जब बाबुल के अंगना में, एगो कली खिलल रहे,
माई के सूना अँचरा में, खुशियन के फूल खिलल रहे।
नन्हकी-नन्हकी अँखियन से, जब दुनिया निहारत रहे,
लागे जइसे घर के अँगना में, साक्षात लक्ष्मी आइल रहे।
ना जाने केतना मन्नत के, फल बनके ऊ आइल रहे,
माई के कोख से निकल के, बाबुल के जान बनल रहे।
ओकरा रोवे पर माई जागे, हँसे त घर मुस्काए,
ओकर एगो नन्हकी मुस्कान पर, पूरा परिवार बलिहारी जाए।
धीरे-धीरे बड़ी होखे लागल, बाबुल के अंगना के चिरई,
कबो माई के आँचर पकड़े, कबो बाबूजी के पगड़ी।
कबो रूठे, कबो मनावे, कबो जिद पर अड़ जाए,
आपन नन्हकी-नन्हकी बात से, सबके दिल बहलाए।
माई कहे, “ए हमार लाडो, तोहरा बिना मन ना लागे,”
बाबूजी हँस के कहें, “बिटिया, तोहरा से घरवा जागे।”
भइया ओकरा नखरा उठावे, बहिनिया संग बतियाए,
ओकरा खातिर घर के हर इंसान, आपन सुख बिसराए।
कबहूँ गुड़िया के बियाह रचावे, कबहूँ दुल्हिन बन जाले,
माई के पुरनका साड़ी ओढ़ के, खुदे इतराए-बलखाए।
सब हँस के ओकरा देखे, सब ओकर नखरा सह जाए,
किसी के का मालूम रहे, ई दिन कब बीत जाए।
समय के पाँख लगल अइसन, बचपन पीछे छूट गइल,
बाबुल के अंगना में खेलत चिरई, धीरे-धीरे बड़ी हो गइल।
जेकरा गोदी में खेलत रहल, आज ओतना समझदार भइल,
माई-बाबूजी के लाड़ली, अब सयान बिटिया बन गइल।
माई के हाथ बँटावे लागल, बाबूजी के दवाई देवे,
घर के छोट-बड़ सबके दुख में, चुपके से साथे रहे।
कबहूँ माई के माथा सहलावे, कबहूँ बाबूजी के समझावे,
आपन सगरी पीर छुपाके, सबके चेहरा मुस्कावे।
बाकिर एगो दिन अइसन आइल, जब बात बियाह के उठल,
माई के हँसी के पीछे-पीछे, आँखिन में पानी भरल।
बाबूजी बाहर से हँसत रहलें, भीतर कुछ टूटत रहे,
आपन जिगर के टुकड़ा के, दूर जाए के डर सतावत रहे।
धीरे-धीरे बियाह के दिन, नजदीक आवे लागल,
घर के हर कोना सजल, बाकिर मन घबराए लागल।
लाल जोड़ा, हाथ में मेहँदी, माथे टिकुली सजल,
बाबुल के अंगना के चिरई, आज दुल्हिन बनके निखरल।
माई ओकर माथा चूम के, बार-बार अँकवार लगावे,
कहे, “ए लाडो, खुश रहिहऽ, आपन घरवा खूब सजइहऽ।”
बाकिर जइसे-जइसे घड़ी बीते, माई के मन घबराए,
बिटिया के चेहरा देख-देख के, चुपके-चुपके रो जाए।
बाबूजी दरवाजा पर ठाढ़, सबके सामने मुस्कात रहलें,
लोग कहे, “बधाई हो,” त हाथ जोड़ के बतियावत रहलें।
बाकिर जब नजर बिटिया पर पड़े, आवाज भर्रा जाला,
जेकरा उँगरी पकड़ के चलल सिखवलें, आज ऊ दूर चल जाला।
भइया जे हर बात पर ओकरा, हँस-हँस के चिढ़ावत रहे,
आज ओही बहिन के विदाई में, नजर चुरावत रहे।
बहिनिया जे संग-संग खेलल, आज गले लग के रोवे,
केकरा संगे अब आपन मन के, छोट-छोट बतिया खोले?
फेर आ गइल ऊ घड़ी, जेकरा से सब डेरात रहल,
बाबुल के अंगना के चिरई, आपन अंगना छोड़त रहल।
माई के कलेजा काँपे लागल, बाबूजी के आँख भर आइल,
हँसत-खेलत घर के अँगना में, रोवे के मौसम छा गइल।
बिटिया माई से लिपट के बोलल,
“माई, हमके अइसन दूर मत करऽ,
तोहरे अँचरा में बीतल बचपन,
हमके फेर से एक बेर दे दऽ।
बाबूजी, हमके माफ करिहऽ,
अगर कबहूँ दुख पहुँचवले बानी,
तोहरे दुलार के छाँव में रहके,
हम जिनगी जीए सिखले बानी।”
माई के मुँह से बात ना निकले,
बस आँचर भींजत जात रहे,
बाबूजी बिटिया के माथा चूम के,
अपना आँसू लुकावत रहे।
कहें, “जा बिटिया, खुश रहिहऽ,
तोहार दुनिया आबाद रहे,
हमार अंगना से दूर सही,
बाकिर दिल में तोहार याद रहे।”
डोली उठल, त अइसन लागल,
जइसे घर के साँस रुक गइल,
जेकर हँसी से गूँजत रहे अँगना,
आज ओही अँगना चुप हो गइल।
गाड़ी आगे बढ़त गइल,
बिटिया पीछे निहारत रहल,
माई-बाबूजी के धुँधल आँख में,
आपन बचपन खोजत रहल।
आज ओकरा नया घर मिलल,
नया रिश्ता, नया संसार,
बाकिर बाबुल के अंगना से,
कइसे छूटे बचपन के प्यार?
ए दुनिया के लोग सुनऽ, एगो बात दिल में धर लिहऽ,
बिटिया के विदाई पर ओकरा पराया कहे से पहिले,
ओकर बचपन के हर मुस्कान याद कर लिहऽ।
जे बेटी काल्ह ले बाबुल के गोदी में सुतत रहे,
आज ओही बेटी नया घर में आपन दुनिया बसावत बिया।
ऊ घर छोड़ के जात बिया, अपना लोग ना छोड़त बिया,
बाबुल के आँगन से दूर जात बिया, बाकिर बाबुल के दिल से ना।
बिटिया कबो पराई ना होखे,
ई बात हर दिल में बस जाव,
बाबुल के अंगना के चिरई,
जहवाँ रहो, खुशियन से सज जाव।
माई के ममता, बाबूजी के दुलार,
भइया-बहिन के नेह अपार,
ई सब लेके उड़ जाली चिरई,
छोड़ के आपन बाबुल के द्वार।
बाबुल के अंगना आज भले सूना हो गइल,
बाकिर ओकर हर कोना बिटिया के याद से भरल रही।
काहे कि बेटी घर छोड़ सकेले,
बाकिर अपना बाबुल के दिल से कबो ना उतर सकेले। 🥹🥹
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