🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

माता पार्वती का पृथ्वीलोक भ्रमण — प्रेम, धैर्य और शिव की महिमा

पढ़ने का समय : 11 मिनट

 

 

हिमालय की ऊँची चोटियों पर स्थित कैलाश पर्वत उस दिन भी दिव्य प्रकाश से जगमगा रहा था। चारों ओर शांति थी। मंद-मंद बर्फीली हवा बह रही थी और भगवान शिव ध्यान में लीन थे। माता पार्वती उनके समीप बैठी हुई थीं।

 

कुछ समय से माता पार्वती पृथ्वीलोक की ओर देख रही थीं। वहाँ उन्हें असंख्य मनुष्य दिखाई देते थे—कोई अपने परिवार के लिए संघर्ष कर रहा था, कोई धन के पीछे भाग रहा था, कोई दुखी था, तो कोई दूसरों के दुख में भी उनका सहारा बन रहा था।

 

माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा,

 

“स्वामी, मैं पृथ्वीलोक के मनुष्यों को बहुत समय से देख रही हूँ। वहाँ कोई सुखी है, कोई दुखी है, कोई अपने परिवार के लिए दिन-रात परिश्रम कर रहा है। मेरा मन करता है कि मैं स्वयं पृथ्वीलोक पर जाकर देखूँ कि मनुष्य वास्तव में किस प्रकार अपना जीवन व्यतीत करते हैं।”

 

भगवान शिव मुस्कुराए और बोले,

 

“देवी, पृथ्वीलोक सरल स्थान नहीं है। वहाँ मोह है, माया है, क्रोध है, लोभ है और अहंकार भी है। वहाँ जाकर मनुष्य के जीवन को देखना जितना सरल दिखाई देता है, उतना है नहीं।”

 

माता पार्वती बोलीं,

 

“परंतु स्वामी, मैं केवल कुछ समय के लिए वहाँ जाना चाहती हूँ। मैं मनुष्यों के जीवन को निकट से समझना चाहती हूँ।”

 

शिवजी ने फिर समझाया,

 

“देवी, मेरा कहना मानिए। पृथ्वीलोक का अनुभव दूर से देखने में जितना सरल लगता है, पास जाकर उतना ही कठिन होता है।”

 

लेकिन माता पार्वती की इच्छा दृढ़ थी।

 

उन्होंने कहा,

 

“स्वामी, मैं अपनी जिद नहीं छोड़ूँगी। मुझे पृथ्वीलोक जाना ही है।”

 

भगवान शिव जानते थे कि माता पार्वती का निर्णय अब नहीं बदलेगा। अंततः उन्होंने कहा,

 

“ठीक है देवी। किंतु एक बात याद रखिए—पृथ्वीलोक का भ्रमण पूरा किए बिना आप कैलाश वापस नहीं आ सकेंगी।”

 

माता पार्वती ने सहमति में सिर हिला दिया।

 

इसके बाद माता पार्वती ने एक साधारण युवती का रूप धारण किया और पृथ्वीलोक पर आ गईं।

 

एक साधारण लड़की के रूप में माता पार्वती

 

पृथ्वीलोक पर माता पार्वती ने एक गरीब लेकिन संस्कारी परिवार में जन्मी युवती का रूप धारण किया। उनका नाम था गौरी।

 

गौरी बचपन से ही बहुत अलग स्वभाव की थी। वह अपनी माता-पिता से बहुत प्रेम करती थी, लेकिन उसके भीतर एक अद्भुत शांति और गंभीरता थी।

 

एक दिन उसकी माता ने कहा,

 

“बेटी, जरा मेरे लिए पानी ले आ।”

 

गौरी ने तुरंत उत्तर दिया,

 

“माताश्री, आप चिंता न करें। मैं अभी जल लेकर आती हूँ।”

 

उसकी माँ कुछ क्षण तक उसे देखती रह गई।

 

“माताश्री?”

 

गौरी ने कहा,

 

“जी माताश्री।”

 

कुछ ही देर बाद उसके पिता ने आवाज लगाई,

 

“बेटी, मेरे लिए भोजन लगा दो।”

 

गौरी मुस्कुराकर बोली,

 

“जी पिताश्री, अभी लगाती हूँ।”

 

माता-पिता एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

 

उनकी बेटी अचानक बहुत शुद्ध हिंदी बोलने लगी थी। वह “मम्मी” की जगह “माताश्री”, “पापा” की जगह “पिताश्री” और “भैया” की जगह “भ्राताश्री” कहने लगी थी।

 

उसके व्यवहार में भी अचानक बहुत परिवर्तन आ गया था।

 

वह सुबह उठकर पूजा करती, घर में सबकी सहायता करती और किसी से क्रोध नहीं करती।

 

माता-पिता को चिंता होने लगी।

 

गाँव के कुछ लोगों ने उन्हें डराते हुए कहा,

 

“लगता है आपकी बेटी के शरीर में कोई आत्मा आ गई है।”

 

एक दिन गौरी के पिता एक प्रसिद्ध बाबा को घर ले आए।

 

बाबा ने आते ही गंभीर आवाज में कहा,

 

“कहाँ है वह लड़की? आज मैं इसके अंदर की शक्ति को बाहर निकाल दूँगा।”

 

गौरी शांत बैठी रही।

 

बाबा ने मंत्र पढ़ने का नाटक शुरू किया और डराने की कोशिश की।

 

गौरी ने शांत स्वर में कहा,

 

“बाबा, आप दूसरों के भय का लाभ उठाकर स्वयं को शक्तिशाली समझते हैं। किंतु वास्तविक शक्ति कभी किसी को भयभीत नहीं करती।”

 

बाबा चौंक गया।

 

गौरी ने आगे कहा,

 

“जिस ज्ञान का आप दावा करते हैं, पहले उसका पालन अपने जीवन में कीजिए। दूसरों को डराकर धन कमाना धर्म नहीं, अधर्म है।”

 

बाबा घबरा गया।

 

गौरी ने कहा,

 

“अब आप यहाँ से चले जाइए। आपके छल का अंत हो चुका है।”

 

बाबा अपना सामान उठाकर वहाँ से भाग गया।

 

गौरी के माता-पिता आश्चर्य में पड़ गए।

 

गौरी ने उनके चरण स्पर्श किए और बोली,

 

“माताश्री और पिताश्री, भय मत कीजिए। आपके घर में कोई बुरी शक्ति नहीं है। आपकी बेटी के भीतर केवल ईश्वर का आशीर्वाद है।”

 

माता-पिता ने उसकी बात समझ तो नहीं पाई, लेकिन उनके मन का भय समाप्त हो गया।

 

विवाह और एक नया घर

 

कुछ समय बाद गौरी का विवाह एक युवक से तय हुआ।

 

विवाह के दिन जब गौरी ने वर को देखा, तो उसके मन में एक अजीब सी शांति उत्पन्न हुई।

 

वह युवक वास्तव में भगवान शिव ही थे, जिन्होंने एक साधारण मनुष्य का रूप धारण किया था।

 

विवाह के बाद गौरी अपने ससुराल पहुँची।

 

शुरुआत में उसने सोचा कि यहाँ उसे एक नया परिवार मिलेगा, जहाँ सभी प्रेम से रहेंगे।

 

लेकिन कुछ ही दिनों में उसकी सास और ननद ने उसे परेशान करना शुरू कर दिया।

 

कभी उसके बनाए भोजन में कमी निकाली जाती, कभी उसके कपड़ों पर टिप्पणी की जाती और कभी उसे बिना कारण अपमानित किया जाता।

 

गौरी चुप रहती।

 

उसके पति भी कई बार परिस्थितियों को समझ नहीं पाते और चुप रह जाते।

 

दिन बीतते गए।

 

गौरी के मन में प्रश्न उठने लगा—

 

“क्या यही वह संसार है जिसे मैं समझने के लिए पृथ्वीलोक पर आई हूँ?”

 

एक दिन अत्यधिक दुखी होकर उसने आकाश की ओर देखा और कहा,

 

“हे स्वामी, अब मुझे कैलाश वापस बुला लीजिए। मैं पृथ्वीलोक का बहुत कुछ देख चुकी हूँ।”

 

लेकिन तभी उसे भगवान शिव की कही हुई बात याद आई—

 

“भ्रमण पूरा किए बिना आप कैलाश वापस नहीं आ सकेंगी।”

 

माता पार्वती ने गहरी साँस ली।

 

उन्होंने मन ही मन कहा,

 

“यदि मैंने यह मार्ग चुना है, तो इसे पूरा भी मैं ही करूँगी।”

 

छह महीने बहुत कठिनाई से बीते।

 

अंततः छह महीने पूरे होने पर माता पार्वती कैलाश वापस पहुँचीं।

 

भगवान शिव ने उन्हें देखा और मुस्कुराते हुए पूछा,

 

“देवी, कैसा रहा आपका पृथ्वीलोक का अनुभव?”

 

माता पार्वती बोलीं,

 

“स्वामी, पृथ्वीलोक पर मैंने देखा कि वहाँ केवल पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ भी अत्याचार करती हैं। मैंने देखा कि कई बार घर की शांति एक व्यक्ति के अहंकार से नष्ट हो जाती है।”

 

फिर उन्होंने कहा,

 

“लेकिन मैंने यह भी देखा कि पृथ्वीलोक पर सास का बहुत सम्मान होता है। घर में कई निर्णय उसके हाथ में होते हैं। इसलिए अब मैं एक बार फिर पृथ्वीलोक जाना चाहती हूँ—इस बार एक सास के रूप में।”

 

शिवजी ने मुस्कुराते हुए कहा,

 

“देवी, जैसा आपकी इच्छा।”

 

इस बार माता बनीं सास

 

माता पार्वती ने इस बार एक वृद्ध स्त्री का रूप धारण किया और एक परिवार में सास बनकर रहने लगीं।

 

उन्होंने सोचा,

 

“अब मैं देखूँगी कि बहुएँ अपनी सास के साथ कैसा व्यवहार करती हैं।”

 

लेकिन पृथ्वीलोक ने उन्हें फिर चौंका दिया।

 

जिस घर में वे गईं, वहाँ उनकी बहुएँ उन्हें ताने देतीं, उनकी बात नहीं मानतीं और छोटी-छोटी बातों पर उन्हें अपमानित करतीं।

 

एक दिन एक बहू ने क्रोध में कहा,

 

“आपको तो हर काम में कमी दिखाई देती है!”

 

दूसरी बोली,

 

“अब यह घर हमारा है। आपको हर बात में बोलने की आवश्यकता नहीं।”

 

माता पार्वती शांत रहीं।

 

उन्होंने सोचा,

 

“शायद मेरे पुत्र मेरी रक्षा करेंगे।”

 

लेकिन जब उन्होंने अपने बेटों की ओर देखा, तो वे भी अपनी पत्नियों के पक्ष में खड़े थे।

 

एक पुत्र ने कहा,

 

“माँ, आप थोड़ी-सी बात को बहुत बड़ा बना रही हैं।”

 

माता पार्वती का हृदय दुख से भर गया।

 

उन्होंने मन में कहा,

 

“जिस माँ ने अपने बच्चों को जन्म दिया, वही वृद्धावस्था में उनके लिए बोझ बन जाती है?”

 

दिन-ब-दिन अत्याचार बढ़ता गया।

 

एक दिन बात इतनी बढ़ गई कि माता पार्वती का धैर्य टूट गया।

 

उनकी आँखों में दिव्य तेज प्रकट होने लगा।

 

घर के सभी लोग अचानक काँपने लगे।

 

वृद्ध स्त्री का रूप समाप्त हो गया।

 

उसके स्थान पर स्वयं माता पार्वती का दिव्य स्वरूप प्रकट हो गया।

 

उनके मस्तक पर तेज था, आँखों में अग्नि थी और चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया।

 

घर के सभी लोग भय से उनके चरणों में गिर पड़े।

 

“माता! हमें क्षमा कर दीजिए!”

 

माता पार्वती का क्रोध बढ़ता जा रहा था।

 

उन्होंने कहा,

 

“मैंने तुम्हें प्रेम दिया, तुमने उसका अपमान किया। मैंने तुम्हें परिवार दिया, तुमने उसमें अहंकार भर दिया।”

 

उनकी आवाज से पूरा पृथ्वीलोक काँप उठा।

 

उन्होंने कहा,

 

“मैंने इस संसार की रचना इसलिए नहीं की थी कि मनुष्य एक-दूसरे को पीड़ा दें। मैंने परिवार इसलिए नहीं बनाए थे कि उनमें प्रेम के स्थान पर अहंकार हो। मैंने माता-पिता इसलिए नहीं दिए थे कि वृद्धावस्था में उन्हें बोझ समझा जाए।”

 

माता पार्वती ने आकाश की ओर देखा।

 

“यदि पृथ्वी पर मनुष्य प्रेम और सम्मान का मूल्य ही भूल गए हैं, तो ऐसी पृथ्वी का क्या लाभ?”

 

उनके क्रोध से प्रकृति में हलचल होने लगी।

 

तभी भगवान शिव वहाँ प्रकट हुए।

 

उन्होंने माता पार्वती के चरणों के पास जाकर शांत स्वर में कहा,

 

“देवी, आपका क्रोध उचित है, किंतु विनाश समाधान नहीं है।”

 

माता बोलीं,

 

“स्वामी, मैंने मनुष्यों को अवसर दिया। मैंने पुत्री बनकर देखा, बहू बनकर देखा और सास बनकर भी देख लिया। हर जगह मनुष्य अपने स्वार्थ और अहंकार में दूसरों को दुख देता दिखाई दिया।”

 

शिवजी बोले,

 

“देवी, हर मनुष्य ऐसा नहीं है। कुछ लोग अंधकार में हैं, लेकिन उनमें प्रकाश जगाया जा सकता है।”

 

फिर शिवजी ने उन सभी मनुष्यों की ओर देखा और कहा,

 

“याद रखो—घर दीवारों से नहीं, रिश्तों से बनता है। जिस घर में सम्मान नहीं, वहाँ धन का कोई अर्थ नहीं। जिस परिवार में प्रेम नहीं, वहाँ सुख टिक नहीं सकता।”

 

माता पार्वती ने क्रोध से भरी आँखों से सभी को देखा।

 

तभी परिवार के लोग रोते हुए बोले,

 

“माता, हमें क्षमा कर दीजिए। हमने रिश्तों का मूल्य नहीं समझा। आज से हम अपनी सास को माता का सम्मान देंगे, बहुओं को बेटियों जैसा प्रेम देंगे और अपने माता-पिता को कभी बोझ नहीं समझेंगे।”

 

गाँव के अन्य लोग भी वहाँ एकत्र हो गए।

 

सबने माता पार्वती और भगवान शिव के सामने हाथ जोड़कर प्रण लिया—

 

“हम एक-दूसरे का सम्मान करेंगे। घर में प्रेम रखेंगे। माता-पिता की सेवा करेंगे। बहू को बेटी और सास को माता का सम्मान देंगे। किसी कमजोर व्यक्ति को अपमानित नहीं करेंगे।”

 

माता पार्वती का क्रोध धीरे-धीरे शांत होने लगा।

 

उनके चेहरे पर फिर ममता दिखाई देने लगी।

 

उन्होंने कहा,

 

“याद रखो, मनुष्य होना अपने आप में सबसे बड़ा अवसर है। धन खो जाए तो वापस कमाया जा सकता है, लेकिन किसी अपने का टूटा हुआ मन हमेशा वैसा नहीं हो पाता।”

 

फिर उन्होंने सभी को आशीर्वाद दिया।

 

भगवान शिव ने मुस्कुराकर माता पार्वती से कहा,

 

“देवी, अब क्या आप पृथ्वीलोक का भ्रमण समाप्त करना चाहेंगी?”

 

माता पार्वती मुस्कुराईं।

 

उन्होंने कहा,

 

“हाँ स्वामी। अब मैं समझ गई हूँ कि पृथ्वी पर सबसे बड़ी समस्या गरीबी या धन की कमी नहीं है। सबसे बड़ी समस्या है—मनुष्य का अहंकार और प्रेम की कमी।”

 

दोनों कैलाश की ओर प्रस्थान करने लगे।

 

जाते-जाते माता पार्वती ने पृथ्वीलोक की ओर देखा और कहा,

 

“जिस दिन मनुष्य अपने रिश्तों में प्रेम, सम्मान और त्याग को स्थान देगा, उसी दिन पृथ्वी स्वयं स्वर्ग बन जाएगी।”

 

भगवान शिव ने कहा,

 

“और याद रखो—कठिन परिस्थिति से भागना समाधान नहीं है। जिस प्रकार पार्वती ने छह महीने का कठिन समय धैर्य से पूरा किया, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन के संघर्षों से घबराना नहीं चाहिए।”

 

माता पार्वती ने मुस्कुराकर कहा,

 

“क्योंकि कठिन समय हमें तोड़ने नहीं, हमें मजबूत बनाने आता है।”

 

और फिर शिव-पार्वती कैलाश लौट गए।

 

उस दिन के बाद उस गाँव के लोगों ने अपने जीवन में एक बात हमेशा के लिए याद रख ली—

 

“परिवार में जीत किसी एक की नहीं होती। परिवार में जब प्रेम जीतता है, तभी सभी जीतते हैं।”

 

(कहानी की सीख)

 

जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। रिश्तों में अहंकार की जगह प्रेम, क्रोध की जगह समझ और अधिकार की जगह जिम्मेदारी होनी चाहिए।

 

सास हो या बहू, माता हो या बेटी, पति हो या पत्नी—हर रिश्ता सम्मान चाहता है।

 

भगवान शिव और माता पार्वती की यह कथा हमें यह संदेश देती है कि संसार को बदलने से पहले हमें स्वयं को बदलना चाहिए।

 

यदि हम अपने घर में किसी एक व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सकें, किसी दुखी व्यक्ति का हाथ थाम सकें और अपने माता-पिता का सम्मान कर सकें, तो यही सबसे बड़ी पूजा है।

 

क्योंकि—

 

“शिव मंदिर में ही नहीं, हर उस हृदय में निवास करते हैं जहाँ प्रेम, करुणा और सच्चाई होती है।”

 

हर हर महादेव।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *