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राजा दुष्यंत ओर शकुंतला

पढ़ने का समय : 6 मिनट

राजा दुष्यंत और शकुंतला

 

बहुत समय पहले की बात है। हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत अपनी वीरता, न्याय और प्रजा के प्रति प्रेम के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। एक दिन वह शिकार के लिए वन की ओर निकले। घने जंगल में हिरण का पीछा करते-करते उनका रथ काफी दूर निकल गया।

 

अचानक उनकी नजर एक शांत और सुंदर आश्रम पर पड़ी। वहाँ हिरण निडर होकर घूम रहे थे, पक्षियों की आवाज गूंज रही थी और ऋषियों के शिष्य अपने काम में लगे थे।

 

राजा ने अपना धनुष नीचे रखा और आश्रम के भीतर जाने लगे।

 

तभी उन्हें एक युवती दिखाई दी। उसके हाथ में पानी का पात्र था और वह आश्रम के पौधों में पानी डाल रही थी। उसके चेहरे पर सादगी और आँखों में अजीब सी शांति थी।

 

वह थी शकुंतला।

 

शकुंतला ऋषि कण्व के आश्रम में पली-बढ़ी थी। वह अपने सरल स्वभाव और दयालु मन के लिए जानी जाती थी।

 

राजा दुष्यंत कुछ पल उसे देखते रहे।

 

शकुंतला ने राजा को देखा तो विनम्रता से पूछा, “आप कौन हैं? क्या आप रास्ता भटककर यहाँ आए हैं?”

 

दुष्यंत ने मुस्कुराकर कहा, “मैं हस्तिनापुर का राजा दुष्यंत हूँ। शिकार करते हुए इस आश्रम तक आ पहुँचा।”

 

शकुंतला ने हाथ जोड़कर कहा, “राजन, आपका आश्रम में स्वागत है। आप थक गए होंगे। कृपया कुछ देर विश्राम कीजिए।”

 

दुष्यंत ने आश्रम में विश्राम किया, लेकिन उनका मन बार-बार शकुंतला की ओर जा रहा था।

 

कुछ दिन तक वह किसी न किसी बहाने आश्रम के आसपास रहने लगे। शकुंतला भी राजा की बातों और उनके सरल व्यवहार से प्रभावित होने लगी।

 

धीरे-धीरे दोनों के बीच प्रेम हो गया।

 

एक दिन दुष्यंत ने कहा, “शकुंतला, मैं तुम्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहता हूँ।”

 

शकुंतला ने धीमे स्वर में पूछा, “लेकिन राजन, आपका राज्य? आपकी प्रजा? क्या आप मुझे कभी भूल तो नहीं जाएंगे?”

 

दुष्यंत ने उसका हाथ थामकर कहा, “मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा। तुम मेरी पत्नी बनोगी और मैं तुम्हें सम्मान के साथ हस्तिनापुर ले जाऊँगा।”

 

दोनों ने गंधर्व विवाह किया।

 

कुछ समय बाद दुष्यंत को राज्य लौटना पड़ा। जाने से पहले उन्होंने शकुंतला से कहा, “मुझे राज्य के जरूरी काम निपटाने हैं। मैं जल्द ही तुम्हें लेने वापस आऊँगा।”

 

शकुंतला ने विश्वास के साथ कहा, “मैं आपका इंतजार करूँगी।”

 

दुष्यंत हस्तिनापुर लौट गए।

 

इधर एक दिन शकुंतला आश्रम में बैठी राजा के बारे में सोच रही थी। तभी ऋषि दुर्वासा वहाँ आए। शकुंतला राजा की यादों में इतनी खोई हुई थी कि वह उनका स्वागत नहीं कर सकी।

 

ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गए।

 

उन्होंने कहा, “जिसके विचारों में खोकर तुमने मेरा अपमान किया है, वही व्यक्ति तुम्हें भूल जाएगा।”

 

शकुंतला घबरा गई।

 

वह हाथ जोड़कर बोली, “ऋषिवर, मुझसे भूल हो गई। मुझे क्षमा कर दीजिए।”

 

शकुंतला की विनती देखकर ऋषि का क्रोध कुछ शांत हुआ। उन्होंने कहा, “जब राजा को तुम्हारे प्रेम की कोई निशानी दिखाई जाएगी, तब उसे सब याद आ जाएगा।”

 

शकुंतला के पास दुष्यंत की दी हुई एक अंगूठी थी।

 

कुछ समय बाद शकुंतला गर्भवती हुई। ऋषि कण्व ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि अब उसे अपने पति के पास जाना चाहिए।

 

शकुंतला राजा दुष्यंत से मिलने हस्तिनापुर के लिए निकल पड़ी।

 

रास्ते में वह एक नदी के किनारे रुकी। पानी में हाथ डालते समय उसकी उंगली से राजा की दी हुई अंगूठी निकलकर नदी में गिर गई। उसे इसका पता ही नहीं चला।

 

जब वह हस्तिनापुर पहुँची तो राजा दुष्यंत के सामने गई।

 

राजा ने उसे देखा, लेकिन श्राप के कारण उन्हें कुछ याद नहीं था।

 

शकुंतला की आँखों में आँसू आ गए।

 

“राजन, क्या आप मुझे पहचानते नहीं?”

 

दुष्यंत ने गंभीर होकर कहा, “मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रहा हूँ। तुम कौन हो?”

 

शकुंतला का दिल टूट गया।

 

“मैं वही शकुंतला हूँ, जिससे आपने विवाह किया था। आपने वचन दिया था कि आप मुझे अपने साथ ले जाएंगे।”

 

दुष्यंत परेशान हो गए। उन्हें शकुंतला की बातें समझ नहीं आ रही थीं।

 

शकुंतला ने अपनी अंगूठी दिखाने के लिए हाथ देखा, लेकिन अंगूठी वहाँ थी ही नहीं।

 

वह समझ गई कि शायद रास्ते में अंगूठी खो गई है।

 

अपमान और दुख से वह वहाँ से चली गई।

 

कुछ समय बाद एक मछुआरे को नदी में एक बड़ी मछली मिली। मछली काटने पर उसके अंदर से एक चमकती हुई अंगूठी निकली। अंगूठी पर राजा दुष्यंत का नाम खुदा था।

 

मछुआरा वह अंगूठी लेकर राजमहल पहुँचा।

 

जैसे ही दुष्यंत ने अंगूठी देखी, अचानक उनके मन में पुरानी सारी यादें लौट आईं।

 

उन्हें आश्रम, शकुंतला, उनका विवाह और अपना वादा—सब कुछ याद आ गया।

 

राजा पछतावे से भर गए।

 

“मैंने शकुंतला के साथ क्या कर दिया?”

 

उन्होंने तुरंत सैनिकों को उसे खोजने भेजा, लेकिन शकुंतला आश्रम छोड़ चुकी थी।

 

कई वर्षों तक राजा उसे खोजते रहे।

 

उधर शकुंतला ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम था भरत। बालक बचपन से ही बहुत साहसी और निडर था।

 

एक दिन राजा दुष्यंत वन में गए। वहाँ उन्होंने एक छोटे बालक को सिंह के बच्चे के साथ निडर होकर खेलते देखा।

 

राजा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम कौन हो?”

 

बालक ने गर्व से कहा, “मैं भरत हूँ।”

 

दुष्यंत के मन में अजीब सी भावना उठी।

 

उन्होंने पूछा, “तुम्हारे पिता कौन हैं?”

 

भरत ने कहा, “मेरे पिता हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत हैं।”

 

दुष्यंत स्तब्ध रह गए।

 

तभी सामने शकुंतला आ गई।

 

दोनों की आँखें मिलते ही कई वर्षों की दूरी जैसे एक पल में खत्म हो गई।

 

दुष्यंत उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

 

“शकुंतला, मुझे क्षमा कर दो। मैंने तुम्हें कभी जानबूझकर नहीं ठुकराया था। मैं उस समय तुम्हें पहचान नहीं पा रहा था।”

 

शकुंतला की आँखों में आँसू थे।

 

उसने कहा, “राजन, दुख मुझे आपके भूलने का नहीं था। दुख इस बात का था कि जिस व्यक्ति पर मैंने सबसे ज्यादा विश्वास किया, उसी के सामने मुझे अपने प्रेम को साबित करना पड़ा।”

 

दुष्यंत ने सिर झुका लिया।

 

“मैं तुम्हारा विश्वास फिर से जीतना चाहता हूँ।”

 

शकुंतला कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा, “विश्वास टूटने के बाद उसे वापस पाने में समय लगता है। लेकिन अगर आपका मन सच में बदल गया है, तो मैं अपने बेटे को उसके पिता से दूर नहीं रखूँगी।”

 

दुष्यंत ने भरत को अपने पास बुलाया और उसे गले लगा लिया।

 

इसके बाद राजा दुष्यंत शकुंतला और भरत को सम्मान के साथ हस्तिनापुर ले गए।

 

समय के साथ भरत बड़ा हुआ और अपनी वीरता, न्याय और साहस के लिए प्रसिद्ध हुआ। आगे चलकर उसी के नाम पर इस भूमि को भारतवर्ष कहा गया।

 

राजा दुष्यंत और शकुंतला की कहानी केवल प्रेम की कहानी नहीं थी। यह विश्वास, वचन और इंतजार की कहानी थी।

 

उनका प्रेम यह सिखाता है कि सच्चे रिश्ते केवल वादों से नहीं, बल्कि उन्हें निभाने की हिम्मत से मजबूत होते हैं।

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