मुझको इतना भी ना तरसा बात करने के लिए ,
मै भी इंसान हु कोई पत्थर नहीं ।।।
मुझको इतना भी ना तरसा बात करने के लिए ,
मै भी इंसान हु कोई पत्थर नहीं ।।।
मौत से ठीक, एक दिन पहले तक,,
मैं भी सबके लिए, बुरा ही रहूंगा…✍️
अबकी बार तुझसे अच्छा मौसम देख के मिलेंगे..
वक़्त जल्दी बीतता है घड़ियां फेक के मिलेंगे।।
पिछली बार तो हम दोनों हुए बहुत बदनाम।।
अबकी बार दांए-बांए देख के गले मिलेंगे..
वो जिस रास्ते से गुजरी है वहां जाकर देख…
मुरझाए हुए फूल भी तुमको खिले मिलेंगे।।
मुहब्बत बड़ी गहरी हो गई है तुमसे ।।
इसका मतलब जख्म भी बड़े गहरे मिलेंगे..
एक प्यारी सी बिंदी…!
बिखरी सी….सँवरी सी…ज़ुल्फें…!
एक झुमका बहका हुआ… और !
हल्की सी मुस्कान तुम्हारे होंठों पर…!!
*तुम समझ नहीं आती लेकिन…!*
*कसम से.. मुझे, पसंद बहुत आती हो…!!!❤️💞*
अपने क़दमों के निशान मेरे रास्ते से हटा दो,
*कहीं ये ना हो कि मैं चलते चलते तेरे पास आ जाऊं!!*💞

शाम का समय था। हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। सड़क किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान पर भीड़ लगी थी। रिया भीगती हुई वहाँ आकर रुकी। उसके हाथ में किताबें थीं और चेहरे पर गुस्सा।
“आज ही बारिश आनी थी…” उसने धीरे से कहा।
तभी पास खड़े एक लड़के ने अपनी छतरी उसकी तरफ बढ़ा दी।
“अगर चाहो तो इस्तेमाल कर सकती हो।”
रिया ने उसकी तरफ देखा। लड़का मुस्कुरा रहा था। सफेद शर्ट पूरी भीग चुकी थी, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर अजीब सी शांति थी।
“और तुम?” रिया ने पूछा।
“मैं बारिश पसंद करता हूँ।” उसने हँसते हुए कहा।
रिया ने बिना कुछ बोले छतरी ले ली। कुछ देर बाद दोनों एक ही बस में बैठे थे। संयोग ऐसा था कि सीट भी साथ मिली।
“वैसे मैं आरव हूँ।”
“रिया।”
बस की खिड़की से बारिश की बूंदें अंदर आ रही थीं। दोनों छोटी-छोटी बातें करने लगे। रिया ने अपने बैग से एक नोट बुक निकाली ओर उसने कुछ लिखने लगी पता ही नहीं चला कब रास्ता खत्म हो गया। उतरते समय रिया जल्दी में थी। उसकी किताब नीचे गिर गई। आरव ने उठाकर उसे दी। तभी उसके अंदर से एक छोटा सा कागज़ गिरा।
आरव ने अनजाने में उसे उठा लिया।
उस पर हल्के नीले पेन से लिखा था—
“कुछ मुलाकातें अजीब होती हैं…
सिर्फ कुछ मिनटों में कोई इंसान अपना सा लगने लगता है…”
रिया की धड़कन जैसे रुक गई। उसने जल्दी से वो कागज़ उसके हाथ से ले लिया। “वो… बस ऐसे ही लिखा था मैंने।” उसने नजरें चुराते हुए कहा।
आरव कुछ पल उसे देखता रहा। फिर हल्का सा मुस्कुराया।
“अच्छा लिखा है…” उसने धीमी आवाज़ में कहा,
“क्योंकि मुझे भी आज कुछ ऐसा ही महसूस हुआ।”
रिया ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।
बारिश की बूंदें अब भी गिर रही थीं, बस फर्क इतना था कि अब उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी।
दोनो अपने अपने रस्ते की ओर चले गए दोनों बिना ये सोचे कि फिर मुलाकात होगी कि नहीं रिया अक्सर आरव के बारे में सोचने लगी वो हर बार बस उस प्लान को अपने दिमाग में दोहराती ओर ऐसा ही कुछ हाल आरव का था ऐसे ही सालों बीत गए पर रिया उस दिन के अलावा कभी आरव को सोच नहीं पाई शायद वो फिर मुलाकात नहीं उस पल में ही खुश रहना चाहती थी शायद यही होता है कुछ पल का सुकून या प्यार

(एक डॉक्टर की अधूरी जिंदगी की कहानी)
रात के लगभग साढ़े दस बजे थे।
शहर के सबसे बड़े अस्पताल की तीसरी मंज़िल पर ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती लगातार जल रही थी। अंदर डॉक्टरों की टीम किसी मरीज की जान बचाने में लगी थी।
ऑपरेशन थिएटर के बीचों-बीच खड़ा था डॉ. आदित्य मेहरा।
शहर का सबसे मशहूर न्यूरोसर्जन। उसके माथे पर पसीना था… आँखों में थकान… लेकिन हाथों में वही आत्मविश्वास, जिसने अब तक ना जाने कितनी जिंदगियाँ बचाई थीं।
“सक्शन…” उसने गंभीर आवाज में कहा। नर्स ने तुरंत उपकरण पकड़ाया। मरीज की हालत बेहद नाजुक थी। ज़रा सी गलती… और सब खत्म।
तभी बाहर से एक जूनियर डॉक्टर तेजी से अंदर आया। “सर…” उसकी आवाज घबराई हुई थी।
आदित्य ने बिना नजर उठाए कहा “मैंने कहा था, ऑपरेशन के बीच कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा।”
“सर… बात बहुत जरूरी है…” आदित्य झल्ला उठा “क्या है?” जूनियर डॉक्टर कुछ पल चुप रहा… फिर धीरे से बोला “सर आपके बेटे आरव का एक्सिडेंट हो गया है…”
आदित्य का हाथ एक पल को रुक गया। “व्हाट…?”
“उसे सिटी हॉस्पिटल लाया गया है… हालत गंभीर है…” कुछ सेकंड के लिए आदित्य की सांसें जैसे थम गईं।
“कैसे हुआ?” उसकी आवाज काँप गई। “स्कूल से लौटते वक्त… ट्रक ने बाइक को टक्कर मार दी…” आदित्य की आँखों के सामने अपने बारह साल के बेटे का चेहरा घूम गया। आरव उसकी दुनिया उसका सब कुछ।
आदित्य तुरंत बाहर जाने को हुआ… लेकिन तभी उसके सीनियर असिस्टेंट ने कहा “सर… अगर आप अभी ऑपरेशन छोड़ देंगे तो मरीज नहीं बचेगा…”
आदित्य रुक गया उसके सामने दो जिंदगियाँ थीं। एक… उसका बेटा दूसरी… एक अनजान मरीज उसके हाथ काँपने लगे।
“सर, फैसला आपको करना है…” असिस्टेंट बोला आदित्य की आँखों में दर्द उतर आया उसने दीवार का सहारा लिया।
उसके दिमाग में आरव की हँसी गूंज रही थी “पापा, आप दुनिया के सबसे अच्छे डॉक्टर हो…” और दूसरी तरफ ऑपरेशन टेबल पर लेटा मरीज… जिसकी सांसें हर सेकंड टूट रही थीं।
आदित्य ने आँखें बंद कीं फिर भारी दिल से बोला “ऑपरेशन जारी रहेगा…”
ऑपरेशन फिर शुरू हुआ… लेकिन अब आदित्य का ध्यान बार-बार भटक रहा था। हर पाँच मिनट बाद उसकी नजर घड़ी पर चली जाती। हर सेकंड उसे भारी लग रहा था।
उसने कई बार फोन उठाने की कोशिश की… लेकिन हाथ फिर ऑपरेशन में लग जाते। तीन घंटे पूरा तीन घंटे बाद ऑपरेशन खत्म हुआ। मरीज बच गया था। पूरा स्टाफ खुश था।
लेकिन आदित्य के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। उसने जल्दी से ग्लव्स उतारे और भागते हुए बाहर निकला। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। “भगवान… बस मेरा बेटा ठीक हो…”
जब आदित्य सिटी हॉस्पिटल पहुँचा… तब रात के दो बज चुके थे।
वह पागलों की तरह ICU की तरफ भागा। बाहर उसकी पत्नी नेहा बैठी थी। उसकी आँखें सूज चुकी थीं… चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था। आदित्य को देखते ही वह खड़ी हो गई।
“आरव कहाँ है?” आदित्य ने घबराकर पूछा। नेहा उसे बस देखती रही उसकी आँखों में दर्द था… गुस्सा था… टूटन थी। “नेहा… बोलो ना मेरा बेटा कहाँ है?” आदित्य चीख पड़ा।
नेहा की आँखों से आँसू बह निकले उसने काँपती आवाज में कहा “वो… चला गया आदित्य…”
आदित्य जैसे पत्थर बन गया। “न… नहीं…” उसके कदम लड़खड़ा गए। “मैंने बहुत कोशिश की…” नेहा रोते हुए बोली “वो बार-बार तुम्हें बुला रहा था…”
आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले। “पापा आएंगे ना मम्मा…?”
नेहा ने रोते हुए आरव की आखिरी बातें दोहराईं। आदित्य वहीं जमीन पर बैठ गया। उसकी दुनिया खत्म हो चुकी थी।
नेहा उसके सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आवाज टूट रही थी… लेकिन हर शब्द तीर की तरह लग रहा था। “काश… तुम उस समय रहते पहुँच जाते…”
आदित्य ने सिर उठा कर उसे देखा। “नेहा…” “तुम सबकी जान बचाते रहे आदित्य…” वह चीखी “लेकिन अपने बेटे को नहीं बचा पाए…” उसके शब्दों में वर्षों का दर्द था। “उसे तुम्हारी जरूरत थी…” नेहा रो रही थी “वो आखिरी सांस तक तुम्हें बुलाता रहा…”
आदित्य खुद को संभाल नहीं पा रहा था। “मैं… मैं एक मरीज को छोड़ नहीं सकता था…” उसकी आवाज बिखर गई। नेहा कड़वाहट से हँसी “और आज… तुम्हारा बेटा तुम्हें छोड़ गया…”
आरव के अंतिम संस्कार के बाद घर पूरी तरह खामोश हो गया। जहाँ पहले हँसी गूंजती थी… अब सिर्फ सन्नाटा था। आरव का कमरा वैसे ही पड़ा था। उसके खिलौने… उसकी किताबें… उसकी अधूरी ड्रॉइंग्स… आदित्य धीरे-धीरे कमरे में गया।
उसने आरव की छोटी सी शर्ट उठाई… और सीने से लगा ली। उसकी आँखों के सामने वो दिन घूम गया जब आरव ने कहा था “पापा, इस बार मेरा मैच देखने जरूर आना…”
लेकिन आदित्य नहीं गया था। “पापा बहुत बिजी हैं…” यही कहकर हर बार वह खुद को समझा लेता था। आज वही शब्द उसे अंदर से तोड़ रहे थे।
एक रात…
आदित्य को आरव की स्टडी टेबल में एक छोटी डायरी मिली काँपते हाथों से उसने डायरी खोली पहले पन्ने पर लिखा था “मेरे पापा सुपरहीरो हैं…”
आदित्य रो पड़ा आगे लिखा था “पापा बहुत लोगों की जान बचाते हैं। मुझे उन पर गर्व है। लेकिन काश… वो मेरे साथ थोड़ा समय बिताते…”
आदित्य का दिल चीर गया। उसने अगले पन्ने पलटे “आज मेरा मैच था। मैं चाहता था पापा आएं… लेकिन वो फिर हॉस्पिटल चले गए…”
हर शब्द उसे मार रहा था। फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था “अगर मैं बड़ा हुआ… तो पापा की तरह डॉक्टर बनूँगा। ताकि मैं लोगों की जान भी बचा सकूँ… और अपने परिवार का साथ भी दे सकूँ…”
डायरी उसके हाथों से गिर गई।
दिन गुजरते गए…
लेकिन आदित्य खुद को माफ नहीं कर पा रहा था। वह हर रात वही सोचता “अगर मैं उस दिन ऑपरेशन छोड़ देता तो…?” “अगर मैं थोड़ा पहले पहुँच जाता तो…?” लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
एक दिन उसने नेहा से कहा “मैंने अपना बेटा खो दिया…”
नेहा की आँखें भर आईं। “हम दोनों ने खोया है आदित्य…”
“नहीं…” आदित्य रो पड़ा “तुमने उसे हादसे में खोया… और मैंने अपनी जिम्मेदारियों में…”
कुछ महीनों बाद…
आदित्य फिर उसी ऑपरेशन थिएटर में खड़ा था। लेकिन आज उसके अंदर कुछ बदल चुका था। ऑपरेशन खत्म होने के बाद उसने अपने जूनियर्स से कहा “याद रखो… डॉक्टर होना जरूरी है… लेकिन इंसान होना उससे भी ज्यादा जरूरी…” सब उसकी तरफ देखने लगे।
उसकी आँखें नम थीं। “कभी ऐसा मत होने देना… कि किसी अपने को तुम्हारी कमी महसूस हो…” रात को आदित्य आरव की कब्र के पास बैठा था। उसने धीरे से फूल रखे। “मुझे माफ कर दो बेटा…” उसकी आवाज काँप गई।
हवा हल्के से चली। आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले “काश… मैं उस दिन समय रहते पहुँच जाता…” लेकिन कुछ पछतावे जिंदगी भर इंसान का पीछा नहीं छोड़ते… और कुछ आवाजें मरने के बाद भी दिल में गूंजती रहती हैं।

हाँ हम बिहारी हैं जी,
हाँ हम बिहारी हैं जी,
थोड़े संस्कारी हैं जी…
माटी को सोना कर दें,
ऐसी कलाकारी है जी,
हाँ हम बिहारी हैं जी…
मिट्टी पर चित्र बना लेते हैं,
हर हुनर में जान डाल देते हैं,
हाँ हम बिहारी हैं जी…
मिट्टी के बर्तन से पूजा कर लेते हैं,
कम में भी खुश रह लेते हैं,
दिल से रिश्ते निभा लेते हैं,
हाँ हम बिहारी हैं जी…
सादा जीवन, ऊँचे विचार,
यही हमारी पहचान है जी,
दिल से अपनापन देने वाले,
हाँ हम बिहारी हैं जी…