सुबह हो चुकी थी।
रुद्रगढ़ हवेली का अधिकांश हिस्सा मलबे में बदल गया था। गाँव के लोग दूर खड़े होकर टूटे हुए महल को देख रहे थे।
आरव और कबीर आँगन में खड़े थे।
हरिदास कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।
आरव ने पूरी रात की रिकॉर्डिंग देखी।
वीडियो में सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था—पश्चिमी कमरा, तहखाना, मृणालिनी की डायरी और वह अजीब काली परछाईं।
लेकिन एक चीज़ देखकर उसके हाथ काँपने लगे।
जहाँ उसे याद था कि मृणालिनी उसके सामने खड़ी थी, वीडियो में वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ आरव और कबीर थे।
और कैमरे के पीछे से एक बच्ची की आवाज़ आ रही थी—
“सच को बाहर ले जाओ।”
आरव ने वीडियो बंद कर दिया।
कबीर चुपचाप खड़ा था।
“तू ठीक है?” आरव ने पूछा।
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“हाँ।”
लेकिन उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे।
“मुझे रात से एक ही सपना आ रहा है।”
“क्या सपना?”
कबीर ने जवाब नहीं दिया।
उसने जेब से कुछ निकाला।
वही चाँदी की पायल।
आरव का चेहरा बदल गया।
“ये तेरे पास कैसे आई?”
कबीर ने कहा—
“जब हम तहखाने में थे, तभी मैंने इसे उठा लिया था।”
आरव ने तुरंत पायल उसके हाथ से लेने की कोशिश की।
लेकिन कबीर ने हाथ पीछे कर लिया।
“नहीं।”
उसकी आवाज़ बदल गई थी।
“ये मेरी है।”
आरव कुछ क्षण उसे देखता रहा।
“कबीर, ये मृणालिनी की थी।”
कबीर मुस्कुराया।
“मुझे पता है।”
आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“तुझे कैसे पता?”
कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
उस रात आरव गाँव के एक छोटे होटल में रुका। उसने तय किया कि सुबह शहर लौट जाएगा।
रात करीब दो बजे उसकी नींद खुली।
कमरे में कोई खड़ा था।
आरव ने मोबाइल की रोशनी जलाई।
कोई नहीं था।
फिर खिड़की पर दस्तक हुई।
टक… टक… टक…
आरव ने पर्दा हटाया।
बाहर कबीर खड़ा था।
लेकिन होटल की चौथी मंज़िल की खिड़की के बाहर कोई इंसान कैसे खड़ा हो सकता था?
आरव पीछे हट गया।
कबीर ने शीशे के दूसरी तरफ से मुस्कुराते हुए कहा—
“दरवाज़ा खोल।”
आरव ने सिर हिलाया।
“तू वहाँ कैसे है?”
कबीर की मुस्कान गायब हो गई।
उसका चेहरा धीरे-धीरे मृणालिनी जैसा बनने लगा।
फिर आवाज़ आई—
“धरोहर कभी खत्म नहीं होती। सिर्फ अपना रक्षक बदलती है।”
आरव ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ सेकंड बाद जब उसने दोबारा देखा, खिड़की के बाहर कोई नहीं था।
सुबह होते ही वह कबीर को ढूँढने गया।
कबीर होटल में नहीं था।
उसका फोन कमरे में पड़ा था।
और बिस्तर पर वही चाँदी की पायल रखी थी।
आरव ने पुलिस को सूचना दी।
कई घंटे तक खोजबीन हुई।
लेकिन कबीर का कोई पता नहीं चला।
तीन दिन बाद आरव शहर लौट आया।
उसने रुद्रगढ़ हवेली पर बनाई पूरी डॉक्यूमेंट्री इंटरनेट पर डाल दी।
वीडियो बहुत तेजी से वायरल हो गया।
लोगों ने हवेली की कहानी पर विश्वास किया।
पुराने दस्तावेज़ों की जाँच हुई।
राजेंद्र सिंह और मृणालिनी के बारे में रिकॉर्ड सच निकले।
गाँव में मृणालिनी के नाम पर एक स्मारक बनाया गया।
आरव को लगा कि अब सब खत्म हो गया।
लेकिन ठीक एक महीने बाद उसे डाक से एक पैकेट मिला।
भेजने वाले का नाम नहीं था।
अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में रुद्रगढ़ हवेली दिखाई दे रही थी।
आरव ने ध्यान से देखा।
हवेली के सामने चार लोग खड़े थे।
मृणालिनी।
हरिदास।
कबीर।
और…
आरव खुद।
लेकिन तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—
1936।
आरव की साँस रुक गई।
तस्वीर के पीछे एक और वाक्य लिखा था—
“तुम दोनों कभी यहाँ पहली बार नहीं आए थे।”
आरव के हाथ से तस्वीर गिर गई।
उसी रात उसने अपने परिवार के पुराने दस्तावेज़ खोजने शुरू किए।
उसे अपने दादा की एक डायरी मिली।
उसमें सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
“हर पीढ़ी में रुद्रगढ़ का एक वारिस लौटता है। उसे लगता है कि वह धरोहर देखने आया है। असल में धरोहर उसे देखने बुलाती है।”
आरव ने डायरी बंद कर दी।
तभी उसके कमरे की लाइट बंद हो गई।
अँधेरे में किसी बच्ची की हँसी सुनाई दी।
ही… ही… ही…
फिर वही आवाज़—
“आरव…”
उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
दीवार पर एक परछाईं थी।
छोटी बच्ची की।
लेकिन वह परछाईं अकेली नहीं थी।
उसके पीछे एक आदमी की परछाईं भी थी।
फिर तीसरी।
चौथी।
दर्जनों परछाइयाँ।
आरव पीछे हटता गया।
दीवार पर धीरे-धीरे शब्द उभरने लगे—
“कहानी खत्म नहीं हुई।”
अचानक उसका फोन बजा।
स्क्रीन पर नाम देखकर उसके हाथ काँप गए।
कबीर कॉलिंग।
आरव ने फोन उठाया।
कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई।
फिर कबीर की बहुत धीमी आवाज़ सुनाई दी—
“आरव… मुझे ढूँढना मत।”
“तू कहाँ है?”
दूसरी तरफ कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी।
कबीर बोला—
“मैं वहीं हूँ जहाँ से सब शुरू हुआ था।”
“हवेली में?”
कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर कबीर ने कहा—
“नहीं।”
उसकी आवाज़ काँपने लगी।
“तुम्हारे घर के नीचे।”
आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसी क्षण उसके पैरों के नीचे फर्श से आवाज़ आई।
ठक… ठक… ठक…
वही तीन दस्तक।
जैसी रुद्रगढ़ हवेली के पश्चिमी कमरे में सुनाई दी थी।
फर्श पर एक दरार बनने लगी।
आरव पीछे हट गया।
दरार के अंदर से ठंडी हवा आने लगी।
और फिर एक पुरानी लकड़ी की पट्टी अपने आप हट गई।
नीचे अँधेरी सीढ़ियाँ थीं।
सीढ़ियों के पास एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।
आरव ने ऊपर देखा।
दीवार पर मृणालिनी की तस्वीर लगी थी।
इस बार तस्वीर में वह अकेली नहीं थी।
उसके बगल में कबीर खड़ा था।
और दूसरी तरफ…
आरव।
मृणालिनी की आँखें तस्वीर के अंदर से सीधे आरव को देख रही थीं।
उसके होंठ धीरे-धीरे हिले।
आवाज़ कमरे में नहीं आई।
लेकिन आरव ने उसके शब्द साफ समझ लिए—
“पुरानी धरोहर को कोई नष्ट नहीं कर सकता।”
नीचे से कबीर की आवाज़ आई—
“वह सिर्फ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है।”
आरव ने टॉर्च उठाई।
और उन अँधेरी सीढ़ियों पर पहला कदम रख दिया।
उसके पीछे दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
अँधेरे में एक बच्ची की हँसी गूँजी।
और उसी के साथ…
रुद्रगढ़ की धरोहर ने अपना नया रक्षक चुन लिया।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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