 108 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

     

    कहा जाता है कि जब रावण ने कठोर तपस्या कर अपने एक-एक सिर भगवान शिव को अर्पित किए और अंतिम सिर भी चढ़ाने वाले थे, तब भगवान शिव प्रकट हुए। रावण ने उनसे प्रार्थना की कि वे उसके साथ लंका चलें। शिव जी शिवलिंग के रूप में उसके साथ चलने को तैयार हो गए, लेकिन एक शर्त रखी कि जहाँ भी वह शिवलिंग को धरती पर रख देगा, वहीं वह स्थापित हो जाएगा।

     

    देवताओं ने शिव जी को लंका जाने से रोकने के लिए झारखंड में रावण से छल कराया और शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। उसी स्थान पर माता सती का हृदय भी गिरा था। तभी से इस स्थान का नाम वैद्यनाथ धाम पड़ा।

     

    इसी वैद्यनाथ मंदिर में सावन के महीने में लाखों भक्त बाबा के दर्शन करने और गंगाजल चढ़ाने के लिए आते हैं।

     

    उन्हीं भक्तों में एक दंपति था—अमर और पूजा। वे पिछले 12 वर्षों से हर साल लगभग 200 किलोमीटर पैदल चलकर बाबा के दर्शन करने आते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने प्रण लिया था कि या तो बाबा उन्हें संतान देंगे, या फिर वे जीवन भर हर साल इसी तरह बाबा के दर्शन करने आते रहेंगे।

     

    दोनों के पैरों में छाले पड़ जाते थे, फिर भी वे कभी नहीं रुकते थे। पूरे रास्ते वे कुछ खाते-पीते नहीं थे। बस एक ही नारा लगाते हुए चलते रहते—

     

    “बोलबम का नारा है, बाबा एक सहारा है।”

     

    घर से निकलने से लेकर घर लौटने तक उनके होंठों पर बस यही जयकारा रहता था।

     

    लोग कहते थे, “अगर कोई दे सकता है, तो केवल भोले बाबा ही दे सकते हैं। उनसे बड़ा दयालु कोई नहीं।”

     

    समय बीतता गया। एक दिन पूजा की गोद भर गई। अमर और पूजा इसे भोले बाबा का आशीर्वाद मानने लगे। आखिर बाबा ने उनकी पुकार सुन ली थी।

     

    इस वर्ष भी सावन का महीना आया, लेकिन इस बार पूजा आठ महीने की गर्भवती थी। डॉक्टर ने उसे कहीं भी यात्रा करने से मना किया था। घर के सभी लोग भी यही चाहते थे कि इस बार पूजा देवघर न जाए और अमर अकेले ही बाबा के दर्शन कर आए।

     

    अमर ने भी प्यार से कहा,

     

    “पूजा, इस बार तुम मत चलो। तुम्हारी और हमारे बच्चे की सुरक्षा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।”

     

    लेकिन पूजा मुस्कुराकर बोली,

     

    “जब मेरे पास कुछ नहीं था, तब भी मैं बाबा के दर्शन के लिए जाती थी। आज जब भोले बाबा ने हमें यह अनमोल खुशी दी है, तो मैं उनके दर्शन किए बिना कैसे रह सकती हूँ? बारह साल तक उन्होंने हमारा साथ नहीं छोड़ा, तो अब मैं भी उनका साथ नहीं छोड़ूँगी। हम दोनों साथ चलेंगे।”

     

    आखिरकार अमर उसकी जिद के आगे हार गया।

     

    सावन के पहले सोमवार के दर्शन के लिए दोनों शुक्रवार को ही घर से निकल पड़े। रास्ते भर “बोलबम का नारा है, बाबा एक सहारा है” का जयघोष करते हुए वे पैदल चलते रहे।

     

    पूजा अपने पेट पर हाथ रखकर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रही थी और अमर हर पल उसका सहारा बना हुआ था। जब भी पूजा थक जाती, अमर उसे कुछ देर बैठाकर आराम कराता, लेकिन खुद कभी नहीं बैठता। उसकी बस एक ही चिंता थी कि पूजा सुरक्षित बाबा धाम पहुँच जाए।

     

    आधे रास्ते तक सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन अचानक पूजा के पेट में तेज दर्द होने लगा। दर्द इतना बढ़ गया कि वह सड़क किनारे बैठ गई। अमर घबरा गया। आसपास चल रही कुछ महिला कांवरियों ने तुरंत दौड़कर पूजा को संभाला।

     

    एक महिला ने पूजा की हालत देखकर कहा,

     

    “लगता है बच्चे का जन्म होने वाला है। इसे तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।”

     

    लेकिन पूजा दर्द से कराहते हुए बोली,

     

    “नहीं… मैं बाबा के दर्शन किए बिना कहीं नहीं जाऊँगी। चाहे कुछ भी हो जाए।”

     

    सबने उसे बहुत समझाया, पर वह नहीं मानी। आखिर सभी महिलाओं ने वहीं उसकी मदद करने का फैसला किया।

     

    अमर बाहर बेचैन होकर इधर-उधर टहल रहा था। उसके हाथ जुड़े हुए थे और आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    वह बार-बार बाबा से प्रार्थना कर रहा था,

     

    “भोलेनाथ! आज तक कभी खाली हाथ नहीं लौटाया। मेरी पूजा और मेरे बच्चे की रक्षा करना।”

     

    कुछ ही देर बाद बच्चे की किलकारी गूँज उठी।

     

    महिलाएँ मुस्कुराते हुए बाहर आईं और बोलीं,

     

    “बधाई हो… बेटा हुआ है।”

     

    यह सुनते ही अमर की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उसने दोनों हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखा और बोला,

     

    “हर-हर महादेव! बाबा, आपने हमारी लाज रख ली।”

     

    थोड़ी देर आराम करने के बाद पूजा ने अपने नवजात बेटे को गोद में उठाया और दोनों फिर बाबा धाम की ओर चल पड़े।

     

    सोमवार की सुबह वे वैद्यनाथ धाम पहुँच गए। बाबा के दर्शन किए, गंगाजल अर्पित किया और अपने बेटे को भगवान शिव के चरणों में लिटा दिया।

     

    दोनों ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोले बाबा! यह आपका दिया हुआ प्रसाद है। इसकी रक्षा करना।”

     

    उन्होंने अपने बेटे का नाम शिवशंकर रखा।

     

    जिस बाबा से उन्होंने बारह वर्षों तक संतान माँगी थी, उसी बाबा ने उनकी झोली भर दी थी। उनकी श्रद्धा और विश्वास सफल हो गया।

     

    लक्ष्मी कुमारी

  • बचपन जो लौट कर नहीं आया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बचपन जो लौटकर कभी नहीं आया 

     

    “मम्मी… मुझे भी स्कूल जाना है…”

     

    तेरह साल की राधा अपने आठ महीने के बेटे को गोद में लेकर घर के बाहर बने छोटे से आँगन में बैठी थी। सामने वाली सड़क से स्कूल की वर्दी पहने बच्चे हँसते-मुस्कुराते जा रहे थे। किसी के हाथ में किताबें थीं, किसी के कंधे पर भारी बस्ता था, तो कोई अपने दोस्तों के साथ शरारत करते हुए आगे बढ़ रहा था।

     

    राधा की नज़रें उन बच्चों पर ही टिक गईं। उसकी आँखों में आँसू आ गए। कभी वह भी उन्हीं बच्चों की तरह स्कूल जाया करती थी। उसे हिंदी की कहानियाँ पढ़ना और चित्र बनाना बहुत पसंद था। वह अक्सर अपनी माँ से कहती थी, “मैं बड़ी होकर टीचर बनूँगी।”

     

    लेकिन किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही लिख रखा था।

     

    राधा सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसी स्कूल में रोहित नाम का एक लड़का भी पढ़ता था। उसकी उम्र तेईस साल थी। कई बार फेल होने के कारण वह अब भी स्कूल आता था। शुरुआत में वह राधा से सामान्य बातें करता, उसकी कॉपी उठाकर दे देता और कभी-कभी टॉफी या चॉकलेट भी दे देता।

     

    राधा मासूम थी। उसे समझ नहीं था कि एक बड़े लड़के का इस तरह उसके करीब आना ठीक नहीं है।

     

    धीरे-धीरे रोहित ने उसे यह विश्वास दिला दिया कि वही उससे सबसे ज़्यादा प्यार करता है। वह कहता, “मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूँगा। कोई तुम्हें डाँटेगा नहीं। बस एक बार मेरे साथ चलो।”

     

    राधा ने बिना कुछ समझे उसकी बातों पर भरोसा कर लिया।

     

    एक दिन वह घर से उसके साथ चली गई। दोनों ने कुछ लोगों की मौजूदगी में शादी जैसा एक दिखावा कर लिया। किसी ने यह नहीं सोचा कि राधा अभी सिर्फ तेरह साल की बच्ची है। उसके हाथों में अभी किताबें होनी चाहिए थीं, घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ नहीं।

     

    कुछ महीनों बाद राधा को पता चला कि वह गर्भवती है।

     

    यह खबर सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है। उसका शरीर अभी पूरी तरह विकसित भी नहीं हुआ था। गर्भावस्था उसके लिए बेहद कठिन रही। उसे बार-बार कमजोरी, चक्कर और तेज़ बुखार आने लगा। कई बार डॉक्टरों के पास ले जाना पड़ा।

     

    आख़िरकार उसने एक बेटे को जन्म दिया।

     

    सब लोग बच्चे को देखकर खुश थे, लेकिन किसी ने उस छोटी बच्ची के चेहरे की थकान नहीं देखी, जिसने अपना बचपन खो दिया था।

     

    आज उसका बेटा आठ महीने का हो चुका था।

     

    रात में जब बच्चा रोता, तो राधा भी उसके साथ रो पड़ती। कई बार उसे खुद तेज़ बुखार होता, फिर भी वह बेटे को सीने से लगाए रखती। उसे समझ नहीं आता कि पहले बच्चे को संभाले या खुद को।

     

    रोहित भी अब पहले जैसा नहीं रहा था। शादी से पहले जो हर वक्त प्यार और साथ निभाने की बातें करता था, वही अब छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगा था। काम ठीक से नहीं चलता था, पैसों की तंगी रहती थी और घर में रोज़ झगड़े होने लगे थे।

     

    एक दिन राधा ने हिम्मत करके कहा, “क्या मैं फिर से स्कूल जा सकती हूँ?”

     

    रोहित ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया, “अब स्कूल जाकर क्या करोगी? अब तुम एक बच्चे की माँ हो।”

     

    ये शब्द सुनकर राधा का दिल टूट गया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने बहुत छोटी उम्र में ऐसा फैसला लिया था, जिसकी कीमत उसे पूरी जिंदगी चुकानी पड़ सकती है।

     

    उस रात वह देर तक जागती रही। बेटा उसकी गोद में सो रहा था और उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। उसे अपनी पुरानी किताबें, अपनी सहेलियाँ, स्कूल का मैदान और अपने अधूरे सपने याद आने लगे।अगले भाग में कहानी आगे बढ़ेगी, जहाँ राधा की ज़िंदगी में एक नया मोड़ आएगा और वह अपने बेटे के भविष्य के लिए एक बड़ा फैसला लेगी।

     

    अगली सुबह राधा अपने बेटे को गोद में लेकर चुपचाप बैठी थी। तभी उसके गाँव में रहने वाली उसकी पुरानी स्कूल टीचर, सीमा मैडम, किसी काम से वहाँ आईं। उनकी नज़र जैसे ही राधा पर पड़ी, वे उसे पहचान ही नहीं पाईं।

    “राधा… तुम?”

    राधा ने सिर झुका लिया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। सीमा मैडम ने जब उसकी गोद में छोटा-सा बच्चा देखा तो वे सब समझ गईं। उन्होंने राधा का हाथ पकड़ लिया और पास बैठ गईं।

     

    “बेटी, तुम्हारे साथ जो हुआ, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन तुम्हारा भविष्य अभी भी खत्म नहीं हुआ है।”

     

    राधा फूट-फूटकर रो पड़ी।

     

    “मैडम… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मुझे लगा था कि प्यार ही सब कुछ होता है। मुझे नहीं पता था कि मेरी पूरी जिंदगी बदल जाएगी।”

     

    सीमा मैडम ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा, “गलती से सीखना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है। तुम अभी भी पढ़ सकती हो।”

     

    उनकी बातें राधा के दिल में उतर गईं।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में बच्चों की शिक्षा और बाल विवाह के प्रति जागरूकता का एक शिविर लगा। राधा भी अपने बेटे को लेकर वहाँ पहुँची। मंच पर एक अधिकारी कह रहे थे, “हर बच्चे को बचपन, शिक्षा और सुरक्षित भविष्य का अधिकार है। कम उम्र में शादी और गर्भावस्था बच्चों के जीवन पर गहरा असर डाल सकती है।”

     

    ये शब्द सुनकर राधा की आँखें भर आईं। उसे अपनी पुरानी कक्षा, ब्लैकबोर्ड, सहेलियाँ और स्कूल की घंटी याद आने लगी। उसने महसूस किया कि उसने जिस उम्र में सपने देखने थे, उस उम्र में जिम्मेदारियों का बोझ उठा लिया।

     

    शिविर के बाद सीमा मैडम फिर उससे मिलीं। उन्होंने कहा, “राधा, अगर तुम चाहो तो घर से पढ़ाई शुरू कर सकती हो। मैं तुम्हारी मदद करूँगी।”

     

    उस दिन राधा ने पहली बार उम्मीद की एक किरण महसूस की।

     

    उसने अपनी पुरानी किताबें निकालीं। जब उसका बेटा सो जाता, वह पढ़ने बैठ जाती। कभी-कभी थकान से उसकी आँखें बंद होने लगतीं, लेकिन फिर वह अपने सपने याद करके दोबारा किताब खोल लेती।

     

    धीरे-धीरे उसके माता-पिता का भी दिल पिघलने लगा। उन्होंने महसूस किया कि उनकी बेटी अभी खुद भी बच्ची है। वे समय-समय पर उसके बेटे को संभाल लेते ताकि राधा कुछ घंटे पढ़ सके।

     

    एक दिन राधा अपने बेटे को गोद में लेकर आईने के सामने खड़ी थी। उसने मुस्कुराकर कहा, “मैंने अपना बचपन खो दिया, लेकिन तुम्हारा कभी नहीं खोने दूँगी।”

     

    उसने तय कर लिया कि उसका बेटा सही उम्र में स्कूल जाएगा, खूब पढ़ेगा और अपने जीवन के फैसले समझदारी से लेगा।

     

    समय बीतता गया। राधा ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू कर दी। रास्ता आसान नहीं था। घर के काम, बच्चे की देखभाल और पढ़ाई—सब कुछ साथ संभालना पड़ता था। कई बार लोग ताने भी मारते, “अब पढ़कर क्या करेगी?”

     

    लेकिन इस बार राधा चुप नहीं रहती। वह मुस्कुराकर कहती, “पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती।”

     

    उसकी यही बात धीरे-धीरे दूसरी लड़कियों के लिए भी हिम्मत बन गई। गाँव की कई बच्चियाँ, जो पढ़ाई छोड़ने वाली थीं, उन्होंने अपने माता-पिता से पढ़ने की जिद की।

     

    कुछ साल बाद वही राधा एक कार्यक्रम में बच्चों और अभिभावकों के सामने खड़ी थी। उसने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा,

     

    “एक गलत फैसला मेरा बचपन छीन ले गया। लेकिन मैंने ठान लिया कि मेरी गलती किसी और बच्ची की किस्मत नहीं बनेगी। हर बेटी को पढ़ने का अधिकार है और हर बच्चे को अपना बचपन जीने का हक है।”

     

    तालियों की गूँज पूरे हॉल में फैल गई।

     

    राधा ने अपने बेटे की ओर देखा। वह मुस्कुराते हुए अपनी किताब हाथ में पकड़े बैठा था।

     

    राधा की आँखें नम थीं, लेकिन इस बार उन आँसुओं में दर्द नहीं, बल्कि सुकून था। उसे विश्वास था कि भले ही उसका बचपन लौटकर कभी नहीं आया, लेकिन उसने अपने बेटे और कई दूसरी बच्चियों का भविष्य ज़रूर बदल दिया।

  • दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

    दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

                          दोस्ती : एक अनमोल रिश्ता

     

     वो जो दूर रहकर भी मेरे पास सदा रहता है,

    हर लम्हा मेरे हिस्से में खुशियां ही आएं

    ऐसी दुआ करता है, ऐसा ही एक अनमोल

    रिश्ता दोस्ती के रूप में मैंने संजो रखा है ,

    रोज छोटी छोटी बातों में मुझसे लड़ पड़ता है, मेरे साथ बिना बोले जिसका दिन नहीं कटता है,

    हां! ऐसे ही एक शख्स को अपना

    दोस्त मैंने बना रखा है , मेरी जिंदगी में

    शामिल हुआ है वह ऐसे जैसे धड़कन

    बनकर बस गया है मुझमें,

    ना जाने कितने आए और साथ निभाने

    का वादा करके निकल गये,

    बस ये एक बिना किसी कारण और

    वादों के मेरे साथ ठहरा है ,

    “दोस्ती ” ये उससे मैंने जानी है 

    सब रिश्ते में सबसे खूबसूरत रिश्ता 

    दोस्ती का है, जो उसने मुझे समझा दिया है ….

  • काश मैं अब भी तुम्हारे करीब होती

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    “कुछ गलतियाँ इंसान की ज़िंदगी बदल देती हैं… और कुछ गलतियाँ पूरी ज़िंदगी पछतावा बनकर साथ चलती हैं।”

     

    रिया और आरव एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। दोनों की मुलाकात कॉलेज में हुई थी। धीरे-धीरे दोस्ती हुई और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई। आरव रिया का बहुत ख्याल रखता था। वह हर छोटी-बड़ी खुशी में उसके साथ खड़ा रहता। रिया की तबीयत खराब हो जाए तो पूरी रात जागकर उसकी चिंता करता। उसके जन्मदिन पर अपने हाथों से छोटा-सा गिफ्ट बनाता, क्योंकि उसके पास ज़्यादा पैसे नहीं थे।

     

    रिया भी उससे बहुत प्यार करती थी, लेकिन उसके दिल में एक कमी थी। उसे हमेशा लगता था कि आरव बहुत सीधा-सादा है। उसके पास न महंगी बाइक थी, न स्टाइलिश कपड़े और न ही बड़ा बैंक बैलेंस। धीरे-धीरे उसने दूसरों की बातों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। उसकी कुछ सहेलियाँ भी उसे समझातीं कि प्यार से ज़िंदगी नहीं चलती, पैसे भी ज़रूरी होते हैं। यही बातें धीरे-धीरे उसके मन में घर करने लगीं और उसने आरव के सच्चे प्यार से ज़्यादा बाहरी चमक-दमक को महत्व देना शुरू कर दिया।

     

    एक दिन कॉलेज में कबीर नाम का लड़का आया। अमीर परिवार से था, महंगी कार में आता था, हर समय दोस्तों से घिरा रहता था। उसकी बातें सुनकर रिया धीरे-धीरे उसकी तरफ आकर्षित होने लगी।

     

    आरव को यह बदलाव महसूस होने लगा।

     

    “रिया, सब ठीक है ना? तुम पहले जैसी नहीं रहीं।”

     

    रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “कुछ नहीं… बस पढ़ाई का प्रेशर है।”

     

    लेकिन सच कुछ और था।

     

    अब वह आरव के मैसेज देर से पढ़ती, कॉल उठाने से बचती और हर समय कबीर के साथ दिखाई देती। आरव हर दिन खुद को समझाता कि शायद रिया किसी परेशानी में होगी, लेकिन उसके दिल को हर पल यही डर सताता था कि कहीं वह उसे खो न दे।

     

    एक शाम आरव ने उसे पार्क में बुलाया।

     

    “रिया… अगर मुझसे कोई गलती हुई है तो बता दो। मैं खुद को बदल लूंगा, लेकिन यूँ दूर मत जाओ।”

     

    रिया ने बिना उसकी आँखों में देखे कहा,

     

    “आरव… हमें यहीं सब खत्म कर देना चाहिए।”

     

    यह सुनते ही आरव जैसे अंदर से टूट गया।

     

    “क्या… इतना आसान था तुम्हारे लिए?”

     

    रिया बोली,

     

    “हम दोनों एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं।”

     

    असल वजह उसने नहीं बताई कि वह कबीर के साथ रहना चाहती है।

     

    आरव की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा,

     

    “अगर यही तुम्हारी खुशी है… तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं। बस खुश रहना।”

     

    उस दिन के बाद दोनों की राहें अलग हो गईं।

     

    कुछ ही दिनों में रिया और कबीर साथ घूमने लगे। महंगे रेस्टोरेंट, लंबी ड्राइव, बड़े-बड़े गिफ्ट… रिया को लगा कि उसने सही फैसला लिया है। उसे लगता था कि अब उसकी हर ख्वाहिश पूरी होगी और यही उसकी नई दुनिया है।

     

    लेकिन कहते हैं, जो रिश्ता दिखावे पर शुरू होता है, वह ज़्यादा दिन नहीं चलता।

     

    धीरे-धीरे कबीर का व्यवहार बदलने लगा। वह घंटों तक रिया के मैसेज का जवाब नहीं देता। मिलने के बहाने टाल देता। पहले जो हर समय उसके साथ रहने की बातें करता था, अब वही उससे दूरी बनाने लगा।

     

    एक दिन रिया ने देखा कि कबीर किसी दूसरी लड़की के साथ हाथ पकड़कर घूम रहा है।

     

    रिया उसके सामने जाकर खड़ी हो गई।

     

    “कबीर… ये सब क्या है?”

     

    कबीर ने बेपरवाही से कहा,

     

    “रिया, प्लीज़ ड्रामा मत करो। मुझे अब तुम्हारे साथ नहीं रहना।”

     

    रिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    “लेकिन… तुमने तो कहा था कि तुम मुझसे प्यार करते हो।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “मैंने ऐसा कई लड़कियों से कहा है। तुम भी उनमें से एक थीं।”

     

    इतना कहकर वह दूसरी लड़की का हाथ पकड़कर चला गया।

     

    रिया वहीं सड़क किनारे बैठकर फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने किस इंसान को खो दिया।

     

    उस रात उसने मोबाइल खोला।

     

    आरव की पुरानी तस्वीरें…

     

    पुराने मैसेज…

     

    उसकी भेजी हुई शुभ रात्रि की बातें…

     

    जन्मदिन की शुभकामनाएँ…

     

    सब कुछ पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भर आईं।

     

    एक मैसेज पर उसकी नज़र रुक गई।

     

    “अगर कभी पूरी दुनिया भी तुम्हारा साथ छोड़ दे… तब भी मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”

     

    रिया ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।

     

    “मैंने ही तो उस इंसान का साथ छोड़ दिया था…”

     

    अब उसे समझ आया कि सच्चा प्यार महंगे गिफ्ट या बड़ी कार से नहीं, बल्कि परवाह और भरोसे से बनता है।

     

    अगले दिन वह हिम्मत करके आरव के घर पहुँची।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    सामने आरव था।

     

    वह पहले जैसा ही शांत था, लेकिन उसकी आँखों की चमक कहीं खो चुकी थी।

     

    रिया रोते हुए बोली,

     

    “आरव… मुझे माफ़ कर दो। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। मैंने तुम्हारे प्यार की कद्र नहीं की। अगर हो सके तो मुझे एक मौका और दे दो।”

     

    कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने धीमी आवाज़ में कहा,

     

    “रिया… मैंने तुम्हें दिल से चाहा था। जब तुम गई थीं, उस दिन सिर्फ रिश्ता नहीं टूटा था… मैं भी टूट गया था। कई रातें बिना सोए गुज़ारी हैं मैंने। हर त्योहार, हर खुशी अधूरी लगती थी। लेकिन समय ने मुझे जीना सिखा दिया।”

     

    रिया की सिसकियाँ और तेज़ हो गईं।

     

    “मुझे हर दिन पछतावा होता है। काश… मैं तुम्हें कभी छोड़कर न जाती।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने तुम्हें बहुत पहले माफ़ कर दिया था… क्योंकि प्यार में नफरत करना मैंने सीखा ही नहीं। लेकिन कुछ टूटे हुए रिश्ते फिर जुड़ तो जाते हैं, मगर उनमें पहले जैसा भरोसा कभी वापस नहीं आता।”

     

    रिया समझ गई कि अब बहुत देर हो चुकी है।

     

    उसने आखिरी बार आरव को देखा और भारी कदमों से वहाँ से चली गई।

     

    कई साल बीत गए।

     

    एक दिन बारिश हो रही थी।

     

    रिया बस स्टॉप पर अकेली खड़ी थी। सामने सड़क के उस पार आरव अपनी पत्नी और छोटी-सी बेटी के साथ हँसते हुए चल रहा था।

     

    उसकी बेटी ने दौड़कर आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    आरव मुस्कुराकर उसे गोद में उठा लिया।

     

    वह दृश्य देखकर रिया की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    उसने आसमान की तरफ देखा और खुद से कहा,

     

    “जिस इंसान ने मुझे सबसे ज़्यादा प्यार किया… मैंने उसी का दिल तोड़ दिया। आज उसके पास उसकी खुशियाँ हैं, और मेरे पास सिर्फ मेरी गलती की यादें।”

     

    बारिश की बूँदें उसके आँसुओं में मिल गईं।

     

    वह धीरे से मुस्कुराई, लेकिन उस मुस्कान में दर्द छिपा था।

     

    उसके होंठों से बस एक ही बात निकली—

     

    “काश… मैं अब भी तुम्हारे करीब होती।

  • नन्ही कोमल की अधूरी विदाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नन्ही कोमल की अधूरी विदाई

     

    राजस्थान के एक छोटे से गांव में वर्षों से एक ऐसी परंपरा चली आ रही थी, जिसे वहां के लोग अपनी शान और संस्कृति का हिस्सा मानते थे। सिर्फ वही गांव नहीं, बल्कि उसके आसपास के सभी गांवों में भी बचपन में ही बच्चों की शादी कर दी जाती थी। चार-पाँच साल के बच्चों का रिश्ता तय कर दिया जाता और आठ-दस साल की उम्र तक उनकी शादी भी कर दी जाती। गांव वालों का मानना था कि जल्दी शादी करने से परिवार की इज्जत बनी रहती है और बड़े होकर बच्चे कोई गलती नहीं करते।

    इसी बीच सरकार की ओर से गांव के प्राथमिक विद्यालय में नए शिक्षक राघव का तबादला हो गया। राघव अपनी पत्नी सीमा और अपनी पाँच साल की प्यारी बेटी कोमल के साथ उस गांव में रहने आ गए।

    कोमल बहुत ही मासूम और चंचल बच्ची थी। कभी गुड़ियों से खेलती, कभी तितलियों के पीछे भागती और कभी अपने पापा के स्कूल में जाकर बच्चों के साथ बैठ जाती। उसे दुनिया की किसी भी परंपरा या रीति-रिवाज की कोई समझ नहीं थी।

    गांव में उनके आने की खबर फैलते ही कई लोग उनसे मिलने पहुंचे।

    एक बुजुर्ग मुस्कुराते हुए बोले, “मास्टर जी, सुना है आपकी एक बेटी भी है?”

     

    राघव ने हँसते हुए कहा, “हाँ, पाँच साल की है।”

    दूसरे बुजुर्ग ने कहा, “तो फिर उसकी शादी की बात भी शुरू कर दीजिए। हमारे यहां लड़कियों की शादी बचपन में ही कर दी जाती है। बड़े होकर बच्चे अपने मन की करने लगते हैं।”

     

    राघव ने विनम्रता से जवाब दिया, “अभी तो उसे ठीक से लिखना-पढ़ना भी नहीं आता। उसकी शादी की बात करना तो बहुत दूर की बात है।”

     

    बुजुर्गों ने एक-दूसरे की ओर देखा और बोले, “मास्टर जी, यहां का यही रिवाज है।”

     

    राघव मुस्कुरा तो दिए, लेकिन उनके मन में चिंता घर कर गई।

     

    अगले दिन जब वे स्कूल पहुंचे तो उन्हें एक अजीब बात दिखाई दी। स्कूल में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी। कई बच्चियों के नाम रजिस्टर में दर्ज थे, लेकिन वे महीनों से स्कूल नहीं आई थीं।

     

    उन्होंने एक बच्चे से पूछा, “रीना स्कूल क्यों नहीं आती?”

     

    बच्चे ने सहजता से कहा, “सर, उसकी शादी हो गई। अब ससुराल वाले पढ़ने नहीं भेजते।”

     

    यह सुनकर राघव का दिल बैठ गया।

     

    शाम को कोमल घर के बाहर मिट्टी में खेल रही थी। तभी लगभग दस साल की एक लड़की वहां आई। उसकी मांग में सिंदूर था और गले में मंगलसूत्र।

     

    कोमल ने मासूमियत से पूछा, “दीदी, आपने ये लाल-लाल क्या लगाया है?”

     

    लड़की ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, “मेरी शादी हो गई है।”

     

    कोमल खुश होकर बोली, “शादी में तो बहुत सारी मिठाइयाँ मिलती होंगी ना?”

     

    लड़की की आंखें भर आईं। उसने बस सिर हिला दिया और वहां से चली गई।

     

    राघव दूर खड़े यह सब देख रहे थे। उन्हें उस बच्ची की आंखों में छिपा दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

     

    कुछ दिनों बाद गांव की पंचायत बुलाई गई।

     

    सरपंच ने कहा, “मास्टर जी, गांव वाले चाहते हैं कि आपकी बेटी का रिश्ता भी तय कर दिया जाए। इससे गांव की परंपरा बनी रहेगी।”

     

    राघव अपनी जगह से उठे और पूरे आत्मविश्वास के साथ बोले,

     

    “मेरी बेटी कोई बोझ नहीं है जिसे जल्दी विदा कर दूँ। वह पढ़ेगी, अपने सपने पूरे करेगी और जब समझदार होगी, तभी अपनी जिंदगी का फैसला खुद करेगी।”

     

    यह सुनकर पंचायत में सन्नाटा छा गया।

     

    कुछ लोगों को उनकी बात पसंद नहीं आई। धीरे-धीरे गांव वालों ने उनके परिवार का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। कोई दूध नहीं देता, कोई सब्जी नहीं बेचता और कई लोग उनसे बात तक नहीं करते।

     

    सीमा परेशान हो गईं। उन्होंने एक दिन कहा, “इतनी परेशानी हो रही है। अगर हम झुक जाएँ तो शायद सब ठीक हो जाए।”

     

    राघव ने शांत स्वर में कहा, “अगर आज हम डर गए, तो कल हमारी बेटी का बचपन भी छिन जाएगा।”

     

    कुछ ही दिनों बाद गांव में एक दुखद घटना हुई। बारह साल की पूजा, जिसकी शादी बचपन में हो गई थी, अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। उसे शहर के अस्पताल ले जाया गया।

     

    डॉक्टर ने गांव वालों से कहा, “बच्चों पर समय से पहले जिम्मेदारियाँ डालना उनके शरीर और मन दोनों के लिए नुकसानदायक है। इन्हें खेलने, पढ़ने और आगे बढ़ने का अधिकार है।”

     

    डॉक्टर की बातें कई लोगों के दिल को छू गईं।

     

    राघव ने उसी समय स्कूल में एक जागरूकता कार्यक्रम रखा। डॉक्टर, पुलिस अधिकारी और बाल विकास विभाग के कर्मचारी भी आए। उन्होंने गांव वालों को बताया कि बाल विवाह सिर्फ एक पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि कानूनन अपराध भी है। इससे बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, उनका भविष्य अंधकार में चला जाता है और उनका बचपन उनसे छिन जाता है।

     

    गांव वाले अब भी चुपचाप बैठे थे।

     

    तभी छोटी-सी कोमल अपनी कॉपी हाथ में लेकर मंच पर पहुंची।

     

    उसने मासूम आवाज में कहा,

     

    “मेरे पापा कहते हैं कि मैं बड़ी होकर डॉक्टर बन सकती हूँ… टीचर बन सकती हूँ… पुलिस बन सकती हूँ… या फिर जो चाहूँ, वो बन सकती हूँ। लेकिन अगर मेरी अभी शादी कर दी गई… तो क्या मैं अपने सपने पूरे कर पाऊँगी?”

     

    पूरा मैदान बिल्कुल शांत हो गया।

     

    किसी के पास उस पाँच साल की बच्ची के सवाल का जवाब नहीं था।

     

    उसी समय वह दस साल की शादीशुदा लड़की रोते हुए उठी और बोली,

     

    “काश… मुझे भी पढ़ने दिया होता। आज मैं भी अपने सपने पूरे कर रही होती।”

     

    उसकी बात सुनकर कई महिलाओं की आँखें भर आईं।

     

    सरपंच धीरे-धीरे खड़े हुए। उन्होंने गांव वालों की ओर देखा और कहा,

     

    “हमने हमेशा यही समझा कि हम सही कर रहे हैं, लेकिन आज एहसास हुआ कि हम अपने ही बच्चों से उनका बचपन छीन रहे थे।”

     

    उन्होंने ऊँची आवाज में घोषणा की,

     

    “आज से इस गांव और आसपास के किसी भी गांव में कोई भी बाल विवाह नहीं होगा। जो भी ऐसा करेगा, पंचायत उसका साथ नहीं देगी, बल्कि कानून का साथ देगी।”

     

    पूरा गांव तालियों की गूंज से भर उठा।

     

    कुछ महीनों बाद गांव पूरी तरह बदल चुका था। जहां पहले छोटी-छोटी बच्चियों के रिश्ते तय होते थे, वहां अब उनके स्कूल में दाखिले करवाए जाने लगे। माता-पिता अपनी बेटियों को गर्व से पढ़ने भेजने लगे।

     

    वही दस साल की लड़की भी दोबारा स्कूल आने लगी। उसके चेहरे पर अब उदासी नहीं, बल्कि नई उम्मीद दिखाई देती थी।

     

    कोमल भी हर सुबह अपने बैग के साथ खुशी-खुशी स्कूल जाती। उसकी मुस्कान देखकर राघव और सीमा की आँखों में सुकून झलकने लगता।

     

    एक दिन स्कूल से लौटते समय कोमल ने अपने पापा का हाथ पकड़कर पूछा,

     

    “पापा… मेरी शादी कब होगी?”

     

    राघव मुस्कुराए, उसे गोद में उठाया और प्यार से बोले,

     

    “जब मेरी बेटी अपने सारे सपने पूरे कर लेगी, अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी और अपनी जिंदगी का फैसला खुद करने लायक बन जाएगी… तभी उसकी शादी होगी।”

     

    कोमल खिलखिलाकर हँस पड़ी।

     

    उसकी वह हँसी सिर्फ एक बच्ची की हँसी नहीं थी, बल्कि उस गांव में लौट आए बचपन, शिक्षा और नई सोच की सबसे प्यारी आवाज बन चुकी थी।

  • एक गांव का राक्षस

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बहुत समय पहले घने जंगलों और ऊँचे पहाड़ों के बीच शिवपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव बसा हुआ था। गाँव के लोग बहुत ही सीधे-सादे, मेहनती और भगवान पर अटूट विश्वास रखने वाले थे। गाँव के ठीक बीचोंबीच मां भवानी का एक प्राचीन मंदिर था। हर सुबह और हर शाम पूरा गाँव वहीं इकट्ठा होकर आरती करता और अपनी खुशियों की प्रार्थना करता था। लेकिन कई वर्षों से उस गाँव पर एक भयानक संकट मंडरा रहा था। जंगल की सबसे ऊँची पहाड़ी पर कालमुख नाम का एक राक्षस रहता था। उसका शरीर पहाड़ जैसा विशाल, आँखें जलते अंगारों जैसी लाल और उसकी दहाड़ सुनकर पेड़ों के पत्ते तक काँप उठते थे। जब भी उसे तेज भूख लगती, वह गाँव में आ धमकता और किसी एक छोटे बच्चे को उठाकर ले जाता। उसके जाने के बाद पूरे गाँव में सिर्फ मातम और चीख-पुकार रह जाती। हर माँ अपने बच्चे को सीने से लगाए रहती। कोई भी बच्चा अकेले घर से बाहर नहीं निकलता था। शाम ढलते ही पूरा गाँव अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेता। एक दिन फिर वही मनहूस घड़ी आ गई। जंगल की ओर से कालमुख की भयानक दहाड़ गूँजी। “वो आ गया… राक्षस आ गया…!” किसी ने घबराकर चिल्लाया। लोग अपने बच्चों को लेकर इधर-उधर भागने लगे। लेकिन कालमुख ने एक सात साल के मासूम बच्चे को पकड़ लिया। उसकी माँ रोते हुए उसके पैरों में गिर पड़ी। “मेरे बच्चे को छोड़ दे… मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ… उसे मत ले जा…” कालमुख ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। “हा… हा… हा… तुम्हारे आँसू देखकर ही मेरी भूख और बढ़ जाती है।” इतना कहकर वह बच्चे को लेकर जंगल की ओर चला गया। पूरा गाँव सन्न रह गया। किसी घर में उस दिन चूल्हा नहीं जला। अगली सुबह गाँव के सभी लोग मां भवानी के मंदिर पहुँचे। सबकी आँखों में आँसू थे। गाँव के बुज़ुर्ग ने हाथ जोड़कर कहा, “हे मां… अब हमसे अपने बच्चों का दुख नहीं देखा जाता। हमारी रक्षा करो।” पूरा मंदिर “जय मां भवानी” के जयकारों से गूँज उठा। तभी मंदिर के बाहर जोरदार ठहाका सुनाई दिया। सबने बाहर देखा। कालमुख मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ा था। वह हँसते हुए बोला, “हर बार इसी मूर्ति से मदद माँगते हो? अगर तुम्हारी देवी में शक्ति है तो मुझे रोककर दिखाए।” उसने मंदिर की ओर देखकर उपहास किया और बोला, “अगली पूर्णिमा को मैं फिर आऊँगा… और इस बारपहले से भी छोटे बच्चे को लेकर जाऊँगा।” इतना कहकर वह हँसता हुआ जंगल की ओर लौट गया। पूरा गाँव डर से काँप उठा। उसी गाँव में हरिराम और सीता नाम का एक गरीब दंपति रहता था। दोनों की शादी को कई साल हो चुके थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। फिर भी उन्होंने कभी भगवान से शिकायत नहीं की। वे रोज़ मंदिर की सफाई करते, दीपक जलाते और मां भवानी की सेवा करते। एक रात सीता मंदिर में बैठी रो रही थी। “हे मां… अगर मेरी गोद भरनी है, तो ऐसी संतान देना जो सिर्फ मेरी नहीं, पूरे गाँव की रक्षा करे।” उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। अचानक मंदिर में रखा दीपक अपने आप तेज़ जलने लगा। बिना हवा के मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं। पूरा मंदिर दिव्य प्रकाश से भर गया। सीता ने काँपते हुए सिर उठाया। उसे लगा जैसे मां भवानी की मूर्ति मुस्कुरा रही हो। तभी एक मधुर आवाज़ गूँजी— “डर मत पुत्री। तुम्हारी भक्ति व्यर्थ नहीं जाएगी। समय आने पर मेरी शक्ति तुम्हारे घर जन्म लेगी। वह दिव्य कन्या इस गाँव को राक्षस के आतंक से मुक्त करेगी।” इतना कहकर प्रकाश धीरे-धीरे गायब हो गया। सीता ने यह बात हरिराम को बताई, लेकिन दोनों ने इसे किसी और से नहीं कहा। कुछ दिनों बाद एक चमत्कार हुआ। सालों से निसंतान रही सीता गर्भवती हो गई। जब यह खबर पूरे गाँव में फैली तो लोगों की आँखों में बरसों बाद उम्मीद की चमक दिखाई दी। सबने इसे मां भवानी का आशीर्वाद माना। लेकिन जब यह बात कालमुख तक पहुँची तो वह ज़ोर से हँस पड़ा। “एक बच्ची मेरा अंत करेगी? हा… हा… हा… इंसानों की उम्मीद भी कितनी मज़ेदार होती है।” उसने गुस्से में पहाड़ की एक विशाल चट्टान पर मुक्का मारा और वह चट्टान टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई। “जिस दिन वह बच्ची पैदा होगी, उसी दिन मैं उसे खा जाऊँगा। फिर देखूँगा तुम्हारी मां भवानी क्या कर लेती हैं।” यह सुनकर गाँव वाले और भी डर गए, लेकिन उन्होंने मां भवानी पर विश्वास नहीं छोड़ा। हर दिन पूरा गाँव मंदिर में दीप जलाकर सीता और उसके होने वाले बच्चे की सलामती की प्रार्थना करने लगा। आखिर वह रात आ ही गई। नौ महीने पूरे हो चुके थे।आसमान में काले बादल छा गए। बिजलियाँ चमकने लगीं।तेज़ हवाएँ चलने लगीं। मां भवानी के मंदिर की घंटियाँ बिना किसी के छुए अपने आप बजने लगीं। पूरा गाँव उस दिव्य प्रकाश से नहा उठा जो मंदिर से निकल रहा था। उसी समय सीता ने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। जैसे ही उस बच्ची ने पहली बार अपनी आँखें खोलीं, उसके माथे पर लाल रंग का एक छोटा-सा त्रिशूल चमक उठा। उसी क्षण मंदिर की अखंड ज्योति पहले से कई गुना अधिक तेज़ हो गई। गाँव के बुज़ुर्ग भावुक होकर बोले, “यह कोई साधारण कन्या नहीं… यह मां भवानी के आशीर्वाद से जन्मी दिव्य शक्ति है।” लेकिन तभी दूर पहाड़ी से कालमुख की भयानक दहाड़ सुनाई दी। “मैं आ रहा हूँ… आज कोई देवी मुझे नहीं रोक पाएगी। सबसे पहले मैं इसी बच्ची को अपना शिकार बनाऊँगा!” उसकी दहाड़ सुनकर पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया। लेकिन उसी समय मां भवानी के मंदिर से तेज़ दिव्य प्रकाश निकला। ऐसा लगा जैसे स्वयं मां भवानी मुस्कुराकर कह रही हों “अब अधर्म का अंत निश्चित है… मेरी पुत्री इस धरती पर अपना पहला कदम रख चुकी है।” और इसी के साथ उस राक्षस के अंत की शुरुआत हो गई… राक्षस कालमुख को जैसे ही दिव्य कन्या के जन्म की खबर मिली, वह गुस्से से पागल हो उठा। उसकी भयानक दहाड़ से पूरा जंगल काँपने लगा। हाथ में विशाल गदा लिए वह तेज़ी से शिवपुर की ओर बढ़ा। गाँव वालों ने उसे आते देखा तो सभी अपने घरों से निकलकर मां भवानी के मंदिर में पहुँच गए। हरिराम और सीता अपनी नवजात बेटी को गोद में लिए मां भवानी के चरणों में बैठ गए। सभी लोग हाथ जोड़कर एक ही प्रार्थना कर रहे थे, “हे मां, हमारी रक्षा कीजिए।” कुछ ही देर में कालमुख मंदिर के सामने आ खड़ा हुआ। वह ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए बोला, “यही है वह बच्ची जो मेरा अंत करेगी? आज सबसे पहले मैं इसी को खाऊँगा, फिर पूरे गाँव को खत्म कर दूँगा।” इतना कहकर वह मंदिर की ओर बढ़ा। लेकिन जैसे ही उसने मंदिर की पहली सीढ़ी पर कदम रखा, उसके पैर वहीं रुक गए। उसे लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे आगे बढ़ने नहीं दे रही हो। गुस्से में उसने अपनी पूरी ताकत से गदा मंदिर पर फेंकी, लेकिन गदा मंदिर से टकराने से पहले ही राख बनकर हवा में उड़ गई। उसी क्षण मंदिर के गर्भगृह से तेज़ प्रकाश निकला। वह प्रकाश सीधा उस नवजात कन्या पर पड़ा। बच्ची मुस्कुराई और उसके माथे पर बना त्रिशूल चमकने लगा। देखते ही देखते वह दिव्य आभा से घिर गई। आसमान में बिजली चमकी और मां भवानी का दिव्य स्वर गूँजा, “कालमुख! तेरे पापों का अंत आज निश्चित है।” यह सुनते ही कन्या के सामने एक दिव्य त्रिशूल प्रकट हुआ। बिना किसी के छुए वह त्रिशूल तेज़ी से उड़ता हुआ कालमुख की ओर बढ़ा। राक्षस ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की। उसने बड़े-बड़े पत्थर उठाकर फेंके, ज़ोरदार दहाड़ लगाई, लेकिन दिव्य त्रिशूल को कोई नहीं रोक सका। अगले ही पल त्रिशूल कालमुख के सीने में जा धँसा। “नहीं… यह नहीं हो सकता!” राक्षस दर्द से चीख उठा। उसका विशाल शरीर काँपने लगा। धीरे-धीरे वह धुएँ में बदलने लगा और कुछ ही क्षणों में राख बनकर धरती पर बिखर गया। राक्षस के मरते ही आसमान साफ़ हो गया। मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं और पूरे गाँव में फूलों की वर्षा होने लगी। गाँव वाले खुशी से झूम उठे। हर तरफ़ “जय मां भवानी!” के जयकारे गूँजने लगे। हरिराम और सीता की आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया और मां भवानी का धन्यवाद किया। उस दिन के बाद शिवपुर में कभी किसी बच्चे पर कोई संकट नहीं आया। गाँव फिर से हँसी, खुशियों और बच्चों की किलकारियों से गूँज उठा। आज भी लोग उस मंदिर में जाकर यही कहते हैं “जहाँ सच्ची श्रद्धा और मां भवानी का आशीर्वाद हो, वहाँ अधर्म और बुराई का अंत निश्चित होता है।”