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श्रेणी: कहानी

दिल से दिल तक पहुंचने वाली एहसास कहानी बनती है।

  • The psycho

    The psycho

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मुंबई ,

     

    सिंघानिया विला ,

     

     

    सिंघानिया विला में  , आज सुबह से  , ही बहुत ज्यादा चहल पहन थी। 

     

     

     

     

    मिसेज सिंघानिया  अपनी बेटी की तरफ देखते हुए बोली  , तुम खुश तो होना । आखिरकार तुम्हारी शादी  , तुम्हारे पसंद के लड़के से हो रही है ।

     

     

     

     

     

    नियति मुस्कुराते हुए बोली , मॉम मैं बहुत ही ज्यादा खुश हूं ।

    आज फाइनली  , मेरी और राज की शादी हो रही है ।

     

     

     

     

     

    मिसेज सिंघानिया मुस्कुराते हुए बोली  , आखिरकार 3 सालों बाद  , तुम्हें तुम्हारा प्यार मिलने जा रहा है । 

     

     

     

     

    यह सुनकर नियति मुस्कुराने लगी । 

     

     

     

    मिसेज सिंघानिया ने अपनी बेटी की तरफ देखते हुए बोली  , तुम जाओ और जाकर ,  इस शादी जोड़े को पहन लो । 

     

     

     

     

    ये  सुनते ही ,  नियति की नजर बेड  पर गई , जहां एक बहुत खूबसूरत सा  लाल रंग का लहंगा रखा हुआ था । 

     

     

     

     

     

    नियति ने मुस्कुराते हुए  , उस लहंगे को लिया और बाथरूम की तरफ चली गई  ,,

     

     

     

     

     

    वहीं मिसेज  सिंघानिया ने अपने मन में बोली  , पता नहीं मुझे क्यों . . . घबराहट हो रही है । राज और उसकी फैमिली तो  , इस रिश्ते के लिए मान गई है । ।

     

     

     

     

     

    फिर मुझे घबराहट क्यों हो रही है । मेरी बेटी को उसका प्यार मिल रहा है । ये बोलते हुए , मिसेज सिंघानिया बार-बार  , खुद को दिलासा दे रही थी ।

     

     

     

     

     

    करीब 1 घंटे बाद  , 

     

     

     

    नियति अच्छी तरह से तैयार होकर ,  अपने कमरे में बैठी हुई थी । 

     

     

     

     

    वही नियति की सभी सहेलियां  , उसे राज के नाम से परेशान कर रही थी । नियति बहुत ही ज्यादा खुश थी । 

     

     

     

     

    आज फाइनली इतने सालों बाद ,  उसे उसका प्यार मिलते जा रहा है । ।

     

     

     

     

     

    राज से नियति को  स्कूल टाइम से ही प्यार  था और आखिरकार कॉलेज में आते आते  ,, राज ने उसे प्रपोज कर दिया ।।

     

     

     

     

     

    आज नियति की जिंदगी का सबसे खूबसूरत पल था ।  जब राज और वह पूरी तरह से एक हो जाएंगे । ये सोचते हुए ,  नियति शरमा रही थी ।

     

     

     

    गार्डन एरिया 

     

     

     

    मिसेज सिंघानिया ने बारात का स्वागत किया । ।

     

     

     

     

    राज  मुस्कुराते हुए बोला ,  आंटी मेरी दुल्हन कैसी है ।। मिसेज सिंघानिया ने मुस्कुराते हुए बोली ,  थोड़ी देर बाद  , खुद अपनी दुल्हन को देख लेना । 

     

     

     

     

     

    ये  सुनकर राज मुस्कुराते हो जाकर मंडप में बैठ गया । राज बहुत बेसब्री से बार-बार  , इधर-उधर देख रहा था ।।शायद उसे नियति की एक झलक देखने को मिल जाए ।।

     

     

     

     

     

     

     

      राज की फैमिली ने , राज को  रस्मों का नाम देकर ,  3 दिनों से  , नियति का चेहरा भी देखने नहीं दिया ।।

     

     

     

     

     

     

    राज ने खुशी से अपने मन में कहा  , सच में ,  आज मैं बहुत खुश हूं । मेरा प्यार मेरा हो जाएगा । ये  बोलते हुए  , राज मुस्कुराते हुए ,  बस बेसब्री से नियति का इंतजार कर रहा था ।।

     

     

     

     

    पंडित जी ने , मिसेज सिंघानिया की तरफ देखते हुए बोली , दुल्हन को बुलाइए ,, ।।

     

     

     

     

     

     

    ये  सुनकर मिसेज सिंघानिया से ज्यादा , राज बहुत ही ज्यादा खुश था ।  फाइनली वह नियति को देखेगा । ये  सोचते हुए  , राज मुस्कुराते हुए दरवाजे की तरफ देखने लगा ।  जिस तरफ मिसेज सिंघानिया नियति को लाने के लिए गई थी ।

     

     

     

     

     

    करीब 10 मिनट बाद , मिसेज सिंघानिया नियति को लेकर गार्डन एरिया में आ गई  ,, ।।

     

     

     

     

     

    राज ने जैसे ही  , नियति को देखा  , वह देखता ही रह गया ।नियति देखने में बहुत ही ज्यादा खूबसूरत और प्यारी लग रही थी । 

     

     

     

     

     

    नियति मुस्कुराते हुए  , राज के पास बैठ गई  ,

     

     

     

     

     

    राज ने धीरे से उसके कान में कहा  , सच में ,  आज तुम बहुत ही ज्यादा खूबसूरत लग रही हो ।

     

     

     

     

     

     

    यह सुनकर नियति मुस्कुराते हुए बोली ,  तुम भी बहुत ही ज्यादा हैंडसम लग रहे हो । ये बोलते हुए  , दोनों एक दूसरे को मुस्कुरा कर देखने लगे । 

     

     

     

     

     

    तभी पंडित जी ने नियति  और राज की तरफ देखते हुए कहा , आप दोनों जयमाला  के लिए  , खड़े हो जाइए ।।

     

     

     

     

     

    यह सुनकर नियति मुस्कुराते हुए , राज को देखने लगी । 

     

     

     

     

     

    राज खड़ा हो गया और अपने हाथ को नियति की तरफ बढ़ाया ,,

     

     

     

     

    नियति ने राज के हाथ को पकड़ा और उसके बगल में खड़ी हो गई  ,,

     

     

     

     

    दोनों एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे ।  वहीं चारों तरफ बस खुशी का माहौल था । 

     

     

     

     

     

    सभी उनके ऊपर फूल बरसा रहे थे । ।

     

     

     

     

     

    राज ने मुस्कुराते हुए कहा ,  आज से हमारी जिंदगी की नई शुरुआत है । My dear love. जल्द ही तुम मेरी wife. बन जाओगी । 

     

     

     

     

     

    यह सुनकर नियति शर्माने लगी ।

     

     

     

     

    राज ने नियति  का हाथ पकड़ा और जैसे ही फेरे के लिए ,  एक कदम चला ही था । । अचानक से वहां पर  , गोलियों की आवाज आने लगी । 

     

     

     

     

     

    नियति और राज इससे पहले कुछ समझ पाते , एक गोली जाकर सीधे राज के सीने पर लग गई  ,

     

     

     

     

    राज सीधे जमीन पर गिर गया ।  नियति बस राज  का नाम चिल्लाते रह गई ,

     

    . . . . . . . . . . To be continue . . . . . . . . . 

    किसकी नजर लगी है । राज और नियति

    की खुशियों को ,

    क्या होने वाला है । राज और नियति के साथ ,

    जानने के लिए  , पढ़ते रहिए ,  मेरी स्टोरी the psycho.

    स्टोरी कैसी लगी कॉमेंट में बताए , 

    स्टोरी को प्रोत्साहन प्रदान करें , मिलते है नेक्स्ट चैप्टर में, आपकी ऑथर शिवानी, 

  • एक बंदूक की जरूरत है अब.. 🤣

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मैं तब तक लोगों को माफ करता रहूँगा, जब तक मैं एक बंदूक नहीं ख़रीद लेता। 

    😬😬माफ बस तब तक ही… चल लो जितनी चले चलनी है.. एक दिन सब बदल जायेगा 🤣

  • लिवर या दोस्ती खराब हो ही जाती है… 🤣

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दारू पियो तो लीवर खराब हो जाता है ना पियो तो दोस्ती खराब

    तकलीफ तो दोनों तरफ है 😑

  • खराब हो ही जाता है… 🤣

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    Earphone हो या Relation कुछ दिनों बाद 

    ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,एक साईड का खराब हो ही जाता है😂

  • जिंदगी निखार देती है…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    *तेरी बातों में वो सुकून है*

    जो दिल को करार देता है,

    *तेरा थोड़ा सा वक्त*

    जैसे बरसों का प्यार देता है।

     

    *सलामती रहे हमेशा तेरे*

    घर-आँगन की खुशियों की,

    *क्योंकि अपनों का साथ ही*

    ज़िन्दगी को निखार देता है।

  • दर्द ऐ दिल…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मुझे तुम्हारे साथ पूरी कहानी लिखनी थी

     

    और एक तुम मेरे साथ एक ही पन्ने में सिमट कर रह 

    गए…!!🥹🥹

  • काश उस दिन मैने

    काश उस दिन मैने

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Writer Lakshmi Kumari

    Story titel “काश उस दिन मैंने…”

     

    बारिश की बूंदें आज कुछ ज़्यादा ही तेज़ थीं… जैसे आसमान भी किसी के बिछड़ने का ग़म मना रहा हो। सड़क के किनारे खड़ा अर्जुन भीगता रहा… लेकिन उसे परवाह नहीं थी। उसकी आँखों में खालीपन था… और दिल में सिर्फ एक ही आवाज़ गूंज रही थी।।

     

    “काश उस दिन मैंने अपने दिल की सुन ली होती…”

     

    उसने अपनी मुट्ठी कस ली, सामने कब्रिस्तान था और एक कब्र पर नाम लिखा था “रोहन”

     

    उस नाम को देखते ही उसकी सांसें भारी हो गईं… और यादों का सैलाब उसे बहा ले गया।

     

    कॉलेज का पहला दिन हर तरफ नए चेहरे नई उम्मीदें और थोड़ी सी घबराहट थी।

     

    अर्जुन क्लास के एक कोने में बैठा था… सिर झुकाए… किताब खोलकर। वह हमेशा से ऐसा ही था चुप चाप, सीधा, अपनी दुनिया में रहने वाला लड़का।

     

    तभी किसी ने उसके सामने कुर्सी खींची “भाई, यहाँ बैठ जाऊं? या ये सीट भी तेरी तरह अकेली रहना चाहती है?”

     

    अर्जुन ने सिर उठाया—एक लड़का मुस्कुरा रहा था… आँखों में शरारत और चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    “बैठ जाओ…” अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

     

    “वैसे नाम क्या है तेरा? मैं रोहन… कॉलेज का फ्यूचर सुपरस्टार”

     

    अर्जुन हँस पड़ा “मैं अर्जुन… बस एक आम इंसान…”

     

    तभी पीछे से एक धीमी आवाज आई“अगर आम लोगों की बात हो रही है… तो मैं भी शामिल हो सकता हूँ?”

     

    दोनों ने मुड़कर देखा, एक लंबा, शांत लड़का… जिसकी आँखों में गहराई थी।

     

    उसने अपना हाथ आगे “कबीर…” उसने अपना नाम बताया।

     

    बस… वहीं से शुरू हुई एक ऐसी दोस्ती… जो वक्त के साथ और गहरी होती चली गई।

     

    तीनों साथ बैठते साथ हँसते साथ लड़ते और फिर खुद ही मना भी लेते।

     

    एक दिन कैंटीन में बैठे-बैठे रोहन ने कहा “यार, अगर हमारी दोस्ती पर कोई फिल्म बने ना… तो सुपरहिट जाएगी!”

     

    कबीर मुस्कुराया “लेकिन उसका एंडिंग sad नहीं होना चाहिए…”

     

    अर्जुन ने हाथ बढ़ाया “तो वादा करते हैं… हम कभी अलग नहीं होंगे”

     

    तीनों ने एक-दूसरे के हाथ पर हाथ रखा “हमेशा साथ”

     

    सब कुछ सही चल रहा था… जब तक सिया नाम की लड़की उनकी जिंदगी में नहीं आई थी

     

    पहली बार जब सिया क्लास में आई… तो जैसे वक्त थम गया। उसकी आँखों में मासूमियत थी… और मुस्कान में एक सुकून।

     

    धीरे-धीरे तीनों उससे दोस्ती करने लगे… और अनजाने में तीनों के दिल में उसके लिए एक खास जगह बन गई।

     

    लेकिन… किसी ने कुछ कहा नहीं, एक रात हॉस्टल की छत पर बैठे हुए रोहन बोला “यार… मुझे लगता है मैं सिया को पसंद करने लगा हूँ…”

     

    अर्जुन चुप हो गया… क्योंकि वह भी यही महसूस कर रहा था।

     

    कबीर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा “तो बता दे उसे…”

     

    लेकिन उसके दिल में हलचल थी क्योंकि वह भी सिया को चाहता था।

     

    तीनों दोस्त… एक ही लड़की से प्यार करने लगे थे… और किसी को इसका अंदाज़ा नहीं था।

     

    कुछ दिनों बाद अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और एक चिट्ठी लिखी।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे… लेकिन दिल साफ था “सिया मैं तुम्हें पसंद करता हूँ… शायद ये सही समय नहीं है… लेकिन मैं और छुपा नहीं सकता हूं”

     

    उसने वह चिट्ठी कबीर को दी “यार… तू इसे सिया तक पहुँचा दे… मुझसे नहीं होगा…”

     

    कबीर ने चिट्ठी ली… और उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी आ गई। वह अकेले में गया… और चिट्ठी को देखा…

     

    कुछ पल के लिए वह चुप रहा… फिर धीरे-धीरे चिट्ठी को फाड़ दिया।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे “मुझे माफ कर देना अर्जुन…”

     

    फिर वह अर्जुन के पास आया “यार… सिया ने मना कर दिया…”

     

    अर्जुन की आँखों में एक पल को उम्मीद चमकी… फिर बुझ गई।

     

    “ओह… ठीक है…” उसने मुस्कुराने की कोशिश की… लेकिन उसकी आवाज टूट गई।

     

    उस रात… अर्जुन बहुत रोया।

     

    अब कबीर अपने झूठ में फंस चुका था। कुछ दिनों बाद रोहन ने कहा “मैं सिया को प्रपोज करने वाला हूँ…”

     

    कबीर का दिल फिर से डगमगाया “नहीं… तू नहीं कर सकता…” उसने जल्दी से कहा।

     

    “क्यों?” रोहन ने पूछा, “क्योंकि अर्जुन और सिया एक-दूसरे को पसंद करते हैं…”

     

    रोहन सन्न रह गया “क्या? लेकिन उसने कभी बताया नहीं…”

     

    “शायद वो तुझसे छुपा रहा है…” कबीर ने झूठ को और गहरा कर दिया।

     

    रोहन का चेहरा उतर गया “ठीक है अगर ऐसा है  तो मैं पीछे हट जाऊँगा।”

     

    धीरे-धीरे… तीनों के बीच खामोशी आ गई।

     

    एक दिन…

     

    “तूने मुझसे झूठ क्यों बोला?” रोहन ने अर्जुन से पूछा।

     

    “मुझ से झूठ तो तुम दोनों ने बोला!” अर्जुन चिल्लाया।

     

    “तू सिया से प्यार करता है और मुझे बताया तक नहीं!” रोहन का गुस्सा फूट पड़ा।

     

    अर्जुन हैरान था “क्या? मैंने कब कहा ऐसा?”

     

    कबीर बीच में आया “बस करो”

     

    “तू चुप रह!” दोनों एक साथ बोले।

     

    उस दिन… उनकी दोस्ती बिखर गई।

     

     

    कुछ महीनों बाद रोहन की मुलाकात सिया से हुई। “तुम लोग इतने दूर क्यों हो गए?” सिया ने पूछा।

     

    रोहन ने सब बताया।

     

    सिया चौंक गई “मुझे तो कभी कोई चिट्ठी मिली ही नहीं…”

     

    रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या…?”

     

    उसे सब समझ आ गया। वह भागा… अर्जुन के पास… सब सच बताने…

     

     

    बारिश हो रही थी… सड़क फिसलन भरी थी…

     

    रोहन जल्दी में था… उसके दिल में सिर्फ एक बात थी।

     

    “मुझे अर्जुन से माफी मांगनी है…”

     

    लेकिन एक तेज़ रफ्तार ट्रक ने रोहर को टक्कर मार दी

     

     

    अर्जुन और कबीर दौड़ते हुए अस्पताल पहुँचे।

     

    रोहन ICU में था… साँसें टूट रही थीं। अर्जुन उसका हाथ पकड़कर रो पड़ा “रोहन उठ जा प्लीज।”

     

    रोहन ने धीरे से आँखें खोलीं “अर्जुन” उसकी आवाज कमजोर थी…

     

    “मुझे… सच पता चल गया…”

     

    अर्जुन की आँखें भर आईं “कुछ मत बोल… तू ठीक हो जाएगा…”

     

    रोहन मुस्कुराया “काश… उस दिन… मैंने अपने दिल की सुन ली होती और तुझसे पूछ लिया होता…”

     

    उसने कबीर की तरफ देखा “और तू… अपने दिल से मत भागना…”

     

    इतना कहकर… उसकी सांस रुक गई।

     

     

    अर्जुन जमीन पर बैठ गया “नहीं रोहन नहीं…”

     

    कबीर फूट-फूट कर रोने लगा “मैंने उसे मार दिया… ये सब मेरी गलती है…”

     

     

    आज अर्जुन और कबीर रोहन की कब्र के सामने खड़े थे।

     

    हवा शांत थी… लेकिन दिलों में तूफान उठा हुआ था।

     

    अर्जुन बोला “काश… उस दिन हम एक बार बैठकर बात कर लेते…”

     

    कबीर रोते हुए बोला “काश… उस दिन मैंने अपने दिल की सुन ली होती… और सच बता दिया होता।”

     

    दोनों ने कब्र पर हाथ रखा “हम तुझे कभी नहीं भूलेंगे।”

     

     

    कुछ कहानियाँ अधूरी रह जाती हैं कुछ गलतफहमियाँ जिंदगी छीन लेती हैं और कुछ पछतावे उम्र भर साथ चलते हैं तीनों की दोस्ती खत्म हो गई…

     

    लेकिन एक सच्चाई हमेशा गूंजती रहेगी “काश उस दिन हमने अपने दिल की सुन ली होती।”

     

  • झूठी दीवार

    झूठी दीवार

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

    सूर्य अस्त हो रहा था, और उसकी अंतिम नारंगी किरणें, एक समय जीवंत रहे, पर अब मौन पड़े घर के आंगन में फैली हुई थीं। उस आंगन में, जहाँ कभी हँसी और खिलखिलाहट गूंजती थी, आज सिर्फ सन्नाटा था। यह घर था आदित्य का, और उस सन्नाटे का कारण था, उसका भाई—अर्जुन।

     

    आदित्य और अर्जुन दो भाई थे, जो एक ही पेड़ की दो मजबूत डालियों की तरह थे। दोनों में गहरा प्रेम था, उनका बचपन साझा सपनों और शरारतों से भरा था। उनके पिता ने उन्हें सिखाया था कि खून का रिश्ता दुनिया में सबसे पवित्र होता है।

     

    लेकिन समय के साथ, जीवन की दौड़ शुरू हुई। आदित्य बड़े थे, उन्होंने जल्द ही अपने पिता का व्यापार संभाल लिया और उसमें सफल हुए। अर्जुन ने पढ़ाई पूरी करके एक बड़ी कंपनी में नौकरी शुरू की। दोनों की राहें अलग थीं, पर मंजिल एक थी,बअपने परिवार की खुशी।

    समस्या तब शुरू हुई, जब उनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़े। पिता ने वसीयत बनाने का फैसला किया। उन्होंने व्यापार का एक बड़ा हिस्सा आदित्य को दिया, क्योंकि वह पहले से ही उसे संभाल रहे थे, और अर्जुन को पैतृक जमीन का एक मूल्यवान टुकड़ा और पर्याप्त धन दिया।

     

    अर्जुन को लगा कि उसके साथ अन्याय हुआ है। उसके दिल में यह बात बैठ गई कि पिता ने आदित्य को उससे अधिक प्यार किया, अधिक मूल्यवान समझा। उसने सोचा कि आदित्य ने पिता को प्रभावित किया होगा। उस रात, क्रोध और निराशा से भरे अर्जुन ने आदित्य से झगड़ा किया। उसने कठोर, अपमानजनक शब्द कहे, जिनकी उम्मीद आदित्य ने कभी नहीं की थी।

     

    “तुम हमेशा से पिता के पसंदीदा रहे हो, है ना? तुमने उन्हें फुसला लिया! यह न्याय नहीं है, यह छल है!” अर्जुन ने चिल्लाकर कहा था।

     

    आदित्य, जो अपने छोटे भाई से इतना प्रेम करता था, उन शब्दों से टूट गया। उसने बचाव करने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन ने सुनने से इंकार कर दिया। उसके दिल में एक ‘झूठी दीवार’ खड़ी हो गई थी, एक गलतफहमी, अहंकार और कड़वाहट की दीवार।

     

    उस झगड़े के बाद, अर्जुन ने वह घर छोड़ दिया। वह अपनी वसीयत का हिस्सा लेकर शहर के दूसरे छोर पर चला गया। उसके जाने से पहले, आदित्य ने उसे रोकने की कोशिश की थी, “अर्जुन, यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है। यह हमारा घर है, हमारा रिश्ता है! वापस आ जाओ।”

    “रिश्ता? अब कोई रिश्ता नहीं,” अर्जुन का जवाब एक नुकीले तीर की तरह था।

     

    उन दोनों भाइयों के बीच वर्षों का मौन पसर गया।

    पिता कुछ समय बाद गुजर गए। उनकी अंतिम इच्छा थी कि दोनों भाई मिल जाएं, पर ऐसा न हो सका। पिता के निधन ने आदित्य को अंदर तक झकझोर दिया, लेकिन अर्जुन अपने दुःख में भी अपनी ‘झूठी दीवार’ के पीछे छिपा रहा।

     

    आदित्य ने अपनी पत्नी, नेहा, और बच्चों के साथ जीवन व्यतीत करना जारी रखा, पर उसके चेहरे पर हमेशा एक उदासी छाई रहती थी। वह सफल था, लेकिन उसके घर का एक कोना हमेशा खाली रहता था। वह हर साल अर्जुन के जन्मदिन पर एक पत्र लिखता, पर कभी भेजता नहीं। बस उन पत्रों में अपनी भावनाओं और अपने दर्द को उतार देता।

     

    कई साल बीत गए। अर्जुन ने अपने हिस्से की जमीन पर एक छोटा सा घर बना लिया था, और वह अपने काम में व्यस्त हो गया था। बाहर से वह खुश दिखता था, पर रात की खामोशी में, उसे हमेशा आदित्य के चेहरे की निराशा याद आती थी। उसे पता था कि उसने गलती की थी। वसीयत वास्तव में न्यायपूर्ण थी, और उसके कठोर शब्द अनुचित थे। लेकिन अब अहंकार, उस ‘झूठी दीवार’ ने उसे जकड़ रखा था।

     

    फिर एक दिन, एक भयानक तूफान आया। अर्जुन का नया बना घर उस तूफान में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। वह बाल-बाल बचा, पर उसका सब कुछ बिखर गया था। वह अकेला, बेघर और टूटा हुआ महसूस कर रहा था।

    अगली सुबह, जब अर्जुन टूटी हुई छत के नीचे बैठा था, उसने एक कार को रुकते देखा। कार से एक जाना-पहचाना चेहरा उतरा, आदित्य।

     

    आदित्य ने बिना एक भी शब्द कहे अर्जुन की ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं, और चेहरे पर वर्षों पुराना दर्द झलक रहा था। वह सीधा अर्जुन के पास आया और उसे कसकर गले लगा लिया।

     

    अर्जुन की ‘झूठी दीवार’ उस एक आलिंगन के स्पर्श से रेत के महल की तरह ढह गई। वर्षों से दबा हुआ पश्चाताप आंसुओं के रूप में बह निकला।

    “माफ़ कर दो भाई! मुझे माफ़ कर दो! मैंने बहुत बड़ी गलती की! मैंने तुम्हारे प्यार का अपमान किया! पिता का अपमान किया! मैं अंधा हो गया था!” अर्जुन फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    आदित्य ने उसे संभाला। उसकी आवाज़ में वर्षों का स्नेह भरा था। “अर्जुन, यह माफ़ी की बात नहीं है। यह मेरे भाई के वापस आने की बात है। मुझे पता था कि तुम एक दिन समझोगे। मैंने तुम्हें कभी दोष नहीं दिया।”

    आदित्य ने उसे अपने साथ चलने के लिए कहा। उसने बताया कि कैसे उसने पैतृक घर को हमेशा उसी तरह बनाए रखा, यह सोचकर कि अर्जुन किसी भी पल वापस आ सकता है।

     

    जब अर्जुन वापस अपने पुराने घर के आंगन में पहुंचा, तो उसने देखा कि सब कुछ वैसा ही था, जैसा उसने छोड़ा था। नेहा ने दौड़कर उसे गले लगाया, और बच्चे, जिन्हें उसने कभी देखा भी नहीं था, उत्सुकता से उसे देख रहे थे।

     

    सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब आदित्य उसे उसके पुराने कमरे में ले गया। कमरे की दीवार पर अब भी वह निशान था, जहाँ दोनों भाइयों ने बचपन में एक क्रिकेट मैच के बाद एक-दूसरे को ‘सर्वश्रेष्ठ दोस्त’ लिखा था।

    मेज पर एक पुरानी लकड़ी की पेटी रखी थी। आदित्य ने पेटी खोली। उसमें पिछले कई वर्षों के अन-भेजे गए पत्र थे।

     

    “यह क्या है?” अर्जुन ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा।

    “ये वो ख़त हैं, जो मैंने हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर लिखे। माफ़ी मांगने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए कि यहाँ सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं,” आदित्य ने कहा।

     

    अर्जुन ने एक पत्र निकाला। तारीख 14 अगस्त, 2018।

    उसमें लिखा था: “अर्जुन, आज तुम्हारा जन्मदिन है। माँ ने तुम्हारी पसंद की खीर बनाई है। मैं तुम्हें मिस कर रहा हूँ। वह ज़मीन का टुकड़ा जो तुम्हें मिला था, वह सबसे उपजाऊ है। पिता ने हमेशा कहा था कि तुम एक अच्छे किसान बनोगे। लौट आओ, भाई। घर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”

     

    अर्जुन के दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए। उसने अपने भाई के निःस्वार्थ प्रेम को ठुकराया था, जबकि आदित्य ने हर पल उसके लिए प्रार्थना की थी। माफ़ी सिर्फ शब्द नहीं थे; वे आदित्य के इन अन-भेजे गए पत्रों में, उसके वर्षों के इंतज़ार में, और उसके निस्वार्थ आलिंगन में समाए हुए थे।

     

    माफ़ी की वह घड़ी, तूफान से अधिक शक्तिशाली थी। वह ‘झूठी दीवार’ हमेशा के लिए गिर गई।

    अर्जुन ने उस रात खाना नहीं खाया। वह बस आदित्य के पास बैठा रहा, उस रिश्ते की गर्माहट महसूस कर रहा था जिसे उसने वर्षों पहले खो दिया था। उसने कसम खाई कि वह अपने जीवन के हर क्षण से उस गलती का प्रायश्चित करेगा। उसने सीखा कि सबसे बड़ी संपत्ति ज़मीन या पैसा नहीं, बल्कि अपने ही दिल में मौजूद निस्वार्थ प्रेम और माफ़ी देने की शक्ति है।

     

    और उस रात, उस आंगन में, जहाँ वर्षों से सन्नाटा था, फिर से एक भाई के वापस आने की खुशी और माफ़ी मिल जाने का सुकून, दोनों की शांतिपूर्ण साँसों में गूंज उठा।

     

    Lakshmi Kumari 

  • कर्मों का फल

    कर्मों का फल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    गाँव का नाम था हरियाली, जहाँ लोग मेहनती और सच्चे थे। गाँव के बीचों-बीच एक विशाल बड़ का पेड़ था, जिसके नीचे सब लोग इकट्ठा होते थे। इस पेड़ के पास ही एक गरीब ब्राह्मण, नाम था उसका रामू, अपने छोटे से झोपड़े में रहता था। रामू का जीवन साधारण था, लेकिन उसके दिल में अच्छाई का वास था।

    रामू रोज़ सुबह उठकर अपने छोटे से बाग में काम करता, हल्का-फुल्का खेती करता और जो भी थोड़ा-बहुत कमा पाता, उसी से अपने परिवार कापालन करता। उसकी पत्नी, सीता, हमेशा उसकी मदद करती, और दोनों मिलकर अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की कोशिश करते थे। रामू का मानना था कि अपने कर्मों का फल जरूर मिलता है।

    एक दिन, गाँव में एक साधु महात्मा आए। गाँव के लोग उनके पास आए और उनसे आशीर्वाद मांगा। रामू भी साधु के पास पहुँचा। साधु ने रामू को देखा और कहा, “तुमhari मेहनत और ईमानदारी के फल तुम्हें जल्दी मिलेंगे।”

    कुछ दिनों बाद, रामू ने सोच लिया कि वह गाँव में थोड़ा और मेहनत कर के और पैसे इकट्ठा करेगा। उसने खेतों में ज्यादा मेहनत की, और उस साल फसल भी अच्छी हुई। रामू ने अपने मेहनत के फल को देखा और अपनी स्थिति में सुधार करने लगा।

    परंतु, गाँव के कुछ लोग उसकी सफलता से जलने लगे। उनमें से एक था उसका पड़ोसी, सुरेश। सुरेश का दिल जलन से भरा हुआ था और उसने सोच लिया कि वह रामू को नुकसान पहुँचाएगा। एक रात, सुरेश ने रामू के खेतों में आग लगा दी। अगली सुबह रामू ने देखा कि उसकी पूरी फसल जलकर राख हो गई है। रामू का दिल टूट गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने साधु के वचनों को याद किया और कहा, “मेरे कर्मों का फल मुझे अवश्य मिलेगा, मुझे धैर्य रखना होगा।”

    रामू ने अपनी मेहनत से फिर से खेतों को तैयार किया और नई फसल बुवाई की। इस बार उसने सोचा कि उसे और भी सावधानी बरतनी होगी। उसने अपने परिवार को भी खेती में मदद करने के लिए प्रेरित किया और सबने मिलकर मेहनत की। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई और रामू की फसल फिर से अच्छी हुई।

    इस बीच, सुरेश की स्थिति खराब होती गई। उसकी जमीन उगाही की कमी के कारण सूखने लगी, और उसका धंधा भी ठप्प हो गया। सुरेश ने रामू की सफलता को देखकर सोचा कि इसे पलटा जाना चाहिए। उसने रामू के खिलाफ गांव के लोगों में अफवाहें फैलाने की कोशिश की कि रामू ने जो भी काम किया है, उसमें कुछ छिपा हुआ है।

    लेकिन गाँव के लोग रामू की सच्चाई को जानते थे। उन्होंने सुरेश की बातों को खास नहीं माना। धीरे-धीरे, रामू की मेहनत और ईमानदारी की ख़ुशबू पूरे गाँव में फैल गई। लोग उसका सम्मान करने लगे। रामू ने अपने फसल को बेचकर पर्याप्त धन दौलत कमाई और अपनी स्थिति को मजबूत किया।

    सुरेश को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने रामू के पास जाकर माफी मांगी। रामू ने उसे माफ कर दिया और कहा, “हम सबके कर्मों का फल ही हमें दिखाई देता है, मैं बस अपने कर्मों पर ध्यान देता हूँ। तुम्हें भी यही करना चाहिए।”

    इस घटना ने गाँव के लोगों को यह सिखाया कि कर्मफल का सिद्धांत सचमुच काम करता है। रामू की मेहनत और सच्चाई ने उसे सफलता दिलाई, जबकि सुरेश की जलन और गलतियों ने उसे गिराया।

    गाँव में रामू की सच्चाई और मेहनत की चर्चा हर ओर होने लगी। लोग उसकी ईमानदारी और दयालुता को देखकर प्रेरित होते थे। बच्चे रामू के पास बैठकर उसकी दास्तानें सुनते और बड़े होकर उसकी तरह अच्छे कर्म करने का सपना देखते।

    रामू ने अपनी सफलताओं का उपयोग समाज की भलाई के लिए करना शुरू कर दिया। उसने गाँव के गरीब किसानों को खेतों की तकनीक सिखाई, ताकि वे भी अच्छे से फसल उगा सकें। वह माहौल बनाकर उन्हें अपने धंधे में मदद कर रहा था।  धीरे-धीरे हरियाली गाँव एक खुशहाल और संपन्न गाँव में बदलने लगा।

    उसी बीच, सुरेश ने रामू से प्रेरित होकर अपने कर्मों पर पुनर्विचार करना शुरू किया। उसने अपनी गलतियों को स्वीकारा और गाँव के लोगों से माफी मांगने का निर्णय लिया। सुरेश ने रामू से मदद मांगी और कहा, “मैंने तुम्हारे प्रति गलत मानसिकता रखी। कृपया मुझे सिखाओ कि कैसे मैं भी अपनी स्थिति को सुधार सकता हूँ।”

    रामू ने सुरेश को सहारा दिया और उसे अपने साथ खेतों में ले गया। रामू ने सुरेश को मेहनत का महत्व समझाया और कहा, “सच्चा धन मेहनत, ईमानदारी और सद्भावना में है। यदि तुम अच्छे कर्म करोगे, तो तुम्हारा कर्मफल भी अच्छा होगा।”

    सुरेश ने रामू के साथ मिलकर मेहनत करने का निश्चय किया। दोनों ने मिलकर खेतों की बुनियाद को मजबूती दी। सुरेश ने अपनी संपत्ति को सही दिशा में लगाना सीखा और रामू की मदद से धीरे-धीरे उसकी स्थिति भी सुधारने लगी। अब दोनों किसान एक-दूसरे के मददगार बन गए थे।

    समय बीतता गया, और गाँव की स्थिति निरंतर सुधरती गई। अब हरियाली गाँव में खुशहाली, समर्पण, और एकता का माहौल था। गाँव के लोग एक-दूसरे का सहयोग करते और सच्चे रिश्ते बनाते। रामू और सुरेश की दोस्ती ने उदाहरण पेश किया कि किस तरह कर्मफल से जुड़े अच्छे कार्यों की बदौलत दोस्ती और भाईचारा स्थापित होते हैं।

    इस बीच, गाँव ने एक बड़ा उत्सव मनाने का निर्णय लिया। गाँव के लोगों ने फसल के अच्छे उत्पादन के लिए रामू और सुरेश को सम्मानित करने का कार्यक्रम रखा। सभी लोग इकट्ठा हुए। इस अवसर पर गाँव के सरपंच ने कहा, “आज हम सब यहाँ इस बात की गवाही देने के लिए इकट्ठा हुए हैं कि ईमानदारी और मेहनत का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। रामू और सुरेश ने हमें यह सिखाया है कि आत्मसमर्पण और सहयोग से हम सभी कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं।”

    रामू को सम्मानित किया गया, लेकिन उसने सुरेश को भी अपने साथ खड़ा किया। उसने कहा, “सच्ची पहचान और सफलता अकेले नहीं आते। ये हमारे सभी कर्मों का फल होते हैं। सुरेश ने भी अब बदलाव किया है और हमें उसके साथ खड़ा होना चाहिए।”

    सभी गाँव वाले तालियाँ बजाने लगे। सुरेश ने रामू की ओर देखते हुए कहा, “तुमने मुझे सिखाया कि खुद को बदलना कितना महत्वपूर्ण है। मुझे अपने कर्मों का फल समझ में आ गया है। अब मैं मेहनत और ईमानदारी से जीवन बिताने का वचन देता हूँ।”

    गाँव में उत्सव धूमधाम से मनाया गया। लोग एक-दूसरे के साथ नृत्य कर रहे थे, गीत गा रहे थे और खुशियों का आदान-प्रदान कर रहे थे। सब मिलकर यह महसूस कर रहे थे कि सच्चे कर्म हमेशा अच्छे फल लाते हैं।

    इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारे कर्म ही हमें पहचान देते हैं। अच्छाई का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन यदि हम सही रास्ते पर रहें,

    Lakshmi Kumari ,,,,,
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  • सोचने वाली बात है न…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    न्यायालय में दोनों पक्षों को 

    सच पता होता है

    असल में तो जज कटघरे में होता है।

     

    (बात बहुत गहरी है… 🥹)