(भाग 3 — शकटासुर का उद्धार)
गोकुल में श्रीकृष्ण के जन्म को कुछ समय बीत चुका था।
पूतना जैसी भयंकर राक्षसी का अंत होने के बाद भी गोकुलवासियों का जीवन पहले जैसा ही चलता रहा। किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि नंद बाबा का यह नन्हा-सा बालक बार-बार बड़े संकटों से कैसे बच जाता है।
परंतु यशोदा मैया के लिए तो उनका कन्हैया अभी भी वही नन्हा बालक था, जिसे हर समय अपनी आँखों के सामने रखने का मन करता था।
कृष्ण अब धीरे-धीरे बड़े होने लगे थे।
उनके हाथ-पैरों में पहले से अधिक चंचलता आ गई थी।
कभी वे अपनी छोटी-सी उँगली से यशोदा मैया की उँगली पकड़ लेते, तो कभी पैरों को हिलाते हुए खिलखिलाकर हँसने लगते।
उनकी मुस्कान देखते ही यशोदा मैया की सारी थकान दूर हो जाती।
एक दिन सुबह यशोदा मैया कृष्ण को गोद में लेकर आँगन में बैठी थीं।
कृष्ण बार-बार उनकी ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे।
यशोदा मैया ने उनके गालों को सहलाते हुए कहा—
“क्या हुआ मेरे लाला? आज बड़े प्रसन्न हो!”
कृष्ण ने कोई उत्तर नहीं दिया।
बस अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मैया को देखते रहे।
यशोदा हँस पड़ीं।
“अच्छा! अभी से इतना मुस्कुराते हो? लगता है कोई बड़ी शरारत सोच रहे हो।”
कृष्ण ने फिर मुस्कुरा दिया।
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गोकुल में उत्सव की तैयारी
कुछ समय बाद नंद बाबा के घर एक विशेष उत्सव मनाने की तैयारी होने लगी।
गोकुल में ऐसे अवसरों पर सभी गोप-गोपियाँ एकत्र होते थे।
घर को सजाया गया।
आँगन में सुंदर रंगोली बनाई गई।
गायों को नहलाकर उनके सींगों पर रंग लगाया गया।
उनके गले में नई घंटियाँ बाँधी गईं।
गोपियाँ अपने-अपने घरों से दही, माखन, दूध और मिठाइयाँ लेकर नंद भवन पहुँचने लगीं।
पूरा गोकुल जैसे एक परिवार बन गया था।
कहीं गीत गाए जा रहे थे।
कहीं ढोलक बज रही थी।
कहीं बच्चे खेल रहे थे।
और नंद भवन में तो विशेष चहल-पहल थी।
यशोदा मैया सुबह से ही काम में लगी थीं।
कभी रसोई में जातीं, कभी आँगन में आतीं, कभी मेहमानों का स्वागत करतीं।
लेकिन बार-बार उनकी दृष्टि अपने कन्हैया पर चली जाती।
“मेरा लाल कहाँ है?”
वह पूछतीं।
एक गोपी हँसकर कहती—
“अरी यशोदा! आज तो पूरे गोकुल की चिंता छोड़कर बस अपने लाला की चिंता कर रही हो।”
यशोदा मुस्कुराकर कहतीं—
“क्या करूँ? यह है ही ऐसा।”
दूसरी गोपी बोली—
“अभी छोटा है, थोड़ा बड़ा होने दो। फिर तुम्हें पता चलेगा इसकी शरारतों का।”
यशोदा ने हँसकर कहा—
“मेरा कन्हैया तो बहुत सीधा है।”
सभी गोपियाँ हँस पड़ीं।
किसी को क्या पता था कि यही “सीधा” बालक आगे चलकर पूरे गोकुल की मटकी चुराने वाला है!
—
वह पुरानी बैलगाड़ी
उत्सव के कारण नंद भवन के आँगन में बहुत-सा सामान रखा हुआ था।
दूध के मटके, दही के घड़े, मक्खन के पात्र और अन्य घरेलू वस्तुएँ एक बड़ी पुरानी बैलगाड़ी के ऊपर रखी थीं।
वह बैलगाड़ी बहुत भारी थी।
उसे आँगन के एक कोने में खड़ा कर दिया गया था।
यशोदा मैया ने सोचा कि कुछ समय के लिए कृष्ण को उसी गाड़ी के नीचे छाया में सुला दिया जाए।
उन्होंने कृष्ण को एक सुंदर वस्त्र पर लिटाया।
फिर उनके सिर के पास बैठकर बोलीं—
“लाला, मैं अभी आती हूँ। तुम यहीं सोना।”
कृष्ण ने अपनी आँखें खोलकर मैया की ओर देखा।
यशोदा ने उनके माथे को चूमा और काम में लग गईं।
आँगन में उत्सव का शोर बढ़ता जा रहा था।
कहीं कोई गीत गा रहा था।
कहीं बच्चे हँस रहे थे।
कहीं मटकी में दही मथा जा रहा था।
और उस सबके बीच नन्हा कृष्ण उस भारी बैलगाड़ी के नीचे लेटे हुए थे।
—
संकट की आहट
कहानी के अनुसार, कंस ने कृष्ण को समाप्त करने के लिए एक और राक्षस भेजा था।
उस राक्षस का नाम था—
शकटासुर।
वह मायावी राक्षस था।
उसने सोचा—
“पूतना असफल हो गई। अब मैं इस बालक को समाप्त करूँगा।”
शकटासुर ने अपनी मायावी शक्ति से उस भारी बैलगाड़ी में प्रवेश कर लिया।
अब वह बैलगाड़ी केवल लकड़ी और पहियों की गाड़ी नहीं थी।
उसमें एक भयंकर राक्षसी शक्ति समा चुकी थी।
शकटासुर मन ही मन प्रसन्न हुआ।
“यह बालक तो मेरे नीचे लेटा है। जैसे ही अवसर मिलेगा, मैं इस गाड़ी को इसके ऊपर गिरा दूँगा।”
लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वह जिस बालक के ऊपर अपनी शक्ति आजमाने आया है, उसके लिए पर्वत भी खिलौने के समान हैं।
—
कृष्ण को भूख लगी
कुछ समय बीता।
कृष्ण की आँख खुल गई।
उन्होंने इधर-उधर देखा।
मैया कहीं दिखाई नहीं दीं।
उन्होंने अपनी छोटी-सी मुट्ठी हिलाई।
फिर अपने पैरों को चलाया।
लेकिन मैया काम में व्यस्त थीं।
कृष्ण को भूख लगी।
उन्होंने धीरे-धीरे रोना शुरू किया।
पहले हल्की-सी आवाज निकली।
फिर रोना बढ़ गया।
आँगन में उपस्थित कुछ गोपियों ने कृष्ण की आवाज सुनी।
एक गोपी बोली—
“लगता है यशोदा का लाला जाग गया।”
दूसरी ने कहा—
“यशोदा तो अभी रसोई में हैं।”
तीसरी बोली—
“अरे, कोई जाकर देखो!”
लेकिन उत्सव की भीड़ और शोर के कारण किसी का ध्यान ठीक से कृष्ण की ओर नहीं गया।
कृष्ण अब और जोर से रोने लगे।
उन्होंने अपने छोटे-छोटे पैर चलाने शुरू किए।
एक बार उन्होंने अपना पैर ऊपर उठाया।
फिर नीचे किया।
और फिर—
उनका नन्हा-सा पैर उस भारी बैलगाड़ी से जा लगा।
अगले ही क्षण जो हुआ, उसे देखकर सभी के होश उड़ गए।
—
भारी गाड़ी का पलटना
एक भयंकर आवाज हुई—
धड़ाम!
वह विशाल और भारी बैलगाड़ी उलट गई।
उस पर रखे सारे मटके और घड़े टूटकर चारों ओर बिखर गए।
दही और दूध आँगन में फैल गया।
लकड़ी के पहिए एक ओर जा गिरे।
बर्तन टूटने की आवाज सुनकर पूरा गोकुल दौड़ पड़ा।
गोपियाँ चिल्लाईं—
“अरे! यह क्या हो गया?”
“गाड़ी कैसे पलट गई?”
“कहीं बालक कृष्ण को तो कुछ नहीं हुआ?”
यशोदा मैया ने जैसे ही आवाज सुनी, उनके हाथ-पैर काँपने लगे।
वह सब काम छोड़कर दौड़ती हुई आईं।
“मेरा लाल!”
उनकी आँखें सीधे कृष्ण को खोजने लगीं।
उन्होंने देखा—
कृष्ण बिल्कुल सुरक्षित थे।
वह वहीं लेटे हुए थे और अपने छोटे-छोटे हाथ-पैर हिला रहे थे।
यशोदा मैया ने तुरंत उन्हें उठाकर अपनी गोद में भर लिया।
“मेरे लाल! तुझे कुछ तो नहीं हुआ?”
वह कृष्ण के हाथ-पैर देखने लगीं।
उनके माथे को चूमा।
फिर उन्हें अपने सीने से लगा लिया।
उनकी आँखों से आँसू निकल आए।
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गोकुलवासियों का आश्चर्य
गोप और गोपियाँ उस उलटी हुई गाड़ी को देखकर हैरान थे।
एक गोप बोला—
“यह गाड़ी इतनी भारी थी। इसे तो चार-पाँच आदमी मिलकर भी मुश्किल से हिला पाते हैं।”
दूसरा बोला—
“फिर यह अपने आप कैसे उलट गई?”
तीसरा बोला—
“क्या किसी ने इसे धक्का दिया था?”
एक बालक बोला—
“मैंने देखा था! कन्हैया ने पैर मारा था।”
सभी उसकी ओर देखने लगे।
एक गोपी हँसकर बोली—
“अरे पगले! इतने-से पैर में इतनी शक्ति कहाँ से आएगी?”
बालक बोला—
“मैंने सच में देखा था!”
दूसरे बच्चे भी कहने लगे—
“हाँ! कन्हैया ने पैर मारा था।”
गोपियाँ हँसने लगीं।
उन्हें लगा कि बच्चे अपने प्रिय मित्र की प्रशंसा कर रहे हैं।
किसी ने कल्पना भी नहीं की कि सचमुच उस गाड़ी को नन्हे कृष्ण ने ही पलटा था।
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शकटासुर का अंत
वास्तव में उस गाड़ी के भीतर छिपा शकटासुर भगवान कृष्ण के चरण-स्पर्श से नष्ट हो चुका था।
जिस शक्ति के भरोसे वह आया था, वही शक्ति उसके लिए विनाश का कारण बन गई।
भगवान ने न तो कोई अस्त्र उठाया।
न कोई युद्ध किया।
न कोई बड़ी शक्ति दिखाई।
उन्होंने केवल अपने नन्हे-से पैर को थोड़ा-सा हिलाया।
और राक्षस का अंत हो गया।
यही तो कृष्ण की बाल-लीला थी।
जो कार्य साधारण मनुष्य के लिए असंभव था, वह उनके लिए खेल मात्र था।
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यशोदा मैया की चिंता
लेकिन यशोदा मैया को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं था।
उनके लिए बस इतना महत्वपूर्ण था कि उनका लाल सुरक्षित रहे।
वह कृष्ण को गोद में लेकर बोलीं—
“तू वहाँ अकेला क्यों लेटा था?”
कृष्ण उन्हें देखते रहे।
यशोदा ने कहा—
“मैंने कहा था न, मैया अभी आती है!”
कृष्ण ने अपनी आँखें झपकाईं।
यशोदा का हृदय पिघल गया।
उन्होंने कहा—
“अच्छा, अब रोना मत।”
और फिर उन्हें अपने आँचल से ढक लिया।
गोपियाँ यह दृश्य देखकर मुस्कुराने लगीं।
एक गोपी बोली—
“यशोदा, तुम्हारा लाल तो बहुत भाग्यशाली है। उसे ऐसी माँ मिली है जो उसे पलभर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती।”
यशोदा ने मुस्कुराकर कृष्ण को और कसकर पकड़ लिया।
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नंद बाबा को समाचार मिला
जब नंद बाबा को इस घटना के बारे में पता चला, तो वे भी तुरंत वहाँ पहुँचे।
उन्होंने उलटी हुई बैलगाड़ी देखी।
टूटे हुए मटके देखे।
फिर अपने बालक को देखा।
नंद बाबा कुछ क्षण तक कुछ बोल ही नहीं पाए।
उन्होंने कृष्ण को गोद में लिया।
“कन्हैया!”
उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया।
फिर बोले—
“आज तो भगवान ने मेरे लाल की रक्षा कर दी।”
नंद बाबा को क्या पता था कि भगवान स्वयं उनके हाथों में हैं।
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ब्रज के बुजुर्गों की चर्चा
गोकुल के कुछ वृद्ध लोग वहाँ एकत्र हुए।
उन्होंने घटना को ध्यान से देखा।
एक वृद्ध बोले—
“यह कोई साधारण घटना नहीं है।”
दूसरे ने कहा—
“बच्चों की बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए, लेकिन इतनी भारी गाड़ी का अपने आप उलटना भी तो संभव नहीं।”
तीसरे ने कहा—
“हो सकता है इसमें कोई अदृश्य शक्ति हो।”
एक अन्य वृद्ध बोले—
“हमें अपने बालक की रक्षा के लिए भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए।”
सभी ने मिलकर भगवान का नाम लिया।
लेकिन कृष्ण अपनी माँ की गोद में आराम से मुस्कुरा रहे थे।
मानो उन्हें सब पता हो।
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नंदलाल की नटखट मुस्कान
उस शाम यशोदा मैया कृष्ण को अपने घर के भीतर लेकर आईं।
उन्होंने उन्हें एक सुंदर शैया पर लिटाया।
कृष्ण ने मैया की ओर देखा और मुस्कुराने लगे।
यशोदा ने कहा—
“क्या बात है? आज बड़ी खुशी हो रही है?”
कृष्ण ने पैर हिलाया।
यशोदा बोलीं—
“अच्छा! आज गाड़ी भी तुमने ही पलटाई थी क्या?”
कृष्ण फिर मुस्कुराए।
यशोदा हँस पड़ीं।
“अरे! तू तो बड़ा शरारती निकलेगा।”
कृष्ण ने जैसे अपनी आँखों से उत्तर दिया—
“मैया, अभी तो शुरुआत है।”
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इस लीला का रहस्य
शकटासुर की कथा में एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी माना जाता है।
वह भारी बैलगाड़ी जैसे हमारे जीवन के उन बोझों का प्रतीक मानी जा सकती है, जिन्हें हम अपने मन में ढोते रहते हैं।
अहंकार।
भय।
लोभ।
क्रोध।
पुरानी चिंताएँ।
और अनेक प्रकार के मानसिक बोझ।
जब मनुष्य भगवान का स्मरण करता है, तो उसके भीतर ऐसी शक्ति आती है जो बड़े से बड़े बोझ को भी दूर करने का सामर्थ्य देती है।
श्रीकृष्ण ने इस लीला में यह दिखाया कि भगवान के लिए कोई संकट बड़ा नहीं होता।
और सबसे सुंदर बात यह थी कि उन्होंने यह लीला किसी बड़े योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक छोटे-से बालक के रूप में की।
यही कृष्ण की बाल-लीलाओं की विशेषता है।
वे कभी रोते हैं।
कभी हँसते हैं।
कभी खेलते हैं।
कभी शरारत करते हैं।
और आवश्यकता पड़ने पर संसार की रक्षा भी कर देते हैं।
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गोकुल में फिर लौटी खुशी
घटना के बाद गोकुलवासियों ने भगवान का धन्यवाद किया।
टूटे हुए मटकों को हटाया गया।
आँगन साफ किया गया।
गायों को फिर से बाँधा गया।
बच्चे थोड़ी देर तक उस घटना की चर्चा करते रहे।
एक बालक दूसरे से कह रहा था—
“मैंने तो पहले ही कहा था, कन्हैया ने पैर मारा था।”
दूसरा बोला—
“हाँ, लेकिन कोई हमारी बात मानता ही नहीं।”
दोनों हँस पड़े।
उधर कृष्ण यशोदा मैया की गोद में आराम से सो चुके थे।
उनके मुख पर हल्की-सी मुस्कान थी।
यशोदा मैया उन्हें देखती रहीं।
उन्होंने धीरे से कहा—
“मेरे लाला, तू हमेशा ऐसे ही हँसता रहना।”
बाहर रात उतरने लगी।
आकाश में तारे चमकने लगे।
यमुना जी की धारा शांत होकर बह रही थी।
गोकुल में सब लोग सोने लगे।
लेकिन भगवान की लीला कहाँ रुकने वाली थी?
जिस बालक ने अभी अपने पैर से एक भारी गाड़ी पलट दी थी, वह शीघ्र ही ऐसी लीला करने वाला था जिसमें एक भयंकर बवंडर पूरे गोकुल को अपनी चपेट में ले लेगा।
लोग भय से काँप उठेंगे।
यशोदा मैया अपने लाल को खोजती हुई व्याकुल हो जाएँगी।
और तब गोकुलवासियों को एक बार फिर अनुभव होगा कि उनका नन्हा कन्हैया कोई साधारण बालक नहीं है।
क्योंकि अगली लीला में आने वाला था—
तृणावर्त।
एक ऐसा राक्षस, जो स्वयं बवंडर का रूप धारण करके नंदलाल को आकाश में ले जाएगा।
लेकिन वह नहीं जानता था कि जिसे वह आकाश में ले जा रहा है, वही संपूर्ण आकाश का स्वामी है।
क्रमशः…
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