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राजा जनक की अनदेखी कहानी

पढ़ने का समय : 3 मिनट

 

मिथिला की अग्नि परीक्षा: जब राजमहल जल रहा था

यह उन दिनों की बात है जब मिथिलापुरी ज्ञान, कला और समृद्धि के शिखर पर थी। राजा जनक, जिन्हें ‘विदेह’ कहा जाता था, वे राज्य के सिंहासन पर तो बैठते थे, राजकाज भी पूरी कुशलता से करते थे, लेकिन भीतर से वे संसार के सभी मोह-माया से पूरी तरह मुक्त थे। उनका मानना था कि वे केवल एक निमित्त मात्र हैं, सब कुछ परमात्मा का है।

 

एक दिन, राजा जनक अपनी विशाल राजसभा में बैठे थे। विद्वान शास्त्रों पर चर्चा कर रहे थे और संगीत का वातावरण था। तभी, राजद्वार पर एक सैनिक हाँफता हुआ आया। उसने घबराते हुए सूचना दी, “महाराज! क्षमा करें… नगर के दूसरे छोर पर भीषण आग लग गई है। तेज़ हवा के कारण आग तेज़ी से राजमहल की ओर बढ़ रही है।”

 

पूरी सभा में हड़कंप मच गया। मंत्री और दरबारी चिंता में पड़ गए। स्वयं महारानी सुनयना भी घबराकर राजा जनक की ओर देखने लगीं। राजमहल में शाही खज़ाना, कीमती रत्न, महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और अनगिनत कलाकृतियाँ थीं।

लेकिन, राजा जनक के चेहरे पर रत्ती भर भी शिकन नहीं आई। वे शांत बैठे रहे और उन्होंने संगीत रुकवाने से भी मना कर दिया।

 

कुछ देर बाद, एक मंत्री ने अधीर होकर कहा, “महाराज! आग राजमहल के बहुत निकट आ चुकी है। कृपया आदेश दें, सेवक खज़ाने और राजसी वस्तुओं को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना शुरू करें। यदि विलंब हुआ, तो सब कुछ भस्म हो जाएगा।”

राजा जनक ने बहुत मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया, “मंत्रीवर, आप लोग व्यर्थ ही चिंता कर रहे हैं। मेरी मिथिलापुरी में जो कुछ भी है, वह सब प्रजा का है और ईश्वर की कृपा से है।”

 

उन्होंने आगे कहा, “मैं ‘विदेह’ हूँ। मेरा अपना कुछ भी नहीं है, जो जलने का भय हो। यदि यह राजमहल प्रारब्ध वश जल रहा है, तो इसे जलने दो। मैं अपनी मानसिक शांति को इस भौतिक संपत्ति के नष्ट होने के डर से अशांत नहीं होने दूँगा।”

दरबारी अवाक रह गए। वे राजा की इस विरक्ति को देखकर हैरान थे। आग की लपटें अब राजमहल की खिड़कियों से दिखने लगी थीं। धुएँ से पूरा दरबार भर गया था। लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे।

 

उसी क्षण, एक और चमत्कार हुआ। जैसे ही आग की लपटें उस कक्ष के दरवाज़े तक पहुँचीं जहाँ राजा जनक बैठे थे, हवा की दिशा अचानक बदल गई। देखते ही देखते, राजमहल के चारों ओर की आग बुझने लगी और धीरे-धीरे शांत हो गई।

 

राजमहल का वह हिस्सा, जहाँ राजा जनक अपनी सभा के साथ पूर्ण स्थिरता और शांति से बैठे थे, पूरी तरह सुरक्षित बच गया। बाकी नगर में भी जहाँ-जहाँ भक्तों ने ईश्वर का नाम लिया, वहाँ आग ने कम क्षति पहुँचाई।

जब धुआँ छँटा, तो सबने देखा कि राजा जनक उसी भाव-विभोर अवस्था में बैठे हैं। उन्हें आग के ताप का तनिक भी अनुभव नहीं हुआ था।

 

यह घटना पूरे राज्य में फैल गई। प्रजा ने इसे कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि राजा जनक के सत्य और आत्म-ज्ञान की शक्ति का परिणाम माना।

 

इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि राजा जनक सचमुच ‘विदेह’ थे—वे शरीर में रहते हुए भी शरीर के प्रति आसक्त नहीं थे, और राजमहल के स्वामी होते हुए भी उसके मोह में नहीं फँसे थे। उनका यही निस्वार्थ और अनासक्त भाव उनकी

सबसे बड़ी शक्ति थी।

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