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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • श्रापित राजकुमारी

    श्रापित राजकुमारी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    हजारों सालों से कैद एक नींद में सोई शापित राजकुमारी

     

    बहुत समय पहले जहाँ आज चारों तरफ घना जंगल फैला हुआ है, वहाँ एक विशाल और समृद्ध साम्राज्य हुआ करता था। दूर-दूर तक उसकी समृद्धि के चर्चे थे। चौड़ी पत्थर की सड़कें, ऊँचे किले, सोने से सजे महल और खुशहाल प्रजा उस साम्राज्य की पहचान थे। लेकिन एक भयानक रात के बाद सब कुछ बदल गया। पूरा साम्राज्य समय के साथ उजड़ गया। धीरे-धीरे महल खंडहर बन गए, सड़कें पेड़ों और बेलों के नीचे दब गईं और कुछ ही सदियों में वह महान साम्राज्य एक रहस्यमयी जंगल में बदल गया।

     

    उस उजड़े साम्राज्य के बीचों-बीच आज भी एक विशाल महल खड़ा था। लोग कहते थे कि उस महल में हजारों सालों से एक शापित राजकुमारी गहरी नींद में सो रही है। न जाने कितने राजा, योद्धा और वीर उसे जगाने पहुँचे, लेकिन कोई भी कभी वापस नहीं लौटा। इसलिए उस महल का नाम सुनते ही लोगों के चेहरे का रंग उड़ जाता था।

     

    गाँव के बुज़ुर्ग अपने बच्चों से कहते थे, “उस महल के पास कभी मत जाना। वहाँ मौत नहीं… हजारों साल पुराना श्राप रहता है।”

     

    लेकिन सच इससे भी ज्यादा दर्दनाक था।

     

    उस महल में सो रही राजकुमारी किसी श्राप की नहीं, बल्कि अधूरी मोहब्बत की कैदी थी।

     

    हजारों साल पहले उस साम्राज्य पर राजा वीरेंद्र का शासन था। उनकी इकलौती बेटी थी—राजकुमारी वैदेही। वह जितनी सुंदर थी, उतनी ही दयालु भी थी। प्रजा उसे अपनी बेटी की तरह प्यार करती थी। महल की शानो-शौकत से ज्यादा उसे लोगों की खुशियाँ प्यारी थीं।

     

    महल के सेनापति का बेटा आदित्य बचपन से ही वैदेही का सबसे अच्छा मित्र था। दोनों साथ खेलते, साथ पढ़ते और धीरे-धीरे उनका साथ प्रेम में बदल गया। दोनों ने एक-दूसरे से जीवनभर साथ निभाने का वादा किया था।

     

    एक शाम महल के बगीचे में आदित्य ने वैदेही का हाथ थामते हुए कहा,

     

    “वैदेही, अगर पूरी दुनिया भी हमारे खिलाफ हो जाए, तब भी मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूँगा।”

     

    वैदेही मुस्कुराई और बोली,

     

    “और मैं जन्म-जन्म तक सिर्फ तुम्हारी रहूँगी।”

     

    लेकिन उनकी खुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकी।

     

    राजा वीरेंद्र को जब दोनों के प्रेम का पता चला तो वे क्रोधित हो उठे।

     

    “एक राजकुमारी किसी साधारण युवक से विवाह नहीं कर सकती।”

     

    उन्होंने उसी दिन आदित्य को कारागार में डालने का आदेश दे दिया।

     

    वैदेही रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, लेकिन राजा का निर्णय नहीं बदला।

     

    इसी बीच राज्य में रहने वाली एक शक्तिशाली तांत्रिक मायरा महल पहुँची। वर्षों पहले राजा ने उसके परिवार को राज्य से निकाल दिया था और तभी से वह बदले की आग में जल रही थी।

     

    उसने राजा से कहा,

     

    “अगर राजकुमारी का विवाह उस युवक से हुआ तो पूरा साम्राज्य खत्म हो जाएगा।”

     

    राजा उसकी बातों में आ गए।

     

    लेकिन मायरा का असली इरादा पूरे राजवंश का अंत करना था।

     

    आधी रात होते ही उसने महल के बीचों-बीच एक भयानक तांत्रिक अनुष्ठान शुरू किया। काले बादलों ने आसमान को ढक लिया। बिजली की तेज़ गड़गड़ाहट से पूरा महल काँपने लगा। अचानक मायरा की डरावनी हँसी पूरे महल में गूँज उठी।

     

    “आज से राजकुमारी वैदेही हजारों सालों तक गहरी नींद में सोएगी। जब तक उसका सच्चा प्रेम अपने वचन को निभाकर उसके पास नहीं आएगा, तब तक यह कभी नहीं जागेगी।”

     

    इतना कहते ही काली रोशनी ने पूरे महल को घेर लिया।

     

    वैदेही बेहोश होकर गिर पड़ी।

     

    एक ही पल में पूरा महल श्राप की कैद में चला गया।

     

    धीरे-धीरे पूरा साम्राज्य वीरान हो गया। समय बीतता गया। राजा, सैनिक, महल के सेवक… सब इतिहास बन गए। महल के चारों ओर जंगल उग आया और सदियों बाद किसी को यह भी याद नहीं रहा कि वहाँ कभी एक महान साम्राज्य हुआ करता था।

     

    उधर कारागार में कैद आदित्य को जब वैदेही के श्राप की खबर मिली तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    मरने से पहले उसने आसमान की ओर देखकर कहा,

     

    “वैदेही… अगर इस जन्म में तुम्हें नहीं बचा पाया, तो अगले हर जन्म में तुम्हें ढूँढ़ने ज़रूर आऊँगा।”

     

    हजारों साल बीत गए।

     

    दुनिया बदल गई।

     

    लेकिन महल के भीतर राजकुमारी वैदेही आज भी वैसी ही सो रही थी।

     

    रात के समय कभी-कभी महल से एक धीमी आवाज सुनाई देती थी—

     

    “आदित्य… क्या तुम अपना वादा भूल गए…?”

     

    हजारों साल बाद एक छोटे से गाँव में आरव नाम का युवक रहता था। बचपन से उसे हर रात एक ही सपना आता था। वह एक पुराने महल को देखता और उसमें सफेद वस्त्र पहने एक राजकुमारी उसे पुकारती—

     

    “मुझे इस नींद से मुक्त कर दो…”

     

    समय के साथ वह सपना और भी सच्चा लगने लगा।

     

    एक दिन गाँव में आए एक वृद्ध साधु ने आरव को देखते ही कहा,

     

    “जिस आत्मा का हजारों सालों से इंतज़ार था… वह आज मेरे सामने खड़ी है।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    साधु उसे उस उजड़े साम्राज्य तक ले गया और सारी कहानी सुना दी।

     

    “अगर तुम्हारा प्रेम सच्चा है, तो श्राप टूट जाएगा।”

     

    अगली सुबह आरव अकेला उस रहस्यमयी महल की ओर निकल पड़ा।

     

    जंगल का हर रास्ता उसे रोकना चाहता था। कभी जंगली जानवर सामने आ जाते, कभी अजीब परछाइयाँ उसका पीछा करतीं। लेकिन उसके कदम नहीं रुके।

     

    घंटों की यात्रा के बाद वह आखिरकार उस विशाल महल के सामने खड़ा था।

     

    जैसे ही उसने महल के मुख्य द्वार को छुआ, वह अपने आप खुल गया।

     

    अंदर चारों तरफ सन्नाटा था।

     

    महल के बीचों-बीच एक सुनहरे पलंग पर राजकुमारी वैदेही शांत होकर सो रही थी।

     

    उसे देखते ही आरव की आँखों से अपने आप आँसू बह निकले।

     

    ऐसा लगा जैसे उसका दिल इस चेहरे को सदियों से पहचानता हो।

     

    अचानक मायरा की गूँजती हुई आवाज पूरे महल में फैल गई।

     

    “अगर इसे जगाना चाहते हो… तो पहले मेरे श्राप से लड़ना होगा।”

     

    उसी पल महल काँपने लगा।

     

    विशाल राक्षस और काली परछाइयाँ आरव पर टूट पड़ीं।

     

    आरव ने पूरी बहादुरी से उनका सामना किया।

     

    वह बुरी तरह घायल हो गया, लेकिन पीछे नहीं हटा।

     

    लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार उसने आखिरी राक्षस को भी हरा दिया।

     

    थका हुआ आरव लड़खड़ाते हुए वैदेही के पास पहुँचा।

     

    उसने धीरे से उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

     

    उसकी आँखों से एक आँसू गिरा और उसने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता मैं कौन हूँ… लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि तुम्हारा दर्द मेरा अपना है। अगर मेरा प्रेम सच्चा है, तो जाग जाओ।”

     

    जैसे ही आँसू वैदेही के हाथ पर गिरा, पूरा महल सुनहरी रोशनी से जगमगा उठा।

     

    श्राप की जंजीरें टूटने लगीं।

     

    सदियों से बंद खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    सूखे पेड़ों पर हरियाली लौट आई।

     

    धीरे-धीरे राजकुमारी वैदेही ने अपनी आँखें खोलीं।

     

    उसने सामने खड़े आरव को देखा।

     

    कुछ पल तक वह उसे देखती रही, फिर उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।

     

    वह काँपती आवाज़ में बोली,

     

    “तुम लौट आए… आदित्य। मुझे पता था… तुम अपना वादा ज़रूर निभाओगे।”

     

    उसी क्षण आरव को अपने पिछले जन्म की सारी यादें लौट आईं।

     

    उसे याद आ गया कि वह कोई और नहीं, आदित्य का ही पुनर्जन्म है।

     

    वह मुस्कुराया और बोला,

     

    “मैंने कहा था ना… चाहे हजारों साल क्यों न बीत जाएँ, मैं तुम्हें ढूँढ़ ही लूँगा।”

     

    वैदेही दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    उसी पल मायरा का श्राप हमेशा के लिए समाप्त हो गया। उजड़ा हुआ साम्राज्य फिर से जीवंत होने लगा। महल की दीवारों में चमक लौट आई, सूखे बाग़ फिर से फूलों से भर गए और वर्षों से कैद आत्माओं को भी मुक्ति मिल गई।

     

    कहते हैं कि आज भी उस प्राचीन साम्राज्य के खंडहरों में जाने वाले लोगों को डर नहीं, बल्कि दो सच्चे प्रेमियों की अमर मोहब्बत महसूस होती है। क्योंकि सच्चा प्रेम समय, मृत्यु और हजारों साल पुराने श्राप को भी हरा सकता है।

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    Auther preeti Sharma

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  • डायन का महल

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    डायन का महल

     

    राजस्थान के एक छोटे से गाँव के पास घने बसी झाड़ियों के बीच एक विशाल और खंडहर जैसा महल था। गाँव वाले उसे “डायन का महल” कहते थे। कहते थे कि वहाँ सौ सालों से एक भयानक डायन रहती है। रात होते ही महल की टूटी खिड़कियों से लाल रोशनी निकलती थी, और कभी-कभी किसी औरत के रोने की आवाज़ पूरे जंगल में गूंज जाती थी।

     

    गाँव का कोई भी इंसान उस महल की तरफ जाने की हिम्मत नहीं करता था। बच्चों को भी बचपन से यही सिखाया जाता था कि अगर कभी गलती से भी उस जंगल में चले गए, तो डायन उन्हें हमेशा के लिए अपने महल में कैद कर लेगी।

     

    उसी गाँव में सत्रह साल का एक लड़का रहता था, जिसका नाम वीर था। वह बाकी लोगों से अलग था। उसे हर बात का सच जानने की आदत थी। उसे हमेशा लगता था कि हर डर के पीछे कोई न कोई राज ज़रूर छिपा होता है।

     

    एक दिन उसकी छोटी बहन गुड़िया जंगल में लकड़ियाँ बीनने गई, लेकिन शाम तक वापस नहीं लौटी। पूरे गाँव में हड़कंप मच गया। लोगों ने बिना खोजे ही कह दिया, “उसे डायन उठा ले गई। अब वह कभी वापस नहीं आएगी।”

     

    लेकिन वीर ने हार नहीं मानी। उसने अकेले ही अपनी बहन को ढूँढ़ने का फैसला किया। गाँव वालों ने बहुत रोका, मगर उसने किसी की बात नहीं सुनी।

     

    रात होते ही वह एक मशाल और अपनी दादी का दिया हुआ ताबीज लेकर जंगल की ओर निकल पड़ा। जंगल में अजीब सी खामोशी थी। पेड़ों के बीच से ठंडी हवा गुजर रही थी, मानो कोई उसका पीछा कर रहा हो।

     

    कुछ देर बाद उसे दूर एक विशाल महल दिखाई दिया। उसकी टूटी हुई दीवारों पर बेलें उगी हुई थीं। लोहे का बड़ा दरवाज़ा अपने आप चरमराता हुआ खुल गया।

     

    वीर ने हिम्मत करके अंदर कदम रखा।

     

    महल के अंदर हर तरफ धूल जमी थी, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि बीच का रास्ता बिल्कुल साफ था, जैसे कोई रोज़ वहाँ से गुजरता हो। अचानक ऊपर की मंज़िल से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    वीर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। तभी उसके सामने सफेद कपड़ों में एक बूढ़ी औरत दिखाई दी। उसके लंबे सफेद बाल थे और आँखें हल्की नीली चमक रही थीं।

     

    औरत ने धीमी आवाज़ में कहा,

    “तुम यहाँ क्यों आए हो?”

     

    वीर ने डरते हुए कहा,

    “मैं अपनी बहन को लेने आया हूँ।”

     

    औरत मुस्कुराई।

    “लोग मुझे डायन कहते हैं, लेकिन किसी ने कभी मेरा सच जानने की कोशिश नहीं की।”

     

    इतना कहकर वह अचानक हवा में गायब हो गई।

     

    वीर घबरा गया, लेकिन उसने आगे बढ़ना जारी रखा। एक कमरे में उसे कई पुराने चित्र दिखाई दिए। उनमें एक सुंदर रानी की तस्वीर थी। तस्वीर के नीचे लिखा था—’रानी मृणालिनी’।

     

    तभी पीछे से वही आवाज़ आई,

    “वही मेरा असली नाम है।”

     

    वीर ने पलटकर देखा। इस बार वह बूढ़ी औरत नहीं, बल्कि एक बेहद सुंदर रानी उसके सामने खड़ी थी।

     

    रानी ने कहा,

    “सैकड़ों साल पहले मैं इसी राज्य की रानी थी। मैं लोगों की सेवा करती थी। लेकिन राज्य का लालची मंत्री सिंहासन चाहता था। उसने पूरे राज्य में यह अफवाह फैला दी कि मैं डायन हूँ। लोगों ने बिना सच जाने मुझे जिंदा महल में कैद कर दिया। मरते समय मैंने बस एक श्राप दिया कि जब तक कोई निडर इंसान मेरे सच पर विश्वास नहीं करेगा, तब तक मेरी आत्मा इस महल से मुक्त नहीं होगी।”

     

    वीर सब कुछ समझ चुका था।

     

    उसी समय महल ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा। चारों तरफ काली परछाइयाँ दिखाई देने लगीं। वे असली बुरी आत्माएँ थीं, जो वर्षों से इस महल में कैद थीं।

     

    उनका सरदार गरजा,

    “अगर रानी आज़ाद हो गई, तो हमारा अंत हो जाएगा!”

     

    सैकड़ों काली परछाइयाँ वीर की ओर बढ़ने लगीं।

     

    वीर ने अपनी दादी का दिया हुआ ताबीज़ कसकर पकड़ लिया। अचानक ताबीज़ से तेज़ सुनहरी रोशनी निकली। वह रोशनी पूरे महल में फैल गई। एक-एक करके सारी काली परछाइयाँ राख बनकर गायब होने लगीं।

     

    लेकिन तभी सबसे बड़ी परछाईं ने गुड़िया को पकड़ लिया।

     

    वीर पूरी ताकत से दौड़ा और अपनी बहन का हाथ पकड़ लिया। दोनों ज़मीन पर गिर पड़े।

     

    रानी ने अपनी आखिरी शक्ति इकट्ठी की और आसमान की ओर हाथ उठाया। महल के ऊपर तेज़ सफेद प्रकाश फैल गया। देखते ही देखते सारी बुरी शक्तियाँ हमेशा के लिए खत्म हो गईं।

     

    महल पूरी तरह शांत हो गया।

     

    रानी मुस्कुराई।

     

    “आज तुमने केवल अपनी बहन को नहीं बचाया, बल्कि मुझे भी सदियों के श्राप से मुक्त कर दिया।”

     

    इतना कहते ही उनका शरीर चमकने लगा और कुछ ही पलों में वह प्रकाश बनकर आकाश में विलीन हो गईं।

     

    वीर और गुड़िया महल से बाहर निकल आए।

     

    सुबह जब दोनों गाँव पहुँचे, तो सब लोग उन्हें देखकर हैरान रह गए।

     

    वीर ने गाँव वालों को पूरी सच्चाई बताई। पहले तो किसी ने विश्वास नहीं किया, लेकिन जब सभी लोग महल तक पहुँचे, तो वहाँ अब कोई डरावनी जगह नहीं थी। टूटी दीवारों के बीच सुंदर फूल खिल चुके थे। महल के ऊपर उड़ते सफेद कबूतर मानो बता रहे थे कि अब वहाँ कोई श्राप नहीं बचा।

     

    गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उन्होंने कहा,

    “हमारे पूर्वजों ने बिना सच जाने एक निर्दोष रानी को डायन कह दिया। सबसे बड़ा पाप अंधविश्वास होता है।”

     

    उस दिन के बाद किसी ने उस जगह को डायन का महल नहीं कहा।

     

    अब लोग उसे “रानी मृणालिनी का महल” कहने लगे।

     

    हर साल गाँव वाले वहाँ दीप जलाते, फूल चढ़ाते और बच्चों को एक ही बात सिखाते

     

    “किसी इंसान का फैसला अफवाहों से नहीं, बल्कि सच जानकर करना चाहिए। कई बार जिसे दुनिया राक्षस समझती है, वह सबसे बड़ा पीड़ित होता है।”

     

    समय बीतता गया। वीर बड़ा होकर गाँव का सबसे सम्मानित युवक बना। उसने उस महल को फिर से बनवाया और उसे एक ऐसी जगह बना दिया जहाँ दूर-दूर से लोग इतिहास और सच्चाई जानने आते थे। महल के मुख्य द्वार पर पत्थर की एक पट्टिका लगाई गई, जिस पर लिखा था—

     

    “डर से बड़ा सच होता है, और सच से बड़ी कोई शक्ति नहीं।”

     

    कहते हैं, आज भी पूर्णिमा की रात उस महल की सबसे ऊँची खिड़की पर सफेद रोशनी दिखाई देती है। लेकिन अब लोग उससे डरते नहीं। वे मानते हैं कि वह रानी मृणालिनी की पवित्र आत्मा है, जो इस बात की

    गवाही देती है कि झूठ चाहे कितने भी वर्षों तक राज करे, अंत में जीत हमेशा सच की ही होती है।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अधूरी मुहब्बत की डायन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अधूरी मोहब्बत की डायन

     

    पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गांव के किनारे एक पुरानी हवेली थी। गांव वाले कहते थे कि वहां एक शातिर डायन रहती है। उसका नाम मायरा था। लोग कहते थे कि जिसने भी उसकी आंखों में देख लिया, वह कभी वापस नहीं लौटा। बच्चे शाम ढलते ही घरों में बंद हो जाते और बड़े भी उस रास्ते से गुजरने की हिम्मत नहीं करते।

     

    लेकिन कोई नहीं जानता था कि मायरा हमेशा से डायन नहीं थी।

     

    सालों पहले वह एक बेहद खूबसूरत लड़की थी। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी कि हर कोई उसे देखकर खुश हो जाता। वह जंगल से जड़ी-बूटियां लाकर गांव वालों का इलाज करती थी। मगर गांव के कुछ लालची लोगों को उसका हुनर पसंद नहीं था। उन्होंने उस पर काला जादू करने का झूठा इल्जाम लगा दिया।

     

    उसी गांव में आरव नाम का एक युवक रहता था। वह मायरा से दिल ही दिल में प्यार करता था और मायरा भी उसे अपनी पूरी दुनिया मानती थी।

     

    एक शाम आरव ने कहा, “मायरा, मैं जल्दी ही तुम्हें अपने घर की बहू बनाऊंगा। चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो जाए।”

     

    मायरा मुस्कुरा दी। “बस इतना वादा है कि कभी मेरा साथ मत छोड़ना।”

     

    लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

     

    गांव वालों ने मायरा को पकड़कर जंगल के बीच बने पुराने मंदिर में जिंदा जलाने का फैसला कर लिया। आरव ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन कुछ लोगों ने उसे बांध दिया।

     

    आग की लपटों में घिरी मायरा की आखिरी चीख पूरे जंगल में गूंज उठी।

     

    “अगर मेरा प्यार अधूरा रहा… तो मेरी आत्मा कभी शांति नहीं पाएगी…”

     

    उस रात तेज तूफान आया। बिजली कड़की और मंदिर के पास खड़ा बरगद का पेड़ दो हिस्सों में टूट गया।

     

    अगली सुबह मायरा की राख तो मिली, लेकिन उसका शरीर नहीं।

     

    उस दिन के बाद गांव में अजीब घटनाएं होने लगीं।

     

    रात होते ही लोगों को सफेद साड़ी पहने एक औरत दिखाई देती। जो भी उसका पीछा करता, वह हमेशा के लिए गायब हो जाता।

     

    धीरे-धीरे लोगों ने उसे शातिर डायन कहना शुरू कर दिया।

     

    मायरा अब इंसानों से नफरत करती थी। उसने कसम खा ली थी कि कोई भी प्रेम कहानी पूरी नहीं होने देगी।

     

    जिस गांव में शादी होती, वहां कोई न कोई अनहोनी हो जाती।

     

    कभी दूल्हा गायब हो जाता, कभी दुल्हन।

     

    लोग डर के मारे रात में शादी करना छोड़ चुके थे।

     

    लेकिन सच यह था कि मायरा हर प्रेमी जोड़े में खुद और आरव को ढूंढती थी।

     

    जब भी वह किसी को खुश देखती, उसका अपना टूटा हुआ दिल फिर से रो पड़ता।

     

    एक दिन गांव में विवान नाम का युवक अपनी मां के साथ रहने आया।

     

    वह पढ़ा-लिखा और निडर था।

     

    गांव वालों ने उसे चेतावनी दी, “हवेली के पास मत जाना। वहां मौत रहती है।”

     

    विवान हंसकर बोला, “अगर वहां कोई है, तो उसकी भी कोई कहानी होगी।”

     

    एक रात वह सच जानने के लिए हवेली पहुंच गया।

     

    अंदर चारों तरफ धूल जमी थी।

     

    अचानक ठंडी हवा चली।

     

    दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    पीछे से एक आवाज आई, “यहां आने की हिम्मत कैसे हुई?”

     

    विवान ने पलटकर देखा।

     

    सामने लाल आंखों वाली एक औरत खड़ी थी।

     

    लंबे खुले बाल, सफेद साड़ी और चेहरे पर दर्द से भरी मुस्कान।

     

    वह मायरा थी।

     

    उसने अपने लंबे नाखून विवान की गर्दन पर रख दिए।

     

    “डर नहीं लगता?”

     

    विवान बोला, “डर उस इंसान से लगता है जिसके अंदर बुराई हो। तुम्हारी आंखों में तो सिर्फ दर्द दिखाई दे रहा है।”

     

    यह सुनकर मायरा कुछ पल के लिए चुप हो गई।

     

    सदियों बाद किसी ने उसे राक्षस नहीं, इंसान समझा था।

     

    मगर अगले ही पल वह फिर कठोर बन गई।

     

    “मेरे पास दया मांगने मत आना।”

     

    विवान बोला, “मैं दया नहीं… तुम्हारी कहानी सुनने आया हूं।”

     

    मायरा ने पहली बार किसी इंसान को जिंदा छोड़ दिया।

     

    उस रात दोनों घंटों तक बात करते रहे।

     

    मायरा ने अपनी अधूरी मोहब्बत का हर दर्द उसे बताया।

     

    विवान सब सुनता रहा।

     

    अगले कई दिनों तक वह रोज हवेली जाने लगा।

     

    गांव वालों ने उसे बहुत रोका।

     

    लेकिन वह नहीं माना।

     

    धीरे-धीरे मायरा के चेहरे पर फिर मुस्कान लौटने लगी।

     

    उसे लगने लगा कि शायद इस बार किस्मत उस पर मेहरबान हो जाएगी।

     

    लेकिन उसके दिल में एक डर भी था।

     

    वह जानती थी कि वह अब इंसान नहीं रही।

     

    एक रात उसने विवान से पूछा, “अगर मैं पहले जैसी होती… तो क्या तुम मुझे अपनाते?”

     

    विवान ने बिना सोचे कहा, “दिल से चाहने वालों का चेहरा नहीं देखा जाता।”

     

    मायरा की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    सैकड़ों साल बाद उसने फिर किसी पर भरोसा किया।

     

    लेकिन किस्मत ने एक बार फिर उसके साथ खेल खेला।

     

    गांव वालों को पता चल गया कि विवान रोज हवेली जाता है।

     

    उन्होंने फैसला किया कि इस बार डायन का हमेशा के लिए अंत कर देंगे।

     

    हथियारों और मशालों के साथ पूरा गांव हवेली पहुंच गया।

     

    विवान उनके सामने खड़ा हो गया।

     

    “कोई इसे हाथ नहीं लगाएगा।”

     

    लोग चिल्लाए, “यह डायन है। इसने हमारे लोगों की जान ली है।”

     

    मायरा धीरे-धीरे बाहर आई।

     

    उसने गांव वालों को देखा।

     

    फिर विवान की तरफ मुस्कुराकर बोली, “आज फिर इतिहास खुद को दोहरा रहा है।”

     

    विवान उसका हाथ पकड़ना चाहता था।

     

    लेकिन मायरा पीछे हट गई।

     

    “नहीं… इस बार मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।”

     

    उसने अपनी सारी जादुई शक्ति इकट्ठी की।

     

    पूरा आसमान काले बादलों से भर गया।

     

    हवा इतनी तेज चलने लगी कि लोगों के हाथों की मशालें बुझ गईं।

     

    मगर मायरा ने किसी पर हमला नहीं किया।

     

    उसने सिर्फ विवान की तरफ देखा।

     

    “मैंने एक बार किसी इंसान से दिल से प्यार किया था… लेकिन उसे कभी पा नहीं सकी। आज फिर वही मोड़ सामने है। अगर इस बार भी तुम्हें अपने पास रखूंगी, तो पूरी दुनिया तुम्हारी दुश्मन बन जाएगी।”

     

    विवान की आंखें भर आईं।

     

    “मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा।”

     

    मायरा हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “कुछ प्यार साथ रहने के लिए नहीं… याद बन जाने के लिए होते हैं।”

     

    इतना कहकर उसने अपना सारा जादू खुद पर ही चला दिया।

     

    तेज रोशनी हुई।

     

    जब रोशनी खत्म हुई, तो हवेली, काला जादू और मायरा… सब गायब हो चुके थे।

     

    वह हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गई।

     

    विवान वहीं घुटनों के बल बैठकर रोता रहा।

     

    उसके हाथ में केवल मायरा की चांदी की एक पुरानी पायल बची थी।

     

    उस दिन के बाद उस गांव में फिर कभी किसी ने डायन नहीं देखी।

     

    लेकिन हर साल उसी रात हवेली वाली जगह पर रातरानी के फूल अपने आप खिल जाते।

     

    लोग कहते हैं कि वह मायरा की

    आखिरी निशानी है।

     

    वह शातिर जरूर थी, उसने कई लोगों से बदला भी लिया था, लेकिन जब उसने पहली और आखिरी बार किसी इंसान को सच्चे दिल से चाहा, तब भी किस्मत ने उसे उसका प्यार नहीं दिया।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • पागल राजा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    पागल राजा

     

    घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरे एक छोटे से गांव का नाम था रामपुरा। गांव के बीचों-बीच एक टूटी-फूटी झोपड़ी थी, जिसमें लगभग पचपन साल का एक आदमी रहता था। उसके कपड़े फटे हुए थे, बाल बिखरे रहते थे और चेहरे पर लंबी सफेद दाढ़ी थी।

     

    लेकिन उसकी सबसे अजीब बात यह थी कि वह हर मिलने वाले से एक ही बात कहता था—

     

    “मैं इस राज्य का असली राजा हूं… मेरा सिंहासन मुझसे छल से छीना गया है।”

     

    गांव वाले उसकी बात सुनते और ठहाका लगाकर हंस पड़ते।

     

    “लो, फिर शुरू हो गया पागल राजा!”

     

    बच्चे उसके पीछे-पीछे दौड़ते और चिढ़ाते, “महाराज की जय हो… महाराज की जय हो!”

     

    वह कभी गुस्सा नहीं होता। बस मुस्कुरा देता और धीरे से कहता,

     

    “एक दिन सच सबके सामने आएगा।”

     

    उसका नाम था वीरेंद्र।

     

    गांव में कोई नहीं जानता था कि उसकी आंखों में इतना दर्द क्यों है। लोग उसे पागल समझते थे, लेकिन उसकी आंखों में कभी-कभी ऐसा तेज दिखाई देता था कि अच्छे-अच्छे लोग पल भर के लिए चुप हो जाते।

     

    एक दिन गांव में एक बूढ़ी औरत आई। उसने वीरेंद्र को देखा तो उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    वह उसके पैरों में बैठ गई।

     

    “महाराज… क्या आपने मुझे पहचाना?”

    वीरेंद्र ने ध्यान से उसे देखा।

    “तुम… दाई मां?”बूढ़ी औरत रो पड़ी।

    “मैंने सोचा था आप अब इस दुनिया में नहीं होंगे।”

    यह देखकर गांव वाले हैरान रह गए।

    वीरेंद्र ने उसे उठाया और झोपड़ी के अंदर ले गया।

    उस रात दाई मां ने गांव वालों को एक ऐसी कहानी सुनाई जिसने सबकी नींद उड़ा दी।

     

    करीब तीस साल पहले इस राज्य के राजा वीरेंद्र सिंह थे। जनता उनसे बहुत प्रेम करती थी। वे न्यायप्रिय और दयालु राजा थे।

     

    लेकिन उनके सबसे भरोसेमंद सेनापति भानु प्रताप की नज़र सिंहासन पर थी।

     

    एक रात उसने महल के कुछ लालची मंत्रियों के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा।

     

    राजा के खाने में बेहोशी की दवा मिला दी गई।

     

    जब राजा बेहोश हुए तो उन्हें रातों-रात जंगल में फेंक दिया गया।

     

    पूरे राज्य में यह खबर फैला दी गई कि राजा की हत्या डाकुओं ने कर दी।

     

    फिर भानु प्रताप ने एक ऐसे आदमी को, जो राजा की तरह दिखता था, राजा बनाकर सिंहासन पर बैठा दिया।

     

    वह बहरूपिया था।

     

    क्योंकि असली राजा की शक्ल बहुत कम लोगों ने करीब से देखी थी, इसलिए किसी को शक नहीं हुआ।

     

    दाई मां ने उस रात सब कुछ अपनी आंखों से देखा था।

    वह राजा को बचाना चाहती थी, लेकिन उसे भी मारने की कोशिश हुई।

    वह किसी तरह बचकर भाग गई।

    उधर जंगल में घायल राजा को कुछ साधुओं ने बचा लिया।

    लेकिन राजा की याददाश्त कई सालों तक कमजोर रही।

    जब सब कुछ याद आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

    वे अकेले थे न सेना…न महल…न कोई पहचानने वाला।

    वे गांव-गांव भटकते रहे और लोगों को अपना सच बताते रहे।

    लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया।

    लोग उन्हें पागल कहते रहे।

    दाई मां की बातें सुनकर पूरे गांव में सन्नाटा छा गया।

    पहली बार सबको लगा कि शायद यह आदमी सच बोल रहा है।

    अगले दिन गांव के मुखिया ने कहा,

    “अगर आप सच में राजा हैं, तो कोई सबूत होना चाहिए।”

    वीरेंद्र कुछ पल चुप रहे।

    फिर उन्होंने अपनी कमर से बंधी एक पुरानी कपड़े की थैली निकाली।

    उसमें एक सोने की अंगूठी थी।

    अंगूठी पर राजघराने का विशेष चिन्ह बना हुआ था।

    साथ ही एक आधा फटा हुआ राजकीय फरमान भी था, जिस पर राजा की मुहर लगी थी।

     

    मुखिया ने वह अंगूठी पहले कभी नहीं देखी थी।

    लेकिन दाई मां ने तुरंत पहचान लिया।

    “यही राजमुद्रा है… यही असली निशान है।”

    अब गांव वालों को यकीन होने लगा।

    उन्होंने तय किया कि वे राजा को लेकर राजधानी जाएंगे।

    कई दिनों की यात्रा के बाद वे राजधानी पहुंचे।

    वहां पूरे राज्य में उत्सव का माहौल था।

    बहरूपिया राजा अपनी ताजपोशी की तीसवीं वर्षगांठ मना रहा था।

    वीरेंद्र महल के सामने पहुंचकर जोर से बोले,

    “सिंहासन पर बैठा आदमी नकली है… मैं इस राज्य का असली राजा हूं।”

    सैनिक हंसने लगे।

    “एक और पागल आ गया!”

    लेकिन तभी महल के सबसे बूढ़े राजगुरु की नजर वीरेंद्र पर पड़ी।

    उनके हाथ कांपने लगे।

    वे दौड़ते हुए नीचे आए।

    उन्होंने वीरेंद्र के माथे पर बचपन का वह छोटा-सा निशान देखा, जो सिर्फ असली राजा के पास था।

    राजगुरु की आंखें भर आईं।

    वे झुक गए।

    “महाराज… आप जीवित हैं!”

    पूरा दरबार सन्न रह गया।

    बहरूपिया राजा का चेहरा पीला पड़ गया।

    उसने भागने की कोशिश की, लेकिन सैनिकों ने उसे पकड़ लिया।

    पूछताछ हुई।

    सारे राज खुल गए।

     

    उसने कबूल कर लिया कि वह असली राजा नहीं है।

    उसे सेनापति भानु प्रताप ने धन का लालच देकर सिंहासन पर बैठाया था।

    भानु प्रताप तो कई साल पहले मर चुका था, लेकिन उसका झूठ इतने वर्षों तक पूरे राज्य पर राज करता रहा।

    पूरे राज्य में खबर आग की तरह फैल गई।लोग रोने लगे।

    उन्हें पछतावा था कि उनका असली राजा इतने वर्षों तक दर-दर भटकता रहा और वे पहचान भी नहीं पाए।

    राजा वीरेंद्र को दोबारा राजगद्दी पर बैठाया गया।राजा वीरेंद्र ने अगले ही दिन पूरे राज्य में एक विशेष सभा बुलाई। दूर-दूर के गांवों से लोग उन्हें देखने आए। जैसे ही वे राजसिंहासन पर बैठे, पूरा राजदरबार उनकी जय करने लगा 

     

    लेकिन उन्होंने सिंहासन पर बैठते ही सबसे पहला आदेश दिया,

     

    “आज से किसी इंसान को उसके कपड़ों, उसकी गरीबी या उसकी हालत देखकर पागल मत कहना। कभी-कभी सबसे बड़ा सच उसी इंसान के पास होता है, जिसे दुनिया सबसे कम समझती है।”

     

    इसके बाद उन्होंने उन सभी गांव वालों को भी राजधानी बुलाया जिन्होंने कठिन समय में उन्हें दो वक्त की रोटी दी थी।

     

    उन्होंने हर गरीब परिवार की मदद की और राज्य में न्याय का ऐसा शासन स्थापित किया कि वर्षों तक लोग उन्हें याद करते रहे।

    रामपुरा गांव के लोग जब भी अपने बच्चों को उस पुराने बरगद के नीचे ले जाते, तो एक बात जरूर कहते

    “बेटा, किसी की बात का मजाक उड़ाने से

    पहले उसका दर्द समझने की कोशिश करना। क्योंकि कभी-कभी जिसे दुनिया पागल समझती है, वही सच में इतिहास का सबसे बड़ा राजा होता है

     

     

    तो कैसी लगी ये स्टोरी कॉमेंट कर जरूर बताएं 

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कैद की दुल्हन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कैद की दुल्हन

     

    विराज सिंघानिया शहर के सबसे बड़े उद्योगपतियों में गिना जाता था। उसके पास आलीशान बंगले, महंगी गाड़ियाँ, दौलत और रसूख की कोई कमी नहीं थी। लोग उसके नाम से ही डरते थे। लेकिन उसके स्वभाव में एक ऐसी कमी थी जिसने उसे कभी किसी का अपना नहीं बनने दिया। उसे बचपन से आदत थी कि जो चीज़ उसे पसंद आ जाए, वह किसी भी कीमत पर उसकी होनी चाहिए।

     

    दूसरी तरफ थी सोनल। एक छोटे से घर में रहने वाली, बेहद मासूम और सादगी पसंद लड़की। उसके पिता एक सरकारी स्कूल में चपरासी थे और माँ सिलाई करके घर चलाने में उनका हाथ बँटाती थीं। सोनल कॉलेज में पढ़ती थी। उसका सपना था कि पढ़-लिखकर अपने माता-पिता का जीवन आसान बनाए। वह रोज़ बस से कॉलेज जाती और लौटते समय मंदिर में माथा टेकना कभी नहीं भूलती थी।

     

    एक दिन विराज अपनी लग्ज़री कार में किसी मीटिंग के लिए जा रहा था। तभी ट्रैफिक सिग्नल पर उसकी नज़र बस स्टॉप पर खड़ी सोनल पर पड़ी। साधारण सूट, कंधे पर बैग और चेहरे पर मासूम मुस्कान। पहली बार किसी लड़की ने उसके मन को इस तरह बेचैन कर दिया।

     

    उस दिन के बाद विराज रोज़ उसी रास्ते से गुजरने लगा। उसने अपने लोगों से सोनल की पूरी जानकारी निकलवा ली—वह कहाँ रहती है, किस कॉलेज में पढ़ती है, कब घर से निकलती है और कब लौटती है।

     

    उसका दोस्त कबीर बोला, “अगर सच में पसंद है तो उसके घर रिश्ता भेज दे।”

     

    विराज हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “मैं इंतज़ार नहीं करता। जो मुझे पसंद आ जाए, उसे हासिल कर लेता हूँ।”

     

    कबीर ने समझाया, “किसी इंसान को चीज़ मत समझ।”

     

    लेकिन विराज ने उसकी बात अनसुनी कर दी।

     

    उधर सोनल को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि कोई उसकी हर हरकत पर नज़र रख रहा है।

     

    एक शाम कॉलेज से लौटते समय सड़क सुनसान थी। तभी एक काली एसयूवी उसके सामने आकर रुकी। चार आदमी बाहर निकले।

     

    “कौन हो तुम लोग?” सोनल घबराकर बोली।

     

    उसके जवाब देने से पहले ही उन्होंने उसे जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया। सोनल चीखती रही, लेकिन सुनसान सड़क पर उसकी आवाज़ किसी तक नहीं पहुँची।

     

    जब उसकी आँखों से पट्टी हटाई गई तो उसने खुद को एक विशाल और आलीशान बंगले के कमरे में पाया। कमरा किसी महल से कम नहीं था, लेकिन उसके लिए वह एक सुनहरा पिंजरा था।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर विराज आया।

     

    “डरो मत, यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं होगी।”

     

    सोनल काँपती हुई बोली, “मुझे यहाँ क्यों लाए हो? मेरे माँ-पापा मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।”

     

    विराज ने शांत आवाज़ में कहा, “क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

     

    सोनल की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “जिस प्यार में मेरी मर्ज़ी ही नहीं, वह प्यार नहीं हो सकता। मुझे घर जाने दो।”

     

    विराज ने सिर्फ इतना कहा, “अब यही तुम्हारा घर है।”

     

    उधर सोनल के घर में मातम जैसा माहौल था। उसके माता-पिता ने पूरी रात उसे ढूँढा। पुलिस में शिकायत दर्ज हुई, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। माँ रो-रोकर बेहोश हो जातीं और पिता हर आने-जाने वाले से बेटी के बारे में पूछते।

     

    बंगले में सोनल कई बार भागने की कोशिश करती, लेकिन हर बार सुरक्षा कर्मी उसे पकड़ लेते। उसके मोबाइल से लेकर हर सामान तक उससे ले लिया गया था। बाहर की दुनिया से उसका हर रिश्ता तोड़ दिया गया।

     

    कुछ दिनों बाद विराज ने पूरे परिवार के सामने घोषणा कर दी कि वह सोनल से शादी करेगा।

     

    उसकी माँ ने कहा, “बेटा, जबरदस्ती से कोई रिश्ता नहीं बनता।”

     

    लेकिन विराज के सिर पर जुनून सवार था।

     

    उसने पंडित बुला लिया। सोनल लाख मिन्नतें करती रही।

     

    “मुझे जाने दो… मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ।”

     

    लेकिन उसकी एक न सुनी गई।

     

    कुछ समय बाद दोनों की शादी करवा दी गई। शादी के मंडप में सोनल की आँखों में आँसू थे। उसके चेहरे पर दुल्हन की खुशी नहीं, बल्कि कैद का दर्द था।

     

    शादी के बाद भी कुछ नहीं बदला। बंगले के हर दरवाज़े पर पहरा था। सोनल बाहर नहीं जा सकती थी। उसके कमरे की खिड़की से दूर दिखाई देता खुला आसमान उसे हर दिन अपनी आज़ादी की याद दिलाता।

     

    विराज रोज़ उसके लिए महंगे कपड़े, गहने और तोहफ़े लाता।

     

    एक दिन उसने हीरे का हार बढ़ाते हुए कहा, “ये तुम्हारे लिए।”

     

    सोनल ने हार की तरफ देखे बिना जवाब दिया,

     

    “जिस इंसान के पास आज़ादी नहीं होती, उसके लिए हीरे भी बेड़ियाँ लगते हैं।”

     

    विराज पहली बार निरुत्तर हो गया।

     

    दिन बीतते गए। सोनल पहले जैसी हँसमुख लड़की नहीं रही। उसने ठीक से खाना छोड़ दिया। वह चुपचाप घंटों खिड़की के पास बैठी रहती।

     

    एक दिन उसकी तबीयत बहुत बिगड़ गई। डॉक्टर ने जाँच के बाद कहा,

     

    “इन्हें बीमारी से ज़्यादा मानसिक तनाव है। अगर ये ऐसे ही रहीं तो इनकी हालत और खराब हो सकती है।”

     

    उस रात विराज सो नहीं पाया। उसे पहली बार अपने किए पर पछतावा होने लगा। उसने सोचा, “क्या सच में मैं इससे प्यार करता हूँ? अगर करता हूँ, तो यह मेरे साथ खुश क्यों नहीं है?”

     

    अगली सुबह वह सोनल के कमरे में गया।

     

    “अगर मैं तुम्हें आज़ाद कर दूँ… क्या तुम मुझे माफ़ कर पाओगी?”

     

    सोनल ने उसकी ओर देखा।

     

    “माफ़ करना मुश्किल नहीं होता, लेकिन जो भरोसा कभी बना ही नहीं, उसे लौटाना नामुमकिन होता है।”

     

    विराज की आँखें झुक गईं।

     

    वह धीरे से उठा, कमरे का दरवाज़ा खोला और अपनी जेब से बंगले के मुख्य गेट की चाबी निकालकर सोनल के हाथ में रख दी।

     

    “आज से तुम आज़ाद हो। तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।”

     

    सोनल कुछ पल तक उसे देखती रही। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यह सच है।

     

    वह धीरे-धीरे बंगले से बाहर निकली। कई दिनों बाद उसने खुली हवा में साँस ली। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों की अदृश्य ज़ंजीरें खोल दी हों।

     

    वह अपने घर पहुँची।

     

    दरवाज़ा खुलते ही उसकी माँ ने उसे देखा और दौड़कर गले लगा लिया। पिता की आँखों से भी आँसू बहने लगे। वह पल पूरे परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।

     

    कुछ दिनों बाद पुलिस ने विराज को पूछताछ के लिए बुलाया। उसने अपने अपराध को छिपाने की कोशिश नहीं की। उसने माना कि उसने सोनल को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखा था। कानून ने अपना काम किया और उसे अपने किए की सज़ा मिली।

     

    सोनल ने धीरे-धीरे अपने जीवन को फिर से सँभाला। उसने अपनी पढ़ाई पूरी की, नौकरी की और अपने माता-पिता का सहारा बनी। उस दर्द ने उसे कमजोर नहीं, बल्कि पहले से कहीं अधिक मजबूत बना दिया।

     

    विराज ने जेल में रहते हुए कई बार अपने फैसलों पर पछतावा किया। उसे समझ में आ गया कि प्यार किसी को अपनी मर्ज़ी से बाँध लेने का नाम नहीं है। अगर किसी रिश्ते में सम्मान, भरोसा और दोनों की सहमति न हो, तो वह रिश्ता नहीं, केवल कैद बनकर रह जाता है।

     

    सालों बाद जब विराज जेल से बाहर निकला, उसने दूर से एक कार्यक्रम में सोनल को देखा। वह आत्मविश्वास से मंच पर खड़ी थी और महिलाओं की सुरक्षा तथा आत्मसम्मान पर भाषण दे रही थी। विराज बिना उससे मिले वापस लौट गया। उसे महसूस हुआ कि कुछ गलतियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें जीवन भर का पछतावा भी पूरी तरह मिटा नहीं सकता।

     

    उस दिन के बाद दोनों की राहें फिर कभी नहीं मिलीं। लेकिन उनकी कहानी हर उस इंसान के लिए एक सीख बन गई कि सच्चा प्यार किसी पर अधिकार जमाने में नहीं, बल्कि उसकी इच्छा, सम्मान और आज़ादी की कद्र करने में होता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • निर्जीव भी अपने से

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    निर्जीव से भी करती थी वो बात

     

    गाँव के किनारे एक छोटा-सा कच्चा घर था। उस घर में चौदह साल की एक लड़की रहती थी, जिसका नाम मीरा था। लोग कहते थे कि वह बहुत अजीब है। कोई उसे हँसता नहीं देखता था, फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा एक हल्की-सी मुस्कान रहती थी।

     

    मीरा की सबसे अनोखी आदत थी कि वह निर्जीव चीज़ों से भी बातें करती थी। सुबह उठते ही वह अपने आँगन के पुराने नीम के पेड़ से कहती, “कैसे हो मेरे दोस्त? आज हवा थोड़ी तेज़ है, अपना ध्यान रखना।”

     

    फिर वह अपने मिट्टी के घड़े से बोलती, “तू हर रोज़ सबकी प्यास बुझाता है, कभी थकता नहीं क्या?”

     

    टूटी हुई चारपाई से कहती, “तू बूढ़ी हो गई है, लेकिन आज भी मेरा सहारा बनी हुई है।”

     

    जो भी उसे देखता, बस यही कहता, “लड़की का दिमाग़ ठीक नहीं है।”

     

    लेकिन कोई यह नहीं जानता था कि मीरा ऐसा क्यों करती है।

     

    जब वह बहुत छोटी थी, तभी उसके पिता का देहांत हो गया था। उसकी माँ कई महीनों से बीमार रहती थी। घर में गरीबी थी और रिश्तेदारों ने भी धीरे-धीरे साथ छोड़ दिया था। माँ अक्सर कहती, “बेटी, अगर कभी मैं न रहूँ तो हिम्मत मत हारना।”

     

    मीरा हर बार माँ का हाथ पकड़कर कहती, “आप कहीं नहीं जाएँगी।”

     

    लेकिन किस्मत ने उसकी बात नहीं सुनी।

     

    एक बरसाती रात उसकी माँ ने भी दुनिया छोड़ दी।

     

    उस दिन के बाद मीरा सचमुच अनाथ होने वाली थी। गाँव वालों ने कुछ दिन तक उसकी मदद की, फिर सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए।

     

    अब उस छोटे-से घर में सिर्फ़ मीरा और उसकी यादें रहती थीं।

     

    शायद इसी अकेलेपन ने उसे निर्जीव चीज़ों से बातें करना सिखा दिया था। उसे लगता था कि अगर इंसान साथ छोड़ दें, तो भी दीवारें, पेड़, हवा और पुरानी चीज़ें इंसान का साथ नहीं छोड़तीं।

     

    वह जब रोती, तो घर की दीवार से टिककर कहती, “तूने मेरी माँ को देखा था न? मुझे लगता है वो अभी भी यहीं कहीं है।”

     

    जब तेज़ बारिश होती, तो वह छत से टपकती बूंदों से कहती, “इतना मत रोओ… मैं भी रो पड़ूँगी।”

     

    गाँव के बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते थे।

     

    “देखो… पगली फिर से पेड़ से बातें कर रही है।”

     

    मीरा बस मुस्कुरा देती। उसे किसी से शिकायत नहीं थी।

     

    धीरे-धीरे उसका यही स्वभाव उसकी ताकत बन गया। वह हर चीज़ में जीवन ढूँढने लगी—टूटी खिड़की की आवाज़ में भी, हवा की सरसराहट में भी। उसे लगता था कि दुनिया में हर चीज़ कुछ कहना चाहती है, बस सुनने वाला चाहिए।

     

    एक दिन स्कूल से लौटते समय उसने देखा कि रास्ते में एक बूढ़े बाबा गिर गए हैं। लोग पास से निकलते रहे, लेकिन किसी ने उन्हें उठाने की कोशिश नहीं की।

     

    मीरा दौड़कर पहुँची। उसने बाबा को सहारा दिया, पानी पिलाया और उन्हें उनके घर तक छोड़ आई।

     

    बाबा ने जाते-जाते पूछा, “बेटी, तू हर किसी का दर्द कैसे समझ लेती है?”

     

    मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “जिसने अपना सब कुछ खोया हो, उसे दूसरों का दर्द जल्दी समझ आ जाता है।”

     

    बाबा की आँखें भर आईं।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव की एक बुज़ुर्ग अम्मा बीमार पड़ गईं। उनके बेटे शहर में रहते थे और कई महीनों से मिलने नहीं आए थे।

     

    मीरा रोज़ उनके लिए खाना बनाकर ले जाती। दवा का समय याद दिलाती। रात को उनके पास बैठती और कहानियाँ सुनाती।

     

    अम्मा कहतीं, “बेटी, तू तो मेरी अपनी बेटी से भी बढ़कर निकली।”

     

    मीरा हँसकर कहती, “रिश्ते हमेशा खून से नहीं, दिल से बनते हैं।”

     

    धीरे-धीरे गाँव के लोगों ने नोटिस किया कि जिस लड़की को वे पागल समझते थे, वही सबसे ज़्यादा संवेदनशील है।

     

    एक दिन गाँव के स्कूल में बच्चों से पूछा गया, “सबसे दयालु इंसान किसे मानते हो?”

     

    पहले तो सब चुप रहे। फिर एक बच्चे ने कहा, “मीरा दीदी।

    यह सुनकर शिक्षक भी हैरान रह गए।

    उन्होंने मीरा को बुलाया और पूछा, “तुम इतनी छोटी उम्र में सबकी मदद क्यों करती हो?”

     

    मीरा ने शांत स्वर में कहा, “क्योंकि मैं जानती हूँ कि अकेलापन कितना दर्द देता है। मैं नहीं चाहती कि कोई और वह दर्द महसूस करे।”

     

    उसकी यह बात सुनकर पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    कुछ समय बाद शहर से एक समाजसेवी संस्था गाँव आई। उन्हें मीरा के बारे में पता चला। उन्होंने उसकी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का फैसला किया।

     

    पहली बार मीरा को लगा कि शायद भगवान देर से ही सही, लेकिन किसी न किसी रूप में मदद ज़रूर भेजते हैं।

     

    शहर जाने से पहले वह अपने पुराने घर के आँगन में गई।

     

    उसने नीम के पेड़ को गले लगाया और बोली, “मैं जा रही हूँ, लेकिन तुम्हें कभी नहीं भूलूँगी।”

     

    फिर उसने मिट्टी के घड़े पर हाथ फेरा और मुस्कुराकर कहा, “तूने मेरा अकेलापन बाँटा था।”

     

    दीवार को छूकर बोली, “तूने मेरी हर ख़ामोशी सुनी है।”

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    आज पहली बार गाँव वालों ने भी उन निर्जीव चीज़ों को अलग नज़र से देखा। उन्हें एहसास हुआ कि जिनसे मीरा बातें करती थी, वे चीज़ें नहीं, उसके जीवन के साथी थे।

     

    कई साल बाद मीरा पढ़-लिखकर एक सामाजिक कार्यकर्ता बनी। उसने अनाथ बच्चों के लिए एक छोटा-सा आश्रय गृह खोला।

     

    वहाँ आने वाले हर बच्चे से वह एक ही बात कहती थी, “अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो, तो याद रखना… दुनिया में कोई न कोई तुम्हारी बात सुनने वाला ज़रूर होता है। और जब तक वह नहीं मिलता, तब तक अपने हौसले से बातें करना।”

     

    एक दिन एक छोटी बच्ची ने उससे पूछा, “दीदी, क्या आप आज भी पेड़ों और दीवारों से बातें करती हैं?”

     

    मीरा मुस्कुराई और बोली, “हाँ… क्योंकि उन्होंने उस समय मेरा साथ दिया था, जब पूरी दुनिया मुझे अकेला छोड़ चुकी थी।”

     

    उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वे दुख के नहीं, कृतज्ञता के आँसू थे।

     

    और अब उसका आश्रय गृह सिर्फ बच्चों का घर नहीं था, बल्कि उम्मीदों का एक छोटा-सा संसार बन चुका था, जहाँ हर बच्चा यह सीखता था कि दर्द चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, अगर दिल में अपनापन हो तो दुनिया फिर से जीने लायक बन जाती है।

     

    कभी-कभी सबसे ज़्यादा दर्द सहने वाले लोग ही दूसरों के आँसू

    सबसे पहले पहचान लेते हैं। और जिनके पास अपना कोई नहीं होता, वही पूरी दुनिया को अपना बना लेते हैं।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • दोस्ती बेमिसाल

    दोस्ती बेमिसाल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दोस्ती का सबसे बड़ा तोहफ़ा

     

    एक छोटे से शहर में दो दोस्त रहते थे आरव और मोहन।

     

    दोनों की दोस्ती पूरे शहर में मिसाल थी। लेकिन उनकी ज़िंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी।

     

    आरव शहर के सबसे बड़े उद्योगपति का इकलौता बेटा था। उसके पास बड़ा बंगला, महंगी गाड़ियाँ, नौकर-चाकर और हर सुख-सुविधा थी। दूसरी ओर मोहन एक बेहद गरीब परिवार से था। उसके पिता दिहाड़ी मजदूर थे और माँ लोगों के घरों में काम करती थीं। कई बार तो उनके घर में दो वक्त का खाना भी मुश्किल से बन पाता था।

     

    लेकिन इन दोनों दोस्तों के बीच अमीरी और गरीबी की दीवार कभी नहीं आई।

     

    बचपन से दोनों साथ स्कूल जाते, साथ खेलते और साथ ही सपने देखते थे। अगर आरव के टिफिन में पनीर की सब्ज़ी होती और मोहन के पास सिर्फ सूखी रोटी, तो दोनों आधा-आधा बाँटकर खाते।

     

    स्कूल के बच्चे अक्सर मोहन का मज़ाक उड़ाते।

     

    “देखो, करोड़पति का दोस्त फटे कपड़ों में आया है।”

     

    लेकिन हर बार आरव उनके सामने खड़ा हो जाता।

     

    “अगर मेरे दोस्त का मज़ाक उड़ाया, तो समझ लेना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”

     

    मोहन हमेशा मुस्कुराकर कहता,

    “यार, तू इतना क्यों लड़ता है?”

     

    आरव हँसकर जवाब देता,

    “दोस्ती निभाने के लिए लड़ना भी पड़ता है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    स्कूल खत्म हुआ। आरव अपने पिता का कारोबार संभालने लगा, जबकि मोहन पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने लगा ताकि अपने बूढ़े माँ-बाप का सहारा बन सके।

     

    अब उनकी मुलाकातें कम होने लगीं, लेकिन दिलों की दूरी कभी नहीं बढ़ी।

     

    हर रविवार दोनों किसी चाय की दुकान पर बैठकर घंटों बातें करते।

     

    एक दिन अचानक सब कुछ बदल गया।

     

    आरव कई दिनों से थकान महसूस कर रहा था। उसका शरीर सूजने लगा था। परिवार उसे बड़े अस्पताल ले गया।

     

    जाँच हुई।

     

    रिपोर्ट देखकर डॉक्टर गंभीर हो गए।

     

    “हमें अफसोस है… आपकी दोनों किडनियाँ लगभग काम करना बंद कर चुकी हैं। इन्हें तुरंत किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होगी।”

     

    यह सुनते ही पूरे परिवार के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    आरव की माँ रोने लगीं।

     

    पिता ने तुरंत रिश्तेदारों से संपर्क किया।

     

    एक-एक करके सभी की जाँच हुई।

     

    लेकिन किसी का ब्लड ग्रुप नहीं मिला, कोई डर गया, किसी ने साफ़ मना कर दिया।

     

    जिन लोगों के लिए आरव के पिता ने लाखों रुपये खर्च किए थे, वही लोग अब बहाने बनाकर दूर हो गए।

     

    दिन बीतते जा रहे थे।

     

    आरव की हालत बिगड़ती जा रही थी।

     

    उसे हफ्ते में कई बार डायलिसिस करवाना पड़ता था।

     

    एक रात उसकी माँ अस्पताल के बाहर बैठकर रो रही थीं।

     

    उन्हें अचानक मोहन का ख्याल आया।

     

    उन्होंने किसी को बताए बिना अगले दिन मोहन के छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया।

     

    मोहन ने दरवाज़ा खोला तो सामने आरव की माँ को देखकर घबरा गया।

     

    “आंटी… आप यहाँ?”

     

    उन्होंने अंदर आकर चारों तरफ देखा। टूटी चारपाई, मिट्टी का चूल्हा और साधारण-सा घर।

     

    उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    मोहन ने पानी दिया।

     

    “सब ठीक है ना?”

     

    कुछ पल चुप रहने के बाद उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा,

     

    “बेटा… मैं आज एक माँ बनकर नहीं, अपने बेटे की दोस्ती का वास्ता लेकर आई हूँ।”

     

    मोहन समझ नहीं पाया।

     

    उन्होंने रोते हुए सारी बात बता दी।

     

    “आरव की दोनों किडनियाँ जवाब दे चुकी हैं… कोई भी उसे किडनी देने को तैयार नहीं है। डॉक्टर ने कहा है कि अगर जल्दी ट्रांसप्लांट नहीं हुआ तो…”

     

    उनकी आवाज़ भर्रा गई।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने काँपते हाथ जोड़ दिए।

     

    “बेटा… अगर तुम्हारा ब्लड ग्रुप मिल जाए… तो क्या… क्या तुम अपने दोस्त के लिए एक किडनी दे दोगे?”

     

    यह सुनकर मोहन कुछ पल बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

     

    उसने बिना एक पल सोचे कहा,

     

    “आंटी… आपने माँगने में देर कर दी। अगर मेरे दोस्त की जान बच सकती है, तो मेरी एक नहीं, दोनों किडनियाँ भी उसकी हैं।”

     

    आंटी रो पड़ीं।

     

    “नहीं बेटा… मुझे सिर्फ एक चाहिए।”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “दोस्ती में हिसाब नहीं होता।”

     

    अगले ही दिन चुपचाप उसकी जाँच हुई।

     

    रिपोर्ट आई।

     

    ब्लड ग्रुप भी मिला और सभी मेडिकल परीक्षण भी सफल रहे।

     

    डॉक्टर खुश हो गए।

     

    लेकिन मोहन ने एक शर्त रखी।

     

    “आरव को पता नहीं चलना चाहिए कि किडनी किसने दी है। अगर उसे पता चला तो वह कभी नहीं मानेगा।”

     

    परिवार ने उसकी बात मान ली।

     

    कुछ दिनों बाद ऑपरेशन हुआ।

     

    घंटों तक चले इस ऑपरेशन के बाद डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराकर बोले,

     

    “ऑपरेशन सफल रहा। अब दोनों खतरे से बाहर हैं।”

     

    पूरा परिवार खुशी से रो पड़ा।

     

    कुछ हफ्तों बाद आरव धीरे-धीरे ठीक होने लगा।

     

    लेकिन उसके मन में हमेशा एक सवाल रहता।

     

    “आख़िर वह कौन था जिसने मुझे नई ज़िंदगी दी?”

     

    हर बार डॉक्टर यही कहते,

     

    “जिसने दान किया, उसने अपना नाम गुप्त रखने की इच्छा जताई है।”

     

    एक दिन अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद आरव अपने दोस्त मोहन से मिलने उसके घर पहुँचा।

     

    मोहन पहले की तरह मुस्कुराकर मिला, लेकिन अब वह पहले से थोड़ा कमजोर लग रहा था।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तू इतना कमजोर क्यों हो गया?”

     

    मोहन हँस पड़ा।

     

    “अरे, बस काम ज्यादा कर लिया।”

     

    तभी मोहन की माँ से यह राज छिप न सका।

     

    उन्होंने भावुक होकर सब सच बता दिया।

     

    “बेटा… जिसने तुझे नई ज़िंदगी दी है… वो कोई और नहीं, मोहन है।”

     

    यह सुनते ही आरव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    वह दौड़कर मोहन के गले लग गया।

     

    “पागल… तूने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “अगर बता देता तो तू कभी मानता ही नहीं।”

     

    आरव फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    “मैं तेरे इस एहसान का कर्ज़ कभी नहीं चुका सकता।”

     

    मोहन ने उसके आँसू पोंछे।

     

    “दोस्ती में एहसान नहीं होते। अगर आज मेरी जगह तू होता, तो क्या तू मना कर देता?”

     

    आरव ने बिना सोचे सिर हिला दिया।

     

    “कभी नहीं।”

     

    दोनों दोस्त गले लगकर देर तक रोते रहे।

     

    कुछ महीनों बाद जब आरव पूरी तरह स्वस्थ हो गया, तब उसने पूरे परिवार को बुलाया।

     

    वहाँ मोहन और उसके माता-पिता भी मौजूद थे।

     

    सबके सामने आरव ने एक फाइल मोहन के हाथ में रखी।

     

    मोहन ने खोला तो उसके हाथ काँप गए।

     

    वह संपत्ति के कागज़ थे।

     

    आरव मुस्कुराकर बोला,

     

    “जिस दोस्त ने मुझे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा दिया, उसके बिना मेरी दौलत भी अधूरी है।”

     

    मोहन ने तुरंत मना किया।

     

    “मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यह कोई कीमत नहीं है… यह उस रिश्ते की इज़्ज़त है जिसने मुझे दूसरी ज़िंदगी दी है।”

    मोहन की आँखें भर आईं।

    उसने फाइल सीने से लगा ली, लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी दौलत आज भी वही दोस्ती थी जो बचपन में आधी रोटी बाँटने से शुरू हुई थी।

     

    उस दिन आरव ने अपनी आधी जायदाद अपने गरीब दोस्त मोहन के नाम कर दी।

     

    कहते हैं, पैसा इंसान को अमीर बना सकता है, लेकिन सच्ची दोस्ती इंसान को सबसे बड़ा ख़ज़ाना दे देती है। जिस दोस्ती में न अमीरी दिखाई दे, न गरीबी, बल्कि सिर्फ़ अपनापन और त्याग हो वही दोस्ती दुनिया की सबसे अनमोल दौलत होती है।

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    Auther preeti Sharma

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  • श्रापित तितली

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    श्रापित तितली

     

    बहुत समय पहले, पहाड़ों के बीच एक जादुई जंगल था। उस जंगल में रंग-बिरंगी परियां रहती थीं। उन्हीं में एक नन्ही और चंचल परी थी, जिसका नाम तारा था। तारा का दिल बहुत साफ था, लेकिन वह बहुत शरारती भी थी। उसे हर नई चीज़ जानने की उत्सुकता रहती थी।

     

    परियों के गुरु, गुरु वायुनाथ, पूरे जंगल के सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली गुरु थे। उन्होंने सभी परियों को एक नियम दिया था।

     

    “कभी भी उत्तर दिशा की पहाड़ी पर लगे सुनहरे फूल को मत छूना। वह फूल जादुई है और उसके पीछे बहुत बड़ा रहस्य छिपा है।”

     

    सभी परियां गुरु की बात मानती थीं, लेकिन तारा के मन में बार-बार यही सवाल उठता, “आख़िर उस फूल में ऐसा क्या है जिसे देखने तक की मनाही है?”

     

    एक सुबह, जब सारी परियां अपने काम में लगी थीं, तारा चुपके से उड़ती हुई उत्तर दिशा की पहाड़ी पर पहुंच गई। वहां सचमुच एक सुनहरा फूल चमक रहा था। उसकी खुशबू इतनी मीठी थी कि तारा खुद को रोक नहीं सकी।

     

    जैसे ही उसने फूल को हाथ लगाया, पूरे जंगल में तेज़ रोशनी फैल गई। आसमान काला पड़ गया और बिजली चमकने लगी। पेड़ तेज़ हवा में झूमने लगे और पूरा जंगल जैसे कांप उठा।

     

    अगले ही पल गुरु वायुनाथ वहां प्रकट हुए। उनकी आंखों में गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “तारा! मैंने तुम्हें चेतावनी दी थी। फिर भी तुमने मेरी आज्ञा तोड़ दी।”

     

    तारा डर गई। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “गुरुदेव… मुझसे गलती हो गई। मुझे माफ़ कर दीजिए।”

     

    गुरु बोले, “हर गलती की एक कीमत होती है। यदि आज तुम्हें बिना दंड के छोड़ दूं, तो बाकी परियां भी नियमों का सम्मान करना छोड़ देंगी।”

     

    उन्होंने अपना जादुई दंड उठाया और बोले,

     

    “आज से तुम्हारे पंख छिन जाएंगे। तुम एक नन्ही तितली बनकर धरती पर जीवन बिताओगी। जब तक तुम किसी ऐसे इंसान के दिल में बिना जादू के सच्ची दया और प्रेम नहीं जगा दोगी, तब तक यह श्राप नहीं टूटेगा।”

     

    इतना कहते ही तारा के चमकीले परी वाले पंख गायब हो गए। उसका शरीर छोटा होने लगा और कुछ ही पलों में वह एक सुंदर, रंग-बिरंगी तितली बन गई।

     

    तारा जोर-जोर से रोने लगी।

     

    “गुरुदेव… मैं फिर से परी बनना चाहती हूं।”

     

    लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

     

    तितली बनी तारा जंगलों, खेतों और बागों में उड़ती रहती। लोग उसकी सुंदरता की तारीफ करते, लेकिन कोई उसके दिल का दर्द नहीं समझता था।

     

    तितली बनने के बाद उसने पहली बार दुनिया को बहुत करीब से देखा। पहले वह एक परी थी, इसलिए उसे कभी भूख, डर या अकेलेपन का एहसास नहीं हुआ था। लेकिन अब हर दिन उसके लिए एक नई परीक्षा लेकर आता था। कभी तेज़ बारिश उसके नाज़ुक पंखों को भिगो देती, तो कभी आंधी उसे बहुत दूर जंगलों तक उड़ा ले जाती। कई बार पक्षी उसे अपना शिकार बनाने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़ते। वह किसी पत्ते या फूल के पीछे छिपकर अपनी जान बचाती।

     

    धीरे-धीरे तारा को समझ आने लगा कि छोटा होना कमजोरी नहीं, बल्कि धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षा है। उसने देखा कि छोटी-सी चींटी अपने से कई गुना बड़ा दाना उठाकर चलती है, मधुमक्खियां बिना थके शहद इकट्ठा करती हैं और छोटे-छोटे जीव भी कभी हार नहीं मानते। यह सब देखकर उसका स्वभाव बदलने लगा। अब वह पहले जैसी जिद्दी नहीं रही थी। उसने मन ही मन प्रण किया कि अगर उसे दोबारा कभी परी बनने का मौका मिला तो वह गुरु की हर बात का सम्मान करेगी।

     

    दिन बीतते गए… महीने गुजर गए… फिर साल भी बीत गए।

     

    एक दिन वह एक छोटे से गांव में पहुंची। वहां उसे आठ साल का एक लड़का मिला, जिसका नाम मोहन था।

     

    मोहन बहुत गरीब था। उसके पास खिलौने नहीं थे, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था।

     

    एक दिन कुछ बच्चे खेलते-खेलते तितली को पकड़ने लगे। कोई उसके पंख तोड़ना चाहता था, तो कोई उसे डिब्बे में बंद करना चाहता था।

     

    तारा डरकर इधर-उधर उड़ने लगी।

     

    तभी मोहन दौड़ता हुआ आया।

     

    उसने बच्चों से कहा,

     

    “उसे मत पकड़ो। अगर कोई तुम्हें पकड़कर बंद कर दे तो कैसा लगेगा?”

     

    बच्चे हंसने लगे।

     

    “अरे, ये तो सिर्फ एक तितली है।”

     

    मोहन बोला,

     

    “इसके भी प्राण हैं। इसे भी दर्द होता होगा।”

     

    उसने अपने दोनों हाथों से तितली को बचाया और धीरे से खुले आसमान की ओर उड़ा दिया।

     

    तारा पहली बार किसी इंसान की आंखों में इतनी सच्ची दया देख रही थी।

     

    उसकी आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े।

     

    लेकिन श्राप अभी भी नहीं टूटा।

     

    वह सोचने लगी, “शायद अभी मेरी परीक्षा पूरी नहीं हुई।”

     

    कुछ दिनों बाद गांव में भीषण सूखा पड़ गया। खेत सूख गए। कुएं खाली होने लगे। लोग परेशान हो गए।

     

    मोहन रोज़ अपने पीने के पानी में से थोड़ा-सा पानी बचाकर गांव के बाहर लगे छोटे-छोटे पौधों को सींचता था।

     

    लोग उसका मजाक उड़ाते।

     

    “जब इंसानों के लिए पानी नहीं है, तब पेड़ों को क्यों बचा रहा है?”

     

    मोहन मुस्कुराकर कहता,

     

    “अगर पेड़ नहीं बचेंगे, तो हम भी नहीं बचेंगे।”

     

    तारा रोज़ यह सब देखती और मन ही मन मोहन की अच्छाई पर गर्व महसूस करती।

     

    एक शाम मोहन ने देखा कि एक घायल चिड़िया ज़मीन पर पड़ी है। उसने उसे घर ले जाकर दाना-पानी दिया। कई दिनों तक उसकी सेवा की। जब चिड़िया पूरी तरह ठीक हो गई तो उसने उसे खुले आसमान में उड़ा दिया।

     

    उसी रात गांव में तेज़ बारिश हुई। सूखे खेतों में फिर से हरियाली लौटने लगी। लोग खुशियां मनाने लगे। मोहन ने आसमान की ओर देखकर भगवान का धन्यवाद किया।

     

    उसी समय तारा के चारों ओर सुनहरी रोशनी फैलने लगी।

     

    आसमान से गुरु वायुनाथ प्रकट हुए।

     

    उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तारा, तुम्हारा श्राप समाप्त हो गया।”

     

    तारा हैरानी से बोली,

     

    “लेकिन गुरुदेव, मैंने तो कोई जादू नहीं किया।”

     

    गुरु मुस्कुराए।

     

    “यही तुम्हारी सबसे बड़ी परीक्षा थी। तुमने किसी के मन को जादू से नहीं बदला। तुमने धैर्य रखा, जीवन की कठिनाइयों को सहा और सच्ची करुणा को अपने सामने खिलते हुए देखा। तुम्हारे बदलते स्वभाव और मोहन की निस्वार्थ दया ने इस श्राप को तोड़ दिया।”

     

    अगले ही पल तितली फिर से एक सुंदर परी बन गई। उसके पंख पहले से भी अधिक चमक रहे थे।

     

    तारा की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। उसने गुरु के चरण छू लिए।

     

    “गुरुदेव, आज मुझे समझ आया कि शक्ति से बड़ा अनुशासन होता है, और जादू से बड़ी दया।”

     

    गुरु ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ रखा और बोले,

     

    “जो अपनी गलती से सीख लेता है, वही सच्चा शिष्य कहलाता है।”

     

    उस दिन के बाद तारा फिर कभी अहंकार या जिद में नहीं आई। वह नई परियों को अपनी कहानी सुनाती और कहती,

     

    “जिज्ञासा अच्छी बात है, लेकिन गुरु की आज्ञा और अनुशासन उससे भी अधिक जरूरी है। दया, प्रेम और धैर्य में इतनी शक्ति होती है कि वे सबसे कठिन श्राप को भी समाप्त कर सकते हैं।”

     

    कहा जाता है कि आज भी जब किसी बगीचे में कोई रंग-बिरंगी तितली बच्चों के आसपास बिना डरे उड़ती है, तो लोग मुस्कुराकर कहते हैं”शायद यह वही श्रापित तितली है, जो अब हर किसी को प्रेम, दया और आज्ञा का सम्मान करना सिखाने आती है।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मायावी

    मायावी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मायावी का भेष 

     

    शहर में पिछले कई महीनों से एक अजीब घटना लगातार हो रही थी। शहर के बड़े-बड़े अमीर परिवार अचानक अपनी मेहनत की कमाई और जमा-पूंजी खो रहे थे। किसी के बैंक खाते से करोड़ों रुपये गायब हो जाते, तो किसी की तिजोरी रातों-रात खाली मिलती। सबसे हैरानी की बात यह थी कि न कहीं चोरी के निशान मिलते थे और न ही किसी को यह याद रहता था कि आखिर उनके साथ हुआ क्या था।

     

    पुलिस ने हर तरफ जांच शुरू कर दी, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ एक सवाल मिलता—”यह सब करता कौन है?”

     

    एक दिन शहर के मशहूर उद्योगपति राघव मल्होत्रा अपने बेटे साहिल के सामने बैठे थे। उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    “साहिल, तुम्हारे खाते से पच्चीस लाख रुपये निकल गए। बैंक कह रहा है कि सारे लेन-देन तुम्हारी मंजूरी से हुए हैं। आखिर यह कैसे हुआ?”

     

    साहिल ने सिर पकड़ लिया।

     

    “पापा, मुझे तो कुछ भी याद नहीं। मैं ऑफिस से निकला था, रास्ते में एक कैफे पर रुका था… उसके बाद जैसे सब धुंधला हो गया।”

     

    यह सुनकर पूरा परिवार सन्न रह गया।

     

    ऐसी ही घटनाएं शहर के कई और अमीर परिवारों के साथ भी हो चुकी थीं। किसी के बेटे के साथ, किसी की बेटी के साथ, तो किसी के बिजनेस पार्टनर के साथ। हर कोई एक ही बात कहता—”हमें कुछ याद नहीं।”

     

    असल में इन सबके पीछे एक मायावी था।

     

    वह कोई साधारण इंसान नहीं था। उसके पास ऐसा मायाजाल था कि वह पलभर में अपना रूप बदल सकता था। कभी वह ड्राइवर बन जाता, कभी सिक्योरिटी गार्ड, कभी ऑफिस का कर्मचारी, कभी डॉक्टर और कभी किसी होटल का वेटर। उसका असली चेहरा किसी ने कभी नहीं देखा था।

     

    लेकिन वह जल्दबाजी नहीं करता था। पहले कई दिनों तक अपने शिकार पर नज़र रखता। वह देखता कि अमीर परिवार का बेटा या बेटी किस समय घर से निकलते हैं, कहाँ काम करते हैं, किस रास्ते से आते-जाते हैं और कहाँ रुकते हैं।

     

    जब उसे पूरा यकीन हो जाता कि अब मौका सही है, तब वह उसी जगह किसी नए भेष में पहुंच जाता।

     

    जिस दिन साहिल कैफे में कॉफी पीने रुका, उस दिन मायावी उसी कैफे का नया कर्मचारी बन चुका था।

     

    वह मुस्कुराते हुए साहिल के पास आया।

     

    “सर, आपकी कॉफी।”

     

    साहिल ने जैसे ही उसकी तरफ देखा, मायावी की आंखों में एक अजीब चमक दिखाई दी। वह धीमी आवाज़ में कुछ रहस्यमयी शब्द बोलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में साहिल की आंखें बोझिल हो गईं। वह जैसे किसी गहरे नशे में चला गया।

    “मोबाइल का पासवर्ड बताओ।”

    साहिल ने बिना सोचे बता दिया।

    “बैंक का ओटीपी?”

    वह भी बता दिया।

    कुछ ही मिनटों में लाखों रुपये अलग-अलग खातों में पहुंच चुके थे। मायावी ने साहिल का मोबाइल वापस उसकी जेब में रखा और बाहर निकल गया।

     

    कैफे से बाहर आते ही उसका चेहरा बदलने लगा। अब वह एक बूढ़ा आदमी बन चुका था। सड़क पर चलते लोग उसे देखकर आगे निकल गए। किसी को जरा भी शक नहीं हुआ।

     

    उधर साहिल कुछ देर बाद सामान्य हुआ, लेकिन उसे सिर्फ इतना याद था कि उसने कॉफी पी थी। बाकी सब कुछ उसकी याददाश्त से गायब था।

     

    जब पुलिस ने कैफे के सीसीटीवी कैमरे देखे, तो उसमें सिर्फ एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। लेकिन बाहर लगे दूसरे कैमरे में वही आदमी अचानक गायब हो गया था।

     

    पुलिस जितनी जांच करती, मामला उतना ही उलझता जा रहा था।

     

    उसी समय शहर में एक नए पुलिस अधिकारी की नियुक्ति हुई। उनका नाम था अजय राणा।

     

    उन्होंने सभी फाइलें पढ़ीं और धीरे से कहा,

     

    “यह कोई साधारण चोर नहीं… बल्कि बहुत चालाक खिलाड़ी है। लेकिन हर खिलाड़ी एक न एक गलती जरूर करता है।”

     

    अजय ने उसी पल फैसला कर लिया कि अब इस रहस्यमयी मायावी का खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चलने देगा।

     

    अजय राणा ने पिछले छह महीनों की सभी घटनाओं का बारीकी से अध्ययन किया। उसने हर पीड़ित से अलग-अलग बात की। सभी की यादें धुंधली थीं, लेकिन एक बात हर कहानी में समान थी हर वारदात से पहले किसी अनजान व्यक्ति से उनकी मुलाकात हुई थी।

     

    अजय ने समझ लिया कि अपराधी लोगों का भरोसा जीतकर उन्हें अपने जाल में फँसाता है।

     

    उसे पकड़ने के लिए उसने एक योजना बनाई।

     

    अगले ही दिन पूरे शहर में खबर फैला दी गई कि एक बड़े उद्योगपति का बेटा विदेश से लौट रहा है। उसके पास करोड़ों रुपये की दुर्लभ हीरे-जवाहरात और नकदी है। यह खबर जानबूझकर फैलाई गई थी ताकि मायावी लालच में आ जाए।

     

    लेकिन सच यह था कि वह युवक कोई उद्योगपति का बेटा नहीं, बल्कि पुलिस का एक जवान था। उसके आसपास सादे कपड़ों में पुलिस के कई अधिकारी हर समय मौजूद थे।

     

    तीन दिन तक कुछ नहीं हुआ।

    चौथे दिन वह जवान रोज़ की तरह एक होटल में खाना खाने पहुँचा। तभी एक नया वेटर उसके पास आया।

     

    अजय, जो दूर बैठा सब देख रहा था, अचानक चौकन्ना हो गया।

    वेटर की चाल बिल्कुल वैसी ही थी, जैसी सीसीटीवी फुटेज में अलग-अलग लोगों की दिखाई देती थी।

     

    वेटर मुस्कुराया और बोला, “सर, आपका ऑर्डर।”

    जैसे ही उसने जवान की आँखों में देखा, उसकी आँखों से वही रहस्यमयी चमक निकली।

     

    लेकिन इस बार जवान पहले से तैयार था। उसने तुरंत अपनी आँखें बंद कर लीं और मेज के नीचे लगा अलार्म दबा दिया।

     

    कुछ ही सेकंड में चारों तरफ से पुलिस ने होटल को घेर लिया।

    मायावी मुस्कुराया।

    “तुम लोग मुझे पकड़ नहीं सकते।”

    इतना कहकर उसने अपना चेहरा बदलना शुरू कर दिया। देखते ही देखते वह वेटर से बूढ़ा बन गया, फिर बूढ़े से साधु और अगले ही पल एक महिला का रूप धारण कर लिया।

    पुलिस के कई जवान पलभर के लिए भ्रमित हो गए।

     

    लेकिन अजय पहले से तैयार था।

    उसने होटल के चारों ओर विशेष दर्पण लगवाए थे। उन दर्पणों में मायावी का असली रूप साफ दिखाई दे रहा था। पहली बार सबने देखा कि उसका चेहरा न बूढ़े जैसा था, न जवान जैसा और न ही किसी साधु जैसा। उसका असली चेहरा डरावना और रहस्यमयी था।

     

    अजय ने बिना देर किए उस पर जाल फेंका। जाल पर विशेष मंत्र लिखे हुए थे, जिनकी वजह से मायावी अपना रूप बदल नहीं सका।

     

    वह गुस्से से चिल्लाने लगा।

    “मुझे कोई नहीं रोक सकता।”

     

    लेकिन इस बार उसकी सारी शक्तियाँ बेकार हो चुकी थीं।

     

    पुलिस उसे गिरफ्तार करके उसके गुप्त ठिकाने पर पहुँची। वहाँ से करोड़ों रुपये, सोना, हीरे और कई परिवारों का लूटा हुआ सामान बरामद हुआ।

    सभी चीज़ें उनके असली मालिकों को वापस लौटा दी गईं।

     

    साहिल और बाकी परिवारों ने राहत की साँस ली। पूरे शहर में अजय राणा की बहादुरी की चर्चा होने लगी।

     

    अदालत ने मायावी को उसके अपराधों के लिए उम्रकैद की सज़ा सुनाई।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

    एक रात जेल का एक पहरेदार अचानक बेहोश मिला। जब दूसरे पहरेदार उसकी मदद के लिए पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि मायावी अपनी कोठरी में तो बैठा है… लेकिन उसके चेहरे पर वही रहस्यमयी मुस्कान है।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मेरे जैसे मायावी कभी खत्म नहीं होते… हम सिर्फ अपना भेष बदलते हैं।”

     

    इतना सुनते ही जेल की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।

     

    कुछ पल बाद जब रोशनी वापस आई, तो मायावी अपनी कोठरी में बैठा

    था… या शायद कोई और उसके भेष में था।

    आज तक कोई यह पता नहीं लगा पाया कि उस रात सच में क्या हुआ था।

     

    समाप्त।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अधूरी इबादत भाग~20

    अधूरी इबादत भाग~20

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    भाग~20 तोड़ डाली परंपराएं

     

    जानकी चौहान, भानु प्रताप और उनके साथ बैठे मेहमान…. सभी की नज़रें एक साथ मेन गेट पर टिक गईं। सबने एक ही पल में देखा…. रूहानी, एक अनजान आदमी के साथ, वरमाला पहने, सिंदूर लगाए, गले में मंगलसूत्र डाले।

    कुछ क्षणों तक बस एक सन्नाटा था। फिर वो सन्नाटा जैसे किसी ने चीख से तोड़ दिया हो। जानकी की आँखों में विश्वास टूटने की दहशत थी, भानु प्रताप की मुट्ठियाँ सख्त हो गई थीं, और मेहमानों की फुसफुसाहटें एक भरी सभा में ज्वालामुखी जैसी गूंज रही थीं।

    रूहानी और अद्वैत अब गेट के भीतर कदम रख चुके थे। दोनों का चेहरा बाहर से शांत और भावहीन दिख रहा था, लेकिन भीतर एक तूफान उमड़ रहा था। रूहानी की हथेलियाँ ठंडी थीं, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं, हर पल उसे लग रहा था जैसे उसका दिल सीने से बाहर आ जाएगा। 

    उसने हिम्मत करके अपने पापा की आँखों में देखना चाहा, पर उसका कलेजा कांप उठा। बस इसी क्षण से वो हमेशा से डरती आई थी और अभी यह पल किसी डरावने सपने की तरह उसके सामने था। उसने हमेशा से अपने पिता की स्वीकृति, उनका स्नेह और उनका गर्व चाहा था, लेकिन आज वो भीतर ही भीतर जानती थी कि शायद ये कभी नहीं मिलेगा, खासकर इस फैसले के बाद। 

    अद्वैत, रूहानी के ठीक बगल में खड़ा था, शांत, संयमित लेकिन बेहद सतर्क। उसकी आँखें चारों ओर के माहौल को स्कैन कर रही थीं, लोगों के चेहरों पर आते-जाते भावों को पढ़ रही थीं। वो जानता था कि ये उसके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है, शायद रूहानी के लिए उससे भी ज़्यादा।

    ये सिर्फ दो लोगों के स्वतंत्र विवाह की बात नहीं थी, ये दो अलग-अलग दुनियाओं, दो परिवारों के मूल्यों, परंपराओं, उम्मीदों और सपनों का एक ज़ोरदार टकराव था।

    उसने रूहानी की तरफ देखा, उसकी आँखों में डर और दर्द की एक झलक थी, लेकिन साथ ही होंठों के कसे होने और कंधों की दृढ़ता में एक अटूट संकल्प भी था।

    वो जानता था कि उसे इस समय उसके साथ खड़ा रहना है, न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि उसकी हिम्मत बनकर, एक चट्टान की तरह।

    “ये क्या है?” भानु प्रताप की भारी और रौबदार आवाज़ ने सबकी बातचीत पर ब्रेक लगाया। उनकी आवाज़ में सिर्फ सवाल नहीं था, उसमें एक अधिकार था, एक चेतावनी थी। उनकी नज़रें सीधी अद्वैत पर टिकी थीं।

    “कौन है ये?” भानु प्रताप की ऊँगली अद्वैत की ओर उठी। उनकी आवाज़ में गुस्सा और अविश्वास साफ झलक रहा था। जैसे कोई अजनबी, कोई अनचाहा व्यक्ति उनकी दुनिया में घुस आया हो।

    यश, रूहानी का छोटा भाई, जो अब तक किनारे खड़ा इस अप्रत्याशित दृश्य को हतप्रभ देख रहा था, धीरे से आगे आया। उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन शब्दों में सच्चाई थी। बोला, “पापा, ये अद्वैत अवस्थी हैं… दीदी के पति।” 

    यश हमेशा से रूहानी का समर्थक रहा था, उसकी बातों को सुनता था, लेकिन आज वो भी अपने पिता के गुस्से से डरा हुआ था। वो जानता था कि उनके पिता का गुस्सा कितना भयानक और अनियंत्रित हो जाता है।

    “पति…?” जानकी की आवाज़ मानो थम गई थी, जैसे शब्दों ने गले में ही दम तोड़ दिया हो। उनकी आँखों में सिर्फ सवाल नहीं थे…. वहाँ एक टूटा हुआ भरोसा था, एक परंपरा की अनसुनी पुकार, और एक ऐसी टीस जो सदियों से हर माँ की आँखों में पलती रही है।

    उन्होंने रूहानी के लिए हमेशा वही देखा था जो हर रूढ़िवादी परिवार देखता है…. एक ऐसा जीवनसाथी जिसे उसके माँ – बाप चुनें, जो जात-पात, कुल-परंपरा, और खानदान की इज़्ज़त को सबसे ऊपर रखे। 

    रूहानी से कभी पूछा नहीं जाना था कि वो क्या चाहती है, क्योंकि उस घर में बेटियों से सवाल नहीं पूछे जाते….. उन्हें बस मौन स्वीकृति देना सिखाया जाता है।

    उनके लिए ‘शादी’ कोई प्रेम कथा नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुबंध थी…. जहाँ भावनाओं से ज़्यादा महत्व घर की मर्यादा का था। जानकी को यकीन था कि रूहानी भी वही करेगी जो उसकी माँ, उसकी नानी, और उन तमाम औरतों ने किया…. चुपचाप सर झुका कर उनकी पसंद को अपना भाग्य मान लेगी।

    और ये अद्वैत… कौन था ये? कहाँ से आया था? वो उनके बुने हुए सपनों से बिल्कुल अलग था, एक अनदेखी राह का पथिक था।

    कमल, वो लड़का जिसे रूहानी के पति के रूप में उसके माँ – बाप के द्वारा चुना गया था, पीछे खड़ा था। उसके चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक और कुटिल मुस्कान थी। वो रूहानी को हमेशा से अपनी संपत्ति समझता था, एक ऐसी लड़की जो उसके रुतबे, उसकी सामाजिक स्थिति को और बढ़ाती। 

    आज, उसे लग रहा था जैसे वो संपत्ति, वो मान-सम्मान सब कुछ उससे छीन लिया गया हो, किसी ने उसे भरी महफ़िल में नीचा दिखा दिया हो। उसके अंदर अपमान और गुस्से का लावा उबल रहा था।

    “हमने शादी कर ली है,” रूहानी ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी थरथराहट थी, “क़ानूनी तौर पर…” उसकी आवाज़ में थोड़ी सी हिम्मत थी, जो उसने अपने अंदर बची आखिरी ताक़त से बटोरी थी, लेकिन वो जानती थी कि ये काफ़ी नहीं है। उसके शब्द हवा में तैरते हुए से लगे और फिर सन्नाटे में खो गए।

    “क़ानूनी?” भानु प्रताप की हँसी बेहद कड़वी और तीखी थी, जैसे किसी घाव पर नमक छिड़क दिया गया हो। 

    “बिना बताये? बिना हमारी सहमति के? और आज अचानक तुम यहाँ ये तमाशा दिखाने आ गई?” उनकी आँखों से जैसे आग बरस रही थी, माथे पर नसें तन गई थीं। उन्हें लगा था जैसे उनकी बेटी ने उनके अधिकार को, उनके निर्णय को, उनके अस्तित्व को ही चुनौती दे दी हो।

    कमल ने इस मौके का फायदा उठाते हुए ताना मारा, “तमाशा नहीं तो और क्या है? सबके सामने नाक कटवा दी। अपने खानदान की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी।” उसकी आवाज़ में ज़हर घुला हुआ था, जैसे वो इस अपमान का बदला शब्दों से ले रहा हो।

    कमल के पिता ने भी अपनी आवाज़ मिलाई, उनके चेहरे पर भी घोर निराशा और गुस्सा था। “हमने तो समझा था, हमें एक संस्कारी बहू मिलेगी, जो घर की लक्ष्मण रेखा समझे। पर ये क्या निकला? अपने फ़ैसले खुद लेने वाली… हमारे घर की लड़कियों में ऐसा कभी नहीं हुआ।” उनके शब्द केवल रूहानी पर नहीं, बल्कि जानकी और भानु प्रताप पर भी एक कटाक्ष थे, जैसे उनकी परवरिश पर सवाल उठा रहे हों।

    रूहानी के कानों में ये बातें तीर की तरह चुभ रही थीं। उसे लग रहा था जैसे हर कोई उसे अपराधी ठहरा रहा हो। वो हमेशा से अपने परिवार का सम्मान करती थी, उनकी बातों को मानती थी, लेकिन आज उसे लग रहा था जैसे उसने सबसे बड़ा गुनाह कर दिया हो, ऐसा गुनाह जिसकी कोई माफ़ी नहीं थी। 

    उसकी आँखों में आँसुओं का सागर उमड़ रहा था, पर उसने उन्हें किसी तरह रोक रखा था। वो जानती थी, अगर आज रोई, अगर आज कमज़ोर पड़ी, तो ये लोग उसे हमेशा के लिए कमज़ोर मान लेंगे और उसे पूरी ज़िंदगी सिर्फ अपनी सफाई ही देनी पड़ेगी।

    अद्वैत ने जैसे ही कमल और उसके पिता की बातें सुनी तो उसका खून खौल उठा। वो अब और चुप नहीं रह सका। उसने उनलोगों की तरफ मुड़कर पहली बार कुछ कहा। उसकी आवाज़ में ठहराव था, शांति थी, लेकिन एक ऐसी दृढ़ता थी जिसने माहौल की सारी फुसफुसाहटों को दबा दिया। 

    “ये तमाशा नहीं है,” अद्वैत ने कहा, “ये ज़िम्मेदारी है। रूहानी ने कोई गुनाह नहीं किया है। उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फ़ैसला लिया है, अपनी ख़ुशी का फ़ैसला और मैं उसके साथ हूँ। हम दोनों ने अपनी मर्ज़ी से, एक-दूसरे से शादी की है और हम अपने फ़ैसले के लिए किसी से माफ़ी नहीं मांगेंगे।”

    उसने फिर भानु प्रताप की तरफ देखा, उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, सिर्फ़ एक सीधी, अडिग चुनौती थी। “और जहाँ तक बात इज़्ज़त की है, इज़्ज़त किसी इंसान के पहनावे से नहीं, किसी के गोत्र या खानदान से नहीं, इज़्ज़त किसी इंसान के फ़ैसले से नहीं घटती, उसकी इज़्ज़त उसके कर्मों से होती है। 

    रूहानी ने आज जो हिम्मत दिखाई है, जो साहस दिखाया है, वो काबिले-तारीफ़ है। आप लोगों को उस पर शर्मिंदा नहीं, उस पर गर्व होना चाहिए।” अद्वैत के शब्द तीखे और सच्चे थे, उन्होंने माहौल में एक नई लहर पैदा कर दी।

    रूहानी ने अद्वैत की तरफ देखा, उसकी आँखों में अविश्वास झलक रहा था। क्या उसने सच में ये कहा? वो, जो अब तक बस एक औपचारिक रिश्ते का हिस्सा था, आज कुछ ऐसा कह गया था जो रूहानी ने कभी उम्मीद नहीं की थी….. इस कॉन्ट्रैक्ट मर्रिज के भीतर भी कोई उसके दर्द को समझ सकता है। ये बात उसके लिए अजीब भी थी और अप्रत्याशित भी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अद्वैत सचमुच उसकी फिक्र करता है, या ये भी किसी शर्त का हिस्सा है।

    भानु प्रताप ने पलटकर अपने दोस्तों की तरफ देखा, जो अब भी फुसफुसा रहे थे, सर हिला रहे थे, जैसे कोई घटिया नाटक देख लिया हो। उनके चेहरे पर तिरस्कार, हैरानी और मज़ाक का मिश्रण था।

    “इतनी भी बेहयाई कोई कैसे कर सकता है, अब तो रीत-रिवाज़ भी इनसे डरने लगे होंगे,” कमल की माँ ने खून खौलाते लहजे में कहा, जैसे उसके संस्कारों पर किसी ने सीधा वार किया हो।

    रूहानी की माँ जानकी चौहान के लिए ये सब बर्दाश्त कर पाना, ये दृश्य देखना आसान नहीं था। सालों से जिस बेटी को अपनी आंखों के सामने पाला था, जिसे हर रिश्ते के लिए, हर मर्यादा के लिए तराशा था, जिसे कुल की प्रतिष्ठा का प्रतीक माना था, वो आज एक अजनबी के साथ वरमाला और सिंदूर में लिपटी खड़ी थी…. बिना बताये, बिना पूछे, बिना समझाए। 

    समाज की बातें, मेहमानों की फुसफुसाहटें जो अब ज़ोर पकड़ने लगी थीं, और पति भानु प्रताप की तनी हुई भौंहें और अपमानित चेहरा…. इन सबके बीच जानकी का दिल तड़प उठा। उसकी आँखों के सामने उसके सारे सपने बिखरते नज़र आ रहे थे।

    वो धीरे-धीरे रूहानी के पास आई, उसका चेहरा देखा… उस चेहरे पर न कोई ग्लानि थी, न कोई शर्म, बस एक गहरा सन्नाटा था, एक थका हुआ भाव था जैसे वो बहुत लंबी लड़ाई लड़कर आई हो और वही सन्नाटा उसकी माँ की सहनशक्ति तोड़ गया। जिस बेटी से उसे उम्मीद थी कि वो आँखों में आँसू लेकर माफ़ी मांगेगी, वो बेटी शांत खड़ी थी, जैसे उसने कोई गलती की ही न हो।

    “शर्म नहीं आई तुझे?” जानकी ने धीमे, पर कड़वे शब्दों में कहा। उसकी आवाज़ में माँ का प्यार नहीं, अपमानित स्त्री का गुस्सा था। “हमारे जीते जी तूने सब खत्म कर दिया। हमारी इज़्ज़त, हमारा नाम… सब मिट्टी में मिला दिया।”

    रूहानी एक पल को स्तब्ध खड़ी रही। उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन चेहरा कठोर था। वह कुछ कहना चाहती थी। होंठों तक आते हुए शब्द काँप रहे थे।

    “माँ… मैं बस—”

    जानकी ने बात पूरी होने से पहले ही रूहानी के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। उस एक थप्पड़ की गूंज पूरे आँगन में फैल गई, हवा में गूंजती रही, जैसे समय ठहर गया हो। हर कोई सन्न रह गया।

    —————

    क्या वाकई ये थप्पड़ सिर्फ एक गाल पर पड़ा था… या फिर एक पीढ़ी के सपनों, भरोसे और इज्ज़त पर भी?

    अब क्या रूहानी फिर खड़ी हो पाएगी… या ये थप्पड़ उसकी हिम्मत की आखिरी दरार बन जाएगा?

    अद्वैत… क्या वो अब भी उसका हाथ वैसे ही थामे रखेगा, या इस तमाचे की गूंज उसके वादों को भी डगमगा देगी?

     

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    Soul_writer

    लिखकर रूह छूने की कोशिश….. 🥹🥹