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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • अधूरी इबादत भाग~23

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~23 अधूरे फासले 

     

    अद्वैत हर सुबह की तरह ठीक समय पर उठा। बाथरूम से बाहर निकलकर उसने घड़ी की ओर देखा… 6:45। रोज़ की तरह सिलसिलेवार ढंग से उसने अपनी शर्ट प्रेस की, बालों में हल्का सा जेल लगाया, फिर अपने स्टडी टेबल पर फाइल्स को अच्छे से समेटकर बैग में रख लिया। वो एक ऐसा आदमी था जिसे अपने जीवन में हर चीज़ को अनुशासन में रखना पसंद था….. हर भाव, हर फैसला, हर दिनचर्या।

    लेकिन आज उसकी सुबह में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रहा था। शायद इसलिए क्योंकि घर में अब वो अकेला नहीं था… फिर भी संवाद की कोई उम्मीद नहीं थी।

    बाहर निकलने से पहले स्टडी रूम के ताले की चाबी घुमाकर लॉक किया और फिर अपने कमरे का।

    वह सीढ़ियों से उतर कर मुख्य दरवाजे की तरफ जा ही रहा था तभी उसकी नज़र रूहानी के कमरे की ओर गई। दरवाज़ा हल्का सटा हुआ था। न कोई हलचल, न कोई आहट।

    कुछ पल के लिए वह वहीं ठिठक गया। उसका हाथ उठे लेकिन दरवाजे तक पहुंच नहीं पाए।

    वह चाहता था कि वो दरवाज़ा खटखटाए। 

    शायद पूछे, “ठीक हो?”

    शायद कहे, “मैं जा रहा हूँ, ज़रूरत हो तो कॉल कर लेना।”

    लेकिन फिर तो कुछ उसे रोक लेता है….. एक दीवार जो दोनों के बीच अब तक खड़ी है।

    ये रिश्ता, जो सिर्फ कागज़ी है, कहीं वो ये न समझ बैठे कि वह उसके जीवन में कुछ अधिक दखल देने लगा है।

    या फिर ये डर भी था कि अगर उसने दरवाज़ा खटखटाया, और जवाब में खामोशी मिली, तो दिनभर वो खामोशी उसकी सांसों से चिपकी रहेगी।

    उसने खुद को रोका, गहरी सांस ली और दरवाज़े की ओर से मुड़कर सीधे बाहर की ओर बढ़ गया। जूतों की धीमी आवाज़ फर्श पर गूंजती रही और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, घर फिर से उसी सन्नाटे में डूब गया…. जहाँ अब दो लोग थे, लेकिन दो अलग-अलग दुनिया में।

    अद्वैत के मन में एक हल्की-सी खटास रह गई…. शायद उस अनकहे संवाद की जो कभी हो नहीं पाया। पर उसने उसे भी अपनी दिनचर्या की तरह तह करके जेब में रख लिया, और चल पड़ा एक और व्यस्त दिन की ओर।

    अद्वैत के जाने के बाद मीना जब अपने नियत समय पर रोज़ की तरह घर का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हुई, तो उसे सब कुछ सामान्य लगा…. हॉल में वही हल्की सी धूल, किचन की खिड़की से आती धूप की पतली लकीर और अद्वैत सर की अनुपस्थिति का शांत एहसास। 

    वो धीरे-धीरे झाड़ू लगाते हुए कमरे दर कमरे बढ़ती चली गई, और आखिर में वह उस कमरे के दरवाज़े तक पहुँची, जो कल तक खाली रहा करता था…. अब जहाँ रूहानी थी।

    दरवाज़ा आंशिक रूप से खुला था और मीना जैसे ही अंदर गई, उसकी नज़र सीधे बिस्तर पर लेटी रूहानी पर पड़ी। पहले तो वो ठिठक गई।

    रूहानी गहरी नींद में थी, पर उसकी करवटें बेचैनी बयां कर रही थीं। उसके माथे पर हलकी लटें चिपकी थीं, जैसे कोई सपना उसे भीतर से उलझाए हुए हो। 

    मीना की नज़र उसके गले के चारों ओर घूमे मंगलसूत्र पर गई, और फिर मांग में भरे सिंदूर पर टिक गई। उसके चेहरे पर अचानक एक धीमा-सा विस्मय था, फिर उसने खुद को संयत किया और रूहानी के पास आकर धीरे से बोली,

    “मैडम… दिन चढ़ने वाला है… क्या अब उठेंगी आप?”

    रूहानी उस आवाज़ से चौंकी, जो नींद के घने कोहरे में किसी हल्की दस्तक जैसी थी। कुछ पल तो उसे समझ ही नहीं आया कि कौन बोल रहा है। 

    आंखें पूरी तरह खुलीं तो सामने मीना को खड़ा पाया, हल्की मुस्कराहट के साथ, जैसे उसने नींद से किसी सपने को जगा दिया हो।

    “मैडम, दिन चढ़ गया है… उठ जाइए?”

    रूहानी झेंप गई, हड़बड़ा कर उठकर बैठ गई, बाल बिखरे हुए थे, चेहरा अभी तक नींद और उलझन से भरा था। कुछ देर को वो बस देखती रही मीना की ओर, फिर खुद को संभालते हुए धीमे स्वर में बोली, “तुम साफ-सफाई कर लो… और मेरे लिए एक कॉफी बना देना। मैं अभी आती हूँ।”

    मीना ने सिर हिलाया, “जी मैडम” और काम में लग गई।

    रूहानी कमरे से बाहर आई तो अब वो पहले जैसी नहीं थी। कल जो तूफान आया था उसकी लहरें अब भी उसकी आंखों में थीं, पर उनमें अब एक संकल्प की परत भी थी। 

    उसने सफेद कुर्ता पहना था, सिंपल, लेकिन उसके चेहरे की गंभीरता और आंखों की थकान उसे और गहराई देती जा रही थी। जब वो किचन में पहुँची तो मीना वहां झाड़ू लगा रही थी।

    “तुम्हारी बेटी का बर्थडे कब है?” रूहानी ने अचानक पूछा, सोफे पर बैठते हुए।

    मीना ने चौंक कर उसकी ओर देखा, उसे याद आया कि उसने ही रूहानी को बोला था अपनी बेटी के लिए डिज़ाइनर कपड़े बनाने के लिए।

    इसके साथ ही मीना फिर से आंखों में चमक लिए मुस्कुराई, “बस एक हफ्ते में, मैडम।”

    “ठीक है, आज शाम को उसे लेते आना… उसका नाप लेना है।” रूहानी का लहजा स्थिर था, लेकिन उस स्थिरता में अपनापन था।

    मीना अब कॉफी बनाने लगी, लेकिन उसके चेहरे पर अब सवालों की परछाइयाँ उतर आई थीं। वो अब तक खुद को रोक रही थी, पर अब उससे रहा नहीं गया। 

    पहले उसने कॉफी का मग रूहानी को दिया, फिर अपने लिए भी एक पुराना मग निकाल कर उसमें कॉफी डाली और फर्श पर बैठ गई। 

    इस वक्त वो मेड नहीं, एक औरत थी… जो एक दूसरी औरत की उलझनों को समझना चाहती थी।

    “मैडम…” उसने धीरे से पूछा, “आपकी शादी कब हुई? और कहीं हमारे अद्वैत सर से तो नहीं हुई?”

    रूहानी के हाथ ठिठक गए। उसने नजर झुका लिया, जैसे इस सवाल का जवाब किसी भारी अलमारी के पीछे छिपा हो। उसके गले में लटकता मंगलसूत्र हल्की थरथराहट के साथ उसकी सांसों की लय में हिल रहा था।

    “बहुत जल्दी में हो गई… बताने का समय नहीं मिला,” रूहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा।

    मीना के चेहरे पर अब संदेह नहीं, पुष्टि थी। “आपके पति अद्वैत सर ही हैं न?”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा, बस धीमे से ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। लेकिन उसने महसूस किया कि उसके भीतर जैसे कोई सिहरन दौड़ गई थी। 

    ‘पति’ शब्द उसके लिए अब भी अजनबी-सा था। वो अब भी इस रिश्ते को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाई थी…. कागज़ पर नाम जुड़ने से आत्मा का बंधन नहीं बनता, ये बात उसके अंदर गूंज रही थी।

    मीना की आंखों में हल्की चमक उभरी, जैसे कोई पहेली सुलझ गई हो।

    वह एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैडम… माफ कीजिएगा, पर एक बात कहूँ?”

    रूहानी जो अब तक खिड़की की तरफ देखती हुई खोई हुई थी, चौंककर उसकी ओर मुड़ी, “हां, बोलो मीना।”

    मीना ने आंखें नीचे किए हुए धीरे से कहा, “अद्वैत सर को ज़रूर आपसे पहली नज़र में प्यार हो गया होगा… वरना वो तो आज तक किसी औरत को आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। उनकी पहली पत्नी के जाने के बाद तो जैसे उनका दिल पत्थर हो गया था।”

    मीना की आवाज़ में एक भोली सच्चाई थी, जो सीधे रूहानी के भीतर कहीं गहराई तक उतर गई। उसकी आँखें पलभर को भी झपकी नहीं और न ही वह उसकी बातों पर मुस्कुरा नहीं सकी। 

    वो केवल कॉफी के कप में अपनी उंगलियों को लपेटे बैठी रही। उसकी आंखें थोड़ी दूर, किसी अदृश्य दीवार को घूर रही थीं।

    तभी मीना पूछ बैठी, “लेकिन आप नीचे के कमरे में क्यों सो रही थीं, सर का कमरा तो ऊपर है।”

    रूहानी की उंगलियाँ अचानक कॉफी के मग पर जकड़ गई और उसकी आंखें मीना की तरफ उठी…. चुप, लेकिन कुछ छिपाती हुईं।

    एक पल को कमरे की हवा जैसे ठहर सी गई……..

    ——-

    अब रूहानी मीना को क्या जवाब देगी?

    क्या अद्वैत के दिल में कोई अनकहा दर्द छुपा है, जो रूहानी को नहीं दिखता?

    उस दरवाज़े के पीछे छिपा क्या कोई राज़ है, जिसे खोलने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा?

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    Soul_writer

    लिखकर रूह छूने की कोशिश….. 🥹🥹

  • अधूरी इबादत भाग~22

    अधूरी इबादत भाग~22

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~22 रिश्तों की खामोश लौ

     

    अद्वैत अब भी रूहानी का हाथ थामे हुए था, उसकी पकड़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी… जैसे वो दुनिया से कह देना चाहता हो कि अब ये साथ अधूरा नहीं रहेगा, चाहे रिश्ता कागज़ों पर लिखा हो या बस हालातों से बंधा हो। वो दोनों जैसे ही कार के पास पहुँचे, पीछे से यश की आवाज़ आई—हांफती, लेकिन साफ़ और भावनाओं से भरी हुई।

    “दीदी!” यश ने पुकारा। उसके हाथ में एक बड़ा सा नीला बैग था।

    रूहानी और अद्वैत दोनों एक साथ मुड़े। रूहानी ने देखा…. यश धीरे-धीरे उनकी ओर आ रहा था, उसकी आंखों में चमक थी, लेकिन चेहरे पर अजीब-सी गंभीरता भी थी, जो उसके उम्र से बड़ी लग रही थी। 

    यश ने नीले बैग को रूहानी की ओर बढ़ाया। “ये लो दीदी,” उसने नरम आवाज़ में कहा, “आपके ड्रेस डिज़ाइनिंग का सारा सामान है इसमें।”

    रूहानी ने हैरानी से बैग को देखा। उसकी आंखें यश के चेहरे को पढ़ने लगीं, लेकिन कुछ कह नहीं पाईं। उसकी उंगलियाँ हौले से उस पुराने बैग के किनारे पर चली गईं, जैसे वो उसकी आत्मा की कोई भूली-बिसरी परत हो।

    यश ने रुककर साँस ली, फिर कहा, “जब पिछली बार आप घर से चली गई थीं, उस दिन… जब माँ-पापा आप पर गुस्सा हुए थे, तो आपके जाने के बाद उन्होंने आपके सारे कपड़े और आपसे जुड़े सारा सामान सबकुछ एक बैग में भरकर बाहर फेंक दिया था।”

    “मैं… आपके कपड़े और बाकी सामान तो नहीं बचा पाया,” यश की आवाज़ टूटने लगी, “लेकिन जब पापा आपकी चीजें फेंक रहे थे, तो मैंने आपकी स्केचबुक, कुछ फैब्रिक सैंपल्स, आपकी डिज़ाइन की हुई कुछ ड्रेसेस के नमूने… सब कुछ चुपचाप इस बैग में भर लिया था। तबसे ये मेरे पास ही था। आज लगा, आपको देना चाहिए। ये आपका सपना है ना दीदी, इससे जुड़ी हर चीज़…”

    वो चुप हो गया।

    रूहानी का कंठ भर आया। उसने हौले से बैग को अपने हाथों में लिया, जैसे कोई माँ अपनी खोई हुई संतान को गले लगाती है। उसकी उंगलियाँ बैग की ज़िप पर फिसलीं, जैसे उसे यकीन नहीं हो रहा हो कि जो वो पकड़े हुए है, वो उसका है… उसका सपना, उसका जुनून, उसका अस्तित्व।

    अद्वैत ने एक पल के लिए रूहानी की ओर देखा…. उसकी आंखें अब भीगी हुई थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी चमक थी। जैसे उस बैग ने उसे फिर से याद दिलाया हो कि वो सिर्फ एक “किसी की पत्नी” नहीं, बल्कि अपने आप में भी कुछ है। उसका एक नाम है, एक पहचान है, जो इस रिश्ते से पहले की भी थी।

    रूहानी ने वह बैग जमीन पर रख दिया और बिना कुछ कहे यश को गले लगा लिया। ये सिर्फ़ एक भाई-बहन का आलिंगन नहीं था, ये उन सपनों की रक्षा का शुक्रिया था, जिनकी कीमत किसी ने नहीं समझी… सिवाय यश के।

    अद्वैत एक कोने में खड़ा ये सब देख रहा था। उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी, लेकिन उसके सीने में कुछ दरक रहा था। वो जानता था, रूहानी की ये मुस्कान, उसका ये कांपता गला… ये सब यूँ ही नहीं था। किसी ने उसके सबसे गहरे हिस्से को छुआ था…. उस हिस्से को जिसे समाज ने कुचलने की कोशिश की थी।

    रूहानी ने एक लंबी, भारी साँस ली, जैसे उसकी आत्मा खुद को भीतर से संवार रही हो। फिर उसने यश के दोनों गालों को अपने हाथों में भर लिया। उसकी आँखें अब भी भीगी थीं, लेकिन उनमें एक स्पष्टता थी, एक दृढ़ता जिसे कोई माँ भी पहचान जाती।

    “यश,” उसकी आवाज़ धीरे लेकिन बेहद साफ़ थी, “अपनी दीदी की बात मानोगे न?”

    यश ने बिना झिझक के जवाब दिया, “हाँ… ज़रूर।”

    रूहानी मुस्कुराई नहीं, पर उसकी आँखों में एक संतोष झलक पड़ा। फिर वो झुक कर धीरे से बोली, “तुमसे माँ-पापा बहुत प्यार करते हैं। उन्होंने तुझे पाने के लिए कितनी मिन्नतें की थीं… तेरा जन्म उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। तू उनके दुलारे बेटे है। इसलिए अब… मुझसे कोई संपर्क मत करना। नहीं तो… वो तेरा फ़ोन भी छीन लेंगे, और मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुझे डाँट पड़े।”

    यश की आँखों में आँसू और भी तेजी से उतर आए। उसकी ठुड्डी काँप रही थी। 

    रूहानी ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है, बहुत आगे जाना है। अगले साल तुम्हारे दसवीं के एग्ज़ाम हैं न? अच्छे से पढ़ाई करना। जब तुम मेडल जीतोगे न, तो मैं खुद तुमसे मिलने आऊंगी। लेकिन अभी के लिए… किसी और चीज़ में ध्यान मत भटकाना और जो तुम्हारा शौक है, उसे जरूर आगे बढ़ाना।” 

    “द…दीदी…” यश के गालों पर आँसू ढुलक पड़े, उसने रूहानी की कलाई थाम ली, “ऐसा मत बोलो… मुझे अपने से दूर मत करो… मैं बहुत अकेला हो जाऊंगा…”

    रूहानी ने खुद को संयमित किया। उसके कंधे भारी हो चुके थे लेकिन आंखें अब भी बहने से इनकार कर रही थीं।

    रूहानी ने उसे धीरे से थपथपाया, “मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, यश। इसलिए तुम्हें ये सब कहना पड़ रहा है।”

    उसी वक्त, अद्वैत ने कार का ड्राइविंग सीट वाला दरवाजा खोला और उसमें बैठ गया। उसकी मौजूदगी दोनों के लिए एक मजबूत सहारा बन गई थी। 

    रूहानी ने अद्वैत को बैठते हुए देखा, फिर यश की ओर देखते हुए बोली, “जा, भाई। माँ-पापा गुस्सा हो जाएंगे।”

    यश ने वो नीला बैग उठाया और कार के बैक सीट पर रख दिया। उसने एक बार फिर रूहानी को देखा, फिर बोला, “अलविदा, दीदी। जल्दी मिलेंगे।”

    रूहानी ने बस सिर हिलाकर जवाब दिया और उसने अपने छोटे भाई को एक बार फिर गले लगा लिया, अपने दिल में ये दुआ करते हुए कि ये अलविदा एक दिन फिर से मिलने का रास्ता बनाए।

    जब यश दूर जाने लगा, तो रूहानी और अद्वैत कार में बैठे। अद्वैत ने इंजन स्टार्ट किया और कार धीरे-धीरे गाड़ी को मोड़ती हुई निकल पड़ी उस सफर पर जहां कोई मंजिल नहीं थी…. या शायद मंज़िल अब उसी यात्रा में ही छुपी थी। 

    सफर के दौरान कार के भीतर एक बोझिल-सी खामोशी पसरी हुई थी। जैसे कोई पुराना गीत धीरे-धीरे बंद हो गया हो, लेकिन उसकी गूंज अभी भी दिल के किसी कोने में बाकी हो। दोनों की सांसें चल रही थीं, मगर जैसे शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं बची थी।

    अद्वैत कार ड्राइव कर रहा था, उसकी निगाहें सड़क पर थीं, लेकिन उसका मन अंदर ही अंदर भटक रहा था….. उलझनों, सवालों और किसी अनकहे बोझ से भरा हुआ।

    रूहानी अपनी सीट पर खिड़की से सिर टिकाए बैठी थी, उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन नींद उनसे कोसों दूर थी। वो कुछ देखना नहीं चाहती थी, शायद इस दुनिया से कुछ देर के लिए खुद को काट देना चाहती थी। हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी, पर कोई ठंडक नहीं पहुंचा पा रही थी…. उसके भीतर की तपन अब और किसी छांव से बुझ नहीं सकती थी।

    अद्वैत ने एक बार नजरें उठाकर उसकी ओर देखा। वो कुछ कहना चाहता था शायद, कुछ ऐसा जो उसके मन में काफी देर से अटका था, पर फिर खुद को रोक लिया। इस वक़्त, कोई भी शब्द जैसे ज़ख्मों को कुरेदने जैसा होता। दोनों ही उस खामोशी को तोड़ना नहीं चाहते थे जो इस वक्त उनके बीच एक नाज़ुक पुल बन गई थी।

    जब कार अद्वैत के अपार्टमेंट के नीचे आकर रुकी, तब तक शाम ढल चुकी थी। सड़क किनारे पीली रोशनी में पत्तों की परछाइयाँ झूल रही थीं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर, ये इलाका थोड़ा शांत था….. शायद उतना ही जितना इस वक़्त रूहानी के मन को चाहिए था।

    अद्वैत पहले बाहर निकला, फिर पीछे की सीट से चुपचाप रूहानी का बैग उठाया। वह कुछ नहीं बोला, सिर्फ उसके निकलने का इंतज़ार करता रहा। रूहानी धीरे-धीरे दरवाज़ा खोलकर उतरी, मानो किसी अनजाने देश की ज़मीन पर कदम रख रही हो….. एक नई शुरुआत, एक अनजाना ठिकाना, एक अनकहा रिश्ता।

    अद्वैत अपार्टमेंट की ओर बढ़ा, और बिना किसी औपचारिकता के दरवाज़ा खोलकर सीधा बैग किचन से सटे एक कमरे में रख दिया। सारा सामान रखने के बाद वह हाल में लौट आया, जहाँ रूहानी अब भी दरवाज़े के पास खड़ी थी, थोड़ी हिचकिचाहट, थोड़ी थकावट और थोड़ी सी उलझन के साथ।

    “फ्रेश हो जाओ,” अद्वैत ने कहा, उसकी आवाज़ में न कोई अधिकार था, न कोई औपचारिकता….. बस एक सादा-सा ख्याल, “और खाने के बाद ही सोना, ठीक है?”

    रूहानी थोड़ी चौंकी। उसने नजर उठाकर उसकी तरफ देखा।

    अब जबकि वो दोनों अकेले थे,जब कोई तमाशबीन नज़र नहीं थी, जब कोई समाज का डर भी सिर पर नहीं था, तब भी अद्वैत उसकी फिक्र क्यों कर रहा था?

    सिर्फ एक कानूनी करार का साथी होने के बावजूद, वह इतनी संजीदगी से पेश क्यों आ रहा था?

    उसके चेहरे की उलझन अद्वैत की नजर से छुप नहीं सकी। वह समझ गया कि रूहानी के मन में क्या चल रहा है। इसलिए बिना कोई सवाल उठने दिए, उसने खुद ही कहा, “मीना ने खाना बनाकर रख दिया था। और वैसे भी, दोपहर से अभी तक हमने कुछ खाया नहीं है। मैं भी फ्रेश होकर आता हूँ।”

    इतना कहकर वह सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे की ओर चला गया, जैसे उसे रूहानी को किसी उत्तर का बोझ नहीं देना था, बस उसकी थकान समझनी थी।

    रूहानी धीरे से कमरे की ओर बढ़ी, जो अद्वैत ने उसके लिए तय किया था। कमरे में रखी चीज़ें बिलकुल करीने से थीं, एक छोटी-सी अलमारी, एक साफ़-सुथरा बिस्तर, और एक कोने में रखा छोटा-सा नाइट लैम्प।

    उसने बैग की चेन खोली और हल्के हाथों से अपना सामान देखने लगी… वही कतरनें, वही डिजाइनिंग के स्केच, कुछ अधूरी नोटबुक्स और यादों से भरी हुई सिलवटें।

    कमरे की खिड़की से बाहर झांकते हुए वो बस बैठ गई—चुपचाप। उसकी पलकों पर आज कोई सपना नहीं था, बस एक एहसास था, कि शायद उसे पहली बार किसी ने बिना कुछ कहे, पूरी तरह समझ लिया था।

    उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। न वो किसी प्रेम में थी, न कोई लगाव जागा था अभी तक। ये रिश्ता तो अब भी बस कागज़ पर दर्ज था, एक समझौता, एक अनुबंध। मगर इस समझौते में अद्वैत ने जो शालीनता, जो आदर और जो स्नेह बिना बोले दे दिया था, वह रूहानी के भीतर एक हल्की सी लौ जला गया था।

    एक ऐसी लौ, जो शायद आने वाले समय में उम्मीद बन सकती थी… या फिर सिर्फ एक याद। मगर इस वक़्त, वह लौ ही उसके लिए काफी थी।

    ——-

    क्या अद्वैत वाकई सिर्फ एक समझौते का हिस्सा है… या उसके खामोशी में कोई अनकहा इकरार छुपा है?

    क्या रूहानी उस लौ को पहचान पाएगी, जो उसके भीतर धीमे-धीमे जलने लगी है?

    और जब अतीत की परछाइयाँ फिर लौटेंगी, तब क्या ये नाज़ुक सा सुकून टिक पाएगा… या बिखर जाएगा एक और बार?

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    Soul_writer

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  • आत्मग्लानि (भाग 2)

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

                        आत्मग्लानि …

    अब तक हमने पढ़ा :— 

    शाम को घर पर पापा, चाचा ताऊ जी अपने काम से वापस आये तो उन्हें बताया कि ना जाने आज रीया को क्या हुआ है । वो स्कूल से आते ही अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर दिया, ना कुछ खाया है ना शाम की चाय पी है, न जाने आज क्या हुआ है उसे । सभी लोग ये सुनकर चिंतित हो गए और पापा उठकर उसके कमरे के बाहर खड़े होकर उसका नाम पुकारा, थोड़ी देर बाद रीया ने दरवाजा खोला तो पापा ने स्नेह से उसके सर पर हाथ फेरते हुए पूछा ” क्या हुआ है मेरी बेटी को” स्कूल में किसी से कोई कहा सुनी हो गई है क्या जिसका गुस्सा खाने पर निकाला जा रहा है!! रीया ने चुपचाप गर्दन नीचे झुका लिया और बोली ऐसा कुछ नहीं है पापा, वो! सब्जेक्ट समझ नहीं आया तो सर ने डांट दिया था, बस! और कोई बात नहीं है, मैं बहुत कोशिश करती हूं कि सब अच्छे से हो जाए पर कहीं ना कहीं आकर मैं अटक जाती हूं, ये बोलते वक्त उसके दिल दिमाग में संजय व्यास जी  थे , उसकी बातें सुनकर सबके दिलों में सुकून उतर आया कि कोई बड़ी बात नहीं है.! उन्हें ख़बर नहीं थी कि उसके पैर किस दिशा में बढ़ गये हैं ।।

    दूसरे दिन भी उसका वही हाल रहा क्लास में , जब भी संजय जी क्लास में पढ़ाने आते वो उन्हें एकटक देखने में समय लगाती, क्या पढ़ा रहे हैं, क्या बोल रहे हैं कुछ दिखाई सुनाई देना बंद कर दिया, वो बस चुपचाप उन्हें देखा करती और आहें भरकर अपने मन को समझाती कि ” रीया! संजय जी सिर्फ तुम्हारे हैं, वो तुमसे प्यार करते हैं बस जताते नहीं हैं” और शर्माते हुए अपनी हथेलियों में अपना मुंह छुपा लेती..!!

    संजय जी ने उसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और ना ही उससे कोई कभी दुबारा इस विषय पर बहस की, क्योंकि वह उनके लिए एक बच्ची मात्र थी, जिसे उन्हें पढ़ाना था।। बस! इससे ज्यादा वो कुछ नहीं उसके बारे में सोचते थे । ऐसे ही अनदेखी में सर जी के दिन गुजर रहे थे और उनकी नजरंदाजी रीया को बहुत खल रही थी जिससे वो अंदर ही अंदर खल रही थी और इस वजह से उसका ध्यान अपनी पढ़ाई और खुद पर से हटता जा रहा था जिसके परिणामस्वरूप उसकी तबीयत धीरे धीरे बिगड़ती गई और परिवार वालों को उसकी चिंता होने लगी…..

    क्या हुआ है रीया को? और क्या संजय जी इस परेशानी से बाहर आ जाएंगे या और फंसते चले जाएंगे, जानते हैं कल के भाग में , लाईक कमेंट करें और मेरी कहानी को शेयर भी करें 🙏 ☺️ ☺️ 

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    shalini rawat

    NSW उभरते लेखक – 🥈 लेखक नहीं हूं। फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं।

  • अधूरी इबादत भाग~21

    अधूरी इबादत भाग~21

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~21 आख़िर बोल पड़ी रूहानी 

     

    जानकी के थप्पड़ मारते ही रूहानी की देह जैसे संतुलन खो बैठी। गाल की जलन, कानों की गूंज और माँ के हाथों की बेरुखी….. उसे सब कुछ एक साथ महसूस हो रहा था। 

    रूहानी का चेहरा झटक कर एक तरफ मुड़ गया और उसकी आँखों में कुछ बुझ-सा गया। उसका शरीर जैसे लड़खड़ा गया, अंदर से जान निकलती महसूस हुई और वह बगल में खड़े अद्वैत की तरफ झुक गई, जैसे आत्मा ही खिंचकर उसके पास चली गई हो।

    वो उस पर केवल गिरी नहीं थी बल्कि वो उसमें समा गई। उसका माथा अद्वैत की कंधे से आकर लगा और हाथ खुद-ब-खुद उसकी बाहों को थामते चले गए, जैसे अगर अब उसने उसे नहीं थामा तो वह चूर-चूर होकर ज़मीन पर बिखर जाएगी।

    अद्वैत, जो अब तक भीड़ और तमाशे के बीच सबको समझने में लगा हुआ था, उस एक पल में बदल गया…. उसकी नज़रें जल उठीं, जबड़े भिंच गए, और सीना तन गया जैसे कोई आँधी थामे खड़ा हो। उसने रूहानी को एक झटके में अपने बाहों के घेरे में ले लिया… कस कर, हिफाज़त से, जैसे सारी दुनिया को रोक रहा हो उसके गिरने से।

    रूहानी का चेहरा अब भी जानकी की हथेली की गर्मी से जल रहा था। गाल पर उभरा लाल निशान साफ दिख रहा था, जो अंदर के आहत आत्मसम्मान और दिल के दर्द से मिलकर उसके चेहरे को और भी पीला और कमज़ोर बना रहा था। 

    उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं, पर उसने रोना नहीं चुना। नहीं। वो जानती थी कि अगर आज वह टूटी, अगर आज आँसू बहाए, तो ये समाज और ये परिवार उसके आंसुओं की नमी से उसकी आत्मा को हमेशा के लिए गीला कर देंगे, उसे कमज़ोर और हारा हुआ मान लेंगे।

    अद्वैत की आंखें अब सीधी रूहानी की भीगी हुई लाल आखों से टकराईं। उन आँखों में गहरा आक्रोश था और अद्वैत की भी आँखों में एक स्त्री के अपमान को देखकर उपजा गुस्सा था, और एक दर्दनाक अविश्वास भी। 

    जैसे वो बिना कुछ कहे उससे पूछ रहा हो…. “क्या वाकई इस घर ने, इस परिवार ने तुम्हें कभी अपनाया था?” उसके चेहरे पर गुस्से और अविश्वास का ऐसा मिश्रण था जिसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल था। रूहानी की आंखें अब भी भीगी थीं, पर उनमें भी एक अजीब सी स्पष्टता थी, एक छुपा हुआ दृढ़ संकल्प था…. वो टूट नहीं रही थी, वो बस सहारा ले रही थी।

    कुछ क्षण तक दोनों बस एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे, जैसे तमाचा दोनों को पड़ा हो… एक को शरीर पर, गालों पर और दूसरे को आत्मा पर, दिल पर। उस एक पल के ठहराव में उन्होंने एक-दूसरे की पीड़ा को महसूस किया, एक-दूसरे की हिम्मत को परखा।

    रूहानी के अंदर बरसों का घुटा हुआ दर्द, समाज की बंदिशों से मिली घुटन, परिवार की उम्मीदों का बोझ…. सब कुछ अब शब्दों में फूटने को तैयार था। उसकी साँसे तेज़ हो चुकी थीं, और आवाज़ कांपते हुए भी एक सख्त लकीर लिए हुए आई…. जैसे बरसों का घुटा हुआ दर्द आखिर अब शब्दों में फूट पड़ा हो।

    पहले तो रूहानी थोड़ी देर चुप रही… फिर धीरे से बोली, “जिस अनजान ने मेरी जान बचाई… जब आप सब ने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था… उसी के घर में, बिना कुछ जाने, आपने मुझ पर इल्ज़ाम लगा दिए? मेरी बात सुने बिना ही मुझे गुनहगार बना दिया?’

    फिर वो अचानक वो अचानक अद्वैत के कंधे से थोड़ा अलग होकर पलटी और लगभग चीखते हुए, सीधे अपने माँ-बाप की तरफ देखकर बोली, “आप दोनों ने ही कहा था न… माँ, पापा, कि मैं इस अनजान आदमी के साथ, उसके घर… उसके कमरे, उसके बिस्तर पर… जाने कितनी रातें गुज़ार चुकी हूँ… समाज में बदनामी कर दी…?” 

    उसके शब्द आरोपों का जवाब नहीं, बल्कि उन्हीं आरोपों को पलटकर एक सवाल थे, जो सीधे उनके अंतरात्मा पर चोट कर रहे थे।

    “तो अब सुन लीजिए… हाँ! ये अनजान अब कोई और नहीं, मेरा पति है! हाँ, मैंने शादी कर ली है! क़ानूनी रूप से, सामाजिक रूप से और हाँ… मेरी मर्जी से! और आप फिर भी मुझे ही कसूरवार ठहरा रहे हैं? उस बदनामी के लिए जिसे आप पहले ही मेरे मत्थे मढ़ चुके थे?”

    उसके शब्द जैसे आंगन की हर ईंट पर हथौड़े की तरह गूंजे। सबकुछ थम गया। जानकी और भानु प्रताप की आँखें हैरत, शर्म और अपमान के मिलेजुले भावों से भर उठीं।

    उन्हें उम्मीद नहीं थी कि रूहानी इस तरह पलटकर जवाब देगी। मेहमानों के चेहरों पर एक नई सनसनी फैल गई थी, बातें बंद हो गईं थीं, केवल हवा में तैरती रूहानी की आवाज़ की गूंज बची थी।

    लेकिन भानु प्रताप का घमंड और क्रोध अब नियंत्रण से बाहर हो चुका था। उनकी बेटी ने, जिसे वो अपनी संपत्ति मानते थे, उनके ही सामने, भरी महफ़िल में उन्हें चुनौती दी थी। वो गुस्से में थरथराते हुए आगे बढ़े, उनके चेहरे पर खून उतर आया था।

    उनकी आँखों में अब बेटी के फैसले के लिए सिर्फ़ गुस्सा नहीं था, उसमें अपमान का, अस्वीकृति का और अपने अधिकार के छिन जाने का ज़हर भर गया था।

    “मैं अभी के अभी तेरी जान ले लूंगा!” वो गूंजती, कांपती हुई आवाज़ में चीखे और रूहानी की तरफ झपटे, उनका हाथ उठ चुका था।

    लेकिन इससे पहले कि उनका हाथ रूहानी तक पहुँचता, अद्वैत एक पल में बिजली की तेज़ी से उसके सामने आ गया। उसने रूहानी को अपने पीछे किया, उसे अपनी बाँहों के सुरक्षा घेरे में लिया। 

    वह गरजते हुए, भानु प्रताप की आँखों में आँखें डालकर बोला, “बहुत कर लिया आपने! बहुत सुन लिया आपकी बेटी ने! अब और नहीं। अगर रूहानी को एक खरोंच भी आई, तो मैं ये भूल जाऊँगा कि आप उसके पिता हैं। मैं सिर्फ़ ये याद रखूंगा कि आपने एक महिला का अपमान किया, उस पर हाथ उठाया और वो भी तब जब उसने सिर्फ़ अपने जीवन का फैसला खुद लिया।”

    रूहानी सन्न थी। उसका दिल धड़क नहीं रहा था, जैसे कुछ पल को सब थम गया हो। उसने अद्वैत की तरफ देखा…. वो शख्स जिसे उसने अब तक बस एक ‘समझौता’ माना था… अब सामने खड़ा था, जैसे दीवार बनकर। उसकी आंखों में ग़ुस्सा था, पर वो ग़ुस्सा रूहानी के लिए नहीं था…. रूहानी के लिए वो सिर्फ़ ढाल बन गया था।

    उसके भीतर कुछ टूटा भी, और कुछ जुड़ भी गया था।

    वो समझ नहीं पा रही थी कि ये वही अद्वैत है जो अब तक चुपचाप अपनी सीमाओं में रहता था? क्या ये वही रिश्ता है, जो बस कुछ कागज़ी शर्तों पर टिका था?

    रूहानी के मन में सवाल उठ रहे थे…. “क्या ये सब सच है? क्या कोई यूं भी मेरी तरफ खड़ा हो सकता है? बिना किसी मजबूरी के?”

    इन सब के बीच आँगन की हवा जैसे एकाएक भारी हो गई थी, इतनी भारी कि साँस लेना मुश्किल लग रहा था। सबकुछ ठहर गया था। भानु प्रताप का उठा हुआ हाथ हवा में जम गया।

    मेहमानों के चेहरे अब सहम और चुप्पी में ढल चुके थे। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक शब्द भी कह सके। अद्वैत की आवाज़ में, उसकी आँखों में जो दृढ़ता थी, वो किसी ने पहले नहीं देखी थी।

    भानु प्रताप कुछ पल तक जड़ हो गए। उनका गुस्सा, उनका अधिकार, अद्वैत की आँखों के सामने बौना लग रहा था। वह एक दामाद नहीं, आज एक रक्षक की तरह खड़ा था, जिसने न सिर्फ़ अपनी पत्नी की शारीरिक इज़्ज़त को बल्कि उसकी आत्मा को भी थाम लिया था, उसे टूटने से बचा लिया था।

    “आप हमें अपनाएँ या नहीं,” अद्वैत ने अब अपने स्वर को थोड़ा शांत किया, लेकिन उसी तेज़ और दृढ़ लहजे में कहा, “ये आपका फ़ैसला है। लेकिन किसी का आत्मसम्मान इस तरह रौंदा नहीं जा सकता। रूहानी आपकी बेटी है, हाँ। लेकिन अब वो मेरी पत्नी भी है और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई उसे दुख नहीं पहुँचा सकता…. चाहे वो इस दुनिया में कोई भी हो। उसका सम्मान मेरा सम्मान है और उसकी सुरक्षा मेरी ज़िम्मेदारी।”

    उसकी बातों में केवल शब्द नहीं थे, उनमें एक अटूट वादा था, एक ऐसी सच्चाई थी जो पूरे माहौल में घुलती चली गई, पुरानी रूढ़ियों और अपेक्षाओं की दीवारों से टकराती हुई।

    अद्वैत ने पहली बार रूहानी का हाथ थामा…. वो भी सबके सामने, बिना किसी हिचकिचाहट के, जैसे कोई फैसले की मुहर लगा रहा हो। उसकी हथेली में रूहानी की उंगलियाँ थरथरा रही थीं, पर इस बार डर नहीं था, बल्कि एक मौन स्वीकार था… और एक बिन बोले गुहार कि “अब मुझे और टूटा हुआ मत देखना।”

    अद्वैत का चेहरा शांत था, लेकिन उसकी आंखों में एक सुलगती हुई आग थी…. जैसे उसने तय कर लिया हो कि अब और नहीं, अब कोई और रूहानी को रुलाने का हक़ नहीं रखता। उसने सबके सामने, उसी आँगन में जहाँ अभी कुछ मिनट पहले रूहानी का आत्मसम्मान रौंदा गया था, उस सन्नाटे को चीरते हुए ठहरी हुई आवाज़ में कहा….

    “जब आप अपनी बेटी को सच में, पूरे दिल से अपना लेंगे… तब आइएगा उसे देखने के लिए,” अद्वैत ने कहा, जैसे किसी अदालत में अंतिम शब्द सुनाए जा रहे हों। “अब नहीं। आज से ये मेरी पत्नी है और जब तक आप इसे दोषी मानते रहेंगे, तब तक आप हम दोनों से दूर रहेंगे।”

    उसकी आवाज़ में कोई ऊँचा स्वर नहीं था, लेकिन हर लफ्ज़ जैसे पत्थर पर चोट करता जा रहा था। वो झुका नहीं, समझौता नहीं किया, सिर्फ़ एक शर्त रख दी…. सम्मान की।

    1. फिर बिना एक पल गँवाए, उसने रूहानी का हाथ और कस कर थामा और दोनों उस दहलीज़ की तरफ बढ़ चले जहाँ से कुछ देर पहले रूहानी को रोक दिया गया था। पर इस बार कोई रोकने वाला नहीं था, सिर्फ़ पीछे छूटा हुआ सन्नाटा और बहुत सारी निगाहें थीं…. जिनमें कुछ हैरानी थी, कुछ ग्लानि और कुछ वो चुप्पियाँ जो अपनी गलती पहचानने के बावजूद कुछ कह नहीं पातीं।

    रूहानी ने पीछे मुड़कर एक बार भी नहीं देखा। उसका चेहरा भावशून्य था, लेकिन उसकी चाल में वो वजन था जो केवल उन लड़कियों को आता है जो आत्मगौरव से जीना सीख चुकी हैं। 

    और ये जानते हुए भी कि उनका रिश्ता बस एक कागज़ी समझौता है….. एक ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ जो समाज की आंखों में सिर्फ़ एक दिखावा है…. अद्वैत ने रूहानी का साथ वैसे दिया जैसे किसी सच्चे जीवनसाथी को देना चाहिए।

    ———–

    क्या रूहानी के माता-पिता इस संघर्ष को खत्म कर पाएंगे, या फिर उनका अहंकार और अस्वीकृति उनके रिश्ते की अंतिम परीक्षा साबित होगा? 

    क्या रूहानी का दर्द सच में खत्म होगा, या यह सिर्फ एक और शुरुआत है?

    अद्वैत और रूहानी के बीच खड़े इस तूफान में क्या कोई था जो उनका साथ देगा, या ये आंधी दोनों को एक दूसरे से और दूर कर देगी? 

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    Soul_writer

    लिखकर रूह छूने की कोशिश…..

    🥹🥹

  • बेवफ़ा

    बेवफ़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    “तुम जैसी बेवफा लड़की मैंने आज तक नहीं देखी!”

     

    रोहन की आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूंज रही थी। उसके हाथ में एक शादी का कार्ड था और सामने खड़ी थी नंदिनी, जिसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

     

    “आज के बाद कभी अपनी शक्ल मत दिखाना मुझे। तुमने सिर्फ मेरा दिल नहीं तोड़ा, मेरे भरोसे को भी मार दिया।”

     

    इतना कहकर रोहन वहां से चला गया।

     

    नंदिनी चाहकर भी उसे रोक नहीं पाई। उसके होंठ कांप रहे थे, लेकिन शब्द जैसे गले में ही अटक गए थे।

     

    उस दिन उसने सिर्फ एक बात धीरे से कही थी…

     

    “हकीकत क्या थी, ये कभी तुमने जाना ही नहीं… और मुझे दे दिया एक नया नाम—बेवफा।”

     

    लेकिन उस आवाज़ को सुनने वाला वहां कोई नहीं था।

     

     

    रोहन और नंदिनी एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। दोस्ती हुई, फिर दोस्ती कब प्यार में बदल गई, दोनों को खुद भी पता नहीं चला।

     

    चार साल तक दोनों ने हर सपना साथ देखा था।

     

    रोहन हमेशा कहता था, “अगर मेरी जिंदगी में कोई सबसे जरूरी है, तो वो सिर्फ तुम हो।”

     

    नंदिनी मुस्कुराकर जवाब देती, “और मेरी दुनिया भी तुमसे ही शुरू होकर तुम पर ही खत्म होती है।”

     

    दोनों ने शादी करने का फैसला भी कर लिया था।

     

    लेकिन जिंदगी हमेशा इंसान की सोच के हिसाब से नहीं चलती।

     

    एक दिन नंदिनी के पिता को अचानक हार्ट अटैक आ गया।

     

    घर में पहले से ही बहुत कर्ज था। इलाज के लिए पैसे नहीं थे।

     

    उसी समय एक अमीर परिवार ने रिश्ता भेजा।

     

    लड़के का नाम आदित्य था। उसने साफ कहा था, “अगर नंदिनी शादी के लिए हां कह दे, तो मैं उसके पिता का पूरा इलाज करवाऊंगा और उनका सारा कर्ज भी चुका दूंगा।”

     

    नंदिनी के सामने एक तरफ उसका प्यार था…

    और दूसरी तरफ उसके पिता की सांसें।

    उसने पूरी रात रो-रोकर बिताई।

     

    सुबह जब अस्पताल में डॉक्टर ने कहा, “अगर जल्दी ऑपरेशन नहीं हुआ तो मरीज को बचाना मुश्किल होगा।”

     

    तब उसने अपने दिल को मार दिया।

    उसने आदित्य से शादी के लिए हां कह दी।

    लेकिन रोहन को कुछ भी नहीं बताया।क्योंकि उसे पता था…

    अगर वह सच बताएगी, तो रोहन अपनी जान तक लगा देगा।

     

    वह कर्ज लेगा…

    घर बेच देगा…

    अपना भविष्य खत्म कर देगा और नंदिनी कभी नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से रोहन बर्बाद हो।

     

    इसलिए उसने खुद को ही गलत बना लिया।

     

    जब रोहन को नंदिनी की शादी की खबर मिली, तो उसकी पूरी दुनिया उजड़ गई।

     

    उसने नंदिनी को फोन किया। लेकिन नंदिनी ने फोन नहीं उठाया।

    उसने मैसेज किया।

    “बस एक बार मिल लो। लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

     

    असल में नंदिनी हर मैसेज पढ़ती थी…और रोते-रोते फोन बंद कर देती थी।

     

    उसे डर था कि अगर उसने एक बार भी रोहन की आवाज़ सुन ली, तो वह अपने फैसले से पीछे हट जाएगी।

     

    शादी हो गई। रोहन टूट गया।

     

    उसने अपने दोस्तों से सिर्फ एक बात कही—

    “जिस लड़की के लिए मैं सब कुछ छोड़ सकता था… उसने मुझे पैसों के लिए छोड़ दिया।”

     

    धीरे-धीरे यही बात सबकी जुबान पर आ गई।

     

    हर कोई नंदिनी को एक ही नाम से बुलाने लगा…

     

    “बेवफा।”

    शादी के बाद नंदिनी की जिंदगी बिल्कुल वैसी नहीं थी जैसी लोगों ने सोची थी।

     

    आदित्य बुरा इंसान नहीं था।

    उसे शादी से पहले ही सब सच पता चल गया था।

     

    उसने एक दिन नंदिनी से कहा,

    “मैं जानता हूं कि तुम्हारे दिल में किसी और का नाम है। मैंने सिर्फ एक इंसान की जान बचाने के लिए तुमसे शादी की है। मैं कभी तुम पर किसी रिश्ते का दबाव नहीं डालूंगा।”

     

    ये सुनकर नंदिनी और भी ज्यादा रो पड़ी।

     

    वह हर रात अपने कमरे में बैठकर रोहन की पुरानी तस्वीरें देखती।

     

    लेकिन कभी उसे फोन नहीं करती।

     

    क्योंकि अब उसके पास कोई हक नहीं बचा था।

     

    उधर रोहन ने खुद को काम में डुबो दिया।

     

    उसने कभी शादी नहीं की।

    जब भी कोई उससे शादी की बात करता, वह सिर्फ मुस्कुरा देता।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द साफ दिखाई देता था।

     

    पांच साल बीत गए।

     

    एक दिन रोहन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    उन्हें उसी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां कभी नंदिनी के पिता का इलाज हुआ था।

     

    वहीं अस्पताल में रोहन की मुलाकात पुराने डॉक्टर से हुई।

     

    डॉक्टर ने उसे पहचान लिया।

     

    बातों-बातों में उन्होंने कहा,

     

    “तुम वही रोहन हो ना? नंदिनी वाला लड़का?”

    रोहन चुप रहा।

    डॉक्टर बोले,बहुत बड़ी लड़की थी वो। अपने पिता को बचाने के लिए उसने अपना प्यार कुर्बान कर दिया।

     

    रोहन ने चौंककर पूछा,”क्या मतलब?”

     

    फिर डॉक्टर ने उसे पूरी कहानी बता दी।कर्ज…

    ऑपरेशन…

    समझौता…और नंदिनी की खामोश कुर्बानी।

     

    रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसकी आंखों से आंसू अपने आप बहने लगे।

    उसे पहली बार एहसास हुआ…

     

    जिसे वह पांच साल से बेवफा कहता रहा…

     

    असल में वह सबसे ज्यादा वफादार थी।

    रोहन उसी शाम नंदिनी के घर पहुंच गया।

     

    दरवाजा आदित्य ने खोला।

     

    रोहन ने कांपती आवाज़ में पूछा,”क्या मैं नंदिनी से मिल सकता हूं?”

     

    आदित्य ने कुछ पल उसे देखा…

     

    फिर बिना कुछ कहे अंदर जाने का इशारा कर दिया।

     

    नंदिनी बरामदे में बैठी थी।

     

    वह पहले से बहुत कमजोर लग रही थी।

     

    रोहन को देखकर उसकी आंखें भर आईं।

     

    कुछ देर दोनों सिर्फ एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रोहन उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।

     

    “मुझे माफ कर दो…”

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा,

     

    “किस बात के लिए?”

     

    रोहन रो पड़ा।

     

    “मैंने तुम्हें समझने की कोशिश ही नहीं की। तुम्हारी आंखों के पीछे छिपे दर्द को पढ़ा ही नहीं। बस लोगों की बातों पर यकीन कर लिया और तुम्हें बेवफा कह दिया।”

     

    नंदिनी की आंखों से भी आंसू बह निकले।

     

    वह बोली,

     

    “मैं चाहती तो सच बता सकती थी… लेकिन फिर तुम्हारी जिंदगी बिखर जाती। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे प्यार की कीमत तुम अपनी पूरी जिंदगी देकर चुकाओ।”

    दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

    लेकिन अब वक्त उनके हाथ से निकल चुका था।

    कुछ महीनों बाद नंदिनी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई।

    लगातार तनाव और दुख ने उसके शरीर को कमजोर कर दिया था।

    अस्पताल के कमरे में उसकी आखिरी सांसें चल रही थीं।

    रोहन उसके पास बैठा था।

    नंदिनी ने कांपते हुए उसका हाथ पकड़ा और मुस्कुराकर बोली,

    “देखो… इस बार रोना मत। मैं जा रही हूं, लेकिन एक बात याद रखना… किसी भी रिश्ते का फैसला सिर्फ सुनी-सुनाई बातों से मत करना। कभी-कभी जो इंसान सबसे ज्यादा गलत दिखाई देता है, वही सबसे ज्यादा टूटकर प्यार करता है।”

     

    रोहन की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे।

    नंदिनी ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

    “हकीकत क्या थी… ये तुमने आखिर जान ही लिया… बस अफसोस इतना है कि थोड़ा देर से।”

    इतना कहकर उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।

    नंदिनी के जाने के बाद रोहन अक्सर उसकी कब्र पर बैठा करता था।

    एक दिन उसने वहां एक छोटा-सा पत्थर लगवाया, जिस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी

    “जिसे दुनिया ने बेवफा कहा… वह अपने प्यार की सबसे सच्ची मिसाल थी।”

    उस दिन रोहन ने आसमान की ओर देखते हुए कहा,

    “काश… मैंने लोगों की बातें सुनने से पहले तुम्हारी खामोशी सुन ली होती। शायद आज मेरी जिंदगी इतनी खाली न होती।”

     

    हवा का एक हल्का झोंका आया, जैसे किसी ने उसके आंसू चुपचाप पोंछ दिए हों।

    और उस दिन रोहन को समझ आया कि हर अधूरी प्रेम कहानी में कोई बेवफा नहीं होता…

    कभी-कभी सिर्फ हालात ही इतने बेरहम होते हैं कि सच्चे प्यार को भी दुनिया बेवफाई का नाम दे देती है।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं

    अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • उसने मुझे कुछ पूछा

    उसने मुझे कुछ पूछा

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    उसने पूछा—

    “तू मुझे देखती भी नहीं…

    क्या तुझे मुझसे मोहब्बत है?”

    मैं मुस्कुरा दी…

    मोहब्बत नहीं होती तो यूँ नज़रें क्यों चुराती?

    मुझमें बस हिम्मत नहीं है।

    डर लगता है…

    कहीं तुम्हें देखते-देखते

    खुद को ही न भूल बैठूँ।

    कहीं तुम्हारी आँखों में ऐसा खो जाऊँ

    कि फिर इस दुनिया का कोई ख़याल ही न रहे।

    इसलिए नज़रें झुका लेती हूँ…

    क्योंकि एक बार जो तुम्हें देख लिया,

    फिर नज़रें हटाना मेरे बस में नहीं रहता।

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    lovely jo

    NSW नया लेखक – 🥉

  • भक्ति में शक्ति

    भक्ति में शक्ति

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शीर्षक: सावन का महीना 🌿🕉️❤️

     

    सावन की पहली फुहार जैसे ही धरती पर गिरी, पूरे गाँव का रंग ही बदल गया। सूखी पगडंडियाँ भीगकर महक उठीं, आम और नीम के पेड़ों की पत्तियाँ धुलकर चमकने लगीं और दूर शिव मंदिर की घंटियों की आवाज़ वातावरण को भक्ति से भर रही थी।

     

    सुबह का समय था।

     

    हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। गाँव की औरतें सिर पर पल्ला किए और हाथ में पूजा की थाली लिए मंदिर की ओर जा रही थीं। कोई “ॐ नमः शिवाय” का जाप कर रहा था तो कोई भोलेनाथ के भजन गुनगुना रहा था।

     

    उसी गाँव में रहती थी गौरी।

     

    बाईस साल की गौरी… बड़ी-बड़ी काली आँखें, चेहरे पर सादगी और दिल में भगवान शिव के लिए अटूट श्रद्धा।

    गौरी बचपन से ही हर सावन सोमवार का व्रत रखती थी। लेकिन इस बार उसका व्रत किसी इच्छा के लिए नहीं था।

     

    इस बार उसने सिर्फ एक प्रार्थना की थी, 

     

    “हे महादेव… मेरे हिस्से की सारी खुशियाँ किसी और को दे देना… बस मेरे बाबा को ठीक कर देना।”

     

    उसके पिता पिछले छह महीनों से बीमार थे। इलाज में उनके खेत बिक चुके थे, घर गिरवी रखा जा चुका था और दवाइयों के लिए भी पैसे नहीं बचे थे।

     

    फिर भी हर सोमवार गौरी बिना कुछ खाए-पिए शिव मंदिर जाती, गंगाजल चढ़ाती और मुस्कुराकर लौट आती। उसके मासूम मन में जरा भी छल कपट नहीं था।

     

    गाँव वाले अक्सर कहते,  

    “इतनी पूजा से क्या होगा? इलाज के लिए पैसे चाहिए, भगवान नहीं।”

     

    गौरी बस मुस्कुरा देती और कहती, “भगवान कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाते।”

     

    दूसरा सावन सोमवार… इस बार बारिश पहले से ज़्यादा तेज़ थी, जैसे भोलेनाथ उसके सब्र की परीक्षा ले रहे हों।

     

    गौरी मंदिर जा रही थी कि रास्ते में उसे लगभग सत्तर साल का एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    वह पूरी तरह भीग चुका था। हाथ काँप रहे थे। लाठी भी कीचड़ में फँस गई थी।

    लोग उसके पास से निकल रहे थे लेकिन किसी ने भी रूककर मदद करने की हिम्मत नहीं की।

     

    लेकिन उन्हें देखते ही गौरी तुरंत दौड़ी। “बाबा… आइए, मैं सहारा देती हूँ।”

     

    उसने उन्हें उठाया, अपनी ओढ़नी से उनका चेहरा पोंछा और मंदिर की सीढ़ियों तक पहुँचाया।

     

    बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा,  “अरे बेटी… तुम खुद भी भीग रही हो।”

     

    गौरी हँस पड़ी। “सावन की बारिश में भीगने से तो भोलेनाथ भी खुश होते हैं, बाबा। आप मेरी चिंता मत कीजिए”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ गहरी नज़र से देखा। “अगर भगवान आज तुम्हारे सामने आ जाएँ तो क्या माँगोगी?”

     

    गौरी कुछ पल चुप रही।

    फिर बोली,  “अपने लिए कुछ नहीं चाहिए मुझे।

    बस मेरे बाबा ठीक हो जाएँ। और कोई भी बेटी कभी भी अपने पिता को इस हालत में न देखे।”

     

    गौरी की बातें सुनकर उस बूढ़े की आँखें भर आईं।

    उन्होंने आशीर्वाद दिया, “तुम्हारी हर मनोकामना पूरी होगी।”

     

    गौरी मुस्कुराकर मंदिर के अंदर चली गई। जब पूजा करके बाहर आई… तो वह बूढ़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।

     

    उसने आसपास बहुत खोजा… लेकिन जैसे वह कभी था ही नहीं।

     

    तीसरा सोमवार…

     

    गौरी ने देखा कि मंदिर के बाहर एक छोटा बच्चा रो रहा था। उसकी माँ बेहोश पड़ी थी। लोग तमाशा देख रहे थे।

     

    गौरी तुरंत दौड़ी। अपने पूजा के लिए रखे पैसे निकालकर उसने ऑटो बुलाया और माँ-बेटे को अस्पताल पहुँचा दिया।

     

    उस दिन वह शिवलिंग पर दूध भी नहीं चढ़ा सकी।

    घर लौटी तो माँ ने देखा कि आज उसके हाथ में कुछ भी नहीं है इसलिए उन्होंने पूछ लिया,”पूजा नहीं की?”

     

    गौरी मुस्कुराई। “आज शायद महादेव मंदिर में नहीं…

    अस्पताल में मिल गए थे।”

    समय धीरे-धीरे बीतता गया। गौरी का भोलेनाथ पर विश्वास अटूट बना रहा।

     

    सावन का आखिरी सोमवार आ गया। उस दिन मंदिर में बहुत भीड़ थी। हर कोई बड़ी-बड़ी थालियाँ लेकर आया था। किसी के पास पाँच लीटर दूध था। किसी के पास चाँदी का नाग। किसी ने सोने का मुकुट चढ़ाया।

     

    गौरी के पास… सिर्फ एक लोटा पानी और बेलपत्र थे।

    वह धीरे-धीरे लाइन में लगी रही।

     

    तभी मंदिर के पुजारी ने घोषणा की,  “आज मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए जो सबसे बड़ा दान देगा, उसका विशेष अभिषेक होगा।”

     

    लोगों ने हजारों रुपए चढ़ाने शुरू कर दिए। गौरी चुपचाप पीछे हट गई।

     

    उसे लगा… उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं।

    तभी मंदिर के बाहर वही बूढ़ा फिर दिखाई दिया। इस बार उनके पैरों में चोट लगी थी। गौरी बिना सोचे दौड़ी।

    अपनी पूजा की थाली नीचे रख दी।

     

    अपने दुपट्टे का किनारा फाड़कर उनके पैर पर पट्टी बाँध दी। बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा,  “बेटा, तुम्हारी पूजा?”

     

    गौरी ने हाथ जोड़ लिए। “बाबा… जहाँ इंसान की सेवा हो…

    वहीं भगवान की पूजा होती है।”

     

    इतना सुनते ही अचानक मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं। तेज़ हवा चलने लगी। बारिश की बूँदें जैसे रुक गईं।

     

    गौरी ने पलटकर देखा… वहाँ कोई बूढ़ा नहीं था। सिर्फ एक सफेद बेलपत्र पड़ा था… जिस पर तीन धारियाँ बनी थीं।

     

    उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसी शाम गाँव में एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक उद्योगपति उतरे।

     

    उन्होंने पूरे गाँव को इकट्ठा किया। और कहने लगे, “बीस साल पहले… मैं इसी गाँव का रहने वाला था।

    जब मेरा सब कुछ खत्म हो गया था… तब एक किसान ने मेरी मदद की थी।

    आज मैं उसी किसान का कर्ज़ चुकाने आया हूँ।”

     

    उन्होंने नाम लिया, “रामस्वरूप।”

     

    वह गौरी के पिता थे। गौरी भी भीड़ में खड़ी थी जैसे ही उसने नाम सुना वो हैरान रह गई।

     

    उद्योगपति बोले, “उनकी ईमानदारी की वजह से आज मैं इस मुकाम पर हूँ। आज मैं उनको कर्ज चुकाने आया हूँ। मुझे पता चला है कि वो बहुत समय से बीमार है, इसलिए अब उनके इलाज का पूरा खर्च मैं उठाऊँगा।

    साथ ही उनका खेत भी वापस दिलाऊँगा।”

     

    इतना सुनते ही पूरा गाँव तालियाँ बजाने लगा।

     

    गौरी की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने मन ही मन कहा, “महादेव… आपने मेरी सुन ली।”

     

    कुछ महीनों बाद… गौरी के पिता पूरी तरह स्वस्थ हो चुके थे। खेत फिर से हरे-भरे हो गए थे। घर की खुशियाँ लौट आई थीं।

     

    एक शाम गौरी मंदिर में दीपक जलाने गई। वहीं मंदिर के पुजारी मुस्कुराकर बोले,  “बेटी…

    क्या तुम्हें पता है? जिस बूढ़े की तुमने दो बार मदद की… उसे इस गाँव में किसी और ने कभी नहीं देखा।”

     

    गौरी चौंक गई। “क्या मतलब?”

     

    पुजारी धीरे से बोले, “उस दिन मैं भी पूरे समय मंदिर में था। तुम अकेली ही किसी से बातें कर रही थीं।”

     

    गौरी के हाथ काँपने लगे। उसने शिवलिंग की ओर देखा। उसे ऐसा लगा जैसे शिवलिंग पर जल की धार के बीच एक क्षण के लिए मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाई दिया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह वहीं बैठ गई।

    उसने समझ लिया, 

     

    महादेव कभी चमत्कार दिखाकर नहीं आते।

    वे किसी भूखे की भूख बनकर आते हैं…

    किसी घायल का दर्द बनकर आते हैं…

    किसी बूढ़े की लाठी बनकर आते हैं…

     

    और किसी बेटी की उम्मीद बनकर उसके आँसू पोंछ जाते हैं।

     

    उस दिन गौरी ने पहली बार अपने लिए कुछ माँगा।

    उसने हाथ जोड़कर कहा,  “भोलेनाथ…

    मुझे इतना समर्थ बना देना कि मैं हर सावन किसी ज़रूरतमंद की मदद कर सकूँ।

    यही मेरी सबसे बड़ी पूजा होगी।”

     

    मंदिर की घंटी एक बार फिर गूँज उठी।

     

    बारिश की ठंडी बूँदें उसके चेहरे पर आकर ठहर गईं।

    गौरी मुस्कुरा दी। अब उसे किसी चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं थी।

     

    क्योंकि वह समझ चुकी थी कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर में जल चढ़ाने से नहीं, बल्कि किसी के जीवन में आशा का दीप जलाने से पूरी होती है।

     

    उसके बाद हर सावन में गाँव की एक नई परंपरा शुरू हुई। लोग पहले किसी गरीब, बीमार या असहाय व्यक्ति की मदद करते, फिर शिव मंदिर में जल चढ़ाने जाते। 

     

    धीरे-धीरे यह परंपरा आसपास के गाँवों तक फैल गई। लोग कहते थे कि इस गाँव में सावन सिर्फ़ बरसात नहीं लाता, बल्कि इंसानियत की खुशबू भी साथ लाता है।

     

    और जब भी सावन की पहली बारिश होती, गौरी मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ी होकर मुस्कुरा देती। उसे ऐसा महसूस होता जैसे हवा के साथ कोई धीमी-सी आवाज़ उसके कानों में फुसफुसा रही हो, 

    “जहाँ करुणा है, वहीं मैं हूँ। जहाँ प्रेम है, वहीं मेरा वास है।”

     

    उसने आसमान की ओर देखा। बादलों के पीछे छिपा चाँद दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसे विश्वास था कि जैसे बादलों के पीछे चाँद हमेशा मौजूद रहता है, वैसे ही हर सच्चे मन के पीछे महादेव की कृपा भी हमेशा रहती है।

    समाप्त। 🕉️🌿

     

    अगरआपकोमेरी कहानीपसंद आईतो एक लाइककरना ना भूलिएगा।

    धन्यवाद 🙏🏻

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    Neha Goyal

    मेरा नाम नेहा गोयल है।

    और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।

    मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।

    वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

  • 30 साल पुराने प्रेम पत्र

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    30 साल पुराने प्रेम पत्र

    सुबह के पाँच बजे थे। पूरे गाँव में अभी सन्नाटा पसरा हुआ था। लेकिन एक बूढ़ा आदमी अपनी पुरानी साइकिल पर चमड़े का घिसा हुआ डाक का बैग टाँगे धीरे-धीरे कच्चे रास्ते पर चला जा रहा था। सफेद बाल, झुकी हुई कमर और काँपते हुए हाथ… फिर भी उसकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी।

    उस बूढ़े डाकिए का नाम रामनाथ था।

    सरकारी नौकरी से उसे रिटायर हुए पूरे तीस साल हो चुके थे। गाँव में अब नया डाकघर बन चुका था और नए डाकिए भी आ गए थे। लेकिन रामनाथ आज भी हर सुबह अपने बैग में कुछ पुराने खत रखकर निकल पड़ता था।

    गाँव वाले उसे देखकर कहते, “बाबा की उम्र हो गई है… अब इनका दिमाग पहले जैसा नहीं रहा।”

    कोई हँसता, कोई तरस खाता।

    लेकिन रामनाथ किसी की बात का जवाब नहीं देता। वह बस मुस्कुराकर आगे बढ़ जाता।

    एक दिन शहर से आई युवा पत्रकार रिया की नज़र उस पर पड़ी। उसे यह बात बहुत अजीब लगी कि एक रिटायर डाकिया रोज़ किसे चिट्ठियाँ बाँटता है।

    अगले दिन वह चुपचाप रामनाथ के पीछे चल पड़ी।

    रामनाथ पूरे गाँव में कई घरों के सामने रुकता, दरवाज़े को देखता, जेब से एक पुराना खत निकालता, उसे हाथ में लेकर कुछ पल खड़ा रहता और फिर वापस बैग में रखकर आगे बढ़ जाता।

    रिया से रहा नहीं गया।

     

    उसने पूछा, “बाबा, आप ये खत देते क्यों नहीं?”

    रामनाथ ने धीमी मुस्कान के साथ कहा, “जिसके नाम हैं… वही लेने नहीं आया।”

    रिया और भी उलझ गई।

    “किसके नाम हैं?”

    रामनाथ ने बैग को सीने से लगा लिया और बोले, “ये प्रेम पत्र हैं… पूरे तीस साल पुराने।”

    रिया हैरान रह गई।

    रामनाथ उसे अपने छोटे-से घर ले गए।

    घर के एक कोने में लकड़ी का पुराना संदूक रखा था। उसे खोलते ही उसमें सैकड़ों पुराने लिफाफे दिखाई दिए। हर खत पर एक ही नाम लिखा था—

    ‘सावित्री के नाम।’

    भेजने वाले का नाम था—

    ‘मोहन।’

    रिया ने पूछा, “ये इतने सालों से क्यों पड़े हैं?”

    रामनाथ की आँखें भर आईं

    उन्होंने कहना शुरू किया—

    “आज से तीस साल पहले मोहन और सावित्री एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। लेकिन दोनों अलग-अलग जाति के थे। उस समय गाँव में ऐसी शादी की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।”

    “दोनों ने भागने का फैसला किया था। लेकिन भागने से एक दिन पहले मोहन शहर काम करने चला गया। उसने सावित्री को हर हफ्ते एक प्रेम पत्र भेजा।”

    “लेकिन…”

    रामनाथ की आवाज़ भर्रा गई।

    “वे पत्र कभी सावित्री तक पहुँचे ही नहीं।”

    रिया ने पूछा, “क्यों?”

    रामनाथ ने सिर झुका लिया।

    “क्योंकि गलती मेरी थी।”

    उन्होंने बताया कि उन्हीं दिनों उनके घर में उनकी पत्नी बहुत बीमार थी। अस्पताल, दवाइयों और भागदौड़ में वे कई चिट्ठियाँ डाकघर के एक पुराने बक्से में रखना भूल गए।

    जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

    सावित्री की शादी कहीं और कर दी गई थी।

     

    और मोहन…

    उसे लगा कि सावित्री ने उसके किसी भी खत का जवाब नहीं दिया, इसलिए उसने भी समझ लिया कि वह उसे भूल चुकी है।

    दोनों हमेशा के लिए अलग हो गए।

     

    रामनाथ की आँखों से आँसू बहने लगे।

    “अगर मैंने उस समय अपना काम ईमानदारी से किया होता… तो शायद दो ज़िंदगियाँ बर्बाद न होतीं।”

    रिया ने धीरे से पूछा, “फिर अब?”

     

    रामनाथ बोले, “अब मैं रोज़ निकलता हूँ… शायद किसी दिन वे दोनों मिल जाएँ और मैं अपने हाथों से ये खत उन्हें दे सकूँ।”

    रिया पूरी रात सो नहीं सकी।

    अगले दिन उसने इस कहानी की तलाश शुरू कर दी।

    कई दिनों की खोज के बाद उसे पता चला कि सावित्री अभी ज़िंदा थी। वह अपने बेटे के साथ दूसरे जिले के एक छोटे-से कस्बे में रहती थी।

    रिया तुरंत रामनाथ को वहाँ ले गई।दरवाज़ा खुला।

    सामने लगभग सत्तर साल की एक बूढ़ी महिला खड़ी थी।

    रामनाथ ने काँपते हाथों से पहला खत आगे ढ़ाया।

    “बेटी… ये तुम्हारे लिए तीस साल पहले आया था।”

    सावित्री ने लिफाफे को देखा।

    उसके हाथ काँपने लगे।

    उसने जैसे ही मोहन का नाम पढ़ा, उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

    वह वहीं चौखट पर बैठ गई।

    धीरे-धीरे उसने पहला खत खोला।

    उसमें लिखा था”सावित्री, मैं अगले महीने लौट आऊँगा। बस मेरा इंतज़ार करना। अगर तुम्हारा जवाब नहीं आया तो भी मैं यकीन करूँगा कि तुम मजबूर होगी, बेवफा नहीं…”

    सावित्री फूट-फूटकर रोने लगी।

    उसने कहा, “मैंने तो हर दिन डाकिए का इंतज़ार किया था… लेकिन कोई खत ही नहीं आया।”

    रामनाथ हाथ जोड़कर रो पड़े।

    “मुझे माफ़ कर दो बेटी।”सावित्री ने आँसू पोंछे और कहा,

    “गलती से बिछड़े लोग नफ़रत नहीं रखते बाबा। बस किस्मत से हार जाते हैं।”लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी।

    रिया ने मोहन की तलाश भी शुरू कर दी।

    करीब एक हफ्ते बाद पता चला कि मोहन भी ज़िंदा था। वह शहर में एक पुराने पुस्तकालय में काम करता था और उसने कभी शादी नहीं की।

    जब उसे सावित्री के बारे में बताया गया, तो उसकी आँखें नम हो गईं।

    कुछ दिनों बाद दोनों की मुलाकात तय हुई।

    गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे…

    जहाँ वे कभी मिला करते थे।

    मोहन धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।सावित्री पहले से बैठी थी।

    तीस साल बाद दोनों एक-दूसरे के सामने थे।

    कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

    फिर मोहन ने काँपती आवाज़ में पूछा,

    “अगर तुम्हें मेरे खत मिल जाते… तो क्या तुम मेरा इंतज़ार करती?”

    सावित्री मुस्कुराई।

    “मैंने तो बिना खत के भी कई साल तुम्हारा इंतज़ार किया था।”

    दोनों की आँखों से आँसू बह निकले।

    रामनाथ थोड़ी दूर खड़े यह सब देख रहे थे।

    उन्होंने अपने बैग से बाकी सारे प्रेम पत्र निकाले और मोहन के हाथों में रख दिए।

    “आज मेरा तीस साल पुराना कर्ज उतर गया।”

    मोहन ने एक-एक करके सभी खत सावित्री को पढ़कर सुनाए।

     

    हर खत में प्यार था, भरोसा था और एक साथ ज़िंदगी बिताने का सपना था।

    दोनों जानते थे कि बीता हुआ समय वापस नहीं आ सकता।

    लेकिन उन्हें यह सुकून मिल गया कि उनमें से किसी ने भी कभी दूसरे से बेवफाई नहीं की थी।

    कुछ महीनों बाद रामनाथ बहुत बीमार पड़ गए।

    मोहन और सावित्री रोज़ उनसे मिलने आते।

    एक शाम रामनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “अब मुझे किसी और पते पर भी एक चिट्ठी पहुँचानी है… ऊपर वाले के नाम।”

    तीनों हँस पड़े।

    उसी रात रामनाथ हमेशा के लिए इस दुनिया से चले गए।

    उनकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ।

    उनकी पुरानी साइकिल, चमड़े का बैग और खाली डाक का थैला भी उनके साथ रखा गया।

    गाँव के लोगों ने पहली बार समझा कि डाकिया सिर्फ़ चिट्ठियाँ नहीं पहुँचाता…

    वह लोगों की उम्मीदें, रिश्ते और अधूरी मोहब्बतें भी अपने कंधों पर ढोता है।

    रामनाथ की याद में गाँव के डाकघर के बाहर एक छोटी-सी पट्टिका लगाई गई, जिस पर लिखा था

    कुछ चिट्ठियाँ देर से पहुँचीं, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्चा प्यार समय से नहीं, भरोसे से ज़िंदा रहता है।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं

    अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अगर मेरी डायरी बोलती तो…

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    यह कहानी रिया नाम की एक युवती के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने विचारों, अनुभवों, सपनों और भावनाओं को अपनी डायरी में लिखती है। रिया एक साधारण-सी लड़की है, लेकिन उसकी सोच और जीवन को देखने का नज़रिया उसे सबसे अलग बनाता है। उसका जीवन सामान्य खुशियों और संघर्षों से भरा है, लेकिन उसकी डायरी का हर पन्ना एक नई दुनिया की कहानी कहता है।

     

    एक दिन रिया अपनी डायरी लेकर पार्क में बैठी थी। जैसे ही उसने अपनी कलम से पहला शब्द लिखा, उसे ऐसा महसूस हुआ मानो उसकी डायरी में कोई जादू जाग गया हो।

     

    अचानक डायरी से आवाज़ आई “नमस्ते, रिया! मैं तुम्हारी डायरी हूँ। आज से मैं तुमसे बातें करूँगी।”

     

    रिया यह सुनकर चौंक गई। उसने हैरानी से पूछा,

     

    “क्या… तुम सचमुच बोल सकती हो?”

     

    डायरी मुस्कुराई और बोली,

     

    “हाँ। मैं तुम्हारे मन की आवाज़ हूँ। तुम्हारी खुशियों, दुखों, सपनों और संघर्षों की सच्ची साथी। तुम जो कुछ भी लिखती हो, मैं उसे महसूस करती हूँ।”

     

    रिया को अपनी बातों का एक नया साथी मिल गया। अब वह हर दिन अपनी डायरी से बातें करने लगी। वह अपने सपनों, डर, उम्मीदों और जीवन की हर छोटी-बड़ी बात उससे साझा करती।

     

    एक दिन डायरी ने पूछा,

     

    “रिया, तुम्हारा सबसे बड़ा सपना क्या है?”

     

    रिया ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “मैं अपना खुद का व्यवसाय शुरू करना चाहती हूँ। मैं अपने हाथों से ऐसी सुंदर चीज़ें बनाना चाहती हूँ, जिन्हें लोग पसंद करें और जो उनके जीवन में खुशियाँ लाएँ।”

     

    डायरी ने उसे प्रेरित करते हुए कहा,

     

    “अपने सपनों को कभी मत छोड़ना। हर नया दिन तुम्हारी ज़िंदगी का एक नया पन्ना है। उसे पूरे साहस और विश्वास के साथ लिखो।”

     

    धीरे-धीरे रिया का अपनी डायरी से गहरा रिश्ता बन गया। वह अपने सुख-दुख, असफलताएँ और उम्मीदें हर दिन उसके पन्नों पर उतारने लगी।

     

    जब भी वह निराश होती, डायरी उसे समझाती,

     

    “असफलता अंत नहीं होती। वह सफलता तक पहुँचने का पहला कदम होती है।”

     

    कुछ समय बाद रिया के जीवन में एक कठिन दौर आया। उसके पिता की तबीयत अचानक खराब हो गई। यह खबर सुनकर वह भीतर से टूट गई।

     

    उस रात उसने अपनी डायरी खोली और लिखा “मुझे बहुत डर लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि सब कुछ बिखर जाएगा।”

     

    डायरी ने जैसे उसके आँसू पोंछते हुए कहा,

     

    “डरना स्वाभाविक है, लेकिन डर के आगे हार मान लेना सही नहीं। अपने भीतर की ताकत को पहचानो। हर अँधेरी रात के बाद नई सुबह ज़रूर आती है।”

     

    डायरी की बातों ने रिया को हिम्मत दी।

     

    उसने अपने पिता की देखभाल पूरे मन से की और उसी दिन एक नया संकल्प लिया।

     

    उसने लिखा “मैं इतनी मेहनत करूँगी कि मेरे परिवार को कभी किसी चीज़ की कमी न रहे।”

     

    कुछ महीनों बाद रिया ने अपने हाथों से सुंदर सजावटी सामान बनाना शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। कई बार उसकी बनाई हुई चीज़ें नहीं बिकीं। कई लोगों ने उसकी मेहनत को नज़रअंदाज़ कर दिया।

     

    लेकिन हर बार डायरी उसे याद दिलाती “हर बड़ी सफलता की शुरुआत एक छोटे कदम से होती है। हार मत मानो।”

     

    रिया ने हिम्मत नहीं छोड़ी।

     

    उसने अपनी कला को सोशल मीडिया पर साझा करना शुरू किया। धीरे-धीरे लोगों ने उसके काम को पसंद करना शुरू किया।

     

    एक दिन उसने अपनी डायरी में लिखा “आज मेरी पहली ग्राहक आई। उसने मेरी बनाई हुई चीज़ देखकर मुस्कुराते हुए कहा कि उसे यह बहुत पसंद आई। उसकी मुस्कान ने मेरी सारी मेहनत सफल बना दी।”

     

    डायरी ने जवाब दिया—

     

    “यह तो बस शुरुआत है। अभी तुम्हारी मंज़िल बहुत दूर है।”

     

    दिन बीतते गए।

     

    रिया लगातार मेहनत करती रही। वह रोज़ नई डिज़ाइन बनाती और ग्राहकों की पसंद को समझकर अपने काम में सुधार करती।

     

    साथ ही वह अपने पिता का भी पूरा ध्यान रखती। उनकी सेहत धीरे-धीरे ठीक होने लगी। जब भी वे रिया की मेहनत देखते, उनकी आँखों में गर्व साफ दिखाई देता।

     

    हर शाम रिया अपनी डायरी के साथ बैठती और पूरे दिन का अनुभव लिखती।

     

    एक दिन उसने लिखा “आज मैंने अपना पहला आर्ट शो लगाया। लोगों ने मेरी कला की बहुत सराहना की। जब मेरे माता-पिता ने गर्व से मेरी तारीफ़ की, तो मुझे लगा जैसे मैंने पूरी दुनिया जीत ली हो।”

     

    डायरी ने मुस्कुराकर कहा “यह तुम्हारी मेहनत, धैर्य और विश्वास का परिणाम है। अभी तुम्हें और भी ऊँचाइयाँ छूनी हैं।”

     

    देखते ही देखते एक साल बीत गया।

     

    रिया का छोटा-सा व्यवसाय अब एक सफल ब्रांड बन चुका था। उसकी बनाई हुई चीज़ें दूर-दूर तक पसंद की जाने लगीं।

     

    एक दिन उसने अपने नए कलेक्शन की प्रदर्शनी आयोजित की।

     

    प्रदर्शनी से एक रात पहले उसने अपनी डायरी में लिखा “मैं चाहती हूँ कि लोग सिर्फ मेरी कला ही नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी मेरी मेहनत, भावनाएँ और संघर्ष भी महसूस करें।”

     

    डायरी ने जवाब दिया “यही तुम्हारी सबसे बड़ी पहचान है। जब दिल से बनाया गया काम लोगों तक पहुँचता है, तो वह केवल एक वस्तु नहीं रहता, बल्कि एक भावना बन जाता है।”

     

    प्रदर्शनी वाले दिन रिया बहुत उत्साहित थी, लेकिन थोड़ी घबराई हुई भी थी।

     

    जैसे ही लोगों ने उसकी कलाकृतियाँ देखीं, उनके चेहरों पर मुस्कान आ गई। सभी उसकी कला की प्रशंसा करने लगे।

     

    एक ग्राहक उसके पास आया और बोला—

     

    “आपकी कलाकृतियाँ सिर्फ सुंदर नहीं हैं, बल्कि इनमें आपकी मेहनत, संघर्ष और भावनाएँ साफ दिखाई देती हैं। यही इन्हें सबसे खास बनाता है।”

     

    उस दिन पूरी प्रदर्शनी का सीधा प्रसारण सोशल मीडिया पर किया गया। इससे रिया को और भी अधिक पहचान मिली।

     

    रात को घर लौटकर उसने अपनी डायरी खोली और लिखा—

     

    “आज मुझे एहसास हुआ कि सपने तभी पूरे होते हैं, जब हम उन पर विश्वास करते हैं और हर मुश्किल के बावजूद आगे बढ़ते रहते हैं। मैंने केवल अपना सपना पूरा नहीं किया, बल्कि अपनी कला के माध्यम से लोगों के दिलों में भी एक छोटी-सी जगह बना ली।”

     

    डायरी मुस्कुराई और बोली “याद रखना, रिया… कहानी कभी खत्म नहीं होती। हर नया दिन तुम्हारी ज़िंदगी का एक नया पन्ना है। उसे अपने हौसले, मेहनत और मुस्कान से भरती रहना।”

     

    रिया मुस्कुराई, अपनी डायरी को सीने से लगाया और अगले पन्ने पर लिख दिया “मेरी कहानी अभी बाकी है…”

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • मोहन और झूमर की अनोखी दोस्ती

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    बहुत समय पहले की बात है। पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों से घिरे एक सुंदर से गाँव में मोहन नाम का एक छोटा-सा लड़का रहता था। मोहन बहुत ही चंचल, दयालु और हँसमुख था। पूरे गाँव में उसकी शरारतों और मददगार स्वभाव की चर्चा होती थी। वह हर किसी से प्यार से बात करता और हमेशा दूसरों की सहायता करने के लिए तैयार रहता।

    लेकिन मोहन के मन में एक छोटी-सी इच्छा हमेशा रहती थी। वह चाहता था कि उसका कोई ऐसा दोस्त हो, जो हर समय उसके साथ रहे। गाँव के बच्चे स्कूल चले जाते थे और कई बार अपने कामों में व्यस्त हो जाते थे। ऐसे में मोहन अकेला महसूस करता।

    एक दिन सुबह-सुबह वह खेतों की ओर घूमने निकला। ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहा रहे थे और तितलियाँ फूलों पर मंडरा रही थीं।

    अचानक उसकी नज़र झाड़ियों के पीछे किसी हलचल पर पड़ी।

    वह धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।

    उसने देखा कि एक छोटा-सा हिरण काँपता हुआ खड़ा था। उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

    मोहन ने धीरे से कहा,

    “डरो मत… मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”

    हिरण कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर धीरे-धीरे उसके पास आ गया।

    मोहन ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।

    “आज से तुम मेरे दोस्त हो। मैं तुम्हारा नाम झूमर रखता हूँ, क्योंकि तुम चलते नहीं, झूमते हुए दौड़ते हो।”

    जैसे ही उसने यह कहा, हिरण खुशी से उछल पड़ा।

    उस दिन से दोनों की दोस्ती शुरू हो गई।

    अब हर सुबह मोहन जंगल जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता।

    दोनों मिलकर पेड़ों के बीच दौड़ लगाते।

    कभी नदी किनारे बैठते।

    कभी तितलियों के पीछे भागते।

    कभी पेड़ों से गिरे मीठे फलों का स्वाद लेते।

    जब भी मोहन उदास होता, झूमर उसके पास आकर अपना सिर उसके कंधे से सटा देता।

    मोहन मुस्कुरा उठता।

    धीरे-धीरे पूरे गाँव को दोनों की दोस्ती के बारे में पता चल गया।

    लोग कहते,

    “ऐसी दोस्ती बहुत कम देखने को मिलती है।”

    कुछ ही दिनों बाद गाँव में साल का सबसे बड़ा मेला लगने वाला था।

    गाँव के बच्चे कई दिनों से उसकी तैयारी कर रहे थे।

    मोहन ने झूमर से कहा,

    “चलो, इस बार तुम्हें भी मेला दिखाता हूँ।”

    झूमर खुशी से उछल पड़ा।

    मेले वाले दिन पूरा गाँव रंग-बिरंगी सजावट से जगमगा रहा था।

    चारों ओर मिठाइयों की खुशबू फैल रही थी।

    बच्चे झूलों पर झूल रहे थे।

    कोई बाँसुरी बजा रहा था तो कोई कठपुतली का खेल दिखा रहा था।

    मोहन और झूमर भी मेले में घूमने लगे।

    दोनों ने गुड़ की रेवड़ी खाई।

    रंग-बिरंगे गुब्बारे देखे।

    झूलों को देखकर झूमर खुशी से उछलने लगा।

    तभी अचानक मेले में अफरा-तफरी मच गई।

    एक शिकारी वहाँ आ पहुँचा।

    उसकी नज़र जैसे ही झूमर पर पड़ी, उसकी आँखें चमक उठीं।

    वह धीरे-धीरे झूमर की ओर बढ़ने लगा।

    मोहन ने यह देख लिया।

    वह तुरंत झूमर के सामने खड़ा हो गया।

    “रुक जाओ!”

    शिकारी हँसते हुए बोला,

    “हटो बच्चे, यह हिरण अब मेरा है।”

    मोहन ने साहस से कहा,

    “यह कोई सामान नहीं है। यह मेरा दोस्त है।”

    लेकिन शिकारी उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।

    उसने जाल निकाल लिया।

    झूमर डरकर पीछे हटने लगा।

    मोहन जल्दी से सोचने लगा कि क्या किया जाए।

    तभी उसकी नज़र पास में बँधी एक बकरी पर पड़ी।

    उसके दिमाग में एक योजना आई।

    उसने झूमर से धीरे से कहा,

    “तुम अभी जंगल की तरफ भागो। मैं सब संभाल लूँगा।”

    झूमर तुरंत दौड़ पड़ा।

    उधर मोहन ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा,

    “अरे… बकरी भाग रही है!”

    शिकारी का ध्यान बकरी की ओर चला गया।

    वह उसी के पीछे दौड़ पड़ा।

    इसी बीच मोहन ने गाँव के चौकीदार और पुलिस को सूचना दे दी।

    कुछ ही मिनटों में पुलिस वहाँ पहुँच गई।

    उन्होंने शिकारी को पकड़ लिया।

    शिकारी भागने की कोशिश करता रहा, लेकिन वह बच नहीं पाया।

    गाँव के लोगों ने राहत की साँस ली।

    झूमर धीरे-धीरे जंगल से वापस आया।

    जैसे ही उसने मोहन को सुरक्षित देखा, वह दौड़कर उसके पास आया और अपना सिर उसके सीने से लगा दिया।

    मोहन ने मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया।

    गाँव के मुखिया ने दोनों की बहादुरी की बहुत प्रशंसा की।

    उन्होंने कहा,

    “आज मोहन ने साबित कर दिया कि सच्चा दोस्त वही होता है, जो अपने दोस्त की रक्षा के लिए हर मुश्किल का सामना करे।”

    उस दिन मेले में सभी बच्चों ने मोहन के लिए ज़ोरदार तालियाँ बजाईं।

    कुछ दिनों बाद गाँव के लोगों ने जंगल के जानवरों की सुरक्षा के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया।

    उन्होंने जंगल के बाहर चेतावनी वाले बोर्ड लगाए।

    वन विभाग की मदद से जानवरों की सुरक्षा के लिए गश्त भी बढ़ाई गई।

    मोहन भी इस अभियान का हिस्सा बन गया।

    अब वह गाँव के बच्चों को जानवरों से प्यार करना और उनकी रक्षा करना सिखाने लगा।

    झूमर भी अक्सर दूर खड़ा होकर उसे देखता और जैसे मुस्कुराता हुआ दिखाई देता।

    समय बीतता गया, लेकिन दोनों की दोस्ती पहले से भी ज़्यादा गहरी होती गई।

    हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ मोहन जंगल पहुँच जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता मिलता।

    दोनों फिर उसी तरह दौड़ते, खेलते और हँसते।

    उनकी दोस्ती पूरे गाँव के लिए एक मिसाल बन गई।

    लोग अपने बच्चों से कहते,

    “अगर दोस्ती निभानी है, तो मोहन और झूमर जैसी निभाओ।”

    मोहन ने समझ लिया था कि दोस्ती केवल साथ खेलने का नाम नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ निभाने का नाम है।

    झूमर ने भी अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया कि प्रेम और विश्वास की कोई भाषा नहीं होती।

    इंसान और जानवर भी सच्चे दोस्त बन सकते हैं, अगर उनके दिल में प्यार और अपनापन हो।

    उस दिन से गाँव के लोग हर साल मेले के दिन “मित्रता दिवस” मनाने लगे, ताकि सभी बच्चों को सच्ची दोस्ती का महत्व याद रहे।

    और जब भी कोई बच्चा जंगल की ओर जाता, उसे अक्सर एक प्यारा-सा हिरण और उसका सबसे अच्छा दोस्त मोहन साथ-साथ खेलते हुए दिखाई देते हैं।

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇