सुबह होते ही आरव और कबीर गाँव की चौपाल में पहुँचे।
गाँव के लोग रोज़ की तरह अपने काम में लगे थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि आज उनके सामने बीस साल पुराना एक ऐसा सच आने वाला है, जिसे सुनकर पूरे गाँव की नींव हिल जाएगी।
आरव ने सबको बुलाया।
धीरे-धीरे गाँव के बुज़ुर्ग, महिलाएँ और नौजवान वहाँ इकट्ठा हो गए।
ठाकुर दीनदयाल भी आए।
आरव ने उनके सामने पुरानी डायरी रख दी।
“यह सावित्री की डायरी है।”
चौपाल में सन्नाटा छा गया।
एक बूढ़ी महिला ने काँपती आवाज़ में पूछा—
“सावित्री?”
“हाँ,” आरव ने कहा। “जिसे हम सब साया के नाम से जानते रहे।”
फिर आरव ने डायरी में लिखी पूरी कहानी सबको सुनाई।
उसने बताया कि सावित्री भागी नहीं थी।
उसकी हत्या हुई थी।
उसे पुराने मकान के नीचे बने कमरे में बंद किया गया था।
उसके पति ने लोगों से झूठ बोला था।
और वर्षों तक उसका सच दबा रहा।
कुछ लोगों की आँखों में आँसू आ गए।
सावित्री की छोटी बहन, जो अब बूढ़ी हो चुकी थी, भीड़ से आगे आई।
उसने डायरी को छुआ और रोते हुए कहा—
“मुझे पता था… मेरी बहन झूठ नहीं बोल सकती थी।”
ठाकुर दीनदयाल ने सिर झुका लिया।
उन्होंने कहा, “हमने उस समय सच जानने की कोशिश नहीं की। हमें लगा वह भाग गई होगी। शायद हमारी चुप्पी भी उसकी आत्मा को बाँधे रही।”
आरव ने कहा, “अब हमें उसका नाम हमेशा के लिए साया नहीं, सावित्री कहना होगा।”
सबने एक साथ सिर झुका दिया।
उसी समय आसमान में बादल घिरने लगे।
हवा तेज़ हो गई।
दूर पुराने मकान की तरफ़ से घंटी बजने की आवाज़ आई।
टन…
टन…
टन…
गाँव के लोग डरकर उस दिशा में देखने लगे।
आरव समझ गया।
“वह हमें बुला रही है।”
कुछ लोग उसके साथ पुराने मकान की ओर चल पड़े।
मकान के अंदर पहुँचते ही उन्हें पहले से कहीं अधिक शांति महसूस हुई।
वह घर अब डरावना नहीं लग रहा था।
दीवारों पर जमी काली परत जैसे हल्की हो गई थी।
नीचे वाले कमरे में पहुँचकर आरव ने दीपक जलाया।
सावित्री की डायरी उसके सामने रखी थी।
उसने आखिरी बार कहा—
“सावित्री, तुम्हारे साथ जो हुआ उसका सच अब सब जानते हैं। तुम्हारा नाम अब किसी डर की पहचान नहीं, बल्कि तुम्हारे अस्तित्व की पहचान है।”
कमरे में हल्की हवा चली।
दीपक की लौ एक पल के लिए बहुत ऊँची हो गई।
फिर सामने धुंध बनने लगी।
धुंध के बीच सावित्री दिखाई दी।
लेकिन इस बार वह वैसी नहीं थी जैसी आरव ने पहली रात देखी थी।
उसके लंबे बाल व्यवस्थित थे।
चेहरा शांत था।
आँखों में डर नहीं था।
उसने अपनी बहन की तरफ़ देखा।
दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।
सावित्री ने कुछ नहीं कहा।
सिर्फ़ मुस्कुराई।
उसकी बहन ने हाथ जोड़ दिए।
“जा बहन… अब तू आज़ाद है।”
सावित्री ने धीरे से सिर झुका दिया।
उसी क्षण कमरे में एक मधुर हवा चली।
दीपक की लौ सुनहरी हो गई।
सावित्री की आत्मा धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी।
उसके आसपास की अँधेरी परछाइयाँ गायब होने लगीं।
आरव ने अपनी कलाई देखी।
काला निशान पूरी तरह मिट चुका था।
टूटा हुआ आईना भी अपने आप राख में बदल गया।
और उस राख के साथ काला साया भी हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
सावित्री की आत्मा प्रकाश की ओर उठने लगी।
जाने से पहले उसने आरव और कबीर की तरफ़ देखा।
उसके होंठ हिले।
आवाज़ बहुत धीमी थी—
“धन्यवाद।”
फिर वह प्रकाश में विलीन हो गई।
कमरे में एक पल के लिए पूर्ण शांति छा गई।
बाहर अचानक बारिश शुरू हो गई।
लेकिन यह बारिश पिछली रात जैसी डरावनी नहीं थी।
बूँदें धीरे-धीरे गिर रही थीं।
आसमान साफ़ होने लगा।
सूरज की किरणें बादलों के बीच से निकल आईं।
गाँव वालों ने उसी दिन पुराने मकान के सामने सावित्री के नाम का एक छोटा-सा दीपक जला दिया।
अब वहाँ कोई डर नहीं था।
रात होने पर भी उस मकान से चीखें नहीं आती थीं।
न पायल की आवाज़।
न काली परछाईं।
न बंद कमरे की दस्तक।
सिर्फ़ हवा चलती और पेड़ों के पत्ते धीरे-धीरे हिलते।
कुछ महीनों बाद उस पुराने मकान को गिराकर वहाँ एक छोटा-सा मंदिर और स्मृति-स्थान बनाया गया।
दीवार पर एक पत्थर लगाया गया, जिस पर लिखा था—
“सावित्री — जिसे दुनिया ने साया समझा, लेकिन जो अंत में सच की रोशनी बन गई।”
आरव जब भी उस रास्ते से गुजरता, कुछ पल वहाँ रुकता।
उसे आज भी पहली बारिश वाली रात याद आती।
वही पुराना मकान।
वही काली परछाईं।
वही डर।
लेकिन अब उसे डर नहीं लगता था।
क्योंकि वह जान चुका था कि हर भटकती आत्मा बदला लेने नहीं आती।
कुछ आत्माएँ सिर्फ़ अपना सच सुनाए जाने का इंतज़ार करती हैं।
उस शाम आरव ने आसमान की ओर देखा।
हल्की बारिश हो रही थी।
एक पल के लिए बादलों के बीच उसे एक शांत चेहरा दिखाई दिया।
सावित्री मुस्कुरा रही थी।
फिर वह दृश्य धीरे-धीरे आसमान में घुल गया।
बारिश थम गई।
हवा शांत हो गई।
और उस रात, बीस साल बाद, सावित्री की आत्मा को आखिरकार मुक्ति मिल गई।
समाप्त।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
प्रातिक्रिया दे