द्वारका अब अपनी चरम वैभवशाली अवस्था में थी। अष्टभार्या के महल चमक रहे थे, सोलह हज़ार एक सौ प्रासादों में दीप जल रहे थे, और श्रीकृष्ण के पुत्र-पौत्रों की संख्या इतनी बढ़ चुकी थी कि यादव कुल पृथ्वी के सबसे शक्तिशाली वंशों में गिना जाने लगा था। लोग कहते थे कि यदुवंश का कोई अंत नहीं। रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न, जाम्बवती के पुत्र साम्ब, अन्य रानियों के पुत्र और फिर उनके भी पुत्र – सब मिलकर एक विशाल सैन्य और राजनीतिक शक्ति बन गए थे। बाहरी शत्रु अब यादवों का सामना करने से डरते थे।
फिर भी एक प्रश्न बार-बार उठता था। कभी सभा में, कभी तट पर, कभी मंदिर के प्रांगण में कोई धीरे से पूछ बैठता – “यदि भगवान की इतनी रानियाँ हैं, इतने पुत्र हैं, इतना विस्तार है, तो भविष्य में उनका वंश क्यों नहीं चलेगा? क्या यदुवंश सदा अमर रहेगा?” अधिकांश लोग इस प्रश्न को टाल देते। वे कहते – “भगवान हैं, उनका वंश कैसे समाप्त होगा?” पर जो गहरी दृष्टि वाले थे, वे जानते थे कि लीला का अपना नियम होता है। जो उदय होता है, उसका अस्त भी निश्चित है। और श्रीकृष्ण की लीला में यह अस्त भी उतना ही आवश्यक था जितना उदय।
कथा के अनुसार सोलह हज़ार एक सौ रानियों में से प्रत्येक ने दस-दस पुत्रों को जन्म दिया। संख्या इतनी विशाल हो गई कि यादव केवल एक कुल नहीं, एक राष्ट्र जैसे लगने लगे। इनमें प्रद्युम्न जैसे वीर थे, साम्ब जैसे तेजस्वी थे, अनिरुद्ध जैसे सुंदर और योग्य थे। अनिरुद्ध के पुत्र वज्र भी हुए। बाह्य दृष्टि से लग रहा था कि कृष्ण का रक्त रेखाओं में बहता रहेगा और द्वारका की शक्ति युगों तक अखंड रहेगी। पर भीतर-भीतर एक दूसरी धारा भी चल रही थी – अहंकार की धारा।
जब किसी कुल को असाधारण बल, अतुल वैभव और निरंतर विजय मिलती है, तो धीरे-धीरे उसमें विनय कम होने लगती है। यादव युवा पीढ़ी में यही होने लगा। वे अपने पिता श्रीकृष्ण के प्रभाव से तो परिचित थे, पर उस प्रभाव के मूल में जो धर्म, संयम और लोकसंग्रह था, उसे भूलने लगे। वे सोचने लगे – हम स्वयं देवता हैं, हम अजेय हैं, हमारा शासन शाश्वत है। मदिरा, अभिमान और परस्पर स्पर्धा ने उनके भीतर की एकता को खोखला कर दिया। बाहर से वे एक वंश दिखते थे, भीतर से टूटने को तैयार थे।
इसी बीच एक घटना घटी जिसने भविष्य के विनाश का बीज बो दिया। कुछ आर्ष मुनि द्वारका आए। साम्ब और अन्य यादव युवकों ने उन्हें परिहास का पात्र बनाने का निश्चय किया। उन्होंने साम्ब को गर्भवती स्त्री का वेश पहनाया और मुनियों से पूछा – “भगवन्, बताइए यह क्या जनेगी?” मुनियों ने दिव्य दृष्टि से देखा और कठोर वचन बोले। उन्होंने कहा कि इससे एक लोहे का मुसल उत्पन्न होगा, और उसी मुसल से तुम्हारे कुल का विनाश होगा। यादव हँसे, पर मुनिवरों का शाप मिथ्या नहीं होता।
समय आने पर साम्ब के पास वास्तव में लोहे का एक मुसल उत्पन्न हुआ। भयभीत यादवों ने उसे पीसकर समुद्र में फेंक दिया। वे समझे अब शाप टल गया। पर भाग्य के विधान को कोई नहीं टाल सकता। उस लोहे के कण समुद्र तट पर बिखरे। वहाँ से एक घास उपजी जिसमें लोहे के अंश थे। उसी से आगे चलकर वही विनाशकारी अस्त्र तैयार होने वाला था। एक भाग जरा नामक व्याध के पास पहुँचा, जो आगे चलकर बाण का अग्रभाग बना।
वर्ष बीतते गए। श्रीकृष्ण सब जानते थे। वे जानते थे कि यादवों का भार पृथ्वी पर अत्यंत बढ़ गया है। कभी देवताओं और पृथ्वी ने ही अनुरोध किया था कि पृथ्वी का भार कम किया जाए। कंस, जरासंध, नरकासुर जैसे अत्याचारियों का अंत हो चुका था, पर अब स्वयं यादव कुल अपनी शक्ति और अहंकार से पृथ्वी पर नया भार बनता जा रहा था। यदि यह वंश इसी रूप में चलता रहता तो आगे चलकर वही कुल धर्म की रक्षा के बजाय धर्म के लिए संकट बन सकता था। अतः विधान रचा गया कि यदुवंश का अंत उसके अपने हाथों हो।
प्रभावती क्षेत्र में, समुद्र तट पर, यादवों का अंतिम जमावड़ा हुआ। मदिरा का प्रवाह बढ़ा, पुरानी मनमुटावें सामने आईं, वाक्य बाण बने और बाण अस्त्र बने। जो एक वंश था, वह दो खेमों में बँट गया। भाई ने भाई को नहीं पहचाना, पिता ने पुत्र को नहीं। जो मुसल शाप से उत्पन्न हुआ था, वही अब उनके हाथों में विनाश का साधन बन गया। थोड़े ही समय में विशाल यादव सैन्य शक्ति स्वयं नष्ट हो गई। प्रद्युम्न, साम्ब, अनिरुद्ध और असंख्य वीर उस युद्ध में गिर गए जो कोई बाहरी शत्रु नहीं, उनका अपना ही अहंकार लड़ रहा था।
जब संहार हो चुका तो श्रीकृष्ण वन की ओर चले गए। वे जानते थे कि उनकी लीला का समय भी पूरा होने को है। एक वृक्ष के नीचे वे लेटे। जरा नामक व्याध ने उन्हें मृग समझकर बाण मारा। बाण उनके चरण में लगा। जरा भयभीत होकर आया, पर कृष्ण ने उसे अभय दिया। उन्होंने कहा कि यह भी विधान है। उन्होंने अपने शेष उत्तरदायित्व पूरे किए। वज्र को सुरक्षित स्थान दिया गया ताकि यदुवंश की एक पतली रेखा किसी रूप में बची रहे, पर वह रेखा आगे चलकर राजनीतिक शक्ति का स्रोत नहीं बनी। मुख्य वंश का अंत हो चुका था।
अब मूल प्रश्न पर आते हैं – इतनी रानियाँ, इतने पुत्र होने के बाद भी श्रीकृष्ण का वंश क्यों नहीं चला?
पहला उत्तर है – स्वयं उनका इच्छा। श्रीकृष्ण अवतार थे। अवतार का अर्थ है विशिष्ट प्रयोजन के लिए उतरना। प्रयोजन जब पूरा हो जाए तो रूप का संकोच भी आवश्यक हो जाता है। यदि उनका रक्त-वंश पृथ्वी पर दीर्घ काल तक राजशक्ति के रूप में बना रहता, तो लोग धर्म के बजाय कुल की पूजा करने लगते। वे कहते – हम कृष्ण के वंशज हैं, अतः हमारा अधिकार अखंड है। भगवान ने इस संभावना को ही समाप्त कर दिया। उन्होंने दिखाया कि पवित्रता कुल में नहीं, आचरण में होती है।
दूसरा उत्तर है – भार का हरण। पृथ्वी ने जब भार से दबी अवस्था में प्रार्थना की थी, तब केवल राक्षसों का नाश पर्याप्त नहीं था। समय आने पर उन शक्तियों का भी संहार आवश्यक था जो शुरू में धर्म के पक्ष में थीं, पर बाद में अहंकार से अधर्म की ओर बढ़ सकती थीं। यादव उसी श्रेणी में आ गए। अतः उनका अंत भी कृष्ण लीला का हिस्सा बना।
तीसरा उत्तर है – उपदेश। संसार को यह दिखाना था कि वैभव, संख्या और रक्त संबंध स्थायी नहीं होते। सोलह हज़ार एक सौ रानियाँ और उनके पुत्र – यह सब होते हुए भी एक शाप, एक अहंकार और एक आंतरिक फूट पर्याप्त थी पूरे वंश को मिटा देने के लिए। जो लोग केवल वंश पर गर्व करते हैं, उन्हें यह कथा आईना दिखाती है।
चौथा उत्तर भक्ति की दृष्टि से है। श्रीकृष्ण का वास्तविक वंश रक्त का नहीं, भाव का है। जो उनकी शरण में आता है, जो उनके नाम का जप करता है, जो उनके गुण गाता है – वही उनका वंशज है। प्रह्लाद दैत्य कुल में जन्मे, पर विष्णु के हो गए। विभीषण राक्षस कुल में जन्मे, पर राम के हो गए। उसी प्रकार कृष्ण का वंश उन लाखों-करोड़ों भक्तों में चलता है जो युगों बाद भी “राधे कृष्ण” कहते हैं। द्वारका का वैभव समाप्त हो गया, यादव सैन्य शक्ति समाप्त हो गई, पर भक्ति परंपरा अखंड चल रही है। यही उनका अटूट वंश है।
पाँचवाँ उत्तर लीला की पूर्णता का है। यदि कृष्ण का वंश राजनीतिक रूप से चलता रहता तो उनकी कथा अधूरी रह जाती। लोग कहते – वे गए, पर उनका राज्य रह गया। अब कहते हैं – वे गए, और अपना सारा ऐश्वर्य भी समेट कर ले गए। पीछे केवल शिक्षा रह गई, केवल नाम रह गया, केवल धर्म रह गया। यह अधिक निर्मल विदाई है।
कुछ लोग पूछते हैं कि फिर वज्र को क्यों बचाया गया। उत्तर है – पूर्ण शून्यता भी आवश्यक नहीं थी। एक पतली रेखा छोड़ दी गई ताकि इतिहास में यह कहा जा सके कि यदुवंश सर्वथा लुप्त नहीं हुआ, पर वह रेखा इतनी शक्तिशाली नहीं रही कि नया अहंकार खड़ा कर सके। संतुलन रखा गया।
रानियों की दृष्टि से देखें तो यह अंत और भी करुण है। रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, कालिन्दी और अन्य रानियाँ जिन्होंने कृष्ण के साथ जीवन व्यतीत किया था, उन्होंने अपने पुत्रों और पौत्रों का संहार देखा। उनके प्रासाद सूने हो गए। पर पुराणों में उनके विलाप को मुख्य स्थान नहीं दिया गया, क्योंकि कथा का केंद्र व्यक्तिगत शोक नहीं, विधान की पूर्णता है। जो भगवान के साथ जीवन बिताती हैं, वे जानती हैं कि आने वाला भी उनका है और जाने वाला भी उनका है। फिर भी मानवीय हृदय पर चोट तो पड़ती ही है। यह चोट भी लीला का अंग है।
आज जब कोई द्वारका जाता है तो विशाल प्रासादों के स्थान पर समुद्र और मंदिर पाता है। सोलह हज़ार एक सौ महलों का कोई अवशेष नहीं। अष्टभार्या के वैभव की कोई राजसी पंक्ति नहीं। केवल कृष्ण का नाम है, उनकी मूर्ति है, और भक्तों की भीड़ है। यही प्रमाण है कि उनका वंश समाप्त नहीं हुआ – केवल रूप बदल गया। पहले वह रक्त से चलता था, अब वह स्मरण से चलता है। पहले वह सिंहासन पर था, अब वह हृदय में है।
इसलिए प्रश्न का उत्तर संक्षेप में यह है – श्रीकृष्ण की इतनी रानियाँ और पुत्र होने के बाद भी उनका राजकीय वंश इसलिए नहीं चला क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि वह चले। उन्होंने पृथ्वी का भार उतारा, अहंकार का नाश किया, रक्त-गर्व की संभावना समाप्त की, और अपनी वास्तविक संतति अर्थात् भक्त परंपरा को अमर छोड़ दिया। जो लोग केवल पुत्र-पौत्रों को वंश मानते हैं, वे संख्या गिनते हैं। जो लोग भाव को वंश मानते हैं, वे देखते हैं कि कृष्ण आज भी सबसे अधिक जीवित हैं।
लीला समाप्त हुई, वंश समाप्त हुआ, द्वारका समुद्र में समा गई – पर जो बच गया वह अविनाशी है। नाम बच गया, धर्म बच गया, और वह प्रेम बच गया जो राधा से शुरू होकर सोलह हज़ार एक सौ हृदय तक फैला और फिर पूरे संसार में फैल गया। यही कारण है कि श्रीकृष्ण का वंश
नहीं रहा, फिर भी वे कभी अकेले नहीं हुए।

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