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  • डरावनी आत्मा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    डरावनी आत्मा का बंद कमरा

     

    शहर से थोड़ा दूर एक पुरानी हवेली थी। हवेली कई सालों से बंद पड़ी थी। उसकी दीवारों पर बेलें चढ़ चुकी थीं और खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे। गांव के लोग शाम होते ही उस रास्ते से गुजरना बंद कर देते थे।

     

    कहा जाता था कि हवेली में एक डरावनी आत्मा रहती है।

     

    लोगों का कहना था कि आधी रात के बाद हवेली की ऊपरी मंजिल से किसी लड़की के रोने की आवाज आती थी।

     

    किसी ने उसे देखा नहीं था, लेकिन कई लोगों ने उसके कदमों की आवाज जरूर सुनी थी।

     

    उसी गांव में एलेक्स नाम का बीस साल का लड़का रहता था। वह इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    एक शाम उसके दोस्त नोलन ने उसे चुनौती दी।

     

    “अगर तुम्हें इतना ही भरोसा है कि वहां कोई आत्मा नहीं है, तो आज रात हवेली में जाकर दिखाओ।”

     

    एलेक्स ने हंसकर कहा—

     

    “मुझे किसी को कुछ साबित नहीं करना।”

     

    नोलन बोला—

     

    “डर गए?”

     

    एलेक्स तुरंत बोला—

     

    “ठीक है। आज रात चला जाऊंगा।”

     

    रात करीब दस बजे एलेक्स टॉर्च लेकर हवेली की तरफ निकल पड़ा।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा आधा खुला था।

     

    उसने उसे धक्का दिया।

     

    चर्ररर…

     

    दरवाजा खुलते ही अंदर से ठंडी हवा का झोंका आया।

     

    एलेक्स ने खुद को संभाला।

     

    “पुरानी हवेली है, हवा तो चलेगी।”

     

    वह अंदर चला गया।

     

    फर्श पर धूल जमी थी। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    जैसे ही उसने टॉर्च एक चित्र पर डाली, उसे लगा कि चित्र में बनी लड़की की आंखें उसकी तरफ देख रही हैं।

     

    एलेक्स कुछ पल रुका।

     

    फिर हंस पड़ा।

     

    “डराने की कोशिश कर रही हो?”

     

    वह आगे बढ़ गया।

     

    अचानक पीछे से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    एलेक्स पलटा।

     

    “हवा होगी।”

     

    उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    अब उसे थोड़ी चिंता हुई।

     

    उसने फोन निकाला।

     

    नेटवर्क नहीं था।

     

    “कमाल है।”

     

    तभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    एलेक्स ने सिर उठाकर देखा।

     

    ऊपरी मंजिल की सीढ़ियां अंधेरे में गायब हो रही थीं।

     

    आवाज फिर आई।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    वह धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    जैसे ही उसने पहला कदम रखा, ऊपर से एक धीमी आवाज आई—

     

    “मत आओ…”

     

    एलेक्स वहीं रुक गया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं मिला।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “वापस चले जाओ…”

     

    एलेक्स का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    लेकिन उसने हिम्मत करके ऊपर जाना जारी रखा।

     

    ऊपरी मंजिल पर एक लंबा गलियारा था।

     

    गलियारे के अंत में एक बंद कमरा था।

     

    दरवाजे पर पुराने ताले के निशान थे।

     

    एलेक्स ने टॉर्च उस दरवाजे पर डाली।

     

    अचानक दरवाजे के अंदर से किसी ने धीरे से तीन बार दस्तक दी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    एलेक्स पीछे हट गया।

     

    “अंदर कौन है?”

     

    कुछ देर बाद आवाज आई—

     

    “मैं…”

     

    एलेक्स ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    “जिसका इंतजार कोई नहीं कर रहा।”

     

    एलेक्स का डर बढ़ गया।

     

    फिर भी उसने पूछा—

     

    “तुम यहां कब से हो?”

     

    अंदर से आवाज आई—

     

    “बहुत सालों से।”

     

    एलेक्स ने दरवाजे के नीचे से देखा।

     

    अंदर से हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    “तुम इंसान हो?”

     

    कुछ देर चुप्पी रही।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “अब नहीं।”

     

    एलेक्स समझ गया।

     

    वह वही आत्मा थी, जिसकी बातें गांव वाले करते थे।

     

    वह भागने के लिए मुड़ा।

     

    लेकिन गलियारे का रास्ता अचानक गायब था।

     

    वह जहां सीढ़ियां थीं, वहां अब सिर्फ दीवार थी।

     

    एलेक्स घबरा गया।

     

    “मुझे जाने दो!”

     

    आत्मा की आवाज आई—

     

    “मैंने तुम्हें नहीं रोका।”

     

    “तो रास्ता कहां है?”

     

    “जिस कमरे में तुमने कभी आने की हिम्मत नहीं की, वही रास्ता दिखाएगा।”

     

    एलेक्स ने बंद कमरे की तरफ देखा।

     

    दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    अंदर एक पुरानी मेज, एक टूटी कुर्सी और दीवार पर कई तस्वीरें थीं।

     

    एक तस्वीर देखकर एलेक्स के कदम रुक गए।

     

    उस तस्वीर में एक युवा लड़की थी।

     

    उसके साथ एक छोटा लड़का खड़ा था।

     

    लड़का बिल्कुल एलेक्स जैसा दिखता था।

     

    उसके हाथ कांपने लगे।

     

    “ये… कौन है?”

     

    आत्मा उसके पीछे खड़ी थी।

     

    अब उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    वह एक शांत चेहरे वाली लड़की थी। उसकी आंखों में डर नहीं, बल्कि बहुत गहरा दुख था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम्हारे दादा के छोटे भाई की बेटी।”

     

    एलेक्स हैरान रह गया।

     

    “मेरा परिवार?”

     

    आत्मा ने सिर हिलाया।

     

    “मेरा नाम एलिसा था।”

     

    उसने बताया कि कई साल पहले हवेली में रहने वाले परिवार में जमीन को लेकर विवाद हुआ था। एलिसा ने एक पुराने दस्तावेज के बारे में सच जान लिया था, जिससे परिवार के एक लालची सदस्य का झूठ सामने आ सकता था।

     

    लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।

     

    उसे इसी कमरे में बंद कर दिया गया था।

     

    “मैंने बहुत देर तक मदद के लिए पुकारा,” एलिसा ने कहा।

     

    “लेकिन कोई नहीं आया।”

     

    एलेक्स की आंखें नम हो गईं।

     

    “फिर?”

     

    “कुछ दिनों बाद मुझे इसी कमरे में मेरी डायरी मिली। उसमें मैंने सब सच लिख दिया था।”

     

    एलिसा ने मेज की तरफ इशारा किया।

     

    वहां एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    एलेक्स ने उसे उठाया।

     

    उसमें पूरे परिवार का सच लिखा था।

     

    आखिरी पन्ने पर एक नाम था।

     

    एलेक्स के परदादा का।

     

    लेकिन उसके आगे लिखा था—

     

    “उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की थी, मगर देर हो चुकी थी।”

     

    एलेक्स स्तब्ध रह गया।

     

    उसे समझ आया कि उसके परिवार ने एलिसा को नुकसान नहीं पहुंचाया था। बल्कि उसके परदादा ने उसे बचाने की कोशिश की थी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

     

    एलेक्स ने पूछा—

     

    “तुम अब तक यहां क्यों हो?”

     

    एलिसा ने धीमे से कहा—

     

    “क्योंकि मेरा सच किसी ने दुनिया तक नहीं पहुंचाया।”

     

    एलेक्स ने डायरी अपने बैग में रख ली।

     

    “मैं तुम्हारा सच सबको बताऊंगा।”

     

    एलिसा की आंखों में पहली बार शांति दिखाई दी।

     

    तभी हवेली में तेज हवा चलने लगी।

     

    खिड़कियां खुल गईं।

     

    दीवारों पर टंगी तस्वीरें हिलने लगीं।

     

    एलिसा धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

     

    एलेक्स ने कहा—

     

    “तुम जा रही हो?”

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मुझे जाने का रास्ता मिल गया है।”

     

    कमरे में अचानक तेज सफेद रोशनी फैल गई।

     

    एलेक्स ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ सेकंड बाद जब उसने आंखें खोलीं तो कमरा खाली था।

     

    दरवाजा खुला हुआ था।

     

    गलियारा भी वापस आ चुका था।

     

    वह तेजी से नीचे आया।

     

    मुख्य दरवाजा इस बार आसानी से खुल गया।

     

    बाहर नोलन और गांव के कुछ लोग खड़े थे।

     

    नोलन घबराकर बोला—

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    एलेक्स ने कहा—

     

    “हां। लेकिन मुझे तुम सबको कुछ बताना है।”

     

    अगले दिन एलेक्स ने पूरी डायरी गांव के बुजुर्गों के सामने रखी।

     

    जैसे-जैसे पन्ने पढ़े गए, एलिसा की पुरानी कहानी सामने आती गई।

     

    गांव के बुजुर्गों ने उस हवेली के बारे में पहली बार सच जाना।

     

    उन्होंने एलिसा के नाम से हवेली के पास एक छोटा-सा स्मारक बनवाया।

     

    उस दिन के बाद हवेली से कभी रोने की आवाज नहीं आई।

     

    लेकिन एलेक्स जब भी उस रास्ते से गुजरता, उसे हवेली की ऊपरी खिड़की में एक हल्की रोशनी दिखाई देती।

     

    एक बार उसने ऊपर देखा।

     

    खिड़की पर एलिसा खड़ी थी।

     

    उसने दूर से हाथ हिलाया।

     

    एलेक्स ने भी हाथ हिला दिया।

     

    अगले ही पल रोशनी गायब हो गई।

     

    उस दिन एलेक्स समझ गया कि हर डरावनी आत्मा बदला लेने नहीं आती।

     

    कुछ आत्माएं सिर्फ इसलिए भटकती हैं क्योंकि उनकी अधूरी कहानी कोई सुनने वाला नहीं होता।

     

    और जब सच आखिरकार सामने आ जाता है…

     

    तो सबसे डरावनी आत्मा भी शांति पा सकती है।

  • Dil sabhal ja jara part – 24

    Dil sabhal ja jara part – 24

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 24: “नई शुरुआत की राह”

    मुंबई की वो शामें प्रिया के लिए कभी न खत्म होने वाली रातों जैसी लगती थीं। अपार्टमेंट की बालकनी से समुद्र की लहरें दिखती थीं, लेकिन उन लहरों की आवाज प्रिया को आरव की हंसी की याद दिलाती थी। वो हंसी जो कभी शिमला के ठाकुर हाउस में गूंजती थी। प्रिया बालकनी में खड़ी थी, हाथ में एक पुरानी फोटो – वो शादी वाली फोटो जहां आरव उसे रिंग पहना रहा था। उसकी आंखें नम थीं, चेहरा थका हुआ, और होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान – वो मुस्कान जो दर्द छिपाने की कोशिश में लगाई गई थी, लेकिन आंखों से झलकता दुख उसे धोखा दे रहा था। प्रिया की उंगलियां फोटो पर फिसल रही थीं, जैसे वो आरव के चेहरे को छू रही हो। “आरव… कितनी खुश थी मैं उस दिन। तुम्हारी आंखों में वो चमक… वो प्यार। अब वो चमक कहां है? मैं यहां अकेली हूं, और तुम… तुम कहां हो?” उसकी आवाज कांप रही थी, आंसू गाल पर बहकर फोटो पर गिर पड़े।

     

    अंदर से आदित्य पापा की आवाज आई। “प्रिया बेटी… शाम हो गई। अंदर आ जाओ। चाय पी लो।”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। एक गहरी सांस ली और मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन वो मुस्कान नकली थी, आंखों तक नहीं पहुंच रही थी। वो अंदर आई। लिविंग रूम में आदित्य पापा सोफे पर बैठे थे, चाय का ट्रे रखा था। उनका चेहरा प्रिया को देखकर और उदास हो गया। आदित्य की आंखें प्रिया के थके चेहरे पर टिक गईं – वो आंखें जो एक पिता की तरह दुख महसूस कर रही थीं। “बेटी… आज फिर बालकनी में खड़ी थी? कितना सोचेगी आरव के बारे में? कितना रोएगी?”

     

    प्रिया सोफे पर बैठ गई। उसकी आंखें नीचे थीं, उंगलियां चाय के मग से खेल रही थीं। “पापा… क्या करूं? आरव… वो हर पल याद आता है। यहां मुंबई में आई हूं, लेकिन दिल शिमला में अटका है। वो ठाकुर हाउस, वो बर्फीली रातें, वो आरव की हंसी… सब मुझे सताता है। मैं भूलना चाहती हूं, लेकिन भूलती नहीं।”

     

    आदित्य ने गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं – वो लकीरें जो एक पिता के दिल का दर्द बयां कर रही थीं। वो प्रिया के करीब सरके और उसके कंधे पर हाथ रखा। वो स्पर्श गर्म था, सहारे वाला। “प्रिया… मैं देख रहा हूं तुझे। रोज उदास रहती है। घर में अकेली बैठी, कुछ नहीं करती। बस यादों में खोई रहती है। बेटी, जिंदगी आगे बढ़नी चाहिए। आरव चला गया, लेकिन तू तो है। तू क्यूं खुद को कैद करके रख रही है? तू कोई जॉब क्यों नहीं कर लेती? बाहर निकल, लोगों से मिल, काम कर। ऐसे घर में अकेली रहोगी तो कभी आरव को भूल नहीं पाओगी।”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। उसकी आंखें लाल थीं, लेकिन उनमें एक जिद थी – वो जिद जो दर्द से पैदा हुई थी। वो मग रखी और आवाज कांपते हुए बोली, “पापा… जॉब? बाहर निकलूं? लेकिन पापा, मैं कहीं भी रहूं तो भी आरव को नहीं भूल सकती हूं। वो मेरी सांसों में है, मेरी हर याद में है। जॉब करूंगी तो क्या? दिन भर काम, लेकिन शाम को घर लौटूंगी तो फिर वही अकेलापन। आरव की यादें मुझे छोड़ेंगी नहीं। मैं भूलना भी नहीं चाहती। वो मेरा प्यार था, मेरा पति था। उसे भूलकर कैसे जिऊं?”

     

    आदित्य का चेहरा और गंभीर हो गया। उनकी आंखें प्रिया के चेहरे पर टिकी थीं – वो आंखें जो एक पिता का दर्द और समझदारी दोनों बयां कर रही थीं। वो प्रिया का हाथ थामे। “बेटी… मैंने नहीं कहा भूल जा। ठीक है, मत भूलो। आरव को याद रखो। लेकिन क्या तू चाहती है कि आरव तुझे ऐसे उदास देखकर वो भी उदास रहे? क्योंकि आरव जहां भी होगा, तुझे देख रहा होगा। वो तेरी खुशी चाहता था, तेरी मुस्कान। अगर तू ऐसे उदास रही, तो उसकी आत्मा को दुख होगा। तू उसके लिए खुश होने की कोशिश कर। जॉब कर, नई जिंदगी बना। आरव को भूल मत, लेकिन उसके लिए जी।”

     

    प्रिया की आंखों में आंसू आ गए। वो चुप हो गई। आदित्य की बातें उसके दिल में उतर रही थीं – धीरे-धीरे, लेकिन गहराई से। उसका चेहरा उदास था, लेकिन अब उसमें एक सोच थी। वो मग उठाई और चाय पीने लगी, लेकिन स्वाद नहीं आ रहा था। “पापा… आप सही कहते हैं। आरव… वो मुझे उदास नहीं देखना चाहते होंगे। वो कहते थे – ‘प्रिया, तू स्ट्रॉन्ग है।’ मैं कोशिश करूंगी। लेकिन पापा, आसान नहीं है। हर पल लगता है वो मेरे साथ है।”

     

    आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, “बेटी, आसान नहीं है। लेकिन शुरू कर। मैं तेरे साथ हूं। NGO में आ, काम कर। या कोई और जॉब ढूंढ। बाहर निकल।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। उसकी आंखों में अब एक फैसला था – दर्द भरी, लेकिन मजबूत। “पापा… ठीक है। मैं जॉब ढूंढूंगी। आरव के लिए।”

     

    उसी समय दरवाजा खुला। रिया अंदर आई। उसका चेहरा थका हुआ था, आंखें सूजी। वो प्रिया के पास बैठी। “प्रिया… क्या बात हो रही है?”

     

    प्रिया ने रिया का हाथ थामा। “रिया… पापा कह रहे हैं जॉब कर लूं। उदास रहने से बेहतर है।”

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द था। वो आदित्य की ओर देखी। “हां प्रिया… अंकल सही कह रहे हैं। तू घर में बैठकर क्या करेगी? यादों में डूबकर खुद को तोड़ेगी? आरव भैया… वो चाहते होंगे हम आगे बढ़ें। मैं भी तेरे साथ हूं। हम साथ जॉब ढूंढेंगे।”

     

    प्रिया ने रिया की आंखों में देखा। रिया हंस रही थी, लेकिन आंखें नम थीं। “रिया… तू भी उदास है ना? आरव… वो तेरे लिए भी भाई था। तू कहती नहीं, लेकिन मैं जानती हूं। रातों में रोती है ना?”

     

    रिया की आंखों से आंसू गिर पड़े। वो चुप हो गई। फिर बोली, “हां प्रिया… उदास हूं। आरव भैया… वो मेरे लिए भाई जैसे थे। उनकी मौत… मुझे भी तोड़ गई। मैं हंसती हूं, लेकिन अंदर से खाली हूं। लेकिन मैं तेरे लिए स्ट्रॉन्ग बन रही हूं। हम साथ हैं।”

     

    प्रिया ने रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। आदित्य ने उन्हें देखा, उनका दिल भी भर आया। “बेटियों… रोओ नहीं। आगे बढ़ो। आरव की यादें साथ रखो, लेकिन जिंदगी जीओ।”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। उसका चेहरा अब तय था। “पापा… ठीक है। मैं जॉब ढूंढूंगी। लेकिन रिया… तू भी। हम साथ करेंगे।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “हां प्रिया। साथ।”

     

    अगले दिन से प्रिया और रिया जॉब ढूंढने लगीं। प्रिया ने अपना रिज्यूम बनाया – कॉलेज की पढ़ाई, स्कॉलरशिप, NGO का एक्सपीरियंस। वो ऑनलाइन सर्च कर रही थी – टीचिंग जॉब्स, NGO पोजीशंस, काउंसलिंग। उसकी उंगलियां कीबोर्ड पर चल रही थीं, लेकिन मन अभी भी आरव में था। “आरव… देखो, मैं कोशिश कर रही हूं। तेरे लिए।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… ये जॉब देख। मुंबई में एक स्कूल में टीचर की वैकेंसी। तू बच्चों से प्यार करती है।”

     

    प्रिया ने देखा। उसकी आंखें चमकीं – पहली बार। “हां रिया… अप्लाई करती हूं।”

     

    आदित्य ने देखा। वो खुश हुए। “बेटी… अच्छा है। आगे बढ़ रही हो।”

     

     

    लेकिन शाम को प्रिया फिर उदास। बालकनी में खड़ी आरव की फोटो देख रही थी। “आरव… जॉब मिल जाएगी। लेकिन तू नहीं मिलेगा।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… चल, बाहर घूम आएं।”

     

    दोनों बाहर निकलीं। मुंबई की सड़कें – भीड़, लाइट्स। लेकिन प्रिया को आरव की कमी खल रही थी। “आरव… यहां सब भाग रहे हैं। लेकिन मेरा दिल रुका हुआ है।”

     

    धीरे-धीरे प्रिया इंटरव्यू देने लगी। पहला इंटरव्यू – NGO में। वो तैयार हुई – सादे कपड़े, बाल बंधे। इंटरव्यूअर ने पूछा, “आपका एक्सपीरियंस?”

     

    प्रिया ने कहा, “मैंने शिमला में NGO में काम किया। बच्चों को पढ़ाया।” लेकिन उसकी आवाज में दर्द था।

     

    इंटरव्यू के बाद प्रिया रो पड़ी। “रिया… मैं नहीं कर पाऊंगी। हर जगह आरव याद आता है।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… कोशिश कर। आरव चाहते होंगे।”

     

    प्रिया ने फिर कोशिश की। दूसरा इंटरव्यू – स्कूल में। वो बच्चों को देखकर मुस्कुराई – पहली बार सच्ची मुस्कान। “आरव… बच्चों में तुम्हारी हंसी है।”

     

    इंटरव्यूअर ने कहा, “आप सिलेक्टेड हैं।”

     

    प्रिया खुश हुई। लेकिन घर लौटकर रो पड़ी। “आरव… मैं जी रही हूं। लेकिन तेरे बिना।”

     

    रिया ने गले लगाया। “प्रिया… मैं भी तेरे साथ हूं। हम साथ जीएंगे।”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 23

    Dil sabhal ja jara part – 23

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    part – 23 nai jagah ka akela pan 

     

    मुंबई की ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकी। अप्रैल की गर्म हवा प्रिया और रिया के चेहरों पर लगी। शिमला की ठंडक से बिल्कुल उलट – यहां उमस थी, भीड़ थी, शोर था। प्रिया ने अपना छोटा सा सूटकेस उठाया। उसकी आंखें लाल थीं, चेहरा थका हुआ। सफेद सलवार-कमीज पहनी थी – विधवा की तरह नहीं, लेकिन दिल से वो खुद को विधवा ही महसूस कर रही थी। गले में मंगलसूत्र अभी भी था, लेकिन वो अब यादों का बोझ लगता था। रिया उसके बगल में थी – उसका सूटकेस, और प्रिया का सहारा। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और प्लेटफॉर्म से बाहर निकलीं।

     

    आदित्य पापा बाहर कार लेकर इंतजार कर रहे थे। उन्हें देखकर प्रिया की आंखें फिर भर आईं। वो दौड़ी और पापा से लिपट गई। “पापा…”

     

    आदित्य ने उसे गले लगाया। उनकी आंखें भी नम थीं। “बेटी… आ गई। अब सब ठीक होगा।”

     

    रिया ने भी गले लगाया। “अंकल… थैंक्स कि हमें अपनाया।”

     

    कार में बैठे। मुंबई की सड़कें – ट्रैफिक, हॉर्न, ऊंची इमारतें। प्रिया खिड़की से बाहर देख रही थी, लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उसका मन शिमला में था – ठाकुर हाउस में, आरव के साथ। “आरव… तुम कहां हो? मुझे अकेला छोड़कर…”

     

    आदित्य पापा का अपार्टमेंट साउथ मुंबई में था – छोटा, लेकिन आरामदायक। दो बेडरूम, बालकनी से समुद्र दिखता था। प्रिया को एक कमरा दिया गया। रिया को दूसरा। सामान रखते वक्त प्रिया ने अपना सूटकेस खोला। अंदर आरव की शेरवानी का एक टुकड़ा था – जो एक्सीडेंट में बच गया था। प्रिया ने उसे छुआ और रो पड़ी। “आरव… तुम्हारी खुशबू अभी भी है।”

     

    रिया ने उसे गले लगाया। “प्रिया… रो मत। हम साथ हैं।”

     

    लेकिन रात हुई तो अकेलापन शुरू हो गया। प्रिया अपने कमरे में थी। नई जगह – नई दीवारें, नई छत, नई हवा। लेकिन दिल पुराना था। वो बिस्तर पर लेटी, छत को देख रही थी। आंसू बह रहे थे। “आरव… यहां सब नया है। लेकिन तुम नहीं हो। मुझे तुम्हारी कमी हर पल खल रही है। शिमला में तुम्हारी यादें थीं – वो लॉन जहां हम बर्फ में खेलते थे, वो हवेली जहां हमारा घर बनने वाला था, वो कमरा जहां हमारी पहली रात… लेकिन यहां? यहां सिर्फ अकेलापन है।”

     

    प्रिया उठी। बालकनी में गई। मुंबई की लाइट्स चमक रही थीं, दूर समुद्र की लहरें सुनाई दे रही थीं। लेकिन प्रिया को शिमला की बर्फ याद आ रही थी। “आरव… याद है? वो रात जब तुमने मुझे प्रपोज किया था। बर्फ गिर रही थी, तुमने रिंग दी। मैं कितनी खुश थी। अब वो रिंग हाथ में है, लेकिन तुम नहीं।” प्रिया ने रिंग को चूमा। आंसू गिर पड़े। वो फर्श पर बैठ गई, घुटने मुंह से लगाए रोने लगी। “आरव… मुझे तुम्हारी आवाज सुनाई देती है। ‘प्रिया… मेरी जान।’ लेकिन अब वो आवाज सिर्फ याद है।”

     

    रिया कमरे में आई। प्रिया को बालकनी में रोते देखा। वो पास बैठी। “प्रिया… मैं जानती हूं। मुझे भी नींद नहीं आ रही। आरव भैया… वो मेरे लिए भाई थे। उनकी हंसी, उनकी चिढ़ाना… सब याद आता है।”

     

    प्रिया ने रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। “रिया… यहां सब नया है। लेकिन दिल पुराना दर्द लिए बैठा है। मैं सोचती हूं – आरव अगर होते तो क्या कहते? ‘प्रिया, मुंबई एंजॉय कर। मैं तेरे साथ हूं।’ लेकिन वो नहीं हैं।”

     

    रिया ने कहा, “प्रिया… हम साथ हैं। धीरे-धीरे सब ठीक होगा।”

     

    लेकिन प्रिया का मन नहीं मान रहा था। वो रात भर जागती रही। आरव की यादें उसे सताती रहीं – वो पहली मुलाकात कॉलेज में, वो डांस पार्टी, वो हवेली की रातें, वो किस, वो गले लगना। “आरव… तुमने कहा था हमारा घर बनेगा। बच्चे होंगे। लेकिन अब? अब सिर्फ मैं हूं। अकेली।”

     

    सुबह हुई। आदित्य पापा NGO ले गए। ‘हृदय सेवा’ – गरीब बच्चों और दिल के मरीजों के लिए। प्रिया ने काम शुरू किया – बच्चों को पढ़ाना, मरीजों से बात करना। लेकिन हर चेहरे में आरव दिखता। एक बच्चा हंसा तो आरव की हंसी याद आई। प्रिया रो पड़ी। आदित्य ने पूछा, “बेटी… क्या हुआ?”

     

    “पापा… सबमें आरव दिखता है।”

     

    आदित्य ने गले लगाया। “समय लगेगा बेटी। लेकिन तू मजबूत है।”

     

    रिया भी NGO में मदद करने लगी। दोनों शाम को घर लौटतीं। मुंबई की भीड़ में खो जातीं, लेकिन अकेलापन नहीं जाता। प्रिया समुद्र किनारे जाती। लहरें देखती। “आरव… शिमला में बर्फ थी, यहां लहरें।

    लेकिन तुम्हारी कमी हर जगह है।”

     

  • नोंक झोंक

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नंदी की वजह से महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक

     

    कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। माता पार्वती पूजा की तैयारी कर रही थीं। गणेश जी पास में बैठे मोदक खा रहे थे और कार्तिकेय जी अपने काम में व्यस्त थे। वहीं नंदी हमेशा की तरह महादेव के पास बैठे उनकी सेवा में लगे थे।

     

    महादेव ध्यान में बैठे थे।

     

    माता पार्वती ने पूजा की सारी तैयारी पूरी की और महादेव को आवाज दी,

     

    “महादेव, पूजा का समय हो गया है।”

     

    महादेव ने आँखें खोलीं।

     

    “अभी आया देवी।”

     

    लेकिन तभी नंदी महादेव के पास आकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी ने नंदी को देखा और फिर महादेव की तरफ।

     

    “आप पहले नंदी के साथ बैठेंगे या मेरे साथ पूजा करने आएँगे?”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “देवी, नंदी तो मेरे पास आए हैं। इन्हें कैसे भेज दूँ?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “जब भी मैं आपको बुलाती हूँ, नंदी बीच में आ जाते हैं।”

     

    नंदी ने यह सुना तो तुरंत उठकर दूसरी तरफ जाने लगे।

     

    महादेव बोले,

     

    “अरे नंदी, तुम कहाँ जा रहे हो?”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “देखा! मैंने कहा था ना?”

     

    महादेव मुस्कुरा दिए।

     

    “देवी, नंदी ने तो कुछ किया ही नहीं।”

     

    “इसीलिए तो कह रही हूँ। आप ही उन्हें हर बार बुलाते हैं।”

     

    नंदी चुपचाप खड़े रहे।

     

    गणेश जी यह सब देख रहे थे। उन्होंने हँसते हुए कहा,

     

    “माता, आज तो नंदी फँस गए।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “बिल्कुल।”

     

    महादेव बोले,

     

    “गणेश, तुम भी अपनी माता का साथ दे रहे हो?”

     

    गणेश जी ने कहा,

     

    “मैं तो सच का साथ दे रहा हूँ पिता।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    पूजा के बाद माता पार्वती भोजन बनाने चली गईं। उन्होंने सोचा कि आज महादेव को अपने हाथों से भोजन खिलाएँगी। उन्होंने प्रेम से भोजन तैयार किया।

     

    उन्होंने महादेव को बुलाया,

     

    “महादेव, भोजन तैयार है।”

     

    महादेव आने ही वाले थे कि नंदी उनके सामने आकर खड़े हो गए।

     

    महादेव ने कहा,

     

    “नंदी, तुम भी भोजन करना चाहते हो?”

     

    पार्वती जी ने दूर से यह देखा।

     

    “फिर से!”

     

    महादेव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “क्या हुआ देवी?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    महादेव समझ गए कि कुछ तो हुआ है।

     

    “देवी, आप नाराज़ हैं?”

     

    “नहीं।”

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “जब आप ‘कुछ नहीं’ कहती हैं, तब अक्सर कुछ न कुछ जरूर होता है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “आपको सब पता है फिर भी पूछते हैं।”

     

    महादेव नंदी की ओर देखने लगे।

     

    “क्या नंदी की वजह से?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “हाँ।”

     

    नंदी ने तुरंत अपना सिर झुका लिया।

     

    महादेव बोले,

     

    “बेचारे नंदी को क्यों दोष दे रही हैं?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “मैं नंदी को दोष नहीं दे रही। मैं आपको कह रही हूँ।”

     

    महादेव चुप हो गए।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “आपको पता है मैंने कितने प्रेम से भोजन बनाया है?”

     

    “हाँ देवी।”

     

    “फिर भी आप नंदी को देखते ही सब भूल जाते हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “ऐसा नहीं है।”

     

    “तो फिर?”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “मैं आपको भी उतना ही महत्व देता हूँ और नंदी को भी।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “मुझे नंदी से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है कि आप उनके साथ इतना समय बिताते हैं कि मेरे लिए समय ही नहीं बचता।”

     

    महादेव ने उनकी बात ध्यान से सुनी।

     

    फिर बोले,

     

    “देवी, आपने कभी सोचा है कि नंदी मेरे लिए क्या हैं?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “हाँ, मैं जानती हूँ। वह आपके भक्त हैं, आपके वाहन हैं और आपके बहुत प्रिय हैं।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और आप?”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैं?”

     

    “आप तो मेरे हृदय में हैं।”

     

    पार्वती जी कुछ पल चुप रहीं।

     

    उनकी नाराज़गी थोड़ी कम हो गई।

     

    तभी नंदी धीरे-धीरे उनके पास आए और अपना सिर माता पार्वती के चरणों के पास रख दिया।

     

    पार्वती जी ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “अरे नंदी, मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ।”

     

    नंदी ने जैसे राहत की साँस ली।

     

    महादेव हँसते हुए बोले,

     

    “देखा नंदी, तुम्हारी माता तुम्हें कितना प्रेम करती हैं।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “हाँ, लेकिन तुम मेरी शिकायत महादेव से मत करना।”

     

    महादेव बोले,

     

    “देवी, नंदी आपकी शिकायत करेंगे भी तो मैं आपकी ही बात मानूँगा।”

     

    पार्वती जी ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “सच?”

     

    “सच।”

     

    नंदी ने महादेव की ओर देखा।

     

    महादेव बोले,

     

    “नंदी, आज से तुम्हें देवी की अनुमति के बिना मुझे कहीं भी ले जाने की जरूरत नहीं।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    “मैंने ऐसा कब कहा कि नंदी आपको कहीं ले जाते हैं?”

     

    महादेव बोले,

     

    “आपने तो कहा था कि वह हर बार बीच में आ जाते हैं।”

     

    “वो तो मैंने मजाक में कहा था।”

     

    “तो फिर मैं भी मजाक कर रहा था।”

     

    दोनों हँसने लगे।

     

    लेकिन नंदी अचानक महादेव के पास आकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “देखिए, फिर आ गए।”

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, तुम आज सच में मेरी परीक्षा ले रहे हो।”

     

    गणेश जी हँसते हुए बोले,

     

    “पिता, नंदी तो कुछ नहीं कर रहे। असली समस्या तो आप दोनों की नोक-झोंक है।”

     

    कार्तिकेय जी भी वहाँ आ गए।

     

    “क्या हुआ?”

     

    गणेश जी ने कहा,

     

    “आज नंदी माता और पिता के बीच फँस गए हैं।”

     

    कार्तिकेय जी हँस पड़े।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “तुम दोनों हँसो मत।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “देवी, अब तो पूरा परिवार हमारी बात सुन रहा है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “तो अच्छी बात है। सबको पता चले कि आप कितने भोले हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “और सबको यह भी पता चले कि आप कितनी जल्दी नाराज़ हो जाती हैं।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “मैं जल्दी नाराज़ होती हूँ?”

     

    “हाँ।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो फिर आज मैं आपसे बात नहीं करूँगी।”

     

    महादेव ने तुरंत कहा,

     

    “देवी, मैंने तो मजाक किया था।”

     

    पार्वती जी दूसरी तरफ देखने लगीं।

     

    गणेश जी ने धीरे से महादेव से कहा,

     

    “पिता, अब आपको ही संभालना होगा।”

     

    महादेव पार्वती जी के पास गए।

     

    “देवी, क्षमा कीजिए।”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “मैंने मजाक किया था।”

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, अब तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    नंदी माता पार्वती के पास जाकर बैठ गए।

     

    पार्वती जी नंदी को देखकर मुस्कुरा दीं।

     

    महादेव बोले,

     

    “देखा, नंदी ने भी मेरी मदद कर दी।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “नंदी अच्छे हैं, इसलिए।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और मैं?”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “आप भी बुरे नहीं हैं।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    “बस इतना ही?”

     

    “अभी इतना ही।”

     

    फिर माता पार्वती ने नंदी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “नंदी, आज से तुम जब चाहो महादेव के पास आ सकते हो। मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं।”

     

    महादेव बोले,

     

    “और मैं?”

     

    “आपको भी अनुमति है।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    उस दिन कैलाश पर एक छोटी-सी बात ने सबको हँसा दिया। नंदी के कारण शुरू हुई नोक-झोंक आखिर में माता पार्वती और महादेव की मुस्कान में बदल गई।

     

    महादेव ने नंदी को प्यार से देखा और बोले,

     

    “नंदी, आज तुम्हारी वजह से मुझे देवी को मनाने का अवसर मिला।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “और मेरी वजह से आपको यह याद रहा कि मुझे समय देना भी जरूरी है।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “यह बात मैं कभी नहीं भूलूँगा।”

     

    नंदी ने खुशी से अपना सिर झुका दिया।

     

    और कैलाश पर फिर वही शांति लौट आईजहाँ महादेव का भोला स्वभाव, माता पार्वती की प्यारी नाराज़गी और नंदी की भक्ति मिलकर एक ऐसा परिवार बनाते थे, जहाँ छोटी-सी नोक-झोंक भी अंत में प्रेम की मुस्कान बन जाती थी।

  • Dil sabhal ja jara part – 22

    Dil sabhal ja jara part – 22

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 22: “अंत की शुरुआत”

     

    शिमला का अस्पताल रात के तीन बजे भी जगमगा रहा था। इमरजेंसी वार्ड की लाइट्स कड़क थीं, और हवा में दवाइयों और डिसइन्फेक्टेंट की तेज़ महक फैली थी। प्रिया, रिया, राजेश पापा और आदित्य अंकल हॉस्पिटल के गलियारे में दौड़ते हुए आए थे। प्रिया की लाल साड़ी अभी भी पहनी थी, मंगलसूत्र गले में लटक रहा था, लेकिन चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसके हाथ कांप रहे थे, आंखें सूजी हुईं। वो रोते हुए चीख रही थी, “आरव… आरव कहां है?”

     

    रिया उसे सहारा दे रही थी। “प्रिया… शांत हो। वो ठीक होगा।”

     

    राजेश पापा डॉक्टर से बात कर रहे थे। डॉक्टर – मिडिल एज, सफेद कोट, थका हुआ चेहरा – ने गहरी सांस ली। “मिस्टर ठाकुर… बहुत अफसोस की बात है। पेशेंट को हम बचा नहीं पाए। एक्सीडेंट बहुत गंभीर था। कार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। हेड इंजरी, इंटरनल ब्लीडिंग… हमने पूरी कोशिश की, लेकिन…”

     

    प्रिया की चीख गलियारे में गूंज गई। “नहीं! ये झूठ है! आरव… वो मर नहीं सकता! वो मुझसे वादा करके गया था!”

     

    वो डॉक्टर के सामने गिर पड़ी। रिया ने उसे संभाला। राजेश पापा का चेहरा पत्थर हो गया। आदित्य अंकल रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा…”

     

    डॉक्टर ने कहा, “और एक बात… एक्सीडेंट इतना भयानक था कि पेशेंट का चेहरा… पूरी तरह खराब हो गया है। पहचानना मुश्किल है। सिर्फ कपड़ों और कार से हमने कन्फर्म किया। बॉडी… देखना चाहेंगे?”

     

    प्रिया चीखी, “नहीं! मैं नहीं देखूंगी! आरव जिंदा है! वो मुझे छोड़कर नहीं जा सकता!”

     

    लेकिन राजेश पापा ने कहा, “देखना पड़ेगा।”

     

    वे सब मोर्चरी की ओर गए। ठंडी, सफेद जगह। एक बॉडी ट्रॉली पर पड़ी थी, सफेद चादर से ढकी। डॉक्टर ने चादर हटाई। चेहरा… कुचला हुआ, खून से सना, पहचान के बाहर। सिर्फ शेरवानी के टुकड़े, पगड़ी का हिस्सा।

     

    प्रिया ने देखा और बेहोश हो गई। रिया ने पकड़ा। “प्रिया!”

     

    राजेश पापा रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा…”

     

    आदित्य अंकल ने चादर फिर ढकी। “ये आरव है।”

     

    सब रो रहे थे। प्रिया को व्हीलचेयर पर बिठाया गया। वो बुदबुदा रही थी, “आरव… तुम वादा करके गए थे। आज हमारी पहली रात थी। तुम मुझे छोड़कर कैसे चले गए?”

     

    रिया रोते हुए बोली, “प्रिया… संभल। आरव भैया… वो हमें देख रहे होंगे।”

     

    घर लौटे। ठाकुर हाउस अब सूना लग रहा था। प्रिया अपने कमरे में थी – वही कमरा जो कल तक खुशियों से भरा था। अब वो बिस्तर पर लेटी रो रही थी। “आरव… तुम झूठे हो। वादा किया था ना… हमेशा साथ रहने का।”

     

    रिया उसके पास बैठी। “प्रिया… भगवान की मर्जी। लेकिन आरव भैया की आत्मा को शांति मिलेगी अगर तू स्ट्रॉन्ग रहेगी।”

     

    प्रिया ने कहा, “रिया… वो कॉल… वो कुछ गलत था। आरव परेशान था। किसी ने बुलाया था उसे।”

     

    राजेश पापा कमरे में आए। “प्रिया बेटी… आरव का फोन मिला है कार में। अनजान कॉल्स थे। पुलिस जांच कर रही है।”

     

    प्रिया उठी। “पापा… ये एक्सीडेंट नहीं। मर्डर है। कोई साजिश है।”

     

    लेकिन सब थके हुए थे। रात गुजर गई। सुबह हुई। अंतिम संस्कार की तैयारियां। प्रिया सफेद साड़ी में। चेहरा सूजा हुआ। वो अर्थी के पास खड़ी थी। “आरव… तुम चले गए। मुझे अकेला छोड़कर।”

     

    अग्नि जली। सब रो रहे थे। प्रिया ने चंदन की लकड़ी डाली। “आरव… मैं तुम्हारे बिना कैसे जिऊंगी?”

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल – “क्या सच में आरव था वो? चेहरा… पहचान नहीं हो रही थी।”

     

     

     

    ठाकुर हाउस अब सूना और उदास लग रहा था। वो घर जो कल तक शादी की रौनक से गूंज रहा था, आज मातम में डूबा हुआ था। दीवारों पर अभी भी फूलों की मालाएं लटक रही थीं, लेकिन उनकी खुशबू अब दर्द की तरह चुभ रही थी। हॉल में आरव की बड़ी सी फोटो लगी थी – शादी वाली, मुस्कुराते हुए। उसके सामने अगरबत्ती जल रही थी, और फूल चढ़ाए गए थे। प्रिया सफेद साड़ी में, सिर पर पल्लू, फोटो के सामने बैठी थी। उसकी आंखें सूजी हुईं, चेहरा सफेद, होंठ कांप रहे थे। वो घंटों से वहीं बैठी थी, जैसे कोई प्रतिमा। हाथ में आरव की शेरवानी का एक टुकड़ा था – वो जो एक्सीडेंट से बचकर मिला था। वो उसे छाती से लगाए बैठी थी, आंसू लगातार बह रहे थे, लेकिन आवाज नहीं निकल रही थी। अंदर से वो पूरी तरह टूट चुकी थी। “आरव… तुम चले गए। मुझे अकेला छोड़कर। हमारी शादी… हमारी पहली रात… सब अधूरा रह गया।”

     

    रिया उसके पास बैठी थी। उसकी आंखें भी लाल थीं, लेकिन वो खुद को संभाल रही थी – प्रिया के लिए। वो प्रिया का हाथ थामे थी। “प्रिया… कुछ खा ले। कल से कुछ नहीं खाया तूने।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। आवाज नहीं निकली। सिर्फ आंसू। रिया की आंखें भी भर आईं। “आरव भैया… वो हमें देख रहे हैं। वो नहीं चाहेंगे कि तू ऐसे टूट जाए।”

     

    लेकिन प्रिया का दिल मान नहीं रहा था। वो फोटो को देख रही थी। “रिया… वो झूठ बोलकर गया था। कहा था काम का कॉल। लेकिन वो… वो किसी खतरे में गया। और मैं रोक नहीं पाई।”

     

    आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) कमरे में आए। उनका चेहरा उदास था, लेकिन आंखों में दृढ़ता। वो प्रिया के पास बैठे। “बेटी… मैं जानता हूं दर्द क्या होता है। रानी को खोया था मैंने। लेकिन जिंदगी रुकती नहीं। तू मेरे साथ मुंबई चल। वहां नई शुरुआत करेंगे। मैं अकेला हूं, तू अकेली। साथ रहेंगे।”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। आंखें नम, लेकिन आवाज में कमजोरी। “पापा… मैं यहां से नहीं जा सकती। ये घर… आरव का घर है। यहां उसकी हर याद है। मैं कैसे छोड़ दूं?”

     

    आदित्य अंकल ने उसका कंधा थामा। “बेटी… यादें दिल में रहती हैं। यहां रहकर तू खुद को और दुख देगी। मुंबई में नया जीवन। मैं तेरी देखभाल करूंगा। तू मेरी इकलौती बेटी है।”

     

    प्रिया रो पड़ी। “पापा… मैं टूट गई हूं। आरव के बिना… कुछ नहीं बचा। लेकिन यहां उसकी खुशबू है, उसकी यादें हैं। मैं नहीं जा पाऊंगी।”

     

    राजेश पापा (आरव के पिता) कमरे में आए। उनका चेहरा बुझा हुआ था। वो प्रिया के सामने बैठे। “प्रिया बेटी… आदित्य जी सही कह रहे हैं। यहां रहकर तू खुद को सजा देगी। आरव नहीं चाहेगा कि तू ऐसे जिए।”

     

    प्रिया ने राजेश पापा की ओर देखा। आंसू बह रहे थे। “पापा… आप भी मुझे छोड़ देंगे? ये घर… आरव का घर। मैं अकेली कैसे रहूंगी?”

     

    राजेश पापा की आंखें भर आईं। वो प्रिया को गले लगा लिया। “बेटी… तू मेरी बेटी है। हमेशा रहेगी। लेकिन आदित्य जी तेरे असली पिता हैं। उनके साथ जा। नई जिंदगी शुरू कर। आरव की आत्मा को शांति मिलेगी।”

     

    प्रिया सिसकियां ले रही थी। “पापा… मैं अकेली नहीं जा सकती। रिया… रिया भी मेरे साथ जाएगी। वो भी टूट गई है। आरव उसका भी भाई था। वो बाहर से मजबूत दिखाती है, लेकिन अंदर से… वो भी रो रही है हर रात।”

     

    सबने रिया की ओर देखा। रिया की आंखें नीची थीं। वो चुप थी, लेकिन कंधे कांप रहे थे। राजेश पापा ने रिया के पास जाकर कहा, “रिया बेटी… सच्च है?”

     

    रिया ने सिर उठाया। आंसू बह रहे थे। “पापा… हां। आरव भैया मेरे भी भाई थे। प्रिया की तरह। मैं मजबूत दिखाती हूं, लेकिन अंदर से… सब खाली हो गया।”

     

    राजेश पापा ने रिया को गले लगाया। “बेटी… अगर प्रिया जाना चाहती है तो तू भी जा। दोनों साथ रहोगी। मैं अकेला रह लूंगा। लेकिन तुम्हारी खुशी महत्वपूर्ण है।”

     

    प्रिया ने रिया का हाथ थामा। “रिया… चल ना। मुंबई। नई शुरुआत। यहां हर कोना आरव की याद दिलाता है। हम साथ रहेंगे।”

     

    रिया ने प्रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। “हां प्रिया… चलते हैं। लेकिन दिल यहां रह जाएगा।”

     

    आदित्य अंकल ने मुस्कुराने की कोशिश की। “बेटियां… मैं खुश हूं। मुंबई में हमारा घर तुम्हारा घर है।”

     

    राजेश पापा ने कहा, “ठीक है। पैकिंग शुरू करो। मैं टिकट बुक करवाता हूं।”

     

    प्रिया उठी। कमरे में गई। आरव की फोटो देखी। “आरव… मैं जा रही हूं। लेकिन तू मेरे दिल में है। हमेशा।”

     

    रिया ने सामान पैक करना शुरू किया। दोनों साथ थीं। टूटे हुए, लेकिन एक-दूसरे का सहारा।

     

    घर अब और सूना हो गया। राजेश पापा अकेले हॉल में बैठे। आरव की फोटो देख रहे थे। “आरव… प्रिया… माफ करना। मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”

     

    प्रिया और रिया मुंबई जाने वाली थीं। नई जिंदगी। लेकिन दिलों में आरव की याद हमेशा रहेगी।

     

  • हिमालय की शान भोले बाबा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    हिमालय का रखवाला भोले बाबा

     

    हिमालय की ऊंची पहाड़ियों के बीच एक गांव था शिवधाम। गांव छोटा था, लेकिन वहां रहने वाले लोगों की आस्था बहुत बड़ी थी। गांव के चारों तरफ बर्फीले पहाड़ थे और सबसे ऊंची चोटी के पास एक पुराना शिव मंदिर था।

     

    लोग मानते थे कि उस मंदिर में विराजमान भोलेनाथ ही पूरे हिमालय की रक्षा करते हैं।

     

    मंदिर के बारे में एक पुरानी बात भी कही जाती थी।

     

    जब तक मंदिर की घंटी अपने आप बजती रहेगी, तब तक गांव पर कोई बड़ा संकट नहीं आएगा।

     

    लेकिन पिछले कुछ दिनों से मंदिर की घंटी बिल्कुल शांत थी।

     

    गांव का बूढ़ा पुजारी देवदत्त इस बात को लेकर परेशान था।

     

    एक सुबह गांव के कुछ लोग मंदिर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि मंदिर के आसपास की बर्फ पर अजीब से पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    देवदत्त ने निशानों को ध्यान से देखा।

     

    “ये इंसान के पैरों के निशान नहीं हैं,” उसने धीमे से कहा।

     

    गांव का मुखिया बोला, “फिर किसके हैं?”

     

    देवदत्त ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस शिवलिंग की तरफ देखा और हाथ जोड़ लिए।

     

    उसी दिन गांव में एक और अजीब घटना हुई।

     

    गांव की सबसे पुरानी नदी अचानक बहुत कम हो गई।

     

    लोग घबरा गए।

     

    अगर नदी का पानी इसी तरह कम होता रहा तो गांव में पीने के पानी की भी समस्या हो सकती थी।

     

    मुखिया ने गांव वालों की बैठक बुलाई।

     

    एक आदमी बोला, “हमें नीचे वाले गांव में जाकर पानी मांगना पड़ेगा।”

     

    दूसरा बोला, “लेकिन वहां तक जाने वाला रास्ता तो बर्फ से बंद है।”

     

    तभी एक बूढ़ी महिला ने कहा, “ये सब सामान्य नहीं है। जरूर हिमालय हमसे नाराज है।”

     

    देवदत्त ने उसकी बात सुनकर कहा, “हिमालय नाराज नहीं होता। लेकिन प्रकृति हमें चेतावनी जरूर देती है।”

     

    उसी रात देवदत्त मंदिर में अकेला बैठा था।

     

    उसने दीपक जलाया और शिवलिंग के सामने बैठकर कहा, “भोलेनाथ, अगर कोई संकट आने वाला है तो मुझे संकेत दीजिए।”

     

    कुछ देर तक मंदिर में बिल्कुल शांति रही।

     

    फिर अचानक मंदिर की घंटी हिली।

     

    देवदत्त ने सिर उठाया।

     

    घंटी एक बार बजी।

     

    फिर दूसरी बार।

     

    और फिर तीसरी बार।

     

    देवदत्त की आंखों में चिंता उतर आई।

     

    वह तुरंत मंदिर से बाहर निकला।

     

    आसमान बिल्कुल साफ था।

     

    हवा भी नहीं चल रही थी।

     

    फिर घंटी कैसे बज रही थी?

     

    अचानक उसे दूर पहाड़ की तरफ एक हल्की रोशनी दिखाई दी।

     

    देवदत्त उस दिशा में बढ़ने लगा।

     

    जैसे-जैसे वह आगे गया, रोशनी साफ होती गई।

     

    वहां एक साधु चट्टान पर बैठा था।

     

    लंबे बाल, माथे पर भस्म और गले में रुद्राक्ष।

     

    देवदत्त ने हाथ जोड़कर पूछा, “महाराज, आप इतनी रात में यहां?”

     

    साधु ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराया।

     

    “जिसे हिमालय बुलाता है, वह रात-दिन नहीं देखता।”

     

    देवदत्त चौंक गया।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    साधु ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस सामने की पहाड़ी की तरफ इशारा किया।

     

    “कल सूरज निकलने से पहले गांव के लोगों को ऊंची जगह पहुंचा देना।”

     

    देवदत्त घबरा गया।

     

    “क्यों? क्या होने वाला है?”

     

    साधु ने कहा, “पहाड़ कभी बिना कारण शांत नहीं होता।”

     

    इतना कहकर साधु उठ खड़ा हुआ।

     

    देवदत्त ने दो कदम आगे बढ़कर उसे रोकना चाहा।

     

    लेकिन वहां कोई नहीं था।

     

    अगली सुबह देवदत्त ने गांव वालों को सारी बात बताई।

     

    कुछ लोगों ने उसकी बात पर विश्वास किया, कुछ ने मजाक उड़ाया।

     

    मुखिया ने कहा, “बाबा, हम बिना वजह गांव छोड़कर कहां जाएंगे?”

     

    देवदत्त बोला, “मैं नहीं जानता वह साधु कौन था। लेकिन उसकी बात में मुझे भरोसा है।”

     

    गांव के लोग आखिरकार मंदिर के पास वाली ऊंची जगह पर जाने लगे।

     

    कुछ लोग अपने घर छोड़ने को तैयार नहीं थे।

     

    तभी दोपहर के समय पहाड़ के अंदर से जोरदार आवाज आई।

     

    धरती हिलने लगी।

     

    लोग घबरा गए।

     

    ऊपर की बर्फ खिसकने लगी।

     

    देवदत्त चिल्लाया, “सब लोग पीछे हटो!”

     

    कुछ ही पलों में पहाड़ की एक बड़ी चट्टान टूटकर नीचे गिरी।

     

    उसके साथ बर्फ का तेज बहाव भी नीचे आने लगा।

     

    गांव वाले चीखने लगे।

     

    लेकिन जिस दिशा में बर्फ बढ़ रही थी, वहां अब कोई इंसान नहीं था।

     

    गांव बच गया।

     

    कुछ देर बाद सब शांत हो गया।

     

    लोग एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    मुखिया की आंखों में पछतावा था।

     

    वह देवदत्त के पास आया और बोला, “आप सही थे।”

     

    देवदत्त ने कहा, “मैं सही नहीं था। भोलेनाथ ने हमें पहले ही सावधान कर दिया था।”

     

    सभी लोग मंदिर की तरफ चल पड़े।

     

    लेकिन वहां पहुंचकर वे हैरान रह गए।

     

    मंदिर की बंद घंटी लगातार बज रही थी।

     

    कोई उसे छू भी नहीं रहा था।

     

    मुखिया ने हाथ जोड़कर कहा, “भोले बाबा, आपने आज हमारे गांव को बचा लिया।”

     

    तभी मंदिर के पीछे से एक छोटी बच्ची की आवाज आई।

     

    “पंडित जी!”

     

    देवदत्त ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    वही बच्ची एक पत्थर के पास खड़ी थी।

     

    उसने वहां से एक छोटी-सी त्रिशूल जैसी लकड़ी उठाई थी।

     

    उस पर ताजा बेलपत्र रखा था।

     

    देवदत्त ने उसे देखते ही आंखें बंद कर लीं।

     

    उसे रात वाला साधु याद आ गया।

     

    वह धीरे से बोला, “वो आए थे…”

     

    मुखिया ने पूछा, “कौन?”

     

    देवदत्त ने शिवलिंग की तरफ देखते हुए कहा

    “हमारे भोले बाबा।”

     

    सभी लोग चुप हो गए।

     

    उसी समय मंदिर के दीपक की लौ अचानक तेज हो गई। किसी ने उसे छुआ नहीं था। मंदिर के भीतर हल्की-सी सुगंध फैल गई और बाहर खड़े लोगों को ऐसा लगा जैसे पहाड़ों के बीच से किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा हो“डरो मत।”

     

    गांव की बूढ़ी महिला की आंखों से आंसू निकल आए। उसने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा ने हमें सिर्फ बचाया नहीं, हमें समझाया भी है कि प्रकृति का सम्मान करना ही उनकी पूजा है।”

     

    उस दिन से गांव वालों ने नदी और पहाड़ों को गंदा करना छोड़ दिया। वे जरूरत से ज्यादा पेड़ काटने से भी बचने लगे। हर परिवार ने मिलकर मंदिर के आसपास सफाई रखनी शुरू कर दी।

     

    किसी ने उस साधु को दोबारा नहीं देखा।

     

    लेकिन उसके बाद गांव में जब भी कोई बड़ा संकट आता, मंदिर की घंटी अपने आप बज उठती।

     

    और गांव के लोग समझ जाते कि हिमालय का रखवाला उन्हें सावधान कर रहा है।

     

    देवदत्त अक्सर बच्चों से कहता था

     

    “भोलेनाथ हमेशा चमत्कार दिखाकर रक्षा नहीं करते। कभी संकेत देकर, कभी किसी इंसान के रूप में और कभी हमारी अपनी समझ के जरिए हमें बचाते हैं।”

     

    फिर वह मंदिर की तरफ देखकर मुस्कुराता और कहता

     

    “हिमालय कितना भी ऊंचा क्यों न हो, उसकी सबसे बड़ी शान उसकी बर्फीली चोटियां नहीं… बल्कि उन चोटियों पर विराजमान हमारे भोले बाबा हैं।”

     

    और हर शाम पूरे गांव में एक ही आवाज गूंजती

    “हर हर महादेव!”

  • Dil sabhal ja jara part – 21

    Dil sabhal ja jara part – 21

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    Part- 21: “टूटते रिश्ते का दर्द”

    आरव ठाकुर हाउस के गलियारे में तेज़ कदमों से चल रहा था। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि लगता था छाती से बाहर निकल आएगी। वो कॉल… वो लिफाफा… वो शब्द – “प्रिया तेरी बहन है। असली में। डायरी का राज़ अधूरा था।” उसके दिमाग में बार-बार गूंज रहे थे। वो आदमी कौन था? वो चेहरा… वो आवाज… सब धुंधला था। लेकिन शब्द साफ थे, जैसे चाकू की धार। आरव का चेहरा सफेद पड़ गया था, हाथ कांप रहे थे। वो सीढ़ियां उतरते हुए खुद से बुदबुदाया, “ये नहीं हो सकता। झूठ है। सब झूठ। प्रिया… मेरी प्रिया… मेरी पत्नी। वो मेरी बहन नहीं हो सकती।”

    लेकिन वो लेटर… वो फोटो… सब कुछ इतना असली लग रहा था। आरव कार की ओर बढ़ा। बाहर रात का सन्नाटा था, बर्फ हल्की-हल्की गिर रही थी, जैसे आसमान भी उसके दर्द पर रो रहा हो। वो कार में बैठा, इंजन स्टार्ट किया। दिमाग में तूफान था। “अगर ये सच है तो… हमारी शादी… हमारा प्यार… सब गलत। मैंने क्या कर दिया? प्रिया… वो निर्दोष है। वो नहीं जानती। मैं उसे कैसे बताऊं? कैसे सहूं?”

    आरव ने कार तेज़ चलाई। सड़कें खाली थीं, शिमला की पहाड़ी रोड्स पर बर्फ की पतली परत थी, जो गाड़ी के टायरों से चिपक रही थी। वो स्पीड बढ़ाता गया – 60, 80, 100। हवा कान में सीटी बजा रही थी। उसके दिमाग में फ्लैशबैक्स आने लगे। बचपन की वो शामें, जब प्रिया छोटी सी थी। “भैया… मुझे गोद लो ना!” वो हंसती, दौड़ती। आरव उसे उठाता, घुमाता। “प्रिया, तू मेरी छोटी राजकुमारी है।” फिर वो रात – एक्सीडेंट की खबर। “प्रिया लापता है।” सालों का दर्द, इंतजार। फिर प्रिया की वापसी। “आरव… मैं तेरी बहन हूं?” नहीं, वो राज़ खुला – खून का रिश्ता नहीं। फिर प्यार… वो किस, वो स्पर्श, वो रातें। “प्रिया… तू मेरी है।” लेकिन अब? “अगर वो मेरी असली बहन है तो… मैंने क्या कर दिया? हमने क्या कर दिया?”

    आरव की आंखें नम हो गईं। वो चीखा, “नहीं! ये झूठ है!” कार और तेज़। पहाड़ी मोड़ आ रहा था, लेकिन वो ब्रेक नहीं लगाया। दिमाग में सिर्फ एक सवाल – “क्या करूं? प्रिया से कहूं? या चुप रहूं? शादी हो गई। वो मेरी पत्नी है। लेकिन अगर सच है तो… गलत है। पाप है। मैं उसे दुख नहीं दे सकता। खुद को मार लूं? या भाग जाऊं?” वो रो रहा था। आंसू गालों पर बह रहे थे, कार की विंडस्क्रीन धुंधली हो रही थी। “प्रिया… सॉरी। मैं तुझे खुश रखना चाहता था। लेकिन अब…”

    वहीं कमरे में प्रिया बिस्तर पर बैठी थी। लाल साड़ी अभी भी पहनी थी, मेहंदी की खुशबू कमरे में फैली हुई थी। वो इंतजार कर रही थी – आरव का। उसका दिल उछल रहा था। “आरव… जल्दी आओ ना। आज हमारी पहली रात है।” लेकिन समय गुजर रहा था। घड़ी की सुई आगे बढ़ रही थी। प्रिया का मन घबरा रहा था। “क्यों इतनी देर? वो कॉल… कौन था? आरव का चेहरा… कुछ गलत लग रहा था।” वो उठी, खिड़की के पास गई। बाहर बर्फ गिर रही थी। दिल में एक अजीब सी बेचैनी। “कुछ गलत होने वाला है। मुझे पता है। आरव… कहां हो तुम?”

    प्रिया ने फोन उठाया। आरव को कॉल किया। रिंग जा रही थी, लेकिन कोई जवाब नहीं। “आरव… पिक करो ना।” बेचैनी बढ़ गई। वो कमरे में चक्कर लगाने लगी। मंगलसूत्र को छू रही थी। “आरव… तुम ठीक हो ना? वो कॉल… काम का था? लेकिन इतनी रात को कौन काम?” मन में बुरे ख्याल आने लगे। “कहीं कोई खतरा तो नहीं? विक्रम? या कोई और?” प्रिया की सांस तेज़ हो गई। वो दरवाजे की ओर गई। “आरव… जल्दी आओ। मुझे डर लग रहा है।”

    आरव की कार अब पहाड़ी रोड पर थी। स्पीड 120। मोड़ आया। वो ब्रेक लगाने की कोशिश की, लेकिन दिमाग कहीं और था। “प्रिया… अगर सच है तो मैं उसे देख नहीं सकता। मैं खुद को सजा दूंगा।” कार स्लिप हुई। बर्फ की वजह से। वो स्टियरिंग संभालने की कोशिश की, लेकिन देर हो गई। कार सड़क से उतरी, पेड़ से टकराई। धमाका। कांच टूटा, कार पलटी। आरव का सिर स्टीयरिंग से टकराया। खून बहने लगा। दर्द। अंधेरा। “प्रिया… सॉरी…”

    प्रिया कमरे में थी। फोन फिर बजाया। कोई जवाब नहीं। दिल जोरों से धड़क रहा था। “आरव… कुछ गलत हुआ है। मुझे पता है।” वो बाहर निकली। रिया के कमरे में गई। “रिया… उठ। आरव… वो कहीं गया है।”

    रिया उठी। “क्या? कहां?”

    प्रिया रो रही थी। “पता नहीं। एक कॉल आया था। उसके बाद चला गया। फोन नहीं उठा रहा।”

    रिया ने कहा, “चल, पापा को बताते हैं।”

    लेकिन तभी फोन आया। हॉस्पिटल से। “आरव ठाकुर का एक्सीडेंट हो गया है। जल्दी आएं।”

    प्रिया का दिल बैठ गया। “आरव…”

     

  • महादेव माता पार्वती की नोंक झोंक

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भक्त के सामने महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक

     

    कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। चारों तरफ शांति थी। महादेव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती पास ही बैठकर फूलों की माला बना रही थीं। नंदी थोड़ी दूरी पर बैठे थे और गणेश जी अपने काम में व्यस्त थे।

     

    तभी कैलाश की ओर एक गरीब भक्त आया। उसका नाम माधव था। वह बहुत दूर एक छोटे से गाँव से पैदल चलकर आया था। उसके कपड़े साधारण थे और हाथ में फूलों की छोटी-सी गठरी थी।

     

    माधव कैलाश के पास पहुँचकर हाथ जोड़कर बोला,

     

    “हे महादेव, मैं आपके दर्शन करने आया हूँ। मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है, बस ये फूल हैं।”

     

    वह आगे बढ़ा और फूल महादेव के चरणों में रख दिए।

     

    महादेव ने आँखें खोलीं और प्रेम से उसकी ओर देखा।

     

    “माधव, तुम्हारे फूल नहीं, तुम्हारी श्रद्धा हमारे लिए मूल्यवान है।”

     

    माधव की आँखें भर आईं।

     

    “प्रभु, मुझे लगा था कि मेरे जैसे गरीब आदमी की भेंट शायद आपको पसंद नहीं आएगी।”

     

    तभी माता पार्वती मुस्कुराते हुए बोलीं,

     

    “महादेव को भेंट की कीमत नहीं, मन की सच्चाई दिखाई देती है।”

     

    माधव ने माता पार्वती को प्रणाम किया।

     

    “माता, मुझे आशीर्वाद दीजिए।”

     

    “सदा प्रसन्न रहो।”

     

    माधव वहीं बैठ गया। वह कुछ देर महादेव और माता पार्वती को देखता रहा।

     

    तभी माता पार्वती ने महादेव की ओर देखा।

     

    “महादेव, आपने आज सुबह कुछ खाया?”

     

    महादेव ने शांत स्वर में कहा,

     

    “नहीं देवी।”

     

    पार्वती जी ने भौंहें चढ़ाईं।

     

    “फिर से नहीं खाया?”

     

    “ध्यान में समय का पता नहीं चला।”

     

    “आपको ध्यान के अलावा कुछ याद भी रहता है?”

     

    महादेव चुप हो गए।

     

    माधव यह देखकर थोड़ा हैरान हुआ।

     

    उसे लगा था कि कैलाश पर सब कुछ बहुत गंभीर और दिव्य होगा, लेकिन यहाँ तो माता पार्वती महादेव को उसी तरह डाँट रही थीं जैसे घर में कोई अपने बहुत करीबी को डाँटता है।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “मैंने सुबह ही कहा था कि समय पर भोजन कर लीजिए।”

     

    महादेव बोले,

     

    “देवी, अभी तो समय है।”

     

    “आपके लिए हर समय ‘अभी तो समय है’ होता है।”

     

    नंदी ने अपना सिर नीचे कर लिया ताकि उनकी हँसी दिखाई न दे।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, तुम हँस रहे हो?”

     

    नंदी तुरंत सीधा बैठ गया।

     

    माधव से रहा नहीं गया। वह हल्का-सा मुस्कुरा दिया।

     

    पार्वती जी ने उसे देख लिया।

     

    “माधव, तुम भी हँस रहे हो?”

     

    माधव घबरा गया।

     

    “नहीं माता… मैं तो बस…”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “देवी, भक्त को मत डराइए।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “मैं इसे क्यों डराऊँगी? मैं तो बस पूछ रही हूँ।”

     

    माधव ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “माता, मुझे पहली बार देखकर ऐसा लग रहा है कि आप दोनों के बीच भी छोटी-छोटी बातों पर नोक-झोंक होती है।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “नोक-झोंक?”

     

    पार्वती जी तुरंत बोलीं,

     

    “हाँ, और इसमें गलत क्या है?”

     

    महादेव मुस्कुराकर बोले,

     

    “कुछ भी गलत नहीं।”

     

    माधव ने आश्चर्य से पूछा,

     

    “लेकिन माता, आप तो महादेव को डाँट रही थीं।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    “बेटा, जिसे हम अपना मानते हैं, उसकी चिंता भी तो करते हैं।”

     

    माधव चुप हो गया।

     

    तभी महादेव बोले,

     

    “और कभी-कभी देवी को चिंता ज्यादा हो जाती है।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत उनकी ओर देखा।

     

    “ज्यादा?”

     

    महादेव समझ गए कि बात फिर बिगड़ सकती है।

     

    “मेरा मतलब था… आपकी चिंता बिल्कुल सही है।”

     

    माधव फिर मुस्कुरा दिया।

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “देखा माधव? बात बदलने में इन्हें कितना समय नहीं लगता।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “देवी, भक्त के सामने मेरी शिकायतें मत कीजिए।”

     

    “क्यों? भक्त को भी तो पता चले कि महादेव कितने लापरवाह हैं।”

     

    माधव हँसने लगा।

     

    महादेव ने उसे देखा।

     

    “तुम भी मेरी बात सुनकर हँस रहे हो?”

     

    माधव ने सिर झुका लिया।

     

    “प्रभु, क्षमा कीजिए।”

     

    महादेव बोले,

     

    “नहीं माधव, हँसो। आज कैलाश पर बहुत दिनों बाद इतनी खुलकर हँसी आई है।”

     

    माता पार्वती भी मुस्कुरा उठीं।

     

    कुछ देर बाद माधव ने अपनी समस्या बताई।

     

    “माता, प्रभु, मेरे गाँव में इस साल फसल खराब हो गई है। घर में बूढ़ी माँ हैं। मैं बहुत परेशान होकर आपके पास आया हूँ। मैं धन नहीं माँगता। बस इतना चाहता हूँ कि मेरी माँ भूखी न रहे।”

     

    महादेव ने उसकी ओर देखा।

     

    “माधव, तुम्हारी माँ की सेवा ही तुम्हारी सबसे बड़ी पूजा है।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “और याद रखना, किसी की मदद करने के लिए हमेशा धन की जरूरत नहीं होती। मेहनत और सच्चे मन से किया काम भी बहुत बड़ा सहारा बन सकता है।”

     

    माधव ने सिर झुका लिया।

     

    “लेकिन माता, मेरे पास तो…”

     

    महादेव ने उसे रोकते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पास मेहनत करने की शक्ति है।”

     

    माधव ने पूछा,

     

    “क्या इससे मेरी समस्या हल हो जाएगी?”

     

    महादेव बोले,

     

    “रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन अगर मन सच्चा हो तो रास्ता मिलता जरूर है।”

     

    तभी पार्वती जी ने महादेव की ओर देखा।

     

    “और आप इसे कोई मदद नहीं करेंगे?”

     

    महादेव बोले,

     

    “मैं इसे आशीर्वाद दे चुका हूँ।”

     

    “सिर्फ आशीर्वाद?”

     

    “देवी…”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मेरा मतलब है, इसे ऐसा विश्वास दीजिए कि यह अपने गाँव जाकर हार न माने।”

     

    महादेव ने माधव की ओर देखा।

     

    “तुम्हें मेरी बात याद रखनी होगी। अपने गाँव लौटो। अपनी माँ की सेवा करो। खेत में फिर मेहनत करो। गाँव के दूसरे लोगों के साथ मिलकर काम करो। जो तुम्हारे पास है, उसे छोटा मत समझो।”

     

    माधव की आँखों में उम्मीद लौट आई।

     

    “प्रभु, मैं ऐसा ही करूँगा।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

     

    “और हाँ, अपनी माँ को कभी अकेला मत समझने देना।”

     

    “जी माता।”

     

    माधव ने दोनों को प्रणाम किया।

     

    फिर उसने धीरे से पूछा,

     

    “माता, एक बात पूछूँ?”

     

    “पूछो।”

     

    “क्या आप दोनों हमेशा ऐसे ही एक-दूसरे से नोक-झोंक करते हैं?”

     

    महादेव मुस्कुरा दिए।

     

    पार्वती जी ने भी हँसते हुए कहा,

     

    “हाँ।”

     

    माधव ने पूछा,

     

    “फिर कभी नाराज़गी ज्यादा नहीं बढ़ती?”

     

    महादेव बोले,

     

    “जहाँ प्रेम हो, वहाँ नाराज़गी टिकती नहीं।”

     

    पार्वती जी ने उनकी ओर देखकर कहा,

     

    “लेकिन कभी-कभी इन्हें मनाने में काफी मेहनत करनी पड़ती है।”

     

    महादेव ने कहा,

     

    “और कभी-कभी देवी को मनाने में पूरा कैलाश भी कम पड़ जाता है।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    नंदी भी खुशी से सिर हिलाने लगे।

     

    माधव ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “आज मैं यहाँ एक समस्या लेकर आया था, लेकिन वापस एक सीख लेकर जा रहा हूँ।”

     

    महादेव ने पूछा,

     

    “क्या सीख?”

     

    माधव बोला,

     

    “कि भगवान से प्रेम करने का मतलब सिर्फ उनसे माँगना नहीं है। और परिवार में छोटी-सी नोक-झोंक हो जाए तो उसे मन में नहीं रखना चाहिए।”

     

    माता पार्वती ने प्रसन्न होकर कहा,

     

    “तुमने बिल्कुल सही समझा।”

     

    माधव वापस जाने लगा।

     

    महादेव ने उसे आशीर्वाद दिया।

     

    “जाओ माधव। तुम्हारा मन मजबूत रहे।”

     

    पार्वती जी ने भी कहा,

     

    “और अपनी माँ का ध्यान रखना।”

     

    माधव मुस्कुराते हुए कैलाश से नीचे उतर गया।

     

    उसके जाने के बाद महादेव ने पार्वती जी की ओर देखा।

     

    “देवी, अब तो आप प्रसन्न हैं?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

     

    “हाँ।”

     

    “तो क्या अब मैं ध्यान कर सकता हूँ?”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

     

    “पहले भोजन कीजिए।”

     

    महादेव कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “मैं भूल ही गया था।”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मुझे पता था।”

     

    नंदी फिर मुस्कुरा दिए।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, तुम फिर हँस रहे हो?”

     

    और इस बार पूरा कैलाश जैसे उनकी हँसी से गूँज उठा।

     

    क्योंकि महादेव और माता पार्वती की नोक-झोंक में भी प्रेम था, और उस दिन एक भक्त ने सीख लिया था कि सच्चा परिवार वही है जहाँ नाराज़गी के बाद भी अपनापन कभी कम नहीं होता।

  • मां पार्वती की नाराज़गी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    ❤️ रूठी पार्वती और भोले महादेव

     

    कैलाश पर्वत पर उस दिन सब कुछ शांत था। महादेव अपने स्थान पर बैठे ध्यान कर रहे थे और नंदी पास ही बैठे थे। गणेश जी भी अपने काम में लगे हुए थे। तभी माता पार्वती वहाँ आईं। उनके चेहरे पर हल्की नाराज़गी थी।

     

    महादेव ने आँखें खोलीं और उन्हें देखते ही बोले,

    “आइए देवी।”

     

    पार्वती जी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह चुपचाप पास से निकल गईं।

     

    महादेव ने नंदी की तरफ देखा।

     

    “नंदी, देवी हमसे नाराज़ हैं क्या?”

     

    नंदी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    महादेव ने कुछ सोचा और फिर बोले,

    “लेकिन क्यों?”

     

    नंदी के पास इसका जवाब नहीं था।

     

    थोड़ी देर बाद महादेव ने पार्वती जी को फिर देखा। वह कैलाश के एक कोने में बैठी थीं और फूलों की माला बना रही थीं।

     

    महादेव उनके पास गए।

     

    “देवी।”

     

    पार्वती जी चुप रहीं।

     

    “आप मुझसे बात नहीं करेंगी?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    महादेव उनके सामने बैठ गए।

     

    “क्या मुझसे कोई गलती हो गई?”

     

    पार्वती जी ने धीरे से कहा,

    “आपको नहीं पता?”

     

    महादेव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    पार्वती जी ने मुँह फेर लिया।

     

    “यही तो बात है।”

     

    महादेव थोड़ा उलझ गए।

     

    “क्या बात?”

     

    “आपको कुछ पता ही नहीं चलता।”

     

    महादेव शांत बैठे रहे।

     

    “देवी, आप बता देंगी तो मुझे पता चल जाएगा।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “अगर हर बात मुझे ही बतानी पड़े तो फिर आपको खुद समझने की जरूरत क्या है?”

     

    महादेव मुस्कुराने लगे।

     

    “आप सही कह रही हैं।”

     

    “अब मुस्कुराइए मत।”

     

    महादेव ने तुरंत अपनी मुस्कान रोक ली।

     

    “ठीक है।”

     

    पार्वती जी फिर फूलों की माला बनाने लगीं।

     

    महादेव कुछ देर उनके पास बैठे रहे। फिर उठकर चले गए।

     

    नंदी ने सोचा कि शायद महादेव अब समझ गए होंगे।

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद महादेव वापस आए।

     

    उनके हाथ में एक सुंदर फूल था।

     

    उन्होंने फूल पार्वती जी की तरफ बढ़ाया।

     

    “देवी, यह आपके लिए।”

     

    पार्वती जी ने फूल देखा।

     

    “फूल देने से गलती खत्म नहीं होगी।”

     

    “तो गलती क्या है?”

     

    पार्वती जी ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको सच में नहीं पता?”

     

    महादेव ने सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    पार्वती जी ने गहरी साँस ली।

     

    “कल मैंने आपसे कहा था कि आज मेरे साथ कुछ समय बिताइए।”

     

    महादेव बोले,

    “हाँ।”

     

    “और आपने क्या कहा था?”

     

    महादेव सोचने लगे।

     

    “मैंने कहा था कि बाद में।”

     

    “और वह ‘बाद में’ कब आया?”

     

    महादेव चुप हो गए।

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “पूरा दिन बीत गया और आपको याद ही नहीं आया।”

     

    महादेव ने धीरे से कहा,

    “देवी, मैं ध्यान में था।”

     

    “मुझे पता है। आप हमेशा ध्यान में रहते हैं।”

     

    “लेकिन…”

     

    “लेकिन क्या?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “मैंने सोचा था कि आप समझ जाएँगी।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

    “और मैं सोच रही थी कि आप समझेंगे।”

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर महादेव बोले,

    “तो हम दोनों ही एक-दूसरे के समझने का इंतजार करते रहे।”

     

    पार्वती जी का चेहरा थोड़ा नरम हुआ।

     

    “शायद।”

     

    महादेव उनके पास बैठ गए।

     

    “देवी, मुझे क्षमा कर दीजिए।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “इतनी आसानी से नहीं।”

     

    “तो क्या करना होगा?”

     

    “आपको खुद पता लगाना होगा।”

     

    महादेव ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर बोले,

    “ठीक है। आज पूरा दिन मैं आपके साथ रहूँगा।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “सच?”

     

    “सच।”

     

    “ध्यान नहीं करेंगे?”

     

    “नहीं।”

     

    “किसी और काम के लिए नहीं जाएंगे?”

     

    “नहीं।”

     

    “नंदी के साथ भी नहीं जाएंगे?”

     

    दूर खड़े नंदी ने यह सुनते ही अपना सिर झुका लिया।

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    “नंदी भी हमारे साथ रहेगा।”

     

    पार्वती जी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    लेकिन तभी महादेव बोले,

    “लेकिन एक बात है।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर आप नाराज़ न होतीं तो मुझे यह सब करने का मौका भी नहीं मिलता।”

     

    पार्वती जी ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “मतलब अब गलती मेरी?”

     

    महादेव तुरंत बोले,

    “नहीं, नहीं। मैंने ऐसा नहीं कहा।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    “आप भी ना, कभी-कभी अपनी बातों में खुद ही फँस जाते हैं।”

     

    महादेव भी मुस्कुराने लगे।

     

    तभी गणेश जी वहाँ आए।

     

    उन्होंने दोनों को साथ बैठे देखा तो बोले,

    “माता, अब आपका गुस्सा खत्म हो गया?”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “अभी थोड़ा बाकी है।”

     

    महादेव ने गणेश जी की तरफ देखा।

     

    “पुत्र, तुम मेरी सहायता करोगे?”

     

    गणेश जी हँसकर बोले,

    “पिता, इस मामले में मैं कुछ नहीं कहूँगा। माता के सामने आपकी कोई नहीं चलती।”

     

    पार्वती जी हँस पड़ीं।

     

    महादेव ने गणेश जी से कहा,

    “तुम भी अपनी माता का पक्ष ले रहे हो?”

     

    गणेश जी बोले,

    “पिता, मैं तो सच का पक्ष ले रहा हूँ।”

     

    “और सच क्या है?”

     

    “यह कि माता आपसे नाराज़ हैं।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

    “यह तो मुझे भी पता है।”

     

    कुछ देर बाद सभी कैलाश के पास बैठे थे। पार्वती जी फूलों की माला बना रही थीं और महादेव उनके लिए फूल चुनकर ला रहे थे।

     

    एक फूल लाकर महादेव ने पूछा,

    “यह अच्छा है?”

     

    पार्वती जी ने देखा।

     

    “हाँ।”

     

    महादेव दूसरा फूल लाए।

     

    “और यह?”

     

    “यह भी अच्छा है।”

     

    महादेव तीसरा फूल लाए।

     

    पार्वती जी ने हँसकर कहा,

    “महादेव, आपको फूल चुनना नहीं आता।”

     

    “तो आप ही चुन लीजिए।”

     

    “नहीं। आज आप चुनेंगे।”

     

    महादेव एक-एक करके फूल लाते रहे।

     

    कुछ देर बाद पार्वती जी ने कहा,

    “अब समझे कि मुझे कल कैसा लगा था?”

     

    महादेव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “हाँ देवी।”

     

    “क्या समझे?”

     

    महादेव ने धीरे से कहा,

    “कभी-कभी जिसे हम बहुत प्रेम करते हैं, उसे हमारी चीजों की नहीं, बस हमारे समय की जरूरत होती है।”

     

    पार्वती जी की आँखों में हल्की चमक आ गई।

     

    “और?”

     

    महादेव बोले,

    “और यह कि प्रेम में बड़ी-बड़ी चीजें जरूरी नहीं होतीं। साथ बैठना भी काफी होता है।”

     

    पार्वती जी मुस्कुरा दीं।

     

    “अब आप समझे।”

     

    महादेव ने हाथ जोड़कर कहा,

    “हाँ देवी।”

     

    पार्वती जी ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “लेकिन एक बात याद रखिएगा।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर अगली बार फिर मुझे यूँ इंतजार करवाया…”

     

    महादेव ने तुरंत पूछा,

    “तो?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “तो मैं आपसे तीन दिन तक बात नहीं करूँगी।”

     

    महादेव ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “तीन दिन?”

     

    गणेश जी हँसने लगे।

     

    नंदी भी खुशी से अपनी पूँछ हिलाने लगे।

     

    महादेव ने कहा,

    “देवी, एक दिन की नाराज़गी ही मेरे लिए बहुत थी। तीन दिन का दंड मत दीजिए।”

     

    पार्वती जी हँसते हुए बोलीं,

    “तो फिर मुझे इंतजार मत करवाइए।”

     

    महादेव ने उनकी तरफ देखकर कहा,

    “वचन है।”

     

    फिर दोनों साथ बैठ गए।

     

    कैलाश की हवा धीरे-धीरे चल रही थी। आसपास शांति थी। महादेव ने पार्वती जी की ओर देखा और मुस्कुराए।

     

    पार्वती जी ने पूछा,

    “अब क्या देख रहे हैं?”

     

    महादेव बोले,

    “सोच रहा हूँ कि आज अगर आप रूठती नहींं, तो मुझे यह याद कैसे रहता कि आपके साथ बिताया हुआ एक छोटा-सा पल भी मेरे लिए कितना खास है।”

     

    पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा,

    “और मुझे यह याद रहेगा कि मेरे भोले महादेव को कभी-कभी बात समझाने के लिए थोड़ा रूठना भी पड़ता है।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    और इस तरह कैलाश पर हुई छोटी-सी नाराज़गी फिर से मुस्कान में बदल गई।

     

    क्योंकि जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ रूठना भी रिश्ता तोड़ने के लिए नहीं होता—बल्कि एक-दूसरे को थोड़ा और समझने के लिए होता है।

  • नन्हे कान्हा की बाल लीलाएं

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ कान्हा और यशोदा मैया की रंगोली

     

    वृंदावन में सुबह होते ही हर तरफ चहल-पहल शुरू हो गई थी। गोपियाँ अपने घरों के बाहर आँगन साफ कर रही थीं। कोई फूलों की माला बना रही थी तो कोई घर के दरवाजे पर सुंदर रंगोली सजा रही थी।

     

    उस दिन नंद भवन के पास रहने वाली गोपी राधिका ने अपने आँगन में बहुत सुंदर रंगोली बनाई थी। उसने कई रंगों से फूल, पत्तियाँ और बीच में एक बड़ा सा मोर बनाया था।

     

    राधिका रंगोली पूरी करके पीछे हटी और खुशी से बोली—

     

    “आज तो मेरी रंगोली सबसे सुंदर लग रही है।”

     

    पास खड़ी दूसरी गोपी ने कहा—

     

    “सच में बहुत सुंदर है। बस इसे कान्हा से बचाकर रखना।”

     

    राधिका का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “अरे हाँ! कान्हा ने देख लिया तो मेरी सारी मेहनत खराब कर देगा।”

     

    उधर थोड़ी दूरी पर खड़े कान्हा अपने दोस्तों के साथ यह बात सुन रहे थे।

     

    कान्हा ने अपने दोस्त से धीरे से कहा—

     

    “तुमने सुना?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “वो कह रही है कि मैं उसकी रंगोली खराब कर दूँगा।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तो क्या करोगे?”

     

    कान्हा ने आँखों में शरारत भरकर कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “तुम्हारे चेहरे से तो लग रहा है कि जरूर कुछ करोगे।”

     

    कान्हा मुस्कुराए और चुप हो गए।

     

    कुछ देर बाद राधिका घर के अंदर चली गई।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उसके आँगन के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने रंगोली को देखा।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    उनके दोस्त भी पास आ गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसे मत छूना। बहुत मेहनत से बनाई है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं खराब थोड़ी करूँगा।”

     

    उन्होंने अपनी छोटी सी उंगली रंग के पास ले जाकर रोक ली।

     

    फिर अचानक उन्होंने रंगोली के बीच एक छोटा सा बांसुरी का निशान बना दिया।

     

    दोस्तों ने मुँह पर हाथ रखकर हँसी रोक ली।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब ये मेरी भी हो गई।”

     

    तभी राधिका बाहर आ गई।

     

    उसने रंगोली देखी।

     

    पहले तो वह चौंकी।

     

    फिर कान्हा को देखकर बोली—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा भागने लगे।

     

    राधिका उनके पीछे दौड़ी।

     

    “रुको! आज तुम्हें नहीं छोड़ूँगी।”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “मैंने रंगोली खराब नहीं की। मैंने तो उसमें बांसुरी बनाई है।”

     

    “तुमने मेरी पूरी रंगोली में अपनी बांसुरी क्यों बना दी?”

     

    “क्योंकि तुमने मोर बनाया था। मोर को भी तो बांसुरी सुननी चाहिए।”

     

    राधिका कुछ बोल नहीं पाई।

     

    पास खड़े बच्चे हँसने लगे।

     

    राधिका ने कहा—

     

    “तुम्हारी बातें सुनकर गुस्सा भी नहीं आता।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो फिर गुस्सा मत करो।”

     

    राधिका ने हाथ में थोड़ा रंग लिया और कान्हा के गाल पर लगा दिया।

     

    “अब बराबर!”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने भी रंग उठाया और राधिका के गाल पर लगा दिया।

     

    अब बाकी बच्चे भी रंग लगाने लगे।

     

    कुछ ही पल में पूरा आँगन रंगों से भर गया।

     

    राधिका की सुंदर रंगोली जरूर खराब हो गई थी, लेकिन आँगन में बच्चों की हँसी गूँज रही थी।

     

    तभी वहाँ यशोदा मैया आ गईं।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    सब बच्चे एकदम शांत हो गए।

     

    यशोदा ने रंगोली की तरफ देखा।

     

    फिर कान्हा की तरफ।

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मैया, मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तो ये रंग तुम्हारे गाल पर कैसे आया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “राधिका ने लगाया।”

     

    राधिका तुरंत बोली—

     

    “पहले कान्हा ने लगाया था!”

     

    यशोदा मुस्कुराने लगीं।

     

    उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़ा।

     

    “चलो मेरे साथ।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “घर।”

     

    “क्यों?”

     

    “तुम्हारे कपड़े देखे हैं?”

     

    कान्हा ने नीचे देखा।

     

    उनका पूरा कुर्ता रंगों से भर गया था।

     

    वह हँसने लगे।

     

    “मैया, आज तो मैं बहुत सुंदर लग रहा हूँ।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ, बिल्कुल रंगों की पोटली जैसे।”

     

    कान्हा हँसते हुए उनके साथ चल दिए।

     

    घर पहुँचकर यशोदा ने उन्हें पानी से साफ किया।

     

    कान्हा बार-बार पानी से बचने की कोशिश करते।

     

    “मैया, ठंडा पानी है!”

     

    “चुपचाप बैठो।”

     

    “मैया, आँख में चला गया।”

     

    “आँखें बंद कर लो।”

     

    “मैया, कान में चला गया।”

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    यशोदा भी आखिर मुस्कुरा दीं।

     

    उन्होंने कान्हा के बाल साफ किए और कपड़े बदलाए।

     

    फिर उन्हें पास बैठाकर बोलीं—

     

    “कान्हा, किसी की मेहनत खराब नहीं करनी चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझसे गलती हो गई।”

     

    “अगर तुम्हें रंगोली पसंद आई थी तो तुम राधिका से पूछ सकते थे।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं उससे माफी माँगूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस यही बात अच्छी है।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा वापस राधिका के घर पहुँचे।

     

    राधिका नई रंगोली बना रही थी।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “राधिका।”

     

    राधिका ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    राधिका मुस्कुरा दी।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “मैं तुम्हारी मदद करूँ?”

     

    राधिका ने सोचा।

     

    फिर बोली—

     

    “लेकिन इस बार रंगोली खराब मत करना।”

     

    कान्हा ने अपना हाथ पीछे कर लिया।

     

    “नहीं करूँगा।”

     

    दोनों मिलकर रंगोली बनाने लगे।

     

    कान्हा ने फूलों के लिए पीला रंग दिया।

     

    राधिका ने नीला रंग लगाया।

     

    कुछ देर बाद रंगोली पहले से भी सुंदर बन गई।

     

    कान्हा ने उसे देखकर कहा—

     

    “अब ये सच में सुंदर है।”

     

    राधिका बोली—

     

    “क्योंकि इस बार तुमने इसे बिगाड़ा नहीं।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    तभी उनके दोस्त आ गए।

     

    एक बोला—

     

    “कान्हा, चलो! नदी के पास चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम लोग जाओ, मैं अभी आता हूँ।”

     

    दोस्तों के जाते ही राधिका ने पूछा—

     

    “तुम्हें इतनी शरारत करने की जरूरत क्यों पड़ती है?”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि जब सब हँसते हैं ना, तो मुझे अच्छा लगता है।”

     

    राधिका मुस्कुराई।

     

    “लेकिन कभी-कभी तुम्हारी शरारत से किसी को दुख भी हो सकता है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “अब ध्यान रखूँगा।”

     

    शाम को यशोदा ने कान्हा को बुलाया।

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आज मैंने रंगोली बनाई।”

     

    “खराब तो नहीं की?”

     

    “नहीं मैया। इस बार मैंने बनवाई है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “सच?”

     

    कान्हा ने गर्व से सिर हिलाया।

     

    “हाँ। और राधिका ने मुझे माफ भी कर दिया।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “मेरा कान्हा बड़ा हो रहा है।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “नहीं मैया, मैं बड़ा नहीं होना चाहता।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि बड़ा हो गया तो आप मुझे गोद में नहीं उठाओगी।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने कान्हा को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “तुम चाहे कितने भी बड़े हो जाओ, मेरे लिए हमेशा मेरे नन्हे कान्हा ही रहोगे।”

     

    कान्हा ने माँ के गले में हाथ डाल दिया।

     

    बाहर शाम की हवा चल रही थी और वृंदावन की गलियों में बच्चों की हँसी सुनाई दे रही थी।

     

    लेकिन उसी समय कान्हा के दोस्तों ने बाहर से आवाज लगाई—

     

    “कान्हा! जल्दी आओ!”

     

    कान्हा ने यशोदा से पूछा—

     

    “मैया, जाऊँ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “जाओ, लेकिन आज कोई नई शरारत मत करना।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैं कोशिश करूँगा।”

     

    और यह कहते ही वह दौड़ते हुए बाहर निकल गए।

     

    यशोदा उन्हें जाते हुए देखती रहीं और मुस्कुराकर बोलीं—

     

    “ये ‘कोशिश’ कह रहा है… मतलब आज फिर कोई शरारत होने वाली है।”

     

    और सच में, अगले दिन कान्हा की शरारत वृंदावन की रंगोली से निकलकर यमुना किनारे तक पहुँचने वाली थी।