एक प्यारी सी बिंदी…!
बिखरी सी….सँवरी सी…ज़ुल्फें…!
एक झुमका बहका हुआ… और !
हल्की सी मुस्कान तुम्हारे होंठों पर…!!
*तुम समझ नहीं आती लेकिन…!*
*कसम से.. मुझे, पसंद बहुत आती हो…!!!❤️💞*
NSW अनुभवी लेखक -🥇
जो हमसे दूर हुए..
हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏
दिल से दिल तक पहुंचने वाली एहसास कहानी बनती है।
एक प्यारी सी बिंदी…!
बिखरी सी….सँवरी सी…ज़ुल्फें…!
एक झुमका बहका हुआ… और !
हल्की सी मुस्कान तुम्हारे होंठों पर…!!
*तुम समझ नहीं आती लेकिन…!*
*कसम से.. मुझे, पसंद बहुत आती हो…!!!❤️💞*
NSW अनुभवी लेखक -🥇
जो हमसे दूर हुए..
हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

(एक डॉक्टर की अधूरी जिंदगी की कहानी)
रात के लगभग साढ़े दस बजे थे।
शहर के सबसे बड़े अस्पताल की तीसरी मंज़िल पर ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती लगातार जल रही थी। अंदर डॉक्टरों की टीम किसी मरीज की जान बचाने में लगी थी।
ऑपरेशन थिएटर के बीचों-बीच खड़ा था डॉ. आदित्य मेहरा।
शहर का सबसे मशहूर न्यूरोसर्जन। उसके माथे पर पसीना था… आँखों में थकान… लेकिन हाथों में वही आत्मविश्वास, जिसने अब तक ना जाने कितनी जिंदगियाँ बचाई थीं।
“सक्शन…” उसने गंभीर आवाज में कहा। नर्स ने तुरंत उपकरण पकड़ाया। मरीज की हालत बेहद नाजुक थी। ज़रा सी गलती… और सब खत्म।
तभी बाहर से एक जूनियर डॉक्टर तेजी से अंदर आया। “सर…” उसकी आवाज घबराई हुई थी।
आदित्य ने बिना नजर उठाए कहा “मैंने कहा था, ऑपरेशन के बीच कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा।”
“सर… बात बहुत जरूरी है…” आदित्य झल्ला उठा “क्या है?” जूनियर डॉक्टर कुछ पल चुप रहा… फिर धीरे से बोला “सर आपके बेटे आरव का एक्सिडेंट हो गया है…”
आदित्य का हाथ एक पल को रुक गया। “व्हाट…?”
“उसे सिटी हॉस्पिटल लाया गया है… हालत गंभीर है…” कुछ सेकंड के लिए आदित्य की सांसें जैसे थम गईं।
“कैसे हुआ?” उसकी आवाज काँप गई। “स्कूल से लौटते वक्त… ट्रक ने बाइक को टक्कर मार दी…” आदित्य की आँखों के सामने अपने बारह साल के बेटे का चेहरा घूम गया। आरव उसकी दुनिया उसका सब कुछ।
आदित्य तुरंत बाहर जाने को हुआ… लेकिन तभी उसके सीनियर असिस्टेंट ने कहा “सर… अगर आप अभी ऑपरेशन छोड़ देंगे तो मरीज नहीं बचेगा…”
आदित्य रुक गया उसके सामने दो जिंदगियाँ थीं। एक… उसका बेटा दूसरी… एक अनजान मरीज उसके हाथ काँपने लगे।
“सर, फैसला आपको करना है…” असिस्टेंट बोला आदित्य की आँखों में दर्द उतर आया उसने दीवार का सहारा लिया।
उसके दिमाग में आरव की हँसी गूंज रही थी “पापा, आप दुनिया के सबसे अच्छे डॉक्टर हो…” और दूसरी तरफ ऑपरेशन टेबल पर लेटा मरीज… जिसकी सांसें हर सेकंड टूट रही थीं।
आदित्य ने आँखें बंद कीं फिर भारी दिल से बोला “ऑपरेशन जारी रहेगा…”
ऑपरेशन फिर शुरू हुआ… लेकिन अब आदित्य का ध्यान बार-बार भटक रहा था। हर पाँच मिनट बाद उसकी नजर घड़ी पर चली जाती। हर सेकंड उसे भारी लग रहा था।
उसने कई बार फोन उठाने की कोशिश की… लेकिन हाथ फिर ऑपरेशन में लग जाते। तीन घंटे पूरा तीन घंटे बाद ऑपरेशन खत्म हुआ। मरीज बच गया था। पूरा स्टाफ खुश था।
लेकिन आदित्य के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। उसने जल्दी से ग्लव्स उतारे और भागते हुए बाहर निकला। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। “भगवान… बस मेरा बेटा ठीक हो…”
जब आदित्य सिटी हॉस्पिटल पहुँचा… तब रात के दो बज चुके थे।
वह पागलों की तरह ICU की तरफ भागा। बाहर उसकी पत्नी नेहा बैठी थी। उसकी आँखें सूज चुकी थीं… चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था। आदित्य को देखते ही वह खड़ी हो गई।
“आरव कहाँ है?” आदित्य ने घबराकर पूछा। नेहा उसे बस देखती रही उसकी आँखों में दर्द था… गुस्सा था… टूटन थी। “नेहा… बोलो ना मेरा बेटा कहाँ है?” आदित्य चीख पड़ा।
नेहा की आँखों से आँसू बह निकले उसने काँपती आवाज में कहा “वो… चला गया आदित्य…”
आदित्य जैसे पत्थर बन गया। “न… नहीं…” उसके कदम लड़खड़ा गए। “मैंने बहुत कोशिश की…” नेहा रोते हुए बोली “वो बार-बार तुम्हें बुला रहा था…”
आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले। “पापा आएंगे ना मम्मा…?”
नेहा ने रोते हुए आरव की आखिरी बातें दोहराईं। आदित्य वहीं जमीन पर बैठ गया। उसकी दुनिया खत्म हो चुकी थी।
नेहा उसके सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आवाज टूट रही थी… लेकिन हर शब्द तीर की तरह लग रहा था। “काश… तुम उस समय रहते पहुँच जाते…”
आदित्य ने सिर उठा कर उसे देखा। “नेहा…” “तुम सबकी जान बचाते रहे आदित्य…” वह चीखी “लेकिन अपने बेटे को नहीं बचा पाए…” उसके शब्दों में वर्षों का दर्द था। “उसे तुम्हारी जरूरत थी…” नेहा रो रही थी “वो आखिरी सांस तक तुम्हें बुलाता रहा…”
आदित्य खुद को संभाल नहीं पा रहा था। “मैं… मैं एक मरीज को छोड़ नहीं सकता था…” उसकी आवाज बिखर गई। नेहा कड़वाहट से हँसी “और आज… तुम्हारा बेटा तुम्हें छोड़ गया…”
आरव के अंतिम संस्कार के बाद घर पूरी तरह खामोश हो गया। जहाँ पहले हँसी गूंजती थी… अब सिर्फ सन्नाटा था। आरव का कमरा वैसे ही पड़ा था। उसके खिलौने… उसकी किताबें… उसकी अधूरी ड्रॉइंग्स… आदित्य धीरे-धीरे कमरे में गया।
उसने आरव की छोटी सी शर्ट उठाई… और सीने से लगा ली। उसकी आँखों के सामने वो दिन घूम गया जब आरव ने कहा था “पापा, इस बार मेरा मैच देखने जरूर आना…”
लेकिन आदित्य नहीं गया था। “पापा बहुत बिजी हैं…” यही कहकर हर बार वह खुद को समझा लेता था। आज वही शब्द उसे अंदर से तोड़ रहे थे।
एक रात…
आदित्य को आरव की स्टडी टेबल में एक छोटी डायरी मिली काँपते हाथों से उसने डायरी खोली पहले पन्ने पर लिखा था “मेरे पापा सुपरहीरो हैं…”
आदित्य रो पड़ा आगे लिखा था “पापा बहुत लोगों की जान बचाते हैं। मुझे उन पर गर्व है। लेकिन काश… वो मेरे साथ थोड़ा समय बिताते…”
आदित्य का दिल चीर गया। उसने अगले पन्ने पलटे “आज मेरा मैच था। मैं चाहता था पापा आएं… लेकिन वो फिर हॉस्पिटल चले गए…”
हर शब्द उसे मार रहा था। फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था “अगर मैं बड़ा हुआ… तो पापा की तरह डॉक्टर बनूँगा। ताकि मैं लोगों की जान भी बचा सकूँ… और अपने परिवार का साथ भी दे सकूँ…”
डायरी उसके हाथों से गिर गई।
दिन गुजरते गए…
लेकिन आदित्य खुद को माफ नहीं कर पा रहा था। वह हर रात वही सोचता “अगर मैं उस दिन ऑपरेशन छोड़ देता तो…?” “अगर मैं थोड़ा पहले पहुँच जाता तो…?” लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
एक दिन उसने नेहा से कहा “मैंने अपना बेटा खो दिया…”
नेहा की आँखें भर आईं। “हम दोनों ने खोया है आदित्य…”
“नहीं…” आदित्य रो पड़ा “तुमने उसे हादसे में खोया… और मैंने अपनी जिम्मेदारियों में…”
कुछ महीनों बाद…
आदित्य फिर उसी ऑपरेशन थिएटर में खड़ा था। लेकिन आज उसके अंदर कुछ बदल चुका था। ऑपरेशन खत्म होने के बाद उसने अपने जूनियर्स से कहा “याद रखो… डॉक्टर होना जरूरी है… लेकिन इंसान होना उससे भी ज्यादा जरूरी…” सब उसकी तरफ देखने लगे।
उसकी आँखें नम थीं। “कभी ऐसा मत होने देना… कि किसी अपने को तुम्हारी कमी महसूस हो…” रात को आदित्य आरव की कब्र के पास बैठा था। उसने धीरे से फूल रखे। “मुझे माफ कर दो बेटा…” उसकी आवाज काँप गई।
हवा हल्के से चली। आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले “काश… मैं उस दिन समय रहते पहुँच जाता…” लेकिन कुछ पछतावे जिंदगी भर इंसान का पीछा नहीं छोड़ते… और कुछ आवाजें मरने के बाद भी दिल में गूंजती रहती हैं।

NSW अनुभवी लेखक -🥇
जब पहली बार इस दुनिया ने
मुझे अपनी कठोर आवाज़ सुनाई थी,
तब एक कोमल हथेली ने
मेरे माथे पर पूरी दुनिया की शांति रख दी थी —
वो माँ थी।
मैं जब भी टूटा,
दुनिया ने वजह पूछी,
माँ ने बिना कुछ जाने
बस सीने से लगा लिया।
उसके आँचल में
ना जाने कैसी मिट्टी की खुशबू होती है,
कि रोता हुआ बच्चा भी
वहाँ जाकर खुद को सुरक्षित समझने लगता है।
माँ बोलती कम है,
पर उसकी खामोशियाँ भी
बेटे के दर्द का पता रखती हैं।
वो दूर बैठकर भी
चेहरे की हँसी में छिपी थकान पढ़ लेती है।
मैंने देखा है —
घर में सबके हिस्से की खुशियाँ बाँटते-बाँटते
वो अपने हिस्से की इच्छाएँ
चुपचाप भगवान के पास रख आती है।
रात के आख़िरी पहर तक जागना,
बुखार में माथे पर ठंडी पट्टी रखना,
खुद भूखी रहकर भी
बच्चों की थाली भर देना —
ये सब प्रेम के वो रूप हैं
जिन्हें शब्द कभी पूरा नहीं लिख सकते।
माँ कोई रिश्ता नहीं,
एक पूरी दुनिया होती है।
उसके होने से
घर सिर्फ़ मकान नहीं रहता,
धड़कता हुआ दिल बन जाता है।
और सच तो ये है —
हम उम्र भर बड़े होते रहते हैं,
लेकिन माँ के सामने
हम हमेशा वही छोटे बच्चे रहते हैं
जो उसकी उँगली पकड़कर
दुनिया से डरना भूल जाते हैं।
अगर कभी भगवान को देखना हो,
तो मंदिरों में मत ढूँढना,
सुबह बिना थके रसोई में खड़ी
उस माँ के चेहरे को देख लेना
जो अपनी हर दुआ में
सिर्फ़ तुम्हारा नाम रखती है।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
अगर बात मोहब्बत की हैं तो बताओ ना
या फिर कोई गीत हैं तो गुनगुनाओ ना
कब से सब मैं ही कहे जा रहा हूँ
तुम भी कुछ दिल की बात सुनाओ ना
वहां से कहोगी तो अच्छा नहीं लगेगा
दूर क्यों बैठी हो , पास ही आ जाओ ना
मैं कब से बेचैन हूँ जानने को
दिल में क्या छुपाया हैं , जरा दिखाओ ना
इजहार का सोच कर आई हो , तो कहो
एक बार मुझे भी अपने सीने से लगाओ ना…
कुछ तो कहो यु चुप ना रहो.. मेरी बातो को तो समझ पाओ न…
NSW अनुभवी लेखक -🥇
जो हमसे दूर हुए..
हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

किसी शहर के सुदूर किनारे, एक सुनसान गांव था, जिसका नाम था “ख़ून-ख़राबा”. यह गांव अपने अनोखे नाम के लिए मशहूर था, और इसका कारण था वहां का बेरहम क़ातिल, जिसका नाम था “शेरखान”. शेरखान एक तगड़ा, कद्दावर आदमी था, जिसकी आँखों में दरिंदगी और चेहरे पर डर का साया था। वह गांव के लोगों के लिए एक बुरे सपने की तरह था, जिसका नाम सुनते ही सभी का दिल दहशत से कांपने लगता था।
शेरखान के दिल में किसी प्रकार का इंसानियत का अंश नहीं था। उसकी निर्दयता के किस्से गांव के बूढ़े-बुजुर्गों की ज़बान पर हमेशा रहते थे। कहा जाता था कि जब वह किसी को मारता था, तो उसके चेहरे पर एक आतंकित मुस्कान होती थी, जैसे वह जीवन का खेल खेल रहा हो। शेरखान अपने victims को अपने तरीके से चुनता था; वह उन्हीं लोगों को अपना निशाना बनाता था, जो उसके अनुसार कमजोर, बेबस या समाज के खिलाफ खड़े होते थे।
वह अक्सर निशाने को अपने घर के पास बुलाता था। पसंदीदा खेलों की तरह, वह उन्हें एक भव्य मेज़बानी के बहाने आमंत्रित करता। उसे यह बेहद सुकून देता था कि वह अपने शिकार को उनकी खुद की लाचारी के पल में पकड़ सके। जब वह उन्हें अपने जाल में फंसा लेता, तो वह उनकी आंखों में डर और य hopelessness को देखता, और यह उसे और भी ख़ुश करता।
मारने के अपने तरीके में, शेरखान बेहद क्रूर था। वह अपने शिकार को कभी तड़पाते, कभी उनके सामने अपने शक्ति के प्रदर्शन करता। यह सब करते समय, वह अक्सर हंसता और कुल्ला दिखाता, जैसे वह जीवन को एक मज़ेदार तमाशा मानता हो। उसकी निर्दयता का एक और कारण था – वह चाहता था कि लोग उसकी ताकत को समझें और उसे डरें। अपने आपको सबसे शक्तिशाली साबित करने के लिए, उसने नरसंहार को अपना माध्यम बना लिया।
गांव में शेरखान की आतंकित चाल चलती रही, लेकिन समय कभी ठहरता नहीं। एक दिन, गांव के कुछ बहादुर युवकों ने मिलकर फैसला किया कि अब उन्हें इस नरभक्षी का सामना करना होगा। उन्होंने अपने दिल में एक उम्मीद जगाई, और शेरखान के वर्चस्व को खत्म करने के लिए योजना बनाई।
शेरखान से टकराने के लिए उन्होंने एक रात का चुनाव किया। युवा पुरुषों ने मिलकर शेरखान को चुनौती दी। वह हंसते हुए उनकी ओर बढ़ा, लेकिन इस बार वह अकेला नहीं था। गांव की एकजुटता ने उसकी ताकत को कमजोर कर दिया। अंततः, शेरखान को अपने ही खेल में मात मिली और गांव वालों ने उसके आतंक से मुक्ति पाई।
इस तरह, बेरहम क़ातिल की कहानी समाप्त हुई, लेकिन गांव के लोग उसकी यादों को कभी भुला नहीं पाए।
गांव वाले अब एक नई सुबह का स्वागत कर रहे थे, एक ऐसे भविष्य की जो शेरखान की दहशत से मुक्त थी। लेकिन उन पर पड़ने वाले आतंक का छाया अभी भी उनके मन में बनी हुई थी। शेरखान की क्रूरता की कहानी ने उन्हें जीवन भर याद रहने वाले सबक दिए थे।
गांव में कुछ युवा, जो शेरखान की चुनौती के दौरान साहस दिखा चुके थे, अब गांव की बुनियाद को मजबूत करने के लिए आगे बढ़े। उन्होंने मिलकर गांव में एक सुरक्षात्मक टीम बनाई। यह टीम गांव को न केवल बाहरी खतरों से बल्कि आंतरिक भ्रांतियों से भी सुरक्षित रखने के लिए गठित की गई थी।
दिल्ली से कुछ दूर, गांव के मुख्य चौक पर एक सभा का आयोजन किया गया। पुरखों की कहानियों की तरह, यह सभा भी गांव की एकता और ताकत को महत्वपूर्ण बनाते हुए थी। लोगों ने शेरखान के आतंक को दूर रखने और अपने गांव को फिर से एक मजबूत इकाई बनाने का संकल्प लिया। उन्होंने पारिवारिक मूल्यों की बात की, सहयोग की चर्चा की और एक-दूसरे का साथ देने के वादे किए।
समय बीतता गया, लेकिन शेरखान की डरावनी यादें लोगों को सताती रहीं। एक बुजुर्ग ने सुझाव दिया कि भय को हटाने का सबसे बेहतर तरीका है उसे लोगों के दिलों में प्यार और एकता डालकर हराना। इस पर गांव के लोगों ने एक बड़ी प्रेरणादायक योजना बनाई – “हमेशा एक साथ” नाम से एक कार्यक्रम।
“हमेशा एक साथ” का आयोजन गांव में खेलों, नाटकों, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से किया गया। इसमें बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी ने भाग लिया। यह कार्यक्रम न केवल मनोरंजन का स्रोत बना बल्कि गांव के लोगों को एक दूसरे के करीब लाने में भी मददगार साबित हुआ।
इस नई एकता के साथ, गांव वाले अब न केवल अपने लिए बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक सुरक्षित वातावरण तैयार कर रहे थे। वे यह समझ चुके थे कि डर और आतंक से कैसे निपटना है। उन्होंने अपने गांव के चारों ओर एक सुरक्षा दीवार खड़ी की, जहां हर सदस्य एक दूसरे के हिस्से की जिम्मेदारी लेता था।
अचानक, कुछ समय बाद, गांव में एक नई समस्या आई। शेरखान का एक साथी, जो उसने पिछले दिनों में छोड़ दिया था, गांव में लौट आया था। लेकिन इस बार, गांव वाले फिर से एकजुट थे। उन्होंने इसे एक सुनहरा अवसर माना कि वे उन मूल्यों को फिर से जी लें, जो उन्होंने शेरखान के आतंक से सीखे थे।
गांव के युवा, अब पहले से अधिक संगठित, एकजुट होकर उस साथी का सामना करने को तैयार थे। उन्होंने उसके कार्यों को सीमित करने के लिए एक योजना बनाई। जब वह गांव के करीब आया, तो युवाओं ने उसे समझाया कि वे एकजुट हैं और अब कोई भी आतंक उनके गांव में स्थान नहीं पाएगा।
साथी ने उन पर हमला करने की कोशिश की, लेकिन गांव के युवा उसकी हर चाल को समझ गए। अंततः, गांव के लोगों ने उसे समझाया कि वे डरने वाले नहीं हैं और अगर उसे समझने में दिक्कत हो रही है, तो वह उन मूल्यों को समझने के लिए तैयार हो जाए, जो उन्होंने सीखे हैं।
गांव के लोगों ने देखा कि यदि वे शांतिपूर्ण तरीके से संवाद करें, तो वे अपने दुश्मनों को समझा सकते हैं। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने साबित किया कि डर और हिंसा को प्रेम और संवाद से हराया जा सकता है।
इस तरह, “ख़ून-ख़राबा” गांव ने न केवल अपने शत्रुओं को परास्त किया बल्कि एक ऐसा सामाज स्थापित किया जहां प्रेम, एकता और साहस सदैव जीवित रहेगा। शेरखान और उसके साथियों की कहानियाँ अब सिर्फ एक याद बन गई थीं, लेकिन गांव ने अपने मूल्यों को कभी नहीं भुलाया।
गांव की नई पीढ़ी अब शेरखान जैसी डरावनी यादों के बिना बड़ी हो रही थी। वे सब एक साथ, हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार थे। यह उनकी एकता और प्रेम की कहानी बन गई, जो आने वाले समय में हमेशा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
Lakshmi kumari

NSW अनुभवी लेखक -🥇

कुकी ने हिम्मत जुटाई और खरगोशों की ओर बढ़ी। “नमस्कार, मैं कुकी हूँ, क्या मैं आपके साथ खेल सकती हूँ?” उसने शर्माते हुए पूछा। खरगोशों ने उसे घूरा और फिर हंसते हुए कहा, “तुम इतनी धीमी हो, हम तुम्हारे साथ कैसे खेल सकते हैं?”
कुकी का दिल टूट गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। “मैं धीमी हो सकती हूँ, लेकिन मैं आपके साथ खेल का एक नया तरीका ढूंढ सकती हूँ,” उसने कहा। “क्या आप मुझे मौका देंगे?”
बंटी और चंचल एक-दूसरे की ओर देखे और लम्बी श्वास लेते हुए बंटी ने कहा, “ठीक है, हम तुम्हें एक मौका देंगे। लेकिन तुम्हें हमें ज़रूर दिखाना होगा कि तुम हमारी तरह खेल सकती हो।” चंचल ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, बस हमें दिखाओ कि तुम खेल में कैसे शामिल हो सकती हो।”
कुकी ने खुशी से सहमति जताई। “धन्यवाद, दोस्तों! मैं पूरी कोशिश करूँगी!” अब कुकी के मन में उत्साह भर गया था। उसने सोच लिया कि उसे अपनी ताकत दिखाने का सही मौका मिल गया है। उसने तुरंत एक योजना बनाई।
कुकी ने सोचा कि सबसे पहले उन्हें एक ऐसा खेल खेलना चाहिए जिसमें धैर्य और रणनीति दोनों की आवश्यकता हो। “चलो, हम एक तनावपूर्ण दौड़ का आयोजन करते हैं!” उसने प्रस्ताव रखा। “हम दौड़ते हुए एक दूसरे को कुछ संकेत देंगे और उसके अनुसार खेलेंगे।”
सभी जानवरों को यह विचार पसंद आया क्योंकि इस खेल में उन्हें अंततः अपनी योग्यताओं का इस्तेमाल करने का मौका मिल रहा था। कुकी ने गेम के नियम स्थापित किए:
1. सभी प्रतिस्पर्धियों को एक निश्चित बिंदु से दौड़ना होगा, जो पूरे जंगल में होगा।
2. जहाँ भी रास्ते में रुकावट आएगी, उन्हें बिना भागे सही रास्ता ढूंढना होगा।
3. अंत में, सभी ko मिलकर सुराग भेड़ने होंगे और अपने-अपने रास्ते पर पहुँचने का प्रयास करना होगा।
“यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है,” कुकी ने कहा। “हमें धैर्य से काम लेना चाहिए और एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। जो भी पहले पहुंचा, उसे विजेता का नाम मिलेगा, लेकिन सच्चा विजेता वो होगा जो दूसरों की मदद करेगा।”
खरगोशों ने विचार किया और फिर उनमें से बंटी ने कहा, “अच्छा, यह तो दिलचस्प लग रहा है। चलो देखते हैं कि क्या तुम यह कर सकती हो।” चंचल ने भी उत्साहित होते हुए हंसते हुए कहा, “हमें तुम्हारी मदद से यह देखना होगा कि तुम कितनी अच्छी हो!”
खेल का आरंभ हुआ और सभी जानवर अपने-अपने स्थानों पर खड़े हो गए। कुकी ने सभी को बताना शुरू किया कि उन्हें शुरुआत में क्या करना है। जैसे ही दौड़ शुरू हुई, बंटी और चंचल तेज़ी से दौड़ने लगे। कुकी अपनी धीमी गति के साथ उनके पीछे चलने लगी।
दौड़ में पहले ही मोड़ पर ज़मीन में गड्ढे थे। बंटी और चंचल ने सर्किट को चिह्नित किया और पहले ही आगे बढ़ गए। लेकिन कुकी ने देखा कि गड्ढों के पास एक ऐसा रास्ता था जो दोनों जानवरों ने नहीं देखा। वह गड्ढों को चकमा देकर उस रास्ते पर चलने लगी।
जैसे ही वह गड्ढों को पार कर रही थी, उसके मन में एक विचार आया: “यह मेरी धीमी गति का फायदा है!” इसने उसे यह समझने में मदद की कि कभी-कभी धीमे चलने का मतलब यह नहीं होता कि कोई पीछे रह गया है।
आखिरकार, उसने मोड़ पर पहुँचकर देखा कि बंटी और चंचल एक साथ में खड़े थे और अपने आगे के रास्ते पर विचार कर रहे थे। कुकी ने खुशी-खुशी वहाँ पर पहुँचकर कहा, “मैंने एक और रास्ता देखा जो हमें ज्यादा तेज़ी से आगे बढ़ा सकता है। हमें वहाँ से चलना चाहिए।”
बंटी और चंचल ने कुकी की बात सुनी और उसका ध्यानपूर्वक गौर किया। “तुम सच में सोच रही हो, कुकी!” बंटी ने कहा। “हम बस अपनी गति में चलने के चक्कर में इसे देख नहीं पाए।” चंचल ने सहमति जताते हुए कहा, “हाँ, चलो देखते हैं कि यह रास्ता हमें कहाँ ले जाता है।”
कुकी ने संकेत किया और वे सभी मिलकर उस नए रास्ते पर चलने लगे। यह रास्ता थोड़ा कठिन था, लेकिन कुकी की धारणा और उसके धैर्य ने उन्हें जल्दी ही सही दिशा में पहुँचाने में मदद की। जब वे आगे बढ़ रहे थे, तो कुकी ने ध्यान दिया कि रास्ते में कई ऐसे बाधाएँ थीं, जिनका सामना करना पड़ा।
“हमें एक बड़ा पत्थर पार करना है,” चंचल ने कहा और तुरंत खुद को दौड़कर पत्थर पर चढ़ा दिया। बंटी ने भी उसका अनुसरण किया। लेकिन कुकी अपने धीमे कदमों से पहले झुक गई और सोचने लगी, “क्या मैं इससे आगे निकलने के लिए कोई और उपाय कर सकती हूँ?”
उसने पत्थर के पीछे झुककर देखा और पाया कि वहाँ एक जगह थी जहाँ से वे पत्थर के चारों ओर जा सकते थे। “दोस्तों, यहाँ एक और रास्ता है!” उसने शोर नहीं मचाते हुए कहा। “यहाँ से हम पत्थर के चारों ओर जा सकते हैं।”
बंटी और चंचल ने एक पल के लिए उसे घूरा, लेकिन फिर वे उसके साथ उस हिस्से में गए। धीरे-धीरे और सावधानी पूर्वक वे सभी उस नई रूट से आगे बढ़ने लगे। अब उनमें से कोई भी और तेजी से दौड़ नहीं रहा था, बल्कि सभी कुकी की सुझाई दिशा का अनुसरण कर रहे थे।
जैसे-जैसे दौड़ आगे बढ़ी, कुकी के द्वारा बताई गई हर छोटी सलाह ने उन्हें और अधिक समर्थ बना दिया। उन्होंने समझा कि कुकी की धीमी गति में भी एक विशेषता थी – साहस, धैर्य और सहानुभूति। कुकी ने न केवल अपनी गति से दूसरों को मदद की, बल्कि उसने उन्हें यह भी बताया कि कैसे सहकारिता सबसे महत्वपूर्ण है।
अब जंगली कौन सा जानवर सबसे तेज दौड़ रहा था, इस पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन्होंने अपनी ताकतों का सही उपयोग करना शुरू कर दिया। जब भी कोई रुकावट आती, वे मिलकर उसे पार कर जाते। कुकी की बुद्धिमता और सृजनात्मकता ने उन्हें उन बाधाओं को पार करने में मदद की जो पहले कठिन लग रही थीं।
“धन्यवाद, कुकी, तुमने हमें नई रणनीतियों के बारे में बताया!” चंचल ने चहकते हुए कहा। “तुमने साबित कर दिया कि केवल तेज़ दौड़ने से ही नहीं, दोस्तों को मदद कर के भी हम जीत सकते हैं।”
आख़िरकार, जब वे दौड़ समाप्त करने के करीब पहुँच गए, एक तेज़ झरने का भाग उनके सामने आया। बंटी और चंचल थोड़े चिंतित दिखे। “हम इसे कैसे पार करेंगे? हम तैर नहीं सकते!” बंटी ने कहा।
कुकी ने सोचा और फिर कहा, “हम इसे एक-दूसरे की मदद से पार कर सकते हैं। तुम दोनों उस ओर कूदो, मैं तुम्हें एक मजबूत तने से पकड़ने में मदद करूँगी।”
बंटी और चंचल ने एकजुट होकर काम किया और कुकी की योजना के अनुसार पहुँच गए। कुकी ने धीरे-धीरे तने पर चढ़ाई की और अंत में दोनों को सुरक्षित पार कर दिया। अब उन्हें एक पल के लिए कुकी की योजना के बिना जीत की कोई उम्मीद नहीं

NSW अनुभवी लेखक -🥇
“सच्चा प्रेम शब्दों से नहीं,
समर्पण और एहसास से दिखाई देता है।
जिस रिश्ते में सम्मान, विश्वास और अपनापन हो,
वहीं प्रेम जीवन को खूबसूरत बना देता है।” ❤️
प्यार केवल पाने का नाम नहीं,
बल्कि किसी की खुशी में खुद को भूल जाने का एहसास है।
NSW अनुभवी लेखक -🥇
जो हमसे दूर हुए..
हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

जंगल में एक छोटा सा जुगनू रहता था जिसका नाम था चमकी। चमकी बहुत चंचल था और हमेशा आसमान के तारे देखने की चाह में रहता था। उसे रात में आसमान में चमकते हुए तारे बहुत पसंद थे। चमकी हर रात अपनी छोटी-सी रोशनी के साथ जंगल में उड़ता और तारे देखने का आनंद लेता। लेकिन एक चीज उसे हमेशा परेशान करती थी—क्योंकि वह जानता था कि वह बहुत छोटा आहे, और उसकी चमक तारे के मुकाबले बहुत छोटी थी।
एक रात, चमकी ने शांति से आसमान की ओर देखा। उसने एक तारे को बहुत करीब से देखा और वह बड़ा और चमकीला लग रहा था। उसने सोचा, “कितना अच्छा होगा अगर मैं भी ऐसा चमकदार और बड़ा बना पाऊँ।” लेकिन उसे यह सोचकर बहुत दुःख हुआ कि उसकी रोशनी तो बहुत छोटी है। “मेरी रोशनी किसी को नहीं दिखती,” उसने उदासी से सोचा।
चमकी ने अपनी दुखी मनोदशा को समाप्त करने का निर्णय किया। उसने सोचा, “अगर मैं खुद को बदल नहीं सकता, तो मुझे अपनी चमक को पहचानने की कोशिश करनी पड़ेगी। मुझे अपनी चमक को अधिकतम करने के लिए परिश्रम करना होगा।” ऐसा सोचकर, उसने अपने आप को प्रेरित किया और अपने दोस्तों से बात करने का प्रस्ताव दिया।
उसने अपने दोस्तों से, जैसे तितली, गेंदे का फूल, और अन्य छोटे जीवों से मदद मांगी। सब उसे हंसते हुए सुन रहे थे, बताने लगे, “तुम तो बस एक जुगनू हो, क्या तुम तारे के समान चमक सकती हो?” हालांकि, चमकी ने अपने भीतर की आशा को नहीं छोड़ा। वह समझता था कि हर कोई अपनी विशेषता के साथ अद्वितीय होता है।
एक दिन, चांद की रोशनी में, उसने अपने दोस्तों को इकट्ठा किया और कहा, “मैं चाहूँगा कि मैं एक रात में चमकने के लिए अपनी पूरी कोशिश करूँ। मैं आकाश के तारे की तरह चमकने की कोशिश करूंगा।” उसने अपने दोस्तों से समर्थन मांगते हुए कहा कि वह एक शक्तिशाली रोशनी उत्पन्न कर सकता है, अगर वे उसकी सहायता करें।
उसके दोस्तों ने उसकी सहयोग की बात सुनी और उसे प्रेरित किया। रंग-बिरंगी तितलियाँ उसके चारों ओर उड़ने लगीं और गेंदे का फूल भी चमकी को प्रोत्साहित करने लगा। सबने कहा, “हम तुम्हारे साथ हैं, चमकी! तुम कर सकते हो!”
तब चमकी ने अपने एक दोस्त, एक साधारण कागज के फूल से भी मदद मांगी। उसने कहा, “अगर तुम मेरे साथ रहोगे, तो मैं तुम्हारी सहायता से अपनी रोशनी को और तेज़ कर सकूँगा।” फूल ने समझाया, “मैं जुगनू में विश्वास करता हूँ। तुम्हारी रोशनी की उत्तमता तुम्हारे भीतर ही है, बस तुम्हें उसे ढूंढना है।”
उस रात, सबने मिलकर एक योजना बनाई। जुगनू ने सोचा, “यदि मैं अपनी रोशनी को चमकाने के लिए खुले आसमान में उड़ता रहूँगा और अपने दिल की गहराइयों से चमकूँगा, तो शायद मैं सच में चमक सकता हूँ।” उसने अपने दोस्तों के सहयोग से एक बड़े वृक्ष के नीचे एक मंडली बनाई, जहाँ सभी ने अपनी रोशनी और रंग-बिरंगे पंख फैलाए।
चमकी ने पेड़ की शाखाओं पर बैठकर अपनी पूरी ताकत लगाई। वह अपनी पंखों को झपकाने लगा, और धीरे-धीरे उसकी चमक बढ़ने लगी। उसके दोस्तों ने उसका उत्साह बढ़ाया और चारों ओर से उसका समर्थन किया। सभी ने मिलकर एक सुंदर प्रदान दिया, और चमकी की रोशनी आसमान में फैलने लगी। धीरे-धीरे, चमकी ने अपनी रोशनी
का समर्पण किया,
Lakshmi Kumari

NSW अनुभवी लेखक -🥇