अगली सुबह आरव सीधे पुराने मंदिर पहुँचा।
हरिदास बाबा मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे थे।
आरव ने उनके सामने लाल डायरी रख दी।
बाबा ने डायरी देखते ही आँखें बंद कर लीं।
“तुमने इसे खोल लिया।”
“आप जानते थे इसके बारे में?”
बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया।
आरव ने कठोर आवाज में पूछा—
“इसमें आपका नाम क्यों है?”
काफी देर तक चुप रहने के बाद बाबा बोले—
“क्योंकि मैं भी दोषी हूँ।”
आरव स्तब्ध रह गया।
“किस चीज का?”
बाबा ने मंदिर के पीछे बने छोटे कमरे की ओर इशारा किया।
“वहाँ एक पुराना संदूक है। उसे खोलो।”
आरव ने संदूक खोला।
अंदर दर्जनों पुराने कागज थे।
जमीन के कागज।
शिकायतें।
पुराने अखबार।
और कई तस्वीरें।
एक तस्वीर में ठाकुर रघुवीर सिंह था।
उसके पास एक युवा हरिदास खड़ा था।
आरव ने तस्वीर उठाई।
“आप ठाकुर के साथ थे?”
बाबा की आँखों में आँसू आ गए।
“मैं उसका मुंशी था।”
आरव चुप रहा।
“मैंने उसकी बहुत मदद की,” बाबा बोले। “गरीबों की जमीन के कागज बदले। झूठे दस्तावेज बनाए। लोगों को धमकाया। और हर बार खुद को समझाया कि मैं सिर्फ नौकरी कर रहा हूँ।”
“फिर?”
“फिर एक दिन मैंने उस आईने को देखा।”
बाबा की आवाज काँपने लगी।
“ठाकुर ने मुझे उसके कमरे में बुलाया था। उसने कहा था कि आईना मुझे मेरा भविष्य दिखाएगा।”
“और आपने क्या देखा?”
बाबा ने सिर उठाया।
“मैंने खुद को देखा… लेकिन बूढ़ा नहीं। एक लाश के पास खड़ा देखा।”
आरव की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
“किसकी लाश?”
बाबा ने कहा—
“एक लड़की की।”
कुछ पल के लिए मंदिर में बिल्कुल सन्नाटा छा गया।
“उस लड़की का नाम मीरा था। वह किसान की बेटी थी। उसके पिता ने ठाकुर की जमीन हड़पने की कोशिश का विरोध किया था।”
“क्या हुआ उसके साथ?”
बाबा की आँखों से आँसू निकल आए।
“मीरा ने सबूत इकट्ठा कर लिए थे। वह शहर जाकर शिकायत करने वाली थी। लेकिन वह कभी शहर नहीं पहुँच पाई।”
आरव समझ गया।
“उसे मार दिया गया?”
बाबा ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“और आपने?”
“मैंने सब देखा।”
“फिर पुलिस को क्यों नहीं बताया?”
बाबा ने काँपते हुए कहा—
“क्योंकि मैं डर गया था।”
यही वह बात थी जिसे समाज बार-बार दोहराता है।
अन्याय देखकर चुप रहना।
गलत देखकर आँखें बंद कर लेना।
और फिर खुद को निर्दोष समझना।
आरव ने पूछा—
“मीरा की लाश कहाँ है?”
बाबा ने धीरे से कहा—
“हवेली के नीचे।”
उसी रात आरव और कबीर हवेली पहुँचे।
हरिदास बाबा ने उन्हें एक पुराना नक्शा दिया था।
हवेली के तहखाने में जाने का रास्ता एक टूटी हुई दीवार के पीछे था।
दोनों नीचे उतरे।
सीढ़ियाँ इतनी पुरानी थीं कि हर कदम पर धूल उड़ रही थी।
नीचे पहुँचकर उन्हें एक कमरा मिला।
कमरे की दीवार पर दर्जनों नाम लिखे थे।
कुछ नाम मिटाए गए थे।
कुछ के नीचे लाल निशान थे।
बीच में एक बड़ा आईना लगा था।
आरव ने उसमें देखा।
इस बार उसे अपना प्रतिबिंब नहीं दिखा।
उसे पूरा सूरजपुर दिखाई दिया।
लोगों के घर।
गलियाँ।
मंदिर।
बाजार।
और हर व्यक्ति के पीछे उसकी एक काली परछाईं।
किसी की परछाईं लालच थी।
किसी की झूठ।
किसी की हिंसा।
किसी की चुप्पी।
फिर एक आवाज आई—
“तुम्हें लगता है राक्षस बाहर है?”
आरव ने चारों तरफ देखा।
“राक्षस कौन है?”
आईने से जवाब आया—
“जिस दिन इंसान गलत देखकर भी चुप रहता है, उसी दिन उसके भीतर राक्षस पैदा होता है।”
अचानक कबीर चीख पड़ा।
“आरव!”
आरव ने देखा—कबीर आईने के सामने खड़ा था।
आईने में कबीर का चेहरा नहीं था।
वहाँ कबीर किसी आदमी पर हमला कर रहा था।
आरव ने उसे पीछे खींच लिया।
“तूने क्या देखा?”
कबीर ने काँपते हुए कहा—
“मैंने… अपना सच देखा।”
“क्या सच?”
कबीर ने कुछ नहीं कहा।
तभी तहखाने में किसी लड़की के रोने की आवाज आई।
बहुत धीमी।
बहुत दूर से।
“मुझे बाहर निकालो…”
आरव ने आवाज का पीछा किया।
दीवार के पीछे एक बंद जगह थी।
उसने पत्थर हटाया।
अंदर एक पुराना लकड़ी का संदूक मिला।
संदूक के अंदर कपड़े का एक टुकड़ा और एक पुरानी चूड़ी थी।
कपड़े पर खून के धब्बे थे।
और नीचे एक छोटा-सा कागज था।
उस पर लिखा था—
“मैं मीरा हूँ। अगर यह कागज किसी को मिले, तो समझ लेना कि मुझे समाज ने नहीं, समाज की चुप्पी ने मारा है।”
आरव की आँखें भर आईं।
तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।
कबीर ने जोर से उसे खींचा।
लेकिन दरवाजा नहीं खुला।
आईने में मीरा दिखाई दी।
उसका चेहरा डरावना नहीं था।
वह सिर्फ दुखी थी।
उसने आरव की तरफ देखकर कहा—
“मुझे न्याय नहीं चाहिए… मुझे सच चाहिए।”
फिर आईने की सतह पर एक नया नाम उभरा—
“सूरजपुर का प्रधान।”
आरव समझ गया।
अगला चेहरा सिर्फ एक आदमी का नहीं था।
यह चेहरा पूरे समाज के सामने आने वाला था।
और शायद इस बार आईना किसी एक इंसान को नहीं, पूरे कस्बे को दिखाने वाला था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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