Part – 12 barfili rato ka raj
शिमला में अब ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। दिसंबर की शुरुआत हो चुकी थी और पहाड़ियों पर बर्फ की चादर बिछने लगी थी। ठाकुर हाउस की छत पर बर्फ जमा हो रही थी, और लॉन में हर सुबह पाला पड़ता। प्रिया अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी, लेकिन उसका मन कहीं और भटक रहा था। विक्रांत के साथ दोस्ती गहरी हो रही थी – वो दोनों लाइब्रेरी में घंटों बैठते, पुरानी दुश्मनी के कागजात पढ़ते, और कभी-कभी हल्की-फुल्की बातें करते। लेकिन प्रिया का ध्यान बार-बार आरव की ओर जाता।
आरव अब पहले जैसा नहीं रहा था। वो प्रिया से नजरें मिलाने में हिचकिचाता, बात करते वक्त उसकी आवाज में एक अजीब सी कंपकंपी आ जाती। रात को जब सब सो जाते, वो लॉन में अकेला टहलता, सिगरेट पीता (जो पहले कभी नहीं पीता था), और दूर पहाड़ियों को देखता रहता। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि उसके दिल में क्या हो रहा है। प्रिया उसके लिए बचपन से छोटी बहन थी – वो जिसे उसने खोया था और फिर पाया। लेकिन अब जब खून का रिश्ता नहीं रहा, तो वो पुराने एहसास नए रंग लेने लगे थे। वो एहसास जो वो खुद से छिपा रहा था – प्रिया को देखकर दिल का तेज़ धड़कना, उसकी मुस्कान पर मन का बहक जाना, उसकी हर छोटी बात पर ध्यान देना। लेकिन वो खुद को कोसता – “ये गलत है। वो मेरी बहन है। मैं उसका भाई हूं।”
एक शाम प्रिया और विक्रांत कॉलेज की कैंटीन में बैठे थे। विक्रांत ने एक पुराना फोटो दिखाया – अपनी दादी और ठाकुर हरि सिंह की एक साथ तस्वीर। “देख प्रिया, ये 1945 की है। दोनों मुस्कुरा रहे हैं। दुश्मनी बाद में बनी।”
प्रिया ने फोटो छुआ। “विक्रांत, शायद हमारी मुलाकात संयोग नहीं। हम पुरानी गलतियां सुधार रहे हैं।”
विक्रांत ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… मुझे तुझसे बात करके बहुत सुकून मिलता है। तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है।”
प्रिया मुस्कुराई, लेकिन उसका मन कहीं और था। “विक्रांत, तू भी मेरा अच्छा दोस्त है।”
बस दोस्त। अभी और कुछ नहीं।
घर लौटते वक्त आरव कार में था। प्रिया बैक सीट पर बैठी। रिया आगे। रिया ने कहा, “भैया, आज प्रिया और विक्रांत फिर लाइब्रेरी में थे। पुरानी दुश्मनी खत्म करने का मिशन चल रहा है।”
आरव का हाथ स्टीयरिंग पर कस गया। “अच्छा है।”
लेकिन उसकी आवाज में कुछ था। प्रिया ने आईने से उसे देखा। आरव की आंखें सड़क पर थीं, लेकिन चेहरा तना हुआ।
रात को डिनर के बाद प्रिया अपनी डायरी लिख रही थी। आरव कमरे में आया। “प्रिया… सो नहीं रही?”
“नहीं भैया। एग्जाम की तैयारी।”
आरव उसके पास बैठ गया। “विक्रांत से मिलकर कैसा लग रहा है?”
प्रिया ने पेन रखा। “अच्छा लग रहा है। वो सच्चा दोस्त है।”
आरव चुप रहा। फिर बोला, “अगर वो तेरे से… कुछ और कहे तो?”
प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “भैया… तुम आजकल ऐसे क्यों पूछ रहे हो? जैसे… जल रहे हो।”
आरव चौंका। वो उठ खड़ा हुआ। “जल? नहीं प्रिया। बस… तेरी खुशी चाहता हूं। तूने इतना स्ट्रगल किया है, कोई गलत इंसान तेरे जीवन में न आए।”
लेकिन उसकी आंखें कुछ और कह रही थीं। प्रिया ने उसका हाथ पकड़ा। “भैया… तुम मेरे लिए सबसे इम्पॉर्टेंट हो। कोई भी आए या जाए, तुम हमेशा रहोगे।”
आरव का दिल पिघल गया। उसने प्रिया के हाथ को धीरे से दबाया। उस पल दोनों के बीच एक अनकही करंट दौड़ गई। आरव ने हाथ छुड़ा लिया और बाहर चला गया। बाहर बर्फ गिर रही थी। वो लॉन में खड़ा हो गया। दिल चीख रहा था – “मैं तुझे प्यार करने लगा हूं प्रिया… लेकिन बोल नहीं सकता।”
प्रिया कमरे में अकेली रह गई। उसका दिल भी तेज़ धड़क रहा था। आरव की नजरें, उसका स्पर्श – वो भाई वाला नहीं लग रहा था। वो खुद से सवाल कर रही थी – “क्या मैं भी…?” लेकिन वो जवाब से डर रही थी।
अगले दिन
कॉलेज में अवनी ने प्रिया को एक पुराना लेटर थमाया। “ये विक्रम ने जेल से भिजवाया है। पढ़।”
लेटर में लिखा था – “प्रिया, विक्रांत से दूर रह। राठौर फैमिली ने ही तेरी मां की मौत की साजिश रची थी। 1947 की जमीन की लड़ाई में ठाकुरों को हराने के लिए उन्होंने ब्रिटिश एजेंट से मिलकर रानी को निशाना बनाया। सच ढूंढ।”
प्रिया कांप गई। वो विक्रांत के पास गई। “ये सच है?”
विक्रांत हैरान। “प्रिया… विक्रम झूठ बोल रहा है। बदला लेने के लिए। मेरी दादी ने कभी ऐसा नहीं लिखा।”
लेकिन प्रिया का मन डोल गया। वो घर लौटी और आरव को लेटर दिखाया। आरव ने पढ़ा। उसका चेहरा लाल हो गया। “प्रिया… अगर ये सच भी है तो पुरानी बात है। लेकिन विक्रांत से दूर रह।”
प्रिया ने कहा, “भैया… तुम क्यों इतना गुस्सा हो रहे हो?”
आरव चीखा, “क्योंकि मैं तुझे खोना नहीं चाहता! क्योंकि… क्योंकि तू मेरे लिए बहुत खास है!”
कमरे में सन्नाटा छा गया। प्रिया की आंखें बड़ी हो गईं। आरव ने सिर पकड़ लिया। “सॉरी प्रिया… मैं… मैं नहीं जानता क्या बोल रहा हूं।”
वो बाहर भाग गया। प्रिया पीछे दौड़ी। बर्फ गिर रही थी। लॉन में आरव खड़ा था। प्रिया उसके पास गई। “भैया… क्या मतलब था तुम्हारा?”
आरव ने पलटा। आंखें लाल। “प्रिया… मैं तुझे बहन की तरह प्यार करता हूं… लेकिन अब… अब वो प्यार बदल रहा है। मैं खुद से लड़ रहा हूं। तू मेरी जिंदगी है। विक्रांत या कोई और तेरे करीब आए, मुझे बर्दाश्त नहीं होता।”
प्रिया की सांस रुक गई। वो पीछे हटी। “भैया… तुम…?”
आरव ने सिर झुका लिया। “मैं गलत हूं प्रिया। तू मुझे भाई मानती है। मैं वो रिश्ता नहीं तोड़ना चाहता। लेकिन दिल… दिल नहीं मानता।”
प्रिया रो पड़ी। वो आरव के पास गई और उसे गले लगा लिया। “भैया… मैं भी कन्फ्यूज हूं। तुम मेरे लिए सबसे बड़े सहारे हो। लेकिन अब… अब ये एहसास नया है। मुझे वक्त चाहिए।”
दोनों बर्फ में खड़े रहे। गले लगे। आंसू बह रहे थे। आरव के मन में वो एहसास अब बाहर आ चुका था – प्रिया के लिए प्यार, जो भाई वाले प्यार से आगे बढ़ चुका था। धीरे-धीरे, बिना जल्दबाजी के।
प्रिया सो नहीं पाई। आरव भी नहीं। दोनों अलग-अलग कमरों में, लेकिन दिल एक-दूसरे के पास।
बर्फीली रात के बाद ठाकुर हाउस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। प्रिया और आरव दोनों एक-दूसरे से नजरें चुरा रहे थे। ब्रेकफास्ट टेबल पर राजेश पापा और आदित्य अंकल बातें कर रहे थे, रिया चुपके से दोनों को देख रही थी, लेकिन आरव और प्रिया चुप। आरव की प्लेट में टोस्ट पड़ा था, लेकिन वो बस कॉफी पी रहा था। उसकी आंखें लाल थीं – रात भर नींद नहीं आई थी।
रात को जो हुआ था, वो उसके दिमाग में बार-बार घूम रहा था। प्रिया को गले लगाना, उसके आंसू महसूस करना, और फिर वो कबूलनामा – “तू मेरे लिए बहुत खास है…”। वो शब्द उसके मुंह से निकल गए थे, और अब वो खुद को कोस रहा था। “मैंने क्या कर दिया? वो मुझे भाई मानती है। बचपन से। मैंने उसका विश्वास कैसे तोड़ सकता हूं?”
आरव उठा और अपने कमरे में चला गया। दरवाजा बंद किया। अंदर अकेला बैठा, सिर पकड़ लिया। उसका मन दो हिस्सों में बंट गया था।
एक तरफ था वो आरव जो प्रिया को छोटी बहन मानता था – वो जो उसे बचपन में गोद में उठाता था, जो उसके लापता होने पर सालों रोया था, जो उसे वापस पाकर सबसे खुश हुआ था। वो आरव जो प्रिया की हर खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार था, जो उसे विक्रांत या किसी और से दूर रखना चाहता था सिर्फ इसलिए क्योंकि वो उसकी “छोटी बहन” थी। वो रिश्ता जो सालों से उसकी जिंदगी का सहारा था।
दूसरी तरफ था वो आरव जो अब प्रिया को एक और नजर से देखने लगा था। जब खून का रिश्ता टूटा, तो दिल ने पुरानी सीमाएं तोड़ दीं। प्रिया की मुस्कान अब उसे सिर्फ प्यारी नहीं, बल्कि दिल को छूने वाली लगती थी। उसकी आंखें देखकर मन बहकता था। उसकी हंसी सुनकर दिल में एक अजीब सी गुदगुदी होती। वो एहसास जो वो खुद से छिपा रहा था – प्यार। लेकिन वो प्यार जो गलत लग रहा था। “समाज क्या कहेगा? फैमिली क्या कहेगी? प्रिया खुद क्या सोचेगी?”
आरव ने आईने के सामने खड़ा होकर खुद से बात की। “आरव ठाकुर… तू पागल हो गया है। वो तेरी बहन है। तूने उसे बचाया है, उसका सहारा बना है। अब ये क्या? अगर तूने कुछ कहा तो वो तुझसे दूर हो जाएगी। तेरी जिंदगी खाली हो जाएगी।”
लेकिन दिल नहीं मान रहा था। वो प्रिया की हर छोटी बात याद कर रहा था – कैसे वो मुस्कुराती है, कैसे साड़ी में खूबसूरत लगती है, कैसे उसकी हिम्मत देखकर वो प्रेरित होता है। वो सोच रहा था कि अगर प्रिया किसी और की हो गई – विक्रांत की या किसी और की – तो वो जी नहीं पाएगा। लेकिन साथ ही डर था – अगर उसने अपने एहसास कबूले तो प्रिया उसे हमेशा के लिए खो देगी।
दोपहर को आरव अपने NGO के आश्रम गया। वहां छोटे-छोटे अनाथ बच्चे थे। वो उन्हें पढ़ाता, खेलता। एक छोटी लड़की – नाम था नेहा – आरव के पास आई। “अंकल, आप उदास क्यों हो?”
आरव ने उसे गोद में उठाया। “कुछ नहीं बेटा। बस थक गया हूं।”
नेहा ने कहा, “अंकल, जब मैं उदास होती हूं तो अपनी दीदी को याद करती हूं जो ऊपर है। आप भी किसी को याद कर रहे हो?”
आरव की आंखें भर आईं। वो प्रिया को याद कर रहा था। वो बच्ची को गले लगाकर बोला, “हां बेटा… बहुत याद आ रही है।”
वहां से लौटते वक्त आरव ने फैसला किया – अपने एहसास दबा देगा। प्रिया की खुशी सबसे ऊपर है। अगर वो विक्रांत को पसंद करेगी तो वो सपोर्ट करेगा। लेकिन अंदर से वो टूट रहा था।
घर लौटा तो प्रिया लॉन में खड़ी थी। बर्फ पिघल रही थी, धूप निकली थी। आरव उसके पास गया। “प्रिया… कल रात के लिए सॉरी। मैंने कुछ गलत कहा। तू मुझे भाई ही मान। मैं वैसा ही रहूंगा।”
प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “भैया… तुमने कुछ गलत नहीं कहा। मैं भी कन्फ्यूज हूं। लेकिन तुम मेरे लिए हमेशा भाई रहोगे। वो रिश्ता मैं नहीं खोना चाहती।”
आरव ने मुस्कुराने की कोशिश की। “हां… बस भाई।”
लेकिन उसके दिल में तूफान था। वो मुस्कुराया, लेकिन अंदर से रो रहा था। वो प्रिया से दूर जाने लगा, लेकिन प्रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया। “भैया… दूर मत जाना। मुझे तुम्हारी जरूरत है।”
आरव रुक गया। उसने प्रिया को गले लगा लिया। इस बार भाई की तरह। लेकिन उसका दिल चीख रहा था – “मैं तुझे प्यार करता हूं प्रिया… लेकिन चुप रहूंगा। तेरी खुशी के लिए।”
शाम को विक्रांत का कॉल आया। प्रिया ने उठाया। “प्रिया… कल बर्फ में वॉक चलें? सिर्फ दोस्तों की तरह।”
प्रिया ने आरव की तरफ देखा। आरव मुस्कुराया। “जा प्रिया। एंजॉय कर।”
लेकिन उसकी मुस्कान के पीछे दर्द था। वो कमरे में गया और दरवाजा बंद कर लिया। अकेले में रोया। उसका इमोशनल कॉन्फ्लिक्ट चरम पर था – प्यार और भाई वाले रिश्ते के बीच फंसा। वो प्रिया को खोना नहीं चाहता था, लेकिन अपना प्यार भी कबूल नहीं कर सकता था।
रिया ने प्रिया से कहा, “यार, आरव भैया आज बहुत उदास हैं। लगता है वो तुझसे…”
प्रिया ने कहा, “रिया… मुझे वक्त चाहिए। सब समझने के लिए।”
रात को आरव छत पर खड़ा था। बर्फीली हवा चल रही थी। वो प्रिया की तस्वीर देख रहा था – बचपन की। “प्रिया… मैं तेरा भाई हूं। हमेशा रहूंगा। मेरा प्यार दबा दूंगा।”
लेकिन दिल नहीं मान रहा था। वो एहसास और मजबूत हो रहा था। धीरे-धीरे।
दूसरी तरफ विक्रांत भी प्रिया को पसंद करने लगा था। लेकिन आरव का दर्द कोई नहीं देख रहा था।
अवनी ने विक्रम को फोन किया। “अब प्रिया और आरव आपस में उलझ गए हैं। हमारा प्लान काम कर रहा है।”
आरव प्यार
जो वो छिपा रहा था, दर्द जो वो सह रहा था। क्या वो कभी कबूलेगा? या हमेशा चुप रहेगा?
जाने के लिए बने रहिए मेरी स्टोरी के साथ।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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