(भाग 12 — ब्रह्मा जी का मोह और कृष्ण की अद्भुत लीला)
वृंदावन में उस दिन भी वही चहल-पहल थी।सूरज की सुनहरी किरणें वन के हरे-भरे पत्तों पर पड़ रही थीं। यमुना की लहरें मंद-मंद बह रही थीं। कदंब के वृक्षों पर बैठे पक्षी मधुर स्वर में चहचहा रहे थे। हवा में फूलों की सुगंध घुली हुई थी।
और वृंदावन के एक खुले मैदान में नंदलाल अपने ग्वाल-बाल मित्रों और बछड़ों के साथ खेल रहे थे।
कृष्ण के हाथ में आज बाँसुरी नहीं थी। वह कभी किसी मित्र के कंधे पर हाथ रख देते, कभी किसी बछड़े को पुकारते और कभी अचानक दौड़कर किसी को पकड़ लेते।
उनके चारों ओर आनंद ही आनंद था।
किसी के हाथ में दही की पोटली थी, किसी के पास फल थे और कोई अपनी छोटी-सी गठरी खोलकर सबको भोजन बाँट रहा था।
कृष्ण ने हँसते हुए कहा,
“देखो, आज हम सब अपना भोजन साथ-साथ करेंगे।”
एक ग्वाल-बाल बोला,
“लेकिन कन्हैया, तुम फिर मेरा माखन मत चुराना।”
कृष्ण ने तुरंत भोला चेहरा बनाकर कहा,
“मैं? मैं तो कभी किसी का माखन नहीं चुराता।”
सभी बच्चे हँस पड़े।
“झूठे कन्हैया!”
कृष्ण भी हँसने लगे।
वृंदावन का यह दृश्य जितना सरल था, उतना ही दिव्य भी।
क्योंकि उन साधारण-से दिखने वाले बालकों के बीच स्वयं परम सत्ता बालक बनकर बैठी थी।
उधर, बहुत दूर ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी अपने दिव्य आसन पर विराजमान थे।
सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने अनेक लोकों को देखा था। उन्होंने असंख्य जीवों की उत्पत्ति देखी थी। देवताओं, ऋषियों और महान योगियों को देखा था।
लेकिन इन दिनों उनका मन बार-बार वृंदावन की ओर जा रहा था।
उनके सामने एक प्रश्न था।
“वह छोटा-सा कृष्ण आखिर कौन है?”
देवताओं से उन्हें उसके अद्भुत कार्यों का समाचार मिल चुका था।
कभी उसने पूतना जैसी भयानक राक्षसी का अंत कर दिया।
कभी शकटासुर का उद्धार किया।
कभी तृणावर्त के भयंकर तूफान से भी नहीं डरा।
और अब तो ऐसी बात भी सुनने में आई थी कि उस बालक के मुख के भीतर पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया था।
ब्रह्मा जी सोचने लगे—
“क्या यह सचमुच कोई साधारण बालक है?”
उनके मन में जिज्ञासा बढ़ती गई।
लेकिन उसी जिज्ञासा के साथ एक सूक्ष्म-सा अहंकार भी उनके भीतर जन्म लेने लगा।
“मैं सृष्टि का रचयिता हूँ। मैं वेदों का ज्ञाता हूँ। मैंने अनेक दिव्य शक्तियों को देखा है। यदि यह बालक वास्तव में परम शक्ति है, तो मुझे इसकी लीला को समझने में कठिनाई क्यों होनी चाहिए?”
यही विचार धीरे-धीरे उनके मन में घर करने लगा।
और फिर ब्रह्मा जी ने निश्चय किया कि वह स्वयं कृष्ण की लीला को परखेंगे।
इधर वृंदावन में दोपहर हो चुकी थी।
ग्वाल-बाल और कृष्ण यमुना के किनारे बैठकर भोजन करने लगे।
किसी के पास रोटी थी, किसी के पास दही, किसी के पास फल और किसी के पास थोड़ा-सा माखन।
कृष्ण बीच में बैठे थे।
वह कभी किसी की रोटी का टुकड़ा उठा लेते, कभी किसी को अपने हाथ से माखन खिला देते।
एक बालक बोला,
“कन्हैया, तुम मेरे फल मत लेना।”
कृष्ण ने मुस्कुराकर पूछा,
“क्यों?”
“क्योंकि मेरे पास बस यही एक है।”
कृष्ण ने अपना फल उसकी ओर बढ़ा दिया।
“तो तुम मेरा ले लो।”
बालक की आँखें चमक उठीं।
“सच?”
“हाँ, बिल्कुल।”
कृष्ण का प्रेम ऐसा ही था।
वह बाँटने में आनंद पाते थे।
तभी अचानक कुछ बछड़े वहाँ से दूर जाने लगे।
एक ग्वाल-बाल ने कहा,
“अरे! बछड़े उधर चले गए।”
कृष्ण ने कहा,
“तुम लोग भोजन करो। मैं उन्हें लेकर आता हूँ।”
कृष्ण उठे और बछड़ों के पीछे चल पड़े।
उसी क्षण ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्य शक्ति से एक अद्भुत लीला रची।
उन्होंने सभी बछड़ों को एक स्थान पर ले जाकर अदृश्य कर दिया।
फिर कुछ ही समय बाद उन्होंने ग्वाल-बालों को भी उसी प्रकार अपनी माया से छिपा दिया।
अब मैदान खाली था।
न बछड़े थे।
न ग्वाल-बाल।
केवल कृष्ण वहाँ खड़े थे।
कृष्ण ने चारों ओर देखा।
उनके मुख पर हल्की मुस्कान थी।
वह समझ गए।
“तो ब्रह्मा जी मेरी परीक्षा लेना चाहते हैं।”
कृष्ण ने आकाश की ओर देखा।
उनकी मुस्कान और गहरी हो गई।
“ठीक है।”
उन्होंने मन ही मन कहा—
“यदि यही आपकी इच्छा है, तो आपकी लीला भी पूरी हो जाए।”
कृष्ण ने उसी क्षण स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट कर लिया।
हर बछड़ा पहले जैसा हो गया।
हर ग्वाल-बाल भी पहले जैसा दिखाई देने लगा।
किसी के चेहरे पर वही मुस्कान थी।
किसी के हाथ में वही भोजन था।
किसी की आवाज वही थी।
किसी की चाल वही थी।
यहाँ तक कि उनके माता-पिता को भी तनिक संदेह नहीं हुआ।
वृंदावन में किसी को पता ही नहीं चला कि असली बछड़े और ग्वाल-बाल तो ब्रह्मा जी की माया में छिपे हुए हैं।
कृष्ण ने स्वयं हर बछड़े का रूप धारण कर लिया।
स्वयं हर ग्वाल-बाल का रूप धारण कर लिया।
वह हर घर में पुत्र बनकर पहुँच गए।
हर माँ ने अपने बच्चे को पहले की तरह गले लगाया।
लेकिन उस दिन एक अद्भुत परिवर्तन हुआ।
वृंदावन की माताओं का अपने बच्चों के प्रति प्रेम अचानक पहले से भी अधिक बढ़ गया।
वे अपने पुत्रों को देखकर बार-बार उन्हें गले लगातीं।
उन्हें लगता—
“आज न जाने क्यों मेरा लाल पहले से भी अधिक प्यारा लग रहा है।”
गायें भी अपने बछड़ों को देखकर असाधारण प्रेम से भर उठीं।
वे उन्हें चाटतीं, पुकारतीं और बार-बार अपने पास बुलातीं।
क्योंकि अब वे केवल बछड़े नहीं थे।
वे स्वयं कृष्ण थे।
समय बीतता गया।
ब्रह्मा जी को लगा कि उनकी योजना सफल हो गई है।
वह कुछ समय बाद यह देखने के लिए लौटे कि कृष्ण क्या कर रहे हैं।
लेकिन जैसे ही उन्होंने वृंदावन की ओर देखा, उनकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
“यह क्या?”
उन्होंने देखा—
सभी ग्वाल-बाल पहले की तरह कृष्ण के साथ खेल रहे हैं।
सभी बछड़े भी वहीं हैं।
कृष्ण के साथ भोजन कर रहे हैं।
दौड़ रहे हैं।
हँस रहे हैं।
ब्रह्मा जी चकित रह गए।
“लेकिन मैंने तो इन्हें छिपा दिया था!”
उन्होंने तुरंत उस स्थान की ओर देखा जहाँ उन्होंने असली ग्वाल-बालों और बछड़ों को रखा था।
वहाँ वे सभी वैसे ही मौजूद थे।
ब्रह्मा जी स्तब्ध रह गए।
एक ओर वे ग्वाल-बाल और बछड़े, जिन्हें उन्होंने छिपाया था।
दूसरी ओर वृंदावन में वही ग्वाल-बाल और बछड़े कृष्ण के साथ खेल रहे थे।
“यह कैसे संभव है?”
ब्रह्मा जी की बुद्धि चकराने लगी।
उन्होंने ध्यान से देखा।
तभी उन्हें एक और अद्भुत दृश्य दिखाई दिया।
वृंदावन में जितने भी ग्वाल-बाल और बछड़े थे, उनके भीतर उन्हें दिव्य प्रकाश दिखाई देने लगा।
एक-एक करके हर बालक का रूप बदलने लगा।
हर बछड़े का रूप बदलने लगा।
और देखते ही देखते उन्हें हर रूप में वही चार भुजाओं वाले भगवान दिखाई देने लगे।
हर दिशा में वही दिव्य स्वरूप।
हर बालक में वही परम सत्ता।
हर बछड़े में वही अनंत भगवान।
ब्रह्मा जी की आँखें खुली की खुली रह गईं।
उनके भीतर का अहंकार जैसे टूटने लगा।
जिस कृष्ण को वह एक छोटा-सा बालक समझ रहे थे, वही अनंत रूपों में उनके सामने उपस्थित था।
जिस शक्ति को वे अपनी बुद्धि से समझना चाहते थे, वही शक्ति उनके सामने अनगिनत रूपों में खेल रही थी।
ब्रह्मा जी के पास अब कोई शब्द नहीं था।
उन्होंने समझ लिया—
“यह मेरी परीक्षा नहीं है। यह तो मेरी ही परीक्षा हो रही थी।”
कृष्ण की माया के सामने सृष्टि का रचयिता भी स्वयं को असहाय अनुभव कर रहा था।
ब्रह्मा जी का सिर झुक गया।
उनका अभिमान समाप्त हो चुका था।
वह धीरे-धीरे कृष्ण के पास पहुँचे।
अब कृष्ण फिर वही छोटे-से बालक के रूप में खड़े थे।
हाथ में भोजन का कौर।
चेहरे पर वही मधुर मुस्कान।
आँखों में वही बालपन।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
ब्रह्मा जी ने कृष्ण के चरणों में अपना मस्तक रख दिया।
उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“प्रभु… मुझे क्षमा कीजिए।”
कृष्ण शांत भाव से उन्हें देखते रहे।
ब्रह्मा जी बोले,
“मैंने अपने ज्ञान पर अभिमान किया। मैंने सोचा कि मैं आपकी लीला को समझ सकता हूँ। मैंने आपकी परीक्षा लेने का प्रयास किया। लेकिन मैं भूल गया कि जिस शक्ति से यह पूरा ब्रह्मांड बना है, उसे मेरी बुद्धि कैसे समझ सकती है?”
कृष्ण मुस्कुराए।
उन्होंने कोई कठोर शब्द नहीं कहा।
यही तो उनकी करुणा थी।
वह भक्त की भूल देखते थे, लेकिन उसके हृदय का पश्चात्ताप भी देखते थे।
ब्रह्मा जी ने हाथ जोड़कर कहा,
“प्रभु, आप सचमुच अद्भुत हैं। आप बालक बनकर खेलते हैं, फिर भी आपके भीतर अनंत लोक समाए हुए हैं। आप अपने भक्तों के लिए स्वयं को छोटा कर लेते हैं, लेकिन आपके स्वरूप की कोई सीमा नहीं।”
कृष्ण ने उन्हें अपनी करुणामयी दृष्टि से देखा।
और तभी ब्रह्मा जी की माया समाप्त हो गई।
ग्वाल-बाल और बछड़े अपने वास्तविक समय में लौट आए।
उनके लिए तो जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।
उन्हें पता तक नहीं चला कि उनके साथ क्या हुआ।
वे उसी प्रकार कृष्ण के साथ खेलते रहे।
कृष्ण ने एक ग्वाल-बाल से कहा,
“चलो, अब घर चलें। मैया इंतजार कर रही होंगी।”
बालक बोला,
“हाँ कन्हैया, लेकिन पहले तुम मेरे साथ दौड़ लगाओ।”
कृष्ण हँस पड़े।
“अच्छा, चलो!”
और दोनों दौड़ पड़े।
ब्रह्मा जी दूर खड़े इस दृश्य को देखते रहे।
उनके लिए यह दृश्य अब पहले जैसा नहीं था।
उन्हें अब उस बालक में केवल बालक नहीं दिखाई दे रहा था।
उन्हें उसमें वह अनंत सत्ता दिखाई दे रही थी, जो कभी यशोदा की गोद में खेलती है, कभी ग्वाल-बालों के साथ भोजन करती है और कभी पूरी सृष्टि को अपनी लीला में समेट लेती है।
ब्रह्मा जी ने मन ही मन प्रणाम किया और अपने लोक की ओर लौट गए।
वृंदावन में शाम उतरने लगी।
गायों के झुंड धीरे-धीरे वापस लौट रहे थे।
उनके पीछे-पीछे ग्वाल-बाल आ रहे थे।
सबसे आगे कृष्ण थे।
उनके होंठों पर मधुर मुस्कान थी।
यमुना की लहरें जैसे उनके चरणों का स्वागत कर रही थीं।
लेकिन वृंदावन की कथा में अब एक नया अध्याय आने वाला था।
कृष्ण की बाल-लीलाएँ अब केवल ग्वाल-बालों और बछड़ों तक सीमित नहीं रहने वाली थीं।
यमुना के जल में एक भयंकर संकट छिपा हुआ था।
उस जल में रहने वाला एक विशाल और विषैला नाग पूरे क्षेत्र को भयभीत कर रहा था।
उसका नाम था—
कालिय।
उसके विष से यमुना का जल दूषित हो चुका था।
पक्षी उसके ऊपर से उड़ते-उड़ते गिर पड़ते।
पशु उस जल के पास जाने से डरते।
वृंदावन के लोगों के मन में भय था।
लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस दिन नंदलाल की दृष्टि उस विषैले जल पर पड़ेगी, उस दिन स्वयं कालिय नाग का अहंकार चूर होने वाला है।
और फिर वृंदावन देखेगा एक ऐसी लीला…
जिसमें नन्हा-सा कृष्ण यमुना में छलाँग लगाएगा…
विशाल कालिय नाग से सामना करेगा…
और उसके फनों पर नृत्य करके पूरे संसार को यह संदेश देगा कि—
जहाँ कृष्ण के चरण पड़ जाते हैं, वहाँ विष भी अमृत बन जाता है।
आने वाले भाग में कथा पहुँचेगी यमुना के उसी विषैले तट पर…
जहाँ नंदलाल करेंगे—
“कालिय नाग का दमन।”
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