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माता पार्वती की परीक्षा

पढ़ने का समय : 6 मिनट

माता पार्वती की परीक्षा

 

हिमालय की ऊँची चोटियों के बीच कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती का जीवन अपनी सरलता और प्रेम से भरा हुआ था। माता पार्वती केवल भगवान शिव की अर्धांगिनी ही नहीं थीं, बल्कि उनकी शक्ति और करुणा का स्वरूप भी थीं। फिर भी एक दिन भगवान शिव ने उनकी भक्ति, धैर्य और करुणा की परीक्षा लेने का निश्चय किया।

 

उस दिन सुबह कैलाश पर हल्की बर्फ गिर रही थी। माता पार्वती शिवजी के लिए पूजा की तैयारी कर रही थीं। नंदी पास ही बैठे थे और गण उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे।

 

तभी शिवजी ने माता पार्वती से कहा, “पार्वती, आज मैं कुछ समय के लिए कैलाश से दूर जा रहा हूँ।”

 

माता ने तुरंत पूछा, “कहाँ जा रहे हैं स्वामी?”

 

शिवजी मुस्कुराए, “बस ऐसे ही… कुछ समय के लिए।”

 

पार्वती ने उनकी आँखों में देखा। उन्हें लगा कि शिवजी के मन में कोई बात है, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं पूछा।

 

“ठीक है स्वामी। आप जहाँ जाएँ, सुरक्षित रहें।”

 

शिवजी वहाँ से चले गए।

 

माता पार्वती कुछ देर तक उन्हें देखती रहीं। तभी कैलाश के द्वार पर एक वृद्ध साधु दिखाई दिया। उसके कपड़े पुराने थे और हाथ में एक कमंडल था।

 

वृद्ध ने धीमी आवाज में कहा, “माता, क्या मुझे थोड़ा भोजन मिल सकता है?”

 

पार्वती ने तुरंत कहा, “क्यों नहीं? आप अंदर आइए।”

 

उन्होंने साधु को भोजन कराया। साधु ने भोजन किया, लेकिन अचानक उसने कहा, “माता, आपकी भक्ति की बहुत चर्चा सुनी है।”

 

पार्वती मुस्कुराईं, “भक्ति की चर्चा नहीं होती, साधु महाराज। भक्ति तो मन की बात है।”

 

वृद्ध ने कुछ पल उन्हें देखा और बोला, “लेकिन क्या आपकी भक्ति इतनी मजबूत है कि कोई आपके सामने आपके आराध्य के बारे में गलत बातें कहे, फिर भी आप अपना धैर्य बनाए रखें?”

 

पार्वती ने शांत स्वर में कहा, “जो मेरे आराध्य को नहीं समझता, उसकी बात से मेरा विश्वास नहीं बदल सकता।”

 

वृद्ध ने मुस्कुराकर कहा, “अच्छा?”

 

“हाँ।”

 

वृद्ध साधु ने अचानक भगवान शिव के बारे में कठोर बातें कहना शुरू कर दिया।

 

“वह शिव भी क्या हैं? शरीर पर भस्म लगाते हैं, गले में साँप रखते हैं, श्मशान में घूमते हैं। न राजसी वस्त्र, न महल, न कोई धन-दौलत। तुम जैसी देवी ने उनसे विवाह क्यों किया?”

 

माता पार्वती ने पहले तो शांत होकर उसकी बात सुनी।

 

उन्होंने कहा, “आप उन्हें बाहरी रूप से देखते हैं, इसलिए आपको ऐसा लगता है। मेरे लिए वे संसार के स्वामी हैं।”

 

साधु ने फिर कहा, “लेकिन तुम्हें क्या मिला उनसे? न सोना, न महल, न सुख-सुविधा।”

 

पार्वती मुस्कुराईं।

 

“मुझे उनसे वह मिला जो किसी महल में नहीं मिलता—सच्चा प्रेम, विश्वास और आत्मिक शांति।”

 

साधु ने कहा, “अगर वे तुम्हें छोड़ दें तो?”

 

माता कुछ क्षण चुप रहीं।

 

फिर बोलीं, “जिस प्रेम में स्वार्थ हो, उसमें छोड़ने का डर होता है। मेरे और शिव के प्रेम में ऐसा डर नहीं है।”

 

साधु ने उनकी ओर ध्यान से देखा।

 

लेकिन परीक्षा अभी बाकी थी।

 

वृद्ध ने कहा, “मान लो मैं तुम्हें कहूँ कि शिव तुम्हारे योग्य नहीं हैं। तुम उनसे कहीं अधिक सुंदर, शक्तिशाली और योग्य हो। तुम्हें किसी दूसरे देवता से विवाह कर लेना चाहिए।”

 

माता पार्वती ने पहली बार गंभीर स्वर में कहा, “साधु महाराज, आप अतिथि हैं, इसलिए मैं आपका सम्मान कर रही हूँ। लेकिन मेरे स्वामी के बारे में अपमानजनक शब्द सुनना मुझे स्वीकार नहीं।”

 

वृद्ध चुप हो गया।

 

उसी समय कैलाश पर तेज हवा चलने लगी। माता ने देखा कि दूर एक छोटी बच्ची बर्फ में अकेली खड़ी रो रही है।

 

माता तुरंत उसके पास गईं।

 

“बेटी, तुम यहाँ अकेली कैसे?”

 

बच्ची रोते हुए बोली, “मुझे रास्ता नहीं मिल रहा।”

 

पार्वती ने उसे अपने पास लिया और बोलीं, “डरो मत, मैं तुम्हें तुम्हारे घर पहुँचा दूँगी।”

 

वह बच्ची को लेकर चल पड़ीं।

 

वृद्ध साधु ने पीछे से आवाज दी, “माता, पहले मेरी सेवा पूरी करो। तुम उस बच्ची के पीछे क्यों जा रही हो?”

 

पार्वती ने बिना पीछे देखे कहा, “जो दुख में हो, उसकी सहायता करना ही सबसे बड़ी सेवा है।”

 

वह बच्ची को लेकर काफी दूर गईं। वहाँ एक छोटी-सी झोपड़ी थी। बच्ची की माँ बाहर परेशान खड़ी थी।

 

अपनी बेटी को देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गए।

 

“माता, आपने मेरी बेटी को बचा लिया।”

 

पार्वती ने कहा, “यह मेरा नहीं, मेरा धर्म था।”

 

जब पार्वती वापस लौटीं तो वह वृद्ध साधु वहीं बैठा था।

 

उसने कहा, “तुमने मेरी सेवा छोड़कर उस बच्ची की सहायता की।”

 

पार्वती ने शांत स्वर में कहा, “भूखे को भोजन देना सेवा है, लेकिन दुखी को सहारा देना उससे भी बड़ा धर्म है।”

 

वृद्ध ने पूछा, “और अगर तुम्हें चुनना पड़े—अपने सुख और किसी दूसरे के दुख के बीच?”

 

पार्वती ने कहा, “मैं दूसरे के दुख को कम करना चुनूँगी।”

 

वृद्ध के चेहरे पर अचानक एक दिव्य मुस्कान आ गई।

 

अगले ही क्षण वहाँ प्रकाश फैल गया।

 

वृद्ध साधु का रूप बदलने लगा।

 

माता पार्वती समझ गईं।

 

“स्वामी!”

 

उनके सामने भगवान शिव अपने वास्तविक रूप में खड़े थे।

 

माता कुछ पल उन्हें देखती रहीं, फिर बोलीं, “तो यह सब आपकी परीक्षा थी?”

 

शिवजी मुस्कुराए।

 

“हाँ पार्वती। मैं देखना चाहता था कि तुम्हारी भक्ति केवल मेरे प्रति प्रेम तक सीमित है या उसमें धैर्य, विश्वास और करुणा भी है।”

 

माता ने हल्की नाराजगी से कहा, “लेकिन आपने मेरे स्वामी के बारे में इतनी बातें कहीं!”

 

शिवजी हँस पड़े।

 

“और तुमने हर बात का उत्तर इतनी शांति से दिया कि मुझे भी लगा, आज परीक्षा लेने वाला ही परीक्षा में पड़ जाएगा।”

 

माता पार्वती भी मुस्कुरा दीं।

 

शिवजी ने कहा, “तुमने साबित कर दिया कि सच्ची भक्ति केवल पूजा करने का नाम नहीं है। सच्ची भक्ति वह है जिसमें विश्वास हो, धैर्य हो और हर जीव के प्रति करुणा हो।”

 

नंदी और गण यह सब सुन रहे थे। नंदी ने खुशी से सिर झुका दिया।

 

माता पार्वती ने शिवजी से कहा, “स्वामी, अगर मेरी कोई शक्ति है तो वह आपकी कृपा से है।”

 

शिवजी बोले, “और मेरी शक्ति तुमसे है।”

 

दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए।

 

उस दिन कैलाश पर जैसे एक नई रोशनी फैल गई।

 

माता पार्वती की परीक्षा पूरी हो चुकी थी, लेकिन उस परीक्षा ने एक बड़ा संदेश दे दिया था—

 

सच्ची भक्ति केवल अपने आराध्य पर विश्वास करना नहीं, बल्कि कठिन समय में धैर्य रखना, दूसरों के दुख को समझना और अपने धर्म से कभी पीछे न हटना है।

 

माता पार्वती ने अपनी भक्ति से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से यह सिद्ध किया था कि शक्ति केवल सामर्थ्य में नहीं होती।

 

सबसे बड़ी शक्ति उस हृदय में होती है, जो अपमान के सामने भी धैर्य रखे और किसी दुखी को देखकर करुणा से भर जाए।

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