एपिसोड – 49 : अभय के साथ कौन था?
मंदिर के बाहर एक के बाद एक गाड़ियों की हेडलाइट्स दिखाई दे रही थीं।
अंधेरी रात अचानक रोशनी से भर गई।
आरव ने खिड़की से बाहर देखा।
“इतनी सारी गाड़ियां?”
अमन ने बंदूक संभालते हुए कहा—
“लगता है हम अकेले नहीं हैं।”
विहान ने अभय की तरफ देखा।
“पापा… ये लोग कौन हैं?”
अभय ने तुरंत मंदिर का दरवाजा बंद कर दिया।
“तुम लोगों को यहां नहीं आना चाहिए था।”
आरव उसके पास आया।
“हम आपको ढूंढते हुए यहां आए हैं।”
“आप पच्चीस साल से कहां थे?”
अभय की आंखों में दर्द उतर आया।
“तुम्हें मुझसे सवाल करने का पूरा हक है।”
“लेकिन अभी हमारे पास सवालों के जवाब देने का वक्त नहीं है।”
बाहर किसी ने जोर से मंदिर का दरवाजा पीटा।
धड़ाम!
नैना घबरा गईं।
“ये लोग यहां तक पहुंच गए।”
आरव ने पूछा—
“कौन हैं ये?”
अभय ने धीरे से कहा—
“वही लोग, जिनसे मैं पिछले पच्चीस साल से तुम्हें बचा रहा हूं।”
मंदिर का गुप्त रास्ता
अभय ने मंदिर की दीवार के पास जाकर एक पत्थर हटाया।
पत्थर हटते ही दीवार का एक हिस्सा खुल गया।
अंदर अंधेरी सुरंग दिखाई दी।
अमन ने हैरानी से पूछा—
“यहां रास्ता है?”
अभय ने कहा—
“हां।”
विहान ने पूछा—
“आपको ये रास्ता कैसे पता?”
अभय हल्का सा मुस्कुराया।
“क्योंकि तुम्हारे नाना ने ये मंदिर बनवाया था।”
आरव चौंक गया।
“नाना ने?”
“हां।”
“और ये सुरंग?”
“उनकी आखिरी सुरक्षा।”
अभय ने सबको अंदर जाने का इशारा किया।
“जल्दी करो।”
सभी सुरंग में उतरने लगे।
सबसे आखिर में आरव रुका।
उसने अभय की तरफ देखा।
“पापा।”
अभय ने उसकी तरफ देखा।
“हां?”
“इस बार आप हमें छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।”
अभय की आंखें नम हो गईं।
“अब नहीं।”
सुरंग में पहली बातचीत
कुछ दूर जाने के बाद सभी रुक गए।
बाहर की आवाजें अब सुनाई नहीं दे रही थीं।
आरव ने सबसे पहले सवाल किया—
“अब बताइए।”
अभय चुप रहा।
“आप जिंदा थे तो हमें छोड़ क्यों दिया?”
अभय ने गहरी सांस ली।
“मैंने तुम्हें कभी छोड़ा नहीं।”
“मैं दूर रहकर तुम्हारी रक्षा करता रहा।”
अमन ने कहा—
“कैसी रक्षा?”
“तुम्हारे हर कदम पर नजर रखता था।”
विहान की आवाज भर्रा गई।
“तो फिर एक बार भी हमारे सामने क्यों नहीं आए?”
अभय ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि अगर मैं सामने आता… तो तुम तीनों उसी दिन खतरे में पड़ जाते।”
आरव ने पूछा—
“किससे?”
अभय ने कहा—
“तुम्हारे अपने परिवार से।”
तीनों भाई चौंक गए।
परिवार में ही दुश्मन
आरव ने पूछा—
“कौन?”
अभय ने सीधे जवाब नहीं दिया।
“जिस आदमी ने राजवीर को आदेश दिए…”
“वही आदमी तुम्हारे परिवार के बहुत करीब है।”
आरोही ने पूछा—
“क्या वो माधवी जी हैं?”
नैना ने तुरंत कहा—
“नहीं।”
अभय ने सिर हिलाया।
“माधवी निर्दोष है।”
“देवेंद्र?”
अभय कुछ पल चुप रहा।
देवेंद्र ने खुद कहा—
“मुझ पर शक करना है तो करो।”
अभय ने उसकी तरफ देखा।
“देवेंद्र पर भी भरोसा किया जा सकता है।”
आरव ने पूछा—
“तो कौन?”
अभय ने कहा—
“अभी उसका नाम लेना सही नहीं होगा।”
अमन झुंझला गया।
“पच्चीस साल से यही सुन रहे हैं!”
“कोई पूरा सच क्यों नहीं बताता?”
अभय ने अमन के कंधे पर हाथ रखा।
“क्योंकि कुछ सच्चाइयां इतनी खतरनाक होती हैं कि उन्हें जानना भी मौत को बुलावा देना होता है।”
आरोही की चिंता
आरोही अब तक चुप थी।
अचानक उसने कहा—
“लेकिन बाहर जो लोग आए हैं, उन्हें हमारे यहां होने की खबर कैसे मिली?”
सब एक-दूसरे को देखने लगे।
अभय ने गंभीरता से कहा—
“यही सबसे बड़ी समस्या है।”
आरव ने पूछा—
“मतलब?”
“हमारे साथ कोई ऐसा व्यक्ति था, जिसने हमारी लोकेशन बताई।”
अमन तुरंत रुद्र की तरफ देखने लगा।
रुद्र ने कहा—
“इस बार मैंने कोई संदेश नहीं भेजा।”
विहान ने कहा—
“तो फिर कौन?”
अभय ने धीरे से कहा—
“तुम्हारे फोन में से किसी एक की लोकेशन ट्रैक की गई है।”
आरव ने अपना फोन निकाला।
“मेरे फोन में?”
अभय ने कहा—
“हां।”
आरोही ने तुरंत अपना फोन देखा।
“मेरे फोन में भी कुछ अजीब नहीं है।”
अमन ने कहा—
“मेरे में भी नहीं।”
विहान ने अपना फोन आगे किया।
अभय ने उसे देखा और अचानक उसका चेहरा बदल गया।
“ये फोन तुम्हें किसने दिया?”
विहान ने कहा—
“कुछ महीने पहले।”
“किसने?”
विहान चुप हो गया।
नैना ने पूछा—
“विहान?”
विहान ने धीरे से कहा—
“राजवीर ने।”
एक बड़ा झटका
अभय तुरंत पीछे हट गया।
“इसे फेंक दो!”
विहान ने फोन जमीन पर पटक दिया।
लेकिन देर हो चुकी थी।
फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी।
उस पर एक संदेश आया—
“बहुत अच्छा… तुम लोग आखिर मेरे पास पहुंच ही गए।”
नीचे सिर्फ एक नाम लिखा था—
“शेखर।”
आरव ने हैरानी से कहा—
“शेखर?”
विहान ने कहा—
“लेकिन शेखर तो पुलिस के कब्जे में था।”
अभय ने कहा—
“वो पुलिस के कब्जे में नहीं है।”
“क्या?”
“जिसे तुमने पुलिस के हवाले किया था…”
अभय की आंखें गंभीर हो गईं।
“वो शेखर था ही नहीं।”
नकली शेखर
आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।
“तो हमारे साथ कौन था?”
अभय ने कहा—
“शेखर का आदमी।”
अमन ने गुस्से में कहा—
“मतलब असली शेखर कहां है?”
अभय ने जवाब दिया—
“राजवीर के पास।”
नैना ने कहा—
“नहीं…”
अभय ने उनकी तरफ देखा।
“हां।”
“असली शेखर अभी भी जिंदा है।”
आरव ने कहा—
“तो फिर जिसे हमने देखा…”
“वो सिर्फ एक मोहरा था।”
देवेंद्र ने सिर पकड़ लिया।
“इतने सालों से ये लोग हमसे एक कदम आगे हैं।”
अभय ने कहा—
“क्योंकि हमारे बीच कोई उनकी मदद कर रहा है।”
अचानक हमला
सुरंग के ऊपर जोरदार धमाका हुआ।
धड़ाम!
धूल नीचे गिरने लगी।
आरोही डरकर आरव से लिपट गई।
आरव ने उसे संभालते हुए कहा—
“डरो मत।”
अभय ने कहा—
“हमें जल्दी निकलना होगा।”
सभी आगे बढ़ने लगे।
लेकिन तभी सुरंग के दूसरे छोर से भी कदमों की आवाज आने लगी।
अमन ने बंदूक निकाल ली।
“उधर भी लोग हैं।”
अभय ने चारों तरफ देखा।
“हम फंस गए।”
विहान ने पूछा—
“अब?”
अभय ने दीवार की तरफ इशारा किया।
“एक रास्ता और है।”
उसने दीवार पर हाथ रखा।
कुछ दबाते ही फर्श का एक हिस्सा खुल गया।
नीचे सीढ़ियां थीं।
आरव ने कहा—
“आपको ये सब रास्ते कैसे पता हैं?”
अभय ने कहा—
“क्योंकि मैंने ये रास्ते तुम्हारे नाना के साथ बनाए थे।”
नाना की आखिरी इच्छा
सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए आरव ने पूछा—
“मेरे नाना कैसे इंसान थे?”
अभय ने मुस्कुराते हुए कहा—
“बहुत सख्त।”
अमन हंस पड़ा।
“हमसे भी ज्यादा?”
“बहुत ज्यादा।”
विहान ने पूछा—
“और वो हमें क्यों बचाना चाहते थे?”
अभय कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
“क्योंकि उन्हें पता था कि एक दिन तुम तीनों मिलकर उस साम्राज्य को खत्म करोगे जिसे राजवीर और उसके साथियों ने बनाया था।”
आरव ने पूछा—
“कौन-सा साम्राज्य?”
अभय ने कहा—
“एक ऐसा साम्राज्य जो सिर्फ पैसों का नहीं था… लोगों की जिंदगी पर कब्जे का था।”
आरव और आरोही
कुछ देर बाद सब एक छोटे कमरे में पहुंचे।
अभय ने दरवाजा बंद कर दिया।
आरोही चुपचाप आरव के पास बैठी थी।
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम डर गई?”
आरोही ने कहा—
“हां।”
“लेकिन तुम्हारे साथ हूं।”
आरव ने हल्की मुस्कान दी।
“तुम्हें पता है, इन सबके बीच एक चीज अच्छी हुई है।”
“क्या?”
“मुझे मेरी मां मिल गई।”
आरोही ने कहा—
“और पिता भी।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“और तुम।”
आरोही मुस्कुराई।
“मैं तो पहले से तुम्हारे साथ हूं।”
आरव ने धीरे से कहा—
“मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता।”
आरोही ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“तो मुझे कभी छोड़ना मत।”
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।
तभी पीछे से अमन की आवाज आई—
“भाई, यहां भी शुरू हो गए?”
आरव मुस्कुरा दिया।
“तू चुप कर।”
आरोही शर्म से मुस्कुरा दी।
देवेंद्र का कबूलनामा
अचानक देवेंद्र ने कहा—
“आरव।”
आरव ने उनकी तरफ देखा।
“क्या हुआ?”
देवेंद्र ने कहा—
“तुम्हें एक और बात जाननी चाहिए।”
“क्या?”
“तुम्हारे पिता के गायब होने के पीछे…”
उन्होंने अभय की तरफ देखा।
“मेरी गलती भी थी।”
अभय ने सिर झुका लिया।
आरव चौंक गया।
“आपने क्या किया था?”
देवेंद्र ने कहा—
“मैंने अभय को उस रात एक जगह बुलाया था।”
“लेकिन वहां राजवीर पहले से मौजूद था।”
“उसे मेरे बारे में सब पता था।”
अभय ने कहा—
“अगर देवेंद्र उस रात मुझे नहीं बुलाता, तो शायद मैं बच जाता।”
देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।
“मैंने तुम्हें खतरे में डाल दिया।”
अभय ने कहा—
“लेकिन तुमने बाद में मेरी जिंदगी बचाई।”
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
आरव ने महसूस किया कि उनके बीच सिर्फ दोस्ती नहीं…
पच्चीस साल पुराना अपराधबोध भी था।
असली दुश्मन का पहला संकेत
अचानक कमरे की दीवार पर लगी पुरानी स्क्रीन चालू हो गई।
सभी चौंक गए।
स्क्रीन पर एक धुंधला चेहरा दिखाई दिया।
आवाज आई—
“अभय…”
अभय का चेहरा सख्त हो गया।
“तुम?”
आरव ने पूछा—
“आप इसे जानते हैं?”
अभय ने कोई जवाब नहीं दिया।
स्क्रीन पर मौजूद आदमी हंसा।
“तुम अपने बेटों को मेरे बारे में बताने से डर रहे हो?”
अभय ने कहा—
“उन्हें इसमें मत घसीटो।”
आवाज आई—
“अब बहुत देर हो चुकी है।”
फिर स्क्रीन पर तीन तस्वीरें दिखाई दीं।
आरव की।
अमन की।
विहान की।
और उसके बाद चौथी तस्वीर आई।
आरोही की।
आरव का चेहरा बदल गया।
“तुमने आरोही की तस्वीर क्यों दिखाई?”
स्क्रीन पर आदमी ने कहा—
“क्योंकि कहानी सिर्फ तुम्हारे परिवार की नहीं है।”
आरोही पीछे हट गई।
“मेरी?”
आवाज आई—
“तुम्हारे पिता ने भी उस रात एक सौदा किया था।”
आरोही की सांस रुक गई।
“मेरे पिता?”
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“आरोही, तुम ठीक हो?”
उसकी आंखों से आंसू निकल आए।
“मुझे कुछ नहीं पता।”
स्क्रीन पर आदमी ने कहा—
“अगर सच जानना है तो कल रात अकेली पुराने महल में आना।”
आरव ने गुस्से में कहा—
“वह अकेली कहीं नहीं जाएगी।”
आवाज हंसी।
“मुझे पता था तुम यही कहोगे।”
फिर स्क्रीन पर आखिरी लाइन दिखाई दी—
“आरव… अगर आरोही मेरे पास नहीं आई, तो अगली बार निशाना उसकी मां होगी।”
स्क्रीन बंद हो गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।
“आरव… मुझे लगता है मेरे परिवार में भी कोई ऐसा राज है, जिसके बारे में मुझे कुछ नहीं बताया गया।”
आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“जो भी सच होगा, हम साथ मिलकर जानेंगे।”
अभय ने गंभीर आवाज में कहा—
“नहीं, आरव।”
सबकी नजर उसकी तरफ गई।
अभय ने कहा—
“अगर वो आदमी आरोही के परिवार तक पहुंच चुका है… तो समझ लो, हमारा असली दुश्मन अब बहुत करीब है।”
और उसी वक्त अभय के फोन पर एक तस्वीर आई।
तस्वीर देखकर उसके हाथ कांपने लगे।
वो तस्वीर…
आरोही के पिता की थी।
और उसके पीछे खड़ा था—
वही आदमी, जिसकी आवाज अभी स्क्रीन पर सुनाई दी थी।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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