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श्रेणी: ऑडियो कहानियां

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  • ट्रेन में पहली मुलाकात

    ट्रेन में पहली मुलाकात

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    ट्रेन में पहली मुलाकात… आज तक याद है

     

    रात के लगभग नौ बजे थे। प्लेटफॉर्म पर हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। स्टेशन की भीड़, चाय वालों की आवाज़ें, बच्चों का शोर और ट्रेनों की सीटी… सब मिलकर एक अजीब-सा शोर बना रहे थे।

     

    रिया अपने सूटकेस के पास खड़ी बार-बार घड़ी देख रही थी।

     

    “हे भगवान! ट्रेन लेट ना हो बस…” उसने धीरे से खुद से कहा।

     

    उसे दिल्ली से मुंबई जाना था। नई नौकरी, नया शहर और नई जिंदगी उसकी राह देख रही थी। मगर उसके चेहरे पर खुशी से ज्यादा घबराहट थी।

     

    तभी पीछे से आवाज आई “मैडम, एक तरफ हो जाइए… ट्रेन आ रही है।”

     

    रिया जल्दी से किनारे हुई। सामने से राजधानी एक्सप्रेस धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी।

     

    वह अपना बैग संभालते हुए अंदर चढ़ गई।

     

    उसकी सीट खिड़की वाली थी। उसने राहत की सांस ली।

     

    “चलो… कम से कम सफर आराम से कट जाएगा।”

     

    वह बैठी ही थी कि तभी एक लड़का जल्दी-जल्दी डिब्बे में आया। उसके हाथ में बैग था और चेहरे पर हल्की घबराहट।

     

    “Excuse me… सीट नंबर 32?”

     

    रिया ने टिकट देखा। “वो सामने वाली है।”

     

    “ओह… थैंक गॉड! मुझे लगा ट्रेन छूट जाएगी।”

     

    लड़का बैठते हुए मुस्कुराया। रिया ने बस हल्का-सा सिर हिला दिया।

     

    कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी रही। फिर ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी।

     

    खिड़की के बाहर स्टेशन पीछे छूटता जा रहा था। तभी लड़के ने हाथ आगे बढ़ाया “वैसे… मैं आरव।”

     

    रिया ने थोड़ी झिझक के साथ हाथ मिलाया।

     

    “रिया।”

     

    आरव मुस्कुरा के बोला, “Nice name.”

     

    “Thanks.” रिया ने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया। 

     

    फिर दोनों चुप।

     

    कुछ मिनट बाद चाय वाला आया।

     

    “चाय… चाय…”

     

    आरव ने पूछा, “आप लेंगी चाय?”

     

    “नहीं।” रिया ने मना कर दिया। 

     

    “पक्का?” आरव ने कन्फर्म किया। 

     

    “हम्म।” रिया ने बस सर हा में हिला दिया। 

     

    आरव ने दो चाय ले लीं।

     

    एक कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोला, “ये भारतीय ट्रेनों का नियम है… सफर में चाय जरूरी होती है।”

     

    रिया हँस पड़ी।“आप हर किसी से ऐसे ही बात करते हैं?”

     

    आरव चाय का एक शिप लेकर “नहीं… सिर्फ उनसे जिनका चेहरा बता देता है कि वो बहुत परेशान हैं।”

     

    रिया थोड़ा चौंकी, “मैं परेशान लग रही हूँ?”

     

    “थोड़ी।” आरव चाय पीते हुए खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। 

     

    रिया ने नजरें खिड़की की तरफ कर लीं।

     

    कुछ पल बाद बोली, “नई नौकरी है… पहली बार घर से इतनी दूर जा रही हूँ।”

     

    “ओह… इसलिए।” आरव चाय खत्म कर के कागज का ग्लास ट्रेन में रखे dasvin में डालते हुए कहा। 

     

    “और आप?” रिया ने पूछा। 

     

    “मैं मुंबई में ही रहता हूँ। ऑफिस के काम से दिल्ली आया था।”

     

    “मतलब आप मुंबई के बारे में सब जानते होंगे?” रिया खुश होकर पूछा। 

     

    आरव खिड़की से बाहर चांद को देखते हुए कहा, “इतना भी नहीं… लेकिन हाँ, वहाँ की बारिश और ट्रैफिक दोनों बहुत खतरनाक हैं।”

     

    रिया हल्का-सा मुस्कुराई। धीरे-धीरे बातचीत शुरू हो गई।

     

    कब दो घंटे गुजर गए, पता ही नहीं चला।

     

    आरव बहुत मजाकिया था। उसकी बातों में एक अजीब-सी गर्माहट थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह सालों से उसे जानती हो।

     

    रात गहरी होने लगी थी। डिब्बे की लाइटें धीमी हो चुकी थीं।

     

    रिया ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ने लगी तभी उसका पैर फिसल गया।

     

    “अरे… संभलिए!” आरव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    कुछ सेकंड के लिए दोनों की नजरें मिलीं। रिया का दिल अजीब-सी तेजी से धड़कने लगा।

     

    “थ… थैंक यू।”

     

    “इतनी जल्दी गिरने की आदत है क्या?”

     

    रिया मुस्कुराई। “नहीं… पहली बार हुआ।”

     

    “अच्छा है। वरना मुझे हर बार हीरो बनना पड़ता।”

     

    रिया हँस पड़ी। उस रात उसे नींद बहुत देर से आई।

     

    पता नहीं क्यों… मगर बार-बार उसका ध्यान सामने वाली सीट पर सोए आरव की तरफ जा रहा था।

     

    सुबह जब उसकी आंख खुली, तो ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर रुकी हुई थी।

     

    आरव खिड़की के पास बैठा बाहर देख रहा था।

     

    उसने रिया को देखा और मुस्कुराया।

     

    “Good morning।”

     

    रिया बैठते हुए कहा, “गुड मॉर्निंग।”

     

    “कॉफी?” आरव ने पूछा

     

    “इतनी सुबह?” रिया खिड़की से बाहर देखते हुए कहा। 

     

    “मुंबई वालों की सुबह कॉफी से ही शुरू होती है।” आरव काफी वाले को इशारे किया। 

     

    रिया मुस्कुराई। “ठीक है।”

     

    दोनों कॉफी पीते हुए बातें करने लगे।

     

    “वैसे… आपकी फैमिली में कौन-कौन है?” आरव ने पूछा।

     

    रिया खिड़की से बाहर सुबह की सोर देखते हुए कहा, “मम्मी-पापा और छोटा भाई।”

     

    आरव उसके चेहरे को देखते हुए पूछा, “आप सबसे ज्यादा किसके करीब हैं?”

     

    रिया कुछ पल चुप रही। “पापा।”

     

    आरव थोड़ा मुस्कुरा कर पूछा, “और वो आपको इतनी दूर भेजने के लिए मान गए?”

     

    रिया उसकी तरफ देख कर कहा, “नहीं… बहुत मुश्किल से माने। मैंने कहा… अगर इस बार रोक लिया ना… तो शायद मैं जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊँगी।”

     

    आरव उसे ध्यान से देखता रहा।

     

    “आप बहुत अलग हैं।”

     

    “अलग?”

     

    “हाँ… ज्यादातर लोग डर के आगे रुक जाते हैं। आप डर के बावजूद आगे बढ़ रही हैं।”

     

    रिया पहली बार किसी अजनबी की बात सुनकर इतना अच्छा महसूस कर रही थी।

     

    दोपहर तक दोनों की दोस्ती काफी अच्छी हो चुकी थी।

     

    वे साथ खाना खा रहे थे, साथ हँस रहे थे।

     

    पास बैठी आंटी तक मुस्कुराकर बोलीं, “लगता है सफर में अच्छी दोस्ती हो गई।”

     

    रिया थोड़ा झेंप गई।

     

    आरव हँसते हुए बोला “जी आंटी… ट्रेन वाली दोस्ती।”

     

    “बेटा… कुछ दोस्तियाँ ट्रेन से शुरू होकर जिंदगी तक चली जाती हैं।”

     

    आंटी की बात सुनकर दोनों कुछ पल चुप हो गए।

     

    शाम होने लगी थी।

     

    खिड़की के बाहर आसमान नारंगी रंग में रंग चुका था।

     

    रिया बाहर देखते हुए धीरे से बोली “मुझे ट्रेन का सफर बहुत पसंद है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इसमें लोग कुछ देर के लिए मिलते हैं… और फिर बिछड़ जाते हैं।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “हर कोई बिछड़ता नहीं।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब?”

     

    “मतलब… कुछ लोग दोबारा भी मिलते हैं।”

     

    “और अगर ना मिले तो?”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर धीरे से बोला “तो याद बन जाते हैं।”

     

    उसकी आवाज में कुछ ऐसा था… जो सीधे रिया के दिल में उतर गया।

     

    मुंबई आने में अब सिर्फ दो घंटे बचे थे। रिया को अचानक अजीब-सी बेचैनी होने लगी।

     

    उसे लग रहा था… यह सफर खत्म नहीं होना चाहिए।

     

    तभी आरव बोला “रिया… एक बात पूछूँ?”

     

    “हम्म?” रिया ने सर हिलाया

     

    “क्या हम दोस्त रह सकते हैं?” रिया मुस्कुराई। “इतनी जल्दी परमिशन मांग रहे हो?” 

     

    “क्योंकि कुछ लोग जल्दी अपने लगने लगते हैं।”

     

    रिया का दिल फिर तेज धड़कने लगा।

     

    उसने धीरे से कहा “हाँ… रह सकते हैं।”

     

    आरव ने तुरंत फोन निकाला। “तो नंबर दीजिए।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    “आप बहुत जल्दी करते हैं।”

     

    “ट्रेन में टाइम कम होता है।”

     

    दोनों हँस पड़े।

     

    मुंबई स्टेशन आ चुका था।

     

    भीड़ तेजी से उतर रही थी।

     

    रिया अपना सामान संभाल रही थी।

     

    दिल अजीब-सा भारी हो गया था।

     

    स्टेशन पर उतरते ही आरव बोला “कैब बुक कर दूँ?”

     

    “नहीं… मैं कर लूँगी।”

     

    “पक्का?”

     

    “हाँ।”

     

    कुछ सेकंड दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर आरव मुस्कुराया।

     

    “तो… फिर मिलेंगे?”

     

    रिया ने भी मुस्कुराकर कहा “शायद।”

     

    “शायद नहीं… जरूर।”

     

    वह चला गया।

     

    रिया उसे जाते हुए देखती रही।

     

    पता नहीं क्यों… मगर उसकी आंखें उसी भीड़ में बस उसे ही ढूंढ रही थीं।

     

    उस रात नए फ्लैट में बैठी रिया बार-बार फोन देख रही थी।

     

    तभी मैसेज आया “घर पहुँच गई?”

     

    रिया मुस्कुरा दी।

     

    “हाँ।”

     

    “Good. और हाँ… ट्रेन वाली दोस्ती मत भूलना।”

     

    रिया ने जवाब दिया—

     

    “इतनी जल्दी नहीं भूलती मैं।”

     

    उस दिन के बाद दोनों रोज बात करने लगे।

     

    सुबह “Good morning” से शुरू होकर रात “सो जाओ अब” पर खत्म होती।

     

    धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे की आदत बन गए।

     

    एक दिन बारिश हो रही थी।

     

    रिया ऑफिस से बाहर निकली तो सामने आरव खड़ा था।

     

    “तुम यहाँ?”

     

    “कॉफी पीने चलें?”

     

    “इस बारिश में?”

     

    “मुंबई में बारिश रुकने का इंतजार करोगी तो जिंदगी निकल जाएगी।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    दोनों सड़क किनारे छोटी-सी दुकान पर कॉफी पीने लगे।

     

    बारिश की बूंदें, ठंडी हवा और आरव की बातें…

     

    रिया बस उसे देखती रह गई।

     

    “क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “झूठ।”

     

    “तुम हर बार कैसे समझ जाते हो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि तुम्हारी आँखें सब बता देती हैं।”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    उस दिन पहली बार उसे एहसास हुआ… वह आरव से प्यार करने लगी है।

     

    मगर उसने कभी कहा नहीं।

     

    उसे डर था।

     

    अगर दोस्ती भी खत्म हो गई तो?

     

    समय गुजरता गया।

     

    एक दिन अचानक आरव का फोन बंद आने लगा।

     

    रिया परेशान हो गई।

     

    पूरा दिन, पूरी रात…

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    तीसरे दिन दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया ने दरवाजा खोला।

     

    सामने आरव खड़ा था।

     

    मगर उसके हाथ पर पट्टी बंधी थी।

     

    रिया घबरा गई।

     

    “ये क्या हुआ?!”

     

    आरव हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “छोटा-सा एक्सीडेंट था।”

     

    रिया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें अंदाजा है मैं कितनी डर गई थी?!”

     

    आरव उसे बस देखता रहा।

     

    “इतनी फिक्र करती हो मेरी?”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    आरव धीरे से बोला—

     

    “रिया… मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”

     

    रिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “क्या?”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “ट्रेन में पहली मुलाकात… आज तक याद है।”

     

    रिया की सांसें थम गईं।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “उस दिन जब तुम खिड़की के पास बैठी थी ना… तभी समझ गया था… फिर कोई और इस दिल को नहीं भाएगा।”

     

    रिया की आँखें भर आईं।

     

    “आरव…”

     

    “मैं सच में तुमसे प्यार करता हूँ।”

     

    रिया हँसते हुए रो पड़ी।

     

    “इतना टाइम लगा दिया बोलने में?”

     

    “डर ल

    गता था।”

     

    “मुझे भी।”

     

    “तो अब?”

     

    रिया ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब तो पूरी जिंदगी परेशान करूँगा।”

     

    रिया हँस पड़ी।

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    ठंडी हवा कमरे में आ रही थी।

     

    और रिया बस एक ही बात सोच रही थी—

     

    कुछ मुलाकातें सच में किस्मत लिखती हैं।

     

    क्योंकि ट्रेन में हुई वह पहली मुलाकात…

     

    आज भी उसकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद थी।

     

     

  • मेरा छोटा सा ख्वाब

    मेरा छोटा सा ख्वाब

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    छोटा सा ख़्वाब मेरा

     

    बारिश की हल्की बूंदें पुराने बस स्टैंड की टूटी हुई छत पर लगातार गिर रही थीं। शाम का धुंधलका धीरे-धीरे पूरे कस्बे को अपने आगोश में ले रहा था। सड़क किनारे लगी छोटी-छोटी दुकानों की पीली रोशनी भीगती हवा में किसी उम्मीद की तरह चमक रही थी। उन्हीं दुकानों के बीच एक छोटी-सी चाय की दुकान थी, जहाँ सत्रह साल की नैना अपने पिता के साथ काम करती थी।

     

    नैना की दुनिया बहुत छोटी थी। सुबह दुकान खोलना, ग्राहकों को चाय देना, घर लौटकर माँ की मदद करना और रात को छत पर बैठकर आसमान को देखना। मगर उस छोटी-सी दुनिया के भीतर एक बहुत बड़ा सपना पल रहा था। वह सपना था, अपनी खुद की एक लाइब्रेरी खोलने का।

     

    लोग अक्सर उस पर हँसते थे।

     

    “चाय बेचने वाली लड़की लाइब्रेरी खोलेगी?”

     

    “इतनी किताबें पढ़कर क्या कलेक्टर बनेगी?”

     

    “लड़कियों के सपने घर की चौखट तक ही अच्छे लगते हैं।”

     

    ऐसी बातें नैना रोज़ सुनती थी, मगर उसने कभी किसी को जवाब नहीं दिया। वह बस मुस्कुरा देती और रात में अपनी पुरानी कॉपी में कुछ लिखती रहती।

     

    उस कॉपी के पहले पन्ने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—

     

    “छोटा सा ख़्वाब मेरा…”

     

    नैना को किताबों से प्यार बचपन से था। जब वह दस साल की थी, तब उसकी माँ उसे मंदिर के पास लगने वाले पुराने किताबों के बाज़ार में ले जाती थीं। लोग वहाँ फटी हुई, पुरानी और धूल भरी किताबें बेचते थे। दूसरों के लिए वे बेकार थीं, मगर नैना के लिए वे किसी खजाने से कम नहीं थीं।

     

    उसने पहली बार वहीं से एक कहानी की किताब खरीदी थी। किताब के कई पन्ने फटे हुए थे, लेकिन उस कहानी ने उसके भीतर एक नई दुनिया जगा दी थी। तब से उसे लगने लगा था कि किताबें इंसान को वहाँ तक ले जा सकती हैं, जहाँ वह अपने पैरों से कभी नहीं पहुँच सकता।

     

    एक रात जब दुकान बंद हो चुकी थी, नैना चुपचाप छत पर बैठी आसमान देख रही थी। उसके पिता रामू चाचा उसके पास आए और बोले,

     

    “क्या सोच रही है बिटिया?”

     

    नैना ने धीरे से कहा,

     

    “बाबा, अगर हमारे पास बहुत सारे पैसे होते ना… तो मैं एक बड़ी-सी लाइब्रेरी खोलती।”

     

    रामू चाचा हल्का-सा हँस पड़े।

     

    “लाइब्रेरी क्यों?”

     

    “ताकि कोई बच्चा सिर्फ पैसों की वजह से किताबों से दूर ना रहे।”

     

    रामू चाचा कुछ पल तक उसे देखते रहे। फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले,

     

    “सपने छोटे-बड़े नहीं होते नैना… बस उन्हें पूरा करने का हौसला बड़ा होना चाहिए।”

     

    उस रात नैना देर तक सो नहीं पाई। उसे पहली बार लगा कि उसका सपना शायद सच भी हो सकता है।

     

    दिन बीतते गए। नैना सुबह दुकान पर काम करती और रात को पढ़ाई। कस्बे के सरकारी स्कूल में वह हमेशा अच्छे नंबर लाती थी। उसके टीचर भी उसकी तारीफ़ करते थे। मगर बारहवीं के बाद आगे पढ़ाई करना आसान नहीं था। घर की हालत बहुत खराब थी। पिता की कमाई से मुश्किल से घर चलता था।

     

    एक दिन माँ ने झिझकते हुए कहा,

     

    “नैना… शर्मा जी अपने बेटे के लिए रिश्ता लेकर आए थे।”

     

    नैना का दिल जैसे अचानक बैठ गया।

     

    “माँ… मैं अभी शादी नहीं करना चाहती।”

     

    “हम भी नहीं चाहते बिटिया… मगर हालात…”

     

    नैना ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “बस एक मौका दे दो माँ। मैं कुछ बनकर दिखाऊँगी।”

     

    माँ की आँखें भर आईं। वह जानती थीं कि उनकी बेटी बाकी लड़कियों जैसी नहीं थी। उसके सपनों में चमक थी।

     

    अगले दिन नैना स्कूल गई तो उसकी क्लास टीचर मीरा मैडम ने उसे स्टाफ रूम में बुलाया।

     

    “तुम उदास क्यों हो?”

     

    नैना पहले चुप रही, फिर उसने सब बता दिया। मीरा मैडम ध्यान से सुनती रहीं। फिर उन्होंने अपनी अलमारी से एक फॉर्म निकाला।

     

    “ये शहर के कॉलेज की स्कॉलरशिप का फॉर्म है। अगर तुम पास हो गई, तो तुम्हारी पढ़ाई मुफ्त हो जाएगी।”

     

    नैना की आँखों में चमक आ गई।

     

    “सच मैडम?”

     

    “हाँ। मगर मेहनत बहुत करनी पड़ेगी।”

     

    उस दिन के बाद नैना ने खुद को पूरी तरह पढ़ाई में झोंक दिया। दिन में दुकान, रात में पढ़ाई। कई बार थकान से उसकी आँखें बंद होने लगतीं, मगर वह फिर भी किताबें खोलकर बैठ जाती।

     

    परीक्षा का दिन आ गया। नैना ने पूरे आत्मविश्वास के साथ पेपर लिखा। जब रिज़ल्ट आया, तो पूरे कस्बे में उसकी चर्चा होने लगी। उसने सिर्फ परीक्षा पास नहीं की थी, बल्कि पूरे जिले में पहला स्थान हासिल किया था।

     

    रामू चाचा की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने पहली बार अपनी बेटी को सीने से लगाकर कहा,

     

    “मुझे तुझ पर गर्व है।”

     

    कुछ ही दिनों बाद नैना शहर चली गई। नया शहर, नई जगह, नए लोग। शुरुआत आसान नहीं थी। कॉलेज के कई छात्र उसका मज़ाक उड़ाते थे क्योंकि उसके पास महंगे कपड़े नहीं थे। वह हॉस्टल की सबसे साधारण लड़की थी।

     

    मगर नैना के पास एक चीज़ थी, जो बहुत कम लोगों के पास होती है, अपने सपनों पर भरोसा।

     

    कॉलेज की लाइब्रेरी उसके लिए किसी जन्नत से कम नहीं थी। घंटों वह किताबों के बीच बैठी रहती। कभी कहानी पढ़ती, कभी इतिहास, कभी विज्ञान। उसे हर किताब में एक नई दुनिया दिखाई देती थी।

     

    धीरे-धीरे उसकी दोस्ती आरव नाम के एक लड़के से हुई। आरव अमीर परिवार से था, मगर दिल से बहुत अच्छा था। उसने पहली बार नैना से पूछा,

     

    “तुम हमेशा लाइब्रेरी में ही क्यों रहती हो?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि मुझे लगता है, किताबें इंसानों से ज्यादा सच्ची होती हैं।”

     

    आरव उसकी बात सुनकर हँस पड़ा, मगर उस दिन के बाद वह भी अक्सर लाइब्रेरी आने लगा।

     

    एक दिन आरव ने पूछा,

     

    “तुम्हारा सपना क्या है?”

     

    नैना कुछ पल चुप रही, फिर बोली,

     

    “मैं अपने कस्बे में एक ऐसी लाइब्रेरी खोलना चाहती हूँ, जहाँ हर गरीब बच्चा मुफ्त में किताबें पढ़ सके।”

     

    आरव उसकी बात सुनकर गंभीर हो गया।

     

    “इतना छोटा सपना?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “सपना छोटा है… मगर मेरे लिए पूरी दुनिया जैसा।”

     

    कॉलेज के तीन साल कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। नैना ने अपनी पढ़ाई पूरी की और उसे शहर की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। उसकी पहली तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं थी, मगर उसके लिए वह किसी खजाने से कम नहीं थी।

     

    उसने सबसे पहले क्या खरीदा?

     

    कोई महंगा फोन नहीं। कोई कपड़े नहीं।

     

    उसने खरीदीं, बीस नई किताबें।

     

    हर महीने वह अपनी तनख्वाह का थोड़ा हिस्सा बचाने लगी। धीरे-धीरे उसकी छोटी-सी बचत बढ़ने लगी। दूसरी तरफ, वह अपने कस्बे के बच्चों के लिए पुरानी किताबें इकट्ठा करने लगी। सोशल मीडिया पर उसने एक अभियान शुरू किया—

     

    “एक किताब दान करें।”

     

    शुरुआत में बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया। मगर धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे। कोई पाँच किताबें भेजता, कोई दस। कुछ लोग बच्चों की कहानियाँ भेजते, कुछ स्कूल की किताबें।

     

    दो साल बाद जब नैना अपने कस्बे लौटी, तो उसके साथ सिर्फ सामान नहीं था। उसके साथ सैकड़ों किताबें थीं।

     

    कस्बे के पुराने पंचायत भवन का एक कमरा कई सालों से बंद पड़ा था। नैना ने प्रधान जी से बात की और वह कमरा साफ करवाया। पूरा कमरा धूल और जालों से भरा हुआ था। लोग उसे देखकर हँस रहे थे।

     

    “यही बनेगी लाइब्रेरी?”

     

    “दो दिन में बंद हो जाएगी।”

     

    मगर नैना ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। उसने खुद झाड़ू लगाई, दीवारों को रंगा, पुराने टेबल ठीक करवाए। उसके पिता और माँ भी उसके साथ काम करते रहे।

     

    आरव भी शहर से आ गया। उसने किताबों की अलमारियाँ बनवाने में मदद की।

     

    आख़िरकार वह दिन आ गया, जिसका नैना ने बरसों से सपना देखा था।

     

    दरवाज़े के बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लगा था—

     

    “छोटा सा ख़्वाब लाइब्रेरी”

     

    उद्घाटन वाले दिन वहाँ बहुत कम लोग आए। मगर कुछ छोटे बच्चे बड़े उत्साह से अंदर गए। उनकी आँखों में चमक थी। वे पहली बार इतनी सारी किताबें देख रहे थे।

     

    एक छोटी लड़की नैना के पास आई और बोली,

     

    “दीदी… क्या मैं ये किताब घर ले जा सकती हूँ?”

     

    नैना की आँखें भर आईं।

     

    “हाँ… ये सारी किताबें तुम्हारी हैं।”

     

    धीरे-धीरे वह लाइब्रेरी पूरे कस्बे की पहचान बन गई। बच्चे स्कूल के बाद वहाँ आने लगे। कुछ पढ़ाई करने आते, कुछ कहानियाँ पढ़ने। कई माता-पिता, जो पहले नैना का मज़ाक उड़ाते थे, अब अपने बच्चों को उसके पास भेजने लगे।

     

    एक दिन वही शर्मा जी, जिन्होंने कभी नैना के लिए रिश्ता भेजा था, अपनी पोती का हाथ पकड़कर लाइब्रेरी आए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “बेटी… हमें माफ कर देना। हम तेरे सपने को समझ नहीं पाए थे।”

     

    नैना ने विनम्रता से सिर झुका लिया।

     

    उस रात वह फिर अपनी छत पर बैठी थी। आसमान में वही तारे चमक रहे थे, जिन्हें वह बचपन से देखती आई थी। मगर आज उसके चेहरे पर अलग सुकून था।

     

    रामू चाचा उसके पास आए और बोले,

     

    “तो बिटिया… तेरा छोटा सा ख़्वाब पूरा हो गया?”

     

    नैना हल्का-सा मुस्कुराई।

     

    “नहीं बाबा… अब तो बस शुरुआत हुई है।”

     

    “मतलब?”

     

    “अब मैं आसपास के गाँवों में भी ऐसी लाइब्रेरी खोलना चाहती हूँ।”

     

    रामू चाचा हँस पड़े।

     

    “तेरे सपने भी ना… कभी खत्म ही नहीं होते।”

     

    नैना ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “सपने खत्म हो जाएँ ना बाबा… तो इंसान जीना छोड़ देता है।”

     

    कुछ महीनों बाद नैना की लाइब्रेरी की कहानी अखबारों में छपने लगी। शहर से लोग उसे बुलाने लगे। स्कूलों और कॉलेजों में उसे सम्मानित किया गया। मगर इन सबके बावजूद नैना वैसी ही रही—साधारण, शांत और मुस्कुराती हुई।

     

    एक दिन एक पत्रकार ने उससे पूछा,

     

    “आपने इतनी मुश्किलों के बाद भी हार क्यों नहीं मानी?”

     

    नैना ने मुस्कुराकर जवाब दिया,

     

    “क्योंकि मेरा सपना सिर्फ मेरा नहीं था। वह उन बच्चों की उम्मीद था, जो किताबें खरीद नहीं सकते थे।”

     

    पत्रकार ने फिर पूछा,

     

    “अगर आपको अपनी कहानी एक लाइन में बतानी हो, तो क्या कहेंगी?”

     

    नैना कुछ पल सोचती रही। फिर उसने धीरे से कहा,

     

    “मैं बस एक चाय बेचने वाली लड़की थी… जिसने किताबों में अपनी दुनिया ढूँढ ली।”

     

    उसकी यह बात अगले दिन अखबार की हेडलाइन बन गई।

     

    समय बीतता गया। नैना की लाइब्रेरी अब सिर्फ एक कमरा नहीं रही थी। वहाँ कंप्यूटर भी आ गए थे, पढ़ाई के लिए अलग हॉल भी बन गया था। गाँव के कई बच्चे, जो कभी स्कूल छोड़ने वाले थे, अब बड़े सपने देखने लगे थे।

     

    एक शाम नैना लाइब्रेरी के कोने में बैठी किताबें सजा रही थी, तभी वही छोटी लड़की, जो पहली बार किताब लेने आई थी, उसके पास आई।

     

    “दीदी…”

     

    “हाँ?”

     

    “मैं बड़ी होकर टीचर बनना चाहती हूँ।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “बहुत अच्छा सपना है।”

     

    लड़की ने मासूमियत से पूछा,

     

    “क्या मेरे सपने भी पूरे हो सकते हैं?”

     

    नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा,

     

    “अगर सपना सच्चा हो… और मेहनत ईमानदार… तो दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती।”

     

    बाहर बारिश फिर शुरू हो चुकी थी। हवा में मिट्टी की खुशबू घुल गई थी। लाइब्रेरी की खिड़की से आती पीली रोशनी दूर सड़क तक फैल रही थी।

     

    नैना ने अपनी पुरानी कॉपी निकाली। वही कॉपी, जिसके पहले पन्ने पर बरसों पहले उसने लिखा था।

     

    “छोटा सा ख़्वाब मेरा…”

     

    उसने मुस्कुराते हुए उसके नीचे एक नई लाइन लिखी दिया।

     

    “और अब यह सिर्फ मेरा नहीं रहा…”

     

  • Maa

    Maa

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    माँ…

    एक ऐसा शब्द,

    जिसमें पूरी दुनिया समा जाती है।

    जिसकी गोद में सिर रखते ही

    हर दर्द कहीं खो जाता है।

    वह खुद भूखी रह जाती है,

    पर अपने बच्चे को कभी भूखा नहीं सोने देती हैं। 

    अपने आँचल में छुपाकर भी, 

    हर मुसीबत से लड़ जाती है।

    नौ महीने कोख में रखकर,

    हर दर्द हँसकर सहती रहती है,

    और जब पहली बार बच्चा रोता है,

    तब वह आँसुओं में भी मुस्कुराती है।

    उसकी ममता किसी मंदिर की पूजा जैसी,

    उसका प्यार भगवान की दुआ जैसा है 

    वह खुद टूट जाती है,

    पर अपने बच्चे को कभी टूटने नहीं देती।

    बच्चा बीमार हो जाए,

    तो रातभर जागती है,

    अपनी नींद, अपनी खुशियाँ,

    सब उस पर वार जाती है।

    जब बच्चा चलना सीखता है,

    तो माँ का दिल भी उड़ने लगता है,

    उसकी छोटी-सी जीत पर भी

    माँ का सीना गर्व से भर जाता है।

    दुनिया साथ छोड़ दे अगर,

    तब भी माँ साथ निभाती है,

    हर हाल में, हर मोड़ पर,

    बस वही तो याद आती है।

    माँ सिर्फ रिश्ता नहीं शब्द नहीं,

    पूरी जिंदगी होती है,

    जिसके बिना हर खुशी अधूरी है। 

    हर सांस अधूरी लगती है।

    शब्द कम पड़ जाते हैं माँ को लिखने में,

    क्योंकि माँ की ममता

    किसी किताब में नहीं समाती…

    वह तो सिर्फ दिल से महसूस की जाती है। ❤️

    Lakshmi Kumari 

  • तकदीर का खेल

    तकदीर का खेल

    पढ़ने का समय : 7 मिनट
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    तकदीर का खेल

    भूमिका

    तकदीर, किस्मत, भाग्य – ये शब्द इंसान की ज़िंदगी में उतने ही मायने रखते हैं, जितने मेहनत और हौसले। कोई अपनी मेहनत से तकदीर बदलने की कोशिश करता है, तो कोई इसे अपनी नियति मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेता है। लेकिन क्या तकदीर सच में पहले से लिखी होती है, या इंसान अपने कर्मों से इसे बदल सकता है? यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जो तकदीर के खेल में उलझा, संघर्ष किया, और अंत में अपनी मेहनत से अपनी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी।

    गंगा किनारे बसा एक छोटा सा गाँव “शिवपुर”। गाँव के बाहर कच्चे रास्ते पर एक झोपड़ी में रहता था अर्जुन। उम्र लगभग 25 साल, चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक, मगर किस्मत ने जैसे उसके हिस्से में संघर्ष ही लिख दिया था। माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे, और एक छोटी बहन राधा उसकी जिम्मेदारी थी।

    अर्जुन बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था, मगर गरीबी ने उसे ज्यादा आगे नहीं बढ़ने दिया। मजबूरी में उसे मजदूरी करनी पड़ी, ताकि बहन की देखभाल कर सके। गाँव के बड़े लोग कहते थे, “अरे अर्जुन, तकदीर में जो लिखा है, वही होगा। मेहनत कर भी लेगा तो क्या होगा?” लेकिन अर्जुन इस सोच को मानने को तैयार नहीं था

    दूसरा अध्याय: संघर्ष की राह

    अर्जुन का सपना था कि वह बहन को अच्छी शिक्षा दिलाए और खुद भी अपनी जिंदगी सुधार सके। लेकिन तकदीर बार-बार उसकी परीक्षा लेती रही।

    एक दिन गाँव के जमींदार रतनलाल ने अर्जुन को बुलाया।

    “अर्जुन, मेरी जमीन पर मजदूरी करेगा? अच्छा पैसा दूँगा।”

    अर्जुन के पास कोई और चारा नहीं था, उसने हामी भर दी। दिनभर खेतों में मेहनत करता और रात को थका-हारा घर लौटता। मगर मन में एक ही सवाल घूमता – क्या यह जिंदगी भर चलने वाला है?

    एक दिन उसकी मुलाकात रमेश से हुई, जो शहर में नौकरी करता था।

    “अर्जुन, तू बहुत मेहनती है, शहर चल, वहाँ अच्छा काम मिलेगा,” रमेश ने सुझाव दिया।

    अर्जुन के मन में उम्मीद की किरण जागी। उसने फैसला किया कि वह भी शहर जाएगा और अपनी तकदीर को आजमाएगा।

    अर्जुन अपनी बहन को पड़ोसी के पास छोड़कर शहर चला गया। वहाँ नौकरी की तलाश शुरू की, मगर हर जगह सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। बिना किसी जान-पहचान के उसे कोई काम नहीं मिल।

    एक दिन, जब अर्जुन भूखा-प्यासा सड़क किनारे बैठा था, तब एक व्यापारी महेश गुप्ता ने उसे देखा।

    “क्या हुआ बेटा? परेशान क्यों है?” महेश जी ने पूछा।

    अर्जुन ने अपनी पूरी कहानी सुना दी। महेश जी ने उसे अपनी दुकान पर काम दे दिया। धीरे-धीरे अर्जुन मेहनत करने लगा और अपनी ईमानदारी से महेश जी का विश्वास जीत लिया।

    अर्जुन अब दुकान में अच्छा काम करने लगा था। वह सिर्फ सेल्समैन नहीं, बल्कि व्यापार के हर पहलू को समझने लगा था। महेश जी ने उसकी लगन को देखकर उसे और बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी।

    कुछ सालों बाद, अर्जुन महेश जी का सबसे भरोसेमंद व्यक्ति बन गया। लेकिन तभी तकदीर ने एक और खेल खेला – महेश जी का अचानक देहांत हो गया। उनकी फैमिली को बिजनेस में कोई रुचि नहीं थी, इसलिए उन्होंने दुकान बेचने का फैसला किया।

    अर्जुन के सामने बड़ा सवाल था – क्या वह अपनी अब तक की मेहनत को यूँ ही छोड़ दे? या कुछ बड़ा करने की सोचे?

    पाँचवाँ अध्याय: तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ?

    अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और अपनी सारी बचत और थोड़े पैसे उधार लेकर वही दुकान खरीद ली। अब वह खुद का मालिक बन चुका था। उसकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा।

    कुछ सालों में उसने अपने व्यापार को इतना बढ़ाया कि वह अब सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि कई दुकानों का मालिक बन चुका था। वह गाँव लौटा और अपनी बहन को अच्छे कॉलेज में पढ़ने भेजा।

    गाँव के लोग जो कभी उसे तकदीर का मारा समझते थे, अब कहते थे, “देखो, अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद लिखी!”

    निष्कर्ष: तकदीर बनती है मेहनत से

    अर्जुन की कहानी बताती है कि तकदीर का खेल असल में मेहनत का ही खेल है। अगर वह भी दूसरों की तरह तकदीर को दोष देकर बैठ जाता, तो उसकी जिंदगी वहीं खेतों में मजदूरी करते बीत जाती। लेकिन उसने अपने हौसले से, अपनी मेहनत से अपनी तकदीर खुद लिखी।

    तो, तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ? जवाब साफ है – तकदीर का खेल असल में मेहनत और संघर्ष की परीक्षा ही है!

    अर्जुन ने अपनी मेहनत से अपना व्यापार खड़ा कर लिया था, लेकिन ज़िंदगी में सफलता के साथ चुनौतियाँ भी आती हैं। जब उसका बिज़नेस अच्छा चलने लगा, तो कई लोगों की नज़रें उस पर टेढ़ी हो गईं।

    गाँव के जमींदार रतनलाल, जो कभी उसे मजदूरी के लिए बुलाते थे, अब उसकी बढ़ती सफलता से जलने लगे। उन्होंने अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं कि अर्जुन ने गलत तरीकों से पैसा कमाया है।

    एक दिन गाँव की पंचायत में यह मामला उठा। रतनलाल ने कहा,

    “अर्जुन, तू गाँव का एक गरीब लड़का था, अचानक इतना अमीर कैसे बन गया? जरूर कोई बेईमानी की होगी!”

    अर्जुन चुपचाप सबकी बातें सुनता रहा। फिर उसने जवाब दिया,

    “मैंने दिन-रात मेहनत की, संघर्ष किया, शहर में धक्के खाए, तब जाकर इस मुकाम तक पहुँचा हूँ। अगर कोई यह साबित कर दे कि मैंने गलत तरीके से कुछ कमाया है, तो मैं खुद सारा व्यापार छोड़ दूँगा!”

    गाँव के बुजुर्ग जानते थे कि अर्जुन ईमानदार है। उन्होंने पंचायत में ही उसका समर्थन किया और कहा,

    “तकदीर उसी की बदलती है जो मेहनत करना जानता है। अर्जुन ने अपने कर्मों से अपना भाग्य लिखा है।”

    रतनलाल चुप हो गए, लेकिन अर्जुन समझ गया कि सफलता के साथ आलोचना भी मिलती है।

    इधर अर्जुन की बहन राधा ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली और उसे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई। अर्जुन ने सोचा कि अब उसकी बहन की शादी करवा दी जाए। उसने राधा से पूछा,

    “क्या तुम किसी को पसंद करती हो, या फिर मैं तुम्हारे लिए अच्छा रिश्ता देखूं?”

    राधा थोड़ी संकोच में थी, फिर उसने कहा,

    “भइया, मेरा एक दोस्त है, जो बहुत अच्छा इंसान है। अगर आप मिलना चाहें, तो मैं उसे घर बुला सकती हूँ।”

    अर्जुन को खुशी हुई कि उसकी बहन अपने फैसले खुद लेने के लायक बन गई थी। उसने उस लड़के से मुलाकात की और जब देखा कि वह वाकई ईमानदार और मेहनती है, तो उसने शादी के लिए हाँ कर दी।

    शादी के दिन पूरा गाँव खुशी से झूम उठा। अर्जुन को देखकर लोग कहते,

    “अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद बनाई और अब अपनी बहन की जिंदगी भी संवार दी!”

    राधा की शादी के बाद अर्जुन ने अपने बिज़नेस को और आगे बढ़ाने का फैसला किया। उसने गाँव के कई बेरोजगार युवाओं को अपने काम से जोड़ा और उन्हें नौकरी दी।

    अब वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे गाँव की तकदीर बदलने की कोशिश कर रहा था। उसने गाँव में एक स्कूल भी खुलवाया, ताकि किसी और अर्जुन को अपनी पढ़ाई अधूरी न छोड़नी पड़े।

    धीरे-धीरे, गाँव के लोग भी मेहनत की अहमियत समझने लगे। वे भी किस्मत को कोसने के बजाय अपने हाथों से अपना भविष्य गढ़ने में जुट गए।

    एक दिन अर्जुन अपनी दुकान के बाहर बैठा था, जब एक बुजुर्ग ने आकर कहा,

    “बेटा, सच ही कहते हैं – तकदीर कोई लिखकर नहीं लाता, उसे मेहनत से गढ़ना पड़ता है। तूने यह साबित कर दिया!”

    अर्जुन मुस्कुराया और बोला,

    “हाँ काका, तकदीर का खेल असल में हमारे हाथ में ही होता है। अगर हम मेहनत करें, तो हम अपनी ज़िंदगी खुद बना सकते हैं।

    उस दिन अर्जुन को अहसास हुआ कि उसने सिर्फ अपनी तकदीर नहीं बदली, बल्कि अपने गाँव की सोच भी बदल दी थी। अब कोई भी तकदीर को कोसकर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता था – सब मेहनत की ताकत को समझ चुके थे।

    और इस तरह, तकदीर का खेल अर्जुन की मेहनत के आगे हार गया।

  • चतुर खरगोश

    चतुर खरगोश

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    एक समय, एक घने और खुशनुमा जंगल में कई जानवर एकसाथ रहते थे। वहाँ के झाड़ियों और पेड़ों के बीच, छोटी-सी नदियाँ बहती थीं, और चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। इस जंगल में एक बहुत ही चतुर खरगोश था, जिसका नाम था चीकू। चीकू अपनी चतुराई और तेज़ी के लिए जाना जाता था। उसे अपनी बुद्धिमानी पर गर्व था, और वह हमेशा नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहता था।

    चीकू के पास एक बहुत अच्छा दोस्त था, जिसका नाम था टिनू। टिनू एक धीमा कछुआ था, लेकिन उसकी धैर्य और स्थिरता की प्रशंसा सभी करते थे। चीकू और टिनू अक्सर एक-दूसरे के साथ खेलते और बातचीत करते। चीकू की तेज़ी और टिनू की धैर्यतावाद, दोनों की दोस्ती जंगल में मशहूर थी।

    एक दिन, जंगल में एक बड़ा और महत्वपूर्ण घोषणा की गई। जल्द ही, जंगल के सभी जानवरों के बीच दौड़ आयोजित होने वाली थी। यह दौड़ जंगल के सबसे तेज़ जानवर का पता लगाने के लिए थी। चीकू ने तुरंत सोचा, “यह मेरे लिए एक शानदार मौका है! मैं अपनी चतुराई और तेज़ी से यह दौड़ जीत सकता हूँ।”

    दौड़ के दिन, सभी जानवर एकत्र हुए। जंगल के सबसे अनुभवी जानवर, हाथी बाबा, ने कहा, “दोस्तों, इस दौड़ में भाग लेना बहुत महत्वपूर्ण है। जो सबसे तेज़ दूर तक जाएगा, वही विजेता होगा।” सभी जानवर उत्साहित हो गए, और दौड़ शुरू करने का समय आया।

    चीकू ने खुद को विजेता मान लिया और दौड़ की शुरुआत से पहले टिनू से कहा, “क्या तुम सोचते हो कि तुम मेरे खिलाफ दौड़ सकते हो? तुम तो बहुत धीमे हो!” टिनू ने मुस्कुराते हुए कहा, “चीकू, तेज़ी ही सब कुछ नहीं है। धैर्य और आत्मविश्वास भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। मुझे अपनी गति पर विश्वास है।”

    दौड़ शुरू हुई, और चीकू ने तुरंत ऊँचाई पर पहुँचते हुए तेजी से दौड़ना शुरू कर दिया। उसने देखा कि उसके पीछे सभी जानवर धीरे-धीरे भागते हैं, और वह बहुत खुश था। “मैंने तो पहले ही जीत हासिल कर ली है,” उसने सोचा और अपनी गति को थोड़ा धीमा कर दिया। उसे लगा कि उसके जीतने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए उसने एक पेड़ के नीचे आराम करने का फैसला किया।

    चीकू ने सोचा, “कछुए को बहुत वक्त लगेगा यहाँ तक पहुँचने में। मैं थोड़ी देर आराम कर सकता हूँ। जब वह आएगा, तब मैं बस एक बार में दौड़कर जीत जाओंगा।” उसकी इस सोच ने उसे सुस्त कर दिया। वह पेड़ के नीचे लेट गया और नींद में चला गया।

    दूसरी ओर, टिनू ने धीरे-धीरे अपनी गति बनाए रखी। उसने अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित किया और स्थिरता से दौड़ता रहा। समय बीतता गया, और टिनू धीरे-धीरे चीकू के पास पहुँच गया। जैसे ही टिनू ने चीकू को सोते हुए देखा, उसने झिझकते हुए कहा, “चीकू, तुम क्यों सो रहे हो?”

    चीकू ने ध्यान नहीं दिया और सोता रहा। टिनू ने पास जाकर कहा, “तुम अपनी सभी तेज़ी को खो रहे हो, जबकि मैं आगे बढ़ रहा हूँ।” लेकिन चीकू ने इससे फर्क नहीं पड़ने दिया और आँखें बंद किए रखीं।

    टिनू आगे बढ़ता गया। कुछ दूर जाकर, उसने एक नदी को पार किया और दूसरी ओर पहुँच गया। उसका धैर्य और बढ़ता गया जबकि चीकू अभी भी सोता रहा। जब चीकू जागा, तो उसे महसूस हुआ कि काफी समय बीत चुका है।

    चीकू ने जल्दी से उठकर देखा कि टिनू उसके बिना ही आगे बढ़ चुका था। उसे एक क्षण के लिए आश्चर्य हुआ और फिर वह घबरा गया। “ये कैसे हो गया?” उसने सोचा। उसने सोचा, “मुझे उसे पकड़ लेना चाहिए!”

    चीकू ने अपनी तेज़ी दिखाते हुए दौड़ना शुरू किया। लेकिन जब उसने दौड़ना शुरू किया, तो टिनू पहले ही काफी दूर पहुंच चुका था। चीकू ने अपने सभी कौशल और तेज़ी के साथ दौड़ने की कोशिश की, लेकिन टिनू अपने धैर्य और स्थिरता के साथ आगे बढ़ता गया।

    जैसे ही चीकू ने उस स्थिति को देखा, उसने तैराकी से पुकारा, “टिनू, तुम बहुत धीमे हो! मुझे जीतने के लिए बस एक बार और दौड़ना है!”

    टिनू ने उत्तर दिया, “चीकू, मुझे पता था कि तुम तेज हो, लेकिन इस दौड़ में सिर्फ तेज़ होना ही काफी नहीं है। मुझे अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना था और अपने सहजता से दौड़ना था।”

    दौड़ के अंत तक पहुँचने में, चीकू ने अपनी सारी ताकत लगा दी, लेकिन वह टिनू को बहुत दूर नहीं कर सका। अंततः, टिनू ने दौड़ समाप्त की और विजेता बना। चीकू ने देखा कि उसने अपनी चतुराई और तेज़ी की जगह पर केवल आत्म-संतोष और अहंकार का सहारा लिया था।

    चीकू को इस हार से एक महत्वपूर्ण सबक मिला। उसने टिनू से कहा, “मैंने सोचा था कि मैं हमेशा तेज़ और सबसे अच्छा रहूँगा, लेकिन तुमने मुझे सिखाया कि धैर्य, आत्मविश्वास और स्थिरता कितनी महत्वपूर्ण हैं।”

    टिनू ने मुस्कुराते हुए कहा, “हर कोई अपनी विशेषताओं के अनुसार अद्वितीय है। तेज़ होना अच्छा है, लेकिन कभी-कभी slow and steady wins the race। चलो, हम साथ में इस हार का जश्न मनाते हैं!”

    चीकू ने अपनी हार को स्वीकार किया और उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामकर जंगल में बहुत खुश होकर खेलना और आनंद लेना शुरू किया। इस प्रकार, चीकू और टिनू की दोस्ती और भी मजबूत हो गई और चीकू ने हमेशा याद रखा कि जीत और हार दोनों ही जीवन का हिस्सा हैं।

    इस कहानी से हमें यह सीखने को मिलता है कि केवल तेज़ी ही नहीं, बल्कि धैर्य और समर्पण भी किसी भी चुनौती को पार करने में महत्वपूर्ण होते हैं।

    Lakshmi Kumari 

     

  • मेरी किताबों को पढ़ो

    मेरी किताबों को पढ़ो

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    जानना है अगर मुझे

     तो मेरी कविताओं को पढ़ो

    शब्दों को नहीं उनमें छुपी

     मेरी भावनाओं को समझो

     पढ़ना है मुझे, तो उन लफ्ज़ों के बीच उतरना, 

    जहाँ हर खामोशी भी कुछ कहने की कोशिश करती है। 

    कुछ बातें ऐसी हैं, जो किसी ने कभी जानी नहीं,

     मैंने उन्हें चुपके से शब्दों में

     ढालकर कविताओं में छुपाया है।

    जानना चाहते हो मुझे, 

    तो मेरी किताबों को खोलो हर पन्ने पर लिखे 

    अनकहे एहसासों को पढ़ो।

     उतार दिया है मैंने अपना हाल-ए-दिल

    वो भी जो मैंने खुद से कभी कहा नहीं मेरी हर कविता में मेरा एक अधूरा हिस्सा रहता है कहीं।

    अगर सच में समझना है मुझे,

     तो लफ्ज़ों के उस समंदर में उतरना, 

    जहाँ दर्द भी लहर बनकर 

    चुपचाप किनारे छू जाता है। 

    शब्दों के इस विशाल समंदर से

     कुछ मोती चुराए हैं मैंने,

     और उनसे ही भावनाओं का

     एक पूरा जहां बनाया है। 

    एक बार उस समंदर में उतरकर तो देखो,

    शायद किनारे तक आते-आते

     तुम मुझे थोड़ा-सा समझ जाओ… 

    अगर जानना है मुझे, तो बस… 

    मेरी किताबों को पढ़ो। Lakshmi Kumari

  • प्यार करते हो तो तड़पाते क्यों हो

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    प्यार करते हो तो तड़पाते क्यों हो,

    दिल में बसाकर यूँ रुलाते क्यों हो।

    कहते हो जान हो मेरी हर घड़ी,

    फिर दूर रहकर ये सताते क्यों हो।

    वादा किया था साथ निभाने का,

    हर मोड़ पे हाथ थाम जाने का,

    फिर खामोशी की चादर ओढ़कर,

    मुझसे ही नज़रें चुराते क्यों हो।

    मेरे ख्वाबों में तुम ही तुम रहते हो,

    फिर हकीकत में बदल जाते क्यों हो।

    प्यार करते हो अगर सच्चे दिल से,

    तो हर बात पे यूँ आज़माते क्यों हो।

    दिल की हर धड़कन तेरे नाम कर दी,

    हर खुशी तेरे अरमान कर दी,

    फिर मेरी मोहब्बत को यूँ सवाल बना कर,

    मुझको ही गलत ठहराते क्यों हो।

  • तेरे जाने के बाद

    तेरे जाने के बाद

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    तेरे जाने के बाद …!!

    रास नहीं आया मुझको मेरे 

    ही घर का कोई कोना,

    सुबह शाम तलक तुम चहकती थी ,

    जहां दिन और रात ,अब काटने को

    दौड़ता है मुझको मेरा ही घर सलोना,

    नहीं पता था ज़िंदगी तुम बिन

    अंधेरे में चली जाएगी,

    तेरे जाने के बाद  हां तेरे

    जाने के बाद एहसास हुआ

    मुझे कमी तेरी कमी यादों की

    चादर इस तरह तड़पाएगी ,

    तेरे जाने के बाद दिल

    खाली – खाली सा लगता है  ,

    तेरी पनाहों में आने को

    दिल कितना तड़पता है  ,

    आंखों से आंसू मेरे झरझर बहते हैं ,

    तेरे बिन कितना अधूरा हूं ये मुझसे कहते हैं…!!

  • निभा नहीं सकते

    निभा नहीं सकते

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तुम निभा नहीं सकते, तो हम ज़ाहिर क्यों करें,

    तुम चार कदम चल नहीं सकते, तो हम हाथ क्यों थामें,

    • एक तरफ है प्यार मेरा,

    तो इसे एक तरफ ही क्यों ना रहने दें।

  • बच्चों की यात्रा

    बच्चों की यात्रा

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में एक नन्हा चाँद रहता था। उसका नाम था चमकीला। चमकीला हमेशा आकाश में तारे के साथ खेलता और रात का नज़ारा देखने आता। लेकिन एक दिन, उसे एक सपना आया। उसने देखा कि वह धरती पर जाकर सारे बच्चों से मिलना चाहता है।

    चमकीला ने अपने दोस्तों, तारे और बादल से कहा, “मैं धरती पर जाना चाहता हूँ। मैं वहाँ के बच्चों के साथ खेलना चाहता हूँ।” तारे ने मुस्कुराते हुए कहा, “लेकिन चमकीला, तुम तो आकाश का चाँद हो। तुम धरती पर कैसे जा सकते हो?” 

    चमकीला ने कहा, “मैं अपनी पूरी कोशिश करूंगा। मुझे सिर्फ एक मौका चाहिए।” उसने बादल से पूछा, “क्या तुम मुझे नीचे लाने में मदद करोगे?” बादल ने कहा, “बिल्कुल, मैं तुम्हें नीचे ले चलूँगा। लेकिन तुम्हें जल्दी आना होगा, वरना सूरज उग जाएगा।”

    तो चमकीला और बादल ने मिलकर एक योजना बनाई। बादल ने चमकीला को अपने विशाल पंखों में समेटा और धीरे-धीरे नीचे की ओर उड़ने लगा। जैसे ही वे धरती के करीब पहुँचे, चमकीला बहुत उत्साहित था।

    जब वे धरती पर पहुँचे, तो चमकीला ने देखा कि बच्चे खेल रहे थे, हंस रहे थे और खुश थे। चमकीला ने तुरंत बच्चों के बीच में आने की इच्छा व्यक्त की। बच्चे उसकी चमकीली रोशनी और सुंदरता को देखकर हैरान रह गए। उन्होंने चाँद से कहा, “क्या आप सच में चाँद हैं?

    चमकीला ने कहा, “हाँ, मैं ही हूँ! मैं यहाँ खेलने आया हूँ। चलो, हम साथ में खेलते हैं!” बच्चे बहुत खुश हुए और उन्होंने चमकीला के साथ खेलना शुरू कर दिया। वे दौड़ने लगे, कूदने लगे और चाँद की रोशनी में तारे की तरह चमकने लगे

    चमकीला ने देखा कि बच्चे कितने खुश हैं। वह उनके साथ खेलते हुए समय को भूल गया। लेकिन जल्द ही सूरज की किरणें फैलने लगीं। चमकीला को जल्दी समझ में आया कि अब उसे वापस आकाश में जाना होगा।

    बच्चों ने उसे रोकने की कोशिश की, “नहीं, चमकीला! मत जाओ!” लेकिन चमकीला ने कहा, “मुझे जाना होगा, लेकिन मैं हमेशा तुम सबके साथ रहूँगा। जब भी तुम रात में मुझे देखोगे, तो याद रखना, मैं तुम्हारे दोस्त हूँ।

    बादल ने फिर से चमकीला को अपने पंखों में समेटा और धीरे-धीरे उसे आसमान में ले जाने लगा। जब वह वापस चाँद पर पहुँचा, तो उसने अपने दोस्तों को बताया कि उसने धरती पर बच्चों के साथ कितना मजेदार समय बिताया

    उस रात, जब बच्चे सो रहे थे, उन्होंने चाँद को अपनी खिड़की से देखा और मुस्कुराने लगे। उन्हें पता था कि उन पर हमेशा चमकीला की नज़र है।

    सपने देखने और उन्हें पूरा करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। दोस्ती और खुशी हर जगह मिलती है, बस हमें उसे पहचानने का तरीका सीखना होता है।