part – 30 ek moka
स्कूल की घंटी बजी। दिन खत्म हो चुका था। बच्चे बैग्स लेकर बाहर दौड़ रहे थे, उनकी हंसी और शोर गलियारों में गूंज रहा था। प्रिया अपनी क्लास से बाहर निकली। उसका चेहरा अब पहले से ज्यादा नॉर्मल लग रहा था – आंखों में थोड़ी चमक लौट आई थी, मुस्कान ज्यादा सच्ची हो गई थी। सफेद साड़ी में वो सादगी से खूबसूरत लग रही थी, बाल बंधे हुए, हाथ में बैग और कुछ बच्चों की ड्रॉइंग्स। वो बच्चों को बाय कह रही थी, उनकी मासूम बातों पर हंस रही थी। “मैम, कल स्टोरी सुनाओगी ना?” एक बच्ची ने पूछा। प्रिया ने उसके गाल खींचे। “हां बेटा, जरूर।”
वो गेट की ओर बढ़ी। मन में एक हल्की खुशी थी – आज क्लास अच्छी गई थी। लेकिन जैसे ही गेट से बाहर निकली, उसकी नजर विक्रांत पर पड़ी। वो कार से बाहर खड़ा था, हाथ में एक गुलाब का फूल, चेहरा गंभीर लेकिन आंखें मुस्कुराती हुईं। प्रिया रुक गई। उसका दिल थोड़ा तेज़ धड़का। “विक्रांत… तुम?”
विक्रांत पास आया। उसकी आंखें प्रिया पर टिकीं – प्यार और नर्वसनेस से भरी। “प्रिया… आज स्कूल के बाद थोड़ा वक्त है? लेग में चलें? बात करनी है।”
प्रिया ने कुछ देर सोचा। उसकी आंखें विक्रांत के चेहरे पर टिकीं – वो चेहरा जो अब परिचित लगने लगा था। वो मुस्कुराई, हल्के से। “ठीक है विक्रांत। चलो।”
दोनों पास के एक छोटे से लेग में गए – समुद्र किनारे, जहां शाम की हवा ठंडी थी, लहरें शांत, और सूरज डूबने की कगार पर था। वे एक बेंच पर बैठ गए। विक्रांत ने गुलाब प्रिया की ओर बढ़ाया। “ये तेरे लिए।”
प्रिया ने लिया। उसकी उंगलियां फूल पर फिसलीं, आंखें नीचे। “थैंक्स विक्रांत।”
विक्रांत ने गहरी सांस ली। उसका चेहरा भावुक हो गया, आंखें प्रिया पर टिकीं – जैसे सालों का बोझ उतार रहा हो। “प्रिया… मुझे कुछ कहना है। बहुत दिन से कहना चाहता था।”
प्रिया ने सिर उठाया। उसकी आंखें विक्रांत में देख रही थीं – थोड़ी उत्सुकता, थोड़ी घबराहट। “क्या विक्रांत?”
विक्रांत ने प्रिया का हाथ थामा। उसकी आवाज कांप रही थी, लेकिन दृढ़। “प्रिया… मैं तुझे पसंद करता हूं। बहुत। कॉलेज के समय से। शिमला में जब हम मिले थे, तभी से। तेरी मुस्कान, तेरी बातें, तेरी स्ट्रेंथ… सब मुझे अच्छा लगता था। लेकिन तब तू आरव को पसंद करती थी। मैं जानता था। इसलिए पीछे हट गया। मैं हमारी दोस्ती खत्म नहीं करना चाहता था। तू मेरी अच्छी दोस्त थी, और मैं तेरी खुशी चाहता था।”
प्रिया चुप रही। उसकी आंखें नम हो गईं, चेहरा उदास लेकिन समझदार। वो विक्रांत का हाथ दबाया। “विक्रांत… मैं जानती हूं। मुझे पता था कि तुम मुझे कॉलेज के समय से पसंद करते थे। तुम्हारी नजरें… वो कुछ और कहती थीं। लेकिन तब मेरा दिल आरव के पास था।”
विक्रांत की आंखें नम हो गईं। उसका चेहरा दर्द से भरा, लेकिन मुस्कान थी। “हां प्रिया। और आरव अच्छा था। तुम दोनों साथ खुश थे। मैंने कभी बीच में नहीं आना चाहा। शादी में गया था, लेकिन रह नहीं सका। देख नहीं पाया तुझे किसी और की दुल्हन बनते। इसलिए मुंबई आ गया। लेकिन अब… अब तू यहां है। अकेली। उदास। मैं देख नहीं पाता तुझे ऐसे। प्रिया… क्या अब तू मुझे एक मौका देगी?”
प्रिया की सांस रुक गई। उसकी आंखें विक्रांत में देख रही थीं – वो सच्चाई, वो प्यार। वो चुप रही। आंसू बह रहे थे। विक्रांत ने आगे कहा, उसकी आवाज भावुक, आंखें प्रिया पर टिकीं। “प्रिया… ये मत सोचना कि आरव नहीं है तो मैं उसकी जगह लेना चाहता हूं। मैं जानता हूं आरव की जगह तेरी जिंदगी में अलग है। कोई नहीं ले सकता उसकी जगह। मैं उसकी जगह नहीं लूंगा। बस… मैं तेरी जिंदगी में अपनी जगह बनाऊंगा। तेरे साथ रहूंगा, तेरी खुशी में शामिल होऊंगा। तुझे हंसाऊंगा, तेरे दर्द में साथ दूंगा। प्रिया… मैं तुझे प्यार करता हूं। सच्चे दिल से।”
प्रिया रो पड़ी। उसकी आंखें बंद हो गईं, आंसू बह रहे थे। मन में तूफान – आरव की यादें, उसका प्यार, और विक्रांत की सच्चाई। वो विक्रांत के कंधे पर सिर रख दिया। “विक्रांत… मुझे वक्त चाहिए। आरव… वो अभी भी मेरे दिल में है। लेकिन तू… तू बहुत अच्छा है। तेरी केयर, तेरी कोशिशें… मुझे अच्छा लगता है। मैं कोशिश करूंगी।”
विक्रांत ने उसे गले लगाया। उसकी आंखें नम, लेकिन दिल खुश। “प्रिया… जितना वक्त चाहिए, लो। मैं इंतजार करूंगा। तू तैयार होगी तब।”
दोनों चुप रहे। समुद्र की लहरें आवाज कर रही थीं, सूरज डूब चुका था। विक्रांत ने प्रिया का हाथ थामा। “प्रिया… आज से नई शुरुआत?”
प्रिया ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। “हां विक्रांत। धीरे-धीरे।”
वे उठे। घर की ओर चले। विक्रांत ने प्रिया को ड्रॉप किया। “गुड नाइट प्रिया।”
प्रिया ने कहा, “गुड नाइट विक्रांत।”
घर पहुंचकर प्रिया अपने कमरे में गई। आरव की फोटो देखी। “आरव… विक्रांत अच्छा है। वो मुझे खुश करना चाहता है। क्या तू चाहेगा मैं खुश रहूं?”
रिया आई। “प्रिया… विक्रांत से बात हुई?”
प्रिया ने सब बताया। रिया खुश हो गई। “प्रिया… विक्रांत सच्चा है। तू उसे मौका दे।”
प्रिया मुस्कुराई। धीरे-धीरे वो विक्रांत को पसंद करने लगी थी – उसकी सच्चाई, उसकी धैर्य। नई शुरुआत हो रही थी।
विक्रांत घर लौटा। नानी से कहा, “नानी… प्रिया ने मौका देने की बात की।”
नानी मुस्कुराई। “बेटा… तू सच्चा है। वो समझेगी।”
विक्रांत खुश था। प्रिया को प्यार करता था – गहराई से। अब इंतजार था – प्रिया के हां का।
प्रिया सोने गई। दिल में आरव की यादें, लेकिन अब विक्रांत की उम्मीद भी। “आरव… मैं जी रही हूं। तेरे लिए। और शायद… विक्रांत के लिए भी।”
समुद्र की लहरें चल रही थीं। नई शुरुआत की लहरें।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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