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श्रेणी: कहानी

दिल से दिल तक पहुंचने वाली एहसास कहानी बनती है।

  • 😂 पप्पू की खतरनाक शादी 😂

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

     

     

    पप्पू अपने मोहल्ले का सबसे बड़ा आलसी और सबसे ज्यादा आत्मविश्वासी लड़का था। उसे लगता था कि दुनिया में उससे ज्यादा समझदार कोई नहीं है। एक दिन उसकी माँ ने कहा, “पप्पू, अब तुम्हारी शादी कर देनी चाहिए।”

     

    पप्पू ने तुरंत बालों में कंघी करते हुए कहा, “माँ, लड़की सुंदर होनी चाहिए, खाना अच्छा बनाती होनी चाहिए और मेरी हर बात माननी चाहिए।”

     

    माँ बोली, “बेटा, लड़की चाहिए या रोबोट?”

     

    पप्पू ने कहा, “रोबोट भी चलेगा, बस रिमोट मेरे हाथ में होना चाहिए!” 😂

     

    कुछ दिनों बाद पप्पू की शादी तय हो गई। शादी वाले दिन पप्पू घोड़ी पर बैठकर इतना अकड़ रहा था जैसे बारात नहीं, प्रधानमंत्री की रैली हो।

     

    रास्ते में उसके दोस्त चिंटू ने पूछा, “पप्पू, डर तो नहीं लग रहा?”

     

    पप्पू बोला, “बिल्कुल नहीं! मैं अपनी पत्नी को पहली रात ही बता दूँगा कि घर में मेरी चलती है।”

     

    चिंटू हँसकर बोला, “भाई, पहले शादी हो जाने दे, फिर देखना किसकी चलती है।”

     

    शादी धूमधाम से हुई। पप्पू ने दुल्हन को देखा और मुस्कुराते हुए बोला, “अब से तुम मेरी हर बात मानोगी।”

     

    दुल्हन ने प्यार से पूछा, “सच?”

     

    पप्पू बोला, “हाँ!”

     

    दुल्हन ने कहा, “तो आज से तुम खाना बनाओगे, कपड़े धोओगे और सुबह चाय भी बनाओगे।”

     

    पप्पू के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। उसने धीरे से पूछा, “ये नियम कब बने?”

     

    पत्नी बोली, “अभी-अभी। और तुमने खुद कहा था कि मैं तुम्हारी हर बात मानूँगी।” 😂

     

    अगली सुबह पप्पू नींद में था। तभी पत्नी ने आवाज लगाई, “पप्पू जी, उठिए!”

     

    पप्पू बोला, “आज रविवार है, मुझे सोने दो।”

     

    पत्नी बोली, “ठीक है, फिर मैं तुम्हारे दोस्तों को फोन करके बता देती हूँ कि शादी के बाद पप्पू सुबह आठ बजे तक सोता है।”

     

    पप्पू तुरंत बिस्तर से कूदकर बोला, “नहीं-नहीं! मैं तो बस आँखों का व्यायाम कर रहा था!”

     

    कुछ दिनों बाद पप्पू का दोस्त चिंटू मिलने आया। उसने देखा कि पप्पू रसोई में सब्जी काट रहा है।

     

    चिंटू ने पूछा, “क्या हुआ भाई? तू तो कहता था कि घर में तेरी चलती है!”

     

    पप्पू ने चाकू चलाते हुए कहा, “चलती तो मेरी ही है।”

     

    चिंटू बोला, “कैसे?”

     

    पप्पू ने मुस्कुराकर कहा, “मैं जहाँ मेरी पत्नी कहती है, वहीं चलता हूँ!” 🤣

     

    तभी पीछे से पत्नी की आवाज आई, “पप्पू जी, चाय बन गई?”

     

    पप्पू तुरंत बोला, “जी मैडम!”

     

    चिंटू जोर-जोर से हँसने लगा।

     

    पप्पू ने उसे घूरकर कहा, “हँस मत! शादी के बाद असली खतरनाक चीज़ भूत नहीं, पत्नी की आवाज होती है!”

     

    चिंटू बोला, “भाई, अब समझ आया कि तू शादी को ‘खतरनाक’ क्यों कहता है!”

     

    पप्पू ने सिर हिलाते हुए कहा, “शादी से पहले मैं राजा था… और शादी के बाद मैं राजा का ड्राइवर बन गया!” 😂😂

     

    और इस तरह पप्पू की खतरनाक शादी पूरे मोहल्ले में मशहूर हो गई।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • वो अजनबी मेरा हमसफ़र

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। आसमान में बादल इस तरह गरज रहे थे, जैसे किसी पुराने राज़ को उजागर करने की जिद पर हों। सुनसान पहाड़ी रास्ते पर आर्या की कार तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। बारिश इतनी तेज़ थी कि कुछ मीटर आगे का रास्ता भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आर्या ने घबराकर फोन देखा।

     

    कोई नेटवर्क नहीं।

     

    उसने गहरी साँस ली और कार की रफ्तार थोड़ी कम कर दी।

     

    तभी अचानक…

     

    धड़ाम!

     

    कार का पिछला पहिया फट गया।

     

    आर्या ने किसी तरह कार संभाली और सड़क के किनारे रोक दी। उसने बाहर देखा। चारों तरफ घना जंगल था। दूर-दूर तक कोई घर, कोई रोशनी, कोई इंसान नहीं।

     

    उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई।

     

    वह कार से बाहर निकलने ही वाली थी कि उसे पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    बारिश में कोई उसकी तरफ बढ़ रहा था।

     

    आर्या का गला सूख गया।

     

    “क… कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ ही सेकंड बाद एक लंबा, भीगा हुआ आदमी उसकी कार के सामने आकर खड़ा हो गया। काले रंग की शर्ट, चेहरे पर बारिश की बूंदें और आँखों में एक अजीब-सी गंभीरता।

     

    उसने कार की तरफ देखा और शांत आवाज़ में कहा—

     

    “आप यहाँ अकेली नहीं रह सकतीं।”

     

    आर्या ने तुरंत दरवाज़ा लॉक कर लिया।

     

    “आप… कौन हैं?”

     

    अजनबी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “अभी के लिए इतना समझ लीजिए कि मैं आपकी मदद करने आया हूँ।”

     

    “मुझे आपकी मदद नहीं चाहिए।”

     

    वह हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “अगर मदद नहीं चाहिए होती, तो आप इतनी देर से मुझे देखकर काँप नहीं रही होतीं।”

     

    आर्या चुप हो गई।

     

    उस आदमी ने कार का पिछला टायर देखा और कहा—

     

    “टायर बदलने में वक्त लगेगा। और ये जगह सुरक्षित नहीं है।”

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    उसने सड़क के दूसरी तरफ अंधेरे जंगल की ओर देखा।

     

    “क्योंकि मैं इस रास्ते को आपसे बेहतर जानता हूँ।”

     

    उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जिसने आर्या को बेचैन कर दिया।

     

    “आपका नाम?”

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद उसने कहा—

     

    “कबीर।”

     

    “और मैं आप पर भरोसा क्यों करूँ?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपको भरोसा करने की जरूरत नहीं है। बस मेरे साथ चलिए।”

     

    आर्या ने मना करने के लिए मुँह खोला ही था कि अचानक जंगल की तरफ से किसी गाड़ी की हेडलाइट दिखाई दी।

     

    कबीर का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “अब आपके पास मेरे साथ चलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो लोग आपको ढूँढ रहे हैं।”

     

    आर्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “कौन लोग?”

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ा और उसे कार से बाहर खींच लिया।

     

    “चलो!”

     

    “मेरा हाथ छोड़िए!”

     

    “अगर जिंदा रहना है तो अभी सवाल मत कीजिए।”

     

    दोनों बारिश में जंगल के अंदर भागने लगे।

     

    आर्या का पैर फिसला और वह गिरते-गिरते बची। कबीर ने तुरंत उसकी कमर थाम ली।

     

    एक पल के लिए दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब थे।

     

    बारिश की ठंडी बूंदों के बीच आर्या ने पहली बार उसकी आँखों को इतनी करीब से देखा।

     

    उन आँखों में अजीब-सी बेचैनी थी।

     

    जैसे वह उसे बहुत पहले से जानता हो।

     

    कबीर ने धीरे से कहा—

     

    “ठीक हो?”

     

    आर्या ने उसकी बाँह से खुद को अलग किया।

     

    “हाँ।”

     

    “तो चलो।”

     

    कुछ दूर चलने के बाद दोनों एक पुरानी हवेली के सामने पहुँचे।

     

    हवेली बाहर से डरावनी थी, लेकिन अंदर पहुँचते ही आर्या को हैरानी हुई। कमरों में बिजली थी, आग जल रही थी और सब कुछ व्यवस्थित था।

     

    कबीर ने उसे एक तौलिया दिया।

     

    “कपड़े सुखा लीजिए। आपको सर्दी लग जाएगी।”

     

    आर्या ने तौलिया लेते हुए पूछा—

     

    “ये घर आपका है?”

     

    कबीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    “कबीर?”

     

    “हाँ।”

     

    “और आप यहाँ अकेले रहते हैं?”

     

    उसने उसकी तरफ देखा।

     

    “पहले अकेला रहता था।”

     

    “पहले?”

     

    कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आर्या ने ध्यान दिया कि दीवार पर कई पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर के सामने जाकर वह रुक गई।

     

    तस्वीर में एक जवान लड़की थी।

     

    चेहरा देखकर आर्या के कदम जैसे जमीन में जम गए।

     

    वह लड़की…

     

    बिल्कुल उसी जैसी दिख रही थी।

     

    “ये कौन है?”

     

    कबीर चुप रहा।

     

    आर्या ने उसकी ओर देखा।

     

    “कबीर, ये लड़की कौन है?”

     

    वह धीरे-धीरे तस्वीर के पास आया।

     

    “मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा।”

     

    “और अब?”

     

    “अब… सिर्फ एक याद।”

     

    आर्या ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    “इसका नाम?”

     

    कबीर ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “आर्या।”

     

    उसके हाथ से तौलिया गिर गया।

     

    “क्या?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “उसका नाम भी आर्या था।”

     

    आर्या के भीतर जैसे तूफान उठ गया।

     

    “ये मजाक है?”

     

    “काश होता।”

     

    कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर अचानक बाहर गोली चलने की आवाज़ आई।

     

    धाँय!

     

    आर्या चीख पड़ी।

     

    कबीर ने तुरंत लाइट बंद कर दी।

     

    “नीचे झुको।”

     

    कुछ सेकंड बाद हवेली के मुख्य दरवाज़े पर जोरदार चोट हुई।

     

    कबीर ने आर्या का हाथ पकड़ा और उसे एक गुप्त कमरे में ले गया।

     

    “यहाँ रहो। जब तक मैं वापस न आऊँ, बाहर मत आना।”

     

    “आप कहाँ जा रहे हैं?”

     

    “उन लोगों को रोकने।”

     

    “लेकिन आप अकेले—”

     

    “मुझ पर भरोसा करो।”

     

    कबीर चला गया।

     

    करीब दस मिनट तक बाहर संघर्ष की आवाज़ें आती रहीं।

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    आर्या डरते-डरते बाहर आई।

     

    कबीर सीढ़ियों के पास खड़ा था। उसके माथे पर हल्की चोट थी।

     

    आर्या दौड़कर उसके पास पहुँची।

     

    “आप ठीक हैं?”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हें मेरी चिंता हो रही है?”

     

    आर्या कुछ पल उसे देखती रही।

     

    “हाँ… शायद।”

     

    कबीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “यही तो डर है।”

     

    “किस बात का?”

     

    “कि इतिहास खुद को दोहरा न दे।”

     

    आर्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे सच बताइए।”

     

    कबीर ने लंबी साँस ली।

     

    “तीन साल पहले मेरी जिंदगी में एक लड़की थी। उसका नाम आर्या था। हम एक-दूसरे से प्यार करते थे। लेकिन एक रात उसे उन लोगों ने मारने की कोशिश की, जिनसे मैं आज भी लड़ रहा हूँ।”

     

    “और वो?”

     

    “वो मर गई।”

     

    आर्या की आँखें भर आईं।

     

    “आपने उसकी मौत देखी?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “फिर मैं…?”

     

    कबीर ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम उसके जैसी दिखती हो। बहुत ज्यादा।”

     

    आर्या के दिल में एक अजीब-सी हलचल हुई।

     

    “और अगर मैं वो नहीं हूँ?”

     

    कबीर ने धीरे से कहा—

     

    “तो शायद तुम मेरी जिंदगी में आई दूसरी आर्या हो।”

     

    उस रात दोनों हवेली की बालकनी में बैठे रहे। बारिश धीरे-धीरे थम चुकी थी। बादलों के पीछे से चाँद निकल आया था।

     

    आर्या ने पूछा—

     

    “कबीर, अगर मैं कल यहाँ से चली गई तो?”

     

    “तो मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं।”

     

    “और अगर मैं रुकना चाहूँ?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो मैं तुम्हें फिर कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

     

    आर्या मुस्कुरा दी।

     

    “आप जानते हैं? जब मैं पहली बार आपसे मिली थी, मुझे लगा था आप बहुत अजीब हैं।”

     

    “और अब?”

     

    “अब लगता है… आप खतरनाक हैं।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “बस?”

     

    आर्या ने धीरे से कहा—

     

    “और थोड़े अच्छे भी।”

     

    दोनों की आँखें मिलीं।

     

    उस पल में जैसे पूरी दुनिया थम गई।

     

    लेकिन तभी आर्या की नजर कबीर के कमरे में रखी एक पुरानी डायरी पर पड़ी।

     

    उसने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कभी आर्या वापस आए, तो उसे सच जरूर बताना।”

     

    आर्या के हाथ काँपने लगे।

     

    “कबीर… ये क्या है?”

     

    कबीर ने डायरी देखी और उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “इसे मत पढ़ो।”

     

    “क्यों?”

     

    आर्या ने अगला पन्ना खोला।

     

    वहाँ उसकी तस्वीर थी।

     

    लेकिन तस्वीर आज से तीन साल पुरानी थी।

     

    आर्या की साँस रुक गई।

     

    “ये… मैं हूँ।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन ये कैसे संभव है?”

     

    कबीर कुछ कहता, उससे पहले हवेली के बाहर कार रुकने की आवाज़ आई।

     

    इस बार कबीर नहीं घबराया।

     

    उसने सिर्फ इतना कहा—

     

    “वे लोग आ गए हैं।”

     

    “कौन?”

     

    “तुम्हारे अतीत का सच।”

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    एक बुजुर्ग आदमी अंदर आया। उसे देखते ही कबीर पीछे हट गया।

     

    बुजुर्ग ने आर्या को देखा और उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “मेरी बेटी… तुम जिंदा हो।”

     

    आर्या स्तब्ध रह गई।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    बुजुर्ग ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “तुम्हारा पिता।”

     

    आर्या ने कबीर की ओर देखा।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    कबीर की आँखों में दर्द था।

     

    “तीन साल पहले जो लड़की मरी थी… वो तुम नहीं थी।”

     

    “फिर कौन थी?”

     

    “तुम्हारी हमशक्ल बहन।”

     

    आर्या के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “मेरी… बहन?”

     

    बुजुर्ग ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हें बचाने के लिए हमने तुम्हारी मौत की झूठी खबर फैलाई थी। लेकिन तुम्हारी याददाश्त चली गई थी। तुम्हें दूर भेज दिया गया।”

     

    आर्या की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उसने कबीर की ओर देखा।

     

    “और तुम?”

     

    कबीर धीरे-धीरे उसके पास आया।

     

    “मैंने तुम्हें पहली नजर में पहचान लिया था।”

     

    “फिर तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि सच तुम्हें फिर खतरे में डाल देगा।”

     

    आर्या ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “और अगर मुझे कुछ हो जाता?”

     

    कबीर ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “तो इस बार मैं खुद को कभी माफ नहीं करता।”

     

    आर्या कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।”

     

    कबीर की आँखों में पहली बार सुकून दिखाई दिया।

     

    “पक्का?”

     

    आर्या मुस्कुराई।

     

    “हाँ। क्योंकि अजनबी तो तुम उस रात थे…”

     

    वह उसके करीब आई।

     

    “लेकिन अब तुम मेरे हमसफ़र हो।”

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो गई।

     

    मगर इस बार उस बारिश में डर नहीं था।

     

    सिर्फ मोहब्बत थी।

     

    और दो ऐसे दिल थे, जिन्होंने अतीत के अंधेरे को पीछे छोड़कर एक नई कहानी लिखने का फैसला किया था।

     

    कभी-कभी जिंदगी हमें जिस अजनबी से मिलाती है, वही इंसान हमारी पूरी दुनिया बन जाता है।

     

    और आर्या की कहानी में…

     

    वो अजनबी उसका हमसफ़र बन चुका था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • ऑनलाइन फ्रेंडशिप — एक अधूरी दास्तान

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    कभी-कभी ज़िंदगी हमें कुछ ऐसे लोगों से मिलाती है, जिनसे मिलने की हमने कभी कोई दुआ तक नहीं की होती। वे अचानक हमारी दुनिया में आते हैं, धीरे-धीरे हमारी आदत बन जाते हैं और फिर एक दिन… उसी खामोशी में खो जाते हैं, जहाँ से उन्हें ढूँढना भी मुमकिन नहीं होता।

     

    मेरी कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

    यह कहानी किसी कॉलेज की कैंटीन से शुरू नहीं हुई थी, न किसी सफ़र में हुई मुलाकात से और न ही किसी जान-पहचान वाले के ज़रिए। मेरी कहानी शुरू हुई थी एक ऐसे प्लेटफ़ॉर्म से, जहाँ लोग अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालते थे।

     

    मैं एक लेखिका हूँ।

     

    मुझे लिखना हमेशा से पसंद था। अपने मन की बातें कागज़ पर उतार देना, अपनी खामोशियों को शब्द दे देना और कभी-कभी अपनी ही लिखी हुई पंक्तियों में खुद को ढूँढ लेना… यही मेरी दुनिया थी।

     

    उसी दुनिया में एक दिन मेरी नज़र एक ऐसे शख्स की लिखी हुई रचना पर पड़ी, जो मेरी ही तरह लिखता था। उसकी बातों में भी वही एहसास था, वही गहराई थी और शायद वही अकेलापन भी, जिसे मैं अपनी लिखाई में अक्सर छुपा दिया करती थी।

     

    मैंने उसकी कुछ रचनाएँ पढ़ीं।

     

    फिर कुछ और पढ़ीं।

     

    और पता नहीं कब उसकी लिखाई मुझे अच्छी लगने लगी।

     

    लेकिन उस वक्त कहाँ पता था कि एक लेखक की लिखाई पसंद आना, एक दिन उसी लेखक को अपनी ज़िंदगी का इतना अहम हिस्सा बना देगा।

     

    एक दिन अचानक उसका संदेश मेरे इनबॉक्स में आया।

     

    संदेश बहुत साधारण था।

     

    शायद किसी बात को लेकर उसने मुझसे कुछ पूछा था।

     

    मैंने भी सामान्य-सा जवाब दे दिया।

     

    बस… यहीं से हमारी कहानी शुरू हुई।

     

    शुरुआत में हमारी बातें सिर्फ़ लिखने-पढ़ने तक सीमित थीं। कौन-सी रचना अच्छी लगी, क्या लिखना चाहिए, किस एहसास को किस तरह शब्द देना चाहिए… बातें छोटी थीं, मगर धीरे-धीरे उन छोटी बातों ने हमारे बीच एक बड़ा रिश्ता बना दिया।

     

    हम दोनों को शायद पता ही नहीं चला कि कब “आप” से “तुम” हो गया।

     

    कब औपचारिक बातों की जगह बेवजह की बातें होने लगीं।

     

    कब सुबह की शुरुआत एक-दूसरे के संदेश से होने लगी और रात तब तक अधूरी लगने लगी, जब तक बात न हो जाए।

     

    वह सिर्फ़ मेरी दोस्त नहीं रही थी।

     

    वह मेरी आदत बन चुकी थी।

     

    मेरे दिन का एक ऐसा हिस्सा, जिसके बिना दिन पूरा नहीं लगता था।

     

    अगर किसी दिन बात न हो तो मन बार-बार मोबाइल उठाता।

     

    “शायद उसका मैसेज आया हो…”

     

    फिर स्क्रीन देखती और खाली इनबॉक्स देखकर खुद से कहती—“शायद व्यस्त होगी।”

     

    और कुछ देर बाद फिर मोबाइल देखती।

     

    हमारी दोस्ती इतनी गहरी हो गई थी कि एक दिन बिना बात किए रहना मुश्किल लगता था।

     

    हम अपनी खुशियाँ बाँटते थे।

     

    अपनी परेशानियाँ बाँटते थे।

     

    कभी वह उदास होती तो मैं उसे हँसाने की कोशिश करती और कभी मेरा मन भारी होता तो वह बिना पूछे समझ जाती कि कुछ ठीक नहीं है।

     

    अजीब बात थी…

     

    हम एक-दूसरे से कभी आमने-सामने नहीं मिले थे, फिर भी वह मुझे उन लोगों से ज्यादा समझती थी, जो मेरे आसपास रहते थे।

     

    कभी-कभी मैं सोचती थी कि आखिर एक ऑनलाइन मुलाकात इतनी सच्ची कैसे हो सकती है?

     

    फिर खुद ही जवाब मिलता—

     

    रिश्ते दूरी से नहीं, एहसास से करीब होते हैं।

     

    हमारी दोस्ती में कोई स्वार्थ नहीं था।

     

    बस एक-दूसरे का साथ था।

     

    एक-दूसरे की बातें सुनने की चाह थी।

     

    और शायद यही वजह थी कि धीरे-धीरे वह मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गई।

     

    लेकिन हर खूबसूरत कहानी के हिस्से में खुशियाँ हमेशा नहीं रहतीं।

     

    एक दिन मेरी ज़िंदगी में ऐसा मोड़ आया, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था।

     

    मेरे परिवार को हमारी दोस्ती के बारे में पता चल गया।

     

    और फिर सवाल मेरी दोस्ती का नहीं, परिवार की सोच का बन गया।

     

    मेरे घर में यह बात स्वीकार नहीं थी कि मैं किसी लड़की से इस तरह बात करूँ, उससे इतनी गहरी दोस्ती रखूँ और उसके साथ अपना इतना समय बाँटूँ।

     

    मुझे समझाया गया।

     

    रोका गया।

     

    और आखिरकार मुझसे कहा गया कि मुझे उससे बात करना बंद करना होगा।

     

    मैंने बहुत कुछ कहना चाहा।

     

    बहुत कुछ समझाना चाहा।

     

    मैं कहना चाहती थी कि वह सिर्फ़ एक ऑनलाइन दोस्त है।

     

    कि इस रिश्ते में कुछ गलत नहीं है।

     

    कि उसने कभी मेरा बुरा नहीं चाहा।

     

    कि वह मेरे लिए बहुत खास है।

     

    लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनके सामने हमारी आवाज़ बहुत छोटी पड़ जाती है।

     

    मैं चाहकर भी उसे सब कुछ नहीं बता पाई।

     

    सबसे ज्यादा दर्द इस बात का था कि वह शायद मेरा इंतज़ार कर रही होगी।

     

    शायद उसे लग रहा होगा कि मैं अचानक क्यों बदल गई?

     

    कल तक जो इंसान घंटों बातें करता था, आज उसके पास दो शब्द बोलने का वक्त क्यों नहीं?

     

    वह शायद मेरे संदेश का इंतज़ार करती रही होगी।

     

    शायद बार-बार अपना इनबॉक्स खोलती होगी।

     

    शायद उसने सोचा होगा कि मुझसे कोई गलती हो गई।

     

    और मैं…

     

    मैं चाहकर भी उसे सच नहीं बता पा रही थी।

     

    कितनी अजीब मजबूरी थी।

     

    मैं उससे बात करना चाहती थी, लेकिन कर नहीं सकती थी।

     

    मैं उसे कारण बताना चाहती थी, लेकिन बता नहीं सकती थी।

     

    मैं उसे यह कहना चाहती थी कि—

     

    “मैं तुमसे दूर अपनी मर्ज़ी से नहीं जा रही हूँ।”

     

    लेकिन मेरे होंठों तक ये शब्द कभी पहुँच ही नहीं पाए।

     

    दिन बीतते गए।

     

    फिर हफ्ते।

     

    और धीरे-धीरे हमारी बातचीत पूरी तरह बंद हो गई।

     

    लेकिन एक चीज़ बंद नहीं हुई—

     

    मेरी यादें।

     

    आज भी कभी-कभी कोई खूबसूरत बात पढ़ती हूँ तो उसकी याद आ जाती है।

     

    किसी की लिखी हुई कोई पंक्ति दिल को छू जाए तो लगता है, जैसे वह सामने बैठी हो और कह रही हो—

     

    “देखो, यह पंक्ति कितनी अच्छी है।”

     

    कभी मोबाइल हाथ में लेकर पुरानी बातचीत देखने का मन करता है।

     

    पुराने संदेश पढ़ती हूँ।

     

    कुछ शब्दों पर मुस्कुराती हूँ।

     

    कुछ बातों पर आँखें नम हो जाती हैं।

     

    और फिर खुद से एक ही सवाल करती हूँ—

     

    “क्या उसे कभी पता चलेगा कि मैं उससे दूर क्यों हुई थी?”

     

    शायद नहीं।

     

    शायद वह आज भी मुझे गलत समझती होगी।

     

    शायद उसे लगता होगा कि मैंने उसे भुला दिया।

     

    लेकिन सच यह है कि कुछ लोगों को भुलाया नहीं जाता।

     

    वे बस हमारी ज़िंदगी से दूर हो जाते हैं।

     

    उनकी जगह कोई और नहीं लेता।

     

    वे हमारे साथ नहीं होते, फिर भी हमारी यादों में हमेशा रहते हैं।

     

    आज मेरे पास उससे बात करने का कोई रास्ता नहीं है।

     

    मेरे पास उसके साथ बिताए हुए नए पल नहीं हैं।

     

    मेरे पास उसके संदेशों का इंतज़ार नहीं है।

     

    मेरे पास रोज़ की वो बातें नहीं हैं, जिनके बिना कभी दिन पूरा नहीं होता था।

     

    मेरे पास अगर कुछ है…

     

    तो बस उसकी यादें हैं।

     

    कुछ अधूरी बातें।

     

    कुछ पुराने संदेश।

     

    कुछ मुस्कुराहटें।

     

    और एक ऐसा रिश्ता, जिसका अंत कभी हमने तय ही नहीं किया था।

     

    कभी-कभी सोचती हूँ, काश उस दिन मैं उसे सब बता पाती।

     

    काश मैं बस इतना कह पाती—

     

    “मुझसे नाराज़ मत होना… मैं तुम्हें छोड़ नहीं रही, बस हालात मुझे तुमसे दूर कर रहे हैं।”

     

    शायद वह समझ जाती।

     

    शायद नहीं भी समझती।

     

    लेकिन कम से कम मेरे दिल पर यह बोझ तो नहीं रहता कि मैंने उसे बिना वजह छोड़ दिया।

     

    अब जब कभी मैं कुछ लिखती हूँ, तो मेरी हर कहानी में कहीं न कहीं उसका ज़िक्र आ ही जाता है।

     

    नाम नहीं लिखती…

     

    क्योंकि कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते।

     

    बस एहसास होते हैं।

     

    और वह एहसास आज भी मेरे भीतर ज़िंदा है।

     

    लोग अक्सर कहते हैं कि ऑनलाइन बने रिश्ते ज्यादा दिनों तक नहीं चलते।

     

    मैं उनसे बस इतना कहना चाहती हूँ—

     

    रिश्ता ऑनलाइन था, लेकिन एहसास बिल्कुल असली थे।

     

    दूरी ऑनलाइन थी, मगर अपनापन बिल्कुल सच्चा था।

     

    हम कभी मिले नहीं थे, फिर भी उसने मेरे दिल में एक ऐसी जगह बना ली, जहाँ आज भी कोई दूसरा नहीं पहुँच पाया।

     

    शायद हमारी कहानी अधूरी है।

     

    शायद हमारी दोस्ती का आखिरी पन्ना बहुत जल्दी बंद हो गया।

     

    लेकिन हर अधूरी कहानी बेकार नहीं होती।

     

    कुछ अधूरी कहानियाँ हमें उम्र भर याद रहती हैं।

     

    और मेरी कहानी भी उन्हीं में से एक है।

     

    आज वह मेरे साथ नहीं है।

     

    हमारी बातें नहीं होतीं।

     

    एक-दूसरे की खबर नहीं मिलती।

     

    लेकिन जब कभी कोई पूछता है—

     

    “क्या तुम्हारी ज़िंदगी में कभी कोई ऐसा इंसान आया था, जिसे तुमने खोना नहीं चाहा?”

     

    तो मेरे पास उस सवाल का जवाब आज भी है।

     

    हाँ…

     

    एक दोस्त थी।

     

    ऑनलाइन मिली थी।

     

    मेरी तरह लिखती थी।

     

    मेरी बातों को समझती थी।

     

    मेरी खामोशियों को पढ़ लेती थी।

     

    और फिर एक दिन हालात ने उसे मुझसे छीन लिया।

     

    मैं उसे रोक नहीं पाई।

     

    उसे अपना सच बता नहीं पाई।

     

    लेकिन शायद वह यह कभी जान पाए…

     

    कि मैंने उसे भुलाया नहीं था।

     

    मैंने बस उसे अपनी यादों में रख लिया था।

     

    और कुछ लोग ज़िंदगी से चले जाने के बाद भी कहाँ जाते हैं?

     

    वे हमारे अंदर कहीं बस जाते हैं।

     

    वह भी आज मेरी ज़िंदगी में नहीं है…

     

    मगर मेरी हर उस कहानी में है,

     

    जिसे लिखते हुए मेरी आँखें नम हो जाती हैं।

     

    क्योंकि मेरे पास अब उससे जुड़ी कोई नई बात नहीं है…

     

    बस पुरानी यादें हैं।

     

    और शायद यही हमारी दोस्ती की सबसे खूबसूरत बात है—

     

    हमारी कहानी खत्म हो गई,

     

    लेकिन मेरी यादों में…

     

    हमारी दोस्ती आज भी जारी है।

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 🐦 नन्ही चिड़िया और बारिश की बूँद 🌧️

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    एक घने जंगल में चिंकी नाम की एक नन्ही चिड़िया रहती थी। वह बहुत प्यारी और चंचल थी, लेकिन उसे अपनी छोटी-सी ताकत पर बिल्कुल भरोसा नहीं था।

     

    एक दिन जंगल में बहुत तेज़ बारिश हुई। बारिश इतनी ज़ोरदार थी कि पेड़ों की डालियाँ हिलने लगीं। चिंकी डरकर अपने घोंसले में छिप गई।

     

    बारिश रुकने के बाद उसने देखा कि एक छोटी-सी चींटी पानी की धारा में फँस गई है।

     

    चींटी चिल्लाई,

    “बचाओ! कोई मेरी मदद करो!”

     

    चिंकी ने सोचा,

    “मैं तो इतनी छोटी हूँ। मैं इसे कैसे बचा सकती हूँ?”

     

    फिर उसने हिम्मत जुटाई। उसने अपनी चोंच से एक छोटा-सा पत्ता उठाया और उसे चींटी के पास पानी में डाल दिया।

     

    चींटी किसी तरह उस पत्ते पर चढ़ गई और बहते-बहते किनारे तक पहुँच गई।

     

    चींटी ने मुस्कुराकर कहा,

    “धन्यवाद चिंकी! तुमने मेरी जान बचा ली।”

     

    चिंकी बहुत खुश हुई। उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा,

    “मैं छोटी जरूर हूँ, लेकिन किसी के काम तो आ सकती हूँ!”

     

    कुछ दिनों बाद जंगल में एक शिकारी आया। उसने चिंकी को पकड़ने के लिए जाल बिछाया। चिंकी जैसे ही जाल के पास पहुँची, चींटी ने उसे देख लिया।

     

    चींटी तुरंत अपने साथियों को बुलाकर आई। सभी चींटियों ने मिलकर शिकारी के पैरों पर काटना शुरू कर दिया। शिकारी घबरा गया और वहाँ से भाग गया।

     

    चिंकी की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

     

    वह बोली,

    “आज समझ आया कि छोटी-सी मदद भी कभी बेकार नहीं जाती।”

     

    चींटी मुस्कुराई और बोली,

    “और सच्ची दोस्ती में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता।”

     

     सीख:

     

    हमें कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि हम छोटे हैं या हमारी मदद छोटी है। सच्चे मन से की गई छोटी-सी मदद भी किसी के लिए बहुत बड़ी बन सकती है। 

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 53 : देवेंद्र का वो राज, जिसने सबको हिला दिया

     

     

    स्क्रीन बंद हो चुकी थी।

     

    लेकिन उस पर दिखाई दिया आखिरी चेहरा अब भी सबकी आंखों के सामने था।

     

    देवेंद्र।

     

    कमरे में ऐसा सन्नाटा था कि किसी की सांसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी।

     

    आरव ने धीरे-धीरे अपनी बंदूक देवेंद्र की तरफ कर दी।

     

    “एक सवाल का जवाब दीजिए।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पूछो।”

     

    “क्या आप गद्दार हैं?”

     

    देवेंद्र की आंखें भर आईं।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा—

     

    “तो मेरे नाना ने आपका नाम क्यों लिया?”

     

    देवेंद्र चुप रहा।

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ा।

     

    “और आपने कहा कि आपने मेरी मां को बचाने के लिए झूठ बोला था?”

     

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “आरव…”

     

    “मां, आप चुप रहिए।”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “आज मुझे सब जानना है।”

     

    “पच्चीस साल से हर कोई मुझसे कुछ न कुछ छुपाता रहा है।”

     

    “पहले पापा… फिर आप… फिर देवेंद्र अंकल।”

     

    “अब और नहीं।”

     

    देवेंद्र ने धीरे से अपनी बंदूक जमीन पर रख दी।

     

    “ठीक है।”

     

    “आज सब बता देता हूं।”

     

    उन्होंने नैना की तरफ देखा।

     

    “लेकिन ये सच सुनना आसान नहीं होगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें सच चाहिए।”

     

    विहान ने भी कहा—

     

    “चाहे कितना भी दर्दनाक क्यों न हो।”

     

    देवेंद्र ने गहरी सांस ली।

     

    “पच्चीस साल पहले… तुम्हारे नाना को पता चला था कि विक्रम उनके कारोबार के अंदर से ही उन्हें बर्बाद कर रहा है।”

     

    “उन्होंने अभय और समर को इसकी जांच करने को कहा।”

     

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के खिलाफ सबूत इकट्ठे किए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “फिर एक दिन हमें पता चला कि विक्रम को सब कुछ पता चल चुका है।”

     

    “उसने अभय को मारने की कोशिश की।”

     

    अभय ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “उस रात…”

     

    देवेंद्र की आवाज भारी हो गई।

     

    “मैं अभय को बचाकर एक सुरक्षित जगह ले गया।”

     

    “लेकिन उसी रात मुझे नैना का फोन आया।”

     

    नैना ने सिर झुका लिया।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “नैना ने मुझे बताया कि वो गर्भवती है।”

     

    आरव, अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    देवेंद्र आगे बोले—

     

    “विक्रम को ये पता चल गया था कि नैना के बच्चे भविष्य में उसके खिलाफ खड़े हो सकते हैं।”

     

    “उसने नैना और उसके बच्चों को खत्म करने की योजना बना ली।”

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    नैना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “मैं डर गई थी।”

     

    “मैं अपने बच्चों को खोना नहीं चाहती थी।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “इसलिए हमने एक योजना बनाई।”

     

    “नैना की मौत की झूठी खबर फैलाई गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन आप हमें कैसे बचाते रहे?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम तीनों को अलग-अलग जगह भेज दिया गया।”

     

    “ताकि अगर एक जगह हमला हो, तो बाकी दोनों बच सकें।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    “इसलिए हम तीनों अलग हुए थे?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “हमारी योजना लगभग सफल थी।”

     

    “लेकिन एक गलती हो गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “विक्रम को पता चल गया कि अभय जिंदा है।”

     

    “उसने अभय का पीछा किया।”

     

    अभय ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “और मैं पकड़ा गया।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको किसने बचाया?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “समर ने।”

     

    आरोही अचानक चौंक गई।

     

    “मेरे पापा?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “समर ने अपनी जान देकर मुझे बचाया।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तो पापा की मौत…”

     

    अभय ने कहा—

     

    “मेरी वजह से हुई।”

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा—

     

    “ऐसा मत कहिए।”

     

    अभय की आवाज टूट गई।

     

    “अगर मैं उस रात वहां नहीं होता… तो शायद समर जिंदा होता।”

     

    आरव ने अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “आपने जानबूझकर कुछ नहीं किया।”

     

    आरव ने देवेंद्र से पूछा—

     

    “लेकिन फिर नाना ने आपको गद्दार क्यों कहा?”

     

    देवेंद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि मैंने उनके साथ एक झूठ बोला था।”

     

    “क्या झूठ?”

     

    “मैंने उन्हें बताया कि नैना मर चुकी है।”

     

    नैना ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन वो जिंदा थीं।”

     

    “हां।”

     

    “नाना को क्यों नहीं बताया?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि तब तक विक्रम ने नाना के घर में अपने आदमी भेज दिए थे।”

     

    “मुझे शक था कि नाना की पूरी टीम में कोई गद्दार है।”

     

    “अगर मैंने उन्हें सच बताया होता, तो नैना की लोकेशन विक्रम तक पहुंच जाती।”

     

    आरव कुछ देर चुप रहा।

     

    “तो आपने नाना से झूठ बोला…”

     

    “नैना को बचाने के लिए?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    नैना धीरे-धीरे आगे बढ़ीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    नैना ने कहा—

     

    “मुझे तुम्हारे बचपन का हर पल याद है।”

     

    “मैं तुमसे दूर थी… लेकिन तुम्हें भूलकर नहीं।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “मां, हमें लगा था आपने हमें छोड़ दिया।”

     

    नैना ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    अमन भी उनके पास आ गया।

     

    आरव कुछ कदम दूर खड़ा रहा।

     

    नैना ने हाथ बढ़ाया।

     

    “गुड्डू…”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह धीरे-धीरे मां के पास गया और उन्हें गले लगा लिया।

     

    “बस एक बात का वादा कीजिए।”

     

    “क्या?”

     

    “अब मुझसे कोई सच मत छुपाइए।”

     

    नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “वादा।”

     

    आरोही अब भी चुप थी।

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “बेटी।”

     

    आरोही ने उनकी तरफ देखा।

     

    “जी?”

     

    “तुम्हारे पिता ने आखिरी वक्त में मुझे एक बात कही थी।”

     

    आरोही की सांस थम गई।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “उन्होंने कहा था कि अगर कभी उनकी बेटी आरव के पास पहुंचे… तो उसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “उन्होंने मेरे बारे में सोचा था?”

     

    “आखिरी सांस तक।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “चाहे कितनी भी मुश्किल आए?”

     

    “चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो।

     

    अमन ने विषय बदलते हुए कहा—

     

    “अब हमें तहखाने तक पहुंचना होगा।”

     

    विहान ने अपना लॉकेट निकाला।

     

    “कोड मेरे पास है।”

     

    आरव ने अपनी चाबी निकाली।

     

    आरोही ने अपने लॉकेट से छोटी चाबी निकाल ली।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “लेकिन हमें पुराने महल तक पहुंचना होगा।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम भी वहीं जाएगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “उसे कैसे पता चलेगा?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि उसके पास भी एक चाबी है।”

     

    सब चौंक गए।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम ने पच्चीस साल पहले तुम्हारे नाना से एक चाबी चुराई थी।”

     

    “लेकिन वो अधूरी थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो वो हमारे पीछे क्यों है?”

     

    “क्योंकि उसके बिना उसका हिस्सा बेकार है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मतलब हम तीनों की चाबियां उसके लिए जरूरी हैं।”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    रात के करीब तीन बजे सभी पुराने महल पहुंचे।

     

    महल बाहर से पूरी तरह वीरान दिखाई दे रहा था।

     

    टूटी हुई दीवारें।

     

    बंद खिड़कियां।

     

    और चारों तरफ घना अंधेरा।

     

    विहान ने कहा—

     

    “क्या सच में यहां तहखाना है?”

     

    देवेंद्र ने सूखे कुएं की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    सभी कुएं के पास पहुंचे।

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    बहुत गहरा अंधेरा था।

     

    अभय ने कहा—

     

    “नीचे उतरना होगा।”

     

    अमन ने रस्सी निकाली।

     

    सब एक-एक करके नीचे उतरने लगे।

     

    सबसे आखिर में आरव और आरोही उतरे।

     

    जैसे ही दोनों नीचे पहुंचे…

     

    उनके सामने एक विशाल लोहे का दरवाजा था।

     

    उस पर तीन निशान बने थे।

     

    एक चाबी का।

     

    एक सिक्के का।

     

    और एक लॉकेट का।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही है।”

     

    आरव ने पहली चाबी लगाई।

     

    क्लिक।

     

    अमन ने अपना सिक्का एक छोटे से स्लॉट में लगाया।

     

    क्लिक।

     

    विहान ने कोड डाला—

     

    1…7…2…5

     

    आखिर में आरोही ने अपनी छोटी चाबी लगाई।

     

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर…

     

    घर्ररर…

     

    लोहे का भारी दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    लेकिन दीवारों पर सैकड़ों फाइलें रखी थीं।

     

    वीडियो रिकॉर्डिंग।

     

    पुराने कागजात।

     

    तस्वीरें।

     

    और एक बड़ा लोहे का बॉक्स।

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये सबूत हैं।”

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    “यही वो सब कुछ है, जिसके लिए पच्चीस साल तक लोग मरते रहे।”

     

    आरोही एक फाइल उठाने लगी।

     

    तभी उसके नीचे से एक पुरानी तस्वीर गिर गई।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें चार लोग खड़े थे—

     

    अभय।

     

    समर।

     

    देवेंद्र।

     

    और…

     

    विक्रम।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे कुछ लिखा था।

     

    आरव ने पढ़ा—

     

    “हम चारों ने मिलकर ये साम्राज्य बनाया था।”

     

    अमन ने हैरानी से कहा—

     

    “मतलब विक्रम अकेला नहीं था?”

     

    देवेंद्र चुप था।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप भी इसमें थे?”

     

    देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “फिर आपने हमसे झूठ क्यों बोला?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि शुरुआत में हम चारों दोस्त थे।”

     

    “लेकिन बाद में विक्रम बदल गया।”

     

    “वो ताकत का भूखा हो गया।”

     

    “और मैंने उससे अलग होने की कोशिश की।”

     

    आरव ने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया।

     

    तभी लोहे के बॉक्स के अंदर से हल्की सी आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सबकी नजर बॉक्स पर टिक गई।

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “इसमें क्या है?”

     

    आरव ने बॉक्स खोला।

     

    अंदर एक पुराना टेप रिकॉर्डर था।

     

    उस पर एक कागज रखा था।

     

    आरव ने कागज उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिस दिन मेरे बच्चे इस बॉक्स तक पहुंचेंगे, उन्हें आखिरी सच जानना होगा।”

     

    नीचे हस्ताक्षर थे—

     

    अभय।

     

    आरव ने रिकॉर्डर चलाया।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।

     

    फिर अभय की आवाज आई—

     

    “आरव… अगर तुम ये सुन रहे हो, तो समझ लो कि विक्रम ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    अभय की आवाज आगे आई—

     

    “हमारे परिवार में ही एक ऐसा इंसान है, जिसने विक्रम से भी बड़ा खेल खेला है।”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।

     

    और उसी क्षण…

     

    तहखाने का दरवाजा बाहर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अंधेरे में विक्रम की आवाज गूंजी—

     

    “अब तुम सब वहीं रहोगे… जब तक मुझे वो फाइल नहीं मिल जाती।”

     

    आरव ने अंधेरे में आरोही का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    और उसे पहली बार एहसास हुआ—

     

    असली दुश्मन शायद उनके बिल्कुल बीच में था।

     

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • 🧚‍♀️ जादुई परियों की कहानी 🧚‍♀️

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के ठीक बारह बजे, जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था, तभी आसमान से एक चमकता हुआ सितारा टूटकर धरती पर आ गिरा। लेकिन वह साधारण सितारा नहीं था। उसके गिरते ही जंगल के बीचों-बीच हजारों सुनहरी रोशनियाँ जगमगा उठीं और हवा में किसी के धीरे-धीरे हँसने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    “ही… ही… ही… क्या कोई हमें ढूँढ़ पाएगा?”

     

    अगली सुबह दस साल की मीरा ने अपने खिड़की के पास एक चमकीला सुनहरा पंख पड़ा देखा। पंख को हाथ में लेते ही वह गर्म हो गया और उसमें से एक बहुत धीमी आवाज़ आई—

     

    “मीरा… हमें तुम्हारी मदद चाहिए।”

     

    मीरा की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    पंख से आवाज़ आई, “हम जादुई परियाँ हैं… और हमारा जादुई राज्य खतरे में है!”

     

    मीरा डरने के बजाय उत्साहित हो गई। उसने पंख को अपनी छोटी-सी लाल थैली में रखा और बिना किसी को बताए जंगल की ओर चल पड़ी।

     

    गाँव के बाहर एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। दादी हमेशा कहती थीं कि उसके आगे वाला जंगल रहस्यमयी है और वहाँ कभी अकेले नहीं जाना चाहिए। लेकिन आज मीरा के मन में डर से ज्यादा उस आवाज़ को जानने की इच्छा थी।

     

    जैसे ही वह बरगद के पेड़ के पास पहुँची, पेड़ के तने पर एक चमकता हुआ दरवाज़ा दिखाई दिया। दरवाज़े पर लिखा था—

     

    “जिसके मन में सच्चाई और दया हो, वही अंदर आ सकता है।”

     

    मीरा ने दरवाज़े को छुआ।

     

    अचानक तेज रोशनी हुई और वह एक अनोखी दुनिया में पहुँच गई।

     

    वहाँ आसमान गुलाबी था, बादल रुई जैसे सफेद थे और पेड़ों पर फूलों की जगह छोटे-छोटे सितारे खिले हुए थे। नदियों का पानी चाँदी की तरह चमक रहा था। रंग-बिरंगी तितलियाँ हवा में उड़ रही थीं और छोटे-छोटे खरगोश अपने कानों से जादुई घंटियाँ बजा रहे थे।

     

    तभी सामने से चार सुंदर परियाँ उड़ती हुई आईं।

     

    सबसे आगे नीले पंखों वाली परी थी। उसने मुस्कुराकर कहा, “स्वागत है, मीरा। मैं नीलपरी हूँ।”

     

    उसके साथ गुलाबी पंखों वाली परी बोली, “मैं फूलपरी हूँ।”

     

    पीले पंखों वाली परी ने कहा, “मेरा नाम सूरजपरी है।”

     

    और सबसे छोटी हरे पंखों वाली परी बोली, “मैं वनपरी हूँ।”

     

    मीरा ने पूछा, “आप लोगों को मेरी मदद क्यों चाहिए?”

     

    नीलपरी का चेहरा अचानक उदास हो गया।

     

    “हमारे जादुई राज्य का ‘सतरंगी रत्न’ चोरी हो गया है। उसके बिना हमारे जंगल के फूल मुरझा रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं और हमारी जादुई रोशनी धीरे-धीरे खत्म हो रही है।”

     

    “रत्न किसने चुराया?” मीरा ने पूछा।

     

    वनपरी ने धीरे से कहा, “काली गुफा में रहने वाला छायादानव।”

     

    मीरा थोड़ी घबराई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।

     

    “अगर मैं आपकी मदद कर सकती हूँ, तो मैं जरूर करूँगी।”

     

    चारों परियाँ खुशी से उसके चारों ओर उड़ने लगीं।

     

    उन्होंने मीरा को एक जादुई नक्शा दिया। नक्शे पर तीन जगह चमक रही थीं—फुसफुसाती नदी, उल्टा पहाड़ और चाँदनी गुफा।

     

    “इन तीन स्थानों को पार करके ही छायादानव की गुफा तक पहुँचा जा सकता है,” नीलपरी ने बताया।

     

    सबसे पहले वे फुसफुसाती नदी के पास पहुँचे। नदी का पानी लगातार बातें कर रहा था।

     

    “जो सच बोलेगा, वही आगे जाएगा… जो झूठ बोलेगा, वह यहीं रह जाएगा…”

     

    नदी ने मीरा से पूछा, “तुम यहाँ क्यों आई हो?”

     

    मीरा ने कहा, “मैं अपने लिए कोई जादू लेने नहीं आई। मैं इन परियों की मदद करने आई हूँ।”

     

    नदी चमक उठी और उसके बीच एक पुल बन गया।

     

    इसके बाद वे उल्टे पहाड़ के पास पहुँचे। वहाँ पेड़ नीचे और जड़ें ऊपर थीं। पहाड़ का रास्ता बहुत कठिन था। मीरा कई बार फिसली, लेकिन सूरजपरी और वनपरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    आखिर वे चाँदनी गुफा तक पहुँच गए।

     

    गुफा के अंदर इतनी अंधेरी थी कि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। तभी मीरा ने अपनी थैली से सुनहरा पंख निकाला। पंख चमका और पूरा रास्ता रोशन हो गया।

     

    अचानक एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “कौन है जो मेरी गुफा में आने की हिम्मत कर रहा है?”

     

    सामने एक विशाल काला साया दिखाई दिया।

     

    वह छायादानव था।

     

    उसके हाथ में सतरंगी रत्न चमक रहा था।

     

    परियाँ डरकर पीछे हट गईं, लेकिन मीरा आगे बढ़ी।

     

    “वह रत्न वापस कर दो।”

     

    दानव जोर से हँसा।

     

    “तुम मुझे आदेश दोगी? मैं इस रत्न की शक्ति से पूरे जादुई राज्य को अपना गुलाम बना सकता हूँ!”

     

    मीरा ने ध्यान से उसे देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन कहीं न कहीं बहुत गहरी उदासी भी थी।

     

    मीरा ने पूछा, “तुमने यह रत्न चुराया क्यों?”

     

    दानव कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने धीमी आवाज़ में कहा, “क्योंकि… मुझे कोई अपना नहीं मानता।”

     

    सभी परियाँ चौंक गईं।

     

    दानव ने कहा, “मैं भी कभी इस जादुई राज्य का रक्षक था। लेकिन एक दिन मेरी जादुई शक्ति खत्म हो गई। सभी परियों ने मुझे कमजोर समझकर दूर कर दिया। तब से मैं इस अंधेरी गुफा में अकेला रहता हूँ।”

     

    मीरा को उस पर दया आ गई।

     

    उसने कहा, “गलती करने पर किसी को हमेशा के लिए अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। अगर तुम रत्न वापस कर दो, तो क्या तुम हमारे साथ वापस चलोगे?”

     

    छायादानव ने पहली बार किसी को अपने लिए इतना प्यार से बोलते सुना था।

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उसने सतरंगी रत्न मीरा के हाथ में रख दिया।

     

    “क्या… क्या परियाँ मुझे स्वीकार करेंगी?”

     

    नीलपरी आगे आई और मुस्कुराई।

     

    “अगर तुम सच में बदलना चाहते हो, तो तुम्हारे लिए हमारे राज्य में हमेशा जगह है।”

     

    छायादानव ने सिर झुका दिया।

     

    “मैं वादा करता हूँ।”

     

    जैसे ही सतरंगी रत्न अपने स्थान पर वापस रखा गया, पूरे जादुई राज्य में अद्भुत परिवर्तन होने लगा।

     

    सूखे फूल फिर से खिल उठे। नदियाँ चाँदी की तरह चमकने लगीं। आसमान में सात रंगों का विशाल इंद्रधनुष बन गया। हजारों छोटी परियाँ आसमान में उड़ने लगीं और चारों ओर घंटियों जैसी मधुर आवाज़ गूँजने लगी।

     

    परियों की रानी भी वहाँ आईं। उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखकर कहा—

     

    “तुमने केवल हमारा राज्य नहीं बचाया, बल्कि एक अकेले हृदय में भी रोशनी जलाई है। यही सच्चा जादू है।”

     

    रानी ने मीरा को एक छोटी-सी चमकती हुई डिबिया दी।

     

    “जब भी किसी जरूरतमंद की सच्चे मन से मदद करोगी, यह डिबिया एक सुनहरी रोशनी से भर जाएगी।”

     

    मीरा ने डिबिया अपने पास रख ली।

     

    अब उसे अपने घर लौटना था।

     

    नीलपरी ने उसे वही सुनहरा पंख दिया और कहा, “जब भी तुम्हें हमारी याद आए, इसे चाँदनी में रखना।”

     

    मीरा मुस्कुराई और अपने गाँव लौट आई।

     

    सुबह जब उसकी आँख खुली तो वह अपने बिस्तर पर थी। उसे लगा शायद यह सब सपना था।

     

    लेकिन उसकी मुट्ठी में सुनहरा पंख अब भी मौजूद था।

     

    मीरा खिड़की के पास गई। दूर जंगल के ऊपर एक छोटा-सा इंद्रधनुष चमक रहा था।

     

    तभी हवा में एक परिचित आवाज़ आई—

     

    “सच्चे दिल से किया गया अच्छा काम कभी जादू से कम नहीं होता।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    उस दिन से उसने हर जरूरतमंद की मदद करना शुरू कर दिया। और हर बार उसकी छोटी-सी जादुई डिबिया थोड़ी और चमकने लगती।

     

    कहते हैं, आज भी उस गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के पास रात में कभी-कभी सुनहरी रोशनी दिखाई देती है।

     

    शायद वे परियाँ आज भी वहाँ रहती हैं।

     

    और शायद वे ऐसे ही किसी बच्चे का इंतज़ार कर रही हैं, जिसके दिल में सच्चाई, दया और दूसरों की मदद करने का साहस हो।

     

    क्योंकि असली जादू परियों के पंखों में नहीं…

     

    हमारे अच्छे दिल में छिपा होता है।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 52

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 52

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 52 : नाना जिंदा थे, लेकिन कैद में क्यों?

    स्क्रीन पर दिखाई दे रहे उस चेहरे को देखकर आरव की आंखें जम गईं।

    वो चेहरा…

    जिसे उसने सिर्फ पुरानी तस्वीरों में देखा था।

    जिसके बारे में बचपन से सुनता आया था कि उसकी मौत कई साल पहले हो चुकी है।

    उसके नाना।

    लेकिन आज वो सामने थे।

    जिंदा।

    और किसी अनजान जगह पर कैद।

    नैना की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

    “पापा…”

    स्क्रीन पर बैठे बूढ़े आदमी ने अपनी बेटी की आवाज सुनकर आंखें बंद कर लीं।

    फिर धीरे से कहा—

    “नैना… मेरी बच्ची।”

    नैना अपने आंसू रोक नहीं पाईं।

    “आपने हमें इतने साल क्यों नहीं बताया कि आप जिंदा हैं?”

    वो कुछ पल चुप रहे।

    फिर बोले—

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल जाता… तो तुम सबको बचाना मुश्किल हो जाता।”

    आरव आगे बढ़ा।

    “नाना… आपको किसने कैद किया है?”

    स्क्रीन के पीछे खड़ा विक्रम मुस्कुराया।

    “अभी इतनी जल्दी क्यों?”

    आरव ने गुस्से में कहा—

    “विक्रम!”

    “उन्हें छोड़ दो।”

    विक्रम ने कहा—

    “तुम मुझे आदेश देने की स्थिति में नहीं हो।”

    “तुम्हारे नाना के पास वो आखिरी राज है, जिसकी तलाश में तुम लोग पिछले पच्चीस साल से भटक रहे हो।”

    अमन ने पूछा—

    “कौन-सा राज?”

    विक्रम ने मुस्कुराकर कहा—

    “तुम्हारे जन्म का।”


    नाना ने बताई सच्चाई

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “नाना, क्या ये सच कह रहा है?”

    नाना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—

    “हां।”

    तीनों भाइयों के चेहरे पर सवाल थे।

    नाना ने कहा—

    “तुम तीनों का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था।”

    “लेकिन तुम्हारे जन्म के कुछ ही समय बाद मुझे पता चला कि हमारे परिवार के खिलाफ एक बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहा है।”

    विहान ने पूछा—

    “किसका?”

    “विक्रम का।”

    विक्रम हंसा।

    “अधूरी कहानी मत सुनाओ।”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “आज मैं पूरी कहानी बताऊंगा।”

    विक्रम का चेहरा गंभीर हो गया।


    पच्चीस साल पुराना राज

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता अभय और समर एक ही काम पर थे।”

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के गैरकानूनी कारोबार के सबूत जुटाए थे।”

    आरव ने पूछा—

    “फिर?”

    “विक्रम को इसका पता चल गया।”

    “उसने पहले समर को निशाना बनाया।”

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

    “मेरे पापा…”

    नाना ने कहा—

    “समर ने अपनी बेटी को बचाने के लिए सबूत तुम्हारे पास रखे।”

    “लेकिन विक्रम ने उसे ढूंढ लिया।”

    आरोही ने पूछा—

    “तो पापा ने मेरे लॉकेट में चाबी क्यों छुपाई?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि वो जानता था कि अगर उसे कुछ हो गया… तो एक दिन तुम बड़ी होकर उस सच तक पहुंचोगी।”

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।


    अभय की बारी

    नाना आगे बोले—

    “जब विक्रम ने अभय को खत्म करने की कोशिश की, तब अभय ने अपनी मौत का नाटक किया।”

    अभय ने सिर झुका लिया।

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “पापा…”

    अभय ने कहा—

    “मुझे तुम्हें सच बताना चाहिए था।”

    आरव की आवाज भर्रा गई।

    “आपने इतने साल हमसे दूरी क्यों रखी?”

    अभय ने कहा—

    “क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहता था।”

    “मुझे डर था कि अगर विक्रम को पता चला कि तुम मेरे बच्चे हो… तो वो तुम्हें भी नहीं छोड़ेगा।”

    आरव ने कहा—

    “लेकिन मैं आपका बेटा हूं।”

    “मुझे आपकी जरूरत थी।”

    अभय की आंखें भर आईं।

    “मुझे भी तुम्हारी जरूरत थी, बेटा।”

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच सिर्फ खामोशी थी।

    फिर आरव ने आगे बढ़कर अपने पिता को गले लगा लिया।

    अभय ने उसे कसकर पकड़ लिया।


    नाना की असली योजना

    अमन ने पूछा—

    “अगर आप सब जानते थे तो हमें तीन अलग-अलग चाबियां क्यों दी गईं?”

    नाना मुस्कुराए।

    “क्योंकि मैंने जानबूझकर ऐसा किया।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि मैं जानता था कि अगर एक व्यक्ति के पास पूरा राज होगा, तो विक्रम उसे खत्म कर देगा।”

    “इसलिए मैंने राज को तीन हिस्सों में बांट दिया।”

    विहान ने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।

    “और ये तीसरी चाबी?”

    नाना ने कहा—

    “हां।”

    “तीनों चाबियां मिलकर एक दरवाजा खोलती हैं।”

    आरव ने पूछा—

    “कहां का?”

    नाना ने कहा—

    “पुराने महल के नीचे बने गुप्त तहखाने का।”

    देवेंद्र अचानक बोल पड़ा—

    “वही तहखाना?”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “हां, देवेंद्र।”

    देवेंद्र का चेहरा गंभीर हो गया।

    आरव ने पूछा—

    “आप उस जगह के बारे में जानते हैं?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “हां।”

    “लेकिन मैंने सोचा था वो जगह हमेशा के लिए बंद हो चुकी है।”

    नाना ने कहा—

    “वो कभी बंद नहीं हुई।”

    “वो सिर्फ सही लोगों का इंतजार कर रही थी।”


    विक्रम क्यों डरा हुआ था?

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “अगर उस तहखाने में इतना बड़ा राज है, तो विक्रम हमें वहां जाने क्यों नहीं दे रहा?”

    विक्रम ने तुरंत कहा—

    “क्योंकि वहां कुछ ऐसा है जिसे बाहर आना नहीं चाहिए।”

    आरव मुस्कुराया।

    “मतलब वहां हमारे खिलाफ कुछ नहीं… तुम्हारे खिलाफ है।”

    विक्रम की मुस्कान गायब हो गई।

    नाना ने कहा—

    “बिल्कुल।”

    “वहां विक्रम के पूरे साम्राज्य के सबूत हैं।”

    “नाम।”

    “हिसाब।”

    “कागजात।”

    “और उन सभी लोगों के वीडियो, जिन्हें उसने रास्ते से हटाया।”

    अमन ने कहा—

    “तो फिर पुलिस को दे देते हैं।”

    नाना ने कहा—

    “अगर हम उस तहखाने तक पहुंच गए तो।”


    विक्रम का आखिरी दांव

    विक्रम ने कैमरे के सामने कदम बढ़ाया।

    “तुम लोग बहुत खुश हो रहे हो।”

    “लेकिन तुम भूल रहे हो कि तुम्हारे नाना अभी मेरे कब्जे में हैं।”

    नैना ने गुस्से में कहा—

    “उन्हें छोड़ दो।”

    “तुम्हें जो चाहिए, मैं दूंगी।”

    विक्रम हंसा।

    “मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए।”

    “मुझे सिर्फ आरव चाहिए।”

    नैना चौंक गईं।

    “आरव?”

    विक्रम ने कहा—

    “हां।”

    “क्योंकि उस तहखाने का आखिरी ताला वही खोल सकता है।”

    आरव ने पूछा—

    “मैं?”

    नाना ने आंखें बंद कर लीं।

    “मुझे डर था कि ये दिन आएगा।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि मैंने उस ताले में तुम्हारा खून इस्तेमाल किया था।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।


    आरव की विरासत

    आरव ने अविश्वास से पूछा—

    “मेरे खून का?”

    “हां।”

    “क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि तुम्हारे पिता की संपत्ति का असली वारिस तुम हो।”

    अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

    आरव ने कहा—

    “लेकिन हम तीनों भाई हैं।”

    “हां।”

    “तो सिर्फ मैं क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि तुम सबसे बड़े हो।”

    “तुम्हारे पिता ने कानूनी वारिस के रूप में तुम्हारा नाम रखा था।”

    “लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारे भाइयों का कोई हक नहीं।”

    “तुम तीनों मिलकर ही उस विरासत को पूरा कर सकते हो।”

    अमन ने कहा—

    “तो हम तीनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।”

    नाना मुस्कुराए।

    “यही बात तुम्हें सबसे ताकतवर बनाती है।”


    आरोही का सच

    अचानक नाना की नजर आरोही पर गई।

    “और तुम।”

    आरोही चौंक गई।

    “जी?”

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता ने अपनी बेटी को सिर्फ एक चाबी नहीं दी थी।”

    “उन्होंने तुम्हें इस परिवार से जोड़ने वाला एक सबूत भी दिया था।”

    आरोही ने पूछा—

    “क्या?”

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता समर और अभय सिर्फ दोस्त नहीं थे।”

    आरव ने चौंककर पूछा—

    “तो?”

    “वे दोनों एक ही मिशन पर काम कर रहे थे।”

    “और उन्होंने फैसला किया था कि अगर उन्हें कुछ हो गया…”

    “तो उनके बच्चे एक-दूसरे की रक्षा करेंगे।”

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

    नाना ने मुस्कुराकर कहा—

    “शायद इसी वजह से तुम दोनों इतने करीब आए।”

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “चाहे अतीत कुछ भी हो… मैं तुम्हें छोड़ने वाला नहीं हूं।”

    आरोही ने धीरे से कहा—

    “मैं भी नहीं।”


    तहखाने का रास्ता

    नाना ने कहा—

    “अब मेरी बात ध्यान से सुनो।”

    “पुराने महल के पीछे एक सूखा कुआं है।”

    “उसके नीचे एक लोहे का दरवाजा है।”

    “वहीं से तहखाने का रास्ता शुरू होता है।”

    आरव ने पूछा—

    “और तीन चाबियां?”

    “पहली चाबी तुम्हारे पास।”

    “दूसरी अमन के पास।”

    “तीसरी आरोही के लॉकेट में।”

    विहान चौंका।

    “लेकिन मेरी चाबी?”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हारी चाबी चाबी नहीं है।”

    “वो उस दरवाजे का कोड है।”

    विहान ने अपने लॉकेट को देखा।

    उसमें कुछ अंक खुदे हुए थे।

    1-7-2-5

    देवेंद्र ने कहा—

    “ये वही नंबर है!”

    आरव ने पूछा—

    “क्या?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “अभय की पुरानी फाइल में यही नंबर था।”


    नाना की आखिरी चेतावनी

    नाना ने गंभीर होकर कहा—

    “लेकिन ध्यान रखना।”

    “तहखाने में सिर्फ सबूत नहीं हैं।”

    “वहां एक इंसान भी है।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    नाना ने कहा—

    “वो व्यक्ति जिसने पच्चीस साल पहले मुझे धोखा दिया था।”

    नैना चौंक गईं।

    “पापा!”

    “आपने मुझे कभी नहीं बताया।”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम उस सच से दूर रहो।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन है वो?”

    नाना ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “तुम उसे जानते हो।”

    “बहुत करीब से।”

    अमन ने पूछा—

    “कौन?”

    नाना ने सिर्फ इतना कहा—

    “देवेंद्र।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    सभी की नजर देवेंद्र पर टिक गई।

    देवेंद्र का चेहरा सफेद पड़ गया।

    नैना ने अविश्वास से कहा—

    “देवेंद्र?”

    देवेंद्र ने सिर झुका लिया।

    आरव ने बंदूक निकाल ली।

    “पापा के दोस्त…”

    “क्या आप गद्दार हैं?”

    देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।

    “आरव… बात वैसी नहीं है जैसी दिख रही है।”

    अभय भी चौंक गया।

    “देवेंद्र?”

    नाना ने कहा—

    “उसने मुझे धोखा दिया था।”

    देवेंद्र ने कांपती आवाज में कहा—

    “मैंने धोखा नहीं दिया था।”

    “मैंने किसी को बचाने के लिए झूठ बोला था।”

    आरव ने पूछा—

    “किसे?”

    देवेंद्र ने धीरे से नैना की तरफ देखा।

    नैना की आंखें फैल गईं।

    देवेंद्र ने कहा—

    “नैना को।”

    नैना स्तब्ध रह गईं।

    और तभी स्क्रीन अचानक बंद हो गई।

    विक्रम की आखिरी आवाज गूंजी—

    “अब समझे, आरव? इस परिवार में कोई भी वैसा नहीं है जैसा दिखाई देता है।”

    स्क्रीन काली हो गई।

    आरव की नजर देवेंद्र और नैना के बीच घूम रही थी।

    उसे पहली बार लगा—

    शायद उसके परिवार का सबसे बड़ा राज अभी खुलना बाकी है।

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • तेरी यादों में हर रात, चुपके से रो लेते हैं,

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तेरी यादों में हर रात, चुपके से रो लेते हैं,

    दर्द कितना भी हो दिल में, तेरा नाम लेकर सो लेते हैं।

    तू लौट आए तो शायद फिर से जीना सीख जाएँ,

    वरना तेरे बिना हम हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा खो लेते हैं। 

    ।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भूतिया रास्ता

    भूतिया रास्ता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भूतिया रास्ता

     

    राजस्थान के एक छोटे से गाँव के बाहर एक पुराना रास्ता था। लोग उसे “भूतिया रास्ता” कहते थे। वह रास्ता घने पेड़ों के बीच से होकर गुजरता था। दिन में भी वहाँ अजीब-सी खामोशी रहती और शाम ढलते ही कोई उस तरफ जाने की हिम्मत नहीं करता।

     

    गाँव के बुजुर्ग हमेशा कहते थे, “इस रास्ते से रोज़ सिर्फ एक इंसान गुजरता है… और उसी दिन एक भूत अपना नया शिकार चुन लेता है।”

     

    पहले तो लोगों को यह सिर्फ एक कहानी लगती थी, लेकिन पिछले कई सालों से हर महीने कोई न कोई इंसान उस रास्ते से गुजरने के बाद गायब हो जाता था। उसकी लाश भी कभी नहीं मिलती थी।

     

    गाँव का एक लड़का था रोहित। वह शहर में पढ़ाई करता था। उसे भूत-प्रेत जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था। छुट्टियों में जब वह गाँव लौटा तो उसने भी लोगों से इस रास्ते की कहानी सुनी।

     

    रोहित हँसते हुए बोला, “अगर सच में वहाँ भूत है तो मैं आज रात उसी रास्ते से होकर जाऊँगा। देखता हूँ कौन मेरा क्या बिगाड़ लेता है।”

     

    उसकी माँ डर गई।

     

    “बेटा, जिद मत कर। तेरे ताऊ भी इसी रास्ते से गए थे… फिर कभी वापस नहीं आए।”

     

    लेकिन रोहित ने किसी की बात नहीं मानी।

     

    रात के करीब नौ बजे उसने टॉर्च उठाई और अकेला ही उस रास्ते की ओर चल पड़ा।

     

    जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी। अचानक उसकी टॉर्च कई बार अपने-आप जलने-बुझने लगी।

     

    “बैटरी खत्म हो रही होगी,” उसने खुद को समझाया।

     

    तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ आई।

     

    टक… टक… टक…

     

    रोहित तुरंत पीछे मुड़ा।

     

    लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

     

    वह दोबारा चलने लगा। इस बार उसे साफ महसूस हुआ कि कोई उसके बिल्कुल पीछे चल रहा है।

     

    उसने तेज़ी से कदम बढ़ाए।

     

    अचानक उसके सामने सफेद कपड़ों में एक बूढ़ी औरत दिखाई दी।

     

    उसके लंबे सफेद बाल चेहरे पर फैले हुए थे।

     

    “बेटा… मुझे मेरे घर तक छोड़ देगा?” उसने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा।

     

    रोहित ने राहत की साँस ली।

     

    “अरे, मैं तो डर ही गया था। आइए दादी, कहाँ जाना है?”

     

    औरत मुस्कुराई।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान इंसानों जैसी नहीं थी।

     

    उसके दाँत बेहद लंबे और काले थे।

     

    रोहित घबरा गया।

     

    वह पीछे हटने लगा।

     

    इतने में वह औरत पल भर में उसकी आँखों के सामने से गायब हो गई।

     

    “ये… ये कैसे हो सकता है?”

     

    रोहित का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

     

    वह भागने लगा।

     

    लेकिन जितना भागता, रास्ता उतना ही लंबा होता जाता।

     

    कुछ दूर जाकर उसे लगा कि वह फिर उसी जगह आ गया है जहाँ से चला था।

     

    अब उसे समझ आ गया था कि कुछ बहुत गलत हो रहा है।

     

    तभी पेड़ों के ऊपर से किसी के हँसने की आवाज़ आई।

     

    “हा… हा… हा…”

     

    रोहित ने ऊपर देखा।

     

    एक भयानक चेहरा पेड़ की डाल पर उल्टा लटका हुआ था।

     

    उसकी आँखें पूरी काली थीं और चेहरा जला हुआ था।

     

    रोहित चीख पड़ा।

     

    वह फिर भागा।

     

    इस बार उसके सामने एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

     

    बच्चा रो रहा था।

     

    “भैया… मेरी माँ खो गई है…”

     

    रोहित उसके पास जाने लगा।

     

    अचानक बच्चे ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं… सिर्फ काले गड्ढे थे।

     

    उसका मुँह धीरे-धीरे इतना बड़ा हो गया कि पूरा चेहरा उसी में बदल गया।

     

    रोहित पीछे गिर पड़ा।

     

    उसी समय किसी ने उसका पैर पकड़ लिया।

     

    उसने नीचे देखा।

     

    मिट्टी के अंदर से दर्जनों हाथ निकलकर उसके पैरों को पकड़ रहे थे।

     

    रोहित पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने लगा।

    किसी तरह उसने पैर छुड़ाया और भाग निकला।

    अब उसकी साँसें फूल चुकी थीं।

    तभी उसे दूर एक मंदिर दिखाई दिया।

    “बस… वहाँ पहुँच गया तो बच जाऊँगा।”

    वह पूरी ताकत से मंदिर की ओर दौड़ा।

    लेकिन जैसे ही पास पहुँचा, मंदिर अचानक गायब हो गया।

    उसकी जगह एक टूटा हुआ कुआँ था।

    रोहित समय रहते रुक गया, नहीं तो सीधे कुएँ में गिर जाता।

    तभी पीछे से किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया”आज का शिकार… मिल गया…”

    रोहित ने पीछे देखा।

    वहीं वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।

    लेकिन अब उसका पूरा शरीर हवा में तैर रहा था।

    उसके पैर उल्टे थे।

    आँखों से खून बह रहा था।

    और उसके पीछे दर्जनों डरावनी परछाइयाँ खड़ी थीं।

    रोहित डर के मारे काँपने लगा।

    वह हाथ जोड़कर बोला, “मुझे छोड़ दो… मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

    बूढ़ी औरत बोली,

    “मैं अकेली नहीं हूँ… इस रास्ते पर मारे गए सभी लोग अब मेरे साथ हैं। हर दिन हममें से किसी एक को नई आत्मा चाहिए… तभी हमारा श्राप अधूरा नहीं रहता।”

    रोहित रोने लगा।

    “मैं वापस चला जाऊँगा… कभी नहीं आऊँगा।”

    लेकिन भूत हँसने लगे।

    धीरे-धीरे चारों तरफ धुंध फैल गई।

    सभी परछाइयाँ उसकी ओर बढ़ने लगीं।

    रोहित भागना चाहता था।

    लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में जम गए।

    एक-एक करके सभी भूत उसके चारों तरफ खड़े हो गए।

    उनकी आँखें सिर्फ उसी को देख रही थीं।

    फिर अचानक सबने एक साथ उसका नाम पुकारा 

    “रोहित…”

    उसकी चीख पूरे जंगल में गूँज उठी।

    अगली सुबह गाँव वालों ने देखा कि रास्ते के बीच रोहित की टॉर्च और उसके जूते पड़े थे।

    लेकिन रोहित कहीं नहीं मिला।

    उस दिन के बाद गाँव में किसी ने उस रास्ते की तरफ जाना छोड़ दिया।

    समय बीतता गया।

    कई साल बाद शहर से एक सरकारी अधिकारी उस इलाके में नई सड़क बनाने पहुँचा।

    गाँव वालों ने उसे बहुत समझाया।

    “साहब… उधर मत जाइए।”

    लेकिन उसने किसी की बात नहीं सुनी।

    वह शाम होते-होते उसी रास्ते पर पहुँच गया।

    रास्ते के बीच उसे एक युवक खड़ा दिखाई दिया।

    उसने कहा,

    “भाई साहब… क्या आप मुझे गाँव तक छोड़ देंगे? मैं रास्ता भूल गया हूँ।”

    अधिकारी ने मुस्कुराकर कहा,

    “हाँ, आ जाओ।”

    जैसे ही वह युवक उसकी गाड़ी में बैठा, अधिकारी ने शीशे में उसकी परछाईं देखी।

    पीछे कोई नहीं था।

    घबराकर उसने तुरंत मुड़कर देखा।सीट खाली थी।

    उसी समय पीछे से वही आवाज़ आई”आज का शिकार… मिल गया…”

    अगले दिन वह अधिकारी भी रहस्यमयी तरीके से गायब हो गया।

    आज भी उस गाँव के लोग कहते हैं कि सूरज ढलने के बाद उस रास्ते से कभी मत गुजरना।

    क्योंकि वहाँ रहने वाला भूत आज भी हर दिन सिर्फ एक इंसान का इंतज़ार करता है… और जो उसकी नज़र में आ गया, वह फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौटता।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    गाँव रामपुर में तीन दोस्तों की जोड़ी इतनी मशहूर थी कि लोग उन्हें नाम से कम और “तीन तिगाड़ा” कहकर ज़्यादा बुलाते थे।

    पहला था भोला। नाम की तरह ही भोला नहीं, बल्कि थोड़ा सनकी भी था। उसे हर काम अपने ही अजीब तरीके से करना पसंद था। कोई कहे दाएँ जाओ, तो वह कहे, “सब दाएँ जाते हैं, मैं बाएँ जाऊँगा।”

    दूसरा था गोलू। हर समय हँसता रहता। चाहे कैसी भी मुसीबत हो, उसके चेहरे पर मुस्कान कभी नहीं जाती थी। उसकी एक ही आदत थी—हर बात में मज़ाक करना।

    तीसरा था पप्पू। वह इतना नादान और बेपरवाह था कि लोग कहते, “इसका दिमाग छुट्टी पर रहता है।” कोई भी कुछ कह दे, वह बिना सोचे वही कर देता।

    तीनों का हाल ऐसा था कि जहाँ जाते, वहाँ कोई न कोई गड़बड़ ज़रूर हो जाती।

    एक दिन तीनों ने सोचा कि अब गाँव में अपनी इज़्ज़त बनानी चाहिए।

    भोला बोला, “चलो आज किसी की मदद करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हाँ, लोग कहेंगे कि ये तीनों सुधर गए।”

    पप्पू बोला, “और अगर नहीं सुधरे तो?”

    दोनों ने उसे घूरकर देखा।

    सबसे पहले उन्हें एक बूढ़ी अम्मा मिलीं जो सिर पर लकड़ियों का गट्ठर उठाए जा रही थीं।

    तीनों दौड़ पड़े।

    “अम्मा, हम उठा देते हैं।”

    अम्मा खुश हो गईं।

    लेकिन जैसे ही भोला ने गट्ठर उठाया, उसने कहा, “इसे ऐसे नहीं, उल्टा पकड़ना चाहिए।”

    उसने गट्ठर उल्टा कर दिया।

    सारी लकड़ियाँ सड़क पर बिखर गईं।

    उधर गोलू इतनी ज़ोर से हँसा कि संतुलन बिगड़ गया और वह भी लकड़ियों पर गिर पड़ा।

    पप्पू उन्हें उठाने लगा, लेकिन उसने सूखी लकड़ियों की जगह पास रखे किसी के कपड़े उठा लिए।

    अम्मा सिर पकड़कर बैठ गईं।

    तीनों चुपचाप वहाँ से खिसक लिए।

    चलते-चलते उन्हें लगा कि खेती में मदद करनी चाहिए।

    एक किसान खेत में पानी लगा रहा था।

    भोला बोला, “चाचा, हम कर देते हैं।”

    किसान ने खुशी-खुशी हाँ कर दी।

    जैसे ही किसान घर गया, भोला ने नहर का रास्ता बदल दिया।

    बोला, “सीधा पानी जाएगा तो मज़ा क्या?”

    नतीजा…

    पूरा पानी खेत छोड़कर सड़क पर बहने लगा।

    गोलू हँस-हँसकर लोटपोट हो गया।

    पप्पू बोला, “लगता है सड़क पर धान उगेंगे।”

    इतने में किसान वापस आया।

    उसने देखा कि खेत सूखा है और सड़क नदी बनी हुई है।

    तीनों फिर भाग खड़े हुए।

    अब उन्होंने फैसला किया कि किसी की दुकान पर मदद करेंगे।

    हलवाई ने कहा, “इन लड्डुओं पर चाँदी का वर्क लगा दो।”

    भोला बोला, “वर्क से क्या होगा? चमक तो तेल से आएगी।”

    उसने लड्डुओं पर तेल लगा दिया।

    गोलू हँसते-हँसते चीनी का डिब्बा गिरा बैठा।

    पप्पू ने समझा कि सब खराब हो गया है।

    उसने पूरा बेसन पानी में डाल दिया।

    थोड़ी ही देर में लड्डुओं की जगह बेसन का हलवा बन गया।

    हलवाई चिल्लाया, “तुम तीनों दुकान से बाहर निकलो!”

    अब तो पूरे गाँव में चर्चा होने लगी।

    “जहाँ ये तीन पहुँच जाएँ, वहाँ भगवान ही मालिक है।”

    तीनों उदास होकर तालाब किनारे बैठ गए।

    गोलू पहली बार चुप था।

    तभी गाँव के सरपंच आए।

    उन्होंने कहा, “तुम लोग इतने परेशान क्यों हो?”

    भोला बोला, “हम अच्छा करना चाहते हैं, लेकिन सब बिगड़ जाता है।”

    सरपंच मुस्कुराए।

    उन्होंने कहा, “अगर सच में मदद करनी है तो पहले सीखो, फिर काम करो।”

    तीनों को बात समझ आ गई।

    अगले दिन गाँव में सफाई अभियान रखा गया।

    इस बार उन्होंने बिना अपनी अक्ल लगाए वही किया जो लोगों ने बताया।

    भोला सिर्फ झाड़ू लगाता रहा।

    गोलू कूड़ा उठाता रहा और बीच-बीच में सबका मन भी हँसाकर हल्का करता रहा।

    पप्पू बस बोरी पकड़कर चलता रहा।

    पहली बार कोई गड़बड़ नहीं हुई।

    गाँव वाले खुश हो गए।

    लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

    काम खत्म होने के बाद पप्पू बोला, “अब कूड़ा कहाँ डालना है?”

    किसी ने कहा, “पीछे वाले गड्ढे में।”

    पप्पू बिना देखे बोरी उठाकर फेंक आया।

    कुछ देर बाद पता चला कि वह कूड़ा नहीं, सरपंच का नया खाद का बोरा था।

    असली कूड़ा वहीं पड़ा रह गया।

    पूरा गाँव पहले कुछ पल चुप रहा…

    फिर इतनी ज़ोर से हँसा कि तालाब तक आवाज़ पहुँच गई।

    सरपंच भी हँस पड़े।

    उन्होंने कहा, “लगता है तुम तीनों की किस्मत में थोड़ा-बहुत काम बिगाड़ना लिखा है।”

    भोला बोला, “हम कोशिश तो पूरी करते हैं।”

    गोलू हँसते हुए बोला, “हमारा इरादा अच्छा होता है, बस नतीजा थोड़ा अलग निकल जाता है।”

    पप्पू मासूमियत से बोला, “अगली बार शायद सही हो जाए…”

    यह सुनकर फिर सब हँस पड़े।

    उस दिन के बाद गाँव में जब भी कोई काम बिगड़ जाता, लोग मुस्कुराकर बस एक ही बात कहते—

    “लगता है यहाँ तीन तिगाड़ा होकर गए हैं!”

    और तीनों दोस्त भी अब इस बात का बुरा नहीं मानते थे। वे हर गलती से कुछ नया सीखते, फिर अगले काम में जुट जाते। हालाँकि उनके साथ कोई न कोई छोटी-मोटी गड़बड़ी फिर भी हो जाती थी, लेकिन उनकी सच्ची दोस्ती, साफ़ दिल और लोगों को हँसा देने वाली आदत ने पूरे गाँव का दिल जीत लिया था।

    सीख: अच्छा इरादा ज़रूरी है, लेकिन किसी भी काम को सही तरीके से सीखकर करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी होता है। और सच्चे दोस्त हर मुसीबत को भी हँसी में बदल

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं