रक्षाबंधन का दिन था। पूरे घर में सुबह से ही चहल-पहल थी। आँगन में रंगोली बनी थी, रसोई से मिठाइयों की खुशबू आ रही थी और माँ बार-बार दरवाज़े की ओर देख रही थीं।
लेकिन इस बार घर में एक कमी थी—आरव नहीं था।
आरव शहर से बहुत दूर नौकरी करता था। पिछले तीन सालों से वह रक्षाबंधन पर घर नहीं आ पाया था। हर साल उसकी छोटी बहन नंदिनी राखी की थाली सजाकर दरवाज़े पर बैठ जाती, लेकिन शाम होते-होते उसकी आँखों की चमक बुझ जाती।
इस बार भी नंदिनी सुबह से तैयार थी। उसने अपनी पसंद की गुलाबी साड़ी पहनी थी और आरव के लिए बाजार से एक सुंदर-सी राखी खरीदी थी।
माँ ने धीरे से पूछा, “बेटा, आरव ने कुछ बताया?”
नंदिनी ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“कहा है माँ… इस बार जरूर आएगा।”
माँ ने उसके चेहरे को देखा। वह समझ रही थीं कि बेटी को भाई के आने से ज्यादा उसके वापस आने के वादे पर भरोसा था।
दोपहर हो गई।
फिर शाम होने लगी।
नंदिनी बार-बार अपना फोन देखती। हर बार स्क्रीन खाली मिलती।
उसने आरव को फोन लगाया।
“भैया… कहाँ पहुँचे?”
उधर से आरव की आवाज़ आई, “बस नंदू, थोड़ा काम फँस गया है। तुम चिंता मत करो। मैं कोशिश कर रहा हूँ।”
नंदिनी कुछ पल चुप रही।
फिर बोली, “हर साल कोशिश ही करते हो भैया…”
फोन के दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया।
आरव समझ गया कि उसकी बहन की आवाज़ में शिकायत से ज्यादा टूटे हुए इंतज़ार का दर्द था।
“नंदू… इस बार मैं—”
नंदिनी ने फोन काट दिया।
उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
वह अपने कमरे में गई और अलमारी खोली। अंदर एक छोटा-सा डिब्बा रखा था। उसने उसे बाहर निकाला। डिब्बे में बचपन की कई चीज़ें थीं—आरव की पुरानी घड़ी, एक टूटा हुआ खिलौना और एक छोटी-सी राखी।
वह राखी देखकर नंदिनी को अपना बचपन याद आ गया।
जब वह छोटी थी, तो स्कूल से लौटते समय कुछ लड़कों ने उसे परेशान किया था। वह रोते हुए घर आई थी। आरव ने उसकी आँखों में आँसू देखे तो बिना कुछ पूछे उसका हाथ पकड़ लिया था।
“किसने परेशान किया?”
नंदिनी ने डरते हुए नाम बताया।
आरव उस समय खुद बहुत छोटा था, लेकिन उसने अपनी बहन से कहा था—
“जब तक मैं हूँ, तुझे किसी से डरने की जरूरत नहीं।”
उस दिन नंदिनी ने पहली बार अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधी थी।
राखी बाँधते हुए उसने पूछा था, “भैया, ये धागा सच में मेरी रक्षा करेगा?”
आरव हँस पड़ा था।
“नहीं पगली… ये धागा मुझे याद दिलाएगा कि मेरी एक बहन है, जिसकी खुशी मेरी जिम्मेदारी है।”
नंदिनी मुस्कुराई थी।
आज वही बच्ची बड़ी हो गई थी।
और वह धागा अब भी उसकी मुट्ठी में था।
रात के लगभग आठ बज गए थे।
घर के बाहर एक कार आकर रुकी।
माँ ने खिड़की से देखा।
उनकी आँखों में अचानक चमक आ गई।
“नंदिनी…”
नंदिनी कमरे से बाहर आई।
दरवाज़े पर आरव खड़ा था।
थका हुआ, धूल से भरा हुआ, लेकिन चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।
नंदिनी कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।
फिर दौड़कर उसके पास गई और उसके सीने से लगकर रो पड़ी।
“बहुत देर कर दी भैया…”
आरव ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा,
“माफ कर दे नंदू। इस बार देर हुई है… लेकिन आया तो हूँ।”
नंदिनी ने आँसू पोंछे।
“मुझे पता था आप आएँगे।”
आरव मुस्कुराया।
“इतना भरोसा?”
नंदिनी ने उसकी ओर देखकर कहा,
“आप पर नहीं… उस धागे पर है जो हर साल आपकी कलाई पर बाँधती हूँ।”
माँ की आँखें भी भर आईं।
नंदिनी ने जल्दी से पूजा की थाली सजाई। उसमें रोली, अक्षत, मिठाई और वही राखी रखी थी जिसे उसने पूरे दिन संभालकर रखा था।
वह आरव के सामने बैठी।
आरव ने अपनी कलाई आगे कर दी।
नंदिनी ने पहले तिलक लगाया, फिर आरती उतारी और धीरे-धीरे उसकी कलाई पर राखी बाँध दी।
राखी बाँधते समय उसके हाथ काँप रहे थे।
“भैया…”
“हम्म?”
“एक वादा करोगे?”
“बोल।”
“चाहे कितनी भी दूर चले जाना… लेकिन कभी मुझसे दूर मत होना।”
आरव की आँखें नम हो गईं।
उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला और नंदिनी की ओर बढ़ाया।
“पहले तू अपना तोहफा खोल।”
नंदिनी ने डिब्बा खोला।
अंदर एक सुंदर-सी चाँदी की पायल थी।
उसकी आँखों में खुशी आ गई।
“मेरे लिए?”
आरव ने सिर हिलाया।
“हाँ। जब तू छोटी थी ना, तो तेरी पायल की आवाज़ पूरे घर में सुनाई देती थी। फिर पता ही नहीं चला कब तू बड़ी हो गई।”
नंदिनी ने पायल हाथ में पकड़ ली।
आरव ने कहा,
“और एक बात…”
“क्या?”
“तू हर साल मुझे राखी बाँधती है और मेरी रक्षा की दुआ करती है। लेकिन सच बता, क्या तू जानती है कि मेरी सबसे बड़ी ताकत क्या है?”
नंदिनी ने सिर हिलाया।
आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“तू।”
नंदिनी फिर रो पड़ी।
आरव ने उसे गले लगा लिया।
माँ थोड़ी दूर खड़ी दोनों को देख रही थीं।
उनके चेहरे पर संतोष था।
उन्हें पता था कि राखी सिर्फ एक धागा नहीं होती।
यह बचपन की याद होती है।
यह भाई की कलाई पर बहन का विश्वास होती है।
यह बहन की आँखों में भाई के लिए दुआ होती है।
और यह वह रिश्ता है, जिसमें दूरी चाहे कितनी भी हो जाए, दिल कभी दूर नहीं होते।
कुछ रिश्ते खून से बनते हैं, कुछ समय के साथ मजबूत होते हैं।
लेकिन भाई-बहन का रिश्ता उन रिश्तों में से है, जिसे एक छोटी-सी राखी हर साल फिर से जीवित कर देती है।
रात को नंदिनी अपने कमरे में गई। उसने अपनी कलाई पर बंधी राखी को देखा और मुस्कुराई।
बाहर आरव माँ से बातें कर रहा था।
नंदिनी ने धीरे से कहा—
“कुछ धागे कलाई पर नहीं, दिल पर बंधते हैं… और उन्हें दुनिया की कोई दूरी कभी नहीं तोड़ सकती।”
उस रात घर में सिर्फ एक भाई वापस नहीं आया था।
एक बहन का इंतज़ार वापस आया था।
और माँ के घर में फिर से वही पुरानी हँसी लौट आई थी। ❤️

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

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