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नाराज़गी

पढ़ने का समय : 7 मिनट

नाराजगी इतनी बढ़ गई कि रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच गया

 

माही और काव्या की शादी को पांच साल हो चुके थे। दोनों की शादी परिवार की पसंद से हुई थी, लेकिन इन पांच सालों में उन्होंने एक-दूसरे को इतना समझ लिया था कि अब उनके बीच पति-पत्नी से ज्यादा अच्छे दोस्त जैसा रिश्ता था।

 

उनका एक छोटा-सा बेटा भी था—अंश।

 

घर में हंसी-मजाक रहता था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से सब कुछ बदलने लगा था।

 

माही का काम बहुत बढ़ गया था। वह सुबह जल्दी घर से निकलता और देर रात लौटता। काव्या दिनभर घर, बच्चे और अपनी जिम्मेदारियों में लगी रहती।

 

शुरुआत में वह माही की मजबूरी समझती थी।

 

लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में शिकायतें जमा होने लगीं।

 

एक रात माही करीब ग्यारह बजे घर आया।

 

काव्या सोफे पर बैठी उसका इंतजार कर रही थी।

 

माही ने जूते उतारते हुए पूछा, “अंश सो गया?”

 

“हां।”

 

“तुम अभी तक सोई नहीं?”

 

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

 

“आपका इंतजार कर रही थी।”

 

माही थका हुआ था।

 

“काव्या, आज बहुत काम था। तुम सो जाया करो। मेरा इंतजार मत किया करो।”

 

बस यही बात काव्या को चुभ गई।

 

“आपके लिए तो आसान है कहना कि इंतजार मत करो।”

 

माही ने उसकी तरफ देखा।

 

“अब क्या हुआ?”

 

“कुछ नहीं।”

 

“तो फिर बात खत्म करो।”

 

काव्या चुप हो गई।

 

लेकिन उस रात उसके मन में एक बात बैठ गई—

 

माही को अब उसकी परवाह नहीं रही।

 

अगले दिन भी दोनों के बीच ठीक से बात नहीं हुई।

 

फिर छोटी-छोटी बातें बड़ी बनने लगीं।

 

माही अगर फोन करना भूल जाता तो काव्या नाराज हो जाती।

 

काव्या अगर घर की कोई बात नहीं बताती तो माही को लगता कि वह जानबूझकर उसे दूर कर रही है।

 

दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे, लेकिन एक-दूसरे की बात समझने के बजाय अपने मन की बात को सच मानने लगे थे।

 

एक दिन काव्या की तबीयत ठीक नहीं थी।

 

उसने माही को फोन किया।

 

“आज जल्दी आ सकते हो?”

 

माही एक जरूरी मीटिंग में था।

 

“आज मुश्किल है। तुम डॉक्टर को दिखा लो।”

 

काव्या ने फोन रख दिया।

 

शाम को माही घर आया तो उसने देखा कि काव्या चुपचाप बैठी है।

 

“अब कैसी तबीयत है?”

 

“ठीक हूं।”

 

“डॉक्टर को दिखाया?”

 

“नहीं।”

 

माही परेशान हो गया।

 

“क्यों?”

 

काव्या ने कहा, “क्योंकि मुझे लगा, जब आपको समय ही नहीं है तो मैं अकेली ही ठीक हो जाऊंगी।”

 

माही को गुस्सा आ गया।

 

“हर बात को मेरे खिलाफ क्यों कर देती हो?”

 

“क्योंकि हर बार मैं ही समझौता करती हूं।”

 

“तो मत करो!”

 

माही के मुंह से ये शब्द निकलते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

काव्या की आंखें भर आईं।

 

“ठीक है। अब नहीं करूंगी।”

 

वह कमरे में चली गई।

 

माही वहीं खड़ा रह गया।

 

उसे एहसास था कि उसने गुस्से में बहुत बड़ी बात कह दी है।

 

लेकिन अहंकार ने उसे रोक दिया।

 

उसने माफी नहीं मांगी।

 

अगले कुछ दिनों तक दोनों एक ही घर में रहते हुए भी अजनबियों की तरह रहने लगे।

 

अंश बीच में फंस गया।

 

वह कभी मां के पास जाता तो मां चुप रहती। पिता के पास जाता तो पिता फोन में व्यस्त होने का बहाना कर लेते।

 

एक शाम अंश ने मासूमियत से पूछा—

 

“पापा, आप मम्मी से बात क्यों नहीं करते?”

 

माही के पास कोई जवाब नहीं था।

 

उधर काव्या ने यह बात सुन ली।

 

उस रात उसने माही से कहा—

 

“हमारी लड़ाई का असर अंश पर पड़ रहा है।”

 

माही ने धीरे से कहा, “मुझे पता है।”

 

“तो फिर इसे खत्म क्यों नहीं करते?”

 

माही कुछ कहने वाला था, तभी उसका फोन बजा।

 

काम का फोन था।

 

वह उठकर दूसरे कमरे में चला गया।

 

काव्या ने आंखें बंद कर लीं।

 

उसे लगा, शायद उनका रिश्ता अब माही की जिंदगी में आखिरी प्राथमिकता बन चुका है।

 

कुछ दिनों बाद काव्या ने अपने मायके जाने का फैसला कर लिया।

 

उसने अपना सामान बांधा।

 

माही कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।

 

“तुम सच में जा रही हो?”

 

“हां।”

 

“कितने दिन के लिए?”

 

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

 

“पता नहीं।”

 

माही का दिल बैठ गया।

 

“काव्या… बात इतनी बड़ी नहीं है।”

 

वह हल्की-सी हंसी।

 

“बात बड़ी नहीं थी माही। हमने उसे बड़ा बना दिया।”

 

“तो मत जाओ।”

 

“क्यों?”

 

माही चुप हो गया।

 

काव्या ने कहा—

 

“क्योंकि अगर मैं आज नहीं गई तो शायद हम दोनों कभी समझ नहीं पाएंगे कि हम एक-दूसरे को खो रहे हैं।”

 

वह चली गई।

 

घर अचानक खाली हो गया।

 

अंश भी कुछ दिनों के लिए नानी के घर चला गया।

 

अब उस घर में सिर्फ माही था।

 

वही घर, जहां कभी हंसी गूंजती थी, अब बिल्कुल शांत था।

 

एक रात माही को अलमारी में काव्या की पुरानी डायरी मिली।

 

उसने पढ़ना शुरू किया।

 

उसमें कोई शिकायत नहीं थी।

 

बस छोटी-छोटी बातें थीं।

 

“आज माही बहुत थका था, इसलिए मैंने उससे ज्यादा बात नहीं की।”

 

“आज उसका प्रेजेंटेशन था। उसने नहीं बताया, लेकिन मुझे पता है कि वह तनाव में है।”

 

“आज उसने मुझे चाय बनाकर दी। बहुत छोटी बात थी, लेकिन मेरा दिन अच्छा हो गया।”

 

माही की आंखें नम हो गईं।

 

उसे पहली बार समझ आया कि काव्या हर दिन उसके लिए छोटी-छोटी खुशियां जमा करती रही थी और वह उन्हीं खुशियों को सामान्य समझता रहा।

 

अगले पन्ने पर लिखा था—

 

“मैं माही से नाराज हूं, लेकिन उससे प्यार करना बंद नहीं कर सकती। बस चाहती हूं कि कभी वह मेरी चुप्पी भी समझे।”

 

माही ने डायरी बंद कर दी।

 

उस रात उसे नींद नहीं आई।

 

अगली सुबह वह सीधे काव्या के मायके पहुंच गया।

 

काव्या उसे देखकर चौंक गई।

 

“आप यहां?”

 

माही ने कहा—

 

“तुम्हें लेने नहीं आया हूं।”

 

काव्या चुप रही।

 

“मैं माफी मांगने आया हूं।”

 

काव्या की आंखें भर आईं।

 

माही ने कहा—

 

“मैं समझता रहा कि मैं परिवार के लिए मेहनत कर रहा हूं। लेकिन मैं भूल गया कि परिवार सिर्फ पैसे और जिम्मेदारियों से नहीं चलता। उसमें वक्त भी देना पड़ता है।”

 

काव्या कुछ नहीं बोली।

 

माही ने आगे कहा—

 

“तुम्हारी नाराजगी मुझे परेशान करती थी, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा कि उस नाराजगी के पीछे तुम्हारा अकेलापन था।”

 

काव्या की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“और मैंने भी गलतियां कीं,” उसने धीरे से कहा। “मैंने अपनी बात समझाने के बजाय चुप रहना शुरू कर दिया। मुझे लगा आप खुद समझ जाएंगे।”

 

माही ने सिर झुका लिया।

 

“शायद हम दोनों यही गलती करते रहे।”

 

कुछ देर दोनों चुप रहे।

 

फिर माही ने कहा—

 

“अगर तुम चाहो तो हम वापस शुरुआत कर सकते हैं।”

 

काव्या ने पूछा—

 

“और अगर फिर वही हुआ?”

 

माही ने उसकी तरफ देखकर कहा—

 

“तो इस बार हम चुप नहीं रहेंगे। बात करेंगे। गुस्सा होगा तो भी बात करेंगे। नाराज होंगे तो भी बात करेंगे। लेकिन एक-दूसरे से दूर नहीं जाएंगे।”

 

काव्या की आंखों में हल्की मुस्कान आई।

 

“पक्का?”

 

“पक्का।”

 

तभी अंश दौड़ता हुआ आया।

 

“मम्मी! पापा!”

 

दोनों ने उसे अपने बीच पकड़ लिया।

 

अंश खुशी से बोला—

 

“अब आप दोनों लड़ोगे नहीं?”

 

काव्या और माही एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए।

 

माही ने कहा—

 

“लड़ाई होगी तो भी जल्दी खत्म कर देंगे।”

 

अंश बोला—

 

“क्यों?”

 

काव्या ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

 

“क्योंकि हमें एक-दूसरे से ज्यादा अपनी नाराजगी प्यारी नहीं है।”

 

उस दिन दोनों घर लौट आए।

 

उनकी जिंदगी एक ही दिन में परफेक्ट नहीं हुई।

 

कभी फिर बहस होती, कभी कोई बात बुरी लगती।

 

लेकिन अब एक फर्क था।

 

वे चुप नहीं रहते थे।

 

क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि रिश्ते हमेशा किसी बड़े धोखे से नहीं टूटते।

 

कई बार रिश्ते छोटी-छोटी अनकही बातों, जमा होती नाराजगी और लंबे समय की चुप्पी से टूटने लगते हैं।

 

और कभी-कभी रिश्ते को बचाने के लिए किसी बड़े चमत्कार की जरूरत नहीं होती।

 

बस एक इंसान को अहंकार छोड़कर कहना पड़ता है—

 

“चलो, फिर से बात करते हैं।”

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