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  • चांदनी रात का अंधियारा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 1

     

    गांव से थोड़ी दूर एक पुरानी हवेली थी। दिन में वह हवेली जितनी शांत और साधारण दिखाई देती, रात होते ही उतनी ही रहस्यमयी लगने लगती थी। गांव के लोग शाम ढलने के बाद उस रास्ते पर जाना पसंद नहीं करते थे।

     

    कहते थे कि हर पूर्णिमा की रात हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में एक दीपक अपने आप जल उठता था।

     

    किसी ने उस दीपक को जलाते हुए कभी नहीं देखा था।

     

    गांव के बड़े-बुजुर्ग कहते थे, “उस हवेली से दूर रहना ही अच्छा है।”

     

    लेकिन गांव की अठारह साल की चांदनी इन बातों को सिर्फ पुरानी कहानियां मानती थी।

     

    चांदनी का असली नाम चांदनी ही था। उसके पिता बचपन से उसे इसी नाम से पुकारते थे, क्योंकि उसके जन्म की रात आसमान में बहुत बड़ा चांद निकला था।

     

    वह हंसमुख और थोड़ी जिद्दी लड़की थी।

     

    एक शाम उसकी मां ने उससे कहा, “चांदनी, सूरज ढलने वाला है। जल्दी घर आ जाना।”

     

    चांदनी ने हंसकर कहा, “मां, मैं बस कुएं तक जा रही हूं।”

     

    “कुएं तक ठीक है, लेकिन हवेली की तरफ मत जाना।”

     

    चांदनी रुक गई।

     

    “आपको अभी भी उस हवेली से डर लगता है?”

     

    मां ने गंभीर होकर कहा, “डर की बात नहीं है। बस वहां जाना ठीक नहीं है।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    मां ने जवाब नहीं दिया।

     

    चांदनी ने फिर पूछा, “मां, आखिर वहां हुआ क्या था?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    “तुम्हें जितना पता है, उतना ही रहने दो।”

     

    चांदनी को यह जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।

     

    वह कुएं की तरफ चली गई, लेकिन उसके दिमाग में हवेली की बात घूमती रही।

     

    रास्ते में उसकी मुलाकात उसकी सहेली गौरी से हुई।

     

    गौरी ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

     

    चांदनी बोली, “तुम्हें हवेली के बारे में कुछ पता है?”

     

    गौरी का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “उसका नाम मत लो।”

     

    “क्यों?”

     

    “मेरी दादी कहती हैं कि पूर्णिमा की रात वहां कोई खिड़की से बाहर देखता है।”

     

    चांदनी हंस पड़ी।

     

    “कोई इंसान?”

     

    गौरी ने धीरे से कहा, “पता नहीं।”

     

    चांदनी ने मजाक किया, “तो आज रात चलकर देख लेते हैं।”

     

    गौरी ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पागल हो गई हो क्या?”

     

    चांदनी हंसती हुई बोली, “मैं मजाक कर रही हूं।”

     

    लेकिन उसके मन में अब वही बात बैठ गई थी।

     

    उस रात पूर्णिमा थी।

     

    आसमान बिल्कुल साफ था और चांद की रोशनी पूरे गांव में फैली हुई थी।

     

    चांदनी अपनी छत पर बैठी थी।

     

    अचानक उसकी नजर दूर हवेली की तरफ गई।

     

    वहां ऊपरी मंजिल की एक खिड़की में हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    चांदनी खड़ी हो गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    उसने ध्यान से देखा।

     

    रोशनी सच में थी।

     

    उसे अपनी मां की बात याद आई।

     

    फिर उसे गौरी की दादी की कहानी याद आई।

     

    चांदनी ने खुद को समझाया।

     

    “कोई दीपक जलाकर गया होगा।”

     

    वह वापस बैठ गई।

     

    लेकिन कुछ मिनट बाद रोशनी गायब हो गई।

     

    चांदनी फिर खड़ी हुई।

     

    “अजीब है।”

     

    अगली सुबह उसने अपनी मां से पूछा, “मां, क्या हवेली में कोई रहता है?”

     

    मां ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम ये क्यों पूछ रही हो?”

     

    “बस ऐसे ही।”

     

    मां ने कहा, “नहीं। वहां कोई नहीं रहता।”

     

    चांदनी ने पूछा, “फिर रात को वहां रोशनी क्यों थी?”

     

    मां के हाथ से गिलास लगभग छूट गया।

     

    “तुमने क्या देखा?”

     

    “ऊपर की खिड़की में दीपक जल रहा था।”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “आज के बाद उस हवेली की तरफ मत देखना।”

     

    चांदनी को अब यकीन हो गया था कि उसकी मां कुछ छिपा रही हैं।

     

    उसी दिन दोपहर में वह अपनी दादी के पास गई।

     

    दादी आंगन में बैठी थीं।

     

    चांदनी उनके पास बैठ गई।

     

    “दादी, आप मुझे हवेली के बारे में सच-सच बताइए।”

     

    दादी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “किसने कहा तुम्हें उसके बारे में पूछने को?”

     

    “किसी ने नहीं। मैंने खुद देखा।”

     

    दादी की आंखों में चिंता आ गई।

     

    “क्या देखा?”

     

    “पूर्णिमा की रात खिड़की में दीपक।”

     

    दादी ने लंबी सांस ली।

     

    “बहुत साल पहले उस हवेली में एक परिवार रहता था। घर के मालिक की एक बेटी थी। उसका नाम भी चांदनी था।”

     

    चांदनी हैरान रह गई।

     

    “मेरे जैसा?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हां। वह लड़की बहुत शांत थी। उसे रात में छत पर बैठकर चांद देखना पसंद था।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    दादी ने धीरे से कहा, “एक पूर्णिमा की रात वह अचानक गायब हो गई।”

     

    “कहां गई?”

     

    “किसी को नहीं पता।”

     

    “उसके परिवार ने उसे ढूंढा?”

     

    “बहुत ढूंढा। लेकिन उसका कोई पता नहीं चला।”

     

    चांदनी ने पूछा, “फिर हवेली बंद क्यों हो गई?”

     

    दादी बोलीं, “उसके बाद हवेली में अजीब घटनाएं होने लगीं। कभी दरवाजे अपने आप खुल जाते, कभी ऊपर की खिड़की में दीपक जलता दिखाई देता।”

     

    चांदनी कुछ देर चुप रही।

     

    “लेकिन दादी, इसका मतलब यह नहीं कि वहां कुछ डरावना है।”

     

    दादी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “बेटी, हर रहस्य को जानना जरूरी नहीं होता।”

     

    चांदनी ने कुछ जवाब नहीं दिया।

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल लगातार घूमता रहा—

     

    अगर वह लड़की सालों पहले गायब हो गई थी, तो हर पूर्णिमा की रात दीपक कौन जलाता था?

     

    उस रात चांदनी देर तक सो नहीं सकी।

     

    आधी रात के करीब उसे बाहर से हल्की-सी आवाज सुनाई दी।

     

    “चांदनी…”

     

    वह तुरंत उठकर बैठ गई।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने सोचा शायद उसका भ्रम होगा।

     

    फिर आवाज आई।

     

    “चांदनी…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    वह खिड़की के पास गई।

     

    बाहर पूरा आंगन चांदनी से भरा हुआ था।

     

    उसने दूर हवेली की तरफ देखा।

     

    ऊपर वही खिड़की दिखाई दे रही थी।

     

    और इस बार वहां दीपक जल रहा था।

     

    चांदनी के दिल की धड़कन तेज हो गई।

     

    तभी खिड़की के पास एक परछाईं दिखाई दी।

     

    एक लड़की जैसी परछाईं।

     

    चांदनी ने आंखें मलीं।

     

    परछाईं गायब हो चुकी थी।

     

    अगली सुबह उसने गौरी को सब बताया।

     

    गौरी ने कहा, “तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए।”

     

    चांदनी बोली, “मुझे लगता है वहां कोई रहस्य है।”

     

    “तो क्या करोगी?”

     

    चांदनी ने दृढ़ होकर कहा, “आज रात हवेली जाऊंगी।”

     

    गौरी ने डरते हुए पूछा, “अकेली?”

     

    चांदनी ने कहा, “तुम साथ चलोगी।”

     

    “बिल्कुल नहीं!”

     

    चांदनी हंस पड़ी।

     

    “ठीक है, मैं अकेली चली जाऊंगी।”

     

    गौरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं! मैं भी चलूंगी।”

     

    रात होते ही दोनों चुपचाप गांव से बाहर निकल पड़ीं।

     

    चांदनी के हाथ में एक छोटी टॉर्च थी।

     

    हवेली का रास्ता चांद की रोशनी में साफ दिखाई दे रहा था।

     

    जैसे-जैसे वे हवेली के करीब पहुंचीं, हवा ठंडी होती गई।

     

    गौरी ने धीमे से कहा, “मुझे अच्छा नहीं लग रहा।”

     

    चांदनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “डर मत। मैं हूं।”

     

    दोनों हवेली के बड़े दरवाजे के सामने पहुंचीं।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    चांदनी ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।

     

    किर्रर्र…

     

    दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    गौरी पीछे हट गई।

     

    “चांदनी… हमने इसे खोला नहीं।”

     

    चांदनी ने धीरे से अंदर देखा।

     

    अंदर पूरा अंधेरा था।

     

    लेकिन सीढ़ियों के ऊपर से हल्की चांदनी आ रही थी।

     

    तभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    चांदनी ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आखिरी छोर पर एक लड़की खड़ी थी।

     

    उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

     

    चेहरा चांदनी को साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लड़की ने धीरे से अपना हाथ उठाया और ऊपर की खिड़की की तरफ इशारा किया।

     

    फिर अचानक गायब हो गई।

     

    गौरी ने कांपते हुए कहा, “चलो यहां से!”

     

    लेकिन चांदनी ने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    चांदनी ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि मुझे लगता है… वो हमें डराने नहीं, कुछ बताने आई थी।”

     

    दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगीं।

     

    ऊपर पहुंचकर उन्हें एक पुराना कमरा दिखाई दिया।

     

    दरवाजा आधा खुला था।

     

    चांदनी ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे के बीच एक पुरानी मेज थी।

     

    मेज पर एक तस्वीर रखी थी।

     

    चांदनी ने टॉर्च की रोशनी तस्वीर पर डाली।

     

    तस्वीर देखते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    तस्वीर में वही लड़की थी जिसे उन्होंने सीढ़ियों पर देखा था।

     

    और तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “चांदनी — इस घर की आखिरी बेटी।”

     

    चांदनी कुछ समझ पाती, उससे पहले कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    गौरी चीख पड़ी।

     

    और उसी पल कमरे के अंधेरे में किसी लड़की की धीमी आवाज गूंजी—

     

    “तुम… आखिर आ ही गईं।”

     

    चांदनी ने कांपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    अंधेरे से जवाब आया—

     

    “तुम्हें अपने घर का सच नहीं पता…”

     

    और कमरे में रखा पुराना दीपक अचानक जल उठा।

  • अनुसूइया और भंवरा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अनुसूइया और एक भंवरा

     

    एक छोटे से गांव के किनारे एक सुंदर-सा बगीचा था। उस बगीचे में तरह-तरह के फूल खिले रहते थे। सुबह होते ही वहां तितलियां मंडराने लगतीं और भंवरे फूलों के आसपास गुनगुनाते रहते। उसी गांव में अनुसूइया नाम की एक सरल और दयालु लड़की रहती थी। उसे पेड़-पौधों और फूलों से बहुत प्यार था।

     

    अनुसूइया रोज सुबह उठकर अपने छोटे से बगीचे में पानी डालती और पौधों से बातें करती।

     

    एक दिन उसने देखा कि एक काला-सा भंवरा बार-बार एक ही फूल के आसपास मंडरा रहा है।

     

    अनुसूइया मुस्कुराकर बोली, “तुम रोज इसी फूल के पास क्यों आते हो?”

     

    भंवरा कुछ देर फूल पर बैठा, फिर उड़कर उसके सिर के ऊपर चक्कर लगाने लगा।

     

    अनुसूइया हंस पड़ी।

     

    “अच्छा! तो तुम मुझसे दोस्ती करना चाहते हो?”

     

    भंवरा फिर उसके पास आकर मंडराने लगा।

     

    उस दिन के बाद वह भंवरा रोज अनुसूइया के बगीचे में आने लगा। अनुसूइया ने उसका नाम रख दिया—भौंरा।

     

    वह जब भी बगीचे में आती, भौंरा उसके आसपास गुनगुनाता रहता।

     

    एक दिन अनुसूइया ने कहा, “भौंरा, तुम सिर्फ मेरे बगीचे में ही क्यों आते हो? पूरे गांव में इतने फूल हैं।”

     

    जैसे ही उसने यह कहा, भौंरा उड़कर एक सूखे पौधे के पास चला गया।

     

    अनुसूइया उसके पीछे गई।

     

    वहां उसने देखा कि उस पौधे पर एक भी फूल नहीं था।

     

    अनुसूइया बोली, “इस पौधे पर तो कुछ भी नहीं है।”

     

    भौंरा उसी पौधे के पास मंडराता रहा।

     

    अनुसूइया को कुछ समझ नहीं आया।

     

    उसने उस पौधे को ध्यान से देखा। मिट्टी बहुत सूखी थी।

     

    “ओह! तुम मुझे बता रहे हो कि इसे पानी चाहिए?”

     

    उसने तुरंत पौधे में पानी डाल दिया।

     

    कुछ दिनों तक वह रोज उस पौधे की देखभाल करने लगी।

     

    एक सप्ताह बाद उस पर छोटी-सी कली निकल आई।

     

    अनुसूइया बहुत खुश हुई।

     

    “भौंरा! देखो, तुम्हारा पौधा फिर से खिलने वाला है।”

     

    भौंरा उसके चारों तरफ खुशी से उड़ने लगा।

     

    धीरे-धीरे वह पौधा फूलों से भर गया।

     

    अनुसूइया को अब यकीन हो गया था कि भौंरा सिर्फ फूलों का रस लेने नहीं आता था। जैसे उसे भी इस बगीचे की चिंता थी।

     

    लेकिन एक दिन गांव में तेज आंधी आई।

     

    आसमान अचानक काला हो गया।

     

    अनुसूइया ने जल्दी-जल्दी बगीचे के छोटे पौधों को बचाने की कोशिश की।

     

    “हे भगवान! मेरे सारे फूल खराब न हो जाएं।”

     

    तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएं हिलने लगीं।

     

    अनुसूइया एक पौधे को सहारा दे ही रही थी कि उसे भौंरे की आवाज सुनाई दी।

     

    वह चारों तरफ देखने लगी।

     

    “भौंरा? तुम कहां हो?”

     

    भौंरा एक पेड़ के नीचे फंसा हुआ था।

     

    अनुसूइया दौड़कर वहां पहुंची।

     

    हवा बहुत तेज थी, लेकिन उसने सावधानी से एक सूखी टहनी हटाई।

     

    भौंरा बाहर निकल आया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    भौंरा कुछ देर उसके हाथ के पास मंडराता रहा।

     

    अनुसूइया मुस्कुराई।

     

    “डर गए थे ना?”

     

    बारिश शुरू हो गई।

     

    अनुसूइया भौंरे को एक पत्ते के नीचे सुरक्षित जगह पर ले गई।

     

    उस रात उसने बगीचे में ही काफी देर तक पौधों को संभाला।

     

    सुबह जब बारिश रुकी, तो बगीचे की हालत खराब थी।

     

    कई फूल टूट गए थे।

     

    कुछ पौधे जमीन पर गिर गए थे।

     

    अनुसूइया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “इतनी मेहनत की थी… सब खराब हो गया।”

     

    तभी भौंरा उसके पास आया।

     

    वह एक फूल के ऊपर बैठा और फिर उड़कर दूसरे पौधे पर गया।

     

    अनुसूइया उसे देखते हुए बोली, “तुम कह रहे हो कि मुझे हार नहीं माननी चाहिए?”

     

    भौंरा उसके आसपास घूमने लगा।

     

    अनुसूइया ने आंसू पोंछे।

     

    “ठीक है। मैं फिर से शुरू करूंगी।”

     

    उसने अगले दिन से बगीचे को दोबारा ठीक करना शुरू किया।

     

    गांव के कुछ बच्चे भी उसकी मदद करने लगे।

     

    किसी ने पौधे लगाए, किसी ने मिट्टी ठीक की और किसी ने पानी दिया।

     

    कुछ ही दिनों में बगीचा फिर से हरा होने लगा।

     

    लेकिन उसी दौरान गांव में एक समस्या खड़ी हो गई।

     

    गांव के लोगों ने देखा कि इस साल फूलों और फलों की संख्या बहुत कम हो रही है।

     

    गांव के बुजुर्ग बोले, “लगता है मौसम ठीक नहीं है।”

     

    अनुसूइया ने अपने बगीचे में देखा।

     

    उसे याद आया कि जब भौंरे और तितलियां फूलों के पास आती हैं, तो कुछ समय बाद पौधों पर फल और बीज बनने लगते हैं।

     

    उसने गांव वालों से कहा, “हमें अपने बगीचों में ऐसे पौधे लगाने चाहिए जिन पर भंवरे और तितलियां आ सकें।”

     

    कुछ लोग उसकी बात पर हंसने लगे।

     

    “एक भंवरे से गांव की खेती चलेगी क्या?”

     

    अनुसूइया चुप रही।

     

    उसने किसी से बहस नहीं की।

     

    उसने अपने बगीचे में अलग-अलग फूल लगाने शुरू कर दिए।

     

    गेंदा, सूरजमुखी, चमेली और कई दूसरे फूल।

     

    कुछ समय बाद उसके बगीचे में फिर से भंवरे और तितलियां आने लगीं।

     

    धीरे-धीरे उसके पौधों पर फल और बीज भी आने लगे।

     

    गांव के लोगों ने यह देखा तो उन्हें अपनी गलती समझ आई।

     

    एक बुजुर्ग किसान अनुसूइया के पास आए।

     

    “बेटी, तुम सही कह रही थी।”

     

    अनुसूइया मुस्कुराई।

     

    “मैं नहीं, भौंरा सही था।”

     

    किसान हंस पड़े।

     

    “भौंरा?”

     

    अनुसूइया ने सिर हिलाया।

     

    “हां। उसी ने मुझे सिखाया कि छोटी-सी चीज भी बड़ी मदद कर सकती है।”

     

    उस दिन से गांव के लोगों ने अपने घरों के आसपास फूलों के पौधे लगाने शुरू कर दिए।

     

    कुछ महीनों बाद पूरा गांव फूलों से भर गया।

     

    भंवरे और तितलियां हर तरफ दिखाई देने लगे।

     

    अनुसूइया का छोटा-सा बगीचा अब गांव के लिए मिसाल बन चुका था।

     

    लेकिन एक सुबह भौंरा दिखाई नहीं दिया।

     

    अनुसूइया ने पूरा बगीचा देख लिया।

     

    “भौंरा… कहां हो तुम?”

     

    वह पेड़ों के पास गई, फूलों के पास गई, लेकिन भौंरा कहीं नहीं था।

     

    दो दिन बीत गए।

     

    अनुसूइया उदास रहने लगी।

     

    तीसरे दिन सुबह वह उसी पुराने पौधे के पास गई, जिसे उसने कभी भौंरे के कहने पर पानी दिया था।

     

    वह पौधा अब बहुत बड़ा हो चुका था।

     

    उस पर अनगिनत फूल खिले थे।

     

    अचानक उसे वही परिचित गुनगुनाहट सुनाई दी।

     

    “गुं… गुं…”

     

    अनुसूइया ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    भौंरा उसके सामने मंडरा रहा था।

     

    उसकी आंखों में खुशी आ गई।

     

    “तुम आ गए!”

     

    भौंरा एक फूल पर बैठा और फिर उड़कर उसके कंधे के पास आ गया।

     

    अनुसूइया हंसते हुए बोली, “तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं जा सकते।”

     

    भौंरा जैसे उसकी बात समझ रहा हो, फिर उसके चारों ओर चक्कर लगाने लगा।

     

    अनुसूइया ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “कभी-कभी भगवान हमारी जिंदगी में किसी इंसान के रूप में नहीं, बल्कि एक छोटी-सी निशानी के रूप में खुशी भेजते हैं।”

     

    उसके लिए वह भंवरा सिर्फ एक कीड़ा नहीं था।

     

    वह उसका छोटा-सा दोस्त था, जिसने उसे सिखाया था कि किसी चीज को छोटा समझकर उसकी अहमियत नहीं भूलनी चाहिए।

     

    उस दिन से अनुसूइया जब भी अपने बगीचे में आती, सबसे पहले उसकी नजर फूलों पर जाती और फिर वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “भौंरा, आज फिर कुछ नया सिखाने आए हो क्या?”

     

    और बगीचे में गूंजती उसकी प्यारी-सी गुनगुनाहट जैसे जवाब देती—

     

    “गुं… गुं…”

  • सच की जीत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 3: सच की जीत

     

    अगली सुबह शौर्य बहुत जल्दी उठ गया। रातभर उसके दिमाग में वही संदेश घूमता रहा था—

     

    “अगर अपने पिता का सच जानना चाहते हो, तो कल सुबह पुराने पुल पर अकेले आना।”

     

    वह तैयार होकर चुपचाप घर से निकलने लगा।

     

    तभी पीछे से कबीर की आवाज आई, “इतनी सुबह कहां जा रहा है?”

     

    शौर्य पलटा।

     

    “तू यहां?”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “मुझे पता था तू अकेला जाने की कोशिश करेगा।”

     

    शौर्य ने कहा, “मैसेज में साफ लिखा था कि अकेले आना है।”

     

    कबीर बोला, “और मैंने तय किया था कि इस बार तुझे अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    शौर्य ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन कबीर नहीं माना।

     

    दोनों पुराने पुल की तरफ चल पड़े।

     

    पुल के पास पहुंचकर शौर्य ने चारों तरफ देखा। वहां कोई नहीं था।

     

    “शायद जिसने मैसेज किया था, वो आया नहीं।”

     

    कबीर बोला, “या फिर हमें देख रहा है।”

     

    शौर्य ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डराने की जरूरत नहीं है।”

     

    “मैं डर नहीं रहा। बस तेरी नादानियों का अनुभव है।”

     

    दोनों कुछ देर इंतजार करते रहे।

     

    तभी पीछे से किसी ने आवाज लगाई।

     

    “शौर्य!”

     

    शौर्य पलटा।

     

    रघुवीर वहां खड़ा था।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी फाइल थी।

     

    शौर्य तुरंत उसके पास गया।

     

    “आपने मुझे यहां बुलाया था?”

     

    रघुवीर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    शौर्य ने पूछा, “कल आपने उस घर में मुझे वो चाबी क्यों दी थी?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि अब समय आ गया है कि तुम्हें पूरा सच पता चले।”

     

    कबीर ने पूछा, “आप इतने सालों से चुप क्यों थे?”

     

    रघुवीर कुछ पल शांत रहा।

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    शौर्य ने हैरानी से पूछा, “आप?”

     

    “हां। मैं भी उस समय तुम्हारे पिता के साथ था। लेकिन जब मुश्किल आई, तो मैंने उनका साथ छोड़ दिया।”

     

    रघुवीर ने फाइल शौर्य की तरफ बढ़ा दी।

     

    “इसमें सबूत हैं।”

     

    शौर्य ने फाइल खोली।

     

    अंदर कई पुराने कागज, रसीदें और कुछ तस्वीरें थीं।

     

    एक दस्तावेज पर उसके पिता के हस्ताक्षर थे।

     

    उसके पिता के नाम पर जिस रकम की हेराफेरी का आरोप लगाया गया था, वह रकम असल में किसी दूसरे खाते में भेजी गई थी।

     

    शौर्य की आंखें फैल गईं।

     

    “तो पापा ने पैसे नहीं चुराए थे?”

     

    “नहीं।”

     

    अनाया भी वहां पहुंच गई।

     

    “मेरे पिता भी निर्दोष थे?”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां। तुम्हारे पिता ने जब सच्चाई पता करने की कोशिश की, तो उन्हें धमकाया गया।”

     

    अनाया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “उन्होंने हमें कुछ क्यों नहीं बताया?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि उन्हें डर था कि सच की कीमत तुम्हारे परिवार को चुकानी पड़ेगी।”

     

    शौर्य ने फाइल के आखिरी पन्ने पर एक नाम देखा।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “ये… विक्रम?”

     

    रघुवीर ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    शौर्य को सब याद आने लगा।

     

    विक्रम उसके पिता का पुराना बिजनेस पार्टनर था। बचपन में वह कई बार उनके घर आता था। शौर्य उसे हमेशा अपने पिता का बहुत अच्छा दोस्त समझता था।

     

    “लेकिन वो तो हमारे परिवार के साथ हमेशा अच्छा रहा।”

     

    रघुवीर ने कहा, “यही तो उसकी सबसे बड़ी चाल थी।”

     

    उसी समय पीछे से ताली बजने की आवाज आई।

     

    ताली…

     

    ताली…

     

    तीनों ने पीछे देखा।

     

    विक्रम वहां खड़ा था।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    “बहुत अच्छा। आखिरकार तुम लोगों ने सच ढूंढ ही लिया।”

     

    शौर्य उसके सामने जाकर खड़ा हो गया।

     

    “आपने मेरे पापा को फंसाया।”

     

    विक्रम ने कहा, “तुम्हारे पिता बहुत भरोसा करते थे। और भरोसा करने वाले लोग अक्सर सबसे आसानी से धोखा खा जाते हैं।”

     

    शौर्य गुस्से में था, लेकिन उसने खुद को संभाला।

     

    “आपने अनाया के पिता की जिंदगी भी बर्बाद कर दी।”

     

    “मुझे अपना फायदा देखना था।”

     

    कबीर ने गुस्से से कहा, “आपको शर्म नहीं आती?”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “शर्म से पैसा नहीं मिलता।”

     

    शौर्य ने फाइल उठाकर कहा, “लेकिन अब आपका सच सबके सामने आएगा।”

     

    विक्रम ने कहा, “तुम्हारे पास सबूत हैं, लेकिन क्या तुम साबित कर पाओगे?”

     

    शौर्य मुस्कुराया।

     

    “इस बार मैंने नादानी नहीं की।”

     

    रघुवीर ने अपने फोन में रिकॉर्डिंग दिखाई।

     

    उसने विक्रम की पूरी बात रिकॉर्ड कर ली थी।

     

    विक्रम का चेहरा उतर गया।

     

    “तुमने ये सब रिकॉर्ड किया?”

     

    रघुवीर बोला, “हां। इतने साल डरने के बाद अब सच बोलने की हिम्मत आ गई है।”

     

    विक्रम पीछे हटने लगा।

     

    लेकिन शौर्य ने कहा, “अब भागने का कोई रास्ता नहीं है।”

     

    कुछ ही समय बाद पूरा मामला जांच के सामने पहुंचा।

     

    पुराने दस्तावेज और रिकॉर्डिंग ने सारी सच्चाई सामने ला दी।

     

    विक्रम के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई।

     

    शौर्य के पिता पर लगे सारे पुराने आरोप भी झूठे साबित हुए।

     

    जब शौर्य घर पहुंचा और अपनी मां को पूरी बात बताई, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम्हारे पापा आज होते तो तुम पर गर्व करते।”

     

    शौर्य ने मां को गले लगा लिया।

     

    “मां, मैंने बस उनका नाम साफ किया है।”

     

    मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू बदल गया है शौर्य।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “इतना भी नहीं।”

     

    तभी रिया बाहर से चिल्लाई—

     

    “मां! भैया ने फिर से रसोई में दूध गिरा दिया!”

     

    शौर्य ने आंखें बंद कर लीं।

     

    कबीर जोर से हंसने लगा।

     

    “देखा? मैंने कहा था, नादानियां खत्म नहीं हुईं।”

     

    शौर्य ने कहा, “वो गलती से हुआ था।”

     

    रिया बोली, “भैया की हर गलती गलती से ही होती है।”

     

    पूरा घर हंसी से भर गया।

     

    कुछ दिनों बाद अनाया ने पुराने घर को दोबारा ठीक करवाने का फैसला किया।

     

    वह घर अब डरावना नहीं लगता था।

     

    वहीं एक छोटी-सी लाइब्रेरी शुरू की गई, जहां आसपास के बच्चों को मुफ्त में पढ़ाया जाने लगा।

     

    शौर्य भी रोज वहां मदद करने जाता।

     

    एक दिन अनाया ने उससे कहा, “अगर तुम उस दिन मेरी मदद करने नहीं आते, तो शायद मुझे अपने पिता का सच कभी नहीं पता चलता।”

     

    शौर्य ने मुस्कुराकर कहा, “मैं तो बस रास्ता दिखाने आया था।”

     

    अनाया बोली, “तुम हमेशा ऐसे ही कहते हो। पहले फूलदान तोड़ते हो, फिर साइकिल ठीक करते हो और आखिर में लोगों की जिंदगी का राज खोज निकालते हो।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “क्या करूं? मेरी नादानियां ही ऐसी हैं।”

     

    कबीर पास खड़ा सुन रहा था।

     

    उसने कहा, “एक बात माननी पड़ेगी। तेरी नादानियों ने इस बार बहुत अच्छा काम किया।”

     

    शौर्य ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन अब मैं पहले जैसा नहीं रहूंगा।”

     

    कबीर ने पूछा, “मतलब?”

     

    “अब कोई भी काम करने से पहले दो बार सोचूंगा।”

     

    उसी वक्त रिया वहां पहुंची।

     

    “भैया, मां ने कहा है कि घर जाते समय सब्जियां लेते आना।”

     

    शौर्य बोला, “ठीक है।”

     

    रिया ने कहा, “और इस बार पैसे मत खो देना।”

     

    कबीर हंसने लगा।

     

    शौर्य ने झुंझलाकर कहा, “एक बार पैसे गिरे थे बस!”

     

    रिया बोली, “तीन बार।”

     

    शौर्य चुप हो गया।

     

    अनाया और कबीर दोनों हंस पड़े।

     

    शौर्य ने आसमान की तरफ देखा।

     

    उसकी जिंदगी में बहुत कुछ बदल चुका था।

     

    पहले वह अपनी नादानियों को सिर्फ अपनी कमजोरी समझता था। लेकिन अब उसे पता था कि गलती करना बुरा नहीं, गलती से सीखना जरूरी है।

     

    उसकी जल्दबाजी ने उसे कई बार मुसीबत में डाला था, लेकिन उसी ने उसे अनाया से मिलाया, पुराने राज तक पहुंचाया और उसके पिता का नाम साफ करने का मौका दिया।

     

    अब शौर्य पहले जैसा लापरवाह नहीं था।

     

    वह जिम्मेदारी समझने लगा था।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान और उसकी मासूम नादानियां अब भी उसके साथ थीं।

     

    शाम को घर लौटते समय उसने रास्ते में एक छोटे बच्चे को गिरा हुआ देखा।

     

    वह तुरंत उसकी मदद करने दौड़ा।

     

    कबीर ने पीछे से आवाज लगाई—

     

    • “शौर्य! पहले देख लेना कि इस बार किसी मुसीबत में तो नहीं कूद रहा!”

     

    शौर्य हंसते हुए बोला—

     

    “मुसीबत हो या मदद… अगर किसी को मेरी जरूरत होगी, तो मैं जरूर जाऊंगा।”

     

    और वह बच्चे को उठाकर उसके घर की तरफ चल पड़ा।

     

    शौर्य की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई थी।

     

    क्योंकि उसकी नादानियां अभी बाकी थीं…

     

    समाप्त।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 24

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 24

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 24 : क्या विराज ही आरोही का असली पिता है?

     

    विराज की बात सुनकर समुद्र किनारे खड़े सभी लोगों के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “तुम्हारा असली पिता… मैं हूं।”

     

    आरोही की आंखें विराज के चेहरे पर जम गईं।

     

    उसके होंठ कांपने लगे।

     

    “नहीं…”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “हां, आरोही।”

     

    “आप झूठ बोल रहे हैं।”

     

    “मैं झूठ क्यों बोलूंगा?”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “मेरे पिता अर्जुन थे।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “अर्जुन ने तुम्हें पाला था। लेकिन तुम्हें जन्म मैंने दिया।”

     

    अर्जुन अचानक आगे बढ़े।

     

    “विराज!”

     

    विराज ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्यों अर्जुन? अब सच सुनकर डर लग रहा है?”

     

    अर्जुन की आंखों में गुस्सा था।

     

    “तुम्हें पिता कहलाने का कोई अधिकार नहीं है।”

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “खून का रिश्ता अधिकार नहीं मांगता।”

     

    आरव तुरंत आरोही के सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    “बस।”

     

    विराज ने उसे देखा।

     

    “तुम बीच में क्यों आ रहे हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि वो अकेली नहीं है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “आरव… मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “जो भी सच होगा, हम साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    “मां, आप बताइए।”

     

    नंदिनी चुप रहीं।

     

    “क्या विराज सच बोल रहा है?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उन्होंने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    आरोही का दिल टूट गया।

     

    “मतलब…?”

     

    नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “हां… विराज तुम्हारा जैविक पिता है।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन आरोही ने अपना हाथ छुड़ा लिया।

     

    “मेरे पिता अर्जुन थे।”

     

    अर्जुन की आंखों में दर्द था।

     

    “और हमेशा रहेंगे।”

     

    विराज ने कड़वाहट से कहा,

     

    “तुम्हें क्या पता पिता होने का मतलब?”

     

    अर्जुन ने जवाब दिया,

     

    “उतना पता है जितना तुम्हें कभी नहीं होगा।”

     

    “तुमने मेरी बेटी को मुझसे दूर किया।”

     

    “क्योंकि तुम उसके लायक नहीं थे।”

     

    विराज की आंखों में गुस्सा आ गया।

     

    “तुम्हारी वजह से मैंने उसे पच्चीस साल दूर से देखा।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “और मैंने पच्चीस साल उसे तुम्हारी सच्चाई से बचाया।”

     

    आरोही ने दोनों की तरफ देखा।

     

    उसका सिर चकराने लगा।

     

    “मुझे अकेला छोड़ दीजिए…”

     

    वह पीछे हटने लगी।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    “आरोही।”

     

    “नहीं आरव।”

     

    “मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    “मुझे थोड़ी देर अकेले रहना है।”

     

    आरव रुक गया।

     

    लेकिन उसकी नजर आरोही से नहीं हटी।

     

    विराज ने समुद्र की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें लगता है मैं सिर्फ एक खलनायक हूं?”

     

    किसी ने जवाब नहीं दिया।

     

    “नंदिनी और मैं एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “फिर?”

     

    “फिर अर्जुन हमारे बीच आ गया।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “झूठ।”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम हमेशा यही कहते रहे।”

     

    फिर वह आरोही की तरफ मुड़ा।

     

    “जब तुम्हारी मां को पता चला कि वो तुम्हारे साथ गर्भवती है, मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहता था।”

     

    नंदिनी बोलीं,

     

    “तुम मुझे अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थे। तुम मुझे अपने कारोबार और ताकत का हिस्सा बनाना चाहते थे।”

     

    विराज चुप हो गया।

     

    नंदिनी आगे बोलीं,

     

    “तुम्हें सिर्फ अपना नाम चाहिए था।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “लेकिन वो मेरी बेटी थी।”

     

    “तुम्हारी बेटी होने से ज्यादा उसे एक इंसान बनने का अधिकार था।”

     

    विराज की आंखों में कुछ पल के लिए दर्द दिखाई दिया।

     

    फिर उसने कहा,

     

    “और मैंने वो अधिकार उसे कभी नहीं दिया?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने अर्जुन की तरफ देखा।

     

    “अगर आप मेरे पिता नहीं थे… तो आपने मुझे इतना प्यार क्यों किया?”

     

    अर्जुन की आंखें भर आईं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म के बाद मैंने तुम्हें पहली बार अपनी बाहों में लिया था।”

     

    “और?”

     

    “उस दिन मैंने तय कर लिया था कि चाहे दुनिया मुझे तुम्हारा पिता माने या न माने… मैं तुम्हारा पिता बनकर रहूंगा।”

     

    आरोही रोने लगी।

     

    “तो आपने मुझे कभी झूठ नहीं बताया?”

     

    अर्जुन चुप हो गए।

     

    आरोही ने फिर पूछा,

     

    “आपने मेरे पिता की सच्चाई मुझसे छुपाई।”

     

    अर्जुन ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि विराज तुम्हें ढूंढ लेगा।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “और उसने मुझे ढूंढने नहीं दिया।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम खतरनाक थे।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मैं आज भी हूं।”

     

    अचानक दूर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    सब चौंक गए।

     

    गोली पास की चट्टान से टकराई।

     

    अभय ने तुरंत सबको नीचे झुकाया।

     

    “सब नीचे!”

     

    विराज के साथ आए लोग चारों तरफ फैल गए।

     

    कबीर ने बंदूक निकाली।

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “पहले आरोही।”

     

    आरव ने तुरंत आरोही का हाथ पकड़ा।

     

    “मेरे साथ चलो।”

     

    आरोही इस बार उसके साथ चल पड़ी।

     

    दोनों एक चट्टान के पीछे छिप गए।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे पता है।”

     

    “मेरे पिता…”

     

    “अर्जुन तुम्हारे पिता हैं।”

     

    “लेकिन खून से?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “खून से क्या होता है?”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे लिए?”

     

    “मेरे लिए जिसने मुझे पाला, वो मेरे पिता हैं।”

     

    “और अगर वो भी झूठ निकले?”

     

    आरव ने उसका चेहरा अपनी तरफ किया।

     

    “तो भी मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तुम हमेशा मेरे साथ क्यों रहते हो?”

     

    आरव हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि शायद मैं तुम्हें छोड़ना चाहता ही नहीं।”

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “अगर हमारे परिवारों की वजह से हमारा रिश्ता गलत साबित हुआ तो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो दुनिया से लड़ेंगे।”

     

    “और अगर हमारे परिवार हमें अलग करना चाहें?”

     

    “तो उनसे भी लड़ेंगे।”

     

    “अगर तुम्हारे पिता?”

     

    “उनसे भी।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “और अगर मैं खुद कहूं कि मुझसे दूर चले जाओ?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तब भी पहले पूछूंगा कि तुम सच में चाहती हो या डर की वजह से कह रही हो।”

     

    आरोही हल्का सा मुस्कुराई।

     

    “तुम बहुत जिद्दी हो।”

     

    “तुम्हारे मामले में हूं।”

     

    तभी एक गोली उनके पास से निकल गई।

     

    दोनों तुरंत नीचे झुक गए।

     

    आरव ने आरोही को अपनी बाहों में ढक लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    “चलो।”

     

    दूसरी तरफ विराज ने शेखर को घेर लिया था।

     

    “अब भागने का कोई रास्ता नहीं है।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    “लाल फाइल।”

     

    शेखर चुप रहा।

     

    “मुझे पता है कि फाइल तुम्हारे पास है।”

     

    “नहीं।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तो फिर आरव को मार दूंगा।”

     

    शेखर ने पहली बार घबराकर उसकी तरफ देखा।

     

    “उसे हाथ मत लगाना।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “यही तो तुम्हारी कमजोरी है।”

     

    “आरव को इसमें मत घसीटो।”

     

    “वो पहले से इसमें है।”

     

    विराज ने बंदूक शेखर की तरफ कर दी।

     

    “फाइल कहां है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मेरे पास नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “मैं सच बोल रहा हूं।”

     

    विराज ने गोली चलाने के लिए उंगली ट्रिगर पर रखी।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “बंदूक नीचे रखो।”

     

    विराज पलटा।

     

    आरव सामने खड़ा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    आरोही उसके पीछे थी।

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “तुम?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “तुम मुझे गोली मारोगे?”

     

    “अगर जरूरत पड़ी तो।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “अपने पिता के सामने?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे पिता वो हैं जिन्होंने मुझे बचाया।”

     

    शेखर की आंखों में आंसू आ गए।

     

    शेखर ने आरव की तरफ देखा।

     

    “बंदूक नीचे कर दो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आज कोई आपको नुकसान नहीं पहुंचाएगा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हें अपनी जिंदगी खतरे में नहीं डालनी चाहिए।”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “आपने मेरी जिंदगी बचाने के लिए पच्चीस साल अकेले गुजारे। आज मेरी बारी है।”

     

    शेखर की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैंने आपको पिता मान लिया है।”

     

    विराज ने ताना मारा,

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “खून से नहीं… कर्म से।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “बहुत भावुक हो गए।”

     

    फिर उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “लेकिन तुम्हें एक बात नहीं पता।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “लाल फाइल में सिर्फ तुम्हारे पिता का सच नहीं है।”

     

    “तो?”

     

    “उसमें तुम्हारी मां की मौत का सच भी है।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “मेरी मां?”

     

    विराज ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    “नंदिनी ने तुम्हें बताया कि वो तुमसे दूर क्यों हुई?”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    नंदिनी चुप थीं।

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि उसने तुम्हें बचाने के लिए नहीं…”

     

    वह थोड़ा रुका।

     

    “बल्कि क्योंकि उसने तुम्हारे जन्म की रात एक ऐसा काम किया था, जिसकी सजा उसे आज तक भुगतनी पड़ रही है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या काम?”

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “आरोही…”

     

    “मां, सच बताइए।”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं,

     

    “मैंने उस रात…”

     

    वह आगे बोल नहीं पाईं।

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “नंदिनी, अभी नहीं।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “नहीं! आज सब सच बताइए।”

     

    नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा “तुम्हारे जन्म के कुछ मिनट बाद मैंने अस्पताल से एक और बच्चा उठाया था।”

     

    आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    “दूसरा बच्चा?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसका?”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर था।

     

    “आरव का।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “मेरा?”

     

    नंदिनी ने कहा “तुम्हें तुम्हारी मां से अलग करके मैंने ही दूसरी जगह पहुंचाया था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “नंदिनी… तुमने ऐसा क्यों किया?”

     

    नंदिनी रोते हुए बोलीं “क्योंकि उस रात किसी ने मुझे मजबूर किया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    नंदिनी ने कांपते हुए विराज की तरफ देखा।

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “अब सच सामने आ गया।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तुमने मेरी मां से मुझे छीन लिया?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    उसने धीरे से कहा “मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”

     

    आरव ने बंदूक कसकर पकड़ ली।

     

    और तभी…

     

    पीछे से एक और गोली चली।

     

    इस बार गोली…

     

    शेखर के सीने में जा लगी।

     

    “पापा!”

     

    आरव चीख उठा।

     

    शेखर जमीन पर गिर पड़े।

     

    आरोही ने भी चीख मार दी।

     

    नंदिनी रोने लगीं।

     

    विराज ने तुरंत पीछे देखा।

     

    लेकिन गोली चलाने वाला…

     

    विराज का आदमी नहीं था।

     

    वह आदमी अंधेरे से बाहर आया।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    और उसने कहा “अब अगला नंबर आरव का है।”

     

    आरव ने शेखर को संभालते हुए ऊपर देखा।

     

    उस आदमी का चेहरा देखकर…

     

    विराज भी स्तब्ध रह गया।

     

    “तुम…?”

     

    जारी रहेगा…

  • बंद कमरे का राज

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 2: बंद कमरे का राज

     

    अंदर से दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनकर शौर्य कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर कहा, “भाई… अंदर कोई है।”

     

    शौर्य ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “मुझे भी यही लग रहा है।”

     

    अनाया ने उसका हाथ रोकते हुए कहा, “दरवाजा मत खोलो।”

     

    शौर्य बोला, “लेकिन अगर अंदर कोई फंसा हुआ है तो?”

     

    कबीर ने माथा पीट लिया।

     

    “तू सुधरने वाला नहीं है।”

     

    शौर्य ने धीरे से दरवाजा खोल दिया।

     

    दरवाजा खुलते ही तीनों की नजर कमरे के अंदर गई।

     

    कमरा बिल्कुल खाली था।

     

    अंदर पुरानी अलमारी, एक मेज और कुछ लकड़ी के बक्से रखे थे। खिड़की आधी खुली हुई थी और हवा के कारण पर्दा हिल रहा था।

     

    कबीर ने तुरंत कहा, “मैंने कहा था ना, यहां कुछ गड़बड़ है।”

     

    शौर्य खिड़की के पास गया।

     

    “शायद हवा से कोई चीज हिली होगी।”

     

    कबीर बोला, “और दरवाजा किसने खटखटाया?”

     

    शौर्य ने मजाक करते हुए कहा, “शायद इस घर का चौकीदार भूत होगा।”

     

    “भाई!”

     

    अनाया ने दोनों को चुप कराया।

     

    “मजाक बंद करो। हमें यहां कुछ ढूंढना है।”

     

    वह धीरे-धीरे कमरे में आगे बढ़ी। तभी उसकी नजर मेज पर रखी एक पुरानी डायरी पर पड़ी।

     

    डायरी के ऊपर उसके पिता का नाम लिखा था।

     

    अनाया ने डायरी उठा ली।

     

    उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    शौर्य उसके पास आकर बोला, “खोलो।”

     

    अनाया ने पहला पन्ना खोला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर यह डायरी मेरी बेटी के हाथ लगे, तो उसे सच जरूर बताना।”

     

    अनाया की आंखें भर आईं।

     

    “ये मेरे पापा की लिखावट है।”

     

    शौर्य चुपचाप उसके पास खड़ा रहा।

     

    डायरी के अगले पन्नों में कई साल पुरानी बातें लिखी थीं। उसके पिता और शौर्य के पिता बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों ने मिलकर एक छोटा कारोबार शुरू किया था। शुरुआत में सब ठीक चल रहा था, लेकिन कुछ साल बाद अचानक कारोबार में बड़ा नुकसान हो गया।

     

    सारा दोष दोनों दोस्तों पर लगाया गया।

     

    अनाया के पिता ने खुद को दोषी समझ लिया और परिवार से दूर चले गए।

     

    लेकिन डायरी में आगे लिखा था कि उन्हें बाद में पता चला था कि कारोबार में असली गड़बड़ी किसी तीसरे आदमी ने की थी।

     

    अनाया ने पन्ना पलटा।

     

    एक जगह लिखा था—

     

    “गलती मेरी नहीं थी। असली धोखा उस आदमी ने दिया था जिस पर हमने सबसे ज्यादा भरोसा किया।”

     

    शौर्य ने पूछा, “कौन आदमी?”

     

    डायरी में नाम नहीं था।

     

    अनाया ने अगले पन्ने पलटे, लेकिन कई पन्ने फाड़े हुए थे।

     

    शौर्य बोला, “किसी ने जानबूझकर ये पन्ने निकाले हैं।”

     

    तभी कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीनों चुप हो गए।

     

    कबीर ने धीरे से दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “कोई बाहर है।”

     

    शौर्य ने इशारे से उसे शांत रहने को कहा।

     

    वह धीरे-धीरे दरवाजे के पास गया और बाहर झांका।

     

    गलियारा खाली था।

     

    शौर्य वापस कमरे में आया।

     

    “कोई नहीं है।”

     

    कबीर बोला, “अभी मैंने साफ कदमों की आवाज सुनी थी।”

     

    अनाया ने डायरी बंद करते हुए कहा, “हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

     

    शौर्य ने कहा, “पहले देखते हैं कि इस कमरे में और क्या है।”

     

    वह पुराने बक्से खोलने लगा।

     

    पहले बक्से में पुराने कपड़े थे।

     

    दूसरे में कुछ तस्वीरें।

     

    तीसरे बक्से में एक लिफाफा था।

     

    शौर्य ने लिफाफा उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “शौर्य के पिता के लिए।”

     

    शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पुराना कागज था।

     

    उसमें लिखा था कि अगर कभी सच्चाई सामने लानी पड़े तो कुछ खास दस्तावेज एक पुराने पुल के पास छिपाए गए हैं।

     

    कबीर ने पूछा, “पुराना पुल?”

     

    शौर्य ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    तभी नीचे से अचानक किसी ने आवाज लगाई।

     

    “शौर्य!”

     

    शौर्य चौंक गया।

     

    “ये मां की आवाज है।”

     

    वह जल्दी से नीचे भागा।

     

    लेकिन दरवाजे के बाहर उसकी मां नहीं थीं।

     

    बल्कि एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था।

     

    उसने शौर्य को देखते ही कहा, “तुम यहां क्या कर रहे हो?”

     

    शौर्य ने पूछा, “आप कौन हैं?”

     

    आदमी ने अपना नाम रघुवीर बताया।

     

    “मैं तुम्हारे पिता का पुराना दोस्त हूं।”

     

    शौर्य ने तुरंत पूछा, “आप मेरे पापा को जानते थे?”

     

    रघुवीर ने नजरें झुका लीं।

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    अनाया भी नीचे आ गई।

     

    रघुवीर उसे देखते ही चौंक गया।

     

    “तुम…?”

     

    अनाया ने कहा, “मैं अपने पिता का सच जानने आई हूं।”

     

    रघुवीर कुछ देर तक चुप रहा।

     

    उसके चेहरे से लग रहा था कि वह कुछ ऐसा जानता है जो इतने सालों से किसी से छिपा रहा था।

     

    आखिर उसने धीमी आवाज में कहा, “तुम्हारे पिता बुरे आदमी नहीं थे।”

     

    “फिर उन्होंने घर क्यों छोड़ा?”

     

    रघुवीर ने लंबी सांस ली।

     

    “क्योंकि उन्हें फंसाया गया था।”

     

    शौर्य का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “किसने?”

     

    रघुवीर ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

     

    उसने पहले कमरे की तरफ देखा, फिर खिड़की के बाहर।

     

    “यह बात यहां नहीं होनी चाहिए।”

     

    शौर्य ने पूछा, “क्यों?”

     

    रघुवीर बोला, “क्योंकि जिस आदमी ने तुम्हारे परिवार को तोड़ा था, उसे पता चल चुका है कि तुम इस घर में आए हो।”

     

    कबीर घबरा गया।

     

    “लेकिन उसे कैसे पता चला?”

     

    रघुवीर ने कहा, “क्योंकि इस घर पर इतने सालों से नजर रखी जा रही है।”

     

    शौर्य ने हैरानी से पूछा, “किसकी?”

     

    रघुवीर कुछ बोलता, उससे पहले बाहर एक गाड़ी आकर रुकी।

     

    रघुवीर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    उसका चेहरा अचानक घबरा गया।

     

    “तुम दोनों को यहां से जाना होगा।”

     

    शौर्य ने मना कर दिया।

     

    “नहीं। इस बार मैं भागूंगा नहीं।”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता भी यही कहते थे।”

     

    शौर्य चुप हो गया।

     

    रघुवीर ने जेब से एक छोटी सी चाबी निकाली और शौर्य को देते हुए कहा, “इसे संभालकर रखना। इसमें तुम्हारे पिता के सच तक पहुंचने का रास्ता है।”

     

    शौर्य ने चाबी को देखा।

     

    “ये किसकी है?”

     

    रघुवीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।

     

    ठक… ठक…

     

    रघुवीर फुसफुसाया, “पीछे के रास्ते से निकलो।”

     

    शौर्य ने पूछा, “और आप?”

     

    “मैं संभाल लूंगा।”

     

    शौर्य जाना नहीं चाहता था, लेकिन रघुवीर ने उसे धक्का देकर पीछे वाले रास्ते की तरफ भेज दिया।

     

    तीनों किसी तरह घर से बाहर निकल गए।

     

    कुछ दूर जाकर शौर्य ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    पुराना घर बिल्कुल शांत खड़ा था।

     

    लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि कोई खिड़की से उन्हें देख रहा है।

     

    रात को शौर्य घर लौटा तो उसकी मां दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    “कहां था?”

     

    शौर्य ने पहली बार अपनी मां से सब कुछ पूछने की ठानी।

     

    “मां, पापा और अनाया के पिता के बीच क्या हुआ था?”

     

    मां का चेहरा उतर गया।

     

    कुछ देर तक वह चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “तुम्हारे पापा ने हमेशा कहा था कि उस मामले को दोबारा मत छेड़ना।”

     

    “क्यों?”

     

    मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा को डर था कि अगर सच बाहर आया, तो तुम्हारी जान खतरे में पड़ सकती है।”

     

    शौर्य सन्न रह गया।

     

    “मां, क्या आपको पता है कि असली गुनहगार कौन था?”

     

    मां ने कुछ पल उसे देखा।

     

    फिर बोलीं, “नाम तो नहीं बता सकती… लेकिन एक आदमी था जिस पर तुम्हारे पापा आंख बंद करके भरोसा करते थे।”

     

    शौर्य को तुरंत रघुवीर की बात याद आई।

     

    उसने पूछा, “क्या वो आदमी अब भी हमारे आसपास है?”

     

    मां ने जवाब देने के बजाय कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।

     

    “शौर्य, अब इस मामले से दूर रहो।”

     

    शौर्य ने कहा, “मां, मैं अब पीछे नहीं हट सकता।”

     

    उसी रात उसके फोन पर एक संदेश आया।

     

    “अगर अपने पिता का सच जानना चाहते हो, तो कल सुबह पुराने पुल पर अकेले आना।”

     

    शौर्य ने संदेश पढ़ा।

     

    कबीर ने पूछा, “किसका मैसेज है?”

     

    शौर्य ने फोन बंद कर दिया।

     

    “पता नहीं।”

     

    लेकिन उसके चेहरे से साफ था कि वह जानता था—ये उसी राज से जुड़ा था।

     

    उसने खिड़की से बाहर देखा और मन ही मन कहा—

     

    “अब चाहे कुछ भी हो जाए, मैं पापा का नाम साफ करके रहूंगा।”

     

    उसे नहीं पता था कि अगले दिन पुराने पुल पर उसका सामना उस इंसान से होने वाला था, जिसका नाम उसकी पूरी जिंदगी बदल देने वाला था।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 23

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 23

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 23 : “जिसे पिता समझा, वही मेरा दुश्मन निकला?”

     

    नीलगिरी हवेली के उस गुप्त कमरे में चारों तरफ धुआं फैल चुका था।

     

    दरवाजा टूटकर जमीन पर पड़ा था।

     

    सामने खड़ा आदमी धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया।

     

    उसकी नजर सबसे पहले आरोही पर पड़ी।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “आखिरकार… इतने सालों बाद मेरी बेटी मेरे सामने खड़ी है।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “आप… मेरे पिता हैं?”

     

    उस आदमी ने कहा,

     

    “हां।”

     

    शेखर तुरंत आरोही के सामने आकर खड़े हो गए।

     

    “इसके पास मत जाना।”

     

    वह आदमी हंस पड़ा।

     

    “तुम अब भी मुझे इससे दूर रखोगे?”

     

    शेखर ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने इसे पैदा किया होगा, लेकिन पिता कहलाने का अधिकार तुम्हें नहीं है।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मुझे सच चाहिए।”

     

    उस आदमी ने कहा,

     

    “सच यही है कि मैं तुम्हारा पिता हूं।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “और इतने सालों तक कहां थे?”

     

    उस आदमी ने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम बीच में मत बोलो।”

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ा।

     

    “ये मेरी जिंदगी है। मैं बीच में बोलूंगा।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव…”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब आ चुके हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “इससे तुम्हें क्या?”

     

    “बहुत कुछ।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “आरोही, मेरी बात सुनो। ये आदमी तुम्हें सिर्फ अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।”

     

    आरोही ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “लेकिन अगर ये सच में मेरे पिता हैं तो?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “खून का रिश्ता हमेशा पिता का रिश्ता नहीं बनाता।”

     

    उस आदमी ने गुस्से में शेखर की तरफ देखा।

     

    “तुमने ये अधिकार कब से हासिल कर लिया?”

     

    शेखर ने जवाब दिया,

     

    “जिस दिन मैंने इसकी जान बचाई थी।”

     

    आरोही ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “आपका नाम क्या है?”

     

    कुछ पल तक वह आदमी चुप रहा।

     

    फिर बोला “अभय राजवंशी।”

     

    कमरे में मौजूद राघव और अर्जुन दोनों चौंक गए।

     

    राघव के मुंह से निकला,

     

    “अभय…!”

     

    अभय ने उनकी तरफ देखा।

     

    “हां राघव। इतने साल बाद भी मेरा नाम याद है?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

     

    अभय हंस पड़ा।

     

    “ये बात तुम्हारे भाई शेखर ने भी कही थी।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “तुम शेखर के भाई हो?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    सब चौंक गए।

     

    अभय ने आगे कहा “मैं शेखर का सौतेला भाई हूं।”

     

    अभय ने धीरे-धीरे अपनी कहानी बतानी शुरू की।

     

    “मेरे पिता और शेखर के पिता अलग थे। लेकिन एक ही परिवार में पले-बढ़े।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “अभय, पुरानी बातें मत दोहराओ।”

     

    “क्यों नहीं?”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आज आरव और आरोही को सब पता चलना चाहिए।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम दोनों की जिंदगी सिर्फ तुम्हारे माता-पिता की वजह से नहीं बदली।”

     

    “फिर किस वजह से?”

     

    “एक विरासत की वजह से।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कैसी विरासत?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “राजवंशी परिवार की ऐसी संपत्ति, जिसका राज सिर्फ परिवार के कुछ लोगों को पता था।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “वो संपत्ति नहीं थी।”

     

    अभय हंसा।

     

    “तुम अब भी इसे छुपा रहे हो?”

     

    राघव चुप हो गए।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या छुपा रहे हैं?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम्हारे जन्म से पहले राजवंशी परिवार के पास एक गुप्त ट्रस्ट था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और उसका वारिस?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “मैं?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्योंकि शेखर ने अपनी पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दी थी।”

     

    शेखर ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैंने वो संपत्ति इसलिए दी थी ताकि मेरे बाद आरव सुरक्षित रहे।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “लेकिन मुझे वो सब चाहिए था।”

     

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तो इसमें मेरा क्या संबंध है?”

     

    अभय उसकी तरफ देखकर बोला,

     

    “तुम्हारी मां नंदिनी उस ट्रस्ट की दूसरी संरक्षक थीं।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल जाता तो अभय तुम्हें ढूंढ लेता।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें ढूंढ लिया।”

     

    नंदिनी ने गुस्से में कहा,

     

    “तुम्हें मेरी बेटी नहीं चाहिए। तुम्हें उसका अधिकार चाहिए।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मुझे दोनों चाहिए।”

     

    आरव आगे बढ़ा।

     

    “तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।”

     

    अभय ने बंदूक उठाई।

     

    “आरव, मुझे मजबूर मत करो।”

     

    आरोही तुरंत आरव के सामने आ गई।

     

    “उन्हें गोली मत मारना।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “यही तो जानता था।”

     

    आरव ने आरोही से कहा,

     

    “मेरे सामने मत आओ।”

     

    “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी।”

     

    “आरोही…”

     

    “नहीं।”

     

    अभय दोनों को देखता रहा।

     

    फिर अचानक उसने बंदूक नीचे कर दी।

     

    “तुम दोनों का प्यार मेरे लिए बहुत उपयोगी है।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “हमारा प्यार तुम्हारे किसी काम नहीं आएगा।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “देखते हैं।”

     

    अभय ने एक फाइल निकाली।

     

    “इसमें तुम्हारे जन्म के सारे दस्तावेज हैं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मुझे नहीं चाहिए।”

     

    “लेकिन तुम्हें चाहिए।”

     

    अभय ने फाइल आरोही की तरफ बढ़ाई।

     

    “क्योंकि इसमें तुम्हारे रिश्ते का सच भी है।”

     

    आरोही ने फाइल लेने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    आरव ने उसका हाथ रोक दिया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्यों डर रहे हो?”

     

    “मुझे किसी बात का डर नहीं।”

     

    “तो फिर सच देखने से क्यों बच रहे हो?”

     

    आरव ने फाइल ले ली।

     

    उसने पहला पन्ना खोला।

     

    आरोही उसके पास खड़ी थी।

     

    पन्ने पर उनके जन्म की तारीख लिखी थी।

     

    दोनों की तारीख एक ही थी।

     

    फिर अगला पन्ना।

     

    दोनों के जन्मस्थान का नाम एक ही था।

     

    फिर तीसरा पन्ना।

     

    उसमें लिखा था “दोनों बच्चों की सुरक्षा एक ही परिवार के जिम्मे रहेगी।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “इसमें तो कुछ गलत नहीं है।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “आखिरी पन्ना पढ़ो।”

     

    आरव ने आखिरी पन्ना खोला।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन थी—

     

    “इन दोनों बच्चों को कभी यह नहीं बताया जाएगा कि वे एक-दूसरे से किस रिश्ते में जुड़े हैं।”

     

    आरोही का चेहरा बदल गया।

     

    “कौन-सा रिश्ता?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “यही तो तुम्हें जानना है।”

     

    शेखर अचानक बोले,

     

    “अभय, अब बहुत हो गया।”

     

    अभय ने उनकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें सच बताना पड़ेगा।”

     

    शेखर कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने आरव और आरोही की तरफ देखा।

     

    “तुम दोनों के बीच खून का कोई रिश्ता नहीं है।”

     

    आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन शेखर ने आगे कहा “लेकिन तुम दोनों के परिवारों के बीच एक बहुत पुराना रिश्ता है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कैसा?”

     

    “तुम्हारे पिता और आरोही के पिता…”

     

    शेखर रुक गए।

     

    अभय ने बात पूरी की “एक ही मां के बेटे थे।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “मतलब?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता और मेरे पिता…”

     

    वह रुक गया।

     

    फिर बोला “एक ही परिवार से थे।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो इससे हमारे रिश्ते पर क्या असर पड़ता है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “कुछ नहीं।”

     

    अभय ने हंसकर कहा,

     

    “लेकिन आगे की बात सुनो।”

     

    उसने दूसरी फाइल खोली।

     

    “आरोही के पिता की पहचान अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “क्योंकि उसके जन्म रिकॉर्ड में पिता का नाम बदला गया था।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “किसने बदला?”

     

    अभय ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “शेखर ने।”

     

    आरोही ने शेखर की तरफ देखा।

     

    “आपने?”

     

    शेखर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां, सच क्या है?”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मैं तुम्हें सच बताना चाहती थी।”

     

    “तो बताइए।”

     

    “लेकिन तुम्हारी जान खतरे में थी।”

     

    “फिर भी… मुझे जानने का हक था।”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे जन्म के समय तुम्हारे पिता का नाम रिकॉर्ड में कुछ और था।”

     

    “कौन?”

     

    नंदिनी ने होंठ खोले।

     

    लेकिन अचानक बाहर गोली चली।

     

    धांय!

     

    कमरे की खिड़की का शीशा टूट गया।

     

    अभय ने तुरंत नंदिनी को पीछे खींच लिया।

     

    शेखर चिल्लाए “सब नीचे!”

     

    दूसरी गोली चली।

     

    इस बार अभय के कंधे को छूती हुई निकल गई।

     

    अभय पीछे हट गया।

     

    “वो यहां कैसे पहुंच गए?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “विराज!”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उन्होंने बाहर देखा।

     

    “ये विराज नहीं है।”

     

    हवेली के बाहर कई गाड़ियों की आवाज सुनाई देने लगी।

     

    कबीर ने खिड़की से देखा।

     

    “बहुत सारे लोग हैं।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “पीछे का रास्ता बंद है।”

     

    राघव ने पूछा,

     

    “तो क्या करें?”

     

    अभय ने कहा,

     

    “मेरे साथ आओ।”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “मैं तुम्हारे साथ नहीं आऊंगा।”

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें मेरी जरूरत पड़ेगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जो लोग बाहर हैं, वो मुझे नहीं…”

     

    उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “उसे लेने आए हैं।”

     

    आरोही का चेहरा डर से सफेद पड़ गया।

     

    आरव उसके सामने खड़ा हो गया।

     

    “कोई उसे हाथ भी नहीं लगाएगा।”

     

    अभय ने कहा,

     

    “तो फिर मेरे साथ चलो।”

     

    आरव ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर उसने आरोही का हाथ पकड़ा।

     

    “हम साथ चलेंगे।”

     

    अभय मुस्कुराया।

     

    “यही सही फैसला है।”

     

    अभय उन्हें कमरे के पीछे एक और दरवाजे तक ले गया।

     

    दरवाजा खुला तो नीचे जाने वाली लंबी सुरंग दिखाई दी।

     

    नंदिनी ने हैरानी से कहा,

     

    “ये सुरंग अभी तक बंद थी।”

     

    अभय बोला,

     

    “मैंने इसे कभी बंद नहीं किया।”

     

    सब लोग सुरंग में उतरने लगे।

     

    आरव सबसे पीछे था।

     

    आरोही उसके साथ थी।

     

    अचानक आरोही का पैर फिसल गया।

     

    आरव ने उसे पकड़ लिया।

     

    “संभलकर।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर तुम नहीं होते तो मैं गिर जाती।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “मैं हूं ना।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “हमेशा रहना।”

     

    आरव ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा,

     

    “ये वादा है।”

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर आगे चलने लगे।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनके पीछे…

     

    कोई और भी सुरंग में उतर चुका था।

     

    कुछ देर बाद वे सुरंग के आखिरी हिस्से में पहुंचे।

     

    वहां एक बड़ा लोहे का दरवाजा था।

     

    अभय ने दरवाजा खोला।

     

    सामने समुद्र का किनारा था।

     

    सब बाहर निकल आए।

     

    राघव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन तभी पीछे से आवाज आई “बहुत अच्छा रास्ता है।”

     

    सब पलट गए।

     

    सुरंग के मुहाने पर विराज खड़ा था।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “तुम सब सोच रहे थे कि मुझसे बच जाओगे?”

     

    आरव ने आरोही को अपने पीछे कर लिया।

     

    विराज ने कहा,

     

    “आज सिर्फ एक चीज चाहिए मुझे।”

     

    “क्या?”

     

    विराज ने आरोही की तरफ इशारा किया।

     

    “ये लड़की।”

     

    अभय ने गुस्से में कहा,

     

    “विराज, उसे हाथ लगाया तो…”

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “अभय, तुम अब भी समझते हो कि फैसला तुम्हारा है?”

     

    अभय चौंक गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    विराज ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    उसने तस्वीर अभय की तरफ फेंकी।

     

    अभय ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर देखकर उसका चेहरा बदल गया।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या है?”

     

    अभय ने तस्वीर आरव को दी।

     

    तस्वीर में एक बच्चा था।

     

    और उसके साथ खड़ी थी…

     

    आरोही की मां नंदिनी।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे लिखा था “असली पिता – अभय नहीं।”

     

    आरव ने हैरानी से नंदिनी की तरफ देखा।

     

    नंदिनी रो पड़ीं।

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “अब बताओ आरोही…”

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “क्या तुम जानना चाहती हो कि तुम्हारा असली पिता कौन है?”

     

    आरोही ने कांपती आवाज में पूछा “कौन?”

     

    विराज ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “जिसे तुम आज तक अपना दुश्मन समझती रही हो…”

     

    आरव ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    और विराज ने आखिरी शब्द कहे “तुम्हारा असली पिता… मैं हूं।”

     

    आरोही के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 22

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 22

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 22 : जिसे भाई समझा, वही सबसे बड़ा राज था

     

    नीलगिरी हवेली के उस गुप्त कमरे में अचानक ऐसी खामोशी छा गई थी कि सबकी सांसों की आवाज तक साफ सुनाई दे रही थी।

     

    सामने खड़ा आदमी खुद को शेखर का भाई बता रहा था।

     

    आरव उसकी तरफ देखता रह गया।

     

    “तुम… शेखर के भाई हो?”

     

    उस आदमी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “हां।”

     

    राघव ने गुस्से में कहा,

     

    “झूठ बोलना बंद करो!”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “राघव, तुम अब भी मुझे पहचानने से इनकार कर रहे हो?”

     

    राघव की आंखें फैल गईं।

     

    “तुम…”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा,

     

    “विक्रम…”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “विक्रम कौन?”

     

    माधवी ने धीमे से कहा,

     

    “शेखर का छोटा भाई।”

     

    आरव की नजर उस आदमी पर टिक गई।

     

    “अगर तुम विक्रम हो… तो इतने सालों तक कहां थे?”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “जहां मुझे होना चाहिए था।”

     

    “कहां?”

     

    “तुम्हारे आसपास।”

     

    आरव के चेहरे पर उलझन थी।

     

    “मतलब?”

     

    विक्रम ने एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    “तुम्हें लगता है तुम्हारी जिंदगी में जो कुछ हुआ, वो सब अचानक हुआ?”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    विक्रम बोला,

     

    “तुम्हारी हर परेशानी, हर हादसा, हर वो इंसान जो अचानक तुम्हारी जिंदगी में आया… उसके पीछे किसी न किसी का हाथ था।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो तुमने हमें कब से देखा?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “बहुत पहले से।

     

    राघव ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने इतने सालों तक हमें क्यों नहीं छोड़ा?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे शेखर की तलाश थी।”

     

    “तुम्हें शेखर से क्या चाहिए था?”

     

    “उसकी मौत।”

     

    माधवी चौंक गईं।

     

    “तुम अपने ही भाई को मारना चाहते थे?”

     

    विक्रम की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “क्योंकि उसने मेरे साथ धोखा किया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कैसा धोखा?”

     

    विक्रम ने कुछ पल उसे देखा।

     

    “तुम्हें सच जानना है?”

     

    “हां।”

     

    “तो पहले ये समझो कि तुम्हारे पिता सिर्फ तुम्हारे पिता नहीं थे।”

     

    “फिर?”

     

    “वो उस संगठन के मुखिया थे जिसने हमारे पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन-सा संगठन?”

     

    विक्रम चुप रहा।

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “विक्रम, अब ये सब बताने का समय आ गया है।”

     

    विक्रम ने उनकी तरफ देखा।

     

    “तुम भी यहां हो?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “हां।”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “तो फिर आज बहुत सारे पुराने हिसाब पूरे होंगे।”

     

    विक्रम ने दीवार पर लगे पुराने प्रोजेक्टर को देखा।

     

    उसने एक बटन दबाया।

     

    स्क्रीन फिर से जल उठी।

     

    इस बार शेखर सामने नहीं थे।

     

    बल्कि एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

     

    उसमें शेखर, विक्रम, राघव और अर्जुन एक साथ खड़े थे।

     

    आरव ने तस्वीर देखकर पूछा,

     

    “आप सब एक-दूसरे को पहले से जानते थे?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “कितने सालों से?”

     

    “तुम्हारे जन्म से भी पहले।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “फिर ये सब छुपाया क्यों गया?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “क्योंकि हम सबने एक गलती की थी।”

     

    “क्या?”

     

    राघव ने सिर झुका लिया।

     

    “हमने शेखर पर भरोसा किया।”

     

    विक्रम ने कड़वाहट से कहा,

     

    “और वही हमारी सबसे बड़ी गलती थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “शेखर ने क्या किया?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “उसने अपनी मौत का नाटक किया।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “क्योंकि उसे पता चल गया था कि कोई उसके पीछे पड़ा है।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “वो सिर्फ अपने लिए नहीं छिपा था।”

     

    विक्रम ने तुरंत कहा,

     

    “हां! वो आरव और आरोही को बचाने के लिए छिपा था।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “मुझे भी?”

     

    विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    विक्रम ने एक पुरानी फाइल निकाली।

     

    “तुम दोनों का जन्म एक ही रात हुआ था।”

     

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “लेकिन तुम्हें नहीं पता कि उसी रात क्या हुआ था।”

     

    विक्रम ने फाइल खोली।

     

    “अस्पताल में आग लगाई गई थी।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किसने?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “विराज ने।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “लेकिन वो क्यों?”

     

    “क्योंकि उस अस्पताल में तुम्हारे जन्म का रिकॉर्ड था।”

     

    “सिर्फ हमारा रिकॉर्ड?”

     

    “नहीं।”

     

    विक्रम ने फाइल का एक पन्ना उठाया।

     

    “एक ऐसा रिकॉर्ड भी था जो साबित कर सकता था कि विराज ने करोड़ों रुपये का घोटाला किया था।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “इसलिए उसने अस्पताल में आग लगाई।”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन हम दोनों को किसने बचाया?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां माधवी और नंदिनी ने।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “उस रात मैं तुम्हें लेकर भागी थी।”

     

    माधवी बोलीं,

     

    “और मैं आरव को लेकर।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “फिर?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “फिर हम अलग हो गए।”

     

    आरव ने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, आपने मुझे इतने साल क्यों नहीं बताया?”

     

    माधवी ने रोते हुए कहा,

     

    “क्योंकि हमें डर था कि अगर तुम्हें सच पता चला तो वो लोग तुम्हें फिर ढूंढ लेंगे।”

     

    “कौन लोग?”

     

    माधवी ने विक्रम की तरफ देखा।

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “वही लोग जिनके लिए आज भी तुम दोनों सबसे बड़ा खतरा हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन अब मैं डरूंगा नहीं।”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “यही तो देखना चाहता था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “कि तुम दोनों डरते हो या लड़ते हो।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हम लड़ेंगे।”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “तो फिर तुम्हें शेखर तक पहुंचना होगा।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “वो कहां हैं?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “यहीं।”

     

    विक्रम उन्हें हवेली के एक पुराने हिस्से में ले गया।

     

    वहां एक बड़ी किताबों की अलमारी थी।

     

    उसने एक किताब निकाली।

     

    अलमारी धीरे-धीरे पीछे हट गई।

     

    पीछे एक संकरी सीढ़ी दिखाई दी।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये रास्ता कहां जाता है?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “उस कमरे तक जहां शेखर पिछले दो सालों से छिपा है।”

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    “दो साल?”

     

    “हां।”

     

    “और आपने हमें क्यों नहीं बताया?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “क्योंकि पहले मुझे यकीन करना था कि तुम सच में उसके बेटे हो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम्हें अब यकीन है?”

     

    विक्रम ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “अब पूरा यकीन है।”

     

    सब लोग सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

     

    सबसे आगे विक्रम था।

     

    उसके पीछे आरव और आरोही।

     

    फिर राघव, माधवी, नंदिनी, अर्जुन और कबीर।

     

    सीढ़ियों के आखिर में एक लोहे का दरवाजा था।

     

    विक्रम ने दरवाजे पर तीन बार दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    विक्रम ने फिर दस्तक दी।

     

    इस बार अंदर से आवाज आई “कौन?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “मैं हूं।”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर आवाज आई “तुम अकेले हो?”

     

    विक्रम ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “कौन है?”

     

    विक्रम ने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारा बेटा।”

     

    दरवाजे के पीछे अचानक खामोशी छा गई।

     

    फिर…

     

    क्लिक।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    कमरे में बहुत कम रोशनी थी।

     

    एक आदमी खिड़की के पास खड़ा था।

     

    उसके बाल थोड़े सफेद हो चुके थे।

     

    चेहरा थका हुआ था।

     

    लेकिन आंखें…

     

    आरव की आंखों जैसी।

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “शेखर…”

     

    आदमी पलटा।

     

    आरव और शेखर की नजरें मिलीं।

     

    दोनों कुछ पल तक कुछ नहीं बोले।

     

    फिर शेखर की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “आरव…”

     

    आरव के कदम वहीं रुक गए।

     

    शेखर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़े।

     

    “मैंने तुम्हें पहली बार देखा था… जब तुम सिर्फ कुछ घंटे के थे।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “फिर मुझे छोड़ क्यों दिया?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा।”

     

    “फिर?”

     

    “मैंने तुम्हें बचाया।”

     

    आरव की आवाज भर्रा गई।

     

    “मेरे बिना रहे?”

     

    “हर दिन।”

     

    शेखर ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    आरव कुछ पल खड़ा रहा।

     

    फिर उसने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    शेखर ने उसे अपने सीने से लगा लिया।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    माधवी यह देखकर रो पड़ीं।

     

    राघव भी नजरें झुका गए।

     

    आरोही चुपचाप दोनों को देखती रही।

     

    कुछ देर बाद शेखर ने आरव से कहा,

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किस बात के लिए?”

     

    “तुम्हारा बचपन तुमसे छीनने के लिए।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “आपने मुझे बचाया था।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “लेकिन अब एक और सच तुम्हें जानना होगा।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “तुम्हारे जन्म के बाद मैंने तुम्हें एक नाम दिया था।”

     

    “कौन सा?”

     

    शेखर ने कहा “आरव राजवंशी नहीं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    शेखर ने आगे कहा,

     

    “तुम्हारा असली नाम था…”

     

    अचानक कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    सब चौंक गए।

     

    कबीर ने तुरंत दरवाजा बंद किया।

     

    बाहर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    शेखर ने आरव को नीचे खींच लिया।

     

    “सब नीचे!”

     

    अगली गोली दीवार में जा लगी।

     

    आरोही चीख उठी।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं ठीक हूं।”

     

    शेखर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “वो यहां तक पहुंच गए।”

     

    विक्रम ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    शेखर ने गंभीर आवाज में कहा “विराज नहीं…”

     

    उन्होंने बाहर अंधेरे में देखा।

     

    “इस बार… खुद शेखर को मारने वाला आया है।”

     

    आरव ने चौंककर पूछा,

     

    “कौन?”

     

    शेखर ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर था।

     

    “तुम्हारा दूसरा पिता।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “दूसरा… पिता?”

     

    शेखर ने कहा “तुम्हें ये जानना होगा कि तुम्हें जन्म देने वाला कौन था… और तुम्हें पालने वाला कौन।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “मतलब?”

     

    शेखर ने जवाब दिया “आरव का जन्म दो परिवारों के राज से हुआ था।”

     

    तभी दरवाजा जोर से हिलने लगा।

     

    धड़ाम!

     

    कोई बाहर से उसे तोड़ने की कोशिश कर रहा था।

     

    शेखर ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अगर मैं आज नहीं बचा… तो नीलगिरी हवेली के नीचे छुपी लाल फाइल ढूंढना।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “उसमें क्या है?”

     

    शेखर ने कहा “तुम्हारे जन्म का वो सच… जो तुम्हें और आरोही को हमेशा के लिए एक-दूसरे से अलग भी कर सकता है।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    और तभी…

     

    दरवाजा टूटकर जमीन पर गिर गया।

     

    धुएं के बीच एक परिचित चेहरा सामने आया।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    वह आदमी मुस्कुराया और बोला “बहुत हो गया पिता-पुत्र का मिलन… अब मेरी बेटी को मेरे साथ भेज दो।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “बेटी…?”

     

    शेखर ने घबराकर कहा “आरोही… इसके पास मत जाना। यही तुम्हारा असली पिता है।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 21

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 21

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 21 : नीलगिरी हवेली का रहस्य

     

    माधवी की बात सुनते ही मंदिर के बाहर खड़े सभी लोग जैसे पत्थर के हो गए।

     

    “नीलगिरी हवेली में नंदिनी कैद है।”

     

    आरोही के होंठ कांपने लगे।

     

    “मां… आपको पक्का पता है?”

     

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां बेटा। मुझे अपनी आंखों से नंदिनी को वहां जाते हुए देखा था।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “तो मेरी मां जिंदा है…”

     

    माधवी ने उसे गले लगा लिया।

     

    “हां।”

     

    आरोही उनके सीने से लगकर रोने लगी।

     

    “मुझे उन्हें बचाना है।”

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “हम उन्हें बचाएंगे।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन तुम्हें अकेले बुलाया गया है।”

     

    “मैं अकेला नहीं जाऊंगा।”

     

    “लेकिन उस आदमी ने धमकी दी है।”

     

    आरव ने शांत आवाज में कहा,

     

    “अगर उसने नंदिनी मां को सच में कैद कर रखा है, तो वो चाहता है कि मैं अकेला जाऊं। लेकिन हम उसकी शर्तों पर नहीं चलेंगे।”

     

    अर्जुन ने सिर हिलाया।

     

    “बिल्कुल।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “विराज और शेखर दोनों खेल खेल रहे हैं। हमें बहुत सावधानी से कदम उठाना होगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और अगर शेखर सच में मेरे पिता हैं?”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो इस बार तुम्हें फैसला करना होगा कि तुम किसे अपना पिता मानते हो।”

     

    आरव की नजर राघव पर टिक गई।

     

    कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने धीरे से कहा,

     

    “जिसने मुझे पाला… मेरे लिए वो हमेशा मेरे पिता रहेंगे।”

     

    राघव की आंखें भर आईं।

     

    उन्होंने आरव को गले लगा लिया।

     

    कुछ घंटों बाद सभी लोग नीलगिरी हवेली के लिए निकल पड़े।

     

    इस बार आरव ने साफ कह दिया था कि कोई भी उसे अकेला नहीं छोड़ेगा।

     

    अद्वैत गाड़ी चला रहा था।

     

    कबीर उसके साथ बैठा था।

     

    पीछे आरव, आरोही, राघव, माधवी और अर्जुन बैठे थे।

     

    रास्ते में अचानक आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम बहुत चुप हो।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “सोच रहा हूं।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर वो आदमी सच में मेरा पिता निकला तो?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “तब भी तुम वही रहोगे।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    “आरव, तुम्हारी पहचान सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि तुम्हारे पिता कौन हैं।”

     

    वह उसका हाथ दबाते हुए बोली,

     

    “तुम्हारी पहचान तुम्हारे कर्मों से है।”

     

    आरव मुस्कुरा दिया।

     

    “तुम्हें पता है, तुम जब समझाती हो तो बहुत समझदार लगती हो।”

     

    “और?”

     

    “जब गुस्सा करती हो तो बिल्कुल नहीं।”

     

    आरोही ने उसे घूरा।

     

    “मैं अभी गुस्सा कर दूंगी।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “यही तो कह रहा था।”

     

    आरोही भी मुस्कुरा दी।

     

    लेकिन अगले ही पल उसकी नजर आरव के हाथ पर गई।

     

    “आरव…”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारा हाथ कांप रहा है।”

     

    आरव ने नजरें चुरा लीं।

     

    “थोड़ा डर लग रहा है।”

     

    आरोही ने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।

     

    “अब?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब नहीं।”

     

    शाम ढलते-ढलते वे समुद्र के किनारे पहुंच गए।

     

    सामने एक बहुत बड़ी, पुरानी हवेली थी।

     

    चारों तरफ घना जंगल था।

     

    समुद्र की लहरें हवेली के पीछे चट्टानों से टकरा रही थीं।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।

     

    कबीर ने गाड़ी रोक दी।

     

    “दरवाजा खुला है।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “ये अच्छी बात नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस हवेली का दरवाजा पिछले दस सालों से किसी ने नहीं खोला।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “तो फिर आज किसने खोला?”

     

    किसी के पास जवाब नहीं था।

     

    आरव गाड़ी से उतर गया।

     

    “चलो।”

     

    राघव ने उसे रोकते हुए कहा,

     

    “सावधान रहना।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    सभी लोग हवेली के अंदर गए।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    एक बड़ी घड़ी बंद पड़ी थी।

     

    फर्श पर धूल जमा थी।

     

    लेकिन बीच कमरे में…

     

    एक दीपक जल रहा था।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “कोई यहां है।”

     

    तभी ऊपर से आवाज आई “स्वागत है, आरव।”

     

    सबने ऊपर देखा।

     

    बालकनी खाली थी।

     

    फिर आवाज आई “तुम्हें अकेले आना था।”

     

    आरव ने जवाब दिया,

     

    “मैं अकेला नहीं आया।”

     

    आवाज में हंसी थी।

     

    “मुझे पता था।”

     

    अचानक हवेली के दूसरे हिस्से से किसी महिला की चीख सुनाई दी।

     

    “बचाओ!”

     

    आरोही तुरंत उस तरफ दौड़ने लगी।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको!”

     

    “वो मां की आवाज थी।”

     

    “हो सकता है जाल हो।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू थे।

     

    “अगर सच में मां हुई तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “हम साथ जाएंगे।”

     

    दोनों आगे बढ़े।

     

    एक लंबे गलियारे के आखिर में लोहे का दरवाजा था।

     

    दरवाजे के पीछे से फिर आवाज आई “आरोही!”

     

    आरोही रो पड़ी।

     

    “मां!”

     

    उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    ताला लगा था।

     

    कबीर ने ताला तोड़ने की कोशिश की।

     

    लेकिन तभी राघव ने कहा,

     

    “रुको।”

     

    “क्यों?”

     

    “इस दरवाजे के नीचे बिजली की वायर जा रही है।”

     

    अद्वैत ने जमीन देखी।

     

    “ये जाल है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो असली कमरा कौन सा है?”

     

    तभी अर्जुन ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    “यहां।”

     

    उन्होंने एक खास पत्थर दबाया।

     

    दीवार का एक हिस्सा खुल गया।

     

    पीछे एक गुप्त रास्ता था।

     

    आरोही ने हैरानी से कहा,

     

    “आपको ये कैसे पता?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “क्योंकि मैंने ये हवेली बनवाई थी।”

     

    सब चौंक गए।

     

    गुप्त रास्ते से नीचे उतरने के बाद वे एक छोटे कमरे में पहुंचे।

     

    कमरे में एक कुर्सी थी।

     

    और उस कुर्सी पर…

     

    एक महिला बैठी थी।

     

    उसके हाथ बंधे हुए थे।

     

    बाल बिखरे हुए थे।

     

    लेकिन चेहरा…

     

    वही था।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मां…”

     

    महिला ने धीरे से सिर उठाया।

     

    कुछ पल तक वह आरोही को देखती रही।

     

    फिर उसकी आंखें भर आईं।

     

    “आरोही…”

     

    आरोही दौड़कर उनके पास गई।

     

    “मां!”

     

    नंदिनी ने उसे कसकर गले लगा लिया।

     

    दोनों रोने लगीं।

     

    “मुझे पता था तुम एक दिन मुझे ढूंढते हुए यहां जरूर आओगी।”

     

    आरोही रोते हुए बोली,

     

    “आपने मुझे छोड़ क्यों दिया?”

     

    नंदिनी ने उसके चेहरे को छुआ।

     

    “मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    “फिर इतने साल?”

     

    “मैं मजबूर थी।”

     

    आरव भी कुछ दूरी पर खड़ा उन्हें देख रहा था।

     

    नंदिनी की नजर आरव पर पड़ी।

     

    उनकी आंखें भर आईं।

     

    “आरव…”

     

    आरव चौंका।

     

    “आप मुझे जानती हैं?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे नहीं पहचानूंगी?”

     

    आरव उनके पास गया।

     

    नंदिनी ने उसका चेहरा दोनों हाथों में ले लिया।

     

    “तुम बिल्कुल अपने पिता जैसे दिखते हो।”

     

    आरव की आंखों में सवाल था।

     

    “मेरे पिता कौन हैं?”

     

    नंदिनी चुप हो गईं।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मुझे सच बताइए।”

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता का नाम शेखर है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    “तो शेखर सच में मेरे पिता हैं?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पीछे मुड़कर राघव की तरफ देखा।

     

    राघव की आंखें नम थीं।

     

    “तो इतने सालों तक…”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “राघव ने तुम्हें अपने बेटे से भी ज्यादा प्यार किया।”

     

    आरव ने राघव की तरफ देखा।

     

    राघव ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें कभी किसी और का बेटा नहीं समझा।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मुझे आपसे कभी शिकायत नहीं थी।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “लेकिन अब तुम्हें अपने पिता को जानना होगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “शेखर कहां हैं?”

     

    नंदिनी ने नजरें झुका लीं।

     

    “यहीं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    नंदिनी ने कहा,

     

    “इस हवेली में।”

     

    अचानक कमरे की लाइट जल गई।

     

    सामने दीवार पर एक प्रोजेक्टर चल पड़ा।

     

    स्क्रीन पर एक आदमी दिखाई दिया।

     

    आरव उसे देखते ही ठहर गया।

     

    चेहरा गंभीर था।

     

    आंखों में अजीब-सी गहराई।

     

    नंदिनी ने धीमे से कहा,

     

    “शेखर।”

     

    स्क्रीन पर आदमी बोला “आरव…”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “पापा?”

     

    शेखर कुछ पल उसे देखते रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “मुझे पता था तुम एक दिन यहां जरूर आओगे।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो सामने क्यों नहीं आते?”

     

    शेखर ने जवाब दिया,

     

    “क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम पहले पूरी सच्चाई जानो।”

     

    “क्या सच्चाई?”

     

    “तुम्हारी मां माधवी ने तुमसे बहुत कुछ छुपाया।”

     

    माधवी आगे आईं।

     

    “शेखर, अब ये सब बंद करो।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “माधवी… तुमने आरव को बताया कि मैं मर गया हूं।”

     

    माधवी रोते हुए बोलीं,

     

    “मैंने उसे बचाने के लिए कहा था।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “और मैंने उसे दूर रहकर बचाया।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “दोनों ने मुझे बचाने के नाम पर मुझसे मेरा बचपन छीन लिया।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    शेखर ने अचानक गंभीर आवाज में कहा,

     

    “आरव, मेरी बात ध्यान से सुनो।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारे जन्म की रात अस्पताल से दो बच्चों को बाहर ले जाया गया था।”

     

    आरव ने आरोही की तरफ देखा।

     

    “हम दोनों?”

     

    “हां।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म के समय अस्पताल में एक ऐसा दस्तावेज तैयार हुआ था, जिसमें एक बहुत बड़े अपराध का सबूत था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किस अपराध का?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “एक ऐसा अपराध… जिसमें राजवंशी परिवार, सूद परिवार और कई बड़े लोग शामिल थे।”

     

    देवेंद्र ने सिर झुका लिया।

     

    विराज का नाम सुनते ही राघव की मुट्ठियां भींच गईं।

     

    शेखर ने कहा,

     

    “विराज उस अपराध का हिस्सा था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और आप?”

     

    “मैं उस अपराध को रोकना चाहता था।”

     

    “फिर?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “मुझे धोखा दिया गया।”

     

    “किसने?”

     

    स्क्रीन कुछ सेकंड के लिए बंद हो गई।

     

    फिर दोबारा चालू हुई।

     

    शेखर ने कहा “जिसे तुम अपना सबसे भरोसेमंद दोस्त समझते हो।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    उसकी नजर धीरे-धीरे कबीर पर गई।

     

    कबीर चौंक गया।

     

    “आरव, मेरी तरफ ऐसे मत देखो।”

     

    आरव कुछ बोल पाता, उससे पहले शेखर ने कहा—

     

    “कबीर तुम्हारा दुश्मन नहीं है।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगली बात सुनकर सब स्तब्ध रह गए।

     

    “कबीर के पिता तुम्हारे पिता के दुश्मन थे।”

     

    कबीर ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझे पता था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो तुम मेरे पास क्यों आए?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “क्योंकि मेरे पिता ने जो किया था… उसका प्रायश्चित मैं करना चाहता था।”

     

    नंदिनी अचानक घबरा गईं।

     

    “शेखर, उन्हें जल्दी यहां से निकालो।”

     

    शेखर ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “क्योंकि वो आ चुका है।”

     

    सबने उनकी तरफ देखा।

     

    “कौन?”

     

    नंदिनी ने धीरे से कहा “विराज नहीं…”

     

    वह दरवाजे की तरफ देखने लगीं।

     

    “वो आदमी… जिससे हम पच्चीस साल से भाग रहे हैं।”

     

    तभी ऊपर से जोरदार धमाका हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    दीवार हिल गई।

     

    अर्जुन ने बंदूक निकाल ली।

     

    राघव ने कहा,

     

    “सब पीछे हटो।”

     

    फिर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    धीरे-धीरे…

     

    सीढ़ियों से कोई नीचे उतर रहा था।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कदमों की आवाज और करीब आई।

     

    फिर एक आदमी कमरे में दाखिल हुआ।

     

    उसे देखते ही शेखर की स्क्रीन पर मौजूद तस्वीर गायब हो गई।

     

    माधवी के मुंह से चीख निकल गई “नहीं…”

     

    आरव ने उस आदमी को देखा।

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “बहुत सालों से तुम लोग मेरा नाम सुनते आए हो।”

     

    वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “आज पहली बार मुझे देख भी लो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आदमी ने मुस्कुराकर कहा “मैं शेखर का भाई हूं।”

     

    सबके चेहरे पर हैरानी छा गई।

     

    राघव ने कांपती आवाज में कहा “नहीं… ये संभव नहीं है।”

     

    आदमी हंसा।

     

    “क्यों राघव?”

     

    फिर उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हें बचाने के लिए शेखर ने जिसे मरा हुआ बताया था… वो मैं था।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    और तभी उस आदमी ने आखिरी बात कही “आरव, तुम्हें अपने पिता की तलाश करने की जरूरत नहीं है…”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि शेखर अभी इसी हवेली में है।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 20

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 20

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    एपिसोड – 20 : विराज की वापसी और आरव की जिंदगी का सबसे बड़ा सच

     

    मंदिर के अंदर धुआं फैल चुका था।

     

    टूटा हुआ दरवाजा जमीन पर पड़ा था और उसके पीछे खड़ा था वही शख्स, जिसे सब पच्चीस साल पहले मर चुका समझते थे।

     

    विराज सूद।

     

    आरोही ने उसे देखते ही आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “आरव… ये वही है?”

     

    आरव की आंखें गुस्से से लाल हो गईं।

     

    “हां।”

     

    विराज धीरे-धीरे मंदिर के अंदर आया।

     

    उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।

     

    “इतने सालों बाद आखिर हम आमने-सामने हैं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम्हें तो मर जाना चाहिए था।”

     

    विराज हंस पड़ा।

     

    “लोगों को यही विश्वास दिलाना जरूरी था।”

     

    अर्जुन उसके सामने आकर खड़े हो गए।

     

    “विराज, अब बहुत हो चुका।”

     

    विराज ने उनकी तरफ देखा।

     

    “अर्जुन… तुम अब भी जिंदा हो?”

     

    अर्जुन ने जवाब दिया,

     

    “तुम्हारी तरह।”

     

    विराज ने ताली बजाई।

     

    “वाह! पच्चीस साल बाद भी तुम्हारी हिम्मत कम नहीं हुई।”

     

    राघव ने गुस्से में कहा,

     

    “तुमने हमारे परिवार की जिंदगी बर्बाद कर दी।”

     

    विराज ने उसकी तरफ देखा।

     

    “नहीं राघव… मैंने सिर्फ वही किया जो मुझे करना था।”

     

    “तुमने माधवी को हमसे अलग किया।”

     

    “हां।”

     

    “नंदिनी को गायब किया।”

     

    “हां।”

     

    “और आरव और आरोही की जिंदगी बर्बाद की।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “अभी तो उनकी जिंदगी शुरू हुई है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।

     

    “अगर आरोही को छूने की कोशिश भी की तो…”

     

    विराज ने बीच में कहा,

     

    “तो क्या करोगे?”

     

    आरव कुछ कहता, उससे पहले आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव, नहीं।”

     

    विराज दोनों को देखकर मुस्कुराया।

     

    “यही तो मुझे चाहिए था।”

     

    आरव ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “क्या?”

     

    “तुम दोनों का एक-दूसरे के लिए इतना प्यार।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “तुम्हें फाइल चाहिए, है ना?”

     

    विराज ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “तो यहां से चले जाओ।”

     

    “फाइल दो और मैं चला जाऊंगा।”

     

    अर्जुन ने लोहे का बॉक्स अपने पीछे कर लिया।

     

    “तुम्हें वो कभी नहीं मिलेगी।”

     

    विराज ने बंदूक निकाल ली।

     

    “फिर किसी एक की जान जाएगी।”

     

    माधवी आगे बढ़ीं।

     

    “विराज!”

     

    विराज ने उनकी तरफ देखा।

     

    “माधवी… तुम भी जिंदा हो।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “तुमने बहुत कुछ छीन लिया।”

     

    “लेकिन तुम्हारा बेटा मैंने नहीं छीना।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरी जिंदगी में जो कुछ हुआ, उसके पीछे तुम थे।”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारी जिंदगी में जो कुछ हुआ, उसके पीछे तुम्हारे अपने लोग थे।”

     

    आरव ने राघव की तरफ देखा।

     

    “क्या मतलब?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तुम्हें सच अपने पिता से पूछना चाहिए।”

     

    राघव ने नजरें झुका लीं।

     

    आरव उनके पास गया।

     

    “पापा?”

     

    राघव चुप रहे।

     

    “आपको क्या पता है?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “उसे सब पता है।”

     

    आरव ने राघव का कंधा पकड़ लिया।

     

    “सच बताइए।”

     

    राघव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “आरव…”

     

    “हां?”

     

    “मैंने तुम्हें बचाने के लिए एक बहुत बड़ा झूठ बोला था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन सा?”

     

    राघव ने कहा “विराज तुम्हारा दुश्मन जरूर है… लेकिन तुम्हारे पिता का कातिल नहीं।”

     

    आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “तो मेरी जिंदगी किसने बर्बाद की?”

     

    राघव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैंने।”

     

    “आपने?”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    राघव ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    आरोही तुरंत आरव के पास आई।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया लेकिन उसकी नजरें राघव पर थीं।

     

    “आपने मुझसे क्या छुपाया?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम्हारी असली पहचान।”

     

    “मैं कौन हूं?”

     

    “तुम मेरे बेटे हो।”

     

    “ये तो मुझे पता है।”

     

    “लेकिन तुम्हारे जन्म से पहले… तुम्हें लेकर एक फैसला हुआ था।”

     

    “कैसा फैसला?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम्हें इस दुनिया से गायब कर देने का।”

     

    आरव की सांसें थम गईं।

     

    “किसने?”

     

    राघव ने जवाब देने से पहले अर्जुन की तरफ देखा।

     

    अर्जुन ने धीरे से कहा,

     

    “राघव, अब सच छुपाने का कोई फायदा नहीं।”

     

    राघव ने आखिरकार कहा “तुम्हें मारने का आदेश… तुम्हारे असली पिता ने दिया था।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मेरे… असली पिता?”

     

    माधवी रो पड़ीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “मां, मुझे सब जानना है।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता का नाम…”

     

    वह रुक गईं।

     

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “कहिए।”

     

    माधवी की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    “तुम्हारे पिता… राघव नहीं हैं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरोही ने हैरानी से राघव की तरफ देखा।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तो आप मेरे पिता नहीं हैं?”

     

    राघव की आंखें भर आईं।

     

    “खून से नहीं… लेकिन दिल से तुम हमेशा मेरे बेटे रहे हो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मेरे असली पिता कौन हैं?”

     

    माधवी ने धीरे से कहा “शेखर राजवंशी।”

     

    अर्जुन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “शेखर कौन?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “राजवंशी परिवार का वो आदमी… जिसे दुनिया ने पच्चीस साल पहले सबसे बड़ा अपराधी माना था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “उन्होंने क्या किया था?”

     

    विराज पहली बार गंभीर हुआ।

     

    “उन्होंने मेरी पूरी दुनिया खत्म करने की कोशिश की थी।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और फिर?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “वो मारे गए।”

     

    माधवी ने धीरे से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    सबने उनकी तरफ देखा।

     

    “शेखर मरे नहीं थे।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “वो गायब हो गए थे।”

     

    “कहां?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो मेरे पिता जिंदा हैं?”

     

    माधवी ने जवाब दिया,

     

    “शायद।”

     

    विराज ने हंसकर कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरव उसकी तरफ मुड़ा।

     

    विराज ने कहा,

     

    “शेखर मर चुका है।”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    विराज ने अपनी जेब से एक तस्वीर निकाली।

     

    “अगर मैं झूठ बोल रहा हूं तो ये देखो।”

     

    उसने तस्वीर आरव की तरफ फेंकी।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में एक आदमी अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था।

     

    और उसके नीचे तारीख लिखी थी दो साल पहले।

     

    आरव की सांसें रुक गईं।

     

    “ये…”

     

    माधवी ने तस्वीर देखी और पीछे हट गईं।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “मां, आप इसे पहचानती हैं?”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा “हां… ये तुम्हारे पिता हैं।”

     

    आरव की आंखों के सामने जैसे सब धुंधला हो गया।

     

    उसने तस्वीर सीने से लगा ली।

     

    “तो वो जिंदा हैं।”

     

    आरोही उसके पास आई।

     

    “हम उन्हें ढूंढेंगे।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर उन्होंने मुझे कभी अपना बेटा माना ही नहीं तो?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “तो भी तुम उनके बेटे हो।”

     

    “अगर उन्होंने मुझे छोड़ दिया हो?”

     

    “तो मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगी।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “तुम हर बार मेरे टूटने से पहले मुझे संभाल लेती हो।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि तुम मेरे लिए सिर्फ एक कहानी नहीं हो, आरव।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “तुम मेरी जिंदगी हो।”

     

    कुछ पल के लिए दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    मंदिर के उस डरावने माहौल में भी उनके बीच एक अजीब-सी शांति थी।

     

    विराज ने उन्हें देखते हुए कहा,

     

    “यही प्यार तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगा।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “यही हमारा सबसे बड़ा हथियार है।”

     

    कबीर ने अचानक फाइल के आखिरी पन्ने पलटे।

     

    “रुको।”

     

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

     

    “यहां कुछ लिखा है।”

     

    उसने पन्ना आरव के सामने किया।

     

    उस पर लिखा था “शेखर राजवंशी – अंतिम लोकेशन: नीलगिरी हवेली।”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “ये नाम यहां कैसे?”

     

    राघव ने फाइल देखते ही कहा,

     

    “ये रिकॉर्ड मैंने कभी नहीं देखा।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि इसे आखिरी वक्त पर बदला गया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “नीलगिरी हवेली कहां है?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “समुद्र के किनारे।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “वहां कौन रहता है?”

     

    अर्जुन ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “कोई नहीं।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “फिर वहां जाएंगे।”

     

    अर्जुन ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि नीलगिरी हवेली में जो भी गया… वापस नहीं आया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मैं जाऊंगा।”

     

    राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं।”

     

    “इस बार कोई मुझे रोक नहीं सकता।”

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “मैं भी चलूंगी।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम दोनों नहीं समझते कि वहां कितना खतरा है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “हमने अपने परिवार का सच जानने के लिए इतना कुछ सहा है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अब पीछे नहीं हटेंगे।”

     

    विराज चुपचाप उनकी बातें सुन रहा था।

     

    अचानक उसने बंदूक नीचे कर दी।

     

    “जाओ।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “नीलगिरी हवेली जाओ।”

     

    “तुम हमें जाने दे रहे हो?”

     

    विराज मुस्कुराया।

     

    “हां।”

     

    आरव को शक हुआ।

     

    “क्यों?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “क्योंकि वहां तुम्हें वो मिलेगा जिसे तुम ढूंढ रहे हो।”

     

    “मेरे पिता?”

     

    “शायद।”

     

    “और अगर तुमने झूठ बोला?”

     

    विराज ने कहा,

     

    “तो तुम वापस आकर मुझे मार देना।”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “मैं जरूर लौटूंगा।”

     

    विराज ने कहा,

     

    “मुझे पता है।”

     

    सुबह होने लगी थी।

     

    आसमान हल्का नीला हो चुका था।

     

    सभी मंदिर से बाहर निकल आए।

     

    आरव और आरोही थोड़ी दूरी पर खड़े थे।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “पता नहीं।”

     

    “तुम्हें डर लग रहा है?”

     

    “हां।”

     

    “मुझे भी।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “लेकिन हम जाएंगे।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “साथ।”

     

    “साथ।”

     

    तभी मंदिर के अंदर से अचानक जोरदार आवाज आई।

     

    सब पलटकर देखने लगे।

     

    लोहे का बॉक्स अपने आप बंद हो गया था।

     

    और उसके ऊपर रखी फाइल के आखिरी पन्ने पर एक नई लाइन दिखाई दे रही थी।

     

    कबीर ने पन्ना उठाया।

     

    उस पर लिखा था “जिसे तुम अपना पिता समझ रहे हो, वह तुम्हारा पिता नहीं है।”

     

    आरव ने हैरानी से कहा,

     

    “ये अभी यहां नहीं था।”

     

    अर्जुन ने पन्ना देखा।

     

    उनके चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “ये…”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    अर्जुन ने कांपते हुए कहा “इस लिखावट को मैं पहचानता हूं।”

     

    “किसकी है?”

     

    अर्जुन ने धीरे से जवाब दिया “शेखर की।”

     

    आरव की धड़कन तेज हो गई।

     

    “मतलब?”

     

    अर्जुन ने फाइल को देखते हुए कहा “शेखर जिंदा है… और वो चाहता है कि तुम उसे ढूंढो।”

     

    उसी समय आरव के फोन पर एक वीडियो आया।

     

    वीडियो में एक अंधेरा कमरा था।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    फिर उस आदमी ने धीरे-धीरे अपना चेहरा कैमरे की तरफ उठाया।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    उस आदमी ने कहा “आरव… अगर तुम सच में अपने पिता को ढूंढना चाहते हो, तो नीलगिरी हवेली आओ।”

     

    कुछ सेकंड की खामोशी के बाद उसने कहा “लेकिन अकेले आना… क्योंकि आरोही को साथ लाए, तो अगली बार तुम्हारी मां जिंदा नहीं बचेगी।”

     

    वीडियो बंद हो गया।

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    उसने सिर्फ फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया।

     

    वीडियो देखकर आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    और तभी पीछे खड़ी माधवी चीख उठीं “नहीं! आरव वहां अकेला नहीं जाएगा… क्योंकि नीलगिरी हवेली में सिर्फ शेखर नहीं है…”

     

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

     

    माधवी ने कांपती आवाज में कहा “वहां नंदिनी भी कैद है।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 19

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 19

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 19 : पच्चीस साल बाद मंदिर की घंटी

     

    राजवंशी हवेली में हर कोई कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत खड़ा था।

     

    बाहर से मंदिर की घंटी की आवाज अब भी आ रही थी।

     

    टन…

     

    फिर कुछ सेकंड की खामोशी।

     

    टन…

     

    आरोही ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    “ये आवाज सच में उसी मंदिर से आ रही है?”

     

    देवेंद्र ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन आपने कहा था कि मंदिर पच्चीस साल से बंद है।”

     

    देवेंद्र की आंखें मंदिर की दिशा में टिकी थीं।

     

    “सिर्फ बंद नहीं… वहां किसी को जाने की इजाजत भी नहीं थी।”

     

    राघव ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “क्योंकि उस मंदिर में आखिरी बार तुम्हारे असली पिता को देखा गया था।”

     

    आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “अगर वो वहां थे… तो क्या वो आज भी…?”

     

    राघव ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी।

     

    “हमें वहां जाना होगा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अभी?”

     

    राघव ने घड़ी देखी।

     

    “सुबह होने में ज्यादा वक्त नहीं है।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “हम जाएंगे।”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें नहीं पता कि वहां क्या मिलेगा।”

     

    आरोही की आंखों में दृढ़ता थी।

     

    “मुझे अपने पिता के बारे में जानना है।”

     

    आरव उसके पास आकर खड़ा हो गया।

     

    “और मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हमेशा?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “हमेशा।”

     

    कुछ देर बाद आरव, आरोही, राघव, माधवी, कबीर और अद्वैत मंदिर की तरफ निकल पड़े।

     

    देवेंद्र भी उनके साथ था।

     

    रास्ते भर कोई कुछ नहीं बोल रहा था।

     

    सिर्फ गाड़ी के इंजन की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    आरोही खिड़की से बाहर देख रही थी।

     

    उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था मेरे असली पिता कौन हैं?

     

    कुछ देर बाद गाड़ी एक सुनसान रास्ते पर रुकी।

     

    सामने घने पेड़ों के बीच पुराना शिव मंदिर दिखाई दे रहा था।

     

    मंदिर के चारों तरफ बेलें उगी हुई थीं।

     

    दरवाजे पर जंग लगी लोहे की जंजीर लटक रही थी।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात…

     

    मंदिर की घंटी लगातार हिल रही थी।

     

    आरव ने कहा,

     

    “हवा भी नहीं चल रही।”

     

    कबीर ने चारों तरफ देखा।

     

    “तो घंटी कौन बजा रहा है?”

     

    तभी घंटी फिर बजी।

     

    टन…

     

    आरोही की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

     

    वह आरव के करीब आ गई।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “डरो मत।”

     

    “मैं डर नहीं रही।”

     

    “झूठ।”

     

    “थोड़ा।”

     

    आरव हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “मैं हूं ना।”

     

    राघव मंदिर के दरवाजे के पास गए।

     

    उन्होंने जंजीर हटाने की कोशिश की।

     

    जंजीर अपने आप नीचे गिर गई।

     

    सब चौंक गए।

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “ये अपने आप कैसे खुली?”

     

    देवेंद्र ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “क्योंकि कोई अंदर से हमारा इंतजार कर रहा है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    देवेंद्र ने जवाब नहीं दिया।

     

    वे सभी मंदिर के अंदर गए।

     

    अंदर धूल जमी थी।

     

    शिवलिंग के सामने एक दीपक जल रहा था।

     

    आरोही ने हैरानी से कहा,

     

    “यहां तो कोई है।”

     

    आरव ने दीपक को देखा।

     

    “ये अभी-अभी जलाया गया है।”

     

    तभी मंदिर की दीवार पर बनी एक पुरानी तस्वीर पर आरोही की नजर पड़ी।

     

    वह तस्वीर के पास गई।

     

    उसमें एक महिला एक छोटे बच्चे को गोद में लिए खड़ी थी।

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “ये… मां हैं।”

     

    राघव ने तस्वीर देखते ही आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “और ये बच्चा?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “तुम।”

     

    आरोही ने तस्वीर को छुआ।

     

    “लेकिन ये मंदिर में कैसे?”

     

    माधवी ने कहा,

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां ने तुम्हें यहीं आखिरी बार सुरक्षित रखा था।”

     

    कबीर ने मंदिर की दीवारों को ध्यान से देखना शुरू किया।

     

    “यहां कुछ अजीब है।”

     

    एक पत्थर बाकी पत्थरों से थोड़ा बाहर निकला हुआ था।

     

    कबीर ने उसे दबाया।

     

    घर्रर…

     

    फर्श का एक हिस्सा खुल गया।

     

    नीचे सीढ़ियां थीं।

     

    आरव ने कहा,

     

    “नीचे चलते हैं।”

     

    राघव ने उसे रोकना चाहा।

     

    “रुको।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम वो देखो।”

     

    आरव ने पिता की आंखों में देखा।

     

    “अब और कुछ मत छुपाइए।”

     

    राघव चुप हो गए।

     

    आखिरकार बोले,

     

    “ठीक है।”

     

    सब नीचे उतरने लगे।

     

    नीचे एक छोटा कमरा था।

     

    दीवारों पर पुराने दस्तावेज और तस्वीरें लगी थीं।

     

    बीच में एक लकड़ी की मेज थी।

     

    उस पर एक लाल कपड़ा रखा था।

     

    आरोही ने कपड़ा हटाया।

     

    नीचे एक पुराना डिब्बा था।

     

    डिब्बे पर लिखा था “आरोही के लिए।”

     

    उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक चिट्ठी थी।

     

    आरोही ने कांपते हाथों से उसे खोला।

     

    चिट्ठी में लिखा था “मेरी बेटी आरोही, अगर तुम ये चिट्ठी पढ़ रही हो, तो शायद मैं तुम्हारे सामने नहीं हूं।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    वह पढ़ती गई।

     

    “मैं तुम्हें अपनी बेटी कहने का अधिकार रखता हूं या नहीं, ये फैसला तुम करना। लेकिन इतना जान लो कि मैंने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    अगली लाइन थी “तुम्हारी मां नंदिनी ने तुम्हें बचाने के लिए बहुत कुछ खोया है। अगर कभी तुम्हें लगे कि उसने तुम्हें छोड़ दिया, तो उस पर भरोसा करना। उसने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    आरोही ने चिट्ठी सीने से लगा ली।

     

    “मां…”

     

    आरव उसके पास बैठ गया।

     

    चिट्ठी का आखिरी हिस्सा पढ़ते हुए आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “लेकिन सबसे बड़ा सच अभी बाकी है।”

     

    “तुम्हारा जन्म जिस रात हुआ, उसी रात एक दूसरा बच्चा भी पैदा हुआ था।”

     

    आरव ने धीमे से कहा,

     

    “फिर वही बात…”

     

    आरोही आगे पढ़ने लगी।

     

    “वो बच्चा आरव था।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    फिर अगली लाइन “आरव तुम्हारा भाई नहीं है।”

     

    आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगली लाइन पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।

     

    “क्योंकि आरव… तुम्हारा बचपन का साथी ही नहीं, बल्कि तुम्हारी मां नंदिनी की आखिरी इच्छा से जुड़ा हुआ है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या मतलब?”

     

    आरोही ने चिट्ठी आगे बढ़ा दी।

     

    चिट्ठी में लिखा था “नंदिनी चाहती थी कि तुम दोनों बड़े होकर एक-दूसरे का साथ दो। उसने कहा था कि अगर दोनों बच्चे एक साथ रहे तो शायद वो राज खुल जाएगा जिसे हमने दुनिया से छुपाया है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन-सा राज?”

     

    चिट्ठी के आखिरी शब्द थे “तुम दोनों की जिंदगी एक-दूसरे से जुड़ी है, क्योंकि तुम दोनों के पास उस रात का आधा-आधा सच है।”

     

    आरोही ने सिर उठाया।

     

    “आधा-आधा सच?”

     

    राघव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “लेकिन दूसरा आधा सच कहां है?”

     

    तभी पीछे से किसी ने कहा “मेरे पास।”

     

    सब पलटकर देखने लगे।

     

    मंदिर के अंधेरे कोने से एक आदमी बाहर आया।

     

    उसने सफेद कपड़े पहने थे।

     

    चेहरा आधा ढका हुआ था।

     

    आरव ने तुरंत आरोही को अपने पीछे कर लिया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    वह आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

     

    “जिसका इंतजार तुम इतने सालों से कर रहे थे।”

     

    आरोही की सांसें रुक गईं।

     

    “पापा?”

     

    आदमी ने चेहरा ऊपर किया।

     

    राघव पीछे हट गए।

     

    माधवी की आंखों में आंसू आ गए।

     

    देवेंद्र ने फुसफुसाकर कहा “अर्जुन…”

     

    आरोही उस आदमी को देखती रह गई।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल वैसा ही था जैसा पुरानी तस्वीरों में था।

     

    “आप… मेरे पिता हैं?”

     

    अर्जुन की आंखें भर आईं।

     

    “हां, बेटी।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    वह धीरे-धीरे उनके पास गई।

     

    “आपने मुझे इतने साल अकेला क्यों छोड़ा?”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    “मैंने तुम्हें कभी छोड़ा नहीं।”

     

    “फिर कहां थे?”

     

    “तुम्हें बचा रहा था।”

     

    “किससे?”

     

    अर्जुन की नजर देवेंद्र पर गई।

     

    फिर राघव पर।

     

    फिर कबीर पर।

     

    “उन लोगों से… जिन पर तुमने भरोसा किया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और मैं?”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें भी बचाया गया था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे असली माता-पिता कौन हैं?”

     

    अर्जुन कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “तुम्हारी मां माधवी है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “और पिता?”

     

    अर्जुन ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “तुम्हारे पिता…”

     

    अर्जुन अचानक रुक गए।

     

    “क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

     

    अर्जुन ने धीरे से कहा “ये सच मैं यहां नहीं बता सकता।”

     

    आरव गुस्से में बोला,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिसने तुम्हारे परिवार को खत्म किया, वो अभी भी जिंदा है।”

     

    तभी मंदिर के बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई।

     

    अर्जुन ने तुरंत कहा,

     

    “सब लोग पीछे हटो।”

     

    राघव ने पूछा,

     

    “कौन आया है?”

     

    अर्जुन ने कहा “वही… जिसका हम पच्चीस साल से इंतजार कर रहे थे।”

     

    अचानक बाहर से गोलियों की आवाज आने लगी।

     

    धांय! धांय!

     

    मंदिर की खिड़की का शीशा टूट गया।

     

    आरव ने आरोही को नीचे झुका दिया।

     

    “नीचे!”

     

    अद्वैत ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    “बहुत लोग हैं।”

     

    देवेंद्र ने कहा,

     

    “हमें पीछे वाले रास्ते से निकलना होगा।”

     

    अर्जुन ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “अगर हम भागे तो वो मंदिर के नीचे वाला कमरा ढूंढ लेंगे।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “वहां ऐसा क्या है?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “तुम दोनों के जन्म का असली रिकॉर्ड।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “तो उसे लेकर चलते हैं।”

     

    अर्जुन ने सिर हिलाया।

     

    “वो रिकॉर्ड सिर्फ मैं खोल सकता हूं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसकी चाबी मेरे पास नहीं…”

     

    उन्होंने आरोही के लॉकेट की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पास है।”

     

    आरोही ने अपना लॉकेट पकड़ लिया।

     

    “इसमें?”

     

    अर्जुन मुस्कुराए।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने लॉकेट खोला।

     

    अंदर की तस्वीर के पीछे एक छोटा-सा बटन था।

     

    उसने बटन दबाया।

     

    लॉकेट के अंदर से एक बेहद छोटी चाबी बाहर निकल आई।

     

    आरव ने हैरानी से कहा,

     

    “इतनी छोटी चाबी?”

     

    अर्जुन ने कहा,

     

    “यही वो चाबी है जो पच्चीस साल से छुपी हुई थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किसकी चाबी?”

     

    अर्जुन ने मंदिर की दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “उस कमरे की।”

     

    दीवार के पीछे एक छोटा ताला था।

     

    आरोही ने चाबी लगाई।

     

    ताला खुल गया।

     

    दीवार के अंदर एक लोहे का बॉक्स था।

     

    अर्जुन ने बॉक्स खोला।

     

    अंदर एक पुरानी फाइल थी।

     

    उसके ऊपर लिखा था “जन्म रिकॉर्ड – गोपनीय।”

     

    आरव और आरोही दोनों आगे बढ़े।

     

    आरव ने पहला पन्ना खोला।

     

    उस पर दो नाम थे बच्ची – आरोही

    बच्चा – आरव

     

    लेकिन पिता के नाम वाली जगह देखकर दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    आरोही के सामने लिखा था अर्जुन राजवंशी

     

    और आरव के सामने लिखा था अज्ञात।

     

    आरव ने धीरे से पूछा,

     

    “मेरे पिता का नाम अज्ञात क्यों है?”

     

    अर्जुन की आंखों में दर्द था।

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म का सच… तुम्हारी मां से भी छुपाया गया था।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “तो फिर मेरे पिता कौन हैं?”

     

    अर्जुन ने होंठ खोले ही थे कि बाहर से किसी ने जोर से आवाज लगाई “अर्जुन! बाहर आ जाओ!”

     

    अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    वह आवाज सुनते ही राघव ने सिर झुका लिया।

     

    माधवी की आंखों में डर भर गया।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन है?”

     

    अर्जुन ने धीरे से कहा “तुम्हारा असली दुश्मन।”

     

    बाहर से वही आवाज फिर आई “और अगर आज तुम बाहर नहीं आए… तो इस बार तुम्हारी बेटी नहीं बचेगी।”

     

    आरव तुरंत आरोही के सामने खड़ा हो गया।

     

    अर्जुन ने आरव की तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में पहली बार पिता वाला गर्व दिखाई दिया।

     

    “अब समझ आया… तुम दोनों को अलग क्यों नहीं किया जा सकता।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    अर्जुन ने कहा “क्योंकि तुम दोनों सिर्फ एक-दूसरे की किस्मत नहीं हो… तुम दोनों मिलकर उस आदमी का साम्राज्य खत्म कर सकते हो।”

     

    बाहर से एक जोरदार धमाका हुआ।

     

    मंदिर का दरवाजा टूट गया।

     

    और धुएं के बीच एक आदमी अंदर आया।

     

    उसके चेहरे को देखते ही आरव के मुंह से निकला “चाचा…?”

     

    लेकिन इस बार चाचा अकेले नहीं थे।

     

    उनके पीछे…

     

    विराज सूद खड़ा था।

     

    जिसे सब पच्चीस साल पहले मर चुका समझते थे।

     

    विराज ने मुस्कुराकर कहा “बहुत ढूंढ लिया मुझे… अब मेरी बारी है तुम्हें ढूंढने की।”

     

    जारी रहेगा…