माता पार्वती की दूसरी परीक्षा
हिमालय की गोद में बसा कैलाश पर्वत उस दिन बहुत शांत था। भगवान शिव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती अपने हाथों से कैलाश पर रहने वाले सभी गणों के लिए भोजन बना रही थीं। उनके लिए कैलाश केवल उनका घर नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा स्थान था जहाँ आने वाला हर प्राणी अपनापन महसूस करता था।
माता पार्वती का स्वभाव ही ऐसा था। कोई भूखा आता तो वह उसे भोजन करातीं, कोई दुखी आता तो उसकी बात सुनतीं और कोई परेशान होता तो उसकी सहायता करतीं।
उसी दिन भगवान शिव ने माता पार्वती को ध्यान से देखा। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह शांति थी।
शिवजी ने मन ही मन सोचा, “पार्वती की करुणा असीम है, लेकिन क्या कठिन परिस्थिति आने पर भी उनका धैर्य ऐसा ही रहेगा?”
शिवजी ने नंदी की ओर देखा।
नंदी समझ गए कि महादेव के मन में कुछ चल रहा है।
कुछ देर बाद शिवजी ने माता पार्वती से कहा, “पार्वती, मैं थोड़ी देर के लिए कैलाश से बाहर जा रहा हूँ।”
माता ने पूछा, “कहीं कोई विशेष काम है?”
शिवजी मुस्कुराए, “बस एक आवश्यक काम है। तुम चिंता मत करना।”
माता ने सिर हिलाया।
“ठीक है स्वामी।”
शिवजी वहाँ से चले गए।
लेकिन वास्तव में वह दूर नहीं गए थे। उन्होंने अपना रूप बदल लिया और एक साधारण यात्री का रूप धारण कर लिया। उनके बाल बिखरे हुए थे, कपड़े पुराने थे और चेहरे पर थकान दिखाई दे रही थी।
कुछ समय बाद वह कैलाश के द्वार पर पहुँचे।
नंदी ने उन्हें रोकना चाहा, लेकिन शिवजी ने कहा, “मैं बहुत दूर से आया हूँ। मुझे माता पार्वती से मिलना है।”
नंदी ने अंदर जाकर माता को सूचना दी।
माता पार्वती तुरंत बाहर आईं।
उन्होंने उस यात्री को देखा और पूछा, “आप बहुत थके हुए लग रहे हैं। क्या आपको भोजन चाहिए?”
यात्री ने कहा, “माता, मैं कई दिनों से भूखा हूँ।”
पार्वती उसे अंदर ले गईं और अपने हाथों से भोजन परोसने लगीं।
यात्री ने खाना शुरू किया, लेकिन अचानक उसने कटोरा दूर कर दिया।
“मुझे यह भोजन पसंद नहीं।”
माता ने आश्चर्य से पूछा, “क्यों? इसमें क्या कमी है?”
“मुझे तो कुछ और चाहिए।”
माता ने बिना नाराज हुए पूछा, “आप क्या खाना चाहते हैं?”
यात्री ने एक लंबी सूची बता दी।
माता ने तुरंत वह सब तैयार करना शुरू कर दिया।
कुछ देर बाद भोजन तैयार हो गया।
यात्री ने भोजन किया और कहा, “ठीक है।”
माता मुस्कुरा दीं।
तभी यात्री बोला, “लेकिन मुझे एक और परेशानी है।”
“क्या हुआ?”
“मुझे रात में सोने के लिए बहुत आरामदायक जगह चाहिए।”
माता ने तुरंत उसके लिए आराम करने की जगह तैयार कर दी।
यात्री वहाँ गया, लेकिन थोड़ी देर बाद वापस आ गया।
“यहाँ बहुत ठंड है।”
माता ने तुरंत उसके लिए गर्म कपड़े और आग की व्यवस्था कर दी।
फिर वह बोला, “अब मुझे यहाँ शांति नहीं मिल रही।”
माता ने आसपास के गणों से कहा कि कुछ समय के लिए शांत रहें।
नंदी यह सब देख रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह यात्री आखिर इतना परेशान क्यों कर रहा है।
लेकिन माता पार्वती बिना शिकायत किए उसकी हर जरूरत पूरी कर रही थीं।
कुछ देर बाद यात्री ने कहा, “माता, आप बहुत धैर्यवान हैं।”
माता मुस्कुराईं।
“मुसीबत में पड़े व्यक्ति की सहायता करना हमारा धर्म है।”
यात्री ने पूछा, “अगर कोई बार-बार आपकी परीक्षा ले तो?”
माता ने कहा, “अगर उसके पीछे कोई दुख छिपा हो तो मैं उसकी बात सुनूँगी। लेकिन अगर वह जानबूझकर किसी को परेशान करे, तब भी क्रोध से पहले समझने की कोशिश करूँगी।”
यात्री ने उनकी ओर ध्यान से देखा।
लेकिन परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी।
उसने अचानक कहा, “माता, मुझे सुना है कि आप भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं।”
“हाँ।”
“लेकिन मैं समझ नहीं पाता कि आपने उनसे विवाह क्यों किया।”
माता शांत रहीं।
यात्री ने आगे कहा, “उनके पास न कोई राजमहल है, न धन-दौलत। वे भस्म लगाते हैं, साँप को गले में रखते हैं और श्मशान में रहते हैं। आपके लिए तो कोई अधिक सुखी जीवन चुनना आसान था।”
माता पार्वती ने गंभीर होकर कहा, “आप मेरे अतिथि हैं, इसलिए आपकी बात सुन रही हूँ। लेकिन मेरे स्वामी को समझने के लिए केवल उनका बाहरी रूप देखना पर्याप्त नहीं है।”
यात्री बोला, “लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि आपने गलत चुनाव किया?”
माता ने तुरंत कहा, “नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैंने शिवजी में संसार की सबसे बड़ी सच्चाई देखी है। उनके पास दिखावे का वैभव नहीं, लेकिन उनके हृदय में समस्त संसार के लिए करुणा है।”
यात्री कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने पूछा, “अगर एक दिन शिव आपको छोड़कर चले जाएँ तो?”
माता ने शांत स्वर में कहा, “सच्चा प्रेम किसी को बाँधकर नहीं रखता। शिव मेरे जीवन का हिस्सा ही नहीं, मेरे अस्तित्व का आधार हैं। उनसे दूरी का विचार भी मेरे लिए अर्थहीन है।”
यात्री ने कहा, “और अगर मैं कहूँ कि तुम्हें शिव को भूल जाना चाहिए?”
माता की आँखों में दृढ़ता आ गई।
उन्होंने कहा, “आपने मेरे धैर्य की परीक्षा ली, इसलिए मैंने आपकी हर बात सुनी। लेकिन अपने विश्वास से समझौता करना मेरे लिए संभव नहीं।”
इतना कहते ही यात्री मुस्कुराया।
अचानक उसके शरीर से तेज प्रकाश निकलने लगा।
माता पार्वती समझ गईं।
“महादेव!”
यात्री का रूप समाप्त हो गया और भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में सामने खड़े थे।
माता ने उन्हें देखकर कहा, “तो यह सब आपकी परीक्षा थी!”
शिवजी हँसते हुए बोले, “हाँ पार्वती।”
माता ने थोड़ा नाराज होकर कहा, “आपने तो मुझे बहुत परेशान किया।”
शिवजी ने मुस्कुराकर कहा, “और तुमने मुझे भी बहुत कुछ सिखा दिया।”
माता ने पूछा, “मैंने क्या सिखाया?”
शिवजी बोले, “धैर्य की असली शक्ति। तुमने न तो भूखे व्यक्ति को ठुकराया, न उसकी कठिन बातों पर तुरंत क्रोध किया। लेकिन जब बात तुम्हारे विश्वास की आई, तब तुमने स्पष्ट होकर अपना पक्ष रखा।”
माता पार्वती शांत होकर शिवजी की ओर देखने लगीं।
शिवजी ने आगे कहा, “यही सच्ची शक्ति है। हर बात पर क्रोध करना शक्ति नहीं है और हर बात सहते रहना भी शक्ति नहीं है। सही समय पर करुणा और सही समय पर दृढ़ता—यही सच्ची शक्ति है।”
माता मुस्कुराईं।
तभी नंदी ने हँसते हुए कहा, “महादेव, अगली बार ऐसी परीक्षा लेने से पहले हमें बता दीजिएगा। आज तो मैं भी परेशान हो गया था।”
शिवजी हँस पड़े।
माता पार्वती भी मुस्कुरा उठीं।
कैलाश पर फिर वही शांति लौट आई।
उस दिन माता पार्वती ने एक बार फिर साबित किया कि सच्ची भक्ति केवल पूजा और तपस्या में नहीं होती। सच्ची भक्ति तब दिखाई देती है जब परिस्थितियाँ कठिन हों, जब सामने वाला बार-बार धैर्य की परीक्षा ले और फिर भी मन में करुणा बनी रहे।
- और जहाँ विश्वास अटल हो, वहाँ किसी परीक्षा का डर नहीं रहता।
माता पार्वती की उस परीक्षा ने यही सिखाया—
करुणा से दिल जीता जा सकता है, धैर्य से कठिन समय पार किया जा सकता है और सच्चे विश्वास को कोई भी परीक्षा हिला नहीं सकती।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
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