(भाग 11 — कृष्ण ने माटी खाई और दिखाया अद्भुत संसार)
वृंदावन की वह सुबह कुछ अलग ही थी।आकाश पर हल्के-हल्के बादल तैर रहे थे। यमुना का जल सूर्य की सुनहरी किरणों को अपने भीतर समेटकर ऐसा चमक रहा था, मानो किसी ने नीले आकाश पर चाँदी की चादर बिछा दी हो। वन में खिले कदंब और तमाल के फूलों की सुगंध हवा में घुली हुई थी। कहीं कोयल कू-कू कर रही थी, तो कहीं रंग-बिरंगे पक्षी वृक्षों की डालियों पर बैठकर अपनी मधुर बोली से वातावरण को आनंदित कर रहे थे।
और उसी मनोहर वृंदावन में नंदलाल अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ खेल रहे थे।
कन्हैया के चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी, जिसे देखकर कोई भी अपना मन हार बैठे।
आज उनके हाथ में न कोई माखन की मटकी थी, न कोई बाँसुरी। आज तो बस खेल ही खेल था।
बलराम जी और दूसरे ग्वाल-बाल कभी दौड़ लगाते, कभी एक-दूसरे को पकड़ने का प्रयास करते और कभी पेड़ों के पीछे छिपकर कृष्ण को ढूँढ़ने का नाटक करते।
कृष्ण कभी किसी को पकड़ लेते तो कभी जान-बूझकर उसके हाथ से निकल जाते।
एक ग्वाल-बाल बोला,
“कन्हैया! आज तुम हमसे बच नहीं पाओगे। आज तो हम तुम्हें पकड़कर ही रहेंगे।”
कृष्ण ने आँखों में शरारत भरकर कहा,
“अच्छा! तो पहले पकड़कर तो दिखाओ।”
इतना कहकर कृष्ण दौड़ पड़े।
सारे ग्वाल-बाल उनके पीछे भागे।
कभी कृष्ण आगे होते, कभी पीछे मुड़कर सबको चिढ़ाते।
“आओ-आओ! पकड़ो मुझे!”
ग्वाल-बाल हँसते हुए उनके पीछे दौड़ते रहे।
दौड़ते-दौड़ते सब वृंदावन के एक ऐसे स्थान पर पहुँच गए जहाँ मिट्टी कुछ नरम थी। वहाँ वर्षा के कारण धरती पर हल्की नमी थी और कुछ जगहों पर मिट्टी के छोटे-छोटे ढेले बने हुए थे।
कृष्ण अचानक वहीं रुक गए।
उनकी दृष्टि उस मिट्टी पर पड़ी।
कन्हैया के मन में न जाने क्या आया।
उन्होंने नीचे झुककर मिट्टी का एक छोटा-सा टुकड़ा उठा लिया।
एक ग्वाल-बाल ने उन्हें देख लिया।
वह चिल्लाया,
“अरे! कन्हैया मिट्टी खा रहा है!”
बस फिर क्या था।
सभी ग्वाल-बाल कृष्ण के चारों ओर इकट्ठे हो गए।
“कृष्ण ने मिट्टी खाई!”
“हाँ, मैंने अपनी आँखों से देखा है!”
“चलो, मैया को बताते हैं!”
कृष्ण ने तुरंत मासूम चेहरा बना लिया।
“मैंने मिट्टी नहीं खाई।”
एक ग्वाल-बाल बोला,
“झूठ बोल रहे हो कन्हैया! हमने देखा है।”
कृष्ण ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें फैलाकर कहा,
“तुम लोगों ने गलत देखा होगा।”
बलराम जी भी वहाँ खड़े मुस्कुरा रहे थे।
उन्होंने कहा,
“मैया से पूछ लेना, फिर पता चल जाएगा।”
कृष्ण ने बलराम की ओर देखा।
उनकी आँखों में जैसे विनती थी—
“दाऊ, तुम तो मेरे भाई हो!”
बलराम हँस पड़े।
“मैं क्या करूँ कन्हैया? सच तो सच है।”
अब ग्वाल-बालों ने निश्चय कर लिया कि वे यशोदा मैया के पास जाकर सारी बात बताएँगे।
कुछ ही देर में वे दौड़ते हुए नंद भवन पहुँचे।
यशोदा मैया उस समय घर के काम में लगी थीं। उनके हाथों में माखन लगा हुआ था और पास ही दही की मटकी रखी थी।
तभी ग्वाल-बालों की आवाज सुनाई दी—
“मैया! मैया!”
यशोदा ने पलटकर देखा।
सारे बच्चे एक साथ खड़े थे।
मैया ने मुस्कुराकर पूछा,
“क्या हुआ लाला? ऐसे क्यों दौड़ते हुए आए हो?”
एक ग्वाल-बाल ने तुरंत शिकायत कर दी—
“मैया! कन्हैया ने मिट्टी खाई है!”
दूसरा बोला,
“हाँ मैया, हमने देखा है।”
तीसरा बोला,
“बहुत सारी मिट्टी खाई है!”
यशोदा मैया का चेहरा गंभीर हो गया।
उन्होंने पूछा,
“कन्हैया ने मिट्टी खाई?”
सबने एक साथ सिर हिला दिया।
“हाँ मैया!”
यशोदा मैया ने गहरी साँस ली।
“अच्छा, तो आज अपने नटखट लाल की खबर लेनी पड़ेगी।”
वह तुरंत कृष्ण को ढूँढ़ने चल पड़ीं।
थोड़ी दूर पर कृष्ण अपने मित्रों के साथ खड़े थे।
जैसे ही उन्होंने मैया को आते देखा, उनकी शरारती आँखों में एक पल के लिए चिंता झलक गई।
यशोदा मैया ने पास आकर कहा,
“कन्हैया!”
कृष्ण ने मासूमियत से कहा,
“जी मैया?”
“तुमने मिट्टी खाई है?”
कृष्ण ने तुरंत सिर हिलाया।
“नहीं मैया।”
“इन सबने झूठ बोला है?”
कृष्ण ने अपने मित्रों की ओर देखा।
फिर बोले,
“हाँ मैया। ये सब मुझे परेशान कर रहे हैं।”
यशोदा ने बलराम की ओर देखा।
“दाऊ, तुम बताओ। क्या कन्हैया ने मिट्टी खाई?”
बलराम कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले,
“मैया… कन्हैया ने मिट्टी उठाई तो थी।”
यशोदा ने कृष्ण की ओर देखा।
“तो फिर?”
कृष्ण बोले,
“मैया, मैंने मिट्टी नहीं खाई। मैंने तो बस उसे देखा था।”
ग्वाल-बाल हँस पड़े।
एक बोला,
“मैया! कन्हैया झूठ बोल रहे हैं।”
यशोदा मैया ने कृष्ण का हाथ पकड़ लिया।
“अच्छा! बहुत हो गई तुम्हारी शरारत। मुँह खोलो।”
कृष्ण पीछे हटने लगे।
“नहीं मैया।”
“मुँह खोलो!”
“मैया, मैंने सच में मिट्टी नहीं खाई।”
“तो फिर डर किस बात का है?”
कृष्ण चुप हो गए।
यशोदा मैया ने थोड़ा कठोर स्वर में कहा,
“कन्हैया, मुँह खोलो।”
कृष्ण ने धीरे-धीरे अपना मुँह खोल दिया।
और फिर…
जो दृश्य यशोदा मैया ने देखा, उसे देखकर उनकी आँखें स्थिर हो गईं।
कृष्ण के छोटे-से मुख के भीतर उन्हें मिट्टी का कोई कण दिखाई नहीं दिया।
वहाँ तो कुछ और ही था।
कुछ ऐसा, जिसकी कल्पना कोई साधारण मनुष्य नहीं कर सकता।
यशोदा मैया ने देखा—
मानो कृष्ण के मुख के भीतर पूरा आकाश समाया हुआ हो।
सूर्य दिखाई दे रहा था।
चंद्रमा दिखाई दे रहा था।
असंख्य तारे चमक रहे थे।
पर्वत थे।
नदियाँ थीं।
समुद्र थे।
वन थे।
नगर थे।
गाँव थे।
पृथ्वी थी।
और उस पृथ्वी पर असंख्य जीव-जंतु दिखाई दे रहे थे।
उन्होंने यमुना को भी देखा।
वृंदावन को भी देखा।
नंद भवन को भी देखा।
और…
उन्होंने स्वयं को भी देखा।
वही यशोदा मैया कृष्ण के सामने खड़ी थीं।
और उनके सामने कृष्ण खड़े थे।
लेकिन उस कृष्ण के मुख के भीतर फिर वही संसार दिखाई दे रहा था।
एक और वृंदावन।
एक और यशोदा।
एक और कृष्ण।
और उस दूसरे कृष्ण के मुख में फिर वही संसार!
यशोदा मैया का हृदय जैसे थम गया।
उनकी आँखें फैल गईं।
वह कुछ समझ नहीं पा रही थीं।
“यह… यह क्या है?”
उनके मन में अनेक प्रश्न उठने लगे।
“क्या मैं स्वप्न देख रही हूँ?”
उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
कुछ पल बाद फिर खोलीं।
दृश्य वही था।
कृष्ण का मुख खुला था और उसमें पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ था।
यशोदा मैया के मन में अचानक एक विचार आया—
“क्या मेरा यह नन्हा-सा लाल वही परम शक्ति है, जिसकी चर्चा ऋषि-मुनि करते हैं?”
लेकिन अगले ही क्षण उनके हृदय ने उस विचार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
“नहीं… यह मेरा कन्हैया है।”
वही कन्हैया जो सुबह उठते ही मेरे आँचल को पकड़ लेता है।
वही कन्हैया जो भूख लगने पर मुझे पुकारता है।
वही कन्हैया जो माखन चुराकर भागता है।
वही कन्हैया जो मेरी डाँट सुनकर मासूम चेहरा बना लेता है।
भला वह स्वयं भगवान कैसे हो सकता है?
यशोदा की आँखों में आँसू भर आए।
कृष्ण ने उनकी ओर देखा।
उनकी आँखों में अब शरारत नहीं थी।
बस वही निश्छल बालपन था।
“मैया…”
यशोदा जैसे नींद से जागीं।
उन्होंने तुरंत कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।
उनके हृदय में उमड़ते प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था।
उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया।
“मेरा लाल…”
कृष्ण ने अपनी छोटी-सी बाँहें मैया के गले में डाल दीं।
उस क्षण यशोदा को न ब्रह्मांड दिखाई दिया, न अनंत आकाश, न कोई दिव्य शक्ति।
उन्हें केवल अपना पुत्र दिखाई दिया।
उनका नंदलाल।
उनका लाड़ला।
उनकी आँखों का तारा।
और यही तो उस लीला की सबसे अद्भुत बात थी।
जिस परम सत्ता को बड़े-बड़े योगी ध्यान में खोजते हैं, जिसे पाने के लिए ऋषि-मुनि वर्षों तक तप करते हैं, वही अनंत सत्ता यशोदा की गोद में एक छोटे बालक की तरह बैठी थी।
परंतु कृष्ण की माया भी अद्भुत थी।
कुछ ही क्षणों में यशोदा मैया का मन फिर सामान्य होने लगा।
उन्हें लगा जैसे अभी जो कुछ उन्होंने देखा, वह शायद किसी दिव्य भ्रम के समान था।
उन्होंने कृष्ण के सिर पर हाथ फेरा।
“चलो, अब घर चलो। बहुत शरारत हो गई।”
कृष्ण मुस्कुराए।
“मैया, मुझे भूख लगी है।”
यशोदा हँस पड़ीं।
“अच्छा! अभी तो मिट्टी खाई थी, अब भूख भी लग गई?”
कृष्ण ने मासूमियत से कहा,
“मैंने मिट्टी कहाँ खाई थी मैया?”
ग्वाल-बाल एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
फिर सब खिलखिलाकर हँस पड़े।
यशोदा भी मुस्कुरा दीं।
उन्हें क्या पता था कि अभी-अभी जिस बालक के मुख में उन्होंने अनंत ब्रह्मांड देखा था, वही कुछ ही देर में फिर किसी नई शरारत के लिए तैयार होने वाला है।
वृंदावन में दिन ढलने लगा।
सूर्य पश्चिम दिशा की ओर बढ़ चला।
गायों के गले में बँधी घंटियाँ मधुर स्वर में बजने लगीं।
ग्वाल-बाल अपने-अपने घर लौटने लगे।
कृष्ण भी मैया की उँगली पकड़कर नंद भवन की ओर चल पड़े।
लेकिन उस दिन के बाद वृंदावन की हवा में जैसे कोई अनकहा रहस्य तैरने लगा।
कन्हैया केवल नंद-यशोदा के पुत्र नहीं थे।
उनके छोटे-से शरीर में अनंत संसार छिपा था।
उनकी बाल मुस्कान में ऐसी शक्ति थी, जिसे कोई समझ नहीं सकता था।
और उनकी हर शरारत के पीछे कोई न कोई दिव्य रहस्य छिपा हुआ था।
परंतु यह रहस्य केवल यशोदा मैया तक सीमित नहीं रहने वाला था।
दूर ब्रह्मलोक में एक महान देवता भी कृष्ण की इन अद्भुत लीलाओं को देखकर आश्चर्यचकित हो रहे थे।
ब्रह्मा जी के मन में एक प्रश्न उठने लगा—
“क्या वास्तव में यह वही परम तत्व है, जिसे वेद खोजते हैं?”
उन्होंने सोचा—
“यदि यह बालक सचमुच स्वयं परमेश्वर है, तो इसकी लीला की सीमा क्या है?”
और यही प्रश्न आगे चलकर एक ऐसी अद्भुत घटना का कारण बनने वाला था, जिसमें स्वयं ब्रह्मा जी भी कृष्ण की माया के सामने चकित हो जाएँगे।
वह कृष्ण की ऐसी लीला होगी, जिसमें समय ठहर जाएगा…
ग्वाल-बालों का रूप बदल जाएगा…
बछड़ों का रूप बदल जाएगा…
और स्वयं ब्रह्मा जी को अपनी भूल का एहसास होगा।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह होगा—
जब स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी कृष्ण की परीक्षा लेने का प्रयास करेंगे, तब नंदलाल उन्हें क्या उत्तर देंगे?
वृंदावन की धूल में छिपा वह रहस्य अब ब्रह्मलोक तक पहुँच चुका था…
और अगले भाग में आरंभ होगी—
“ब्रह्मा जी का मोह और कृष्ण की अद्भुत लीला”।

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