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Dil sabhal ja jara part – 11

पढ़ने का समय : 5 मिनट

Part – 11 “दिल की अनकही हलचल”

 

शिमला की सर्दियां शुरू हो चुकी थीं। सुबह-सुबह कोहरा इतना घना कि ठाकुर हाउस का लॉन भी धुंधला दिखता। प्रिया अपनी बालकनी में खड़ी थी, हाथ में गर्म चाय का मग, और मन में उलझनें। विक्रांत और ठाकुर-राठौर की पुरानी दुश्मनी का सच अब सबके सामने था। अवनी ने कॉलेज में अफवाह फैला दी थी – “प्रिया और विक्रांत साथ घूम रहे हैं, लेकिन उनके खानदान सदियों से दुश्मन हैं।”

 

प्रिया को बुरा लग रहा था। विक्रांत अच्छा दोस्त बन रहा था, लेकिन अब हर मुलाकात पर एक अनजाना दबाव महसूस होता। और सबसे बड़ी उलझन थी आरव भैया की।

 

आरव पिछले कुछ दिनों से थोड़ा अलग लग रहा था। पहले जहां वो प्रिया को हर समय चिढ़ाता, हंसाता था, अब उसकी नजरें प्रिया पर टिकतीं और फिर जल्दी हट जातीं। बात करते वक्त आवाज में एक अजीब सी गर्माहट आ जाती। प्रिया ने नोटिस किया, लेकिन समझ नहीं पाई। आखिर आरव तो उसका भाई था – दिल से, अगर खून से नहीं भी।

 

एक शाम कॉलेज से लौटते वक्त आरव कार लेकर आया। रिया भी साथ थी। रिया ने बैक सीट पर बैठते हुए कहा, “भैया, आज प्रिया को विक्रांत ने फिर मैसेज किया था। कॉफी के लिए पूछ रहा था।”

 

आरव का चेहरा एक पल को सख्त हो गया। उसने आईने से प्रिया को देखा। “तू जाएगी?”

 

प्रिया ने कंधे उचकाए। “नहीं भैया। अभी एग्जाम हैं। और… दुश्मनी वाली बात भी है ना।”

 

आरव ने राहत की सांस ली, लेकिन खुद को छिपाने की कोशिश की। “हां, सही है। पुरानी बातें भूलना आसान नहीं।”

 

घर पहुंचकर रिया कमरे में प्रिया के पास आई। “यार, तुझे नहीं लगता आरव भैया थोड़े… जल रहे हैं? विक्रांत का नाम लेते ही मूड ऑफ!”

 

प्रिया हंस पड़ी। “पागल, वो बस प्रोटेक्टिव हैं। भाई हैं ना।”

 

रिया ने आंख मारी। “भाई? खून का नहीं ना? और भैया की नजरें… कुछ और कह रही हैं।”

 

प्रिया चुप हो गई। रिया की बात मन में घर कर गई।

 

रात को डिनर के बाद आरव और प्रिया लॉन में टहल रहे थे। ठंड थी, प्रिया ने शॉल ओढ़ी। आरव ने अपनी जैकेट उतारकर उसके कंधों पर डाल दी। “ठंड लग जाएगी।”

 

प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “भैया, तुम्हें खुद ठंड नहीं लगेगी?”

 

आरव ने पास आकर कहा, “तुझे ठंड लगे, ये मुझे बर्दाश्त नहीं।”

 

उनकी आंखें मिलीं। एक पल को समय रुक सा गया। आरव की नजरें प्रिया के चेहरे पर टिकीं – बालों की लट, आंखें, होंठ। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि प्रिया उसके लिए सिर्फ बहन नहीं… कुछ और है। वो एहसास जो सालों से दबा था, अब धीरे-धीरे बाहर आ रहा था। लेकिन वो खुद से लड़ रहा था। “ये गलत है… वो मेरी बहन है… दिल से।”

 

प्रिया ने भी कुछ फील किया। आरव की नजरों में वो गर्माहट नई थी। पहले भाई वाली, अब… कुछ और। उसका चेहरा गर्म हो गया। वो जल्दी से नजरें हटा ली। “भैया… चलो अंदर चलते हैं।”

 

आरव ने सिर हिलाया। लेकिन रात को वो सो नहीं पाया। पुरानी यादें आ रही थीं – छोटी प्रिया को गोद में उठाना, उसके साथ खेलना। लेकिन अब प्रिया बड़ी हो गई थी। खूबसूरत, स्ट्रॉन्ग, और उसके दिल के सबसे करीब।

 

अगले दिन कॉलेज में नया ट्विस्ट आया।

 

विक्रांत प्रिया के पास आया। “प्रिया, मुझे कुछ दिखाना है। दादी की डायरी में एक पुराना लेटर मिला – ठाकुर और राठौर की दुश्मनी का असली कारण।”

 

लाइब्रेरी के कोने में दोनों बैठे। लेटर में लिखा था – “1947 में ठाकुर हरि सिंह और राठौर विक्रम सिंह सबसे अच्छे दोस्त थे। दोनों ने मिलकर एक बड़ा बागान खरीदा था। लेकिन आजादी के बाद एक तीसरा आदमी – ब्रिटिश अफसर का एजेंट – ने दोनों को आपस में लड़वा दिया। झूठी अफवाह फैलाई कि एक ने दूसरे को धोखा दिया। असल में वो एजेंट जमीन हड़पना चाहता था। दोनों खानदानों ने सालों लड़ाई की, लेकिन जमीन एजेंट ले उड़ा।”

 

प्रिया हैरान। “तो दुश्मनी झूठी थी? किसी तीसरे की साजिश?”

 

विक्रांत ने कहा, “हां। दादी लिखती हैं कि अगर कभी ठाकुर और राठौर फिर मिलें तो सच बाहर लाएं।”

 

प्रिया मुस्कुराई। “तो हम… मिल गए।”

 

विक्रांत ने उसका हाथ छुआ। “प्रिया, शायद ये संकेत है। हम पुरानी गलतियां सुधार सकते हैं।”

 

प्रिया ने हाथ नहीं छुड़ाया, लेकिन दिल में आरव की याद आई। वो कन्फ्यूज हो गई।

 

शाम को घर लौटकर प्रिया ने आरव को लेटर दिखाया। आरव ने पढ़ा। उसका चेहरा बदल गया। “तो विक्रांत ने ये बताया?”

 

प्रिया ने हां कहा। आरव ने कुछ देर चुप रहकर कहा, “अच्छा है। पुरानी दुश्मनी खत्म हो।”

 

लेकिन उसकी आवाज में कुछ था – जलन? दर्द?

 

रात को प्रिया अपने कमरे में थी। आरव दरवाजे पर खड़ा था। “प्रिया… विक्रांत से मिलकर अच्छा लगा?”

 

प्रिया ने कहा, “हां भैया। वो अच्छा लड़का है। और अब दुश्मनी भी झूठी निकली।”

 

आरव पास आया। “लेकिन… अगर वो तेरे करीब आए तो?”

 

प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “भैया… तुम क्यों ऐसा पूछ रहे हो?”

 

आरव ने सांस रोकी। उसका दिल चीख रहा था – “क्योंकि मैं तुझे खोना नहीं चाहता। क्योंकि तू मेरे लिए सिर्फ बहन नहीं…” लेकिन वो बोल नहीं पाया। बस बोला, “बस… तेरी खुशी चाहता हूं।”

 

वो चला गया। प्रिया बिस्तर पर लेट गई। उसका दिल भी उलझा था। आरव की नजरें, उसकी केयर – वो भाई वाली थी या कुछ और? और विक्रांत की दोस्ती – वो आगे बढ़ेगी या नहीं?

 

बाहर बर्फ गिरने लगी थी। शिमला की पहली बर्फ। रोमांच शुरू हो रहा था – दिल का रोमांच। आरव के मन में प्रिया के लिए वो एहसास धीरे-धीरे पनप रहा था जो वो खुद से छिपा रहा था। प्रिया भी कुछ फील कर रही थी, लेकिन समझ नहीं पा रही।

 

और विक्रांत? वो भी प्रिया को पसंद करने लगा था। लेकिन अब त्रिकोण बनने की शुरुआत थी – धीरे-धीरे, बिना किसी जल्दबाजी के।

 

अवनी दूर से सब देख रही थी। मुस्कुरा रही थी। “अब असली खेल शुरू होगा।”

 

बर्फ गिर रही थी। दिलों में नई हलचल शुरू हो रही थी।

 

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