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श्रेणी: कहानी

दिल से दिल तक पहुंचने वाली एहसास कहानी बनती है।

  • मेरा चांद…!!

    मेरा चांद…!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    रोशन है ऐ चांद तुमसे धरती का कोना- कोना,

    एक चांद मेरे पास भी है जिससे

    रोशन है मेरी जिंदगी का अंधियारा,

    ऐ चांद तुम पर बंदिशें है बादलों,

    बारिशों और आसमान में छाए धुंध की,

    मेरा चांद है मेरे पास मेरे हर लम्हें ,

    मेरे हर वजूद की परछाई में ,

    मैं तुम्हें देखूं जो बादलों से

    आ़खंमिचौली करता है,

    या उसे जो मेरे साथ मेरे हाथों

    में डालें हाथ एकटक तुम्हें निहारता है, 

    वो प्रमाण है मेरी जिंदगी की

    हर उधेड़बुन का,

    तुम्हीं बताओ अब उसे कैसे

    ना देखूं मैं तुमसे पहले ,

    तुम पर हक कविता शायरी

    करने का हक सबको मिला है  ,

    मेरा चांद मेरे दिल का चैन 

    उसने अपने सारे हक़ मेरे नाम किये,

    वो सिर्फ मेरा है  ,

    मेरे इस दिल ,जज़्बात ,ज़िन्दगी ,पर

    हक़ सिर्फ उसका है …!!

  • तकदीर का खेल

    तकदीर का खेल

    पढ़ने का समय : 7 मिनट
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    तकदीर का खेल

    भूमिका

    तकदीर, किस्मत, भाग्य – ये शब्द इंसान की ज़िंदगी में उतने ही मायने रखते हैं, जितने मेहनत और हौसले। कोई अपनी मेहनत से तकदीर बदलने की कोशिश करता है, तो कोई इसे अपनी नियति मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेता है। लेकिन क्या तकदीर सच में पहले से लिखी होती है, या इंसान अपने कर्मों से इसे बदल सकता है? यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जो तकदीर के खेल में उलझा, संघर्ष किया, और अंत में अपनी मेहनत से अपनी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी।

    गंगा किनारे बसा एक छोटा सा गाँव “शिवपुर”। गाँव के बाहर कच्चे रास्ते पर एक झोपड़ी में रहता था अर्जुन। उम्र लगभग 25 साल, चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक, मगर किस्मत ने जैसे उसके हिस्से में संघर्ष ही लिख दिया था। माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे, और एक छोटी बहन राधा उसकी जिम्मेदारी थी।

    अर्जुन बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था, मगर गरीबी ने उसे ज्यादा आगे नहीं बढ़ने दिया। मजबूरी में उसे मजदूरी करनी पड़ी, ताकि बहन की देखभाल कर सके। गाँव के बड़े लोग कहते थे, “अरे अर्जुन, तकदीर में जो लिखा है, वही होगा। मेहनत कर भी लेगा तो क्या होगा?” लेकिन अर्जुन इस सोच को मानने को तैयार नहीं था

    दूसरा अध्याय: संघर्ष की राह

    अर्जुन का सपना था कि वह बहन को अच्छी शिक्षा दिलाए और खुद भी अपनी जिंदगी सुधार सके। लेकिन तकदीर बार-बार उसकी परीक्षा लेती रही।

    एक दिन गाँव के जमींदार रतनलाल ने अर्जुन को बुलाया।

    “अर्जुन, मेरी जमीन पर मजदूरी करेगा? अच्छा पैसा दूँगा।”

    अर्जुन के पास कोई और चारा नहीं था, उसने हामी भर दी। दिनभर खेतों में मेहनत करता और रात को थका-हारा घर लौटता। मगर मन में एक ही सवाल घूमता – क्या यह जिंदगी भर चलने वाला है?

    एक दिन उसकी मुलाकात रमेश से हुई, जो शहर में नौकरी करता था।

    “अर्जुन, तू बहुत मेहनती है, शहर चल, वहाँ अच्छा काम मिलेगा,” रमेश ने सुझाव दिया।

    अर्जुन के मन में उम्मीद की किरण जागी। उसने फैसला किया कि वह भी शहर जाएगा और अपनी तकदीर को आजमाएगा।

    अर्जुन अपनी बहन को पड़ोसी के पास छोड़कर शहर चला गया। वहाँ नौकरी की तलाश शुरू की, मगर हर जगह सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। बिना किसी जान-पहचान के उसे कोई काम नहीं मिल।

    एक दिन, जब अर्जुन भूखा-प्यासा सड़क किनारे बैठा था, तब एक व्यापारी महेश गुप्ता ने उसे देखा।

    “क्या हुआ बेटा? परेशान क्यों है?” महेश जी ने पूछा।

    अर्जुन ने अपनी पूरी कहानी सुना दी। महेश जी ने उसे अपनी दुकान पर काम दे दिया। धीरे-धीरे अर्जुन मेहनत करने लगा और अपनी ईमानदारी से महेश जी का विश्वास जीत लिया।

    अर्जुन अब दुकान में अच्छा काम करने लगा था। वह सिर्फ सेल्समैन नहीं, बल्कि व्यापार के हर पहलू को समझने लगा था। महेश जी ने उसकी लगन को देखकर उसे और बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी।

    कुछ सालों बाद, अर्जुन महेश जी का सबसे भरोसेमंद व्यक्ति बन गया। लेकिन तभी तकदीर ने एक और खेल खेला – महेश जी का अचानक देहांत हो गया। उनकी फैमिली को बिजनेस में कोई रुचि नहीं थी, इसलिए उन्होंने दुकान बेचने का फैसला किया।

    अर्जुन के सामने बड़ा सवाल था – क्या वह अपनी अब तक की मेहनत को यूँ ही छोड़ दे? या कुछ बड़ा करने की सोचे?

    पाँचवाँ अध्याय: तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ?

    अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और अपनी सारी बचत और थोड़े पैसे उधार लेकर वही दुकान खरीद ली। अब वह खुद का मालिक बन चुका था। उसकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा।

    कुछ सालों में उसने अपने व्यापार को इतना बढ़ाया कि वह अब सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि कई दुकानों का मालिक बन चुका था। वह गाँव लौटा और अपनी बहन को अच्छे कॉलेज में पढ़ने भेजा।

    गाँव के लोग जो कभी उसे तकदीर का मारा समझते थे, अब कहते थे, “देखो, अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद लिखी!”

    निष्कर्ष: तकदीर बनती है मेहनत से

    अर्जुन की कहानी बताती है कि तकदीर का खेल असल में मेहनत का ही खेल है। अगर वह भी दूसरों की तरह तकदीर को दोष देकर बैठ जाता, तो उसकी जिंदगी वहीं खेतों में मजदूरी करते बीत जाती। लेकिन उसने अपने हौसले से, अपनी मेहनत से अपनी तकदीर खुद लिखी।

    तो, तकदीर बदली या मेहनत ने बदला सबकुछ? जवाब साफ है – तकदीर का खेल असल में मेहनत और संघर्ष की परीक्षा ही है!

    अर्जुन ने अपनी मेहनत से अपना व्यापार खड़ा कर लिया था, लेकिन ज़िंदगी में सफलता के साथ चुनौतियाँ भी आती हैं। जब उसका बिज़नेस अच्छा चलने लगा, तो कई लोगों की नज़रें उस पर टेढ़ी हो गईं।

    गाँव के जमींदार रतनलाल, जो कभी उसे मजदूरी के लिए बुलाते थे, अब उसकी बढ़ती सफलता से जलने लगे। उन्होंने अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं कि अर्जुन ने गलत तरीकों से पैसा कमाया है।

    एक दिन गाँव की पंचायत में यह मामला उठा। रतनलाल ने कहा,

    “अर्जुन, तू गाँव का एक गरीब लड़का था, अचानक इतना अमीर कैसे बन गया? जरूर कोई बेईमानी की होगी!”

    अर्जुन चुपचाप सबकी बातें सुनता रहा। फिर उसने जवाब दिया,

    “मैंने दिन-रात मेहनत की, संघर्ष किया, शहर में धक्के खाए, तब जाकर इस मुकाम तक पहुँचा हूँ। अगर कोई यह साबित कर दे कि मैंने गलत तरीके से कुछ कमाया है, तो मैं खुद सारा व्यापार छोड़ दूँगा!”

    गाँव के बुजुर्ग जानते थे कि अर्जुन ईमानदार है। उन्होंने पंचायत में ही उसका समर्थन किया और कहा,

    “तकदीर उसी की बदलती है जो मेहनत करना जानता है। अर्जुन ने अपने कर्मों से अपना भाग्य लिखा है।”

    रतनलाल चुप हो गए, लेकिन अर्जुन समझ गया कि सफलता के साथ आलोचना भी मिलती है।

    इधर अर्जुन की बहन राधा ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली और उसे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई। अर्जुन ने सोचा कि अब उसकी बहन की शादी करवा दी जाए। उसने राधा से पूछा,

    “क्या तुम किसी को पसंद करती हो, या फिर मैं तुम्हारे लिए अच्छा रिश्ता देखूं?”

    राधा थोड़ी संकोच में थी, फिर उसने कहा,

    “भइया, मेरा एक दोस्त है, जो बहुत अच्छा इंसान है। अगर आप मिलना चाहें, तो मैं उसे घर बुला सकती हूँ।”

    अर्जुन को खुशी हुई कि उसकी बहन अपने फैसले खुद लेने के लायक बन गई थी। उसने उस लड़के से मुलाकात की और जब देखा कि वह वाकई ईमानदार और मेहनती है, तो उसने शादी के लिए हाँ कर दी।

    शादी के दिन पूरा गाँव खुशी से झूम उठा। अर्जुन को देखकर लोग कहते,

    “अर्जुन ने अपनी तकदीर खुद बनाई और अब अपनी बहन की जिंदगी भी संवार दी!”

    राधा की शादी के बाद अर्जुन ने अपने बिज़नेस को और आगे बढ़ाने का फैसला किया। उसने गाँव के कई बेरोजगार युवाओं को अपने काम से जोड़ा और उन्हें नौकरी दी।

    अब वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे गाँव की तकदीर बदलने की कोशिश कर रहा था। उसने गाँव में एक स्कूल भी खुलवाया, ताकि किसी और अर्जुन को अपनी पढ़ाई अधूरी न छोड़नी पड़े।

    धीरे-धीरे, गाँव के लोग भी मेहनत की अहमियत समझने लगे। वे भी किस्मत को कोसने के बजाय अपने हाथों से अपना भविष्य गढ़ने में जुट गए।

    एक दिन अर्जुन अपनी दुकान के बाहर बैठा था, जब एक बुजुर्ग ने आकर कहा,

    “बेटा, सच ही कहते हैं – तकदीर कोई लिखकर नहीं लाता, उसे मेहनत से गढ़ना पड़ता है। तूने यह साबित कर दिया!”

    अर्जुन मुस्कुराया और बोला,

    “हाँ काका, तकदीर का खेल असल में हमारे हाथ में ही होता है। अगर हम मेहनत करें, तो हम अपनी ज़िंदगी खुद बना सकते हैं।

    उस दिन अर्जुन को अहसास हुआ कि उसने सिर्फ अपनी तकदीर नहीं बदली, बल्कि अपने गाँव की सोच भी बदल दी थी। अब कोई भी तकदीर को कोसकर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता था – सब मेहनत की ताकत को समझ चुके थे।

    और इस तरह, तकदीर का खेल अर्जुन की मेहनत के आगे हार गया।

  • स्वाद की खोज

    स्वाद की खोज

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

    जॉन एक युवा शेफ था जो न्यूयॉर्क शहर में रहता था। उसका सपना था कि वह दुनिया के विभिन्न हिस्सों के व्यंजनों को सीखकर अपने रेस्तरां में पेश करे। एक दिन, उसने यूरोप की यात्रा करने का निर्णय लिया ताकि वहाँ के पारंपरिक व्यंजनों का अध्ययन कर सके।

    पहला पड़ाव इटली था, जहाँ उसने पिज़्ज़ा और पास्ता के विभिन्न प्रकारों को बनाना सीखा। नेपल्स में, उसने असली नेपोलिटन पिज़्ज़ा के रहस्यों को जाना, जबकि बोलोग्ना में उसने टैग्लिएटेल अल रागू की विधि सीखी।

    इसके बाद, वह फ्रांस गया, जहाँ उसने पेस्ट्री और बेकिंग की कला में महारत हासिल की। पेरिस में, उसने क्रोइसेंट और बैगेट बनाना सीखा, जबकि लियोन में उसने कोक औ विन और बुफ़ बौर्गिन्योन जैसे पारंपरिक व्यंजनों का ज्ञान प्राप्त किया।

    स्पेन में, जॉन ने तपस और पेला की विविधताओं का अध्ययन किया। बार्सिलोना में, उसने पेला वेलेंसियाना बनाना सीखा, जबकि मैड्रिड में उसने विभिन्न तपस व्यंजनों का स्वाद लिया और उनकी तैयारी की विधियाँ सीखीं।

    यूरोप की इस यात्रा ने जॉन के ज्ञान को समृद्ध किया और उसे पाश्चात्य व्यंजनों की गहराई और विविधता का अनुभव कराया। अपने देश लौटकर, उसने अपने रेस्तरां में इन सभी व्यंजनों को शामिल किया, जिससे उसके ग्राहकों को विभिन्न पाश्चात्य स्वादों का आनंद मिला।

    इस प्रकार, जॉन की यह यात्रा न केवल उसके व्यक्तिगत विकास का साधन बनी, बल्कि उसने अपने समुदाय को भी पाश्चात्य व्यंजनों की समृद्ध विरासत से परिचित कराया।

  • वो आखरी मेसेज

    वो आखरी मेसेज

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    तकरीबन सवा साल बीत गया था उसे गए हुए,

    कल अचानक उसका एक मैसेज आया

    सिर्फ एक शब्द लिखा था, 

     

    “सुनो…”

     

    मैंने फोन हाथ में लिया, पर उंगलियाँ कांप रही थीं,

    दिल ने कहा सब कह डालो जो इन महीनों में सहा है,

    दिमाग ने कहा खामोश रहो, उसने तुम्हें कब का भुला दिया है।

    ​मैंने टाइप करना शुरू किया

    “पता है? तुम्हारे जाने के बाद मैंने हंसना छोड़ दिया है,” (फिर मिटा दिया…) फिर लिखा

    “आज भी रात को जब नींद खुलती है, तो फोन में तुम्हारा नाम ढूंढते है,” (फिर मिटा दिया…) 

     

    आखिर में मैंने सिर्फ इतना लिखा “कहो, कैसे हो?” उसका जवाब आया

    “बस यूं ही याद आ गई थी, लगा तुम बदल गए होगे।” मैंने मन ही मन मुस्कुराया,

    अंदर एक टीस उठी और आंखों के कोर भीग गए।

    बदल तो वो लोग जाते हैं जिनके पास कोई और होता है,

    हम जैसे लोग तो बस एक ही याद के सहारे पूरी उम्र गुज़ार देते हैं।

     

    ​तभी स्क्रीन पर ‘Typing…’ दिखा और फिर गायब हो गया,

    शायद उसे भी एहसास हो गया था…

    कि कुछ सवाल पूछने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है।

    ​उस दिन फिर समझ आया

    कुछ लोग हाल पूछने नहीं,

    सिर्फ ये तसल्ली करने आते हैं,

    कि तुम आज भी उनकी यादों की कैद में हो या रिहा हो गए!💔💔💔

     

     

  • परी मां (जलपरी की कहानी)

    परी मां (जलपरी की कहानी)

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     एक गाँव में सुहानी नाम की एक लड़की अपने पिता उदय और सौतेली माँ  मधु के साथ रहती थी , सुहानी की एक सौतेली बहन भी  निशा भी थी , सुहानी की माँ अपनी बेटी को बहुत प्यार करती थी , लेकिन वह सुहानी से नफरत करती थी और दिन भर घर के काम में लगा कर रखती थी , और उसे ठीक से खाना भी नहीं देती थी। 

     

    एक दिन मधु सुहानी को लेकर जंगल जाती है , और लकड़ी काटने लगती है ,  मधु के दिमाग में सुहानी को लेकर कुछ षडयंत्र चल रहा था।

     

    मधु सुहानी से बोली ,” मुझे बहुत प्यास लगी है , जरा पानी ले आओ “!

     

    सुहानी पानी लेने के लिए नदी के पास जाती है ,तो मधु भी दबे पाव सुहानी के पीछे चली जाती है।

     

    सुहानी बहुत ही मासूम थी , उसे पानी से डर लगता था , पर क्योंकि उसकी मां को प्यास लगी थी , इसलिए  वह डर डर के नदी के पास चली गई।

     

    अभी सुहानी पानी भरने के लिए झुकी ही थी कि मधु ने उसे नदी में धक्का दे दिया।

     

    सुहानी जैसे ही पानी में गिरी खुद को बचाने की कोशिश करने लगी पर क्योंकि उसे तैरना नहीं आता था इसलिए वह नदी के किनारे नहीं आ पाई।

     

    सुहानी चीखते हुए बोली ,” मां प्लीज मुझे बचा लो “! 

     

    पर मधु पर कोई असर नहीं पड़ा और वह नफरत से हंसते हुए बोली , ” तुझे बचा लूं , ताकि  मेरी बेटी के हिस्से की खुशी तू खा जाए ,तेरे रहते मेरी बेटी का रिश्ता नहीं हो पाएगा , भगवान ने अक्ल तुझे भला ही कम दी है पर शक्ल बहुत अच्छी दी है , इसलिए जब तक तू जिंदा मेरी बेटी को दुनिया की सबसे अच्छी चीज नहीं मिलेगी “!

     

    सुहानी रोते हुए बोली ,” प्लीज मां बचा लो , मैं बेटी हूं आपकी “!

     

    मधु वह से जाते हुए बोली ,” तू बेटी नहीं है मेरी , सौतेली बेटी है “!

    सुहानी पानी में डूबती रही पर मधु वहां से जा चुकी थी।

     

     कुछ देर बाद जब सुहानी को होश आता है तो वह एक अलग ही दुनिया में होती है, जो बहुत खूबसूरत थी।

     

    सुहानी धीरे से अपनी आंखे खोलती है और इधर उधर देखती है तो उसे ही  तरफ सुंदर  पद पौधे फूल दिख रहे थे,  ये सब देखकर  एक पल के लिए वह बहुत खुश होती है ,और इधर उधर घूमते-घूमते थक जाती है तो पेड़ के नीचे बैठ जाती है।

     

    सुहानी घबराते हुए बोली ,” यह मैं कहां आ गई ,यह कौन सा गांव है “? तभी उसकी नजर एक हवेली पर पड़ती है , सुहानी वह  से उठकर  उस हवेली का दरवाजा खोलती है ,तो उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती है।

     

    सुहानी को वहाँ एक खूबसूरत सी औरत दिखती है जो बड़ी सी कुर्सी में बैठी हुई थी।

     

    वह औरत मुस्कराकर बोली ,” तुम कौन हो ? और यहां कैसे आई “?

     

    सुहानी घबराते हुए बोली ,” मैं सुहानी हूं , और रामपुर गांव में रहती हूं ,और मैं नदी में गिर गई और यहां आ गई “!

     

    सुहानी की बात सुनकर वह औरत सोच में पड़ जाती है ,कि आखिर एक इंसान उनके  जललोक में कैसे आई ?

     

    वह औरत अपनी आंखे बंद करती है और उसे  सब सच पता चल जाता है।

     

     सुहानी बोली ,” आप कौन है और मैं कौन से गांव में हूं “?

     

    वह औरत मुस्कराकर उसके पास जाकर उसका सिर सहलाकर बोली ,” मैं   उर्वशी हूं इस जल लोक की रानी पारी और तुम नदी में गिर गई इसलिए हमारे लोक आ गई हो “!

     

    उर्वशी की बात सुनकर सुहानी घबरा गई , और डरते हुए पीछे होने लगी ।

     

    उर्वशी सुहानी का हाथ पकड़कर बोली ,” घबराओ मत बेटा ,मैं तुम्हे कुछ नुकसान नहीं पहुंचाऊंगी  ,मुझे मालूम है तुम्हारी मां ने तुम्हे मारने की कोशिश की “!

     

    उर्वशी की बात सुनकर सुहानी की आंखे भर आई और वह रोने लगी और उर्वशी को गले लगा लिया।

     

    सुहानी के उर्वशी को गले लगाते ही उर्वशी को  एक अलग सा एहसास हुआ जो वो समझ नहीं पा रही थी।

    उर्वशी  ने सुहानी को खाना खिलाया और फिर अपने साथ सुला दिया।

     

    सुहानी को सोता देख उर्वशी सोचने लगी , कि आखिर एक साधारण लड़की उनके लोक में कैसे आई ? और आखिर क्यों यह अपनी सी लग रही है ।

     

    अब ऐसे ही कुछ दिन निकल गए और सुहानी जल लोक में ही रहने लगी ,और उर्वशी और सुहानी के बीच एक अलग ही रिश्ता बन गया , सुहानी उर्वशी को परी मां कहने लगी।

     

    एक दिन पारियों की बैठक में उर्वशी की दुश्मन शकीरा परी ने भरी सभा में शिकायत की कि उर्वशी ने इंसानों के साथ हाथ मिला लिया है ,जिससे उनके लोक को खतरा है तभी तो इंसानों के जासूस को अपनी बेटी बनाकर रखा है।

     

    शकीरा की बात सुनकर उर्वशी गुस्से से बोली ,” शकीरा सब तुम्हारी तरह स्वार्थी नहीं होते, और यह मासूम सी बच्ची तो खुद अपनो की ठुकराई हुई है किसी को क्या धोखा देगी “!

     

    शकीरा मुस्कराकर बोली ,” रानी परी आप भी तो सब छोड़कर इंसानी दुनिया चली गई थी , तो फिर है आप पर कैसे भरोसा करे “!

     

    शकीरा की बार सुनकर उर्वशी चुप हो गई ,उर्वशी को चुप होता देखकर शकीरा का हौसला बढ़ गया।

     

    शकीरा बोली ,” देखिए रानी परी या तो आप इस लड़की को मार दीजिए या इसकी दुनिया वापिस भेज दीजिए “!

     

    रात के समय  सुहानी खिड़की में बैठी कुछ सोच रही थी , और उसकी आँखें नम थी।

     

    सुहानी को उदास देख उर्वशी उसके पास जाकर बोली ,” क्या हुआ सुहानी इतनी उदास क्यों हो ? घर की याद आ रही है “?

     

    सुहानी नम आंखों से उर्वशी को गले लगा लेती है। और रोते हुए बोली ,” आखिर क्यों मेरी मां मुझे छोड़कर चली गई ? छोटी मां सही कहती थी मैं मनहूस हूं तभी उन्होंने मुझे नदी में फेंक दिया फिर भी मैं बच गई ,और यहां आकर आपके लिए भी मुसीबत बन गई “!

     

    उर्वशी सुहानी का सिर सहलाते हुए बोली ,” परेशान मत हो , मैं अब संभाल लूंगी , और  शकीरा तो हमेशा मेरे खिलाफ षडयंत्र रचती रहती है , चिंता मत करो मैं अब देख लूंगी “!

     

    सुहानी बोली ,” मैं अपनी दुनिया में वापिस जाना चाहती हूं “!

     

    उर्वशी बोली ,” यह क्या बोल रही हो ? उस दुनिया में तुम्हारी मां तुम्हारी जान की दुश्मन है , और तुम्हारे पिता भी हमेशा काम से बाहर रहते है , तो ऐसे में हमेशा तुम्हारी जान को खतरा रहेगा “!

     

    सुहानी बोली ,” परी मां आप चिंता मत करो , मां को अपनी गलती का एहसास हो गया होगा और वो भी मुझे याद करती होगी , इसलिए मैं अपने गांव जाना चाहती हूं”!

     

     उर्वशी परेशान होते हुए बोली ,”  सुहानी जल लोक में है किसी को भी उसकी मर्जी के खिलाफ नहीं रख सकते , अगर तुम जाना चाहती हो तो जाओ ,पर यह अंगूठी  हमेशा अपने पास रखना “!

     

    सुहानी अंगूठी देखते हुए बोली ,”  परी मां यह क्या है “?

     

    उर्वशी सुहानी की उंगली में अंगूठी पहनाते हुए बोली ,” यह जादुई अंगूठी है ,  अगर तुम किसी मुसीबत में हो और  जैसे ही इसे अपने होंठों से चूमकर मुझे याद करोगी , मैं आ जाऊंगी “!

     

     

    सुहानी उर्वशी को गले लगाकर अपने मन में सोचने लगी ,” मैं आपको किसी मुसीबत में नहीं डालना चाहती इसलिए यहां से जा रही हूं ,पर आपसे मुझे मां का प्यार मिला है , मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगी कि अगले जन्म में आप मेरी मां बने “!

     

     सुहानी यह सब मन में बोल रही थी, पर उर्वशी सुहानी के मन की बात सुन पा रही थी , उर्वशी की आंखे भी नम हो जाती है।

     

    कुछ देर बाद सुहानी नदी के किनारे खड़ी थी, सुहानी एक नजर नदी की ओर देखती है और फिर अपने घर चली जाती है।

     

    सुहानी जैसे ही अपने घर जाती है ,तो उसकी मां की नजर उस पर पड़ती है ,और वह बोली ,” यह क्या मैं सपना देख रही हूं , यह तो मर गई थी ,तो फिर यहां कैसे आई “?

     

     

    मधु गुस्से से सुहानी का हाथ पकड़कर बोली ,” यहां क्या कर रही है “?

     

    सुहानी रोते हुए बोली ,” मां मै घर लौट आई”!

     

    मधु बोली ,” निकल जा यहां से ,अब क्या लेने आई है कुलटा “!

     

    सुहानी रोते हुए बोली ,”मां  आप यह क्या कह रही है “?

     

    अभी सुहानी रो ही रही थी तभी उदय आ गया , उदय को देख कर मधु रोते हुए बोली ,” देखिए जी आपकी यह बेटी हमारी नाक कटा के चली गई थी , जैसे तैसे हमने निशा की शादी की और अब यह लौट आई ताकि हमारी पूरे गांव में थू थू हो “!

     

     

    सुहानी अपने पिता के पास जाकर बोली ,” नहीं पिता जी , ऐसा कुछ नहीं है ,मैने कुछ भी किया “!

     

    सुहानी के पिता गुस्से से उसके गाल में एक थप्पड़ मारकर बोले ,” झूठ मत बोलो , तुम भी अपनी मां की तरह धोखेबाज निकली ,मेरी इज्जत उछाल कर भाग गई “!

     

    सुहानी बोली ,” नहीं पिता जी, मैं कहीं नहीं भागी , मां ने मुझे नदी में फेंक दिया था”!

     

    सुहानी की बात सुनकर  मधु सुहानी के बाल पकड़कर खींचते हुए घर के बाहर फेंक देती है और बोली ,” झूठ मत बोल , तू ही अपने किसी यार के साथ भाग गई ,जैसे तेरी मां तुझे पैदा करते ही अपने यार के साथ भाग गई ,तुझे इतनी शर्म नहीं की मैने अपनी बेटी की तरह थे पाला और तू यह इल्जाम लगा रही है मुझपर “!

     

     सुहानी रोते हुए बोली ,” छोटी मां झूठ मत बोलो ,जब जम जंगल लकड़ी लेने गए थे ,आपने ही मुझसे पानी मंगाया और जब मैं नदी में पानी लेने गई तो आपने धक्का दे दिया “!

     

    मधु सुहानी की बात सुनकर घबरा गई, और अपना झूठ छुपाने के लिए रोते हुए उदय के पास गई और बोली ,” यह झूठ बोल रही है ,आप तो जानते है इसी तैरना नहीं आता ,और अगर मैने इसे नदी में फेंका, तो यह बच कैसे गई “!

     

    सुहानी रोते हुए बोली ,” मुझे भी पता पर मैं बच गई ,और जल लोक में चली गई, और वहां परी मां के साथ रहने लगी “!

     

    सुहानी की बात सुनकर मधु उदय की ओर देखकर बोली ,” देखा यह खुद को बचाने के लिए कैसे झूठी कहानी बना रही है “!

     

    उदय मधु की बात में यकीन कर लेता है , और गुस्से से बोला ,” सुहानी झूठ मत बोलो “!

     

    पिता जी मैं झूठ नहीं बोल रही हूं। सुहानी ने रोते हुए कहा।

     

    मधु बोली ,” अच्छा झूठ नहीं बोल रही हो ,तो सबूत दो की तुम पानी में पारियों की दुनिया में चली गई थी ,और परी के साथ रह रही थी ,अरे तुम एक काम करो उस परी को ही क्यों। नहीं बुला लेती “! यह शब्द मधु ने हंसते हुए बोले।

     

    मधु की बात से सुहानी को उर्वशी का ख्याल आया ,और उसने अपने हाथ में पहनी अंगूठी को चूमकर उर्वशी को याद किया।

     

    कुछ ही पल में एक तेज रोशनी उत्पन्न हुई जिससे सभी की आंखे बंद हो गई, जब सुहानी ने आंखे खोली , तो उसके सामने उर्वशी थी।

     

    मधु और उदय ने जैसे ही आंखे खोली , उनकी आंखे उर्वशी को देखकर फटी की फटी रह गई।

     

    सुहानी उर्वशी को गले लगाते हुए बोली ,” परी मां आप आ गई “!

     

    उर्वशी की नजरे मधु और उदय में टिकी हुई थी, और वह सुहानी का सिर सहला रही थी।

     

    सुहानी रोते हुए बोली ,” परी मां , छोटी मां कह रही है कि मैं भाग गई थी किसी के साथ , आप बताइए ना मैं आपके साथ थी, इन्हें लग रहा है मैं अपनी मां की तरह भाग गई थी “!

     

    उर्वशी हैरानी से बोली ,” मां , क्या तुम्हारी मां जिंदा है “?

     

    उदय बोला ,” हां जिंदा है इसकी मां , और  इसके सामने खड़ी है “!

     

    उदय की बात सुनकर उर्वशी और सुहानी एक दूसरे को देखने लगे “!

     

    उदय बोला ,” हां सुहानी यही है तुम्हारी मां उर्वशी, जो तुम्हे जन्म देते ही कहीं चली गई ,और सालों ढूंढा मैने इसे पर यह कहीं नहीं मिली, और आज मुझे पता चल रहा है यह एक परी है “!

     

    उर्वशी नम आंखों से बोली ,” मुझे माफ कर दो उदय , मैं क्या  करती , मैं जल लोक से बाहर की दुनिया देखने आई , और मेरी मुलाकात तुमसे हुई , और मुझे तुमसे प्यार हो गया , पर जब मैने तुमसे शादी की और मेरी बेटी का जन्म हुआ , तो मेरे पिता जी की हमारे दुश्मनों ने हत्या कर दी , और मुझे जल लोक को बचाने के लिए अपनी दुनिया में लौटना पड़ा , अगर मेरे दुश्मनों को मेरी बेटी का पता चलता तो उसकी जान को खतरा था इसलिए मैं वापिस लौट गई “!

     

    सच जानकर उदय और सुहानी की आंखे नम हो गई।

     

    सुहानी उर्वशी को गले लगाते हुए बोली ,” परी मां आप मेरी मां है”!

    उर्वशी सुहानी का माथा चूमती है और फिर उसके गालों को एक एक कर चूमकर अपनी ममता लुटाते हुए बोली ,” हां मैं हूं तुम्हारी मां , जिस दिन तुम जल लोक में आई , मैं उसी दिन सोच में पड़ गई थी कि आखिर एक साधारण इंसान जल लोक में कैसे आ सकता है ,काश मैने पहले सच जानने की कोशिश की होती “!

    उदय ने मधु को एक झन्नाटेदार थप्पड़ मारकर कहा ,” तुमने मेरी बेटी की जान लेने की कोशिश की निकल जाओ यहां से “!

    मधु ने बहुत मन्नते की पर उदय ने उसकी एक ना सुनी और मधु को घर से बाहर निकाल दिया।

     उदय ने अपने अविश्वास के लिए उर्वशी और सुहानी से माफी मांगी। 

    उर्वशी ने भी उदय से माफी मांगी , और उदय से इजाजत लेकर  उर्वशी सुहानी को लेकर अपने जल लोक लौट गई ,और उसे परी की सारी शक्तियां दे दी, और जल लोक की राजकुमारी बना दिया। 

    इस तरह एक मासूम सी लड़की इतनी तकलीफें झेलने के बाद अपनी मां से मिल गई , और राजकुमारी बनकर जल लोक की परी बन गई ।

     

     

    Mysterious Chand 

     

     

     

     

     

  • जादुई दवा

    जादुई दवा

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एक छोटे से गाँव में, जिसका नाम था नेहरूवाला, एक साधारण सा वैद्य था, जिसका नाम था रामू। उसे अपनी दवाइयों और औषधियों के लिए जाना जाता था। रामू का काम गाँव वालों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था, लेकिन उसकी दवाओं में एक खास बात थी। गाँव वाले कहते थे कि उसकी कुछ दवाएँ जादू में बदल सकती हैं। रामू खुद इस बात से अनजान था, लेकिन वह हमेशा अपने काम में लगे रहता था।

    एक दिन, गाँव में एक नई महिला आई, जिसका नाम था सुमन। सुमन की आँखों में एक अलग सी चमक थी। उसने रामू के पास आकर कहा, “मुझे तुम्हारी दवा की जरूरत है। मेरे बेटे को तेज बुखार है, और कोई और दवा काम नहीं कर रही।” रामू ने तुरंत एक जड़ी-बूटी निकाली और उसे तैयार किया। उसने सुमन को बताया कि यह दवा केवल तभी प्रभावी होगी जब इसे दिल से बनाया जाएगा।

    सुमन ने विश्वास के साथ दवा का सेवन किया। रामू ने देखा कि जैसे ही सुमन ने दवा ली, उसके चेहरे पर एक हल्का सा उत्साह आ गया। बीमार बेटा तुरंत स्वस्थ हो गया, और यह देखकर सुमन की आँखों में आंसू आ गए। वह रामू का धन्यवाद करते हुए बोली, “आपकी दवा एक जादू है! मुझे यकीन है कि यह अन्य समस्याओं के लिए भी काम करेगी।”

    गाँव में इस घटना की चर्चा होने लगी। लोग रामू के पास और अधिक समस्याएँ लेकर आने लगे। एक सप्ताह के भीतर, रामू ने महसूस किया कि उसकी दवाएँ सचमुच जादू में बदल रही थीं। कई लोग उसे अपनी आशा का अंतिम द्वार मानने लगे थे। लेकिन रामू ने सोचा कि यह सब बस संयोग है।

    फिर एक दिन, एक वृद्ध व्यक्ति, जिसका नाम था हरिदास, रामू के पास आया। वह बेहद परेशान था। “मेरी बहु बीमार है,” उसने कहा। “कोई भी दवा काम नहीं कर रही।” रामू ने फिर से एक जड़ी-बूटी तैयार की, और हरिदास ने उसे अपनी बहु को दिया। चमत्कार हुआ! बहु ठीक हो गई और हरिदास के चेहरे पर खुशी आ गई। लेकिन इस बार, रामू ने असामान्य महसूस किया। उसे लगा कि उसकी दवा में कुछ और है जो उसे नहीं पता।

    रामू की यह जिज्ञासा उसे और भी परेशान करने लगी, और वह चुपचाप अपनी दवाओं के पीछे के रहस्यमयी तत्वों का पता लगाने लगा। उसने कई पुरानी किताबें पढ़ीं, जिनमें जड़ी-बूटियों और औषधियों के बारे में ज्ञान था। धीरे-धीरे, उसे पता चला कि एक बहुत पुरानी जड़ी-बूटी, जिसका नाम ‘अमृतिका’ था, उसकी दवाओं में विशेष प्रभाव डालती थी। यह जड़ी-बूटी केवल एक ही जगह पाई जाती थी – एक प्राचीन जंगल में, जहाँ जाना असंभव था।

    एक रात, रामू ने तय किया कि वह उस जड़ी-बूटी की खोज में निकलेगा। वह जंगल की ओर बढ़ा, जहाँ उसे अंधेरे, जंगली पौधों और अजीब जीवों का सामना करना पड़ा। लेकिन रामू का इरादा मजबूत था। उसने सोचा, “यदि मैं इस जड़ी-बूटी को पा लूँ, तो मैं और भी लोगों की मदद कर सकूँगा।”

    रामू ने अद्भुत और डरावना जंगल पार करने की ठानी। पहले तो उसे रास्ता ढूँढने में दिक्कत हुई, लेकिन उसकी दृढ़ता ने उसे आगे बढ़ने का साहस दिया। जंगल में अद्भुत पेड़ और पौधे थे, जो उसे कभी-कभी मंत्रमुग्ध कर देते थे। अचानक, उसे एक चमकदार फूल दिखाई दिया,

    रामू ने जब जंगल में कदम रखा, तो उसके मन में एक अद्भुत मिश्रण था—उत्सुकता और भय। जंगल की गहराई में कदम रखते ही, उसके चारों ओर का वातावरण बदलने लगा। पेड़ों की ऊँचाई आसमान को छू रही थी और इनकी शाखाएँ एक-दूसरे से मिलकर एक ऐसी छत बना रही थीं, जिससे सूर्य की किरणें मुश्किल से नीचे पहुँच पा रही थीं। उसके कदमों की आवाज़ घनघोर सन्नाटे में फँस गई थी, और बस चिड़ियों की चहचहट और पत्तों की सरसराहट सुनाई दे रही थी।

    जंगल में चलते हुए, रामू ने पहचाना कि यह जगह उसके लिए केवल एक चुनौती नहीं थी, बल्कि यह किसी अद्भुत दुनिया की ओर संकेत कर रही थी। उसके चारों ओर चढ़ते हुए मजबूत लताएँ, रंग-बिरंगे फूल, और अजीबोगरीब जानवर उसे लगातार आकर्षित कर रहे थे। उसने पहले से सोचा था कि जंगल में ढृढ़ता और साहस की आवश्यकता होगी, परंतु उसे यह भी महसूस होने लगा कि यहाँ की सुंदरता और अनोखापन भी उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा था।

    जब वह आगे बढ़ा, तो उसकी नज़र एक चमकदार फूल पर पड़ी। यह फूल अद्वितीय था—इसके पंखुड़ियाँ नीली और सुनहरी चमक से भरी हुई थीं, मानो वह सूरज की किरणों का प्रतिबिम्ब हो। रामू ने सोच लिया कि इसे निकटता से देखना अनिवार्य है। उसने धीरे-धीरे उसके पास जाकर उसे देखने की कोशिश की। फूल की महक इतनी आकर्षक थी कि वह उसे खींच ले गई।

    जैसे ही रामू ने उस फूल के पास पहुँचकर उसे छुआ, वह एक अद्भुत अनुभव का सामना किया। उसके चारों ओर हल्की चमक फैल गई, और फूल से एक मधुर धुन निकलने लगी। यह सच में कोई साधारण फूल नहीं था, बल्कि यह जंगल का एक रहस्यमय अभेद्य गहना प्रतीत हो रहा था। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। क्या यह कोई जादुई फूल है?

    फूल के पास खड़े-खड़े, रामू ने अपने मन में अनेक विचार आने लगे। क्या इसका मतलब यह है कि इसे किसी प्रकार की मिठास या शक्ति प्राप्त है? या फिर यह एक हानिकारक जादू का हिस्सा है? लेकिन उसकी जिज्ञासा ने उसे पीछे हटने नहीं दिया। उसने अपने चारों ओर देखा और महसूस किया कि जिंदगी में कुछ खास अनुभवों के लिए आपको थोड़ी जोखिम उठानी पड़ती है।

    अचानक, फूल से फैल रही रोशनी ने एक छोटी सी दरवाज़े की आकृति बनानी शुरू कर दी। रामू के मन में सवाल उठने लगा—क्या उसे उस दरवाज़े के पार जाना चाहिए? उसके अंदर साहस और डर का एक अद्भुत मिश्रण था। उसने ठान लिया कि उसे इसका पता लगाना होगा। अपनी हिम्मत जुटाकर, रामू ने दरवाजे की ओर कदम बढ़ाया।

    जैसे ही वह दरवाजे के पार पहुँचा, उसे एक नई दुनिया में प्रवेश करते हुए महसूस हुआ। यहाँ की प्रकृति और भी अधिक अद्भुत थी। पेड़ और पौधे हर तरह की सुंदरता में लिपटे हुए थे। हवा में एक मीठी महक थी और पक्षियों का गाना इतना मधुर था कि वह मंत्रमुग्ध हो गया। यह स्थान किसी जादुई संसार से कम नहीं था।

    जैसे ही रामू उस जादुई दुनिया में कमीज़ होकर आगे बढ़ा, उसने देखा कि चारों ओर रंग-बिरंगे फूल, अनोखे पेड़ और कई प्रकार के जीव-जंतु मौजूद थे। लेकिन यहां का असली रहस्य एक मीठी महक में छुपा था, जो उसे हर कदम पर आकर्षित कर रही थी। उसने ध्यान से सुना और उसे पता चला कि यहां के जीव-जंतु आपस में किसी महत्वपूर्ण दवा के बारे में बात कर रहे थे।

    रामू ने नज़दीक जाकर सुना कि वे एक जादुई दवा के बारे में चर्चा कर रहे थे, जो केवल इस जंगल में मिलती थी। यह दवा gezondheidsproblemen में मददगार थी और प्राकृतिक रूप से ऊर्जा प्रदान करती थी। उसने यह भी सुना कि इस दवा को बनाने के लिए एक विशेष पौधे की आवश्यकता होती है, जिसे “जीवनफूल” कहा जाता है। यह फूल केवल चाँद की रौशनी में खिलता है और इसे प्राप्त करना आसान नहीं होता।

    रामू की आँखों में चमक आ गई। यदि वह इस जादुई दवा को खोज ले, तो न केवल वह अपने गाँव के लोगों की मदद कर सकेगा बल्कि इस अनुभव को भी अपने जीवन का लक्ष्य बना सकेगा। उसने निर्णय लिया कि वह “जीवनफूल” की खोज में निकलेगा। लेकिन वह जानता था कि यह असामान्य चुनौती केवल साहस से ही दूर की जा सकती थी।

    जंगल की गहरी गुफाओं में पहुँचते ही रामू ने अपने रास्ते में कई कठिनाइयों का सामना किया। उसे विशाल पेड़ों के नीचे से गुजरना पड़ा, जहां विलक्षण जीव-जंतु उसे घूर रहे थे। लेकिन रामू ने हिम्मत नहीं हारी। वह हमेशा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहा। उसके हृदय में एक नई ऊर्जा का संचार हो रहा था, जो उसे हर कदम पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थी।

    आखिरकार, चाँद की रोशनी में जब पूरी वनवासी दुनिया चाँद की सुनहरी रोशनी में नहाने लगी, तभी रामू ने दूर एक चमकदार फूल देखा। यह वही “जीवनफूल” था, जो उसने सुना था। वह खुशी से झूम उठा, लेकिन उसे अपने दिल की धड़कन को नियंत्रित करना था। उसने धीरे-धीरे उस फूल के पास जाकर उसे देखा। इसकी पंखुड़ियाँ चाँदनी की रोशनी में चमक रही थीं, और इसकी खुशबू मंत्रमुग्ध कर देने वाली थी।

    रामू ने धीरे-धीरे फूल को हाथ में लिया और उसकी पंखुड़ियाँ छू कर महसूस किया। उसे एहसास हुआ कि यह फूल न केवल उसकी खोज का वांछित फल था, बल्कि यह उस साहस और धैर्य का प्रतीक भी था, जो उसे जंगल में आगे बढ़ने के लिए मिला था।

    उसने फूले को सावधानी से अपने थैले में रखा और वापस लौटने का मन बनाया। जब वह जंगल की ओर लौट रहा था, तब उसे महसूस हुआ कि इस यात्रा ने उसे कितनी चीजें सिखा दी थीं। साहस, दृढ़ता, और सबसे महत्वपूर्ण—प्रकृति का सम्मान।

    जब वह गाँव पहुँचा, तो लोगों ने उसे कौतुहल भरी नज़रें गड़ा कर देखा। उसने “जीवनफूल” की शक्ति का विकास करके एक जादुई दवा बनाई और सभी को इसकी उपयोगिता बताई। गाँव में सबके बीच खुशी और उम्मीद की एक नई लहर दौड़ पड़ी।

    रामू ने उन सबको बताया कि जंगल में उसने न केवल दवा खोजी थी, बल्कि एक नई दुनिया का भी अनुभव किया था—एक ऐसी दुनिया, जहां प्रकृति की शक्ति और मानव के साहस का अद्भुत तालमेल था। अब वह सिर्फ दवा के माध्यम से नहीं, बल्कि जिन्दगी के हर छोटे-बड़े अनुभव से गाँववालों की मदद करना चाहता था।

    इस तरह, रामू की यात्रा समाप्त हुई, लेकिन उसके द्वारा अर्जित ज्ञान और साहस हमेशा उसके साथ रहेगा।

    Lakshmi Kumari……

     

  • चतुर खरगोश

    चतुर खरगोश

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    एक समय, एक घने और खुशनुमा जंगल में कई जानवर एकसाथ रहते थे। वहाँ के झाड़ियों और पेड़ों के बीच, छोटी-सी नदियाँ बहती थीं, और चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। इस जंगल में एक बहुत ही चतुर खरगोश था, जिसका नाम था चीकू। चीकू अपनी चतुराई और तेज़ी के लिए जाना जाता था। उसे अपनी बुद्धिमानी पर गर्व था, और वह हमेशा नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहता था।

    चीकू के पास एक बहुत अच्छा दोस्त था, जिसका नाम था टिनू। टिनू एक धीमा कछुआ था, लेकिन उसकी धैर्य और स्थिरता की प्रशंसा सभी करते थे। चीकू और टिनू अक्सर एक-दूसरे के साथ खेलते और बातचीत करते। चीकू की तेज़ी और टिनू की धैर्यतावाद, दोनों की दोस्ती जंगल में मशहूर थी।

    एक दिन, जंगल में एक बड़ा और महत्वपूर्ण घोषणा की गई। जल्द ही, जंगल के सभी जानवरों के बीच दौड़ आयोजित होने वाली थी। यह दौड़ जंगल के सबसे तेज़ जानवर का पता लगाने के लिए थी। चीकू ने तुरंत सोचा, “यह मेरे लिए एक शानदार मौका है! मैं अपनी चतुराई और तेज़ी से यह दौड़ जीत सकता हूँ।”

    दौड़ के दिन, सभी जानवर एकत्र हुए। जंगल के सबसे अनुभवी जानवर, हाथी बाबा, ने कहा, “दोस्तों, इस दौड़ में भाग लेना बहुत महत्वपूर्ण है। जो सबसे तेज़ दूर तक जाएगा, वही विजेता होगा।” सभी जानवर उत्साहित हो गए, और दौड़ शुरू करने का समय आया।

    चीकू ने खुद को विजेता मान लिया और दौड़ की शुरुआत से पहले टिनू से कहा, “क्या तुम सोचते हो कि तुम मेरे खिलाफ दौड़ सकते हो? तुम तो बहुत धीमे हो!” टिनू ने मुस्कुराते हुए कहा, “चीकू, तेज़ी ही सब कुछ नहीं है। धैर्य और आत्मविश्वास भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। मुझे अपनी गति पर विश्वास है।”

    दौड़ शुरू हुई, और चीकू ने तुरंत ऊँचाई पर पहुँचते हुए तेजी से दौड़ना शुरू कर दिया। उसने देखा कि उसके पीछे सभी जानवर धीरे-धीरे भागते हैं, और वह बहुत खुश था। “मैंने तो पहले ही जीत हासिल कर ली है,” उसने सोचा और अपनी गति को थोड़ा धीमा कर दिया। उसे लगा कि उसके जीतने की कोई संभावना नहीं है, इसलिए उसने एक पेड़ के नीचे आराम करने का फैसला किया।

    चीकू ने सोचा, “कछुए को बहुत वक्त लगेगा यहाँ तक पहुँचने में। मैं थोड़ी देर आराम कर सकता हूँ। जब वह आएगा, तब मैं बस एक बार में दौड़कर जीत जाओंगा।” उसकी इस सोच ने उसे सुस्त कर दिया। वह पेड़ के नीचे लेट गया और नींद में चला गया।

    दूसरी ओर, टिनू ने धीरे-धीरे अपनी गति बनाए रखी। उसने अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित किया और स्थिरता से दौड़ता रहा। समय बीतता गया, और टिनू धीरे-धीरे चीकू के पास पहुँच गया। जैसे ही टिनू ने चीकू को सोते हुए देखा, उसने झिझकते हुए कहा, “चीकू, तुम क्यों सो रहे हो?”

    चीकू ने ध्यान नहीं दिया और सोता रहा। टिनू ने पास जाकर कहा, “तुम अपनी सभी तेज़ी को खो रहे हो, जबकि मैं आगे बढ़ रहा हूँ।” लेकिन चीकू ने इससे फर्क नहीं पड़ने दिया और आँखें बंद किए रखीं।

    टिनू आगे बढ़ता गया। कुछ दूर जाकर, उसने एक नदी को पार किया और दूसरी ओर पहुँच गया। उसका धैर्य और बढ़ता गया जबकि चीकू अभी भी सोता रहा। जब चीकू जागा, तो उसे महसूस हुआ कि काफी समय बीत चुका है।

    चीकू ने जल्दी से उठकर देखा कि टिनू उसके बिना ही आगे बढ़ चुका था। उसे एक क्षण के लिए आश्चर्य हुआ और फिर वह घबरा गया। “ये कैसे हो गया?” उसने सोचा। उसने सोचा, “मुझे उसे पकड़ लेना चाहिए!”

    चीकू ने अपनी तेज़ी दिखाते हुए दौड़ना शुरू किया। लेकिन जब उसने दौड़ना शुरू किया, तो टिनू पहले ही काफी दूर पहुंच चुका था। चीकू ने अपने सभी कौशल और तेज़ी के साथ दौड़ने की कोशिश की, लेकिन टिनू अपने धैर्य और स्थिरता के साथ आगे बढ़ता गया।

    जैसे ही चीकू ने उस स्थिति को देखा, उसने तैराकी से पुकारा, “टिनू, तुम बहुत धीमे हो! मुझे जीतने के लिए बस एक बार और दौड़ना है!”

    टिनू ने उत्तर दिया, “चीकू, मुझे पता था कि तुम तेज हो, लेकिन इस दौड़ में सिर्फ तेज़ होना ही काफी नहीं है। मुझे अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना था और अपने सहजता से दौड़ना था।”

    दौड़ के अंत तक पहुँचने में, चीकू ने अपनी सारी ताकत लगा दी, लेकिन वह टिनू को बहुत दूर नहीं कर सका। अंततः, टिनू ने दौड़ समाप्त की और विजेता बना। चीकू ने देखा कि उसने अपनी चतुराई और तेज़ी की जगह पर केवल आत्म-संतोष और अहंकार का सहारा लिया था।

    चीकू को इस हार से एक महत्वपूर्ण सबक मिला। उसने टिनू से कहा, “मैंने सोचा था कि मैं हमेशा तेज़ और सबसे अच्छा रहूँगा, लेकिन तुमने मुझे सिखाया कि धैर्य, आत्मविश्वास और स्थिरता कितनी महत्वपूर्ण हैं।”

    टिनू ने मुस्कुराते हुए कहा, “हर कोई अपनी विशेषताओं के अनुसार अद्वितीय है। तेज़ होना अच्छा है, लेकिन कभी-कभी slow and steady wins the race। चलो, हम साथ में इस हार का जश्न मनाते हैं!”

    चीकू ने अपनी हार को स्वीकार किया और उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामकर जंगल में बहुत खुश होकर खेलना और आनंद लेना शुरू किया। इस प्रकार, चीकू और टिनू की दोस्ती और भी मजबूत हो गई और चीकू ने हमेशा याद रखा कि जीत और हार दोनों ही जीवन का हिस्सा हैं।

    इस कहानी से हमें यह सीखने को मिलता है कि केवल तेज़ी ही नहीं, बल्कि धैर्य और समर्पण भी किसी भी चुनौती को पार करने में महत्वपूर्ण होते हैं।

    Lakshmi Kumari 

     

  • मेरी किताबों को पढ़ो

    मेरी किताबों को पढ़ो

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    जानना है अगर मुझे

     तो मेरी कविताओं को पढ़ो

    शब्दों को नहीं उनमें छुपी

     मेरी भावनाओं को समझो

     पढ़ना है मुझे, तो उन लफ्ज़ों के बीच उतरना, 

    जहाँ हर खामोशी भी कुछ कहने की कोशिश करती है। 

    कुछ बातें ऐसी हैं, जो किसी ने कभी जानी नहीं,

     मैंने उन्हें चुपके से शब्दों में

     ढालकर कविताओं में छुपाया है।

    जानना चाहते हो मुझे, 

    तो मेरी किताबों को खोलो हर पन्ने पर लिखे 

    अनकहे एहसासों को पढ़ो।

     उतार दिया है मैंने अपना हाल-ए-दिल

    वो भी जो मैंने खुद से कभी कहा नहीं मेरी हर कविता में मेरा एक अधूरा हिस्सा रहता है कहीं।

    अगर सच में समझना है मुझे,

     तो लफ्ज़ों के उस समंदर में उतरना, 

    जहाँ दर्द भी लहर बनकर 

    चुपचाप किनारे छू जाता है। 

    शब्दों के इस विशाल समंदर से

     कुछ मोती चुराए हैं मैंने,

     और उनसे ही भावनाओं का

     एक पूरा जहां बनाया है। 

    एक बार उस समंदर में उतरकर तो देखो,

    शायद किनारे तक आते-आते

     तुम मुझे थोड़ा-सा समझ जाओ… 

    अगर जानना है मुझे, तो बस… 

    मेरी किताबों को पढ़ो। Lakshmi Kumari

  • आंखों का नूर

    आंखों का नूर

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    तेरी आँखों में जो नूर है,

    वो मेरी रूह का सुरूर है,

    तेरी मुस्कान से महकता जहाँ,

    तेरी चाहत ही मेरा गुरूर है।

    तेरे पास आकर दिल सँवर गया,

    तेरे बिना हर लम्हा बिखर गया,

    तेरी मोहब्बत ने ये एहसास दिया,

    कि ये ज़िंदगी का सफ़र तेरे नाम कर गया।।

  • एक अनोखा रिश्ता

    एक अनोखा रिश्ता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    राहुल अपने मम्मी पापा  के साथ मुंबई में एक फ्लैट में रहता था ,वह अपने दोस्तों के साथ सामने के खाली पड़े फ्लैट के सामने हमेशा अपने दोस्तों के साथ खेलता था , एक दिन उस फ्लैट में अचानक ही फर्नीचर का काम चालू हो गया ,और पता चला कि उस फ्लैट में अब कोई रहने आने वाला है। इससे राहुल और उसके दोस्त बहुत उदास हो गये। पर फिर भी उन्होंने फ्लैट में खेलना नहीं छोड़ा। 

    राहुल और उसके दोस्तों को शैतानी करते देखकर फर्नीचर वाले अंकल उन्हें हमेशा डांट कर भगाते थे पर वह नहीं सुनते थे।

    एक दिन राहुल अपने  दोस्तो के साथ फ्लैट में खेल रहा था और सामने फर्नीचर का काम भी चल रहा था , तभी वहां एक औरत एक छोटी सी  लड़की को लेकर आई।

     उसकी छोटी-छोटी आंखें और दबी हुई सी नाक थी। वो लड़की हमें डरी हुई नज़रों से देख रही थी, हमने उन्हें देखकर खेलना बंद कर दिया था।

    “शायद ये लोग ही यहां रहने आए है।” अजय ने धीरे से राहुल के कान में कहा। 

    उसकी बात सुनकर राहुल के चेहरे में मुस्कान आ गई, उसे बड़ी खुशी हुई कि अब उनकी गैंग में एक और सदस्य जुड़ जाएगा। 

    उस लड़की की नज़रें जैसे ही राहुल की नजरो से टकराई तो राहुल के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

    जब उस लड़की ने देखा कि मैं उसे देख कर मुस्करा रहा हूं, तो उस लड़की ने राहुल से मुंह फेर लिया। 

    उस लड़की के ऐसे मुंह फेरने से राहुल का चेहरा उतर गया , उसे बड़ा अजीब सा लगा और वह जल्दी से अजय के साथ वहां से चला गया।

    अब राहुल और अजय ने वहां पर खेलना बन्द कर दिया क्योंकि वो लोग फ्लैट में रहने लगे थे ।

    एक दिन राहुल की मम्मी सीमा उसके पापा से बात के रही थी ।

     ” सुनो जी मैंने सुना वो सामने वाले घर में जो लोग आए है ,वह  हिमाचल से आए हैं। बस मां बेटी रहती है ,सुना है बच्ची  के मम्मी-पापा का तलाक हो चुका था “।

    अक्षय सीमा से बोला ,” छोड़ो ,हमे क्या करना है , वह उनका निजी मामला है “!

    राहुल अपनी मम्मी पापा की बात सुनकर वहां से चला गया।

    अब राहुल और अजय अपने और दोस्तों के साथ बिल्डिंग के नीचे वाले गार्डन में खेलते थे।

    राहुल एक दिन खेल था , तभी उसकी नजर बालकनी में खड़ी उस लड़की में पड़ी , जो  कभी अपने घर से बाहर नहीं निकलती थी ,पर कभी कहीं गलती से बालकनी में खड़ी दिख भी जाती, तब भी उसे देखकर अंदर चली जाती थी। आज भी वही हुआ जैसे ही राहुल और उस लड़की की नजरे टकराई ,वो लड़की अन्दर भाग गई।

    कुछ दिनों बाद दीवाली आई और  शाम को घर  में पूजा हुई और पूजा खत्म होने के बाद सीमा ने राहुल को प्रसाद देते हुए कहा ,” जाओ राहुल ये प्रसाद लेकर सामने वाले फ्लैट की आंटी को दे दो। 

    राहुल प्रसाद लेकर जैसे ही सामने वाले घर में गया तो दरवाज़ा उस लड़की ने ही खोला, पर राहुल ने उसे इग्नोर किया और उसकी मम्मी के पास गया।

    “ आंटी मम्मी ने प्रसाद दिया है और कहा है कि आप लोग हमारे साथ दिवाली मनाएं।” राहुल ने उसकी मम्मी को प्रसाद पकड़ाते हुए कहा।

    “बेटा…हम दिवाली नहीं मनाते… बैठो मैं अभी आती हूं” आंटी ने राहुल को बैठने का इशारा करते हुए कहा और किचन से राहुल के लिए कुछ खाने के लिए लेने चली गईं। 

    “तुम्हारा नाम क्या है “? राहुल ने पूछा।

    वो लड़की बहुत देर चुप रहने के बाद बोली ,” आकांक्षा “!

    “तुम्हें पटाखे जलाना अच्छा नहीं लगता?” राहुल ने उस लड़की से पूछा।

    “हां” बहुत देर तक चुप रहने के बाद आखिर कर वो लड़की बोली।

     “तुम चलो बाहर हम साथ में पटाखे जलाएंगे” राहुल ने कहा।

    “नहीं मम्मी बाहर जाने से मना करती हैं।” लड़की कहने लगी।

    “अच्छा। हमसे बात करने के लिए भी?” राहुल ने  चौंक कर पूछ लिया।

    “नहीं।…उन्हें डर लगता है, लोग हमारा मज़ाक बनाते हैं।” लड़की ने धीरे से कहा।

    “क्यों?” राहुल ने पूछा।

    “क्योंकि हमारी छोटी आंखें हैं ना… हम यहां पहले रहते थे, वहां सब बच्चे मुझे चाइनीज.. चाइनीज…बोलकर चिढ़ाते थे। एक दिन मुझे गुस्सा आ गया। मैंने एक लड़के को घूंसा मार दिया। फिर उसकी मम्मी ने मेरी मम्मी से बहुत झगड़ा किया। मेरे पापा-मम्मी के बारे में गंदी-गंदी बातें की। फिर हमने वो घर छोड़ दिया। इसलिए ही मम्मी यहां किसी से बात करने के लिए मना करती हैं।” अभी  वो बता ही रही थी कि उसकी मम्मी आ गई।

    “आंटी आप नहीं आ रही तो मैं इसे ले जाऊं? हम साथ में पटाखे जलाएंगे, प्लीज़ आंटी।” राहुल ने रिक्वेस्ट करते हुए कहा तो कुछ देर बाद उसकी मम्मी मान गईं।

    राहुल ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, “डरो मत यहां कोई तुम्हारा मज़ाक नहीं बनाएगा।”  और वो दोनों बाहर जाकर पटाखे जलाने लगे ।

    तभी कुछ बच्चे आए और आकांक्षा का मजाक बनाने लगे।

    आकांक्षा सबको अपना मजाक बनाता देख रोते हुए भागने लगी।

    जब बालकनी में खड़ी उसकी मां ने आकांक्षा का मजाक बच्चों को उड़ाते देखा तो वह भागकर नीचे चली गई।

     इधर आकांशा भागकर जा ही रही थी कि वह सीमा और अक्षय से टकरा गई।

    सीमा ने आकांक्षा को गले लगाते हुए कहा,” क्या हुआ बेटा तुम ऐसे रो क्यों रही हो “?

    राहुल भी वहां आ गया और उसे सब बात बता दी।

    जब सीमा ने अब बाते जानी तो वह आकांक्षा के आंसु पोछते हुए बोली ,” बेटा रोते नहीं लोग तो बाते बनाते रहते है ,उनकी बातो को दिल में नहीं लेते ,तुम भागेगी तो वह तुम्हे कमजोर समझेंगे ,और बार बार वही करेंगे ,तुम इन सबका डटकर सामना करो “!

    आकांक्षा की मां राधा जैसे ही वहां आई  ,तो  उन बच्चों की मां बाते बनाने लगी ,” इस औरत का पता नहीं यहां कैसे आई ? पति से तलाक क्यों लिया और कोई पति है भी या नहीं ? कौन जानता है  सच “!

    सबको बात बनाता देखकर राधा की आंखे भर आई , सीमा सबको डांटते हुए बोली ,” चुप हो जाओ तुम अब ,शर्म नहीं आती एक औरत होकर दूसरी औरत के बारे में ऐसी बात। करते हुए “?

    सीमा की डांट सुनकर अब चुप हो गए।

    अक्षय गुस्से से बोला ,” आप सब ऐसे बाते मत बनाइए राधा बहन के बारे में ,किसकी क्या मजबूरी है कोई भी जानता, यह एक ईजेदार महिला है इन्हें ऐसे परेशान मत कीजिए ,अब जमाना बदल गया है ,एक औरत कमजोर नहीं ,वह अकेले भी खुद का और अपने बच्चों का अच्छा पालन पोषण कर सकती है”।

    अब सब लोगों ने नजरे झुका ली।

    अक्षय ने आकांक्षा को गोद में लिया और बोला ,” यह देखिए इस मासूम सी बच्ची को ,आप जैसे समाज के ठेकदारों की वजह से इसकी आंखों में आंसु है ,सब कहते है बच्चे भगवान का रूप होते है ,तो क्या आपको शोभा देता है ऐसे किसी बच्चे को परेशान करता देखकर “!

    सभी को अपने किए पर शर्मिंदगी हुई और उन्होंने राधा और आकांशा से माफी मांगी।

    उसके बाद सभी ने साथ मिलकर दिवाली मनाई ,और राहुल और उसके दोस्तों के साथ आकांशा ने खूब पटाखे जलाए।

    इस तरह राहुल और आकांशा दोस्त बन  गए ,और उनके बीच दोस्ती का एक अनमोल रिश्ता बन गया।

    Mysterious chand