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मीरा बाई विवाह की एक अनकही कहानी

पढ़ने का समय : 11 मिनट

 

 

 

 

इतिहास के पन्नों में जब भी प्रेम और समर्पण की बात आती है, तो राधा के बाद सबसे पहला और प्रखर नाम मीराबाई का आता है। मीरा केवल एक रानी नहीं थीं, वे एक ऐसी विद्रोहिणी थीं जिन्होंने समाज की रूढ़ियों को तोड़कर अपने आराध्य को ही अपना सब कुछ मान लिया था। उनका जीवन एक राजसी महल से शुरू होकर वृंदावन की गलियों और द्वारका के रणछोड़ मंदिर तक की एक लंबी आध्यात्मिक यात्रा है।

 

इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वह विवाह था, जिसने एक ओर उन्हें मेवाड़ के राजघराने की बहू बनाया, और दूसरी ओर उनके और उनके गिरधर गोपाल के बीच की दूरी को और कम कर दिया। यह कहानी सिर्फ दो लोगों के मिलने की नहीं, बल्कि एक आत्मा के परमात्मा से विवाह की प्रस्तावना है।

 

 

कहानी शुरू होती है राजस्थान के पाली जिले में स्थित छोटे से गाँव कुड़की से, जहाँ वि.सं. 1555 (लगभग 1498 ई.) में मीरा का जन्म हुआ। उनके पिता राव रतन सिंह थे, जो मेड़ता के शासक राव दूदा के पुत्र थे। मीरा अभी बहुत छोटी थीं जब उनकी माँ का देहांत हो गया। इसलिए, उनका लालन-पालन उनके दादा राव दूदा के संरक्षण में मेड़ता के किले में हुआ।

राव दूदा एक अत्यंत धार्मिक और वीर पुरुष थे। मेड़ता का माहौल भक्तिमय था। घर में संतों का आना-जाना था, भजन-कीर्तन होते थे। बचपन से ही मीरा ने इन सब को अपनी आँखों में और अपने हृदय में उतारा।

 

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब मीरा बहुत छोटी थीं, एक बार उनके घर में कोई साधु आए। उनके पास एक बहुत सुंदर कृष्ण की मूर्ति थी। मीरा उस मूर्ति पर मोहित हो गईं। उन्होंने हठ पकड़ लिया कि वे उसी मूर्ति के साथ खेलेंगी और उसे ही अपना पति मानेंगी। साधु ने पहले तो बच्ची की नासमझी समझकर मना किया, लेकिन मीरा के दृढ़ प्रेम को देखकर वे पिघल गए और उन्होंने वह मूर्ति मीरा को दे दी।

 

उस दिन से, वह छोटी सी कृष्ण की मूर्ति मीरा की सगी साथी बन गई। वे उसके साथ खेलतीं, उसे लाड़ लड़ातीं, उसे ही अपना सब कुछ मानतीं। यह बचपन का भोलापन कब एक गहरे, अटूट प्रेम में बदल गया, किसी को पता ही नहीं चला।

 

समय बीतता गया और मीरा यौवन की देहरी पर कदम रखने लगीं। वे न केवल अत्यंत रूपवती थीं, बल्कि उनके सुसंस्कार और मधुर व्यवहार की चर्चा भी दूर-दूर तक थी। उस समय उत्तर भारत में राजपूतों की शक्ति को संगठित करने की आवश्यकता थी।

 

मेवाड़ का सिसोदिया राजवंश उस समय राजपूताना में सबसे शक्तिशाली माना जाता था। मेवाड़ के महाराणा सांगा, जो एक पराक्रमी योद्धा थे, अपने बड़े पुत्र कुँवर भोजराज के लिए एक योग्य वधू की तलाश में थे। राव दूदा और महाराणा सांगा के बीच अच्छे संबंध थे। जब सांगा ने मीरा के रूप, गुण और कुल की ख्याति सुनी, तो उन्होंने मेड़ता में विवाह का प्रस्ताव भेजा।

 

राजनीतिक दृष्टि से यह एक बहुत मजबूत गठबंधन था। मेड़ता के राठौड़ और चित्तौड़ के सिसोदिया—दोनों मिलकर दिल्ली के सुल्तानों और अन्य आक्रांताओं का बेहतर सामना कर सकते थे। राव दूदा ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

 

 

जब मीरा को इस विवाह के बारे में पता चला, तो उनके कोमल हृदय पर जैसे वज्र गिर गया। वे तो पहले ही अपना मन, अपना तन, अपना सर्वस्व गिरधर गोपाल को समर्पित कर चुकी थीं। उनके लिए किसी अन्य पुरुष के बारे में सोचना भी पाप था।

 

लेकिन, उस समय की राजपूती परंपराओं में लड़कियों के पास अपने विवाह के निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं था। वे अपने पिता और कुल की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकती थीं। मीरा एक गहरे अंतर्द्वंद्व (Dilemma) में फँस गईं। एक ओर कर्तव्य की बेड़ियाँ थीं, और दूसरी ओर प्रेम की पुकार।

 

कहा जाता है कि मीरा ने अपनी कुलदेवी की पूजा की और अपने इष्टदेव कृष्ण से प्रार्थना की। उन्होंने इस रिश्ते को स्वीकार तो किया, लेकिन एक शर्त के साथ—कि वे अपनी कृष्ण मूर्ति को हमेशा अपने साथ रखेंगी और उनकी पूजा-अर्चना में कोई बाधा नहीं डाली जाएगी।

 

 

मेड़ता में विवाह की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से शुरू हो गईं। वि.सं. 1573 (लगभग 1516 ई.) में मीरा का विवाह मेवाड़ के युवराज कुँवर भोजराज के साथ अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ। यह विवाह पूरे राजपूताना में चर्चा का विषय था।

बारात चित्तौड़गढ़ से आई थी, जो अपनी वीरता और भव्यता के लिए प्रसिद्ध था। मीरा को राजसी आभूषणों से सजाया गया। वे एक अप्सरा जैसी लग रही थीं, लेकिन उनके चेहरे पर वह स्वाभाविक खुशी नहीं थी जो एक दुल्हन के चेहरे पर होनी चाहिए। उनकी आँखों में अपने आराध्य से बिछड़ने का डर और एक अज्ञात भविष्य के प्रति चिंता थी।

विदाई का समय आया। मीरा की डोली जब मेड़ता के किले से निकली, तो पूरा मेड़ता भावुक हो गया। राव दूदा ने अपनी लाड़ली पोती को वह कृष्ण मूर्ति उपहार में दी, जिसे वह बचपन से पूजती आ रही थीं। यह मूर्ति ही अब मीरा का एकमात्र संबल थी।

 

 

मीराबाई अब मेवाड़ की वधू बनकर चित्तौड़गढ़ पहुँचीं, जो अरावली की पहाड़ियों पर बना एक अभेद्य दुर्ग है। यह दुर्ग वीरता की कहानियों और जौहर की ज्वालाओं का साक्षी रहा है। मीरा का यहाँ भव्य स्वागत किया गया।

कुँवर भोजराज एक वीर योद्धा थे और वे मीरा के प्रति बहुत संवेदनशील और उदार थे। उन्होंने मीरा की भावनाओं को समझा। इतिहासकार बताते हैं कि भोजराज ने मीरा की पूजा के लिए महल में एक अलग मंदिर बनवाया, जिसे आज भी मीरा मंदिर के नाम से जाना जाता है (जो कुंभ श्याम मंदिर के परिसर में है)।

 

शुरुआत में, मीरा ने एक आदर्श बहू और पत्नी की भूमिका निभाने की पूरी कोशिश की। उन्होंने राजघराने की सभी रीतियों का पालन किया। लेकिन उनका मन राजकाज या सांसारिक सुखों में नहीं लगता था। जैसे ही उन्हें समय मिलता, वे अपने मंदिर में चली जातीं और घंटों कृष्ण की भक्ति में लीन रहतीं।

 

मीरा का जीवन जितना बाहर से शांत और भव्य था, अंदर से उतना ही अशांत और चुनौतियों भरा था। राजघराने की परंपराएँ कठोर थीं और पर्दा प्रथा का कड़ाई से पालन होता था। एक महारानी का मंदिरों में जाना, साधु-संतों के साथ बैठना और भजन गाना—यह सब राज परिवार की मर्यादा के विरुद्ध माना जाता था।

 

मीरा की सास, महाराणा सांगा की पत्नी (कुँवर भोजराज की माता), इस बात से बहुत खफा थीं। उन्हें लगता था कि मीरा का यह व्यवहार उनके कुल की प्रतिष्ठा को धूमिल कर रहा है। वे मीरा को ताने देतीं और उन्हें रोकने का प्रयास करतीं।

मीरा की ननद, उदयसिंह की बहन (कुछ स्रोतों के अनुसार कुँवरबाई), भी अक्सर मीरा की आलोचना करती थीं। वे मीरा पर व्यंग्य कसतीं कि उन्होंने लोक-लाज त्याग दी है। मीरा के लिए इन तानों को सहना बहुत कठिन था, लेकिन वे सब कुछ सहती रहीं। उनका उत्तर केवल उनके प्रेमपूर्ण भजन थे।

 

इन्हीं कठिन परिस्थितियों में मीरा की कविताओं और भजनों का जन्म हुआ। उनके शब्द उनके हृदय की गहराई से निकलते थे। उन्होंने राजस्थानी, ब्रज और गुजराती मिश्रित भाषा में हजारों पद रचे, जिन्हें ‘मीरा पदावली’ के नाम से जाना जाता है।

 

उनके भजनों में दो धाराएँ थीं—एक तरफ गहरी विरह वेदना (Separation Pain) थी, जिसमें वे अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने के लिए तड़पती थीं। वे खुद को एक ‘बिरहिन’ मानती थीं। दूसरी तरफ, उस मिलन की खुशी और उस अद्वैत प्रेम का वर्णन था, जहाँ आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं।

 

“पायो जी मैंने राम रतन धन पायो…”

“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई…”

ये भजन आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं। उस समय इन भजनों ने पूरे समाज में एक नई चेतना जगा दी। वे राजमहल की चारदीवारी से बाहर निकलकर आम लोगों के दिलों पर छाने लगीं।

 

मीरा के विवाह के कुछ ही वर्ष बीते थे (लगभग 1521 ई. में), जब मेवाड़ पर एक और विपत्ति आ गई। दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ हुए खातोली के युद्ध में कुँवर भोजराज घायल हो गए और बाद में उनका देहांत हो गया।

मीरा अभी बहुत युवा थीं और इस घटना ने उन्हें पूरी तरह तोड़कर रख दिया। सांसारिक दृष्टि से, उनका पति, उनका सहारा और उनका रक्षक अब इस दुनिया में नहीं था। राजपूती परंपरा के अनुसार, उस समय सती प्रथा का प्रचलन था, लेकिन मीरा ने सती होने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे तो पहले ही गिरधर गोपाल को अपना पति मान चुकी हैं और वे उन्हीं की ‘सती’ हैं।

 

भोजराज के निधन के बाद, मीरा का जीवन और भी कठिन हो गया। ससुराल में अब उनके पास कोई ऐसा नहीं था जो उनकी समझ रखता हो। उनका देवर, महाराणा विक्रमादित्य, जो अब गद्दी पर बैठा था, वह और भी रूढ़िवादी और क्रूर था।

 

महाराणा विक्रमादित्य को मीरा का साधु-संतों के साथ उठना-बैठना और राजघराने की मर्यादा का उल्लंघन करना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने कई बार मीरा को मारने का प्रयास किया।

 

सबसे प्रसिद्ध कथा विष के प्याले की है। महाराणा ने एक विष का प्याला मीरा के पास भेजा और कहलाया कि यह अमृत है, जिसे पीकर आपको प्रभु का आशीर्वाद मिलेगा। मीरा जानती थीं कि इसमें विष है, लेकिन उन्होंने बिना किसी डर या संकोच के, “कृष्णार्पण” कहकर उस विष को पी लिया।

 

जनश्रुति है कि प्रभु की कृपा से वह विष मीरा के लिए अमृत बन गया और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा।

दूसरी कथा में, महाराणा ने मीरा के कमरे में एक फूलों की टोकरी में एक जहरीला काला नाग (कोबरा) रखवाया और उनसे कहा कि इसमें शालिग्राम (विष्णु का प्रतीक पत्थर) हैं। जब मीरा ने टोकरी खोली, तो सचमुच वह नाग एक सुंदर शालिग्राम में बदल गया।

 

इन चमत्कारों ने लोगों के मन में मीरा के प्रति श्रद्धा और बढ़ा दी। वे अब केवल एक विधवा राजकुमारी नहीं थीं, बल्कि एक साक्षात् संत और देवी मानी जाने लगीं।

 

दिन-प्रतिदिन के अत्याचारों और राजघराने की घुटन भरी ज़िंदगी से तंग आकर, मीरा ने चित्तौड़ छोड़ने का निर्णय लिया। वे अब समझ चुकी थीं कि उनकी असली दुनिया चित्तौड़ का राजमहल नहीं, बल्कि उनके गिरधर गोपाल की सेवा है।

 

उन्होंने एक अंतिम पद गाया, जिसमें उन्होंने अपनी विवशता और अपने निर्णय को स्पष्ट किया:

“राणा जी, म्हाँने या बदनामी लागे प्यारी।

सूली ऊपर सेज हमारी, सोवन किस विधि होय?

गगन ऊपर मंदिर हमारा, तहाँ बसै प्रभु मोय।”

(अर्थात्: हे राणा, मुझे यह सांसारिक बदनामी अब प्यारी लगने लगी है क्योंकि यह मुझे मेरे प्रभु के करीब लाती है। काँटों की सेज पर मैं कैसे सोऊँ? मेरा मंदिर तो गगन के ऊपर है, जहाँ मेरे प्रभु निवास करते हैं।)

कहा जाता है कि मीरा चित्तौड़ से निकलकर पहले मेड़ता गई, और फिर वहाँ से वृंदावन की पवित्र भूमि की ओर प्रस्थान कर गईं। वे अब एक साधारण जोगन थीं, जिनके हाथों में एकतारा था और मुँह पर कृष्ण का नाम।

 

वृंदावन, जो कृष्ण की बाल लीलाओं का साक्षी है, वहाँ पहुँचकर मीरा को परम शांति मिली। उन्होंने खुद को पूरी तरह भक्ति में लीन कर दिया।

यहाँ एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना का उल्लेख मिलता है। उस समय वृंदावन में गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का बहुत प्रभाव था, जिसके प्रमुख संत रूप गोस्वामी थे। रूप गोस्वामी ने नियम बना रखा था कि वे किसी भी स्त्री से नहीं मिलेंगे।

जब उन्हें पता चला कि मेवाड़ की महारानी मीराबाई उनसे मिलने आई हैं, तो उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया। इस पर मीरा ने एक बहुत ही मार्मिक संदेश भेजा:

“मैं जानती थी कि वृंदावन में केवल एक ही पुरुष (कृष्ण) है, और बाकी सब गोपियाँ हैं। आज मुझे पता चला कि यहाँ रूप गोस्वामी भी एक पुरुष हैं।”

 

इस संदेश ने रूप गोस्वामी को हिला दिया। वे अपनी गलती समझ गए और तुरंत मीरा से मिलने दौड़े। उन्होंने मीरा के चरणों में गिरकर उनसे क्षमा माँगी और उन्हें अपना शिष्य बना लिया।

 

वृंदावन में कुछ समय बिताने के बाद, मीरा को लगा कि अभी भी उनकी यात्रा पूरी नहीं हुई है। वे वहाँ से द्वारका (गुजरात) के लिए चल पड़ीं, जो कृष्ण की कर्मभूमि और अंतिम विश्राम स्थल है।

 

द्वारका में, वे रणछोड़ दास (कृष्ण) के मंदिर में रहने लगीं। उन्होंने अपना पूरा समय भजन-कीर्तन और पूजा में बिताया। उनका स्वास्थ्य अब गिरने लगा था, क्योंकि उन्होंने शरीर की बहुत उपेक्षा की थी। वे अत्यंत कमजोर हो गई थीं, लेकिन उनकी आँखों में एक दिव्य चमक थी।

 

मीराबाई के जीवन का अंतिम क्षण इतिहास और आस्था का एक अद्भुत संगम है। कहा जाता है कि वि.सं. 1603 (लगभग 1546 ई.) में एक दिन, मीरा मंदिर में गर्भगृह के सामने खड़ी होकर भावविभोर होकर गा रही थीं।

“म्हाँने चाकर राखो जी, गिरधर लाला चाकर राखो जी…”

गाते-गाते वे इतनी तल्लीन हो गईं कि ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वे मूर्ति की ओर खिंची चली जा रही हैं। मंदिर के कपाट बंद थे। जब पुजारियों ने कपाट खोले, तो देखा कि मीराबाई अपनी देह में नहीं थीं, बल्कि उनकी साड़ी का एक हिस्सा उस कृष्ण मूर्ति के चरणों से लिपटा हुआ था।

 

मीराबाई अपने प्रियतम गिरधर गोपाल में समा चुकी थीं। आत्मा परमात्मा से पूर्णतया एक हो गई थी।

उपसंहार: विवाह जो विच्छेद नहीं, मिलन बना

मीराबाई का विवाह कुँवर भोजराज के साथ हुआ था, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। लेकिन उनका असली विवाह उस दिन हो गया था, जिस दिन उन्होंने बचपन में वह कृष्ण मूर्ति अपने हाथों में ली थी।

 

भोजराज के साथ उनका विवाह एक सामाजिक समझौता था, जिसे उन्होंने एक कर्तव्य के रूप में निभाया। लेकिन उनका हृदय, उनकी आत्मा और उनका समर्पण केवल कृष्ण के लिए था।

 

ससुराल की प्रताड़ना, विष के प्याले और राजसी सुखों का त्याग—इन सबने मिलकर एक साधारण राजकुमारी को एक अमर संत बना दिया। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं, समर्पण है। मीराबाई आज भी हमारे बीच मौजूद हैं—उनके भजनों में, उनकी कविताओं में और उन लाखों लोगों की आस्था में जो प्रेम और भक्ति की शक्ति में विश्वास करते हैं।

 

 

उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा विवाह दो शरीरों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का मिलन होता है, जिसे मृत्यु भी अलग नहीं कर सकती।

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