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बारिश में मिला प्यार

पढ़ने का समय : 7 मिनट

बारिश में मिला प्यार

 

पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा-सा गांव था—देवगढ़। चारों तरफ ऊंचे पहाड़, घने पेड़ और उनके बीच कुछ छोटे-छोटे घर। गांव से कुछ दूर सेना की एक चौकी थी, जहां तैनात जवान अक्सर कठिन मौसम में भी अपनी ड्यूटी निभाते थे।

 

उन्हीं जवानों में से एक था कैप्टन आदित्य, जिसकी उम्र अट्ठाईस साल थी। वह शांत स्वभाव का था और अपने काम को लेकर बहुत गंभीर रहता था।

 

एक रात आदित्य को एक जरूरी मिशन के लिए पहाड़ी रास्ते से आगे जाना था। मौसम अचानक बिगड़ गया। तेज बारिश, घना कोहरा और रास्ते पर गिरते पत्थरों के कारण आगे बढ़ना मुश्किल हो गया।

 

उसके साथ दो जवान और थे।

 

आदित्य ने आसपास देखा।

 

“आगे जाना अभी ठीक नहीं होगा। मौसम थोड़ा संभलने तक हमें कहीं रुकना पड़ेगा।”

 

पास ही उसे एक छोटा-सा घर दिखाई दिया।

 

उसने दरवाजा खटखटाया।

 

कुछ देर बाद एक बुजुर्ग आदमी ने दरवाजा खोला।

 

“कौन?”

 

आदित्य ने अपना परिचय दिया।

 

“हम सेना से हैं। मौसम बहुत खराब हो गया है। अगर कुछ देर यहां रुकने की इजाजत मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी।”

 

बुजुर्ग ने तुरंत दरवाजा खोल दिया।

 

“बेटा, इसमें पूछने की क्या बात है? अंदर आओ।”

 

घर में आदित्य और उसके साथियों के लिए चाय बनाई गई। बाहर बारिश लगातार तेज होती जा रही थी।

 

तभी कमरे की दीवार पर लगी एक तस्वीर पर आदित्य की नजर पड़ी।

 

तस्वीर में एक लड़की मुस्कुराती हुई खड़ी थी। उसकी आंखों में एक अजीब-सी सादगी थी।

 

आदित्य कुछ पल तस्वीर को देखता रहा।

 

बुजुर्ग ने उसकी नजर देख ली।

 

“मेरी बेटी है—नंदिनी।”

 

आदित्य ने तुरंत नजरें हटा लीं।

 

“बहुत अच्छी तस्वीर है।”

 

बुजुर्ग मुस्कुराए।

 

“वह अभी शहर में पढ़ाती है। छुट्टियों में ही घर आती है।”

 

आदित्य ने सिर हिलाया।

 

उसे खुद समझ नहीं आया कि उस तस्वीर ने उसका ध्यान इतना क्यों खींच लिया था।

 

रात बढ़ती गई।

 

कुछ घंटों बाद मौसम थोड़ा शांत हुआ और आदित्य अपने साथियों के साथ वहां से निकल गया।

 

जाते समय उसने बुजुर्ग से कहा—

 

“आपने हमारी मदद की, इसे मैं कभी नहीं भूलूंगा।”

 

बुजुर्ग ने कहा, “बेटा, तुम लोग हमारी रक्षा करते हो। आज अगर हम तुम्हें थोड़ी देर छत दे पाए तो इसे अपना सौभाग्य समझेंगे।”

 

आदित्य मुस्कुराया और वहां से चला गया।

 

लेकिन वह घर और दीवार पर लगी वह तस्वीर उसके मन में कहीं रह गई।

 

अगले कुछ दिनों तक मिशन बेहद कठिन रहा। आदित्य अपने काम में व्यस्त हो गया। फिर भी कभी-कभी उसे उस घर की याद आ जाती।

 

एक महीने बाद उसकी ड्यूटी उसी इलाके में लगी।

 

आदित्य को पता चला कि उस गांव के आसपास सेना का एक छोटा अभियान चलना है। काम खत्म होने के बाद वह उसी घर के पास से गुजर रहा था।

 

दरवाजे के बाहर वही बुजुर्ग बैठे थे।

 

उन्होंने आदित्य को पहचान लिया।

 

“अरे बेटा! तुम?”

 

“जी अंकल।”

 

“अंदर आओ।”

 

आदित्य अंदर गया तो इस बार दीवार के पास वही लड़की खड़ी थी, जिसकी तस्वीर उसने उस रात देखी थी।

 

बुजुर्ग ने कहा—

 

“ये मेरी बेटी नंदिनी।”

 

नंदिनी ने मुस्कुराकर नमस्ते किया।

 

“नमस्ते।”

 

आदित्य ने भी सिर झुकाया।

 

“नमस्ते।”

 

दोनों की पहली मुलाकात बस इतनी ही थी।

 

लेकिन उस छोटी-सी मुलाकात में आदित्य को महसूस हुआ कि तस्वीर में दिखने वाली मुस्कान असल में उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत थी।

 

नंदिनी ने चाय रखते हुए पूछा—

 

“आप उस रात भी यहां रुके थे ना?”

 

आदित्य थोड़ा हैरान हुआ।

 

“आपको पता है?”

 

नंदिनी हंस दी।

 

“पापा ने बताया था।”

 

फिर उसने कहा—

 

“उस रात मौसम बहुत खराब था। आपको डर नहीं लगा?”

 

आदित्य मुस्कुराया।

 

“डर तो लगा था। लेकिन मिशन पर निकले जवान डर से ज्यादा अपने काम के बारे में सोचते हैं।”

 

नंदिनी ने गंभीर होकर कहा—

 

“शायद इसी वजह से लोग आप लोगों पर भरोसा करते हैं।”

 

उसकी बात आदित्य के दिल में उतर गई।

 

इसके बाद जब भी आदित्य को समय मिलता, वह उस घर के पास चला जाता। कभी नंदिनी से गांव के बारे में बात होती, कभी किताबों के बारे में।

 

नंदिनी गांव के बच्चों को पढ़ाती थी। उसे लगता था कि पहाड़ों में रहने वाले बच्चों को भी अच्छे अवसर मिलने चाहिए।

 

आदित्य को उसकी यह सोच बहुत पसंद थी।

 

एक दिन नंदिनी ने पूछा—

 

“आप हमेशा ऐसे ही मिशन पर रहते हैं?”

 

“अक्सर।”

 

“और घर?”

 

आदित्य कुछ पल चुप रहा।

 

“घर बहुत दूर है। मां-पापा हैं। उनसे मिलने का समय कम मिलता है।”

 

नंदिनी ने धीरे से कहा—

 

“आपको उनकी बहुत याद आती होगी।”

 

“हां।”

 

फिर आदित्य ने मुस्कुराकर पूछा—

 

“आपको?”

 

“मुझे भी। लेकिन मेरा घर तो यही है।”

 

दोनों हंस पड़े।

 

धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी होने लगी।

 

आदित्य को एहसास हो चुका था कि वह नंदिनी को पसंद करने लगा है। लेकिन वह जानता था कि उसकी जिंदगी सामान्य नहीं थी।

 

उसने कभी नंदिनी से कोई वादा नहीं किया।

 

एक शाम उसे अचानक आदेश मिला।

 

उसे अगले दिन एक लंबे मिशन पर जाना था।

 

आदित्य नंदिनी के घर पहुंचा।

 

नंदिनी ने उसे देखते ही पूछा—

 

“सब ठीक है?”

 

आदित्य ने कहा—

 

“मुझे जाना होगा।”

 

“कहां?”

 

“ये नहीं बता सकता।”

 

नंदिनी कुछ देर चुप रही।

 

फिर बोली—

 

“आप लौटेंगे?”

 

आदित्य ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

 

“कोशिश पूरी रहेगी।”

 

नंदिनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

 

“तो मैं इंतजार करूंगी।”

 

आदित्य ने पहली बार महसूस किया कि उसके लिए लौटना अब सिर्फ ड्यूटी नहीं रहा था।

 

उसके पीछे कोई इंतजार करने वाला भी था।

 

कई सप्ताह गुजर गए।

 

नंदिनी को आदित्य की कोई खबर नहीं मिली। वह रोज शाम गांव के रास्ते की तरफ देखती।

 

उसके पिता ने कहा—

 

“बेटी, फौज की जिंदगी ऐसी ही होती है। खबर न मिले तो इसका मतलब हमेशा बुरा नहीं होता।”

 

नंदिनी चुप रहती।

 

फिर एक दिन दूर से सेना की गाड़ी दिखाई दी।

 

गाड़ी से आदित्य उतरा।

 

नंदिनी उसे देखते ही दरवाजे तक आ गई।

 

आदित्य मुस्कुराया।

 

“कहा था ना… कोशिश पूरी रहेगी।”

 

नंदिनी की आंखें नम थीं।

 

“बहुत देर कर दी।”

 

आदित्य ने कहा—

 

“माफ करना।”

 

“मैं नाराज नहीं हूं।”

 

कुछ पल दोनों चुप रहे।

 

फिर आदित्य ने उसके पिता के सामने कहा—

 

“अंकल, मैं नंदिनी को पसंद करता हूं। मेरी जिंदगी आसान नहीं है। कभी मुझे महीनों दूर रहना पड़ सकता है। कभी मेरी ड्यूटी मुझे कहीं भी ले जा सकती है। मैं नंदिनी से कोई झूठा वादा नहीं करना चाहता। लेकिन अगर आप दोनों की सहमति हो तो मैं उसके साथ अपनी जिंदगी बिताने की इच्छा रखता हूं।”

 

नंदिनी के पिता कुछ देर उसे देखते रहे।

 

फिर मुस्कुराकर बोले—

 

“बेटा, तुमने मेरी बेटी से प्यार करने से पहले उसकी जिंदगी की सच्चाई समझी है। इससे बड़ी बात मेरे लिए कुछ नहीं।”

 

नंदिनी की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

 

कुछ महीनों बाद दोनों ने परिवार की सहमति से शादी कर ली।

 

शादी के बाद भी आदित्य की ड्यूटी चलती रही। वह अक्सर दूर रहता, लेकिन जब भी छुट्टी मिलती, उसी पहाड़ी घर में लौटता।

 

एक दिन वह उसी कमरे में बैठा था, जहां पहली बार उसने नंदिनी की तस्वीर देखी थी।

 

अब उसी दीवार पर उनकी शादी की तस्वीर लगी थी।

 

नंदिनी ने मुस्कुराकर पूछा—

 

“उस रात मेरी तस्वीर देखकर आपको क्या लगा था?”

 

आदित्य हंस पड़ा।

 

“सच बताऊं?”

 

“हां।”

 

“मुझे लगा था कि मौसम खराब होने की वजह से मैं बस कुछ घंटों के लिए इस घर में रुका हूं।”

 

नंदिनी ने पूछा—

 

“फिर?”

 

आदित्य ने उसकी ओर देखकर कहा—

 

“फिर पता चला कि वो बारिश मुझे जिंदगी का सबसे खूबसूरत रास्ता दिखाने आई थी।”

 

बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

 

आदित्य ने खिड़की से बाहर देखा और मुस्कुराया।

 

जिस तूफान ने उसे उस रात रास्ते में रोक दिया था, उसी तूफान ने उसे उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत रिश्ता दे दिया था।

 

और नंदिनी के लिए भी वह सिर्फ एक फौजी नहीं था।

 

वह उस रात की बारिश से मिला वह इंसान था, जिसने उसे सिखाया था कि कभी-कभी जिंदगी की सबसे खूबसूरत मुलाकातें बिल्कुल अनजाने में होती हैं।

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