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सुदामा का संघर्ष और कृष्ण की याद

पढ़ने का समय : 9 मिनट

 

अध्याय 6 — सुदामा का संघर्ष और कृष्ण की याद

 

गुरुकुल से विदा हुए कई वर्ष बीत चुके थे।

 

समय ने कृष्ण और सुदामा दोनों के जीवन को अलग-अलग दिशाओं में पहुँचा दिया था। बचपन में जो दो मित्र एक ही पेड़ के नीचे बैठकर भोजन बाँटते थे, आज उनके जीवन की परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग थीं।

 

सुदामा अपने गाँव में ही रहने लगा था।

 

उसने अपने गुरुकुल की शिक्षा को कभी भुलाया नहीं। वह बच्चों को पढ़ाता, लोगों को अच्छी बातें समझाता और जो कुछ जानता था, उसे दूसरों के साथ बाँट देता था। गाँव के लोग उसका सम्मान करते थे, क्योंकि सुदामा का मन बहुत साफ था।

 

लेकिन सम्मान से घर का चूल्हा नहीं जलता।

 

समय बीतने के साथ सुदामा का जीवन कठिन होता चला गया।

 

उसके पास धन नहीं था।

 

एक छोटा सा घर था, जिसकी छत बरसात में कई जगह से टपकती थी। घर में जरूरत की चीजें भी बहुत कम थीं। फिर भी सुदामा ने कभी किसी से शिकायत नहीं की।

 

वह अक्सर कहता था,

 

“जिसके पास संतोष है, वह कभी पूरी तरह गरीब नहीं होता।”

 

लेकिन जीवन की कठिनाइयाँ केवल संतोष से हमेशा आसान नहीं होतीं।

 

धीरे-धीरे सुदामा का परिवार बढ़ा। घर की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ने लगीं। अब केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के लिए भी सोचना पड़ता था।

 

एक दिन सुदामा की पत्नी ने घर में रखे मिट्टी के बर्तनों को देखा।

 

एक बर्तन लगभग खाली था।

 

दूसरे में बस थोड़े से अनाज के दाने बचे थे।

 

वह कुछ देर तक चुप रही।

 

सुदामा घर के बाहर बैठा था और बच्चों को कुछ पढ़ा रहा था।

 

बच्चे चले गए तो वह अंदर आया।

 

पत्नी ने उसे देखा और पूछा,

 

“आज बच्चों को क्या पढ़ा रहे थे?”

 

सुदामा मुस्कुराया।

 

“सच्चाई और धैर्य के बारे में।”

 

पत्नी ने धीमी आवाज में कहा,

 

“और क्या धैर्य से भूख भी शांत हो जाती है?”

 

सुदामा का चेहरा शांत हो गया।

 

वह समझ गया कि उसकी पत्नी क्या कहना चाहती है।

 

कुछ क्षणों तक घर में चुप्पी रही।

 

फिर सुदामा ने कहा,

 

“मैं जानता हूँ कि हमारे दिन कठिन चल रहे हैं।”

 

पत्नी ने तुरंत कहा,

 

“मैं आपसे शिकायत नहीं कर रही।”

 

सुदामा ने उसकी ओर देखा।

 

“तो फिर तुम्हारी आँखों में चिंता क्यों है?”

 

पत्नी की आँखें भर आईं।

 

“क्योंकि मैं आपको परेशान देखती हूँ।”

 

सुदामा कुछ कह नहीं पाया।

 

वह जानता था कि उसके पास अपनी पत्नी को देने के लिए बहुत कम था।

 

फिर भी वह हर दिन कोशिश करता था कि उसके चेहरे पर निराशा न दिखाई दे।

 

पत्नी ने धीरे से कहा,

 

“आपके गुरुकुल के मित्र कृष्ण…”

 

सुदामा अचानक शांत हो गया।

 

कृष्ण का नाम सुनते ही जैसे उसके सामने वर्षों पुरानी यादें आ गईं।

 

गुरुकुल का आँगन।

 

पेड़ों के नीचे बैठा कृष्ण।

 

उनकी मुस्कान।

 

जंगल की बारिश।

 

दोनों का साथ भोजन बाँटना।

 

विदाई के समय कृष्ण का कहना—

 

“अगर तुम्हें कभी लगे कि तुम अकेले हो, तो यह मत सोचना कि मैं बहुत दूर हूँ।”

 

सुदामा की आँखें नम हो गईं।

 

उसकी पत्नी ने पूछा,

 

“आप उन्हें याद करते हैं?”

 

सुदामा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

 

“हर सच्चे मित्र को उसका मित्र याद रहता है।”

 

पत्नी ने धीरे से कहा,

 

“तो फिर आप उनसे मिलने क्यों नहीं जाते?”

 

सुदामा ने तुरंत उसकी ओर देखा।

 

“कृष्ण से?”

 

पत्नी ने सिर हिला दिया।

 

“हाँ।”

 

सुदामा कुछ क्षण तक चुप रहा।

 

फिर बोला,

 

“इतने वर्षों बाद?”

 

“तो क्या हुआ?”

 

“उनका जीवन अब बहुत अलग होगा।”

 

पत्नी ने पूछा,

 

“क्या मित्रता परिस्थितियाँ देखकर बदल जाती है?”

 

सुदामा के पास इस प्रश्न का उत्तर था।

 

लेकिन वह बोल नहीं पाया।

 

पत्नी आगे बोली,

 

“आपने मुझे कितनी बार बताया है कि आपके मित्र कृष्ण आपको अपने बराबर मानते थे। फिर आज आप उनके पास जाने से क्यों डर रहे हैं?”

 

सुदामा ने कहा,

 

“मैं उनसे कुछ माँगने नहीं जा सकता।”

 

पत्नी ने शांत स्वर में कहा,

 

“किसने कहा कि आपको कुछ माँगना है?”

 

“लेकिन अगर मैं इस समय उनके पास जाऊँगा, तो उन्हें लगेगा कि मैं किसी जरूरत के कारण आया हूँ।”

 

पत्नी ने कहा,

 

“तो क्या जरूरत के समय अपने मित्र से मिलना गलत है?”

 

सुदामा ने सिर झुका लिया।

 

उसे कृष्ण से मिलने की इच्छा तो हमेशा से थी।

 

लेकिन वर्षों की दूरी ने उसके मन में संकोच भर दिया था।

 

वह सोचने लगा—

 

क्या कृष्ण मुझे पहचानेंगे?

 

क्या वे वैसे ही मुस्कुराएँगे?

 

क्या वे मुझे देखकर खुश होंगे?

 

फिर उसके मन में एक और विचार आया।

 

अगर मैं उनके सामने अपने साधारण वस्त्रों में खड़ा हुआ तो?

 

यह सोचकर सुदामा स्वयं को ही समझाने लगा।

 

“कृष्ण मेरे मित्र हैं। वह मुझे कभी धन या वस्त्रों से नहीं आँकेंगे।”

 

लेकिन फिर भी उसका मन उसे रोक रहा था।

 

उस रात सुदामा देर तक सो नहीं सका।

 

वह घर के बाहर बैठा आसमान की ओर देख रहा था।

 

उसे याद आया कि गुरुकुल में भी वह और कृष्ण कई रातों में इसी तरह तारों को देखते थे।

 

उसने धीरे से कहा,

 

“कृष्ण… क्या तुम्हें भी कभी मेरी याद आती होगी?”

 

हवा हल्के से चली।

 

सुदामा के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गई।

 

उसे लगा जैसे वर्षों की दूरी अचानक कम हो गई हो।

 

अगले दिन भी जीवन वैसे ही चलता रहा।

 

सुदामा सुबह उठा।

 

कुछ बच्चों को पढ़ाया।

 

फिर गाँव के एक वृद्ध व्यक्ति की सहायता की।

 

शाम को घर लौटा।

 

लेकिन घर का वातावरण देखकर उसका मन भारी हो गया।

 

उसकी पत्नी चुप बैठी थी।

 

बच्चे भी शांत थे।

 

सुदामा ने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

पत्नी ने धीरे से कहा,

 

“आज घर में जो थोड़ा सा अनाज था, वह भी समाप्त हो गया।”

 

सुदामा के कदम रुक गए।

 

उसने चारों ओर देखा।

 

घर में सचमुच बहुत कम चीजें बची थीं।

 

उस क्षण उसके मन में दुख आया।

 

अपने लिए नहीं।

 

अपने परिवार के लिए।

 

वह बाहर जाकर बैठ गया।

 

उसकी पत्नी उसके पास आई।

 

“आप चिंता मत कीजिए।”

 

सुदामा ने कहा,

 

“कैसे न करूँ?”

 

पत्नी ने पहली बार उसके सामने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी।

 

“कृष्ण से मिलने जाइए।”

 

सुदामा ने सिर हिलाया।

 

“मैं उनके पास सहायता माँगने नहीं जाऊँगा।”

 

पत्नी ने कहा,

 

“तो सहायता मत माँगिए। बस अपने मित्र से मिल आइए।”

 

सुदामा ने उसकी ओर देखा।

 

पत्नी बोली,

 

“क्या मित्र से मिलने के लिए कोई कारण चाहिए?”

 

यह बात सुदामा के हृदय में उतर गई।

 

सच ही तो था।

 

वह कृष्ण के पास धन माँगने नहीं जाना चाहता था।

 

उसे बस अपने मित्र से मिलना था।

 

उसे देखना था।

 

उनसे बातें करनी थीं।

 

वर्षों से मन में जमा बातें कहनी थीं।

 

सुदामा ने धीरे से कहा,

 

“लेकिन मैं उनके पास खाली हाथ कैसे जाऊँ?”

 

पत्नी ने कुछ क्षण सोचा।

 

फिर वह घर के अंदर गई।

 

वहाँ उसने बहुत खोजा।

 

कुछ देर बाद वह एक छोटी सी पोटली लेकर आई।

 

उसमें थोड़ा सा चिवड़ा था।

 

बहुत साधारण।

 

बहुत कम।

 

लेकिन उसके पास देने के लिए वही सबसे कीमती चीज थी।

 

पत्नी ने पोटली सुदामा की ओर बढ़ाई।

 

“इसे अपने मित्र के लिए ले जाइए।”

 

सुदामा ने पोटली को देखा।

 

उसकी आँखें भर आईं।

 

उसे गुरुकुल का समय याद आ गया।

 

जब वह और कृष्ण थोड़े से दाने भी बाँटकर खा लेते थे।

 

उसने पोटली अपने हाथों में ली।

 

“यह बहुत कम है।”

 

पत्नी मुस्कुराई।

 

“प्रेम में दिया गया थोड़ा भी बहुत होता है।”

 

सुदामा के मन में जैसे कोई पुरानी आवाज गूँज उठी।

 

“जो चीज प्रेम से बाँटी जाए, वह कभी कम नहीं होती।”

 

यह बात कृष्ण ने उससे वर्षों पहले कही थी।

 

सुदामा ने पोटली को अपने सीने से लगा लिया।

 

अब उसका मन दृढ़ होने लगा था।

 

उसने पत्नी से कहा,

 

“मैं जाऊँगा।”

 

पत्नी के चेहरे पर हल्की खुशी आ गई।

 

“सच?”

 

“हाँ। मैं कृष्ण से मिलने जाऊँगा।”

 

पत्नी ने कहा,

 

“और उनसे कहना कि उनका एक पुराना मित्र उन्हें कभी नहीं भूला।”

 

सुदामा मुस्कुराया।

 

“मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि अगर उनकी मित्रता सच्ची है, तो शायद उन्हें पहले से पता होगा।”

 

पत्नी ने उसे यात्रा के लिए तैयार होने में सहायता की।

 

सुदामा के पास पहनने के लिए साधारण वस्त्र थे।

 

उसने अपनी छोटी सी पोटली संभालकर रखी।

 

सुबह होते ही उसने अपने परिवार को देखा।

 

बच्चों के सिर पर हाथ रखा।

 

पत्नी ने उसके चरण छुए और कहा,

 

“जल्दी लौट आइए।”

 

सुदामा ने कहा,

 

“मैं लौटूँगा।”

 

फिर वह कुछ क्षण रुका।

 

“लेकिन शायद पहले से अलग होकर।”

 

पत्नी ने पूछा,

 

“क्यों?”

 

सुदामा मुस्कुराया।

 

“क्योंकि इतने वर्षों बाद मैं अपने बचपन के मित्र से मिलने जा रहा हूँ।”

 

उसके कदमों में एक अलग ही उत्साह था।

 

रास्ता लंबा था।

 

लेकिन इस बार सुदामा को यात्रा की कठिनाई महसूस नहीं हो रही थी।

 

उसके मन में बस एक ही बात थी—

 

कृष्ण।

 

वह चलते-चलते पुराने दिनों को याद करता रहा।

 

उसे याद आया कि कृष्ण कैसे हर कठिन परिस्थिति में मुस्कुरा देते थे।

 

कैसे वे उसकी चिंता को हल्का कर देते थे।

 

कैसे उन्होंने कहा था—

 

“अगर यादें कम पड़ जाएँ, तो मुझे ढूँढने आ जाना।”

 

सुदामा ने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा।

 

“कृष्ण, मैं तुम्हें ढूँढने आ रहा हूँ।”

 

लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वर्षों में कृष्ण का जीवन कितना बदल चुका है।

 

जिस मित्र के साथ वह कभी जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करता था…

 

जिसके साथ वह एक पेड़ के नीचे बैठकर भोजन बाँटता था…

 

आज वही कृष्ण एक महान राजा के रूप में द्वारका में रहते थे।

 

सुदामा को नहीं पता था कि द्वारका कैसी होगी।

 

वहाँ पहुँचने पर उसके साथ कैसा व्यवहार होगा।

 

क्या महल के द्वारपाल उसे अंदर जाने देंगे?

 

क्या कोई उसकी बात पर विश्वास करेगा कि वह स्वयं श्री कृष्ण का बचपन का मित्र है?

 

उसके मन में हल्की चिंता फिर जागी।

 

लेकिन उसने अपने कपड़ों के भीतर रखी चिवड़े की छोटी सी पोटली को छुआ।

 

उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

 

“मैं राजा से मिलने नहीं जा रहा,” उसने मन ही मन कहा।

 

“मैं अपने मित्र कृष्ण से मिलने जा रहा हूँ।”

 

और इसी विश्वास के साथ…

 

सुदामा ने द्वारका की ओर अपनी यात्रा जारी रखी।

 

लेकिन उसके सामने अभी एक लंबा रास्ता था।

 

एक ऐसा रास्ता, जहाँ हर कदम के साथ उसके मन में कृष्ण से मिलने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।

 

उधर…

 

बहुत दूर द्वारका में…

 

कृष्ण अपने राजकार्य में व्यस्त थे।

 

लेकिन कौन जानता था कि वर्षों पहले गुरुकुल में उनके साथ बैठकर भोजन बाँटने वाला उनका प्रिय मित्र…

 

अब उनसे मिलने के लिए चल पड़ा है।

 

और बहुत जल्द…

 

दो पुराने मित्रों के बीच वर्षों की दूरी समाप्त होने वाली थी।

 

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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