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श्रेणी: ऑडियो कहानियां

कहानी पढ़ें हीं नहीं सुनें भी,आपके दिलों तक पहुंचाती खूबसूरत कहानियां पढ़ें लिखें और सुनें भी।

  • ऑनलाइन फ्रेंडशिप — एक अधूरी दास्तान

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    कभी-कभी ज़िंदगी हमें कुछ ऐसे लोगों से मिलाती है, जिनसे मिलने की हमने कभी कोई दुआ तक नहीं की होती। वे अचानक हमारी दुनिया में आते हैं, धीरे-धीरे हमारी आदत बन जाते हैं और फिर एक दिन… उसी खामोशी में खो जाते हैं, जहाँ से उन्हें ढूँढना भी मुमकिन नहीं होता।

     

    मेरी कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

    यह कहानी किसी कॉलेज की कैंटीन से शुरू नहीं हुई थी, न किसी सफ़र में हुई मुलाकात से और न ही किसी जान-पहचान वाले के ज़रिए। मेरी कहानी शुरू हुई थी एक ऐसे प्लेटफ़ॉर्म से, जहाँ लोग अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालते थे।

     

    मैं एक लेखिका हूँ।

     

    मुझे लिखना हमेशा से पसंद था। अपने मन की बातें कागज़ पर उतार देना, अपनी खामोशियों को शब्द दे देना और कभी-कभी अपनी ही लिखी हुई पंक्तियों में खुद को ढूँढ लेना… यही मेरी दुनिया थी।

     

    उसी दुनिया में एक दिन मेरी नज़र एक ऐसे शख्स की लिखी हुई रचना पर पड़ी, जो मेरी ही तरह लिखता था। उसकी बातों में भी वही एहसास था, वही गहराई थी और शायद वही अकेलापन भी, जिसे मैं अपनी लिखाई में अक्सर छुपा दिया करती थी।

     

    मैंने उसकी कुछ रचनाएँ पढ़ीं।

     

    फिर कुछ और पढ़ीं।

     

    और पता नहीं कब उसकी लिखाई मुझे अच्छी लगने लगी।

     

    लेकिन उस वक्त कहाँ पता था कि एक लेखक की लिखाई पसंद आना, एक दिन उसी लेखक को अपनी ज़िंदगी का इतना अहम हिस्सा बना देगा।

     

    एक दिन अचानक उसका संदेश मेरे इनबॉक्स में आया।

     

    संदेश बहुत साधारण था।

     

    शायद किसी बात को लेकर उसने मुझसे कुछ पूछा था।

     

    मैंने भी सामान्य-सा जवाब दे दिया।

     

    बस… यहीं से हमारी कहानी शुरू हुई।

     

    शुरुआत में हमारी बातें सिर्फ़ लिखने-पढ़ने तक सीमित थीं। कौन-सी रचना अच्छी लगी, क्या लिखना चाहिए, किस एहसास को किस तरह शब्द देना चाहिए… बातें छोटी थीं, मगर धीरे-धीरे उन छोटी बातों ने हमारे बीच एक बड़ा रिश्ता बना दिया।

     

    हम दोनों को शायद पता ही नहीं चला कि कब “आप” से “तुम” हो गया।

     

    कब औपचारिक बातों की जगह बेवजह की बातें होने लगीं।

     

    कब सुबह की शुरुआत एक-दूसरे के संदेश से होने लगी और रात तब तक अधूरी लगने लगी, जब तक बात न हो जाए।

     

    वह सिर्फ़ मेरी दोस्त नहीं रही थी।

     

    वह मेरी आदत बन चुकी थी।

     

    मेरे दिन का एक ऐसा हिस्सा, जिसके बिना दिन पूरा नहीं लगता था।

     

    अगर किसी दिन बात न हो तो मन बार-बार मोबाइल उठाता।

     

    “शायद उसका मैसेज आया हो…”

     

    फिर स्क्रीन देखती और खाली इनबॉक्स देखकर खुद से कहती—“शायद व्यस्त होगी।”

     

    और कुछ देर बाद फिर मोबाइल देखती।

     

    हमारी दोस्ती इतनी गहरी हो गई थी कि एक दिन बिना बात किए रहना मुश्किल लगता था।

     

    हम अपनी खुशियाँ बाँटते थे।

     

    अपनी परेशानियाँ बाँटते थे।

     

    कभी वह उदास होती तो मैं उसे हँसाने की कोशिश करती और कभी मेरा मन भारी होता तो वह बिना पूछे समझ जाती कि कुछ ठीक नहीं है।

     

    अजीब बात थी…

     

    हम एक-दूसरे से कभी आमने-सामने नहीं मिले थे, फिर भी वह मुझे उन लोगों से ज्यादा समझती थी, जो मेरे आसपास रहते थे।

     

    कभी-कभी मैं सोचती थी कि आखिर एक ऑनलाइन मुलाकात इतनी सच्ची कैसे हो सकती है?

     

    फिर खुद ही जवाब मिलता—

     

    रिश्ते दूरी से नहीं, एहसास से करीब होते हैं।

     

    हमारी दोस्ती में कोई स्वार्थ नहीं था।

     

    बस एक-दूसरे का साथ था।

     

    एक-दूसरे की बातें सुनने की चाह थी।

     

    और शायद यही वजह थी कि धीरे-धीरे वह मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गई।

     

    लेकिन हर खूबसूरत कहानी के हिस्से में खुशियाँ हमेशा नहीं रहतीं।

     

    एक दिन मेरी ज़िंदगी में ऐसा मोड़ आया, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था।

     

    मेरे परिवार को हमारी दोस्ती के बारे में पता चल गया।

     

    और फिर सवाल मेरी दोस्ती का नहीं, परिवार की सोच का बन गया।

     

    मेरे घर में यह बात स्वीकार नहीं थी कि मैं किसी लड़की से इस तरह बात करूँ, उससे इतनी गहरी दोस्ती रखूँ और उसके साथ अपना इतना समय बाँटूँ।

     

    मुझे समझाया गया।

     

    रोका गया।

     

    और आखिरकार मुझसे कहा गया कि मुझे उससे बात करना बंद करना होगा।

     

    मैंने बहुत कुछ कहना चाहा।

     

    बहुत कुछ समझाना चाहा।

     

    मैं कहना चाहती थी कि वह सिर्फ़ एक ऑनलाइन दोस्त है।

     

    कि इस रिश्ते में कुछ गलत नहीं है।

     

    कि उसने कभी मेरा बुरा नहीं चाहा।

     

    कि वह मेरे लिए बहुत खास है।

     

    लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनके सामने हमारी आवाज़ बहुत छोटी पड़ जाती है।

     

    मैं चाहकर भी उसे सब कुछ नहीं बता पाई।

     

    सबसे ज्यादा दर्द इस बात का था कि वह शायद मेरा इंतज़ार कर रही होगी।

     

    शायद उसे लग रहा होगा कि मैं अचानक क्यों बदल गई?

     

    कल तक जो इंसान घंटों बातें करता था, आज उसके पास दो शब्द बोलने का वक्त क्यों नहीं?

     

    वह शायद मेरे संदेश का इंतज़ार करती रही होगी।

     

    शायद बार-बार अपना इनबॉक्स खोलती होगी।

     

    शायद उसने सोचा होगा कि मुझसे कोई गलती हो गई।

     

    और मैं…

     

    मैं चाहकर भी उसे सच नहीं बता पा रही थी।

     

    कितनी अजीब मजबूरी थी।

     

    मैं उससे बात करना चाहती थी, लेकिन कर नहीं सकती थी।

     

    मैं उसे कारण बताना चाहती थी, लेकिन बता नहीं सकती थी।

     

    मैं उसे यह कहना चाहती थी कि—

     

    “मैं तुमसे दूर अपनी मर्ज़ी से नहीं जा रही हूँ।”

     

    लेकिन मेरे होंठों तक ये शब्द कभी पहुँच ही नहीं पाए।

     

    दिन बीतते गए।

     

    फिर हफ्ते।

     

    और धीरे-धीरे हमारी बातचीत पूरी तरह बंद हो गई।

     

    लेकिन एक चीज़ बंद नहीं हुई—

     

    मेरी यादें।

     

    आज भी कभी-कभी कोई खूबसूरत बात पढ़ती हूँ तो उसकी याद आ जाती है।

     

    किसी की लिखी हुई कोई पंक्ति दिल को छू जाए तो लगता है, जैसे वह सामने बैठी हो और कह रही हो—

     

    “देखो, यह पंक्ति कितनी अच्छी है।”

     

    कभी मोबाइल हाथ में लेकर पुरानी बातचीत देखने का मन करता है।

     

    पुराने संदेश पढ़ती हूँ।

     

    कुछ शब्दों पर मुस्कुराती हूँ।

     

    कुछ बातों पर आँखें नम हो जाती हैं।

     

    और फिर खुद से एक ही सवाल करती हूँ—

     

    “क्या उसे कभी पता चलेगा कि मैं उससे दूर क्यों हुई थी?”

     

    शायद नहीं।

     

    शायद वह आज भी मुझे गलत समझती होगी।

     

    शायद उसे लगता होगा कि मैंने उसे भुला दिया।

     

    लेकिन सच यह है कि कुछ लोगों को भुलाया नहीं जाता।

     

    वे बस हमारी ज़िंदगी से दूर हो जाते हैं।

     

    उनकी जगह कोई और नहीं लेता।

     

    वे हमारे साथ नहीं होते, फिर भी हमारी यादों में हमेशा रहते हैं।

     

    आज मेरे पास उससे बात करने का कोई रास्ता नहीं है।

     

    मेरे पास उसके साथ बिताए हुए नए पल नहीं हैं।

     

    मेरे पास उसके संदेशों का इंतज़ार नहीं है।

     

    मेरे पास रोज़ की वो बातें नहीं हैं, जिनके बिना कभी दिन पूरा नहीं होता था।

     

    मेरे पास अगर कुछ है…

     

    तो बस उसकी यादें हैं।

     

    कुछ अधूरी बातें।

     

    कुछ पुराने संदेश।

     

    कुछ मुस्कुराहटें।

     

    और एक ऐसा रिश्ता, जिसका अंत कभी हमने तय ही नहीं किया था।

     

    कभी-कभी सोचती हूँ, काश उस दिन मैं उसे सब बता पाती।

     

    काश मैं बस इतना कह पाती—

     

    “मुझसे नाराज़ मत होना… मैं तुम्हें छोड़ नहीं रही, बस हालात मुझे तुमसे दूर कर रहे हैं।”

     

    शायद वह समझ जाती।

     

    शायद नहीं भी समझती।

     

    लेकिन कम से कम मेरे दिल पर यह बोझ तो नहीं रहता कि मैंने उसे बिना वजह छोड़ दिया।

     

    अब जब कभी मैं कुछ लिखती हूँ, तो मेरी हर कहानी में कहीं न कहीं उसका ज़िक्र आ ही जाता है।

     

    नाम नहीं लिखती…

     

    क्योंकि कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते।

     

    बस एहसास होते हैं।

     

    और वह एहसास आज भी मेरे भीतर ज़िंदा है।

     

    लोग अक्सर कहते हैं कि ऑनलाइन बने रिश्ते ज्यादा दिनों तक नहीं चलते।

     

    मैं उनसे बस इतना कहना चाहती हूँ—

     

    रिश्ता ऑनलाइन था, लेकिन एहसास बिल्कुल असली थे।

     

    दूरी ऑनलाइन थी, मगर अपनापन बिल्कुल सच्चा था।

     

    हम कभी मिले नहीं थे, फिर भी उसने मेरे दिल में एक ऐसी जगह बना ली, जहाँ आज भी कोई दूसरा नहीं पहुँच पाया।

     

    शायद हमारी कहानी अधूरी है।

     

    शायद हमारी दोस्ती का आखिरी पन्ना बहुत जल्दी बंद हो गया।

     

    लेकिन हर अधूरी कहानी बेकार नहीं होती।

     

    कुछ अधूरी कहानियाँ हमें उम्र भर याद रहती हैं।

     

    और मेरी कहानी भी उन्हीं में से एक है।

     

    आज वह मेरे साथ नहीं है।

     

    हमारी बातें नहीं होतीं।

     

    एक-दूसरे की खबर नहीं मिलती।

     

    लेकिन जब कभी कोई पूछता है—

     

    “क्या तुम्हारी ज़िंदगी में कभी कोई ऐसा इंसान आया था, जिसे तुमने खोना नहीं चाहा?”

     

    तो मेरे पास उस सवाल का जवाब आज भी है।

     

    हाँ…

     

    एक दोस्त थी।

     

    ऑनलाइन मिली थी।

     

    मेरी तरह लिखती थी।

     

    मेरी बातों को समझती थी।

     

    मेरी खामोशियों को पढ़ लेती थी।

     

    और फिर एक दिन हालात ने उसे मुझसे छीन लिया।

     

    मैं उसे रोक नहीं पाई।

     

    उसे अपना सच बता नहीं पाई।

     

    लेकिन शायद वह यह कभी जान पाए…

     

    कि मैंने उसे भुलाया नहीं था।

     

    मैंने बस उसे अपनी यादों में रख लिया था।

     

    और कुछ लोग ज़िंदगी से चले जाने के बाद भी कहाँ जाते हैं?

     

    वे हमारे अंदर कहीं बस जाते हैं।

     

    वह भी आज मेरी ज़िंदगी में नहीं है…

     

    मगर मेरी हर उस कहानी में है,

     

    जिसे लिखते हुए मेरी आँखें नम हो जाती हैं।

     

    क्योंकि मेरे पास अब उससे जुड़ी कोई नई बात नहीं है…

     

    बस पुरानी यादें हैं।

     

    और शायद यही हमारी दोस्ती की सबसे खूबसूरत बात है—

     

    हमारी कहानी खत्म हो गई,

     

    लेकिन मेरी यादों में…

     

    हमारी दोस्ती आज भी जारी है।

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 🐦 नन्ही चिड़िया और बारिश की बूँद 🌧️

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    एक घने जंगल में चिंकी नाम की एक नन्ही चिड़िया रहती थी। वह बहुत प्यारी और चंचल थी, लेकिन उसे अपनी छोटी-सी ताकत पर बिल्कुल भरोसा नहीं था।

     

    एक दिन जंगल में बहुत तेज़ बारिश हुई। बारिश इतनी ज़ोरदार थी कि पेड़ों की डालियाँ हिलने लगीं। चिंकी डरकर अपने घोंसले में छिप गई।

     

    बारिश रुकने के बाद उसने देखा कि एक छोटी-सी चींटी पानी की धारा में फँस गई है।

     

    चींटी चिल्लाई,

    “बचाओ! कोई मेरी मदद करो!”

     

    चिंकी ने सोचा,

    “मैं तो इतनी छोटी हूँ। मैं इसे कैसे बचा सकती हूँ?”

     

    फिर उसने हिम्मत जुटाई। उसने अपनी चोंच से एक छोटा-सा पत्ता उठाया और उसे चींटी के पास पानी में डाल दिया।

     

    चींटी किसी तरह उस पत्ते पर चढ़ गई और बहते-बहते किनारे तक पहुँच गई।

     

    चींटी ने मुस्कुराकर कहा,

    “धन्यवाद चिंकी! तुमने मेरी जान बचा ली।”

     

    चिंकी बहुत खुश हुई। उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा,

    “मैं छोटी जरूर हूँ, लेकिन किसी के काम तो आ सकती हूँ!”

     

    कुछ दिनों बाद जंगल में एक शिकारी आया। उसने चिंकी को पकड़ने के लिए जाल बिछाया। चिंकी जैसे ही जाल के पास पहुँची, चींटी ने उसे देख लिया।

     

    चींटी तुरंत अपने साथियों को बुलाकर आई। सभी चींटियों ने मिलकर शिकारी के पैरों पर काटना शुरू कर दिया। शिकारी घबरा गया और वहाँ से भाग गया।

     

    चिंकी की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

     

    वह बोली,

    “आज समझ आया कि छोटी-सी मदद भी कभी बेकार नहीं जाती।”

     

    चींटी मुस्कुराई और बोली,

    “और सच्ची दोस्ती में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता।”

     

     सीख:

     

    हमें कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि हम छोटे हैं या हमारी मदद छोटी है। सच्चे मन से की गई छोटी-सी मदद भी किसी के लिए बहुत बड़ी बन सकती है। 

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • तेरी यादों में हर रात, चुपके से रो लेते हैं,

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तेरी यादों में हर रात, चुपके से रो लेते हैं,

    दर्द कितना भी हो दिल में, तेरा नाम लेकर सो लेते हैं।

    तू लौट आए तो शायद फिर से जीना सीख जाएँ,

    वरना तेरे बिना हम हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा खो लेते हैं। 

    ।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • शामिल

    शामिल

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    शामिल था वो किसी और के दिल में,

    फिर मेरे दिल में घर क्यों बनाने लगा?

    जब छोड़कर ही जाना था उसे,

    तो मेरे ख़्वाब क्यों सजाने लगा?

    जाते-जाते ऐसा अँधेरा कर गया,

    कि इस दिल में अब कोई रौशनी नहीं बची।

    घर तो आज भी उसी का है,

    मगर अफ़सोस…

    अब इस घर में मैं भी नहीं बचा।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • Online dosti

    Online dosti

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    हेल्लो दोस्तों…

     

    आज मैंने एक ऑनलाइन प्यार वाली कहानी पढ़ी। कहानी खत्म हुई तो पता नहीं क्यों, मुझे भी किसी की याद आ गई।

     

    प्यार क्या होता है, ये तो आज तक मुझे नहीं पता। शायद मैंने कभी किसी से प्यार किया भी नहीं। लेकिन हाँ… एक दोस्त ज़रूर ऐसा मिला, जिसकी याद आज भी मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। इसलिए आज मैं अपनी ही एक ऑनलाइन दोस्त की कहानी लिख रही हूँ।

     

    ये कहानी शुरू होती है लगभग तीन साल पहले… 21 – सावन 2023 से उस समय मैंने पहली बार कहानियाँ लिखना शुरू किया था। लिखने का बहुत शौक था, लेकिन लिखना उतना अच्छा नहीं आता था। शब्दों में ढेर सारी गलतियाँ होती थीं। कई बार तो खुद अपनी कहानी दोबारा पढ़ती, तो लगता कि पता नहीं लोग इसे पढ़ते भी कैसे होंगे।

     

    लगभग तीन महीने बाद मुझे एक इंस्टाग्राम ग्रुप में पता चला कि प्रतिलिपि जैसा भी एक ऐप है। उस समय लफ्ज़ो की कहानी ऐप नहीं आई थी और मैं पॉकेट नोबेल पर लिखना शुरू किया था। उसके बाद में प्रतिलिप पर लिखना शुरू किया।

     

    जो लोग मुझे शुरू से जानते होंगे, उन्हें ये तो पता होगा कि मेरी स्टोरी में गलती कितनी होती थी। लेकिन शायद किस्मत को यही मंज़ूर था कि मेरी वही गलतियाँ मुझे मेरी ज़िंदगी के सबसे खास ऑनलाइन दोस्त से मिलवा दें।

     

    एक दिन मैं प्रतिलिपि पर अपनी कहानी लिख रही थी। तभी अचानक मेरे inbox में एक मैसेज आया।

     

    मुझे थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि उस समय कोई भी सीधे inbox में मैसेज नहीं करता था। मैंने मैसेज खोला।

     

    उसने सबसे पहले लिखा था,

    “sorry में आपको inbox में मैसेज कर रहा हु”

     

    मैं कुछ देर तक बस स्क्रीन को देखती रही। फिर मैंने जवाब दिया, “कोई बात नहीं” और inbox बंद करने लगी। तभी उसका दूसरा मैसेज आया।

     

    “आप की स्टोरी बहुत अलग है और अच्छी है पर कुछ जगह गलती है आप डालने से पहले चेक कर लीजिए गा। मैं ये बात कमेंट में भी बोल देता पर वह बोलता तो लोग आपकी स्टोरी को गलत कहने लगते पर आपकी स्टोरी बहुत अच्छी है।”

     

    उसका मैसेज पढ़कर मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा। क्योंकि उसने मेरी कमी बताई थी, लेकिन मेरा आत्मविश्वास नहीं तोड़ा था। उसने मेरी गलती सबके सामने नहीं, बल्कि अकेले में बताई थी।

     

    मैंने बस “थैंक यू” कहा और “सॉरी” भी बोलकर निकल गई।

    असल में उस समय मेरे घर में शादी होने वाली थी। पूरे घर में मेहमान थे। हर तरफ भागदौड़ थी। इसलिए मैं किसी से ज़्यादा बात नहीं करती थी।

     

    लेकिन उसके बाद एक चीज़ रोज़ होने लगी। जब भी मैं प्रतिलिपि खोलती, उसका एक मैसेज ज़रूर होता। “आज का एपिसोड अच्छा था” और मैं हर बार बस “thank you” बोल देती।

     

    एक दिन उसने कहा, “मेरी स्टोरी भी पढ़ना में राइटर नहीं हु बस कभी लिखने का मन होता है तो लिख लेतीहु”

     

    मैंने उसकी कहानी पढ़ी। फिर कभी मेरी कहानी की बातें होतीं… कभी उसकी कहानी की… और धीरे-धीरे हमारी बातें बढ़ने लगीं।

     

    मुझे पता चला कि वो गुजरात से था और मैं बिहार से। दो अलग-अलग राज्यों के दो बिल्कुल अनजान लोग… जिन्हें शायद कभी मिलना भी नहीं था।

     

    लेकिन दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी। एक दिन उसने कहा,

    “लिपि पर ऑनलाइन का पता नहीं चलता है क्या आपका इंस्ट्राग्राम id है”

     

    मैंने बिना ज़्यादा सोचे अपना इंस्टाग्राम आईडी दे दिया। बस… शायद वहीं से हमारी असली दोस्ती शुरू हुई। अब हमारी सुबह गुड मॉर्निंग से होती और रात गुड नाइट पर खत्म होती।

     

    या यूँ कहूँ… खत्म ही नहीं होती थी। क्योंकि रात के दो-दो, तीन-तीन बजे तक बातें चलती रहती थीं। कभी कहानी…

    कभी सपने… कभी बचपन… कभी भविष्य… तो कभी बिल्कुल बेकार की बातें।

     

    लेकिन मज़े की बात ये थी कि हमें उन बेकार की बातों में भी बहुत मज़ा आता था। उसी दौरान मेरे घर में भाई की शादी थी।

     

    हर समय कोई ना कोई मेहमान घर में रहता था। मेरे हाथ में फोन देखकर कभी पापा डाँट देते कभी भैया कुछ बोल देते।

     

    मैं भी गुस्से में इंस्टाग्राम पर नोट डाल दिया, “मुझे कोई मैसेज नहीं करेगा में इंट्रा छोड़ कर जा रही हु” असल में वो मैसेज मैंने इंस्टाग्राम ग्रुप के लिए डाला था।

     

    लेकिन जैसे ही उसने वो नोट पढ़ा वो परेशान हो गया। उसे लगा कि शायद उसकी वजह से मैं इंस्टाग्राम छोड़ रही हूँ।

     

    उसने लगातार मैसेज करने शुरू कर दिए। कॉल भी किए।

    जब रात में पापा सो गए, तब मैंने मम्मी से फोन लिया।

    कम से कम कहानी तो लिखनी थी। मैंने जैसे ही इंस्टाग्राम खोला इतने सारे मैसेज इतनी सारी मिस्ड कॉल…

     

    कि आज भी गिन नहीं सकती। मैंने उसे पूरी बात बताई कि आखिर हुआ क्या था। तब जाकर वो शांत हुआ।

     

    उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मेरी दोस्ती किसी के लिए इतनी मायने रखती है।

     

    फिर आया वो दिन जिस दिन मेरे भैया की हल्दी थी। और उसी दिन उसका जन्मदिन भी था। उसने मुझे पहले ही बता दिया था। लेकिन घर में इतने मेहमान इतनी भागदौड़ थी कि मैं भूल गई।

     

    रात के लगभग ग्यारह बजे जब मैं ऑनलाइन आई तब मुझे याद आया। मैंने तुरंत उसे “sorry” बोला। लेकिन मुझे पता था ग्यारह से बारह के बीच उसका डिनर करने का समय होता था।

     

    उसने मेरे सॉरी का कोई जवाब नहीं दिया। मैं परेशान हो गई।

    लगभग तीस मिनट तक लगातार “सॉरी” बोलती रही। साथ में एक अच्छा सा happy birthday wishes भी लिखा।

     

    और 11:30 बजे भेज दिया। लेकिन उसने 11:57 पर जाकर देखा। और आखिरकार मान गया। उस दिन मेरी जान में जान आई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती और गहरी होती चली गई।

     

    कभी स्टोरी की बातें कभी इधर-उधर की बातें तो कभी हम truth or dare खेलते। कभी घंटों हँसते तो कभी बिना वजह एक-दूसरे को चिढ़ात और झगड़ा वो तो पूछो ही मत ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरता था जब में झगड़ती नहीं थी।

     

    देखते ही देखते दो साल कब बीत गए पता ही नहीं चला।

    हाँ एक बार मैं उसका जन्मदिन भूल गई थी। वो बहुत नाराज़ हो गया था। लेकिन मज़ेदार की बात ये है कि तीन साल में उसे मेरा जन्मदिन एक बार भी याद नहीं रहा।

     

    दो बार तो मेरा इंस्टाग्राम नोट और स्टोरी देखकर उसे याद आया। जब मैं नाराज़ होती तो वो बस इतना बोल देता, “मुझे याद तो आया पर तुम तो भूल ही गई थी।”

     

    अब क्या ही जवाब दूँ मैं जनाब को। और इस साल उसने विश भी नहीं किया। शायद अब बातें पहले जैसी नहीं रहीं।

    लगभग एक साल पहले मैं बीमार थी।

     

    और उसी समय उसकी नई जॉब भी शुरू हो गई। वो अपने काम में व्यस्त रहने लगा। हमारी बातें कम होने लगीं। पहले जहाँ हर छोटी बात शेयर होती थी…

     

    अब पूरे-पूरे दिन निकल जाते थे। धीरे-धीरे ये दूरी इतनी बढ़ गई कि जो दोस्त कभी बिना Good Morning के दिन शुरू नहीं करते थे और बिना रात के दो या तीन बजे Good Night बोले सोते नहीं थे…

     

    आज वही दोस्त सिर्फ एक-दूसरे की रील देखकर आगे बढ़ जाते हैं। पहले ऐसा होता था रात के बारह बजे Good Night बोलते। फिर कोई नई बात याद आ जाती और फिर बातें शुरू हो जातीं।

     

    फिर दोबारा Good Night। फिर हँसी, फिर कोई नया किस्सा। और पता ही नहीं चलता था कि कब रात के तीन बज गए।

     

    लेकिन अब बस एक रील भेज देते हैं। सामने वाला देख ले तो ठीक न देखे तो भी ठीक। कभी किसी रील पर हँसने वाली इमोजी भेज दी…

     

    बस वहीं बात खत्म। जब वो अपनी नई नौकरी में बिज़ी हुआ तब उसने मुझसे सिर्फ इतना कहा था, “तुम्हे जब भी बात करने का मन हो बात कर लेना”

     

    आज तक मुझे समझ नहीं आया वो कहना क्या चाहता था?

    क्या उसे सच में मेरी दोस्ती चाहिए थी? या फिर वो सिर्फ औपचारिकता निभा रहा था? मैं तो दोस्त से बात करना चाहती थी।

     

    लेकिन क्या सिर्फ मैं ही बात करना चाहती थी? क्या उसका मन नहीं करता था मुझसे बात करने का? शायद इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे।

     

    उस दिन के बाद मैंने खुद से मैसेज करना लगभग बंद कर दिया। कभी-कभी कर देती थी लेकिन अब नहीं। हाँ रील्स आज भी भेज देती हूँ।

     

    शायद इसलिए कि कहीं न कहीं दोस्ती अभी भी बाकी है।

    कुछ दिन पहले मैंने उसे एक रील भेजी। कई दिनों बाद उसका टेक्स्ट आया।

     

    इतने दिनों बाद उसका मैसेज देखकर मैं सच में बहुत खुश हो गई। इतनी खुश कि समझ ही नहीं आया क्या जवाब दूँ।

     

    दिल बहुत कुछ लिखना चाहता था। पूछना चाहता था कि कैसे हो? इतने दिन कहाँ थे? याद आती है क्या हमारी पुरानी बातें?

     

    लेकिन उँगलियाँ कुछ भी नहीं लिख पाईं। और मैंने बस 🤣🤣 ये वाली इमोजी भेज दी।

     

    शायद इसलिए क्योंकि कभी-कभी इमोजी वो बातें कह देते हैं, जिन्हें शब्द नहीं कह पाते।

     

    आज भी जब पुरानी चैट पढ़ती हूँ तो लगता है जैसे वो दिन किसी और दुनिया के थे। जहाँ वक्त बहुत था बातें बहुत थीं हँसी बहुत थी और उम्मीदें भी एक दूसरे का ऑनलाइन आने का इंतजार बहुत थी 

     

    अब न शिकायत है न कोई गिला। बस एक खूबसूरत याद है।

    तो अब आप ही बताइए इसे ऑनलाइन प्यार कहेंगे या दोस्ती या फिर कुछ भी नहीं?

     

    मुझे आज भी नहीं पता। लेकिन मेरे लिए वो हमेशा मेरा एक बहुत अच्छा ऑनलाइन दोस्त रहेगा।

     

    कुछ रिश्तों को नाम देने की ज़रूरत नहीं होती है। वो बस यादों में रह जाते हैं और जब भी याद आते हैं चेहरे पर एक छोटी-सी मुस्कान छोड़ जाते हैं।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • आवाज़

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

     “

    गाँव का नाम था “शिवपुर” — एक साधारण सा गाँव, जहाँ की मिट्टी में अनाज कम और चुप्पी ज़्यादा उगती थी। यह चुप्पी सदियों से वहाँ के लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी थी। वे अन्याय सहते थे, लेकिन उसका विरोध नहीं करते थे। ज़मींदार की लाठी और सरपंच के हुक्म ने लोगों की रीढ़ को इतना झुका दिया था कि कोई सिर उठाने का साहस ही नहीं करता।

    लेकिन एक दिन शिवपुर की मिट्टी ने एक नई कहानी लिखी  विरोध की कहानी।

    बिंदु, एक 22 वर्षीय युवती, शिवपुर के स्कूल में अस्थायी शिक्षिका थी। शहर से पढ़कर लौटी थी, पिता की इच्छा के कारण। माँ पहले ही नहीं रही थी, और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी। बिंदु ने किताबों से जो रोशनी पाई थी, वह उसे गाँव के अंधेरों में बाँटना चाहती थी।

    पर गाँव में पढ़ाई का मतलब था—लड़कियाँ बस नाम भर स्कूल आएँ, लड़के इधर-उधर बैठकर समय बिताएँ और शिक्षक अनुपस्थित रहें। स्कूल भवन खंडहर था, और किताबें सिर्फ रिकॉर्ड में थीं।

    बिंदु ने देखा कि यहाँ शिक्षा नहीं, केवल दिखावा था।

    एक दिन बिंदु ने गाँव के सरपंच, रघुवीर सिंह, से मिलकर स्कूल की दशा सुधारने की बात कही। रघुवीर ने मुस्कराकर कहा, “बिटिया, बहुत सोचती हो। यह गाँव है, शहर नहीं। यहाँ सब ऐसे ही चलता है।”

    बिंदु ने नम्रता से कहा, “अगर कुछ बदला नहीं गया, तो अगली पीढ़ी भी ऐसे ही अंधेरे में जिएगी।”

    रघुवीर की आँखें लाल हो गईं, “तू अपने काम से काम रख। ये सुधार-उधार तेरे बस की बात नहीं।”

    पर बिंदु चुप नहीं हुई। उसने स्कूल की तस्वीरें लीं, बच्चों के साथ बातचीत की, और ये सब सोशल मीडिया पर डाला। उसने ज़िला शिक्षा अधिकारी को शिकायत भेजी।

    यह पहला विरोध था — एक शिक्षिका का सिस्टम के खिलाफ आवाज़ उठाना।

    बिंदु के विरोध की खबर पूरे गाँव में फैल गई। कुछ लोगों ने उसे ‘बदतमीज़’ कहा, कुछ ने कहा ‘शहर से पढ़कर आई है, अकड़ दिखा रही है’। उसके पिता को पंचायत में बुलाया गया, उन्हें चेतावनी दी गई कि बेटी को काबू में रखें।

    घर में तनाव बढ़ गया। पिता ने बिंदु से कहा, “बिटिया, तू क्यों झगड़े में पड़ती है? हमें शांति से जीना है।”

    बिंदु ने कहा, “बाबा, चुप रहने से कुछ नहीं बदलेगा। कोई तो बोले, कोई तो लड़े।”

    पिता ने सिर झुका लिया। वे जानते थे कि बेटी सही कह रही है, पर डर की बेड़ियाँ उन्हें बाँधे रखती थीं।

    बिंदु का असर स्कूल के बच्चों पर पड़ने लगा। कुछ लड़कियाँ अब नियमित आने लगीं। एक दिन, मीरा नाम की लड़की ने कहा, “दीदी, क्या मैं भी आपकी तरह मास्टरनी बन सकती हूँ?”

    बिंदु मुस्कराई, “क्यों नहीं? पर पहले तुम्हें डर से लड़ना होगा।”

    मीरा का पिता शराबी था, और लड़कियों को पढ़ाना पाप समझता था। एक दिन उसने मीरा को स्कूल जाते हुए पीटा। बिंदु को पता चला तो वह मीरा के घर गई और उसका विरोध किया। मोहल्ले के लोग इकट्ठे हो गए

    बिंदु ने पहली बार खुलकर भीड़ से कहा:

    “हर बार चुप रहकर हमने औरत को बंदी बनाया है। क्या एक लड़की पढ़कर गाँव को रोशन नहीं कर सकती?”

    लोग चुप थे, पर इस बार उनकी चुप्पी में हलचल थी।

    रघुवीर सिंह को यह सब बर्दाश्त नहीं था। वह शिक्षा विभाग के लोगों को रिश्वत देता था, स्कूल के फंड हड़पता था। बिंदु उसके लिए खतरा बन गई थी। उसने अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं — “बिंदु शहर से बदनाम होकर आई है”, “वह गाँव की लड़कियों को बिगाड़ रही है।”

    एक रात, बिंदु के घर की दीवार पर कालिख पोत दी गई, “शहर वापस जा, नहीं तो अंजाम बुरा होगा।”

    बिंदु डरी, पर टूटी नहीं। उसने पुलिस में शिकायत की, पर कोई सुनवाई नहीं हुई।

    बिंदु अब अकेली नहीं थी। मीरा, उसकी सहेलियाँ, कुछ नौजवान लड़के — सब उसके साथ आ गए। उन्होंने गाँव में पहली बार एक खुली बैठक रखी। इसमें बिंदु ने सबूतों के साथ बताया कि स्कूल का पैसा कैसे हड़प लिया गया।

    लोगों ने पहली बार विरोध में नारे लगाए:

    “अन्याय नहीं सहेंगे”,

    “शिक्षा का हक़ माँगेंगे।”

    रघुवीर सिंह चिढ़ गया। उसने गुंडों को भेजा, बिंदु को डराने के लिए। लेकिन इस बार पूरा गाँव उसकी रक्षा में खड़ा हो गया। महिलाओं ने लाठियाँ उठाईं, बुजुर्गों ने कहा, “अब बहुत हो गया।”

    जिला अधिकारी को दोबारा शिक़ायत भेजी गई, मीडिया को बुलाया गया। इस बार बिंदु के पास गाँव की आवाज़ थी। जब कैमरे गाँव पहुँचे, तो बिंदु ने सबके सामने कहा:

    “ये सिर्फ मेरा विरोध नहीं है। यह हर उस लड़की की आवाज़ है, जिसे चुप रहने को कहा गया। यह हर उस माँ का प्रतिकार है, जिसने अपनी बेटी को स्कूल भेजने का सपना देखा।”

    जाँच हुई। रघुवीर सिंह पकड़ा गया, स्कूल के फंड में घोटाला साबित हुआ। उसे पद से हटाया गया। स्कूल को नए शिक्षक मिले, भवन की मरम्मत शुरू हुई।

    बिंदु को सरकार ने सम्मानित किया, लेकिन वह शिवपुर नहीं छोड़ी। उसने एक लाइब्रेरी शुरू की, नाम रखा — “आवाज़।”

    मीरा अब स्कूल की टॉपर थी, और कहती थी, “मैं भी दीदी की तरह बनना चाहती हूँ — सवाल पूछने वाली।”

    गाँव में विरोध अब गुनाह नहीं, अधिकार बन चुका था। और यह सब हुआ एक लड़की के साहस से

    यह कहानी हमें यह सिखाती है कि विरोध सिर्फ ऊँची आवाज़ या झगड़ा नहीं होता — वह सच्चाई का साथ देना होता है। अगर एक आवाज़ उठे, तो कई जुड़ती हैं, और बदलाव की शुरुआत होती है।

     

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • “राजा जनक: सीता के मसीहा”

    “राजा जनक: सीता के मसीहा”

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    यह कहानी उस समय की है जब मिथिला भूमि पर धर्म, नीति और न्याय का दीप जलाने वाले राजा जनक का शासन था। वह केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक ऋषि, एक तत्वज्ञानी और एक संवेदनशील पिता भी थे। यह कथा उस महान क्षण की है जब उन्होंने न केवल एक पुत्री को अपनाया, बल्कि सम्पूर्ण नारी जाति की गरिमा को भी एक नई ऊँचाई दी

    मिथिला राज्य में लम्बे समय से अकाल पड़ा हुआ था। वर्षा नहीं हो रही थी, फसलें सूख रही थीं और प्रजा में निराशा फैल गई थी। राजा जनक, जो तप और ज्ञान में भी रुचि रखते थे, चिंतित थे कि यह अकाल क्यों पड़ा है। ज्योतिषियों और ऋषियों से परामर्श के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि भूमि को हल चलाकर यज्ञभूमि तैयार करनी होगी, जिससे देवताओं को संतोष मिले और वर्षा हो।

    राजा जनक स्वयं हल लेकर खेत में उतरे। जब वह हल चला रहे थे, तभी भूमि की कोख से एक सुंदर, तेजस्वी कन्या बाहर आई। कन्या की त्वचा कमल के फूल-सी कोमल थी, आँखें चंद्रमा-सी शीतल और स्वर वीणा के समान मधुर। यह कोई सामान्य बालिका नहीं थी।

    जनक ठिठक गए। कुछ क्षण के लिए समय थम-सा गया। उन्होंने कन्या को अपनी गोद में उठाया और जैसे ही उस कन्या ने उन्हें अपनी नन्ही बाहों से छुआ, जनक के हृदय में एक अलौकिक प्रेम जाग उठा। यह कन्या उन्हें केवल एक बालिका नहीं लगी, बल्कि देवी स्वरूप प्रतीत हुई।

    ऋषियों ने घोषणा की — “यह कन्या स्वयं धरती की पुत्री है। इसका नाम सीता होगा, क्योंकि यह हल (सीत) की नोक से प्रकट हुई है।”

    राजा जनक ने सीता को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। यद्यपि वह गोद ली हुई कन्या थी, किंतु जनक और रानी सुनयना ने उसमें अपनी आत्मा बसा दी। मिथिला में उस समय भी समाज की रूढ़ियों ने जड़ें जमा रखी थीं — कोई कन्या गोद ली जाए और राजकुमारी बनकर महल में रहे, यह सबके लिए अस्वाभाविक था।

    लेकिन जनक ने समाज की परवाह नहीं की। उन्होंने घोषणा की, “सीता केवल मेरी पुत्री नहीं, बल्कि मिथिला की भविष्य है। जो उसे छोटा समझेगा, वह मेरे न्याय और प्रेम को नहीं समझा।”

    सीता को उन्होंने शास्त्रों का ज्ञान, अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा और आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया। वह स्वयं विद्वान थे और विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम जैसे ऋषियों के सान्निध्य में सीता की परवरिश कराई। सीता धीरे-धीरे केवल सुंदर नहीं, बल्कि तेजस्वी, बुद्धिमती और धर्मनिष्ठ भी बन गईं।

    राजा जनक का यह विचार क्रांतिकारी था — जहाँ उस युग में स्त्रियों को केवल गृहकार्य और विवाह तक सीमित किया जाता था, जनक ने सीता को स्वतंत्रता, विचार और शिक्षा का अधिकार दिया।

    समय बीता। सीता युवा हुईं। अब राजसभा में यह विषय उठा कि उनके लिए योग्य वर की खोज की जाए। अनेक राजाओं और राजकुमारों के नाम आए, किंतु जनक का मानना था कि केवल कुल, वैभव और शक्ति से नहीं, बल्कि चरित्र, संयम और धर्म से ही कोई व्यक्ति सीता के योग्य हो सकता है।

    एक दिन जनक ने घोषणा की, “जो शिवधनुष को उठा सकेगा, वही सीता का पति होगा।” यह घोषणा पूरे आर्यावर्त में गूँज उठी। जनक जानते थे कि जो वास्तव में शक्तिशाली होगा, वही इस दिव्य धनुष को उठा सकेगा।

    कई राजा आए, धनुष देख कर लौट गए। कोई उसका भार नहीं सह पाया। तब अयोध्या से राम आए, विश्वामित्र के साथ। जब राम ने धनुष उठाया और तोड़ा, जनक की आँखों में अश्रु भर आए — यह खुशी के आँसू थे।

    उन्होंने सीता का हाथ राम के हाथ में देते हुए कहा, “आज मुझे विश्वास हुआ कि यह कन्या जिसे मैंने भूमि से पाया था, उस पुरुष को मिल गई है जो धर्म और मर्यादा का प्रतीक है।”

    शादी के बाद जब सीता अयोध्या चली गईं, तो जनक प्रसन्न भी थे और व्यथित भी। वह जानते थे कि राजपरिवारों में केवल प्रेम नहीं, राजनीति भी चलती है। एक पिता होने के नाते वह चिंतित रहते थे कि सीता पर कोई अन्याय न हो

    जब उन्हें यह समाचार मिला कि राम को वनवास हुआ है और सीता भी उनके साथ वन गई हैं, जनक का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने सीता को संदेश भेजा कि वह चाहे तो मिथिला लौट सकती है, किंतु सीता ने मना कर दिया।

    उसने उत्तर भिजवाया — “पिताजी, आपने मुझे आत्मबल और धर्म का पाठ पढ़ाया है। यदि आज मैं उस पर न चलूँ, तो यह शिक्षा व्यर्थ होगी।”

    जनक को गर्व हुआ, किंतु मन व्यथित रहा।

    पाँचवाँ भाग: अग्नि परीक्षा और जनक का हस्तक्षेप

    जब लंका विजय के बाद राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली, तो जनक तक यह समाचार पहुँचा। उनका हृदय टूट गया। उन्होंने अयोध्या में दूत भेजा और स्पष्ट कहा — “यदि सीता पर कोई लांछन है, तो वह मुझ पर है। क्योंकि वह केवल मेरी पुत्री ही नहीं, मेरी मर्यादा भी है। एक पिता को चुनौती मत दो, क्योंकि जब धर्म अधर्म के हाथों अपमानित होता है, तब वह जनक जैसे राजा को भी युद्ध के लिए विवश कर सकता है।”

    राम ने जनक के संदेश को समझा। उन्होंने सीता को पुनः सम्मानपूर्वक स्वीकार किया। जनक ने स्पष्ट किया, “राजा बनना आसान है, किंतु नारी के सम्मान की रक्षा करना कठिन है। और जो इसे न निभा पाए, वह राजा कहलाने योग्य नहीं।

    जब सीता ने अंत में धरती में समा जाने का निर्णय लिया, तब उन्होंने अंतिम बार जनक को स्वप्न में देखा। जनक ने मुस्कराते हुए कहा — “बेटी, तुम वापस अपनी माँ की गोद में जा रही हो। मैंने तुम्हें जिस धरती से पाया, उसी में समा जाना तुम्हारी महिमा है। तुम जनक की पुत्री थीं, अब तुम जननी बनकर समस्त स्त्री जाति के लिए प्रेरणा बन गई हो।”

    राजा जनक केवल एक राजा नहीं थे। वह एक विचार थे — नारी के सम्मान का, शिक्षा का, स्वतंत्रता का और पिता के रूप में सच्चे प्रेम का। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा ‘मसीहा’ वही होता है जो बिना समाज की परवाह किए, सत्य और न्याय का साथ दे।

    सीता ने धरती को अपनी माँ कहा, लेकिन जनक ने उसे एक नया जीवन, पहचान और सम्मान दिया। उन्होंने यह साबित किया कि किसी स्त्री का मसीहा वही होता है जो उसे उसके अस्तित्व और आत्मबल के साथ स्वीकार करे।

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    Lakshmi Kumari

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  • मेरी पहली कविता

    मेरी पहली कविता

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    याद है मुझे आज भी…

    याद है मुझे आज भी,
    मेरी वो पहली कविता।

    जब उसे लिखा था,
    तो कभी सोचा भी नहीं था
    कि मैं भी कुछ लिख सकती हूँ,
    अपने एहसासों को शब्दों में पिरो सकती हूँ।

    जब पहली बार उसे पढ़ा,
    तो दिल खुशी से भर गया था।
    ऐसा लगा जैसे मेरे मन की बातों को
    एक नई पहचान मिल गई हो।

    बड़ी उम्मीदों के साथ
    मैंने अपनी पहली कविता सबको दिखाई।

    सोचा था लोग उसके जज़्बात समझेंगे,
    उसमें छिपी भावनाओं को महसूस करेंगे।

    लेकिन तारीफ़ से ज़्यादा
    लोगों ने मेरी गलतियाँ गिनवा दीं।

    किसी ने शब्दों की कमी बताई,
    किसी ने लिखने का तरीका गलत कहा,
    और किसी ने ये तक कह दिया कि
    “तुमसे कविता नहीं लिखी जाएगी।”

    उन बातों ने दिल दुखाया,
    कुछ पल के लिए ऐसा लगा
    शायद सच में मैं लिख नहीं सकती।

    लेकिन फिर अगले ही दिन
    मैंने खुद से एक वादा किया।

    मैंने आईने में देखकर कहा—

    “नहीं… मैं हार नहीं मानूँगी।”

    जिसने मेरी गलतियाँ देखीं,
    मेरी भावनाएँ नहीं देखीं,
    एक दिन मैं उसे अपनी कलम की ताकत दिखाऊँगी।

    एक दिन ऐसा आएगा
    जब मेरी गलतियों की नहीं,
    मेरी कविताओं की बात होगी।

    लोग शब्दों की कमी नहीं,
    उनमें छिपे एहसासों को पढ़ेंगे।

    और जिस दिन ऐसा होगा,
    उन्हें मेरी पहली कविता भी याद आएगी।

    तब वे उसकी गलतियाँ नहीं,
    उसमें छिपे सपनों को याद करेंगे।

    उस मासूम कोशिश को याद करेंगे,
    जिसने एक लेखक को जन्म दिया था।

    क्योंकि हर बड़ी कहानी,
    हर बेहतरीन कविता,
    एक छोटी सी शुरुआत से ही जन्म लेती है।

     

    और मेरी शुरुआत…
    मेरी वही पहली कविता थी। ✍️❤️🌸

     

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    Lakshmi Kumari

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  • बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम,
    मेरी यादों का पूरा आसमान हो तुम।

    कभी बूंदों बनकर चुपके से बरस जाते हो,
    तो कभी यादों का सैलाब बन दिल में उतर आते हो।

    जब भी तुम्हारी याद आती है,
    चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान छा जाती है।

    बीते हुए लम्हे फिर से जी उठते हैं,
    और अधूरी ख्वाहिशें भी हौले से गुनगुनाने लगती हैं।

    लेकिन जब भी तुम्हें देखने का दिल करता है,
    आँखों में अनजाने ही आँसू भर आते हैं।

    तुम्हारी कमी का एहसास
    दिल को फिर से तन्हा कर जाता है।

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम,
    कभी सुकून तो कभी दर्द की बात जैसे हो तुम।

    मेरी हर दुआ, हर ख्वाब, हर एहसास में बसे हो,
    मेरी यादों के पूरे संसार जैसे हो तुम। ❤️🌹

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    Lakshmi Kumari

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  • ट्रेन में पहली मुलाकात

    ट्रेन में पहली मुलाकात

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    ट्रेन में पहली मुलाकात… आज तक याद है

     

    रात के लगभग नौ बजे थे। प्लेटफॉर्म पर हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। स्टेशन की भीड़, चाय वालों की आवाज़ें, बच्चों का शोर और ट्रेनों की सीटी… सब मिलकर एक अजीब-सा शोर बना रहे थे।

     

    रिया अपने सूटकेस के पास खड़ी बार-बार घड़ी देख रही थी।

     

    “हे भगवान! ट्रेन लेट ना हो बस…” उसने धीरे से खुद से कहा।

     

    उसे दिल्ली से मुंबई जाना था। नई नौकरी, नया शहर और नई जिंदगी उसकी राह देख रही थी। मगर उसके चेहरे पर खुशी से ज्यादा घबराहट थी।

     

    तभी पीछे से आवाज आई “मैडम, एक तरफ हो जाइए… ट्रेन आ रही है।”

     

    रिया जल्दी से किनारे हुई। सामने से राजधानी एक्सप्रेस धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी।

     

    वह अपना बैग संभालते हुए अंदर चढ़ गई।

     

    उसकी सीट खिड़की वाली थी। उसने राहत की सांस ली।

     

    “चलो… कम से कम सफर आराम से कट जाएगा।”

     

    वह बैठी ही थी कि तभी एक लड़का जल्दी-जल्दी डिब्बे में आया। उसके हाथ में बैग था और चेहरे पर हल्की घबराहट।

     

    “Excuse me… सीट नंबर 32?”

     

    रिया ने टिकट देखा। “वो सामने वाली है।”

     

    “ओह… थैंक गॉड! मुझे लगा ट्रेन छूट जाएगी।”

     

    लड़का बैठते हुए मुस्कुराया। रिया ने बस हल्का-सा सिर हिला दिया।

     

    कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी रही। फिर ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी।

     

    खिड़की के बाहर स्टेशन पीछे छूटता जा रहा था। तभी लड़के ने हाथ आगे बढ़ाया “वैसे… मैं आरव।”

     

    रिया ने थोड़ी झिझक के साथ हाथ मिलाया।

     

    “रिया।”

     

    आरव मुस्कुरा के बोला, “Nice name.”

     

    “Thanks.” रिया ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया। 

     

    फिर दोनों चुप।

     

    कुछ मिनट बाद चाय वाला आया।

     

    “चाय… चाय…”

     

    आरव ने पूछा, “आप लेंगी चाय?”

     

    “नहीं।” रिया ने मना कर दिया। 

     

    “पक्का?” आरव ने कन्फर्म किया। 

     

    “हम्म।” रिया ने बस सर हा में हिला दिया। 

     

    आरव ने दो चाय ले लीं।

     

    एक कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, “ये भारतीय ट्रेनों का नियम है… सफर में चाय जरूरी होती है।”

     

    रिया हँस पड़ी।“आप हर किसी से ऐसे ही बात करते हैं?”

     

    आरव चाय का एक शिप लेकर “नहीं… सिर्फ उनसे जिनका चेहरा बता देता है कि वो बहुत परेशान हैं।”

     

    रिया थोड़ा चौंकी, “मैं परेशान लग रही हूँ?”

     

    “थोड़ी।” आरव चाय पीते हुए खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। 

     

    रिया ने नजरें खिड़की की तरफ कर लीं।

     

    कुछ पल बाद बोली, “नई नौकरी है… पहली बार घर से इतनी दूर जा रही हूँ।”

     

    “ओह… इसलिए।” आरव चाय खत्म कर के कागज का ग्लास ट्रेन में रखे dasvin में डालते हुए कहा। 

     

    “और आप?” रिया ने पूछा। 

     

    “मैं मुंबई में ही रहता हूँ। ऑफिस के काम से दिल्ली आया था।”

     

    “मतलब आप मुंबई के बारे में सब जानते होंगे?” रिया खुश होकर पूछा। 

     

    आरव खिड़की से बाहर चांद को देखते हुए कहा, “इतना भी नहीं… लेकिन हाँ, वहाँ की बारिश और ट्रैफिक दोनों बहुत खतरनाक हैं।”

     

    रिया हल्का-सा मुस्कुराई। धीरे-धीरे बातचीत शुरू हो गई।

     

    कब दो घंटे गुजर गए, पता ही नहीं चला।

     

    आरव बहुत मजाकिया था। उसकी बातों में एक अजीब-सी गर्माहट थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह सालों से उसे जानती हो।

     

    रात गहरी होने लगी थी। डिब्बे की लाइटें धीमी हो चुकी थीं।

     

    रिया ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ने लगी तभी उसका पैर फिसल गया।

     

    “अरे… संभलिए!” आरव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    कुछ सेकंड के लिए दोनों की नजरें मिलीं। रिया का दिल अजीब-सी तेजी से धड़कने लगा।

     

    “थ… थैंक यू।”

     

    “इतनी जल्दी गिरने की आदत है क्या?”

     

    रिया मुस्कुराई। “नहीं… पहली बार हुआ।”

     

    “अच्छा है। वरना मुझे हर बार हीरो बनना पड़ता।”

     

    रिया हँस पड़ी। उस रात उसे नींद बहुत देर से आई।

     

    पता नहीं क्यों… मगर बार-बार उसका ध्यान सामने वाली सीट पर सोए आरव की तरफ जा रहा था।

     

    सुबह जब उसकी आंख खुली, तो ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर रुकी हुई थी।

     

    आरव खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था।

     

    उसने रिया को देखा और मुस्कुराया।

     

    “Good morning।”

     

    रिया बैठते हुए कहा, “गुड मॉर्निंग।”

     

    “कॉफी?” आरव ने पूछा

     

    “इतनी सुबह?” रिया खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। 

     

    “मुंबई वालों की सुबह कॉफी से ही शुरू होती है।” आरव काफी वाले को इशारे किया। 

     

    रिया मुस्कुराई। “ठीक है।”

     

    दोनों कॉफी पीते हुए बातें करने लगे।

     

    “वैसे… आपकी फैमिली में कौन-कौन है?” आरव ने पूछा।

     

    रिया खिड़की से बाहर सुबह की सोर देखते हुए कहा, “मम्मी-पापा और छोटा भाई।”

     

    आरव उसके चेहरे को देखते हुए पूछा, “आप सबसे ज्यादा किसके करीब हैं?”

     

    रिया कुछ पल चुप रही। “पापा।”

     

    आरव थोड़ा मुस्कुरा कर पूछा, “और वो आपको इतनी दूर भेजने के लिए मान गए?”

     

    रिया उसकी तरफ देख कर कहा, “नहीं… बहुत मुश्किल से माने। मैंने कहा… अगर इस बार रोक लिया ना… तो शायद मैं जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊँगी।”

     

    आरव उसे ध्यान से देखता रहा।

     

    “आप बहुत अलग हैं।”

     

    “अलग?”

     

    “हाँ… ज्यादातर लोग डर के आगे रुक जाते हैं। आप डर के बावजूद आगे बढ़ रही हैं।”

     

    रिया पहली बार किसी अजनबी की बात सुनकर इतना अच्छा महसूस कर रही थी।

     

    दोपहर तक दोनों की दोस्ती काफी अच्छी हो चुकी थी।

     

    वे साथ खाना खा रहे थे, साथ हँस रहे थे।

     

    पास बैठी आंटी तक मुस्कुराकर बोलीं, “लगता है सफर में अच्छी दोस्ती हो गई।”

     

    रिया थोड़ा झेंप गई।

     

    आरव हँसते हुए बोला “जी आंटी… ट्रेन वाली दोस्ती।”

     

    “बेटा… कुछ दोस्तियाँ ट्रेन से शुरू होकर जिंदगी तक चली जाती हैं।”

     

    आंटी की बात सुनकर दोनों कुछ पल चुप हो गए।

     

    शाम होने लगी थी।

     

    खिड़की के बाहर आसमान नारंगी रंग में रंग चुका था।

     

    रिया बाहर देखते हुए धीरे से बोली “मुझे ट्रेन का सफर बहुत पसंद है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इसमें लोग कुछ देर के लिए मिलते हैं… और फिर बिछड़ जाते हैं।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “हर कोई बिछड़ता नहीं।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब?”

     

    “मतलब… कुछ लोग दोबारा भी मिलते हैं।”

     

    “और अगर ना मिले तो?”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर धीरे से बोला “तो याद बन जाते हैं।”

     

    उसकी आवाज में कुछ ऐसा था… जो सीधे रिया के दिल में उतर गया।

     

    मुंबई आने में अब सिर्फ दो घंटे बचे थे। रिया को अचानक अजीब-सी बेचैनी होने लगी।

     

    उसे लग रहा था… यह सफर खत्म नहीं होना चाहिए।

     

    तभी आरव बोला “रिया… एक बात पूछूँ?”

     

    “हम्म?” रिया ने सर हिलाया

     

    “क्या हम दोस्त रह सकते हैं?” रिया मुस्कुराई। “इतनी जल्दी परमिशन मांग रहे हो?” 

     

    “क्योंकि कुछ लोग जल्दी अपने लगने लगते हैं।”

     

    रिया का दिल फिर तेज धड़कने लगा।

     

    उसने धीरे से कहा “हाँ… रह सकते हैं।”

     

    आरव ने तुरंत फोन निकाला। “तो नंबर दीजिए।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    “आप बहुत जल्दी करते हैं।”

     

    “ट्रेन में टाइम कम होता है।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    मुंबई स्टेशन आ चुका था।

     

    भीड़ तेजी से उतर रही थी।

     

    रिया अपना सामान संभाल रही थी।

     

    दिल अजीब-सा भारी हो गया था।

     

    स्टेशन पर उतरते ही आरव बोला “कैब बुक कर दूँ?”

     

    “नहीं… मैं कर लूँगी।”

     

    “पक्का?”

     

    “हाँ।”

     

    कुछ सेकंड दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर आरव मुस्कुराया।

     

    “तो… फिर मिलेंगे?”

     

    रिया ने भी मुस्कुराकर कहा “शायद।”

     

    “शायद नहीं… जरूर।”

     

    वह चला गया।

     

    रिया उसे जाते हुए देखती रही।

     

    पता नहीं क्यों… मगर उसकी आंखें उसी भीड़ में बस उसे ही ढूंढ रही थीं।

     

    उस रात नए फ्लैट में बैठी रिया बार-बार फोन देख रही थी।

     

    तभी मैसेज आया “घर पहुँच गई?”

     

    रिया मुस्कुरा दी।

     

    “हाँ।”

     

    “Good. और हाँ… ट्रेन वाली दोस्ती मत भूलना।”

     

    रिया ने जवाब दिया—

     

    “इतनी जल्दी नहीं भूलती मैं।”

     

    उस दिन के बाद दोनों रोज बात करने लगे।

     

    सुबह “Good morning” से शुरू होकर रात “सो जाओ अब” पर खत्म होती।

     

    धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे की आदत बन गए।

     

    एक दिन बारिश हो रही थी।

     

    रिया ऑफिस से बाहर निकली तो सामने आरव खड़ा था।

     

    “तुम यहाँ?”

     

    “कॉफी पीने चलें?”

     

    “इस बारिश में?”

     

    “मुंबई में बारिश रुकने का इंतजार करोगी तो जिंदगी निकल जाएगी।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    दोनों सड़क किनारे छोटी-सी दुकान पर कॉफी पीने लगे।

     

    बारिश की बूंदें, ठंडी हवा और आरव की बातें…

     

    रिया बस उसे देखती रह गई।

     

    “क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “तुम हर बार कैसे समझ जाते हो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि तुम्हारी आँखें सब बता देती हैं।”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    उस दिन पहली बार उसे एहसास हुआ… वह आरव से प्यार करने लगी है।

     

    मगर उसने कभी कहा नहीं।

     

    उसे डर था।

     

    अगर दोस्ती भी खत्म हो गई तो?

     

    समय गुजरता गया।

     

    एक दिन अचानक आरव का फोन बंद आने लगा।

     

    रिया परेशान हो गई।

     

    पूरा दिन, पूरी रात…

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    तीसरे दिन दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया ने दरवाजा खोला।

     

    सामने आरव खड़ा था।

     

    मगर उसके हाथ पर पट्टी बंधी थी।

     

    रिया घबरा गई।

     

    “ये क्या हुआ?!”

     

    आरव हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “छोटा-सा एक्सीडेंट था।”

     

    रिया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें अंदाजा है मैं कितनी डर गई थी?!”

     

    आरव उसे बस देखता रहा।

     

    “इतनी फिक्र करती हो मेरी?”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    आरव धीरे से बोला—

     

    “रिया… मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”

     

    रिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “क्या?”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “ट्रेन में पहली मुलाकात… आज तक याद है।”

     

    रिया की सांसें थम गईं।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “उस दिन जब तुम खिड़की के पास बैठी थी ना… तभी समझ गया था… फिर कोई और इस दिल को नहीं भाएगा।”

     

    रिया की आँखें भर आईं।

     

    “आरव…”

     

    “मैं सच में तुमसे प्यार करता हूँ।”

     

    रिया हँसते हुए रो पड़ी।

     

    “इतना टाइम लगा दिया बोलने में?”

     

    “डर ल

    गता था।”

     

    “मुझे भी।”

     

    “तो अब?”

     

    रिया ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब तो पूरी जिंदगी परेशान करूँगा।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    ठंडी हवा कमरे में आ रही थी।

     

    और रिया बस एक ही बात सोच रही थी—

     

    कुछ मुलाकातें सच में किस्मत लिखती हैं।

     

    क्योंकि ट्रेन में हुई वह पहली मुलाकात…

     

    आज भी उसकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद थी।

     

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇