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ऑनलाइन फ्रेंडशिप — एक अधूरी दास्तान

पढ़ने का समय : 8 मिनट

 

 

कभी-कभी ज़िंदगी हमें कुछ ऐसे लोगों से मिलाती है, जिनसे मिलने की हमने कभी कोई दुआ तक नहीं की होती। वे अचानक हमारी दुनिया में आते हैं, धीरे-धीरे हमारी आदत बन जाते हैं और फिर एक दिन… उसी खामोशी में खो जाते हैं, जहाँ से उन्हें ढूँढना भी मुमकिन नहीं होता।

 

मेरी कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

यह कहानी किसी कॉलेज की कैंटीन से शुरू नहीं हुई थी, न किसी सफ़र में हुई मुलाकात से और न ही किसी जान-पहचान वाले के ज़रिए। मेरी कहानी शुरू हुई थी एक ऐसे प्लेटफ़ॉर्म से, जहाँ लोग अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालते थे।

 

मैं एक लेखिका हूँ।

 

मुझे लिखना हमेशा से पसंद था। अपने मन की बातें कागज़ पर उतार देना, अपनी खामोशियों को शब्द दे देना और कभी-कभी अपनी ही लिखी हुई पंक्तियों में खुद को ढूँढ लेना… यही मेरी दुनिया थी।

 

उसी दुनिया में एक दिन मेरी नज़र एक ऐसे शख्स की लिखी हुई रचना पर पड़ी, जो मेरी ही तरह लिखता था। उसकी बातों में भी वही एहसास था, वही गहराई थी और शायद वही अकेलापन भी, जिसे मैं अपनी लिखाई में अक्सर छुपा दिया करती थी।

 

मैंने उसकी कुछ रचनाएँ पढ़ीं।

 

फिर कुछ और पढ़ीं।

 

और पता नहीं कब उसकी लिखाई मुझे अच्छी लगने लगी।

 

लेकिन उस वक्त कहाँ पता था कि एक लेखक की लिखाई पसंद आना, एक दिन उसी लेखक को अपनी ज़िंदगी का इतना अहम हिस्सा बना देगा।

 

एक दिन अचानक उसका संदेश मेरे इनबॉक्स में आया।

 

संदेश बहुत साधारण था।

 

शायद किसी बात को लेकर उसने मुझसे कुछ पूछा था।

 

मैंने भी सामान्य-सा जवाब दे दिया।

 

बस… यहीं से हमारी कहानी शुरू हुई।

 

शुरुआत में हमारी बातें सिर्फ़ लिखने-पढ़ने तक सीमित थीं। कौन-सी रचना अच्छी लगी, क्या लिखना चाहिए, किस एहसास को किस तरह शब्द देना चाहिए… बातें छोटी थीं, मगर धीरे-धीरे उन छोटी बातों ने हमारे बीच एक बड़ा रिश्ता बना दिया।

 

हम दोनों को शायद पता ही नहीं चला कि कब “आप” से “तुम” हो गया।

 

कब औपचारिक बातों की जगह बेवजह की बातें होने लगीं।

 

कब सुबह की शुरुआत एक-दूसरे के संदेश से होने लगी और रात तब तक अधूरी लगने लगी, जब तक बात न हो जाए।

 

वह सिर्फ़ मेरी दोस्त नहीं रही थी।

 

वह मेरी आदत बन चुकी थी।

 

मेरे दिन का एक ऐसा हिस्सा, जिसके बिना दिन पूरा नहीं लगता था।

 

अगर किसी दिन बात न हो तो मन बार-बार मोबाइल उठाता।

 

“शायद उसका मैसेज आया हो…”

 

फिर स्क्रीन देखती और खाली इनबॉक्स देखकर खुद से कहती—“शायद व्यस्त होगी।”

 

और कुछ देर बाद फिर मोबाइल देखती।

 

हमारी दोस्ती इतनी गहरी हो गई थी कि एक दिन बिना बात किए रहना मुश्किल लगता था।

 

हम अपनी खुशियाँ बाँटते थे।

 

अपनी परेशानियाँ बाँटते थे।

 

कभी वह उदास होती तो मैं उसे हँसाने की कोशिश करती और कभी मेरा मन भारी होता तो वह बिना पूछे समझ जाती कि कुछ ठीक नहीं है।

 

अजीब बात थी…

 

हम एक-दूसरे से कभी आमने-सामने नहीं मिले थे, फिर भी वह मुझे उन लोगों से ज्यादा समझती थी, जो मेरे आसपास रहते थे।

 

कभी-कभी मैं सोचती थी कि आखिर एक ऑनलाइन मुलाकात इतनी सच्ची कैसे हो सकती है?

 

फिर खुद ही जवाब मिलता—

 

रिश्ते दूरी से नहीं, एहसास से करीब होते हैं।

 

हमारी दोस्ती में कोई स्वार्थ नहीं था।

 

बस एक-दूसरे का साथ था।

 

एक-दूसरे की बातें सुनने की चाह थी।

 

और शायद यही वजह थी कि धीरे-धीरे वह मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गई।

 

लेकिन हर खूबसूरत कहानी के हिस्से में खुशियाँ हमेशा नहीं रहतीं।

 

एक दिन मेरी ज़िंदगी में ऐसा मोड़ आया, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था।

 

मेरे परिवार को हमारी दोस्ती के बारे में पता चल गया।

 

और फिर सवाल मेरी दोस्ती का नहीं, परिवार की सोच का बन गया।

 

मेरे घर में यह बात स्वीकार नहीं थी कि मैं किसी लड़की से इस तरह बात करूँ, उससे इतनी गहरी दोस्ती रखूँ और उसके साथ अपना इतना समय बाँटूँ।

 

मुझे समझाया गया।

 

रोका गया।

 

और आखिरकार मुझसे कहा गया कि मुझे उससे बात करना बंद करना होगा।

 

मैंने बहुत कुछ कहना चाहा।

 

बहुत कुछ समझाना चाहा।

 

मैं कहना चाहती थी कि वह सिर्फ़ एक ऑनलाइन दोस्त है।

 

कि इस रिश्ते में कुछ गलत नहीं है।

 

कि उसने कभी मेरा बुरा नहीं चाहा।

 

कि वह मेरे लिए बहुत खास है।

 

लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनके सामने हमारी आवाज़ बहुत छोटी पड़ जाती है।

 

मैं चाहकर भी उसे सब कुछ नहीं बता पाई।

 

सबसे ज्यादा दर्द इस बात का था कि वह शायद मेरा इंतज़ार कर रही होगी।

 

शायद उसे लग रहा होगा कि मैं अचानक क्यों बदल गई?

 

कल तक जो इंसान घंटों बातें करता था, आज उसके पास दो शब्द बोलने का वक्त क्यों नहीं?

 

वह शायद मेरे संदेश का इंतज़ार करती रही होगी।

 

शायद बार-बार अपना इनबॉक्स खोलती होगी।

 

शायद उसने सोचा होगा कि मुझसे कोई गलती हो गई।

 

और मैं…

 

मैं चाहकर भी उसे सच नहीं बता पा रही थी।

 

कितनी अजीब मजबूरी थी।

 

मैं उससे बात करना चाहती थी, लेकिन कर नहीं सकती थी।

 

मैं उसे कारण बताना चाहती थी, लेकिन बता नहीं सकती थी।

 

मैं उसे यह कहना चाहती थी कि—

 

“मैं तुमसे दूर अपनी मर्ज़ी से नहीं जा रही हूँ।”

 

लेकिन मेरे होंठों तक ये शब्द कभी पहुँच ही नहीं पाए।

 

दिन बीतते गए।

 

फिर हफ्ते।

 

और धीरे-धीरे हमारी बातचीत पूरी तरह बंद हो गई।

 

लेकिन एक चीज़ बंद नहीं हुई—

 

मेरी यादें।

 

आज भी कभी-कभी कोई खूबसूरत बात पढ़ती हूँ तो उसकी याद आ जाती है।

 

किसी की लिखी हुई कोई पंक्ति दिल को छू जाए तो लगता है, जैसे वह सामने बैठी हो और कह रही हो—

 

“देखो, यह पंक्ति कितनी अच्छी है।”

 

कभी मोबाइल हाथ में लेकर पुरानी बातचीत देखने का मन करता है।

 

पुराने संदेश पढ़ती हूँ।

 

कुछ शब्दों पर मुस्कुराती हूँ।

 

कुछ बातों पर आँखें नम हो जाती हैं।

 

और फिर खुद से एक ही सवाल करती हूँ—

 

“क्या उसे कभी पता चलेगा कि मैं उससे दूर क्यों हुई थी?”

 

शायद नहीं।

 

शायद वह आज भी मुझे गलत समझती होगी।

 

शायद उसे लगता होगा कि मैंने उसे भुला दिया।

 

लेकिन सच यह है कि कुछ लोगों को भुलाया नहीं जाता।

 

वे बस हमारी ज़िंदगी से दूर हो जाते हैं।

 

उनकी जगह कोई और नहीं लेता।

 

वे हमारे साथ नहीं होते, फिर भी हमारी यादों में हमेशा रहते हैं।

 

आज मेरे पास उससे बात करने का कोई रास्ता नहीं है।

 

मेरे पास उसके साथ बिताए हुए नए पल नहीं हैं।

 

मेरे पास उसके संदेशों का इंतज़ार नहीं है।

 

मेरे पास रोज़ की वो बातें नहीं हैं, जिनके बिना कभी दिन पूरा नहीं होता था।

 

मेरे पास अगर कुछ है…

 

तो बस उसकी यादें हैं।

 

कुछ अधूरी बातें।

 

कुछ पुराने संदेश।

 

कुछ मुस्कुराहटें।

 

और एक ऐसा रिश्ता, जिसका अंत कभी हमने तय ही नहीं किया था।

 

कभी-कभी सोचती हूँ, काश उस दिन मैं उसे सब बता पाती।

 

काश मैं बस इतना कह पाती—

 

“मुझसे नाराज़ मत होना… मैं तुम्हें छोड़ नहीं रही, बस हालात मुझे तुमसे दूर कर रहे हैं।”

 

शायद वह समझ जाती।

 

शायद नहीं भी समझती।

 

लेकिन कम से कम मेरे दिल पर यह बोझ तो नहीं रहता कि मैंने उसे बिना वजह छोड़ दिया।

 

अब जब कभी मैं कुछ लिखती हूँ, तो मेरी हर कहानी में कहीं न कहीं उसका ज़िक्र आ ही जाता है।

 

नाम नहीं लिखती…

 

क्योंकि कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते।

 

बस एहसास होते हैं।

 

और वह एहसास आज भी मेरे भीतर ज़िंदा है।

 

लोग अक्सर कहते हैं कि ऑनलाइन बने रिश्ते ज्यादा दिनों तक नहीं चलते।

 

मैं उनसे बस इतना कहना चाहती हूँ—

 

रिश्ता ऑनलाइन था, लेकिन एहसास बिल्कुल असली थे।

 

दूरी ऑनलाइन थी, मगर अपनापन बिल्कुल सच्चा था।

 

हम कभी मिले नहीं थे, फिर भी उसने मेरे दिल में एक ऐसी जगह बना ली, जहाँ आज भी कोई दूसरा नहीं पहुँच पाया।

 

शायद हमारी कहानी अधूरी है।

 

शायद हमारी दोस्ती का आखिरी पन्ना बहुत जल्दी बंद हो गया।

 

लेकिन हर अधूरी कहानी बेकार नहीं होती।

 

कुछ अधूरी कहानियाँ हमें उम्र भर याद रहती हैं।

 

और मेरी कहानी भी उन्हीं में से एक है।

 

आज वह मेरे साथ नहीं है।

 

हमारी बातें नहीं होतीं।

 

एक-दूसरे की खबर नहीं मिलती।

 

लेकिन जब कभी कोई पूछता है—

 

“क्या तुम्हारी ज़िंदगी में कभी कोई ऐसा इंसान आया था, जिसे तुमने खोना नहीं चाहा?”

 

तो मेरे पास उस सवाल का जवाब आज भी है।

 

हाँ…

 

एक दोस्त थी।

 

ऑनलाइन मिली थी।

 

मेरी तरह लिखती थी।

 

मेरी बातों को समझती थी।

 

मेरी खामोशियों को पढ़ लेती थी।

 

और फिर एक दिन हालात ने उसे मुझसे छीन लिया।

 

मैं उसे रोक नहीं पाई।

 

उसे अपना सच बता नहीं पाई।

 

लेकिन शायद वह यह कभी जान पाए…

 

कि मैंने उसे भुलाया नहीं था।

 

मैंने बस उसे अपनी यादों में रख लिया था।

 

और कुछ लोग ज़िंदगी से चले जाने के बाद भी कहाँ जाते हैं?

 

वे हमारे अंदर कहीं बस जाते हैं।

 

वह भी आज मेरी ज़िंदगी में नहीं है…

 

मगर मेरी हर उस कहानी में है,

 

जिसे लिखते हुए मेरी आँखें नम हो जाती हैं।

 

क्योंकि मेरे पास अब उससे जुड़ी कोई नई बात नहीं है…

 

बस पुरानी यादें हैं।

 

और शायद यही हमारी दोस्ती की सबसे खूबसूरत बात है—

 

हमारी कहानी खत्म हो गई,

 

लेकिन मेरी यादों में…

 

हमारी दोस्ती आज भी जारी है।

 

 

Story kesi lgi comment me jarur batae.

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Alka Singh

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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