(भाग 7 — मटकी फोड़ने की शरारत)
गोकुल की सुबह हमेशा की तरह बहुत सुंदर थी।सूरज की हल्की सुनहरी किरणें नंदबाबा के आँगन में उतर रही थीं। गायों के गले में बंधी घंटियाँ मधुर स्वर में बज रही थीं। कहीं बछड़े अपनी माताओं के पास उछल-कूद कर रहे थे, तो कहीं गोपियाँ अपने घरों में दही मथ रही थीं।
लेकिन उस सुबह नंदभवन में कुछ अलग ही होने वाला था।
क्योंकि नंदलाल के मन में एक नई शरारत जन्म ले चुकी थी।
पिछली कथा में आपने देखा था कि कृष्ण माखन चुराने के लिए गोकुल की गोपियों के घर-घर जाते थे। कभी वे अपने सखाओं की सहायता से ऊँची मटकी तक पहुँचते, कभी माखन बंदरों को खिला देते और कभी पकड़े जाने पर इतनी भोली मुस्कान देते कि शिकायत करने आई गोपियों का सारा क्रोध ही गायब हो जाता।
लेकिन उस दिन यशोदा मैया ने मन में ठान लिया था—
“आज मैं अपने कान्हा को माखन की मटकी के पास भी नहीं जाने दूँगी।”
उन्होंने सुबह-सुबह ही घर की सारी मटकियाँ सँभालकर रख दी थीं।
कुछ मटकियाँ ऊँची जगह पर रखीं।
कुछ को कपड़े से ढक दिया।
और एक बड़ी मटकी को उन्होंने अपने पास ही रख लिया।
उसमें ताजा दही जमा था और ऊपर मलाई की मोटी परत तैर रही थी।
कृष्ण की नजर उस मटकी पर पड़ते ही उनकी आँखों में चमक आ गई।
वे कुछ देर तक चुपचाप मटकी को देखते रहे।
फिर मैया की ओर देखा।
मैया अपने काम में व्यस्त थीं।
कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर मन ही मन कहा—
“आज तो इस मटकी का माखन मुझे ही खाना है।”
कान्हा की योजना
कृष्ण धीरे-धीरे अपने सखाओं के पास पहुँचे।
श्रीदामा और सुभल पहले से ही आँगन के बाहर खेल रहे थे।
कृष्ण ने उन्हें इशारे से बुलाया।
“इधर आओ।”
श्रीदामा ने पूछा,
“क्या हुआ कान्हा?”
कृष्ण ने धीरे से कहा,
“आज एक बहुत जरूरी काम है।”
सुभल ने आँखें बड़ी करके पूछा,
“कैसा काम?”
कृष्ण ने मटकी की ओर इशारा किया।
“वह देख रहे हो?”
दोनों ने मटकी की ओर देखा।
श्रीदामा तुरंत समझ गया।
“माखन?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
सुभल बोला,
“लेकिन कान्हा, यशोदा मैया तो यहीं हैं।”
कृष्ण ने कहा,
“इसीलिए तो योजना बनानी पड़ेगी।”
तीनों कुछ देर सोचने लगे।
फिर कृष्ण ने धीरे से कहा,
“पहले तुम दोनों मैया का ध्यान दूसरी ओर लगाओ।”
श्रीदामा बोला,
“और तुम?”
कृष्ण ने मटकी की ओर देखते हुए कहा,
“मैं अपना काम करूँगा।”
दोनों सखा हँस पड़े।
मैया का ध्यान भटकाना
श्रीदामा और सुभल यशोदा मैया के पास पहुँचे।
श्रीदामा ने कहा,
“मैया!”
यशोदा मैया ने मुस्कुराकर पूछा,
“क्या हुआ बेटा?”
“हमने बाहर एक बहुत सुंदर बछड़ा देखा है।”
सुभल तुरंत बोला,
“मैया, वह तो कान्हा के पीछे-पीछे आ रहा है।”
यशोदा मैया ने बाहर देखने के लिए अपना ध्यान दूसरी ओर किया।
बस!
यही तो कृष्ण चाहते थे।
उन्होंने तुरंत मटकी के पास जाकर उसे देखा।
मटकी काफी भारी थी।
कृष्ण ने पहले उसे उठाने की कोशिश की।
लेकिन वे अभी छोटे थे।
मटकी हिली तक नहीं।
उन्होंने चारों ओर देखा।
फिर पास पड़ी एक छोटी-सी लकड़ी की चौकी को खींचकर मटकी के नीचे रखा।
उसके ऊपर चढ़े।
फिर भी मटकी तक हाथ पूरी तरह नहीं पहुँच रहा था।
कृष्ण ने अपनी एड़ी पर खड़े होकर हाथ ऊपर किया।
उँगलियाँ मटकी के किनारे तक पहुँचीं।
उन्होंने उसे थोड़ा अपनी ओर खींचा।
मटकी हल्के से हिली।
कृष्ण के चेहरे पर खुशी छा गई।
उन्होंने दोनों हाथों से उसे पकड़ लिया।
लेकिन तभी—
छन्न!
मटकी थोड़ा और झुकी।
कृष्ण ने उसे संभालने की कोशिश की।
लेकिन मटकी भारी थी।
और फिर—
धड़ाम!
मटकी नीचे गिर पड़ी।
मटकी टूट गई।
दही और माखन आँगन में फैल गया।
कुछ क्षणों के लिए पूरा आँगन शांत हो गया।
कृष्ण वहीं खड़े रहे।
उनकी आँखें टूटे हुए बर्तन पर थीं।
फिर उन्होंने अपने हाथों को देखा।
फिर आँगन में फैले माखन को।
उनके चेहरे पर पहले थोड़ी चिंता आई।
लेकिन अगले ही क्षण उनके होंठों पर शरारती मुस्कान लौट आई।
उन्होंने धीरे से कहा,
“अब माखन छिपेगा कहाँ?”
सखाओं की हँसी
श्रीदामा और सुभल दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे।
उन्होंने टूटी मटकी देखी तो दोनों हँसने लगे।
श्रीदामा बोला,
“कान्हा! आज तो मैया तुम्हें जरूर डाँटेंगी।”
कृष्ण ने कहा,
“डाँटेंगी तो डाँटेंगी। पहले माखन खा लेते हैं।”
सुभल ने पूछा,
“इतना सारा?”
कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा,
“हमारे लिए, तुम्हारे लिए और बंदरों के लिए भी।”
तीनों बालक माखन खाने लगे।
कुछ माखन हाथों में।
कुछ मुँह पर।
कुछ कपड़ों पर।
कृष्ण ने थोड़ा माखन उठाकर श्रीदामा के गाल पर लगा दिया।
श्रीदामा ने भी बदले में कृष्ण के गाल पर माखन लगा दिया।
अब दोनों एक-दूसरे को देखकर हँसने लगे।
कृष्ण की हँसी पूरे आँगन में गूँजने लगी।
लेकिन उन्हें पता नहीं था कि उनकी यह हँसी अब ज्यादा देर तक छिपी नहीं रहने वाली थी।
यशोदा मैया ने देखा दृश्य
यशोदा मैया वापस आँगन में आईं।
उन्होंने देखा—
मटकी टूटी हुई।
दही पूरे फर्श पर फैला हुआ।
माखन इधर-उधर बिखरा हुआ।
और बीच में उनका कान्हा!
कृष्ण के गाल पर माखन लगा था।
हाथ माखन से सने थे।
और वे अपने सखाओं के साथ खिलखिलाकर हँस रहे थे।
यशोदा मैया कुछ क्षणों तक उन्हें देखती रहीं।
फिर उन्होंने थोड़ा कठोर स्वर बनाया।
“कान्हा!”
कृष्ण की हँसी अचानक रुक गई।
उन्होंने धीरे से मैया की ओर देखा।
मैया के चेहरे पर हल्का-सा क्रोध था।
कृष्ण समझ गए—
अब मुसीबत आ गई है।
वे धीरे-धीरे पीछे हटने लगे।
यशोदा मैया बोलीं,
“रुको!”
कृष्ण रुक गए।
“यह मटकी किसने तोड़ी?”
कृष्ण ने नीचे देखा।
फिर धीरे से बोले,
“मैया…”
“हाँ?”
“मटकी स्वयं गिर गई।”
यशोदा मैया ने आश्चर्य से पूछा,
“स्वयं?”
कृष्ण ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“तो चौकी किसने रखी?”
कृष्ण चुप।
“उसके ऊपर कौन चढ़ा था?”
कृष्ण चुप।
“और माखन किसने खाया?”
कृष्ण ने धीरे से कहा,
“बंदरों ने।”
यशोदा मैया ने उनकी ओर देखा।
फिर उनके मुँह पर लगा माखन देखा।
उनके हाथों पर लगा माखन देखा।
और फिर मुस्कुराकर बोलीं,
“अच्छा! तो बंदर तुम्हारे मुँह में माखन लगा गए?”
कृष्ण समझ गए कि अब कोई बहाना काम नहीं करेगा।
वे धीरे-धीरे पीछे हटे।
यशोदा मैया ने कहा,
“कान्हा, आज तुम बच नहीं सकते।”
कृष्ण ने एक पल मैया को देखा।
फिर अचानक—
दौड़ पड़े!
शुरू हुई कान्हा की दौड़
कृष्ण आँगन से बाहर भागे।
यशोदा मैया भी उनके पीछे दौड़ीं।
“कान्हा! रुको!”
कृष्ण हँसते हुए बोले,
“मैया, पकड़ लो!”
यशोदा मैया ने कहा,
“आज तो पकड़कर ही रहूँगी!”
कृष्ण कभी दाएँ भागते, कभी बाएँ।
कभी किसी खंभे के पीछे छिप जाते।
फिर अचानक दूसरी ओर निकल जाते।
यशोदा मैया उन्हें पकड़ने की कोशिश करतीं, लेकिन कृष्ण उनकी पकड़ से निकल जाते।
गोकुल की कुछ गोपियाँ यह दृश्य देख रही थीं।
वे मुस्कुराने लगीं।
एक गोपी ने दूसरी से कहा,
“देखो, आज यशोदा मैया के हाथ भी कान्हा नहीं आ रहे।”
दूसरी बोली,
“हमने तो पहले ही कहा था, तुम्हारा कान्हा बहुत नटखट है।”
तीसरी हँसते हुए बोली,
“आज मटकी भी टूट गई और मैया का धैर्य भी।”
यशोदा मैया ने उनकी बात सुन ली।
उन्होंने कहा,
“आप लोग हँसिए मत! अगर पकड़ में आ गया तो आज इसकी सारी शरारत निकाल दूँगी।”
लेकिन कृष्ण यह सुनते ही और तेज भागने लगे।
नंदलाल की मुस्कान
कृष्ण की पायल छन-छन करती हुई बज रही थी।
उनके घुँघराले बाल हवा में उड़ रहे थे।
माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें चमक रही थीं।
लेकिन चेहरे पर वही प्यारी मुस्कान थी।
यशोदा मैया ने आखिर उन्हें एक कोने में घेर लिया।
कृष्ण ने पीछे देखा।
एक ओर दीवार।
दूसरी ओर मैया।
अब भागने का रास्ता नहीं था।
यशोदा मैया धीरे-धीरे उनके पास आईं।
कृष्ण ने हाथ जोड़ लिए।
“मैया…”
“क्या?”
“अब नहीं करूँगा।”
“क्या नहीं करोगे?”
कृष्ण ने थोड़ा सोचकर कहा,
“मटकी नहीं तोड़ूँगा।”
यशोदा मैया ने पूछा,
“माखन चुराओगे?”
कृष्ण चुप।
मैया ने कहा,
“बोलो!”
कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,
“अगर आप अपने हाथ से खिलाएँगी तो नहीं चुराऊँगा।”
यशोदा मैया के चेहरे का कठोर भाव फिर पिघल गया।
उन्होंने कृष्ण को अपनी बाँहों में भर लिया।
उनके गाल पर हाथ फेरा।
“तुम मुझे बहुत परेशान करते हो, कान्हा।”
कृष्ण ने मैया के गले से लगकर कहा,
“लेकिन मैया, आप मुझे प्यार भी तो बहुत करती हो।”
यशोदा मैया की आँखें भर आईं।
उन्होंने कृष्ण को चूम लिया।
“हाँ बेटा… बहुत प्यार करती हूँ।”
गोपियों की हँसी
इतने में कुछ गोपियाँ वहाँ पहुँच गईं।
एक गोपी बोली,
“मैया, आज तो आपका कान्हा सचमुच पकड़ा गया।”
दूसरी बोली,
“और माखन भी गया, मटकी भी गई।”
तीसरी ने हँसते हुए कहा,
“अब देखना, कल फिर किसी के घर यही लीला होगी।”
कृष्ण ने उनकी बात सुन ली।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
“मैंने कहा न, अब माखन नहीं चुराऊँगा।”
गोपियाँ बोलीं,
“सच?”
कृष्ण ने सिर हिलाया।
फिर धीरे से बोले,
“लेकिन अगर आप लोग स्वयं बुलाएँगी तो?”
सब गोपियाँ हँस पड़ीं।
यशोदा मैया भी मुस्कुरा उठीं।
गोकुल में फैल गया कान्हा का नाम
उस दिन के बाद कृष्ण की मटकी फोड़ने वाली शरारत पूरे गोकुल में प्रसिद्ध हो गई।
अब जब भी किसी घर में मटकी थोड़ी ऊँचाई पर रखी जाती, गोपी मुस्कुराकर कहती—
“कहीं कान्हा आ न जाए।”
कोई माखन छिपाता।
कोई मटकी बाँधकर रखता।
कोई दरवाजा बंद कर देता।
लेकिन मन में सबकी यही इच्छा रहती—
काश! कान्हा हमारे घर भी आए।
क्योंकि कान्हा की शरारतों में भी प्रेम था।
उनकी चोरी में भी अपनापन था।
उनकी हँसी में ऐसा जादू था कि जिसे एक बार सुन लिया, वह उसे बार-बार सुनना चाहता था।
गोकुल की गोपियाँ शिकायत तो करतीं, लेकिन जब कई दिनों तक कृष्ण उनके घर नहीं जाते, तो वे स्वयं कहने लगतीं—
“आजकल हमारा कान्हा हमारे घर क्यों नहीं आता?”
यही तो कृष्ण की बाल-लीला थी।
वे माखन नहीं चुराते थे।
वे तो अपने भक्तों के हृदय में बसे प्रेम को चुराते थे।
लेकिन यशोदा मैया ने कुछ और सोच लिया था…
उस शाम जब सब शांत हो गया, यशोदा मैया कृष्ण को अपने पास बैठाकर समझा रही थीं।
“कान्हा, तुम अब बड़े हो रहे हो। इतनी शरारत करना अच्छी बात नहीं है।”
कृष्ण मैया की ओर देखकर मुस्कुराते रहे।
“मैया, मैं तो छोटा हूँ।”
“अच्छा? सुबह इतनी बड़ी मटकी कौन तोड़ रहा था?”
कृष्ण चुप।
“गोपियों के घर माखन कौन चुराता है?”
कृष्ण फिर चुप।
“बंदरों को माखन कौन खिलाता है?”
कृष्ण ने धीरे से कहा,
“मैं।”
यशोदा मैया हँस पड़ीं।
उन्होंने कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया।
लेकिन उस दिन उनके मन में एक विचार आया।
उन्होंने सोचा—
“यह बालक बहुत नटखट हो गया है। इसे थोड़ा अनुशासन भी सिखाना होगा।”
उन्हें क्या पता था कि अगले दिन कृष्ण की एक और ऐसी शरारत सामने आने वाली है, जो आज की मटकी फोड़ने वाली लीला से भी अधिक अद्भुत होगी।
अगली सुबह यशोदा मैया घर के काम में व्यस्त थीं।
कृष्ण चुपचाप खेल रहे थे।
सब कुछ सामान्य लग रहा था।
लेकिन कुछ ही देर बाद घर से एक आवाज आई—
छनन्…!
फिर दूसरी आवाज—
धड़ाम!
यशोदा मैया ने चौंककर पीछे देखा।
उनकी आँखें बड़ी हो गईं।
“कान्हा!”
लेकिन इस बार कृष्ण केवल माखन की मटकी के पास नहीं थे।
उन्होंने कुछ ऐसा कर दिया था कि यशोदा मैया को उन्हें रोकने के लिए स्वयं उनके पीछे दौड़ना पड़ा।
और फिर…
एक माँ अपने नटखट लाल को पकड़ने के लिए दौड़ रही थी, जबकि पूरा गोकुल उस अद्भुत दृश्य को देखकर मुस्कुरा रहा था।
लेकिन क्या यशोदा मैया इस बार कृष्ण को पकड़ पाएँगी?
और यदि पकड़ लिया…
तो क्या होगा उस नन्हे माखनचोर का?
यही जानेंगे अगली कड़ी में।
भाग 8 — यशोदा मैया ने कृष्ण को बाँधा
जहाँ नटखट कान्हा की शरारत देखकर यशोदा मैया उन्हें पकड़ लेंगी और पहली बार उन्हें अनुशासन सिखाने का प्रयास करेंगी। लेकिन कृष्ण को बाँधने की उनकी कोशिश बार-बार क्यों असफल होगी?
आखिर उस नन्हे बालक को एक साधारण-सी रस्सी बाँध क्यों नहीं पाएगी?
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