मथुरा में कंस का वध हो चुका था। कृष्ण अब केवल गोकुल के कान्हा नहीं रह गए थे। वे यदुवंश के रक्षक, धर्म के स्थापित करने वाले और द्वारका के भावी राजा बन चुके थे। समुद्र के बीचों-बीच उन्होंने एक अद्भुत नगरी बसाई – द्वारका। सोने की दीवारें, रत्नों के महल, और यमुना की जगह अब समुद्र की लहरें उनके चरण धोती थीं। पर उनके हृदय में अभी भी ब्रज की धूल और राधा की स्मृति बसी हुई थी। फिर भी लीला आगे बढ़नी थी।
उधर, दक्षिण दिशा में विदर्भ देश की राजधानी कुंडिनपुर में एक अपूर्व सुंदरी जन्म ले चुकी थी। उसका नाम था – रुक्मिणी।
रुक्मिणी राजा भीष्मक की पुत्री थीं। उनके बड़े भाई का नाम रुक्मी था, जो स्वभाव से घमंडी और महत्वाकांक्षी था। रुक्मिणी का रूप ऐसा था मानो स्वयं लक्ष्मी धरती पर अवतरित हो गई हों। श्याम वर्ण नहीं, बल्कि गौर वर्ण की वह राजकुमारी थीं। लंबे काले बाल, कमल जैसे नेत्र, और चलते समय ऐसी छवि मानो हिरणी वन में विचर रही हो। पर उनकी सबसे बड़ी सुंदरता उनके हृदय में थी। वे बचपन से ही भगवान विष्णु की परम भक्त थीं।
जब रुक्मिणी किशोरावस्था में पहुंचीं, तो उनके कानों में एक नाम बार-बार पड़ने लगा – कृष्ण। यादव कुल के श्यामसुंदर, जिन्होंने कंस जैसे अत्याचारी का वध किया, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को एक अंगुली पर उठा लिया, और जिनकी बांसुरी की धुन से सारा ब्रज मोहित हो जाता था। राजकुमारियाँ जब उनकी कथाएँ सुनतीं तो मुग्ध हो जातीं, पर रुक्मिणी के हृदय में कुछ और ही घटित हुआ।
एक दिन महल के उपवन में बैठी रुक्मिणी अपनी दासी से कह रही थीं, “सखी, क्या तुमने सुना है? द्वारका में जो कृष्ण रहते हैं, वे साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे तो स्वयं नारायण हैं।” दासी हँसी, “राजकुमारी, आप भी ना! कितने राजकुमार आपसे विवाह करना चाहते हैं, और आप किसी यादव की बात करती हैं?”
रुक्मिणी मुस्कुराईं। उनके नेत्रों में एक अजीब चमक थी। “नहीं सखी। मैंने उनके गुण सुने हैं। वे सत्यवादी हैं, वे शरणागतवत्सल हैं, वे गरीबों के रक्षक हैं। रूप की बात तो बाद में आती है। पहले तो हृदय जीतना होता है। और मेरा हृदय तो उनके नाम से ही जीत लिया गया है।”
धीरे-धीरे रुक्मिणी का प्रेम गहरा होता गया। वे प्रतिदिन मंदिर में जाकर विष्णु भगवान की पूजा करतीं और मन ही मन प्रार्थना करतीं, “हे नाथ! यदि आप वास्तव में कृष्ण रूप में अवतरित हुए हैं, तो मुझे स्वीकार कीजिए। मैं आपको ही अपना पति बनाना चाहती हूँ।”
पर यहाँ विघ्न भी थे। रुक्मिणी के भाई रुक्मी को कृष्ण से गहरा द्वेष था। वह चाहता था कि उसकी बहन शिशुपाल से विवाह करे। शिशुपाल चेदि देश का राजा था और कंस का मित्र रहा था। रुक्मी ने पिता भीष्मक को समझा-बुझाकर तय कर दिया कि रुक्मिणी का स्वयंवर होगा और उसमें शिशुपाल को ही वरमाला पहनाई जाएगी।
जब रुक्मिणी को यह समाचार मिला तो उनके प्राण जैसे सूख गए। महल के भीतरी कक्ष में वे अकेली बैठी रोने लगीं। उनकी प्रिय दासी ने कहा, “राजकुमारी, आप कुछ कीजिए। नहीं तो आपकी इच्छा अधूरी रह जाएगी।”
रुक्मिणी ने उस रात निर्णय लिया। उन्होंने एक ब्राह्मण को बुलाया। उसका नाम था सुंदर। रुक्मिणी ने अपने हाथों से एक पत्र लिखा। पत्र में शब्दों में आग थी और प्रेम था। उन्होंने लिखा –
“श्रीकृष्णचंद्र को सादर प्रणाम।
मैं रुक्मिणी, विदर्भराज भीष्मक की पुत्री, आपको अपना हृदय अर्पण करती हूँ। मैंने आपके गुणों को सुनकर आपको अपना पति चुना है। पर मेरे भाई रुक्मी मुझे शिशुपाल को सौंपना चाहते हैं। स्वयंवर के दिन जब मैं मंदिर जाऊँगी, तब आप आकर मुझे अपना लीजिए। यदि आप नहीं आए तो मैं अपनी जान दे दूँगी, क्योंकि आपके बिना जीने का कोई अर्थ नहीं।”
पत्र को ब्राह्मण के हाथों में देते हुए रुक्मिणी की आँखों में आँसू थे। उन्होंने कहा, “आप इसे स्वयं कृष्ण के हाथ में दीजिए। और उनसे कहना कि रुक्मिणी आपकी प्रतीक्षा कर रही है।”
ब्राह्मण चल पड़े। कई दिनों की यात्रा के बाद वे द्वारका पहुँचे। कृष्ण उस समय सभा में बैठे थे। ब्राह्मण को देखकर वे स्वयं उठकर उनके पास गए और चरण छुए। जब ब्राह्मण ने रुक्मिणी का पत्र दिया तो कृष्ण ने उसे पढ़ा। पढ़ते-पढ़ते उनके मुख पर एक मधुर मुस्कान फैल गई।
उन्होंने ब्राह्मण से कहा, “आप रुक्मिणी से कह देना कि मैं अवश्य आऊँगा। लक्ष्मी को नारायण कैसे छोड़ सकते हैं?”
स्वयंवर का दिन आ गया। कुंडिनपुर में चारों ओर राजा-महाराजाओं का जमावड़ा था। शिशुपाल गर्व से भरा हुआ था। रुक्मी अपनी बहन को शिशुपाल की ओर ले जाने का सपना देख रहा था। भीष्मक राजा भी बाध्य होकर चुप थे।
रुक्मिणी माता के मंदिर में पूजा करने गईं। लाल रंग के वस्त्रों में वे इतनी सुंदर लग रही थीं मानो स्वयं महालक्ष्मी हों। उनके हाथ में वरमाला थी, पर उनका हृदय द्वारका में था।
ठीक उसी समय मंदिर के बाहर हलचल मच गई। एक रथ हवा की तरह उड़ता हुआ आया। रथ पर बैठे थे श्यामसुंदर कृष्ण। पीतांबर धारण किए, गले में वैजयन्ती माला, और मुख पर वह दिव्य तेज। उन्होंने रथ से उतरते ही रुक्मिणी का हाथ पकड़ लिया।
रुक्मिणी ने जैसे ही कृष्ण को देखा, उनके नेत्रों से आँसू बह निकले – पर ये आँसू खुशी के थे। उन्होंने वरमाला कृष्ण के गले में डाल दी। चारों ओर सन्नाटा छा गया। फिर कोलाहल मच गया।
रुक्मी चिल्लाया, “कृष्ण! तुम मेरी बहन का हरण कैसे कर सकते हो?” शिशुपाल और अन्य राजाओं ने हथियार उठा लिए। पर कृष्ण ने रुक्मिणी को रथ पर बिठाया और रस्सियाँ पकड़ लीं। बलराम भी साथ थे। यादव सैनिकों ने शत्रुओं को रोका।
रथ द्वारका की ओर दौड़ पड़ा। रास्ते में रुक्मी ने पीछा किया। उसने कृष्ण को ललकारा। दोनों में युद्ध हुआ। कृष्ण ने रुक्मी को हराया, पर रुक्मिणी के कहने पर उसकी जान छोड़ दी। केवल उसके सिर के बाल काट दिए और उसे अपमानित करके छोड़ दिया।
जब रथ द्वारका पहुँचा तो सारी नगरी उत्सव में डूब गई। कृष्ण ने विधिवत रुक्मिणी के साथ विवाह किया। वे उनकी पत्नी बनीं – नहीं, उनकी प्रधान रानी बनीं। द्वारका के महल में लक्ष्मी आकर बस गईं।
विवाह के बाद कृष्ण ने रुक्मिणी से कहा, “तुमने मेरे लिए सब कुछ त्याग दिया। अपने भाई को, अपने राज्य को, अपनी सुविधा को। तुम्हारा प्रेम राधा के प्रेम से भिन्न है, पर कम नहीं है। राधा का प्रेम आत्मसमर्पण था, तुम्हारा प्रेम साहस और भक्ति से भरा है।”
रुक्मिणी मुस्कुराईं। उन्होंने कहा, “नाथ, मैं जानती हूँ कि आपके हृदय में ब्रज की राधा बसी हैं। मैं उनसे ईर्ष्या नहीं करती। मैं तो आपकी दासी हूँ। आपने मुझे स्वीकार किया, यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।”
कृष्ण ने उनके माथे पर हाथ रखा और बोले, “रुक्मिणी, तुम मेरी लक्ष्मी हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं, वहाँ नारायण अधूरे हैं। तुम द्वारका की रानी बनकर रहो, और मेरी लीला में सदा साथ दो।”
उस दिन के बाद रुक्मिणी कृष्ण की सबसे बड़ी सहयोगिनी बन गईं। वे उनकी सलाहकार थीं, उनकी पत्नी थीं, और उनकी परम भक्त थीं। जब भी कृष्ण युद्ध पर जाते, रुक्मिणी मंदिर में बैठकर उनकी विजय की प्रार्थना करतीं। जब वे लौटते तो पहले रुक्मिणी के ही चरण छुते।
रुक्मिणी ने कृष्ण को एक पुत्र भी दिया – प्रद्युम्न, जो कामदेव के अवतार माने गए। उनके जीवन में सुख था, वैभव था, पर सबसे अधिक थी कृष्ण के प्रति अटूट भक्ति।
कभी-कभी रात के समय जब कृष्ण समुद्र के किनारे खड़े बांसुरी बजाते, तो रुक्मिणी दूर से देखतीं। वे जानती थीं कि वह धुन ब्रज के लिए है, राधा के लिए है। पर वे कभी बीच में नहीं आतीं। वे समझती थीं कि कृष्ण का हृदय इतना विशाल है कि उसमें राधा भी समा सकती हैं और रुक्मिणी भी।
रुक्मिणी की कहानी केवल विवाह की नहीं है। यह उस नारी की कहानी है जिसने समाज की रीति-नीति के विरुद्ध जाकर अपने प्रेम को चुना। जिसने पत्र लिखकर भगवान को बुलाया। जिसने रथ पर बैठकर सब कुछ त्याग दिया। और जिसने अंत तक कृष्ण के चरणों में अपना सब कुछ अर्पण कर दिया।
द्वारका के इतिहास में रुक्मिणी का नाम सदा स्वर्णाक्षरों में लिखा रहेगा। क्योंकि वे केवल पत्नी नहीं थीं। वे कृष्ण की धर्मपत्नी थीं, उनकी लक्ष्मी थीं, और उनकी लीला की सहचरी थीं।
और जब कभी कोई भक्त द्वारका जाता है, तो वह रुक्मिणी माता के मंदिर में अवश्य जाता है। वहाँ खड़े होकर कहता है, “माता, आपने साहस दिखाया था। आपने प्रेम को धर्म बनाया था। हमें भी उतना बल दीजिए।”
क्योंकि रुक्मिणी केवल इतिहास की पात्र नहीं हैं। वे हर उस आत्मा का प्रतीक हैं जो भगवान को पाने के लिए सब कुछ छोड़ने को तैयार हो जाती है।

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